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सोमवार, 21 दिसंबर 2009

एक कोशिश

कुछ परवाजों को पंख नही मिला करते
कुछ दरख्तों पर फूल नही खिला करते

अब तो कलमों की स्याही भी सूख चुकी है



कोई मेरे आंसुओं को पिए ----तो क्यूँ?
कोई मेरे ज़ख्मों को सिंए ----तो क्यूँ ?

यादों का उधड़ना अभी बाकी है


लबों पर जो हमने, ख़ामोशी का कफ़न ओढ़ लिया
तो दर्द मेरा, क्यूँ तेरे चेहरे पर उतर आया है

क्या चाहत का कोई क़र्ज़ अब भी बाकी है

27 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

लबों पर जो हमने, ख़ामोशी का कफ़न ओढ़ लिया
तो दर्द मेरा, क्यूँ तेरे चेहरे पर उतर आया है
क्या चाहत का कोई क़र्ज़ अब भी बाकी है?

वाह बहुत सुन्दर!
रचना छोटी होते हुए भी बहुत प्रभावशाली है!
बधाई!

अजय कुमार ने कहा…

गहरे जज्बात लिये अर्थपूर्ण रचना

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

लबों पर जो हमने, ख़ामोशी का कफ़न ओढ़ लिया
तो दर्द मेरा, क्यूँ तेरे चेहरे पर उतर आया है
क्या चाहत का कोई क़र्ज़ अब भी बाकी है?
बहुत खूब वन्दना जी !

नीरज गोस्वामी ने कहा…

कामयाब कोशिश....बेहतरीन रचना...अलग रंग...अलग रूप...वाह...
नीरज

महफूज़ अली ने कहा…

कोई मेरे आंसुओं को पिए ----तो क्यूँ?
कोई मेरे ज़ख्मों को सिंए ----तो क्यूँ ?

यादों का उधड़ना अभी बाकी है...

सिर्फ...यादों का उधड़ना बाकी है..... बहुत सुंदर पंक्तियाँ ....

क्या चाहत का कोई क़र्ज़ अब भी बाकी है....?

यह पंक्ति कहीं अन्दर तक उतर गयीं....

बहुत सुंदर कविता...

M VERMA ने कहा…

लबों पर जो हमने, ख़ामोशी का कफ़न ओढ़ लिया
खामोशी का कफन नूतन प्रयोग
सुन्दर अभिव्यक्ति

rashmi ravija ने कहा…

बहुत ही ख़ूबसूरत कविता...गागर में सागर समेटे हुए

हास्यफुहार ने कहा…

रचना अच्छी लगी।

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी रचना।

shikha varshney ने कहा…

waah aakhiri line kamal ki hai..sunder kavita.

'अदा' ने कहा…

लबों पर जो हमने, ख़ामोशी का कफ़न ओढ़ लिया
तो दर्द मेरा, क्यूँ तेरे चेहरे पर उतर आया है

क्या चाहत का कोई क़र्ज़ अब भी बाकी है

ye panktoyaan lajwaab ban padi hain..behtareen..
mujhe bahut nahut pasand aayin hain..
badhai...

Sadhana Vaid ने कहा…

कोई मेरे आँसुओं को पिए.. ..तो क्यूँ?

कोई मेरे ज़ख्मों को सिए....तो क्यूँ?

यादों का उधड़ना अभी बाकी है

बहुत ही मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ हैं वन्दनाजी । बहुत बहुत बधाई और अभिनन्दन !

योगेश स्वप्न ने कहा…

तो दर्द मेरा, क्यूँ तेरे चेहरे पर उतर आया है
क्या चाहत का कोई क़र्ज़ अब भी बाकी है?

behaaren.

योगेश स्वप्न ने कहा…

behatareen.

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

... सुन्दर रचना !!!

kshama ने कहा…

Dua karungi,aisa koyi qarz bacha na ho...

रंजना ने कहा…

peeda ko shabdon me badi sarthak abhivyakti di aapne...bahut hi sundar rachna...

chandrabhan bhardwaj ने कहा…

teenon sher achchhe hain poori ghazal kar letin to achchha hota.
Sunder sheron ke liye badhai

रचना दीक्षित ने कहा…

हर शब्द अपनी दास्ताँ बयां कर रहा है आगे कुछ कहने की गुंजाईश ही कहाँ है बधाई स्वीकारें

दिगम्बर नासवा ने कहा…

कुछ परवाजों को पंख नही मिला करते
कुछ दरख्तों पर फूल नही खिला करते ...

बहुत ही लाजवाब बात लिखी है आपने ........ उम्दा शेर है ......

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

गहरे भाव लिए हुए हैं यह सुन्दर रचना शुक्रिया

psingh ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन रचना
बहुत बहुत आभार

Dinesh Rohilla ने कहा…

वाह बहुत खूब वन्दना जी !

sangeeta ने कहा…

अब तो कलमों की स्याही भी सूख चुकी है



कोई मेरे आंसुओं को पिए ----तो क्यूँ?
कोई मेरे ज़ख्मों को सिंए ----तो क्यूँ ?

यादों का उधड़ना अभी बाकी है
बहुत मार्मिक प्रस्तुति.... बधाई

प्रीति टेलर ने कहा…

ek baar fir ek khubsurat ahsaas ka sailab bandh todkar nikal aaya ....

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

just speachless ji

kya kahun aur kya na kahun ...

संजय भास्‍कर ने कहा…

कुछ कहने की गुंजाईश ही कहाँ है बधाई स्वीकारें