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गुरुवार, 7 नवंबर 2019

दिल माँ का किसी को समझ आता नहीं

दिल माँ का किसी को समझ आता नहीं
फूल कौन सा है जो अंत में मुरझाता नहीं
वो देगी बद्दुआ तो भी दुआ बन जायेगी
इतनी सी बात कोई उसे समझाता नहीं

तेरे गुस्से पर भी उसे गुस्सा आता नहीं
मगर तेरा बचपना है कि जाता नहीं
तेरे दर्द से पिघलती है जो दिन-ब-दिन
उसकी हूक का मर्म तुझे समझ आता नहीं

तू लेने हाल माँ का कभी आता नहीं
उसके क़दमों तले जन्नत है जान पाता नहीं
वो आईना है तेरे आने वाले कल का
अभिमानी मगर कल अपना संवार पाता नहीं

गुरुवार, 19 सितंबर 2019

उल्फत के गुलाब

धुआँ घुटन का किस फूँक से उड़ायें
धंसे बेबसी के काँच अब किसे दिखायें
न हो सकी उन्हीं से मुलाकात औ गुजर गयी ज़िन्दगी
अब किस पनघट पे जाके प्यास अपनी बुझायें

मन पनघट पर जा के बुझा ले प्यास सखी
पिया आयेंगे की लगा ले आस सखी
वो भी तुझे देखे बिन रुक न पायेंगे
फिर क्यों विरह से किया सोलह श्रृंगार सखी

साँझ की बेला में ही जवाकुसुम खिलते हैं
मन के हरसिंगार तो मन में ही झरते हैं
कैसे प्रीत की रीत सिखाऊँ सखी
पिया मिलन बिन तो अश्रु बिंदु ही गिरते हैं

चंदा की चांदनी से कर श्रृंगार सखी
तारों की ओढ़नी से सर ढांप सखी
नयनों में डाल विभावरी का सुरमा
दे अपनी प्रतीक्षा को नया आयाम सखी

पल पल युगों सम बीतें जिसके
वो क्या अंतिम क्षणों को रोके
आस का करके स्वयं ही तर्पण
अब अंतिम प्रयाण का है आगाज़ सखी

उल्फत के गुलाब हर बार शरद में ही खिलें जरूरी तो नहीं .....






शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

विधवा विलाप की तरह ...



मत बोलना सच
सच बोलना गुनाह है
बना डालो इसे आज का स्लोगन

रावण हो या कंस
स्वनिर्मित भगवान
नहीं चाहते अपनी सत्ता से मोहभंग
और बचाए रहने को खुद का वर्चस्व
जरूरी है
आवाज़ घोंट देना

आवाज़ जो बन न जाए सामूहिक प्रलाप
आवाज़ जिसके शोर से न उखड जाएँ सत्ता के खूँटे
आवाज़ जिसका और कोई पर्याय नहीं
जानते हैं वो

तो जरूरी था दमन
दमन के लिए नहीं होती कोई नियमावली
दमन आज के युग का क्रांतिकारी कदम है
तो कैसे ढूंढते हो उसमें कोई मर्यादा?

सुनो
वो जो रोज करते हैं बड़े बड़े घोटाले
नहीं मारी जातीं उन्हें गोलियाँ
वो जो रोज करते हैं बलात्कार
नहीं खौला करता किसी का खून
वो जो रोज धोखे को बना लेते हैं धर्म का पर्याय
नहीं कसी जातीं उनकी मुश्कें

इस चुप्पे समय के प्रलाप पर मत बहाओ आँसू
कि तुम आ ही नहीं सकते किसी खाते में
जब तक नहीं मिला सकते उनकी हाँ में हाँ

ये वक्त का कमज़ोर पक्ष है
राहू, केतु और शनि का दुर्लभ संयोग है
नहीं सुने या सराहे जायेंगे तुम्हारे नज़रिए
सुन लो
ओ कलबुर्गी, दाभोलकर,पानसारे, गौरी लंकेश
वो नहीं करते लिंग भेद
गर करोगे विद्रोह या प्रतिरोध
देशद्रोह की श्रेणी तैयार है तुम्हारे लिए

सच तो बस एक कोने में सिसकने को बेबस है
आओ सत्य का अंतिम संस्कार करें
एक एक मुट्ठी मिटटी डाल अपने हिस्से की
विधवा विलाप की तरह ...

सोमवार, 27 मई 2019

ए उदासियों

ए उदासियों आओ
इस मोहल्ले में जश्न मनाओ
कि यहाँ ऐतराज़ की दुकानों पर ताला पड़ा है
सोहर गाने का मौसम बहुत उम्दा है



रुके ठहरे सिमटे लम्हों से गले मिलो
हो सके तो मुस्कुराओ
एक दूजे को देखकर
यहाँ अदब का नया शहर बसा है
सिर्फ तुम्हारे लिये

रूमानी होने का मतलब
सिर्फ वही नहीं होता
तुम भी हो सकती हो रूमानी
अपने दायरों में
इक दूजे की आँख में झाँककर
सिर्फ इश्क की रुमानियत ही रुमानियत नहीं हुआ करती
उदासियों की रुमानियतों का इश्क सरेआम नहीं हुआ करता

चढ़ाये होंगे इश्क की दरगाह पर
सबने ख्वाबों के गुलाब
जिनकी कोई उम्र ही नहीं होती
मगर
उदासियों की सेज पर चढ़े गुलाब
किसी उम्र में नहीं मुरझाते

ये किश्तों में कटने के शऊर हैं
हो इरादा तो एक बार आजमा लेना खुद को
उदासियाँ पनाह दे भी देंगी और ले भी लेंगी
कि उदासियों से इश्क करने की कसम खाई है इस बार...

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

नयी किताबें सूचनार्थ

मित्रों मेरा दूसरा उपन्यास "शिकन के शहर में शरारत" और नया कविता संग्रह "प्रेम नारंगी देह बैंजनी" किताबगंज प्रकाशन से प्रकाशित होकर आया है जिनके बारे में सब सूचनाएँ नीचे दे रही हूँ :
1

किताब : प्रेम नारंगी देह बैंजनी 
(कविता संग्रह)
लेखिका : वन्दना गुप्ता
मूल्य : ₹ 225/- (पेपरबैक संस्करण)
आवरण : पंकज तिवारी
ISBN : 978-81-938724-2-0
प्रकाशक : किताबगंज प्रकाशन

📱 : 8750660105
इस नवीनतम कविता संग्रह "प्रेम नारंगी देह बैंजनी" में सुप्रसिद्ध कवयित्री वन्दना गुप्ता जी ने स्त्री जीवन को मुख्य विषयवस्तु बनाया है । हिन्दी कविता के सुधी पाठकों के लिए यह एक संग्रहणीय पुस्तक है। यह पुस्तक अब ऑनलाइन शापिंग प्लेटफॉर्म amazon.in पर बिक्री के लिए उपलब्ध है। जो भी पाठक इस किताब की डायरेक्ट बुकिंग कराना चाहते हैं वे हमें हमारे व्हाट्सअप नंबर # 8750660105 पर इनबॉक्स में संपर्क कर सकते हैं ●
अथवा amazon.in से खरीदने के लिए निम्नलिखित लिंक पर क्लिक करें-
https://www.amazon.in/PREM-NARANGI-BAINJA…/…/ref=mp_s_a_1_1…


2

किताब : शिकन के शहर में शरारत
(उपन्यास)
लेखिका : वन्दना गुप्ता
मूल्य : ₹ 350/- (पेपरबैक संस्करण)
आवरण : कुंवर रविन्द्र
ISBN : 978-93-88348-95-9
इस उपन्यास में सुप्रसिद्ध कवयित्री एवं कथाकारा वन्दना गुप्ता जी ने "खाप प्रथा" को उपन्यास की मुख्य विषयवस्तु बनाया है । हिन्दी के सुधी पाठकों के लिए "खाप" पर आधारित यह एकमात्र संग्रहणीय पुस्तक है। यह पुस्तक अब ऑनलाइन शापिंग प्लेटफॉर्म amazon.in पर बिक्री के लिए उपलब्ध है। जो भी पाठक इस किताब की डायरेक्ट बुकिंग कराना चाहते हैं वे हमें हमारे व्हाट्सअप नंबर # 8750660105 पर इनबॉक्स में संपर्क कर सकते हैं ●
अथवा amazon.in से खरीदने के लिए निम्नलिखित लिंक पर क्लिक करें-


3

लीजिये मित्रों *कॉम्बो ऑफर* किताबगंज प्रकाशन की तरफ से :

उपन्यास "शिकन के शहर में शरारत" और कविता संग्रह "प्रेम नारंगी देह बैंजनी" दोनों अब सिर्फ 500 रूपये में आप इस लिंक से प्राप्त कर सकते हैं या फिर प्रकाशक से इस नंबर पर 8750660105 संपर्क कर पेटीएम कर प्राप्त कर सकते हैं :


सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

सफ़ेद नकाबपोश चेहरे...

दहशत का लिफाफा
हर दहलीज को चूमता रहा
और सुर्ख रंग से सराबोर होता रहा हर चेहरा

फिर किसके निशाँ ढूँढते हो अब ?

तुमने दहशतें बोयी हैं
फसल लहलहा कर आयी है
सदियों से अब कैसी अदावत

तुम्हारे चेहरे की लुनाई है अब क्यों गायब?

प्रायोजित कार्यक्रम बना डाला
सबने अपना गुबार निकाल मारा
मगर हल का कागज़ कोरा ही रहा

कहो कैसे ढकोगे अब रुसवाई को ?

आँधियों ने चीन्हे हैं सफ़ेद नकाबपोश चेहरे...

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

शिशुत्व की ओर

बन चुकी है गठरी सी 
सिकुड़ चुके हैं अंग प्रत्यंग 
बडबडाती रहती है जाने क्या क्या 
सोते जागते, उठते बैठते 
पूछो, तो कहती है - कुछ नहीं 

सिर्फ देह का ही नहीं हो रहा विलोपन 
अपितु अस्थि मांस मज्जा भी 
शनैः शनैः छोड़ रही हैं स्थान रिक्त 
और कर रही है वो पदार्पण 
एक बार फिर से अपने शिशुत्व की ओर 

शिशु 
सोता है, रोता है, खाता है और सोता है 
बस ऐसे ही तो बन चुकी है उसकी दिनचर्या 
जहाँ स्वयं के शरीर का भार भी नहीं उठा पा रही 
शिशु जो नहीं उठ बैठ पाता खुद से 
नहीं नहा सकता खुद से 
यहाँ तक कि चलने को भी जरूरत होती है सहारे की 
नहीं ओढ़ पाता कम्बल या रजाई खुद से 
सर्द गर्म से होता है जो परे 
मानो समाधिस्थ हो कोई ऋषि मुनि किसी तपस्या में 
इन्द्रियों पर नहीं होता जहाँ नियंत्रण 
मल मूत्र विसर्जन स्वाभाविक प्रक्रिया सा 
जहाँ होता है बिस्तर में ही संपन्न 
यूँ शिशुवत हो गया उसका सब व्यवहार 
लगता है जैसे उसने भी 
ले लिया है जन्म दोबारा एक ही जन्म में 

जन्म क्या है और मरण क्या?
जन्मने के बाद और मरने से पहले 
हो जाती है दैहिक अवस्था जब समान 
फिर शोक किसका और क्यों?
चक्र चलता है पुनः पुनः 
लौटता है फिर फिर मौसम 
यही तो है आवागमन 
देह में देह का 
आत्मा में आत्मा का 
मृत्यु में जन्म का और जन्म में मृत्यु का 
शायद यही कहलाता है पुनर्जन्म 

प्रौढत्व से शिशुत्व की यात्रा में 
मैं देख रही हूँ ... माँ को फिर से शिशु बनते हुए