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गुरुवार, 22 अक्तूबर 2009

सिर्फ़ तू ही तू

कल शाम
जब पर्वतों के
साये में
बादलों के
दामन में
ख्यालों की
फसल पक रही थी
तेरी याद ने
दस्तक दी
अन्दर आने की
इजाज़त मांगी
मगर इजाज़त
देता कौन
कुछ ख्याल
तो मेरे
तेरे ख्यालों में
गुम थे
कुछ ख्याल मेरे
तेरे आगोश में
खो गए थे
ना मैं था वहां
ना मेरे ख्याल
सिर्फ़ तेरा ही
तो वजूद था
फिर ख़ुद से
कैसे इजाज़त
मांग रही हो

22 टिप्‍पणियां:

ओम आर्य ने कहा…

वन्दना जी
आप भी अपने गहरे भावो मे डुबा ही देते हो .....बेहद खुबसूरत रचना!

GATHAREE ने कहा…

prem ki sundar abhivyakti

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन रचना..खुद से इजाजत कैसी!!

M VERMA ने कहा…

खूबसूरत एहसासो को पिरोने मे आप तो माहिर है. जैसे मोतिया चुन चुन कर पिरोये गये हो.
बेहद और बेहद खूबसूरत

Mishra Pankaj ने कहा…

तेरी याद ने
दस्तक दी
अन्दर आने की
इजाज़त मांगी
मगर इजाज़त
देता कौन
कुछ ख्याल
तो मेरे
तेरे ख्यालों में
गुम थे


बहुत सुन्दर , आभार आपका !

पवन *चंदन* ने कहा…

विचारों के चारों और विचरती रचना ।
बहुत खूब रही, अच्‍छी और मनभावन लगी।

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत सुन्दर भाव हैं यह शुक्रिया

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सिर्फ़ तेरा ही
तो वजूद था
फिर ख़ुद से
कैसे इजाज़त
मांग रही हो

सुन्दर अभिव्यक्ति है।
स्वयं से बाते करने का आपका अन्दाज
बढ़िया लगा।

श्रीकांत पाराशर ने कहा…

NA MAIN THA VAHAN, NA MERA VAZUD THA, SHIRF TERA HI KHAYAL THA, kitna sundar likha hai aapne, bahut umda srijan.

श्रीकांत पाराशर ने कहा…

NA MAIN THA VAHAN, NA MERA VAZUD THA, SHIRF TERA HI KHAYAL THA, kitna sundar likha hai aapne, bahut umda srijan.

योगेश स्वप्न ने कहा…

vandana ji , ek baar phir purani baat dohra raha hun, aapki rachnaon men ek apnapan lagta hai. bahut umda abhivyakti. badhai.

Abhishek Prasad ने कहा…

कुछ ख्याल तो मेरे तेरे ख्यालों में गुम थे....

mere khyaal to abhi bhi aapki in bhaavon mein gum hai... ek behtarin kavita ke liye dhanyavaad...

शोभना चौरे ने कहा…

achhi abhivykti khyalo ki

Babli ने कहा…

बहुत ही सुंदर और गहरे भाव के साथ लिखी हुई आपकी ये शानदार रचना प्रशंग्सनीय है!

राकेश कुमार ने कहा…

प्रेम समर्पण है , त्याग है, जीवन है, यह एक दूसरे के रूह मे जैसे समाहित हो जाने की एक विधा का नाम है, जब आत्मिक प्रेम किसी से मनुष्य का हो जाता है तो एक प्रेमी और प्रेयसी दोनो ही स्वयम का अस्तित्व एक दूसरे मे तलाशने लगते है,फिर सारी औपचारिकताये गौड हो जाती है,अपनी प्रियतमा के प्रति एक प्रेमी के इसी तरह भावो का सुन्दर रेखान्कन .

प्रीति टेलर ने कहा…

sachmuch sundar kavita

रचना दीक्षित ने कहा…

सुंदर अभिव्यक्ति,
सच ही कहा जब मैं और तू हों तो किसी और की गुजाइश ही कहाँ होती है

दिगम्बर नासवा ने कहा…

SACH HAI JAB TOO AUR MAIN EK HO TO KON SE IZAAJAT AUR KISKI IZAAJAT .... BAHOOT LAJAWAAB LIKHA HAI ...

Dr. Smt. ajit gupta ने कहा…

बढिया विचार है। बधाई।

raj ने कहा…

khud ko khayale yaar me aisa bhula diya barso khayle yaar hume dhundta raha...

शरद कोकास ने कहा…

अच्छी रचना । शिल्प में और कसावट की ज़रूरत है ।

Rajey Sha ने कहा…

जि‍स्‍मों से परे रूहों का मि‍लन, फि‍ल्‍म गैंग्‍स्‍टर में आखि‍र में देखा था जी।