अनुमति जरूरी है

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

मंजिल की तलाश में

मंजिल की तलाश में
बहुत दूर निकल आये हम
वो कहते हैं रास्ता बदल दो
वो कहते हैं मंजिल 


अब मुझे खुद से शिकायत है
सोचता हूँ
खुदा बदल दूँ


कि
बुतपरस्ती मेरा शौक है यारा ....

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

बिन्नी चौधरी की नज़र में -- "बुरी औरत हूँ मैं"




"बुरी औरत हूँ मैं" की Binni Chaudhary द्वारा लिखित प्रतिक्रिया ....कम शब्दों में गागर में सागर भरती प्रतिक्रिया के लिए दिल से आभार बिन्नी........तुम सबकी प्रतिक्रिया ही मेरे लेखन का सबसे बड़ा प्रतिफल है जो मुझे आगे लिखने को प्रेरित करता है :)

प्रतिक्रिया इस प्रकार है : 

वंदना गुप्ता द्वारा लिखा गया कहानी संग्रह "बुरी औरत हूँ मैं"... कहानियों का संग्रह नहीं फूलों का गुलदस्ता है। जिसमें भिन्न -भिन्न रंगों और खुशबुओं के फूल हैं। आपकी कहानियों में सबसे अच्छी बात यह है कि जब तक कहानी समाप्त नहीं होती यह दिलचस्पी बनी रहती हैं कि आगे क्या होगा? इस पुस्तक में तो आपने कहानी के साथ कविता का भी रस घोला है... जिससे मिठास और भी बढ़ गई हैं। कुछ कहानियां.. जैसे ऐसा आखिर कब तक?...छोटी सी भूल या गुनाह, बुरी औरत हूँ मैं, कितने नादाँ थे हम, आत्महत्या :कितने कारण आदि बार -बार पढने को मन करता हैं..! ये कहानियाँ कुछ सोचने को मजबूर करती हैं..! दिल और दिमाग कहानी के पात्र और घटनाओं पर तर्क -वितर्क करने को विवश करता है..! पता नहीं आपकी ये कहानियाँ वास्तविक जिंदगी से प्रेरित है या नहीं लेकिन मैं ये यकीन से कह सकती हूं कि आपकी ये कहानियाँ हमारे समाजिक परिवेश में प्रायः देखने को मिलता है..! जिसे आपने अपने कलम के जादू से बड़ा प्रभावी बना दिया हैं.....! वंदना गुप्ता दी......!

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

धुँधले अतीत की आहटें



"धुँधले अतीत की आहटें" गोपाल माथुर जी द्वारा लिखित उपन्यास बोधि प्रकाशन से छपा है जिसे गोपाल माथुर जी ने बहुत ही स्नेह के साथ मुझे भेजा . गोपाल माथुर जी की लेखनी को मैंने पहले भी पढ़ चुकी हूँ तो उनकी लेखनी की तो हमेशा से ही कायल हूँ .

 जब इस उपन्यास को पढ़ा तो लगा लेखक खुद में एक पूरी यूनिवर्सिटी हैं .उपन्यास लेखन वैसे भी कोई आसान कार्य नहीं होता . एक लगन निष्ठा , एकाग्रता और निरंतरता की मांग करता है जिसका अहसास उपन्यास पढ़ते समय होता है . उपन्यास पढ़ते हुए लगता है जैसे इस उपन्यास के बारे में दो लफ़्ज़ों में नहीं कहा जा सकता। एक यात्रा है ये लेखक की जहाँ वो अनुपस्थित होते हुए भी उपस्थित है जो पाठक के मन  से मानो संवाद कर रहा हो, उसे झकझोर रहा हो । पाठक मन चकित विस्मित सा कथा के प्रवाह में बहता जाता है। ये सच है उपन्यास लेखन एक यात्रा से कम नहीं और यहाँ भी पढ़कर ऐसा ही लगता है जैसे लेखक ने ये उपन्यास कोई साल छह महीने में नहीं लिखा हो बल्कि एक लम्बा अरसा उन लम्हों को जीया हो और फिर उन्हें एक सूत्र में पिरोया हो . मानो कोई रोज डायरी लिख रहा हो . रोज की दिनचर्या में पल प्रतिपल बदलते जीवन के पहलू और उनसे उपजी पीड़ा , हताशा तो इंसान सहता ही है मगर रिश्तों की तल्खियों से ऊबकर जब जीना पड़ता है तब अपने विगत से छूट नहीं पाता वो आज में भी साथ साथ चलता है . यूँ कहानी में मुख्य पात्र दो ही हैं सिंथिया और लेखक, जो इस कहानी को कह रहा है या कहिये सोच रहा है या फिर जी रहा है . मगर दो पात्र अनुपस्थित होते हुए भी हर पल उपस्थित हैं फिलिप और संजना. फिलिप सिंथिया का पति और संजना लेखक के साथ रहने वाली लिव इन पार्टनर . इस अनुपस्थिति में उपस्थिति को दर्शाना बेशक आसान हो मगर उस उपस्थिति का अहसास हर पल बनाए रखना आसान नहीं होता लेकिन लेखक ने ऐसा किया है . लेखक ने मानो एक जीवन को जीकर इस उपन्यास को लिखा है . पाठक उपन्यास जैसे जैसे पढता जाएगा पात्र उसके साथ साथ चलते जायेंगे और ऐसे उसके साथ शामिल हो जायेंगे कि वो पात्रों के नाम तक भूल जाएगा क्योंकि ऐसा ही मेरे साथ हुआ है अब जब इसके बारे में लिखने बैठी हूँ तो ख्याल आया कि स्त्री पात्र का तो नाम यहाँ वर्णित है मगर शायद पुरुष पात्र को कोई नाम नहीं दिया लेखक ने , जहाँ तक मुझे याद है . या हो सकता है उसका कोई नाम हो और एक आध जगह आया हो तो पात्र के नाम की जरूरत ही महसूस नहीं हुई शायद इसीलिए ध्यान से निकल गया हो . शायद यही होता है लेखन का कमाल जहाँ स्त्री और पुरुष भर दो पात्र रह जाएँ बाकी सब गौण हो जाए .

मूल बात इस उपन्यास को तीन हिस्सों में बाँटा है लेखक ने और हर हिस्से से पहले एक कविता वर्णित है जो उस भाग में क्या लिखा है मानो उसका दर्पण है . वहीं इस कहानी का मुख्या पात्र यानि पुरुष भी एक लेखक है जो खुद भी एक उपन्यास लिख रहा है यानि कहानी के साथ साथ उसके उपन्यास लेखन की यात्रा का भी लेखक ने बखूबी वर्णन किया है मानो कहना चाहता हो किन किन मोड़ों से गुजरते हुए एक उपन्यास आकार पाता है , किन जद्दोजहद से लेखक गुजरता है फिर वो आन्तरिक हों या मानसिक और पाठक एक क्षण में उसे स्वीकार या अस्वीकार कर देते हैं .

कहानी कोई कहे तो दो लफ़्ज़ों में कह दे लेकिन कहानी को ठहराव के साथ , महसूस करते और कराते हुए कहना हो तो लेखक से सीखे जहाँ दोनों पात्रों की अपनी अपनी ज़िन्दगी में एक अतीत है जिसे दोनों छोड़ चुके हैं मगर भुला नहीं पाते , गाहे बगाहे अतीत उनकी स्मृतियों में जिंदा रहता है , अपनी उपस्थिति का आभास कराता रहता है . वहीँ सिंथिया और उसका बेटा पिन्टो दोनों तक ही सिमटी है उनकी ज़िन्दगी लेकिन फिलिप की अनुपस्थिति में उपस्थिति से व्याप्त पीड़ा का दंश सिंथिया हर पल जीती है , जिसमे अन्दर आने की किसी को इजाज़त नहीं. उस दर्द को जीते हुए किन किन मोड़ों से एक स्त्री गुजरती है, कितनी अकेली वो होती है , कैसे कोई प्रतिकार उसके पास होता ही नहीं , एक एक लम्हे का जैसे आँखों देखा हाल किसी ने वर्णन किया हो , कुछ ऐसे लेखक ने पल पल को जीवंत किया है कि एक एक घटनाचक्र आँखों के आगे घटता हुआ दिखाई देता है . सिंथिया जैसी स्त्री जो कम बोलती है , उसकी अपनी एक दुनिया है जिसमे किसी का प्रवेश नहीं . वो साथ बैठी है मगर अपनी दुनिया में खो जाती है, एक उदासी हर पल उसे अपने घेरे में कैद करे रखती है जो लेखक को कचोटती है लेकिन वो उसके एकांत में दखल नहीं देता. उसे अपनी सीमा मालूम है. एक रहस्य मानो दस्तक देता हो और उधर के सब दरवाज़े तिलिस्मी हों जो खुलेंगे तो सिर्फ सिंथिया की इच्छा पर ही .

सबसे बड़ी बात उपन्यास जिस मद्धम गति से चलता है लगता है इतनी ही मद्धम गति से लिखा गया और पढ़ा भी वैसे ही जाता है मानो कोई स्वाद के चटखारे ले लेकर भोजन का आनंद ले रहा हो . इस उपन्यास के बारे में जितना लिखा जाएगा कम ही रहेगा और यदि किसी को एक यात्रा का आनंद लेना हो, पात्रों के संग उसे जीना हो तो ये उपन्यास खुद पढना होगा और पढ़ते हुए उसे जीना होगा . यूँ दो चार पात्र कहानी में आते जाते हैं मगर मुख्य दो पात्र ही इस उपन्यास का दिल धड़कन आत्मा और शरीर सब हैं . जहाँ कोई रिश्ता नहीं होकर भी दुःख का रिश्ता स्वतः बन जाता है . शायद इसीलिए कहा गया हो खगही जाने खगही की भाषा. फिर भी लगता है जैसे जब तक खुद उस हालात से न गुजरो आप नहीं समझ सकते दूसरे की तकलीफ दर्द और पीड़ा को . पीड़ा जो अपने रसायन से बाहर ही नहीं आने देती सिंथिया को और जो संभव ही नहीं था . सिंथिया एक रहस्यमयी पात्र के रूप में आती है लेकिन जब अंत पढो और उस रहस्य से पर्दा हटता है तो लगता है जैसे सब कुछ छिन गया हो और प्रश्न उठे आखिर ऐसा क्यों?

उपन्यास के अंत ने तो मानो इस यात्रा को यानि पाठक की यात्रा को जैसे डेड एन्ड पर लेजाकर खड़ा कर दिया और मानो खुद से पूछ रहा हो ऐसा आखिर क्यों। ब्रैस्ट कैंसर की भयावह त्रासदी को लेखक  जिस तरह उकेरा है शायद ही कोई लिख पाया हो। एक सच का एक जीवन की जटिलता का कैसे सामना करना होता है बल्कि कहा जाये खुद का खुद से सामना करना क्या इतना आसान होता है खासतौर से तब जब एक स्त्री का न केवल बाह्य सौंदर्य बल्कि आंतरिक सौंदर्य भी प्रभावित हो रहा हो। उस जद्दोजहद उस कश्मकश को कहना आसान  नहीं . एक स्त्री जो इस पीड़ा से गुजरती है उसके दर्द को , उसकी निराशा हताशा को , उसके जीवन की नीरसता को कैसे कलमबद्ध किया जाए शायद लेखक से बेहतर कोई वर्णित नहीं कर सकता . हर पल आप सिर्फ कयास लगाते रहेंगे उसकी उदासी का , उसके अकेलेपन का कि शायद कोई भी वो कारण हो जैसा अक्सर होता है लेकिन जैसे ही अंत आपके सामने आएगा आप न केवल चौंक उठेंगे बल्कि पूरी कहानी और सिंथिया की पीड़ा क्षण भर में एक चलचित्र की भांति आपके सामने होगी और आप भी उसके दर्द से कराह उठेंगे शायद तब समझ पायें एक कैंसर पीडिता का दर्द, उसकी विवशता जहाँ उसे जीना भी अभिशाप सा लगता है सिर्फ मातृत्व ही उसे जीने की वजह देता है . उस पर दोनों वक्षस्थल गँवा देना और उसकी वजह से फिलिप का उसे छोड़ दूसरी के साथ रहना , शायद काफी है एक जीवन को अभिशापित करने के लिए , उससे उसका वजूद छीनने के लिए , जीवन भर के लिए दुःख के गर्त में धकेलने के लिए और ऐसा ही सिंथिया के साथ यहाँ होता है बस जो एक पक्ष में बात होती है वो ये कि उसके पास उसका एक बच्चा है जो उसे जीने को वजह देता है वर्ना यदि वो भी न होता तो ? तब शायद वो कभी इस पीड़ा से बाहर ही नहीं आ पाती, जीने की कोई वजह ही नहीं ढूंढ पाती. बेशक बीमारी में उसका दोष नहीं लेकिन अंग भंग होने पर भी जीना ही पड़ता है बस जरूरी है एक वजह तभी नए सिरे से ज़िन्दगी शुरू की जा सकती है . ब्रेस्ट कैंसर की भयावहता का दूसरा नाम है सिंथिया , जहाँ कैंसर के दर्द से भी गहरे दर्द में वो जी रही है या कहा जाए सिंथिया के माध्यम से लेखक ने ब्रैस्ट कैंसर की उस भयावहता का दर्शन कराया है जो उससे निजात पाने पर उपजती है . बेशक समय समय पर ब्रैस्ट कैंसर पर कभी अनामिका जी और पवन करण जी ने कवितायें लिखीं लेकिन शायद वो सिर्फ कविताओं तक ही सिमित रहे उसकी भयावहता को महसूस न कर सके यदि करते तो शायद कविता का रूप कुछ अलग ही होता . बेशक मैंने भी एक कविता लिखी थी कभी इसी पर "देखा है कभी राख को घुन लगते हुए" . वहां मैंने भी एक युवती जो अभी माँ भी नहीं बनी और ब्रैस्ट कैंसर की शिकार हो जाए और उसके दोनों वक्षस्थल यदि निकल जाएँ तो कैसा मह्सूसेगी जब जब अपने उस अंग को देखेगी , उसका दिग्दर्शन कराया है और यहाँ ये पढ़कर लगा जैसे मेरी उस कविता को , उस स्त्री के दर्द को लेखक ने समझा है और उपन्यास का रूप दिया है जहाँ एक जगह ऐसी आती है कि सिंथिया कहती है यदि पिन्टो न होता तो शायद वो अपना जीवन ही ख़त्म कर लेती और यही बात मैंने उस कविता में कही थी कि कैसा लगता होगा एक स्त्री को जब वो मातृत्व के सुख से वंचित हो जाती होगी शायद तब खुद को किन्ही कमजोर पलों में ख़त्म करने की भी सोच लेती होगी . वही मुझे यहाँ मिला . शायद यही इस बिमारी की भयावहता का सबसे दर्दनाक पहलू है जहाँ वो एक सफल जीवन नहीं जी पाती . ऐसे में जरूरी होता है एक पुरुष का साथ लेकिन हजारों में कुछ ही होंगे जो साथ देते होंगे नहीं तो जाने कितनी इस त्रासदी को भोगती होंगी . ये पढ़कर लगा जैसे मेरी कविता को आज सार्थकता मिल गयी या कहूँ इस संसार में कहीं न कहीं वो घटित होता है जो लिखा जाता है फिर पता चाहे बाद में चले ........ऐसा लगा जैसे उस कविता के पात्रों को लेखक ने जिवंत कर दिया हो और मेरा लिखना सफल हो गया हो . ये उपन्यास मानो उस कविता का आईना हो .

वहीँ एक ख्याल उभरता है कि स्त्री यदि शारीरिक रूप से अक्षम हो जाए तो पुरुष को पल नहीं लगता उसे छोड़ दूसरा जहान बसाने में लेकिन वहीँ ऐसा यदि पुरुष के साथ हो तो वो ताउम्र उसकी लाचारगी और विवशता के साथ जी लेती है . और यहाँ तो शारीरिक रूप से अक्षम भी नहीं है बल्कि बीमारी की त्रासदी से ग्रसित है लेकिन मानो स्त्री सिर्फ यौनांगों के कारण ही पूर्ण है अन्यथा पुरुष की नज़र में उसकी कोई कीमत नहीं . नहीं मिलता उसे पुरुष साथी का साथ . लगता है जैसे स्त्री सिर्फ यौनिकता को पूर्णता देने वाला पात्र भर है उससे इतर उसकी कोई पहचान नहीं और शायद यही दंश है जो सिंथिया को घुन की तरह खाता रहता है , अपनी अपूर्णता का हर पल अहसास कराये रखता है वहीँ फिलिप का इंतज़ार उसके प्रेम की पराकाष्ठा है . एक स्त्री किस हद तक किसी को चाह सकती है , किसी के लिए जी सकती है मानो एक एक पल को लेखक ने खुद देखा हो और कलमबद्ध किया हो, पाठक को ऐसा लगता है . इतनी बारीकी से स्त्री मन की पीड़ा को कह पाना आसान नहीं खासतौर से जब स्त्री पात्र की चुप्पी ने सब राहें बंद कर रखी हों. लेकिन उसकी चुप्पी भी मुखर है जरूरत है तो उसे देखने और समझने वाली नज़र की और ऐसा ही यहाँ हुआ जब उपन्यास का पुरुष किरदार उर्फ़ लेखक ने उसे देखा और समझना चाहा . यहाँ गोपाल माथुर जी ने लेखक मन कैसा सूक्ष्म होना चाहिए कि सामने वाले की आँखें , भाव भंगिमा देख ही जान ले उसके अन्दर की हलचल को , तूफ़ान को , निराशा को , का लेखक के माध्यम से वर्णन किया है .

वहीँ साथ साथ लेखक ने पुरुष पात्र और संजना के मध्य लिव इन रिलेशन से उपजे अलगाव को भी दृष्टिगोचर किया है जहाँ सम्बन्ध यथार्थ के धरातल पर बहुत खोखले होते हैं फिर उनका शिकार स्त्री हो या पुरुष क्योंकि ज्यादातर लिव इन संबंधों में स्त्रियाँ ही पुरुषों की बेवफाई या दुत्कार की शिकार होती हैं यहाँ पुरुष पात्र को शिकार दर्शाया गया है . वहीँ समुद्र , बारिश , मौसम का साथ साथ चलना मानो कहानी को और मुखर करता है और सच्चाई के करीब जैसे लेखक खुद उस माहौल में एक अरसा रहा हो और फिर एक एक दृश्य को जिवंत कर रहा हो . सम्बन्ध कोई हो आहत दोनों ही होते हैं या कहिये जो ज्यादा संवेदनशील होगा वो ज्यादा आहत होगा फिर वो पुरुष हो या स्त्री या जो ज्यादा जुड़ा होगा . यहाँ पुरुष पात्र की व्यथा को उकेरने में कोई कमी नहीं उसी शिद्दत से उकेरा है जैसे स्त्री पात्र की पीड़ा को .

वहीँ कहानी में वृद्ध पुरुष जो सिंथिया के ससुर हैं जिसने लेखक दरवाज़ा बनवाने जाता है उनकी कहानी भी साथ साथ चलती है . वहां के दृश्यों को , भाषा की अनभिज्ञता होने के बाद भी संवेदनाओं से संवाद कैसे किया जाता है मानो लेखक ने वो बता दिया , दिखा दिया , मानो कहना चाहता हो जब भाषा नहीं थी तब भी तो संवाद होता था तो अब कैसे संभव नहीं . वहीँ उनकी कहानी को भी उनकी मृत्यु पर लाकर अंतिम रूप तो दिया ही साथ ही उनकी मृत्यु होने पर उनके बेटे फिलिप का न आना मानो सिंथिया को अहसास करा गया जो पंछी एक बार उड़ जाते हैं वो डाल पर वापस नहीं लौटते और वो स्वयं के लिए निर्णय ले सकी . वहीँ  पिन्टो जो शुरू में लेखक को पसंद नहीं करता , उसकी बीमारी के बाद धीरे धीरे पसंद करने लगता है , सबको साथ लेकर लेखक चलते हैं और हर कहानी को अंतिम रूप देते हैं जो उनके कहाँ का कौशल है जिसमे कहीं कोई विखंडन नहीं , समरसता बराबर बनी रहती है .


अब यदि लेखक के लेखन में प्रयुक्त भाषा बिम्ब और शैली की बात की जाए तो उसके लिए तो शब्द भी थोड़े पड़ जायेंगे. पाठक पल पल चकित होता जाएगा जैसे जैसे कहानी पढता जाएगा एक से बढ़कर एक शब्द संरचना जो हर पेज को नायाब  बनाती है जैसे किसी जौहरी ने नगीने जड़े हों और हार की सुन्दरता को द्विगुणित कर दिया हो . कहते हैं निर्मल वर्मा ऐसा लेखन किया करते थे मैंने उनकी सिर्फ एक किताब में कुछ कहानियाँ पढ़ी थीं तो सच पूछा जाए मुझे उनके लेखन से भी आगे का लेखन लगता है गोपाल माथुर जी का लेखन जो अपने साथ पाठक को बहा ले चलता है . यदि उस सुन्दरता का दर्शन करना है तो ये कुछ टुकड़े लगा रही हूँ मगर सम्पूर्ण आनंद लेना है लेखन का तो किताब खुद पढनी पड़ेगी . एक ऐसा लेखन जहाँ पात्र यानि चेतन ही नहीं जड़ भी बोलने लगें अर्थात जड़ से भी संवाद कराने की कला में माहिर हैं लेखक फिर वो समुद्र हो , बारिश , सड़क, बैंच या लैंप ..........सब पात्र हैं कहानी के .

१) वे सावधानी से बैठी हुई थीं, की कहीं असावधानीवश कोई स्पर्श हमारे बीच मेहमान बन कर न चला आये . न तो मैं उन्हें देख सकता था और न ही सुन सकता था सिर्फ महसूस कर सकता था, उनके भार विहीन भार को...एक ऐसा भार, जिसके नीचे दब कर मेरे सारे अनुभव अनुभव हीन होकर रह गए थे .

२)हमारे दोनों और लगे नारियल और कटहल के घने वृक्ष हमें गुजरते हुए देख रहे थे. पता नहीं उन पेड़ों ने क्या सोचा होगा? शायद उन्होंने सोचा हो कि ये दोनों कौन हैं जो इस तरह एक दुसरे से अपरिचित उस पतली सी पगडण्डी पर पाँव रखते हुए चले जा रहे हैं . शायद यह भी सोचा हो कि इन दोनों से तो हम ही अच्छे हैं जो हवा पत्तों डालियों फलों चिड़ियाओं आकाश और तारों से बातें तो करते हैं और एक ये दोनों हैं जो भाषा होते हुए भी चुप हैं .

३)जब कभी हवा चलने लगती तो लगता जैसे कोई परिंदों के बच्चों को लोरी सुना रहा हो

४)न जाने कितना समय निकल गया है शामों के साथ वक्त बिताये..

५)शुरू शुरू में मुझे लगता था कि उपन्यास की सारी स्थितियां मेरी ही तो सृजित की हुई हैं उन्हें मैं कभी भी किसी भी तरह घुमा सकता हूँ पर अहिस्ता अहिस्ता मैंने जाना कि एक सीमा के बाद उपन्यास के पात्र इतना ग्रो कर जाते हैं की लेखक का साथ छोड़ देते हैं और अपनी राह खुद-ब-खुद चलने लगते हैं . एक दिन वे इतने सक्षम हो जाते हैं की लेखक को वह लिखना पड़ता है जो वे चाहते हैं .

५)हम उसी पगडण्डी की और बढ़ गए जो बारिशों में नहा नहा कर बीमार पड़ चुकी थी

६)कई बार जब कोई संदेह अपनी थोड़ी सी झलक दिखाकर छिप जाता है तब हम उस संदेह के इर गिर्द घुमते रहे हैं . संदेह की गांठें सुलझें न सुलझें हम जरूर उलझ जाते हैं .

७)अँधेरे और उजाले से बना एक धुंधलका सा था जिसमे यह अनुमान लगाना कठिन था कि उजाला अँधेरे को खिसका कर वहां आया था या अँधेरा उजाले को

८)किसी की आवाज़ सुनने के लिए किसी रौशनी का मोहताज नहीं होना पड़ता . वह अँधेरा हो या उजाला , अपने लिए कान ढूंढ ही लेती है

९)मुझे लगता था जैसे एक अकेला मैं ही नहीं हूँ जो अपने अतीत के किनारे सर पताका करता हूँ , यह समुद्र भी है ठीक मेरी तरह जो न जाने किस वेदना का मारा सदियों से ठीक मेरी तरह पछाड़ें खा रहा है .

१०)दिन चुपचाप कट रहे थे. घटनाएं अपना घटना भूलकर कैलेंडर की तारीखों के पीछे जा छिपी थीं .

११)मुझे लगा जैसे वह निगाह एक पूरी किताब हो, आद्योपांत पढ़ी हुई , आद्योपांत सुनी हुई, आद्योपांत महसूस की हुई . वह निगाह शब्दों से परे थी, वह रुक गयी थी जैसे कोई शाम हो , जो ठहर गयी थी पेड़ की सबसे ऊंची डालियों पर ... जैसे कोई सदा हो जो सिर्फ मेरे लिए थी, जैसे कोई स्मृति हो जो मेरी अमूल्य धरोहर थी .

१२)अपनेपन की भी एक गंध होती है जिसे सूंघने के लिए नासछिद्रों की आवश्यकता नहीं होती .

१३)हम मुख्य्हाल के बीचों बीच रुके हुए थे जैसे कोई किताब पढ़ते पढ़ते हम बीच में कहीं ठिठक जाते हैं जहाँ पिछले पन्ने हमारा हाथ पकडे रहते हैं और आने वाले पृष्ठ अपरिचित यात्रियों की तरह किसी ट्रेन से उतरने के लिए आतुर नजर आते हैं .......


एक से बढ़कर एक वाक्य संरचना ऐसे ही बनाने से नहीं बनती उसके लिए उन लम्हों को , उन पात्रों को आत्मसात करना पड़ता है तब जाकर अन्दर से वो बाहर आता है जो उन पात्रों का वास्तविक जीवन , सोच , डर , पीड़ा होता है . अब यदि लिखने बैठूँ तो ऐसा लेखन पूरे उपन्यास में है जो साथ साथ चलता है जबरदस्ती थोपा हुआ नहीं है बल्कि उपन्यास का हिस्सा हैं , वो भी संवाद कर रहे हैं , इस तरह तो पूरा उपन्यास ही लिखना पड़े . लेखक के लेखन कौशल की जितनी तारीफ की जाए कम है .

खुद को बीतते बसंत की पदचापों कह मुझे भेंट किया गया उपन्यास लेकिन मैं कहती हूँ आपके लेखन पर हमेशा बसंत छाया रहे . आने वाले हर बसंत में हमें आपसे आपके लेखन के माध्यम से ऐसी ही कृतियाँ मिलती रहें जो हमारे पाठक मन को संतुष्ट कर सकें और सोचने पर विवश भी साथ ही सीखने को भी मिलता रहे . अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ ........

मंगलवार, 21 मार्च 2017

रचनी हैं अब साजिशें

रचनी हैं अब साजिशें
स्वप्न तो बहुत देख दिखा चुके
ये वक्त का बदला लहजा है
जिस पर इंसानियत तलवों का उपालम्भ है
और साजिश एक आदतन शिकारी

चौतरफा बहती बयार में
जरूरी है बह जाना
जिंदा रहना जरूरत जो ठहरी आज की
हकीकतों के चिंघाड़ते जंगल
दे रहे हैं दलीलें
वक्त अपनी नब्ज़ बदल चुका है
तुम कब बदलोगे ?

आदर्शों उसूलों के धराशायी होते महल
कबीलों में बदलते जल जंगल और जमीन
ऊँची दुकान फीके पकवान समान
अब नहीं करते जिरह ...
हकीकतें दुरूह हुआ करती हैं
जानते हैं वो ....

सीख सको तो सीख लेना
स्वप्नों से बगावत करना
और साजिशों से दोस्ती करना
कि
ये समय की सबसे बड़ी साजिश है
कोई अठखेली नहीं ...
बदलाव के कबूतरों ने मुंडेरों पर उतरना छोड़ दिया है

साजिशें स्वप्नों का हिस्सा हों
या स्वप्न साजिश का
हलाक तुम्हें ही होना है अंततः ...
कहो अब किस ओर का साक्षी है तुम्हारा जमीर ?


क्योंकि
हर मुस्कराहट का अर्थ अलग हुआ करता है .........जानते हो न

बुधवार, 8 मार्च 2017

अघायी औरतें

मर्दों के शहर की अघायी औरतें 
जब उतारू हो जाती हैं विद्रोह पर 
तो कर देती हैं तार तार 
सारी लज्जा की बेड़ियों को 
उतार देती हैं लिबास हया का 
जो ओढ़ रखा था बरसों से सदियों ने 
और अनावृत हो जाता है सत्य 
जो घुट रहा होता है औरत की जंघा और सीने में 


अघायी औरतों के तिलिस्म 
यूँ ही नहीं टूटा करते हैं 
परिपक्व होने में बरसों 
मिटटी में ज़मींदोज़ होना पड़ता है 
फिर काटने और तराशने की प्रक्रिया से 
गुजरना पड़ता है 
तब कहीं जाकर अघायी औरत का 
स्वरुप निखरता है 
तब जाकर वो अपने तिलिस्म के 
भेदों को अनावरित करती है 
तब जाकर वो अपनी 
बुनियादों से निकलती है 
और करती है बेनकाब मर्दों के शहरों को 
करती है ध्वस्त बरसों से बनाये गए 
मर्दों के अहम् के किलों को 
जब होती है वो भी संलग्न 
मर्दों की बनायीं दुनिया के रिवाजों में 


अघायी औरत बनने के सफ़र में 
आते हैं जाने कितने जलज़ले 
सिल बनी बट्टे के मार में 
पिसती रहती हैं उसकी संवेदनाएं 
फिर चाहे चोट धड के निचले हिस्से पर हो 
या ऊपरी हिस्से पर 
आघात शारीरिक हो या मानसिक 
सहनशीलता के रक्त की अन्तिम बूँद तक 
करती है कोशिश 
मर्द के शहर की 
ईंट ईंट को जोड़े रखने की 
उसे स्थायित्व प्रदान करने की 
मगर जब मर्द की संवेदनहीनता का पाँव 
अंगद सा औरत के स्वाभिमान को ललकारता है 
उसे नेस्तनाबूद करने को लालायित होता है 
तब अघायी औरत उतार देती हैं खोल 
सदियों से ओढ़ी सभ्यताओं का 
कर देती हैं खुद को निर्वस्त्र 
उतार देती है लिबास 
मर्द और औरत के बेजान रिश्ते से 
खोल लेती है बाल तब तक 
जब तक न मर्दों के शहर पर 
बिजली बन न गिरती है ये 
जब खोलने लगती है उसके 
अतिक्रमण के पेंचों को कि
कैसे अमानवीयता चरम को छूती गयी 
जब उसने लड़की से औरत के सफ़र को तय किया था 
फिर चाहे उसका शारीरिक दोहन हुआ हो 
मानो बिछी है धरा चटाई सी 
और हल की फाँक उसकी अस्मिता पर गाड़ी हो 
और बो दिया गया हो बीज उसकी कोख में 
बिना सींचे , सहेजे , सहलाए 
फिर भी तिरस्कार , उपेक्षा की 
शिकार होती रही हो मानसिक शोषण के साथ 

आखिर कब तक ? 
कब तक स्वयं का दोहन होने दे 
कब तक मर्द के शहर की 
बेजुबान मिटटी बन धूल धूसरित होती रहे 
और जब हो जाती है 
दोहन और शोषण की पराकाष्ठा 
और सहने की अति कर देती है अतिक्रमण 
हर सीमा रेखा का 
तब 
अघायी औरतों का हल्ला, कानफ़ोडू शोर
कर देता है भंग शांति 
मर्दों के शहर के गली- कूचों की 

आखिर ये बोली कैसे ? 
कहाँ से सीखी जुबान ?
किसने दिया इसे कलम रुपी हथियार ? 
कैसे आया इसकी वाणी में व्यभिचार ?
कैसे छोड़ दी इसने अपनी मर्यादा ?
कैसे लांघ दी इसने लक्ष्मण रेखा ?
कैसे खोल रही है ये भेद 
ना केवल मर्द के शहर के 
बल्कि उसके गुप्त रास्तों पर भी 
कर रही है प्रहार 
कभी वाणी द्वारा तो कभी लेखन द्वारा 
कहाँ से पनपा इतना विद्रोह 
जो मर्द के शहर की दीवारें भरभराने लगीं 
आखिर कैसे ये इतनी उच्छ्रंखल हुयी 
जो मर्द के बिस्तर की 
सलवटें भी खोलने लगी 
वो बिस्तर जिसे वो जैसे चाहे जब चाहे 
अपनी सुविधानुसार 
ओढ़ा , बिछाया , लपेटा 
या तोडा मरोड़ा करता था 
मगर बिस्तर की सलवट के माथे पर 
ना कोई ख़म पड़ता था 
और मर्द अपने शहर का 
एकछत्र बादशाह बन 
जिसे चाहे जब चाहे 
अपने हरम की जीनत बना लिया करता था 
कैसे बर्दाश्त हो सकता था 
अघायी औरत का गुप्तांग पर वार 
जब खोलने शुरू कर दिए 
उसने मर्द के हरम के 
किवाड़ पर किवाड़ 
होने लगी मुखर 
बन गयी वाचाल 
और कह उठी वो भी 
उस किसी एक को , जो अपना सा लगा हो 
जिसमे पाया होता है 
उसने अपना स्वर्णिम संसार 
तब कह उठती है 
उसकी शोखी बेबाकी से 
काश वो मर्द तुम होते 
जिसके लिए कौड़ी में भी मैं बिक जाती 
तो भी आरती का दीया ही कहलाती 
काश तुम पहले मेरे जीवन में आये होते 
तो सम्पूर्णता पाने को 
इधर उधर न भटक रहे होते 
एक सम्पूर्ण मर्द से एक सम्पूर्ण औरत तब गुजरी होती 
कायनात के ज़र्रे ज़र्रे पर उस मोहब्बत की दास्ताँ उभरी होती 
देह की रश्मियाँ भी निखरी होतीं 
रूह की बेचैनी भी मोहब्बत के जलाशय में भीगी होती 
तो आज ना कोई अघायी औरत होती 


उफ़ ! आखिर किसने दिया 
अघायी औरत को ये अधिकार 
जो हो जाए तो इतनी मुखर 
इतनी वाचाल 
स्त्री पुरुष अन्तरंग संबंधों पर 
चलने लगी हो जिसकी कलम 
कैसे उसे होने दिया जाए इतना बेबाक 
कैसे उतारने दिया जाए उसे 
लज्जा के घूंघट को 
जो कर दे निर्वस्त्र 
मर्दों की पूरी सभ्यता को 
और होने लगते हैं 
उस पर तुषारापात 
बेमौसम गिराई जाती हैं 
उसकी मान मर्यादा और अस्मिता पर 
शब्दबाण रुपी बिजलियाँ 
काटने होते हैं 
अघायी औरत की 
सोच की उड़ान के पंख 
ताकि मर्द के शहर की 
निर्वस्त्र सभ्यता न हो जाए और निर्वस्त्र 
कुल्टा , कुलच्छिनी 
ख्याति पाने को आतुर 
होती हैं अघायी औरतें 
नवाजी जाती हैं इन विशेषणों से 
संज्ञा और सर्वनाम से परे 
विशेष विशेषणों से सुसज्जित 
अघायी औरतें बेपरवाह 
आखिर बना ही लेती हैं 
अपना एक शहर 
"अघायी औरतों का शहर " 
स्वतंत्रता , उन्मुक्तता , बेबाकी का शहर 
आज़ादी की सांस का शहर 
कुछ पल अपने साथ जीने का शहर 
हँसी की खिलखिलाहट का शहर 
और जब बसा लेती हैं 
शहर को खिलखिलाहट से 
तब उनके हौसले 
उनके जज्बे 
उनके साहस के आगे 
नतमस्तक हो जाता है 
मर्दों का शहर 
और स्वीकार कर ही लेता है उपादेयता अघायी औरतों की 
पूरे मनोयोग के साथ 
बस जरूरत होती है 
तो सिर्फ इतनी 
कि 
अघायी औरत पहला पत्थर अपने हाथ में उठा ले ………


बुधवार, 1 मार्च 2017

अंतिम विकल्प ...

मुझे दस्तकों से ऐतराज नहीं
यहाँ अपनी कोई आवाज़ नहीं
ये किस दौर में जीते हैं
जहाँ आज़ादी का कोई हिसाब नहीं

चलो ओढ़ लें नकाब
चलो बाँध लें जुबान
कि
ये दौर-ए-बेहिसाब है
यहाँ कोई किसी का खैरख्वाह नहीं

दांत अमृतांजन से मांजो या कोलगेट से
साँसों पे लगे पहरों पर
तुम्हारा कोई अख्तियार नहीं

आज के दर का यही है बस एकमात्र गणित
मूक होना ही है निर्विकल्प समाधि का प्रतीक
तो
शोर देशद्रोह है, राष्ट्रद्रोह है
हाथ ताली के लिए
मुँह खाने के लिए
सिर झुकाने के लिए
इससे आगे कोई रेखा लांघना नहीं
कि
सीमा रेखा के पार सीता का निष्कासन ही है अंतिम विकल्प ...

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

जी-मेल एक्सप्रेस मेरी नज़र से

Image may contain: 1 person

जी-मेल एक्सप्रेस अलका सिन्हा जी द्वारा लिखित उपन्यास किताबघर प्रकाशन से प्रकाशित है . अलका सिन्हा जी किसी परिचय की मोहताज नहीं इसलिए उनसे परिचित कराने की बजाय सीधे उपन्यास पर ही बात की जाए .
पुरुष विमर्श को केंद्र में रख लिखा गया उपन्यास पाठक को एक अलग ही दुनिया में ले जाता है . उपन्यास की शुरुआत धीमी गति से होती है तक़रीबन आधे से ज्यादा उपन्यास पढने तक पाठक समझ भी नहीं पाता आखिर लेखिका कहाँ ले जाना चाहती हैं या क्या कहना चाहती हैं. जैसे कोई रबड़ को खींच रहा हो बस इसी तरह यात्रा चलती जाती है लेकिन कहानी रफ़्तार तब पकडती है जब कहानी का मुख्य पात्र देवेन त्रिपाठी चेन्नई घूम कर वापस आता है तो सारी दुनिया ही बदल जाती है. अचानक कहानी एकदम ऐसे मोड़ पर मुड़ जाती है जो उसे रोचक बनाती है और फिर अंत तक ले जाकर ही रूकती है यानि यूँ लगा जैसे एक्सप्रेस गाडी में ही पाठक बैठ गया हो.
सबसे जरूरी है जी-मेल की व्याख्या क्योंकि आधा उपन्यास पढने तक यही प्रश्न अन्दर ही अन्दर उठता रहता है आखिर जी मेल से क्या तात्पर्य है लेखिका का ? तो जरूरी है सबसे पहले उसी का अर्थ जो लेखिका ने दिया है – जी मतलब जिगोलो और मेल मतलब मेल यानि पुरुष . तो यहाँ पाठक के प्रश्न को उत्तर मिल जाता है कि इसका किसी जीमेल जैसी ईमेल साईट से सम्बन्ध नहीं है लेकिन वहीँ एक प्रश्न उठता है जब एक तरफ खुद लेखिका लिख रही हैं जिगोलो यानि मेल प्रोसटीटयूट तो फिर अलग से मेल शब्द जोड़ने की जरूरत ही क्या थी? क्योंकि जिगोलो शब्द का प्रयोग ही मेल प्रोसटीटयूट के लिए होता है . शायद पाठक मन में उत्सुकता पैदा करने के लिए इस तरह का नाम दिया गया है यही लगा .
अब बात करते हैं उपन्यास की जहाँ मुख्य पात्र देवेन एक पुरानी डायरी दरियागंज से ले आता है और जब उसे पढना शुरू करता है तो उसमे कोड में लिखे अल्फाबेट को अपनी सोच के अनुसार मेल और फिमेल में ढाल लेता है और उन्हें अपनी सोच के अनुसार ढाल पढने लगता है और उसके साथ अपने ख्यालों की ज़िन्दगी भी जीने लगता है . अपनी ज़िन्दगी की असंतुष्टि के साथ फिर वो ऑफिस की हो या घर की . आधे से ज्यादा उपन्यास इसी उधेड़बुन में गुजर जाता है जहाँ उस डायरी के पात्र एक ज़िन्दगी जी रहे होते हैं तो दूसरी देवेन त्रिपाठी. लेकिन जैसे ही उपन्यास अपने अंत की ओर बढना शुरू करता है घटनाएं तेजी से रंग बदलती हैं तो नया ही संसार खुल जाता है जहाँ लेखिका ने जिगोलो क्यों बनते हैं पर प्रकाश डाला है. कैसे पुरुष शोषण होता है और वो जिगोलो बनने को बाध्य हो जाते हैं, पर बहुत ही गहराई से प्रकाश डाला है वहीँ साथ साथ स्त्री विमर्श का जो मुख्य बिंदु है उसे भी उजागर किया है. एक बहुत ही बोल्ड विषय जिस पर अक्सर बात कोई करना ही नहीं चाहता उस पर एक स्त्री ने लिखा ये बहुत साहस की बात है. स्त्री यौनिकता की बात करना वैसे ही हमारे समाज में गुनाह माना जाता है वहां इतनी मुखरता से न केवल स्त्री की यौनिकता की बात की गयी है बल्कि पुरुष की यौनिकता को भी विमर्श का हिस्सा बनाया है . पुरुष का भी बलात्कार होता है , उसका भी शोषण होता है कभी दैहिक कभी मानसिक लेकिन उस पर बात नहीं की जाती . उसी पर लेखिका ने ऐसे प्रश्नों को उठाया है. कैसे कॉलेज स्टूडेंट इस दलदल में फंसते हैं , कैसे जरूरतें उन्हें इसमें घसीटती हैं तो कुछ मौकापरस्त लोग उसका फायदा उठाते हैं एक एक पहलू पर लेखिका की कलम चलती गयी. एक आम इंसान जो घर और बच्चों के साथ अपनी आजीविका तक ही सीमित रहता है जब उसके सामने एक नया संसार खुलता है तो वो हतप्रभ हुए बिना नहीं रहता. लेकिन जब उस स्थिति को स्वीकार लेता है तो सहज भी हो जाता है ऐसा ही देवेन के साथ होता है. वहीँ लेखिका ने आध्यात्मिकता का पुट भी उपन्यास में दिया है तो दूसरी ओर देशभक्ति का जज्बा भी साथ चलता है . यानि ज़िन्दगी के तमाम पहलुओं को छूती हुई कहानी चलती है जैसा कि एक आम इंसान की ज़िन्दगी में होता है और फिर अचानक कैसे ज़िन्दगी करवट लेती है तो एक नयी दुनिया ही उसके सामने खुलती है और वो उसमे खुद को कुछ हद तक फंसा पाता है तो कैसा बेचैन महसूस करता है और फिर जब अपनों का भरोसा पाता है तो उसका आत्मविश्वास वापस आ जाता है फिर दुनिया से वो हर हाल में भिड सकता है यानी उसके माध्यम से मानो लेखिका कहना चाहती हो कि अपनों का साथ और विश्वास इंसान के लिए कितना आवश्यक है यदि उसमे कमी हो जाए या न मिले तो वो भटक सकता है और गलत राह भी पकड़ सकता है या फिर आत्महत्या तक का विचार करने लगता है. मानो इसी बहाने लेखिका ने परिवार के सहयोग की आवश्यकता पर तो बल दिया ही है वहीं इससे दूर रहने वालों के बिखराव को भी चिन्हित किया है .
यहाँ जरूरत नहीं कि हर पात्र का नाम लेकर लिखा जाए क्योंकि यहाँ पात्र गौण हैं बल्कि मुद्दा मुख्य है तो मुद्दे पर बात जरूरी है. इसलिए पात्रों के नाम न लेते हुए जरूरी है मुख्य समस्या पर ही ध्यान केन्द्रित किया जाए. कैसे ऑफिस आदि में काम होते हैं और कैसे स्त्री हो या पुरुष आगे बढ़ने के लिए एक दूसरे को जरिया बनाते हैं , हर पहलू पर लेखिका की कलम चली है जो यही सिद्ध कर रही है कि आज के युग में स्त्री हो या पुरुष , मौका मिलते ही एक दूसरे का शोषण करने से नहीं चूकते. फिर आखिर हम दोषारोपण करते ही क्यों हैं ? या फिर आज स्त्री समझ गयी है अपनी जरूरतों को तो उसने अपनी देह को माध्यम बनाया है लेकिन समझ नहीं पायी आखिर कहीं न कहीं अब भी उसी का शोषण किया जा रहा है बस उसका मानसिक दोहन कर. ऐसे मुद्दे उठा लेखिका तमाम स्त्री पुरुष विमर्श को उकेर रही हैं .
यदि कहानी के एक दो पहलुओं पर यदि ध्यान दें तो जब पाठक कहानी पढ़ रहा होता है तो जब देवेन अल्फाबेट को अपने मनानुसार मेल फिमेल में बांटता है जहाँ क्यू को क्वीना बना देता है तभी पाठक मन में प्रश्न उठता है कहीं लेखक गलत न साबित हो जाए और उल्टा अर्थ निकले उसका यानि वो फिमेल न होकर मेल हो और ऐसा ही अंत में होता है यानि कुछ बातें शुरू में ही पकड़ में आनी शुरू हो जाती हैं. वहीँ चरित नाम के पात्र को जब बीच कहानी से थोड़ी देर गायब कर दिया जाता है तब उसी पर शंका का बादल मंडराता है और वो भी सही सिद्ध होता है . यानि कुछ बातें बीच में समझ आने लगती हैं कि क्या हुआ होगा और क्यों?
वहीँ इस कहानी में जो शुरुआत में थोडा ज्यादा कहानी को घसीटा गया है यदि वो थोडा कम कर दिया जाता तो रोचकता कुछ ज्यादा बन जाती क्योंकि कुछ लोग तो शुरू के २५-५० पेज ही पढ़कर निर्णय ले लेते हैं आगे पढ़ा जाए या नहीं क्योंकि यदि कहानी पाठक को बाँध न पाए तो वो उसे छोड़ देता है . यदि इन बातों पर ध्यान देकर लिखा जाए तो और रोचकता बन जाती है और उपन्यास खुद को पढवा ले जाता है . वैसे देखा जाए तो ऐसा अक्सर लिखा जाता है लेकिन पाठक की रूचि का भी ध्यान जरूर रखा जाना चाहिए. उपन्यास वो जो खुद को खुद पढवा ले जाए.
Image may contain: one or more people
बाकी अंत में जब दो डायरियों का भेद खुलता है तो ये भी अपने में एक लेखिका के लेखन का कौतुक ही है . एक ऐसे विषय पर उपन्यास का लिखा जाना जिस पर बात तक करना जुर्म समझा जाता है लेखिका के साहस का परिचायक होते हुए भी एक जरूरी उपन्यास है जिस पर बात की जानी चाहिए. आखिर क्या कारण हैं जो पुरुष वेश्या उर्फ़ जिगोलो बनते हैं जबकि स्त्री वेश्या को हमारा समाज आसानी से स्वीकार लेता है लेकिन पुरुष वेश्या को नहीं. जाने कितने ही ऐसे प्रश्न मुँह उठाये समाज से उत्तर की अपेक्षा कर रहे हैं वहीँ कहीं कहीं उत्तर खुद भी दे रहे हैं मानो कह रहे हों ये सब आपकी ही देन है . आपने ही स्त्री पुरुष के बीच खाई उत्पन्न की उन्हें एक दूसरे की जरूरतों को जानने समझने नहीं दिया बल्कि स्त्री को प्रयोग की वस्तु बना दिया जिस कारण उससे इतर कोई कुछ समझ ही नहीं पाया जबकि स्त्री हो या पुरुष यौन जरूरतें दोनों की सामान होती हैं . दोनों को ही बराबर संतुष्टि की जरूरत होती है वो भी सिर्फ शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक भी . तभी पूर्ण संतुष्टि दोनों को मिलती है यही वो मुख्य बिंदु है जिस पर लेखिका ध्यान केन्द्रित कराना चाहती हैं. बेशक शरीर दोनों को मिल सकते हैं लेकिन पूर्ण संतुष्टि वहीँ मिलती है जब मानसिक लेवल दोनों का बराबर हो और दोनों ही एक दूसरे को पूर्ण रूप से संतुष्ट करने का प्रयास करें . बस इतना सा ही तो फ़साना है लेकिन ये इतना सा ही कोई समझना नहीं चाहता जिस कारण एक भटकाव कैसे समाज को उसकी आने वाली पीढ़ी को लील रहा है उसी को लेखिका कहना चाहती हैं. उपन्यास खुद को पढ़े जाने की मांग करने के साथ इस विषय पर विमर्श की मांग भी करता है . लेखिका बधाई की पात्र हैं जो उस विषय पर उपन्यास लिखा जिस पर अब तक चर्चा तक नहीं की जाती फिर उपन्यास लिखना तो दूर की कौड़ी ही हुई. उम्मीद है इसी तरह नए नए विषयों पर लिख लेखिका समाज को जागरूक करती रहेंगी और समाज के उस हिस्से पर वार करती रहेंगी जो कमजोर हो......शुभकामनाओं के साथ .

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

वही रजाई वही कम्बल

यहाँ तो वही रजाई वही कम्बल
गरीबी के उलाहने
भ्रष्टाचार के फरेब
जाति धर्म का लोच
वोट का मोच
लुभावने वादों का गुलदस्ता
प्यार मोहब्बत का वही किस्सा
कुछ नहीं बदला
कुछ नहीं बदलना

संवेदना संवेदनहीनता बहनों सी गलबहियाँ डाले कुहुकती
किसी मन में न पीली सरसों खिलती
ऐसे में
किस दौर से गुजरे कोई
जो सोच की आँख पर पर्दा डाल सके

और वो कहते हैं
कुछ नया कहो
क्या तोते हो तुम ?

तो आओ
कुछ अलग कुछ हट के
चलो तीसरी दुनिया की बात करें
कल्पना का सिरहाना बनाएं
ख्वाब के हुक्के को गुडगुडायें
हकीकत से नज़र चुराएं
फरमानों के ज़मीन पर फर्शी सलाम ठोकें
कि
अता हो जाए फ़र्ज़

अपने अपने मुल्क में
नमक का हक़ अदा करने का रिवाज़ मुख्तलिफ हुआ करता है 
 
सच कहने और मुस्कुराहटों के दौर किस देश में जिंदा हैं ... बताना तो ज़रा
बस खानाबदोशी पर जिंदा है रवायतें ...


सोमवार, 2 जनवरी 2017

मुझे रीतना था

उम्मीद के टोकरे में होकर सवार
आया नववर्ष मेरे द्वार
तो क्या हुआ

मुझे रीतना था , रीत गयी
वक्त ने जीतना था , जीत गया

एक नामालूम , बेवजह सा सपना था
टूटना था , टूट गया
ज़िन्दगी पाँव में पायल डाल जरूरी नहीं झंकार ही करे

मैंने उम्मीदों की शाख पर नहीं सुखाई अपनी हसरतें
क्योंकि
वक्त ने खार सा चुभना था , चुभ गया