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सोमवार, 27 मई 2019

ए उदासियों

ए उदासियों आओ
इस मोहल्ले में जश्न मनाओ
कि यहाँ ऐतराज़ की दुकानों पर ताला पड़ा है
सोहर गाने का मौसम बहुत उम्दा है
रुके ठहरे सिमटे लम्हों से गले मिलो
हो सके तो मुस्कुराओ
एक दूजे को देखकर
यहाँ अदब का नया शहर बसा है
सिर्फ तुम्हारे लिये
रूमानी होने का मतलब
सिर्फ वही नहीं होता
तुम भी हो सकती हो रूमानी
अपने दायरों में
इक दूजे की आँख में झाँककर
सिर्फ इश्क की रुमानियत ही रुमानियत नहीं हुआ करती
उदासियों की रुमानियतों का इश्क सरेआम नहीं हुआ करता
चढ़ाये होंगे इश्क की दरगाह पर
सबने ख्वाबों के गुलाब
जिनकी कोई उम्र ही नहीं होती
मगर
उदासियों की सेज पर चढ़े गुलाब
किसी उम्र में नहीं मुरझाते
ये किश्तों में कटने के शऊर हैं
हो इरादा तो एक बार आजमा लेना खुद को
उदासियाँ पनाह दे भी देंगी और ले भी लेंगी
कि उदासियों से इश्क करने की कसम खाई है इस बार...

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

नयी किताबें सूचनार्थ

मित्रों मेरा दूसरा उपन्यास "शिकन के शहर में शरारत" और नया कविता संग्रह "प्रेम नारंगी देह बैंजनी" किताबगंज प्रकाशन से प्रकाशित होकर आया है जिनके बारे में सब सूचनाएँ नीचे दे रही हूँ :
1

किताब : प्रेम नारंगी देह बैंजनी 
(कविता संग्रह)
लेखिका : वन्दना गुप्ता
मूल्य : ₹ 225/- (पेपरबैक संस्करण)
आवरण : पंकज तिवारी
ISBN : 978-81-938724-2-0
प्रकाशक : किताबगंज प्रकाशन

📱 : 8750660105
इस नवीनतम कविता संग्रह "प्रेम नारंगी देह बैंजनी" में सुप्रसिद्ध कवयित्री वन्दना गुप्ता जी ने स्त्री जीवन को मुख्य विषयवस्तु बनाया है । हिन्दी कविता के सुधी पाठकों के लिए यह एक संग्रहणीय पुस्तक है। यह पुस्तक अब ऑनलाइन शापिंग प्लेटफॉर्म amazon.in पर बिक्री के लिए उपलब्ध है। जो भी पाठक इस किताब की डायरेक्ट बुकिंग कराना चाहते हैं वे हमें हमारे व्हाट्सअप नंबर # 8750660105 पर इनबॉक्स में संपर्क कर सकते हैं ●
अथवा amazon.in से खरीदने के लिए निम्नलिखित लिंक पर क्लिक करें-
https://www.amazon.in/PREM-NARANGI-BAINJA…/…/ref=mp_s_a_1_1…


2

किताब : शिकन के शहर में शरारत
(उपन्यास)
लेखिका : वन्दना गुप्ता
मूल्य : ₹ 350/- (पेपरबैक संस्करण)
आवरण : कुंवर रविन्द्र
ISBN : 978-93-88348-95-9
इस उपन्यास में सुप्रसिद्ध कवयित्री एवं कथाकारा वन्दना गुप्ता जी ने "खाप प्रथा" को उपन्यास की मुख्य विषयवस्तु बनाया है । हिन्दी के सुधी पाठकों के लिए "खाप" पर आधारित यह एकमात्र संग्रहणीय पुस्तक है। यह पुस्तक अब ऑनलाइन शापिंग प्लेटफॉर्म amazon.in पर बिक्री के लिए उपलब्ध है। जो भी पाठक इस किताब की डायरेक्ट बुकिंग कराना चाहते हैं वे हमें हमारे व्हाट्सअप नंबर # 8750660105 पर इनबॉक्स में संपर्क कर सकते हैं ●
अथवा amazon.in से खरीदने के लिए निम्नलिखित लिंक पर क्लिक करें-


3

लीजिये मित्रों *कॉम्बो ऑफर* किताबगंज प्रकाशन की तरफ से :

उपन्यास "शिकन के शहर में शरारत" और कविता संग्रह "प्रेम नारंगी देह बैंजनी" दोनों अब सिर्फ 500 रूपये में आप इस लिंक से प्राप्त कर सकते हैं या फिर प्रकाशक से इस नंबर पर 8750660105 संपर्क कर पेटीएम कर प्राप्त कर सकते हैं :


सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

सफ़ेद नकाबपोश चेहरे...

दहशत का लिफाफा
हर दहलीज को चूमता रहा
और सुर्ख रंग से सराबोर होता रहा हर चेहरा

फिर किसके निशाँ ढूँढते हो अब ?

तुमने दहशतें बोयी हैं
फसल लहलहा कर आयी है
सदियों से अब कैसी अदावत

तुम्हारे चेहरे की लुनाई है अब क्यों गायब?

प्रायोजित कार्यक्रम बना डाला
सबने अपना गुबार निकाल मारा
मगर हल का कागज़ कोरा ही रहा

कहो कैसे ढकोगे अब रुसवाई को ?

आँधियों ने चीन्हे हैं सफ़ेद नकाबपोश चेहरे...

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

शिशुत्व की ओर

बन चुकी है गठरी सी 
सिकुड़ चुके हैं अंग प्रत्यंग 
बडबडाती रहती है जाने क्या क्या 
सोते जागते, उठते बैठते 
पूछो, तो कहती है - कुछ नहीं 

सिर्फ देह का ही नहीं हो रहा विलोपन 
अपितु अस्थि मांस मज्जा भी 
शनैः शनैः छोड़ रही हैं स्थान रिक्त 
और कर रही है वो पदार्पण 
एक बार फिर से अपने शिशुत्व की ओर 

शिशु 
सोता है, रोता है, खाता है और सोता है 
बस ऐसे ही तो बन चुकी है उसकी दिनचर्या 
जहाँ स्वयं के शरीर का भार भी नहीं उठा पा रही 
शिशु जो नहीं उठ बैठ पाता खुद से 
नहीं नहा सकता खुद से 
यहाँ तक कि चलने को भी जरूरत होती है सहारे की 
नहीं ओढ़ पाता कम्बल या रजाई खुद से 
सर्द गर्म से होता है जो परे 
मानो समाधिस्थ हो कोई ऋषि मुनि किसी तपस्या में 
इन्द्रियों पर नहीं होता जहाँ नियंत्रण 
मल मूत्र विसर्जन स्वाभाविक प्रक्रिया सा 
जहाँ होता है बिस्तर में ही संपन्न 
यूँ शिशुवत हो गया उसका सब व्यवहार 
लगता है जैसे उसने भी 
ले लिया है जन्म दोबारा एक ही जन्म में 

जन्म क्या है और मरण क्या?
जन्मने के बाद और मरने से पहले 
हो जाती है दैहिक अवस्था जब समान 
फिर शोक किसका और क्यों?
चक्र चलता है पुनः पुनः 
लौटता है फिर फिर मौसम 
यही तो है आवागमन 
देह में देह का 
आत्मा में आत्मा का 
मृत्यु में जन्म का और जन्म में मृत्यु का 
शायद यही कहलाता है पुनर्जन्म 

प्रौढत्व से शिशुत्व की यात्रा में 
मैं देख रही हूँ ... माँ को फिर से शिशु बनते हुए