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बुधवार, 25 जुलाई 2018

हम अवसाद में हैं

सुनो
मत कुरेदो हमें
हम अवसाद में हैं
मत पूछना कैसा अवसाद

नकारात्मकता के ढोल जब
बेतहाशा बज रहे हों
कान के परदे जब फट रहे हों
बेचैनियों के समुन्दर जब ठाठें मार रहे हों
और सोच के कबूतर जब उड़न-छू हो गए हों
तल्खियों के पैरों में मोच आई हुई हो
तब
चुप के तहखाने में सिसकती है मानवता
अदृश्य बेड़ियों में जकड़ी
सिर्फ खुद से सवाल जवाब किये जाती है
नकारात्मकता के शोर में घायल देह पर
रक्तिम दस्तकारियां चिन्हित करती हैं
देश काल और समय
हम अट्टहास की प्रतिक्रियाएं सुना करते हैं

तुम नहीं समझ सकते हमारे अवसाद की वजहें
तुम सिर्फ शोर के पुजारी हो

चित्रकारियाँ करीने से की गयी हों जहाँ
कि पाँव पग पग पर घायल होता हो
और सिसकने को बचा न हो दिल
आँखों में उतरे मोतियाबिंद ने
कराहों से समझौता कर लिया हो
वहाँ दिन और रात महज वहम के सिवा कुछ भी तो नहीं
फिर 'जिंदा हो तुम' महज एक स्लोगन सा चस्पा रहता है

बेजारियों के मौसम हैं ये
जहाँ राजनीति की दुल्हन
अपने सम्पूर्ण श्रृंगार से लुभा रही है प्रेमियों को
और हम
मुँह बाए देखने को हैं कटिबद्ध
चहुँ तरफ फैली निर्ममता की खरपतवार को

अवसाद के ढोर
नहीं चरा करते सत्ता की हरी घास
स्याह रुबाइयों को लगाकर गले
बस अलापते हैं एक ही राग
बिक चुका है जहाँ जमीर कोयले की खानों में
वहाँ उम्मीद की चिलम कैसे भरें

इसलिए
मत कुरेदो हमें
हम अवसाद में हैं

©वन्दना गुप्ता vandana gupta 



बुधवार, 18 जुलाई 2018

भीड़

भीड़ का कोई धर्म नहीं होता
सच ही तो कहा गया
भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता
सच ही तो कहा गया
फिर आज प्रश्न क्यों?
फिर आज उस पर लगाम लगाने की जरूरत क्यों?

आदत है तुम्हारी
हर उक्ति-लोकोक्ति को स्वीकारना
उसी की बनायी लकीर पर चलना
बिना सोचे समझे उसके परिणाम
तो फिर आज क्यों डर रहे हो
क्यों आज प्रश्न उठ रहे हैं ?

सोचने का वक्त अब आया
तब न सोचा
बिना सोचे समझे मानते गए
जबकि जानते हैं वो तुम्हारी कमजोरी
फायदा उठाना है उनका धर्म
नहीं है कोई एक कातिल
नहीं है कोई एक मुजरिम
और दुनिया की किसी अदालत में
नहीं दी गयी आज तक भीड़ को सजा

कहो कैसे चेहरे पहचानोगे?
पहचान भी लिया तो क्या कर लोगे?
कोई मूक दर्शक ही होगा
तो देखना उसका जुर्म हुआ?
किस किस को सजा दोगे?

क्या दे सकते हो भीड़ को फाँसी क़त्ल पर?

लेकिन एक बात का जवाब देना
ये भीड़ आखिर पैदा किसने की और कैसे?
कहाँ कमी रही जो आज भीड़ उग्र हुई
या फिर जान गयी है वो अपने होने का अर्थ
या फिर कर रही है अब भी तुम्हारे ही स्वार्थ पूरे
क्या ये आकलन का वक्त नहीं है?
क्या ये अपने गिरेबान में झाँकने का समय नहीं है?

भीड़ स्वयं से नहीं होती
भीड़ पैदा की जाती है
और तुमने पैदा की
और आज अपनी ही पैदा संतानों से भयभीत हो उठे ओ हुक्मरानों ?
सवालिया निगाहों के प्रश्नों पर तुम्हारा मौन
सांत्वना का फाहा नहीं

मत खेलो भावनाओं से
मत बोओ बीज नफरत के
मत दो धर्म के पांसे इस बार
शकुनि के हाथ में
मत बनाओ धर्म को हथियार 
मत बनाओ ऐसा बाज़ार
जहाँ बेची जा सकें इतनी नफरतें एक साथ
कि खरीदार ही न बचे कहीं कोई


तुम कहते हो कानून है
जान लो
सिर्फ कानून बनाने भर से कुछ नहीं होना
उग्रता के बीज बोये हैं तो काटोगे भी तुम ही
कल राजनीति की बिसात पर भीड़ एक मोहरा थी
आज जिंदगी की बिसात पर
सोचो जरा
ये किस मोड़ पर खड़े हो तुम
और तुम्हारी भीड़
क्योंकि
कहते हैं चोर को नहीं उसकी माँ को पकड़ो
अब है कोई हल आपके पास
या निरुत्तर भीड़
दिशाहीन भीड़ ही बचा है अब इस देश का भविष्य ?





मंगलवार, 10 जुलाई 2018

बहुत से दिन बीते सखी रीते

करूँ क्या संवाद दिन से
बहुत से दिन बीते सखी रीते

नयापन न मिला दिन में
तब बाँझ हुईं आस मन में

न घट भरा न सुरा ने तृप्त किया
किस शुभ दिन के मोह में रहें जीते

आह ! मेरी दग्ध हुई चेतना
कौन से सावन से कहो बुझे

मिलन हो जिस पल प्रियतम से
उसी दिन की हो गणना जीवन में

जर्जर काया सुलग सुलग
करे निहोरा अब रिमझिम से

बेमौसम बरसे जब बदरा
रोम रोम की मिटे तब तृष्णा

हरियल हो जाए आस की कोख
करूँ तब सखी संवाद मैं दिन से

करूँ क्या संवाद दिन से
बहुत से दिन बीते सखी रीते


©वन्दना गुप्ता vandana gupta 




सोमवार, 9 जुलाई 2018

तुम्हारी नज़र में दिल्ली क्या है ?



उसने कहा
तुम्हारी नज़र में दिल्ली क्या है ?

वो नज़र कहाँ से लाऊँ
जो आत्मा में झाँक सके
जो धड़कन को सुन सके
जो साँसों का संगीत हो
कौन कर सका है उसे व्याख्यायित

दिल्ली कोई शहर नहीं , राजधानी नहीं
ये दिल है
न केवल मेरा बल्कि सारे देश का
जहाँ धडकता है सुगम संगीत
'मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा'
फिर भी बाँट दी गयी है आज जाने कितने खेमों में
अपनी अपनी राजनीति
अपनी अपनी सहूलियत की मीनार
ऐसे में कैसे संभव है
दिल में पलती मोहब्बत की लहरों को गिनना

अपने पराये से परे है
हाशिये को भी जो सहेज ले और अट्टालिकाओं को भी
गंगा हो या जमुना
दोनों गलबहियाँ डाले
गुजरती हैं गली कूचों से खिलखिलाती हुई
अजान और ओंकार साथ साथ कुहुकती हों कोयल सी
नहीं लगाए गए जहाँ ताले घरों में
खुले रहते थे किवाड़
भरोसा था जिसका आधार
बदल दिया है उसे आज अविश्वास ने
उग आई हैं शक की खरपतवारें
संदेह के कब्जों से हिलने लगी हैं विश्वास की चूलें
रात के खौफ पर भारी है दिन के पहर
तांडव करती है जहाँ भूख, बेईमानी और बदहाली
वहाँ आज उगने लगा है कंक्रीट का जंगल धीरे धीरे
सोख ली है जिसने सारी नमी
वाष्पित होने लगी हैं संवेदनाएं
बदलता मौसम बन गया है सूचक एक अंतहीन विलाप का

मेरे शहर में मेरा ही बाशिंदा नहीं कोई आज
गिने चुने ही मिलेंगे सहेजे अपनी विरासत
फिर भी हर आगत का किया स्वागत
निष्कासित करना सीखा ही नहीं
दिल से लगा लिया अपना बना लिया
बस यही तो दिल्ली का फलसफा रहा
फिर खुद चाहे क्यों न अक्सर तोहमतों का शिकार हुई
दिल्ली ऐसी, दिल्ली वैसी
मगर विचारना जरा
दिल्ली को ऐसा वैसा बनाया किसने?

तुम आये - क्या लाये अपने साथ ?
जो लाये वो ही दिया तुमने दिल्ली को
खुद सा बना लिया
तो आज संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पर विधवा विलाप क्यों?

दिल्ली तुम्हारे सपनों का वो ब्रह्माण्ड है
जिसमे दाखिल तो हो गए तुम
लेकिन उसकी जड़ों में ही मट्ठा देते रहे, गरियाते रहे
लेकिन फिर भी न कर सके पलायन
सहूलियतों के पायों ने जकड़े रखा
फिर वो रेहड़ी वाला हो, रिक्शा वाला या मजदूर
या फिर हो कोई अफसर या इंजीनियर
कवि हो, लेखक या साहित्यकार
पत्रकार या व्यापारी
तुम्हारी अपेक्षाओं पर खरी उतरती रही
फिर भी तुम्हारी ही बदजुबानी की शिकार होती रही
तो सोचो जरा
कैसी है दिल्ली ?
और आज जैसी है तो वैसी क्यों है दिल्ली ?

एक बार आकलन के लिए खुद को कटघरे में खड़ा करके देखना
फिर किसी जवाब के मोहताज नहीं रहोगे

बार बार उजड़ना और बसना बेशक इसकी फितरत ही रही
बाहरी हमलों का हमेशा शिकार होती रही
जाने कितनी बार नेस्तनाबूद होकर भी
फिनिक्स सी अपना अस्तित्व बचाती रही
वक्त के उतार चढ़ावों से चाहे जितना बोझिल रही
इसकी जिजीविषा ही इसकी पहचान रही
तभी तो हमेशा ये कहा गया
दिल्ली तो दिलवालों की ही रही ...

क्या कर सकता है कोई परिभाषित दिल्ली होने की विडंबना
दिल्ली सुकूं का महल भी है
तो बेचैनी की आतिश भी
सोचो, विचारो और फिर बताओ
दिल्ली होना आखिर है क्या?

दिल्ली वो संग्रहालय है
जिसने संजोयी हैं स्मृतियाँ
कटु, रुखी, तीक्ष्ण, दाहक भी
तो मधुर, मधुर और मधुर भी
अब अपने चश्मे का नंबर बदलो
शायद तब देख पाओ
अपनायियत की मिसाल है
दिल्ली खूबियों का जिंदा ताजमहल है 

जिसके सिर पर सदा काँटों का ताज रहा 
मगर फिर भी न दिल्ली का दिल डोला 


दिल्ली का दर्द जिस दिन जान जाओगे

चैन की नींद न इक पल सो पाओगे
हमने देखी है दिल्ली की आँखों में पलती मोहब्बत 
ज़रा रुक के इक बार दीदार तो करो 
अपने सपनों के शहर से बाहर निकल 
तो शायद जान पाओ क्या है दिल्ली ?

इक सफ़र है दिल्ली 
तो इक मंजिल भी है दिल्ली 
इक आग है दिल्ली 
तो ख़्वाबों की ताबीर भी है दिल्ली 
दिल्ली यूँ ही नहीं दिलवालों की बनी जनाब 
झुलसाते तेज़ाब से नहाकर निकली है 
तब जाकर सबको गले लगाने की इसे आदत पड़ी है 

अब कैसे बताएं तुम्हें 
हमारी नज़र में क्या है दिल्ली 
अपनी तो दिल , जिगर और जां है दिल्ली ...

शनिवार, 7 जुलाई 2018

क्रूरतम अट्टहास

न रास्ता था न मंज़िल
न साथी न साहिल
और
एक दिन दृश्य बदल गया
कछुआ अपने खोल में सिमट गया

शब्द हिचकियाँ लेकर रोते रहे
अब बेमानी था सब
खोखली थीं वहां भावनाएं, संवेदनाएं
एक शून्य आवृत्त हो कर रहा था नर्तन

ये था ज़िन्दगी का क्रूरतम अट्टहास

सोमवार, 2 जुलाई 2018

आह ! अब दर्द का पर्याय नहीं

दर्द जब कट फट जाता है
मैला हो जाता है
तब बहुत मुस्काता है
शब्दबाण विहीन हो

फैला है यूँ, बिखरा हो जैसे पानी
और रपट जाए कोई बेध्यानी में
कचोट कितना छलछलाये
मौन को नहीं तोड़ पाती

मूक अभिव्यक्तियों से बंधा है गठजोड़
अब खुश्क हैं आँखें और अंतर्मन दोनों ही

कहते हैं
उस तरफ बज रही है एक सरगम अहर्निश
जाने क्यों
तोड़ नहीं पाती साँकल बंद दरवाज़ों की

खामोश रुदन श्रृंगार है दर्द की तहरीरों का
आह ! अब दर्द का पर्याय नहीं