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मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

कैसा होता है वो प्रेम ?

अभी कुछ दिन पहले अमृता और इमरोज जी के बारे में कुछ पढ़ा और वो दिल में उतर गया । तभी कुछ भाव उभरे जिन्हें शब्दों में बाँधने की कोशिश की है --------------


ना वादा किया
ना वादा लिया
मगर फिर भी
साथ चले
ना इंतज़ार किया
ना इंतज़ार लिया
मगर फिर भी
हमेशा साथ रहे
कभी अल्फाज़ की
जरूरत ना रही
दिल ने ही दिल से
मुलाक़ात की
भावों को पढने के लिए
नज़रों ने ही नज़रों से
बात की
जो तुम कह ना सकी
जो मैं कह ना सका
मगर रूह ने रूह से
फिर भी बात की
वादों पर गुजर करने वाले
प्रेमी नही होते
आँख में अश्क जो दे
वो साहिल नही होते
कुछ प्रेम देह के पिंजर से अलग
रूह के अवसान के लिए होते हैं
वादों की खोखली
चादर में लिपटे नही होते
इंतज़ार के पैबंद के
मोहताज़ नही होते
लफ़्ज़ों की बानगी की जहाँ
जरूरत नही होती
प्रेम अभिव्यक्ति का
मोहताज़ नही होता
सिर्फ रूह ही रूह की
सरताज होती है
रूह ही रूह की
माहताब होती है
कैसा होता है वो प्रेम
या
सिर्फ वो ही प्रेम होता है

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

उसने पुकारा मुझको

कल का दिन
मेरी ज़िन्दगी का
वो दिन था
जब मैं ज़िन्दगी के
करीब था
वो
जिससे मैंने मिलना चाहा
इक नज़र देखना चाहा
लाखों पैगाम भेजे
मिन्नतें की
सदके किये
मगर ये सोच
पत्थर भी कभी
पिघले हैं
खामोश हो जाता था
और अपनी
मोहब्बत से मजबूर हो
बार - बार
आवाज़ दिए जाता था
मगर उस दर पर
कभी मेरी
ना फरियाद कबूल हुई
ना ही कोई
जवाब आया
मगर ना जाने
ये मोहब्बत की
कशिश थी
या मेरी
दुआओं का असर
कल मेरी मोहब्बत ने
पुकारा मुझको
आवाज़ दी
हिमखंड शायद
पिघल रहा था
लम्हा वहीँ ठहर गया
शब्द वहीँ रुक गए
जुबान खामोश हो गयी
धडकनों की धड़कन भी
थम सी गयी
मेरे पंखों को
परवाज़ मिल गयी थी
मेरे गीतों को
आवाज़ मिल गयी थी
होशो- हवास ना जाने
किन फिजाओं में
तैर रहे थे
ख्वाबों को भी शायद
पंख मिल रहे थे
तन- मन झंकृत
हो रहा था
बिना साज के सुर
सज रहे थे
गीतों की बयार
बहने लगी थी
मैं कल्पनाओं के
आकाश में
विचर रहा था
तभी उसने फिर पुकारा
तब ख्यालों की
नींद से जागा
यथार्थ के धरातल
पर उतरा
यूँ लगा
किसी दर्द के गहरे
कुएं से आवाज़ आई हो
किस मजबूरी से मजबूर हो
उसने पुकारा मुझे
किस बेबसी से बेबस हो
आवाज़ दी होगी
इस ख्याल ने ही
रूह कंपा दी मेरी
वो जो मिलना तो दूर
बात भी ना करना चाहती हो
वो जो ख्यालों में भी
किसी को ना आने देती हो
वो जो हवाओं के
साये से भी
कतराती हो
वो जो चांदनी से भी
घबराती हो
वो जो गुलों के
खिलने से भी
शरमा जाती हो
ना जाने किस
भावना के वशीभूत हो
उसने पुकारा मुझे
उसके दर्द की
थाह कैसे पाउँगा
किन शब्दों का
मरहम लगाऊँगा
कैसे उसकी सर्द आवाज़ में
ठहरे दर्द के सागर को
लाँघ पाउँगा
कैसे उसे उसके दर्द से
जुदा कर पाउँगा
कैसे उसके जीवन के
गरल को सुधा सागर में
बदल पाउँगा
कहाँ से वो दामन लाऊँ
जहाँ मिलन की
ख़ुशी को सहेजूँ
या
उसके दर्द की
इम्तिहान देखूँ
किस दामन में
उसकी बेबसी के
दर्द की
मिटटी को समेटूँ


सोमवार, 21 दिसंबर 2009

एक कोशिश

कुछ परवाजों को पंख नही मिला करते
कुछ दरख्तों पर फूल नही खिला करते

अब तो कलमों की स्याही भी सूख चुकी है



कोई मेरे आंसुओं को पिए ----तो क्यूँ?
कोई मेरे ज़ख्मों को सिंए ----तो क्यूँ ?

यादों का उधड़ना अभी बाकी है


लबों पर जो हमने, ख़ामोशी का कफ़न ओढ़ लिया
तो दर्द मेरा, क्यूँ तेरे चेहरे पर उतर आया है

क्या चाहत का कोई क़र्ज़ अब भी बाकी है

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

कहाँ सजाऊँ इसे

तेरे रूप के सागर में
उछलती -मचलती
लहरों सी
चंचल चितवन
जब तिरछी होकर
नयन बाण चलाती है
ह्रदय बिंध- बिंध जाता है
धडकनें सुरों के सागर पर
प्रेम राग बरसाती हैं
केशों का बादल
जब लहराता है
सावन के कजरारे
मेघ छा जाते हैं
अधरों की अठखेलियाँ
कमल पर ठहरी ओस -सी
बहका- बहका जाती हैं
क़दमों की हरकत पर तो
मौसम भी थिरक जाते हैं
ऋतुओं के रंग भी
बदल- बदल जाते हैं
रूप- लावण्य की
अप्रतिम राशि पर तो
चांदनी भी शरमा जाती है
फिर कैसे धीरज
रख पाया होगा
तुझे रचकर विधाता
कुछ पल ठिठक गया होगा
और सोच रहा होगा
लय और ताल के बीच
किसके सुरों में सजाऊँ इसे
किस शिल्पकार की
कृति बनाऊँ इसे
किस अनूठे संसार में
बसाऊँ इसे
किसके ह्रदय आँगन में
सजाऊँ इसे
किस भोर की उजास
बनाऊँ इसे
किस श्याम की राधा
बनाऊँ इसे

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

प्रेम को साकार बना दें ...........१०० वी पोस्ट

दोस्तों ,

आज ज़िन्दगी पर १०० वी पोस्ट डाल रही हूँ । उम्मीद करती हूँ हमेशा की तरह इसे भी आप सबका स्नेह प्राप्त होगा।

इक उम्र
इंतज़ार किया तेरा
तुम अपने जीवन की
हलचलों में गुम थे
मैं अपनी ज़िन्दगी की
खानाबदोशी में खुश थी
मगर फिर भी
इक प्यास थी
किसी की चाहत थी
एक आस थी
एक विश्वास था
कोई न कोई
तो होगा
जो मेरा होगा
या किसी की
रूह की तस्वीर
मैं होऊँगी
देह का जीवन तो
जी चुकी थी
रूह का जीवन
अभी सूना था
न जाने किस
इंतज़ार में.........
ज़िन्दगी यूँ ही
गुजरती रही
और उम्र यूँ ही
बढती रही
आज जब सोच
कुंद हो चुकी है
मानस क्षुब्ध
हो चुका है
चाहत सब
भस्म हो चुकी है
उम्र का आखिरी
पड़ाव आ चुका है
उस पड़ाव पर
तुम मिले हो मुझे
मेरा इंतज़ार करते हुए
जन्मों से खोज रहे थे
मिलन की बाट जोह रहे थे
विरह- व्यथा का दावानल
जो अंतस में जला था
आओ चिर- प्रतीक्षित
उर- ज्वाला को
भावों की चांदनी में
नहला दें
तुम्हारे चेहरे की लकीरों में
छुपे वियोग के दर्द को
कुछ चाहत का मरहम लगा दूँ
जन्मों से तेरी नज़रों में
ठहरे पतझड़ को
अपनी नज़रों के नेह से
वासंतिक बना दूँ
अधरों पर पसरे मौन को
शब्दों का जामा पहना दूँ
अब मत पढो
चेहरे को
तुम्हारा ही अक्स
नज़र आएगा
तुम और मैं
दो थे ही कब
वक्त का ही
तो परदा था
जो इंतज़ार का दर्द
तूने सहा
वो क्या मुझसे
जुदा था
आओ , आज मिलन
को साकार बना दें
जन्मों से बिछड़े
प्रेम को साकार बना दें
दोनों के अव्यक्त प्रेम को
प्रेम का प्रतिबिम्ब बना
चिरनिद्रा में सो जाएँ
रूह का रूह से
मिलन करा दें
आओ , प्रेम को
साकार बना दें

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

मैं नहीं आने वाली

अब मुझे
मत पुकारना
ना देना आवाज़
मैं नही आने वाली
लम्हा - लम्हा
युग बना
तेरा इंतज़ार
करते- करते
और युग
बीतते- बीतते
जन्म बदल गए
जन्मों के बिछड़े हैं
जन्मों तक
बिछड़ते ही रहेंगे
अब तेरे प्रेम की
चाह में ना तडपेंगे
ना तुझे आवाज़ देंगे
ना तेरे दीदार को तरसेंगे
जन्मों की प्यास को
अब और बढ़ाना होगा
तुझे मुझसे
मिलने से पहले
ख़ुद को भी
इसी आग में
अब जलाना होगा
एक बार फिर
जन्मों के इंतज़ार को
अगले कुछ और
जन्मों तक
निभाना होगा
इंतज़ार के लम्हों को
तुझे भी तो जीना होगा
जन्मों की मौत को
तुझे भी तो सहना होगा
कुंदन बनने के लिए
तुझे भी तो तपना होगा
मेरे प्यार के काबिल बनने के लिए
इस आग को सहना होगा
फिर आवाज़ देना मुझे
जब आग का दरिया पार कर लो
फिर आवाज़ देना मुझे
जब ख़ुद को इतना तपा लो
फिर आवाज़ देना मुझे
अपने प्रेम का अहसास करवाना
गर तेरे प्रेम पर
यकीं आया मुझे
तो इक प्रेम परीक्षा देना
गर हो गए अनुत्तीर्ण
फिर ना आवाज़ देना मुझे
मैं नही आने वाली

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

आखिरी ख़त

मेरा ये आखिरी ख़त
और ये अन्तिम शब्द
क्या तुम्हें
उद्वेलित कर पाएँगे?
मेरी ह्रदय व्यथा को
क्या ये बयां कर पाएँगे?
गर कर दिया बयाँ
तो क्या तुम
उसे समझ पाओगी?
गठबंधन में बँधे
जब हम तुम
वचन लिया था दोनों ने
इक दूजे को चाहेंगे
साथ न छोड़ेंगे इक पल
फिर कौन सी
मुझसे खता हुई
जिसकी ये सज़ा मिली
क्या प्रेम में मेरे
कोई खोट था
या कोशिशें मेरी
नाकाम रही
तुम्हारी इक -इक अदा पर तो
मेरे दिल-ओ-जान गए
तुम्हारी हर ख्वाहिश को
मैंने अपना बनाया
तेरे लबों के तबस्सुम पर तो
दिल मेरा मचलता था
कौन सी ख्वाहिश ऐसी
जो न पूरी कर पाया मैं
कौन सी ऐसी हसरत थी
जिसे समझ न पाया मैं
फिर भी किस खता की
सज़ा दे चली गई तुम
पल-पल युगों सा बीतता है
और पल -पल में
युगों सी मौत मरा मैं
बाबुल के अँगना जाकर
पिया का दामन भुला दिया
एक चाहने वाले को
खतावार बना दिया
मेरे हर प्रयास को
निराशा का जामा पहना दिया
हर दरवाज़ा तुमने बंद किया
हर आस को तुमने तोड़ दिया
घनघोर निराशा फैली है
अब जीवन बगिया मेरी सूनी है
किस आस के सहारे जियूँ में
किसको अपना कहूँ मैं
तुम बिन जग
सूना लगता है
जीना मौत से
बदतर लगता है
रोज काँटों की
सेज पर सोता हूँ
हर पल तुम्हारे
लिए ही रोता हूँ
अब न रहा वश ख़ुद पर
कोई राह न सूझती है
तुम बिन प्रिया
जीवन की डगर अधूरी है
कैसे अधूरा जियूँ मैं
ये ज़हर का घूँट
कैसे पियूँ मैं
अब न सहा जाता है
तुम बिन रहा न जाता है
दरो- दीवार में
तुम्हारा
अक्स ही
नज़र आता है
इसलिए
विदा चाहता हूँ तुमसे
अन्तिम विदाई देना मुझे
कर सको तो इतना करना
अन्तिम यात्रा में आकर
दीदार अपना दिखा जाना
जो जीते जी न मिला
वो सुकून रूह को तो
दिला जाना
इस आखिरी ख़त को भी
चिता के साथ जला देना
जैसे मुझे भुला दिया
वैसे ही हर याद को वहीँ जला देना
अब आखिरी सलाम लो मेरा
लो अब ख़ुद को
ख़त्म मैं करता हूँ
और तुमसे
अन्तिम विदा मैं लेता हूँ

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

सूखे दरख़्त का दर्द

अपनी दुनिया में मस्त हैं सभी
हम ही सबसे विलग हैं
जितनी रात गहरी होगी
अकेलापन अभी और बढेगा
हर काले गहराते साये के साथ
तन्हा सफर कैसे कटेगा
दिन भी गुजरा, साँझ भी गुजर गई
रात का दामन ही क्यूँ गहरा है
रात के बढ़ते पहरों पर अब
वक्त का न कोई पहरा है
जीवन की इस सांझ का
अब न कोई सवेरा है
पल - छिन पंख लगाकर
अब नही उड़ पाते हैं
इक - इक पल में गहराते
अकेलेपन के साये हैं

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

यादों का सन्नाटा

यादों की सूनी
पगडण्डी पर
जो कदम पड़ा
दूर -दूर तक
एक सन्नाटा ही
बिखरा पड़ा था
कहीं सूखे
पत्तों के नीचे
यादों का मलबा
दबा हुआ था
तो कहीं
किसी शाख से लिपटी
कोई अधूरी - सी ,
बिखरी - सी याद
अपनी बेबसी पर
आंसू बहाती मिली
कोई याद वक्त के
शोलों में जलती मिली
तो कोई याद
मन के रसातल में
दबी-सिसकती मिली
मगर फिर भी
उनका सन्नाटा
उनकी सिसकियाँ
भी न तोड़ पायीं
न जाने कैसी
वो यादें थीं
और कैसा
घनघोर सन्नाटा था
शायद यादों के
अंतस का सन्नाटा था
जहाँ कभी कोई
दिया जला न पाया था
किसी चाँद की चांदनी
वहां तक कभी
पहुँच ही ना पाई थी
सिर्फ़ सन्नाटा
यादों को सीने से लगाये
उनके दर्द को,
उनके ज़ख्मों को
अपनी ख़ामोशी से
सहला रहा था

शनिवार, 28 नवंबर 2009

निशा का दर्द

रवि और निशा
कभी न मिल पाए
संध्या माध्यम भी बनी
मगर रवि ने तो
सिर्फ़ संध्या को चाहा
उसे ही अपना बनाया
अपना स्वरुप उसमें ही डुबाया
और निशा अपने
दर्द को समेटे
हर नई सुबह
भोर के उजाले पर
आस लगाये
टकटकी बांधे
अपने रवि का
इंतज़ार करती रही
मगर रवि ना कभी
निशा के दामन में झाँका
न उसके प्रेम की इम्तिहाँ
कभी जान पाया
निशा चातक सी
तरसती रही
सिसकती रही
और रवि ने ना
निशा का दर्द जाना
न ही उस ओर निहारा
मगर प्रतीक्षारत निशा
अपना इंतज़ार निभाती रही
सिर्फ़ एक दिन के
मिलन की चाह में
अपना पल -पल मिटाती रही
आस का दिया
हर क्षण जलाती रही
और फिर एक दिन
उसके इंतज़ार को
विराम मिला
जब संध्या से
मिलन को आतुर
रवि को ग्रहण ने
निगलना चाहा
उसके चेहरे पर
कालिमा का रंग
गढ़ना चाहा
अचानक निशा ने
अपना दामन फैला
रवि को अपने
आगोश में समेट लिया
उसकी ज़िन्दगी भर की
बेरुखी को भुला
अपने दामन में पनाह दी
आज रवि और निशा का
अद्भुत मिलन था
जिस इंतज़ार में
उसने अपना हर पल
जलाया था
आज उसके
हर जलते पल पर
रवि ने अपने प्रेम का
मरहम लगाया था
आह ! शायद आज रवि
संध्या और निशा के
प्रेम का फर्क जान पाया था

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

बेरुखी का दर्द

पास होकर
क्यूँ दूर
चले जाते हो
दिल को मेरे
क्यूँ इतना
तड़पाते हो
तेरी बेरुखी
लेती है
जान मेरी
मत कर ऐसा
कहीं ऐसा न हो
तेरी बेरुखी पर
अगली साँस आए
या न आए
और तेरी दिल
तोड़ने की अदा
कहीं तेरी
सज़ा न बन जाए
फिर लाख
सदाएं भेजो
मुझे न
जहाँ में पाओगे
मेरी याद में
फिर तुम भी
इक दिन
तड़प जाओगे
मेरे रूठने पर
मुझे ना मना पाओगे
और इक दिन
इसी दर्द के
आगोश में
सिमट जाओगे
फिर मेरे दर्द के
अहसास को
समझ पाओगे
दिल तोड़ने की
सज़ा जान पाओगे
हर पल तड़पोगे
मगर मुझे न
पास पाओगे
तब तुम बेरुखी
का दर्द जान पाओगे

शनिवार, 21 नवंबर 2009

' तू ' और ' मैं '

मैं , मैं रही
तुम , तुम रहे
कभी 'मैं ' को
'हम' बनाया होता
तो जीवन भी
मुस्कुराया होता
कभी जिस्म के
पार गए होते
कभी रूह को अपना
बनाया होता
कभी प्रेम का वो दीप
जलाया होता
जहाँ तुम , तुम न होते
जहाँ मैं , मैं न होती
कभी संवेदनाओं की जाली में
समय के झरोखों से
कुछ अप्रतिम प्रेम की
बरखा बरसाई होती
तन नही , मन को
भिगोया होता
कुछ देर वहां रुका होता
तो वक्त वहीँ ठहर गया होता
हमारे मिलन के लिए
ठिठक गया होता
प्रेम को प्रेम में
डूबते देखा होता
अंतर्मन की दरारों से
कभी प्रेमरस छलकाया होता
मधुर ह्रदय के तारों से
कभी प्रेम धुन गायी होती
सूनी अटरिया कभी तो
सजाई होती
तो जीवन की विष बेल
सुधा सागर में नहायी होती
फिर वहां
न 'तू' होता
न ' मैं होती
सिर्फ़ प्रेम की ही
बयार होती
और ' तू ' और ' मैं '
अलग अस्तित्व न होकर
प्रेमास्पद बन गए होते

बुधवार, 18 नवंबर 2009

ज़ख्मों के फूल

कुछ मौन मौन होकर भी कितने मुखर होते हैं
और कभी शब्दों को भी जुबान नही मिलती

कभी मेरे मन को सहलाया होता
तो दर्द तेरी उँगलियों में सिमट आया होता

नासूरों पर कभी अश्क टपकाया होता
तो अश्क को भी जलता पाया होता

मोहब्बत के ज़ख्मों की इम्तिहाँ तो देख
हर ज़ख्म में अपना ही चेहरा पाया होता

कभी किसी रोयें को छुआ होता
तो हर रोयें पर लिखा अपना ही नाम पाया होता

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

ज़िन्दगी के रंग कैसे- कैसे

उजासों की कतरन
सांसों की धड़कन
लम्हों की सिहरन
अरमानों की थिरकन
भोर की गुनगुन
ज़िन्दगी को जीवंत करती


सांझ का पतझड़
रात का खंडहर
अहसासों का अकाल
चेहरों का बांझपन
दिलों का सूनापन
रिश्तों का बेगानापन
प्रतीक्षित लम्हों का खोखलापन
ज़िन्दगी को मृत्युतुल्य बनाता


आह ! ज़िन्दगी
कब , कैसे
भोर की लालिमा से
सांझ की कालिमा बन जाती

ज़िन्दगी पहेली है न सहेली
ज़िन्दगी एक ऐसी खोज है
जिसकी कोई मंजिल नहीं

अब लब सील लो
या खुलकर जी लो
निर्भर तुम पर करता है

ये आशिकी है न दीवानगी
खामोश सफ़र की कोई इन्तेहा सी
करती है गुफ्तगू
क्या जी सकते हो मुझे सच में ?
है इतनी जिन्दादिली ?

गर हो कोई जवाब तो आ जाना ज़िन्दगी के पालने में झूलने
मीठी लोरी सुना सुला देगी
स्वप्न मीठा फिर दिखा देगी
भोर में फिर जगा देगी
अपने होने के अर्थ बता देगी ...





रविवार, 15 नवंबर 2009

मैं इंतज़ार करूँगा ..........

कभी वादा तो नही किया
मगर फिर भी
मैं इंतज़ार करूँगा तेरा
एक जनम की मुझे चाह नही
तुझसे मिलने की कोई राह नही
मगर फिर भी
मैं इंतज़ार करूँगा तेरा
इस कायनात के उस
आखिरी जनम तक
जब तुम सिर्फ़ मेरी होगी
तुम्हारा दीदार सिर्फ़ मेरा होगा
शरीर तो हर जनम मिलते रहे हैं
इंतज़ार है उस आख़िर जनम का
जब तेरी रूह का प्यार भी
सिर्फ़ मेरा होगा
मैं इंतज़ार करूँगा..............

रविवार, 1 नवंबर 2009

किसी ने कभी लिखा ही नही

मुझे इंतज़ार है
उस एक ख़त का
जिसमें मजमून हो
उन महकते हुए
जज्बातों का
उन सिमटे हुए
अल्फाजों का
उन बिखरे हुए
अहसासों का
जो किसी ने
याद में मेरी
संजोये हों
कुछ न कहना
चाहा हो कभी
मगर फिर भी
हर लफ्ज़ जैसे
दिल के राज़
खोल रहा हो
धडकनों की भी
एक -एक धड़कन
खतों में सुनाई देती हो
आंखों की लाली कर रंग
ख़त के हर लफ्ज़ में
नज़र आता हो
इंतज़ार का हर पल
ज्यूँ ख़त में उतर आया हो
हर शब्द किसी की तड़प का
किस के कुंवारे प्रेम का
किसी के लरजते जज्बातों का
जैसे निनाद करता हो
जिसमें किसी की
प्रतीक्षारत शाम की
उदासी सिमटी हो
आंखों में गुजरी रात का
आलम हो
दिन में चुभते इंतज़ार के
पलों का दीदार हो
किसी के गेसुओं से
टपकती पानी की बूँदें
जलतरंग सुनाती हों
किसी के तबस्सुम में
डूबी ग़ज़ल हो
किसी के बहकते
ज़ज्बातों का रूदन हो
किसी के ख्यालों में
डूबी मदहोशी हो
किसी की सुबह की
मादकता हो
किसी की यादों में
गुजरी शाम की सुगंध हो
हर वो ख्यालात हो
जहाँ सिर्फ़
महबूब का ही ख्वाब हो
प्यार की वो प्यास हो
जहाँ जिस्मों से परे
रूहों के मिलन का
जिक्र हो
हर लफ्ज़ जहाँ
महबूब का ही
अक्स बन गया हो
मुझे इंतज़ार है
उस एक ख़त का
जो किसी ने कभी
लिखा ही नही
किसी ने कभी...................

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

स्वीकार करूँ मैं भी तुमको

अंगीकार किया जब तुमने
क्यूँ नही चाहा तब
स्वीकार करूँ मैं भी तुमको
जब बांधा इस बंधन को
गठजोड़ लगा था हृदयों का
फिर क्यूँ नही चाहा तुमने
अंगीकार करूँ मैं भी तुमको
दान लिया था जब तुमने
तब क्यूँ नही चाहा तुमने
वस्तु बना कर
कोई तुम्हें भी दान करे
सिन्दूर भरा था जब माँग में
वादे किए थे जब जन्मों के
तब क्यूँ नही चाहा तुमने
मेरी उम्र भी दराज़ हो
तुम भी बंधो उसी बंधन में
जिसका सिला चाहा मुझसे
अर्धांगिनी बनाया जब मुझको
तब क्यूँ नही चाहा तुमने
तुम भी अर्धनारीश्वर बनो
अपूर्णता को अपनी
सम्पूर्णता में पूर्ण करो
इक तरफा स्वीकारोक्ति तुम्हारी
क्यूँ तुम्हें आंदोलित नही कर पाती है
मेरी स्वीकारोक्ति क्या तुम्हारे
पौरुष पर आघात तो नही
जब तक मैं न अंगीकार करूँ
जब तक मैं न तुम्हें स्वीकार करूँ
अपना वजूद कहाँ तुम पाओगे
फिर क्यूँ नही चाहा तुमने
अपना वजूद पाना मुझमें
फिर क्यूँ नही चाहा तुमने
स्वीकार करूँ में भी तुमको
स्वीकार करूँ मैं .......................

बुधवार, 28 अक्टूबर 2009

मोहब्बत ये तूने क्या किया

किसी ने ख्वाब भी बनाया
पलकों में भी बसाया
किसी के दिल की धड़कन भी बनी
ज़िन्दगी की आरजू भी बनी
उसे भी अपने दिल की धड़कन बनाया
उसके ख्वाबों को भी
अपनी आंखों में सजाया
उसकी हर चाहत को अपना बनाया
बस उसकी इक हसरत को
जो न अपनाया
उस इक कसूर की
सज़ा ये मिली
उसने भी
पलकों से गिरा दिया
धडकनों को भी
क़ैद कर दिया
बे-मुरव्वत मोहब्बत का
पाक गला भी घोंट दिया
इश्क के न जाने
कौन से मुकाम पर ले जाकर
शाख से टूटे पत्ते की मानिन्द
दर -दर भटकता छोड़ दिया
आह ! मोहब्बत ये तूने क्या किया

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

भावों के टुकड़े

कभी कभी
कुछ भावों को ठांव नही मिलती
जैसे चिरागों को राह नही मिलती

सर्द अहसासों से दग्ध भाव
जैसे अलाव दिल का जल रहा हो

कुछ भाव टूटकर यूँ बिखर गए
जैसे रेगिस्तान में पानी की बूँद जल गई हो

कुछ भावों के पैमाने यूँ छलक रहे हैं
जैसे टूटती साँसे ज़िन्दगी को मचल रही हों



गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009

सिर्फ़ तू ही तू

कल शाम
जब पर्वतों के
साये में
बादलों के
दामन में
ख्यालों की
फसल पक रही थी
तेरी याद ने
दस्तक दी
अन्दर आने की
इजाज़त मांगी
मगर इजाज़त
देता कौन
कुछ ख्याल
तो मेरे
तेरे ख्यालों में
गुम थे
कुछ ख्याल मेरे
तेरे आगोश में
खो गए थे
ना मैं था वहां
ना मेरे ख्याल
सिर्फ़ तेरा ही
तो वजूद था
फिर ख़ुद से
कैसे इजाज़त
मांग रही हो

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009

गुफ्तगू

सुरमई शाम ने झाँका बाहर
निशा दामन फैला रही थी
मिलन को आतुर दोनों सखियाँ
अपने पंख फैला रही थी
शाम का धुंधलका छाने लगा था
निशा का आँचल भी लहराने लगा था
पक्षियों का कलरव भी सो गया था
प्रकृति का दामन भी भिगो गया था
मिलन के इंतज़ार में
कदम आगे बढ़ रहे थे
खामोशी के साये
चहुँ ओर बढ़ रहे थे
कदम-ब-कदम ,धीरे-धीरे
निशा ने शाम का हाथ पकड़ा
सखियों के नैना मिले
कुछ गुफ्तगू हुई
आँखों ही आँखों में
और फिर
निशा ने शाम के हर पल पर
अपना साया फैला दिया
उसका हर हाल जान लिया
और अपने आगोश में
उसके हर दर्द को समेट लिया
इक नई सुबह होने तक............

रविवार, 18 अक्टूबर 2009

बस एक बार ..................

तुम पुकार लो
एक बार
आवाज़ तो दो
मैं वक्त नही
जो वापस आ ना सकूं
मैं ख्वाब नही
जो फिर
देखा जा ना सकूं
तेरी इक आवाज़ पर
रस्मों के बंधन छोड़कर
रिवाजों की जंजीर तोड़कर
नदिया सी
उफनती ,मचलती
अपने सागर में समाने को
दौडी चली आउंगी
तुम एक बार पुकारो तो सही
दिल की कश्ती को
दरिया में उतारो तो सही
मैं वो लहर नही
जो वापस आ न सके
मैं वो डोर नही
जिसे तू सुलझा न सके
तेरे इक इशारे पर
तेरे गीतों के निर्मल धारे पर
पायल छनकाती
प्रीत का गीत गाती
तेरी सरगम की पुकारों पर
प्रेम रस बरसाती
इठलाती,बलखाती
आ जाउंगी
बस तुम एक बार
पुकारो तो सही
मुझे वापस
बुलाओ तो सही

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009

भीगा हूँ बहुत

भीगा हूँ बहुत
अश्कों के बहते धारों में
डूबा हूँ बहुत
तेरे दिए दर्द के सैलाबों में


भटका हूँ बहुत
तेरी जुल्फों के गलियारों में बहका हूँ बहुत
तेरे रेशमीअहसासों में


बस बहुत हुआ
अब और न इम्तिहाँ ले
मत मार मुझे
यूँ याद में तडपा-तडपा कर


सिर्फ़ एक बार आकर
सीने पर खंजर चला दे
दिल के टुकड़े- टुकड़े कर दे

कि
जीने की आरज़ू पूरी हो जाए 
दिल की हर हसरत निकल जाए 
और 
मोहब्बत की यूँ नज़र उतर जाए

रविवार, 11 अक्टूबर 2009

तुम जीत गए ,मैं हार गई

दो विपरीत ध्रुवों सा
जीवन अपना
साजन यूँ ही बीत गयातुम अपने धरातल से
बंधे रहे
मैं अपने बांधों में
सिमटी रही
तुम वक्त के प्रवाह संग
बहते रहे
मैं वक्त के साथ
न चल सकी
तुमने पाया हर
स्वरुप मुझमें
मैं तुममें कृष्ण
न पा सकी
धूप छाँव के
इस खेल में साजन
तुम जीत गए
मैं हार गई

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

सफर निशा का

स्याह रात का तन्हा सफर
ज्यों प्रियतम बिन सजनी का श्रृंगार
किस मिलन को आतुर निशा
पल -पल का अँधेरा समेट रही है
भोर के उजास से मिलन को
क्यूँ विरह के पल गिन रही है
ये क्षण -क्षण गहराता अँधियारा
तन्हाईयाँ बढाता जाता है
निशा के गहरे दामन को
और गहराता जाता है
कौन बने तन्हाई का साथी
स्याह रात के स्याह सायों के सिवा
विरह अगन में दग्ध निशा
ज्यों बेवा नूतन श्रृंगार किए हो
प्रिय मिलन की आस में जैसे
विरहन का कफ़न ओढ़ लिया हो