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गुरुवार, 24 मई 2018

चलूँ कि बहुत अँधेरा है

चलूँ कि बहुत अँधेरा है 
हाथ को हाथ दिखाई नहीं देता
रूह जाने किस द्वारका में प्रवेश कर गयी है 

कि अजनबियत तारी है खुद पर ही...

रुके हुए हों रस्ते जैसे, मंजिलों ने किया हो अलगाववाद का शोर 
और किसी रहस्यमयी जंगल में घूम रहा हो मन का मोर ...

संवाद के लिए जरूरी हैं शब्द और शब्दों के लिए जरूरी है अक्षरज्ञान 
एक निपट अज्ञानता से सूख चुकी हैं उम्मीद की कड़ियाँ 
हिज्जों में बंटा है अस्तित्व 
खुद से संवाद के लिए भी मुझमें मेरा होना तो जरूरी है और मैं ...प्रश्नचिन्ह सा टंगा हूँ वक्त के ताखे पर

रविवार, 20 मई 2018

आओ फासलों को गुनगुनाएं

मैं एक चुका हुआ ख्याल हूँ
तू क्यूँ उम्मीद की गाँठ बाँधता है
मुसाफिर चलता चल जहाँ ले जाएँ कदम
कि सूखे हुए दरख़्त हरे नहीं हुआ करते
नदी वापस नहीं मुड़ा करती
और रूहें आलिंगनबद्ध नहीं हुआ करतीं

इक सोये हुए शहर के आखिरी मकान पर दस्तक
नहीं तोड़ा करती शताब्दियों की नींद

आओ फासलों को गुनगुनाएं
इश्क न जन्मों का मोहताज है न शरीर का ...




शुक्रवार, 4 मई 2018

पिपासा रक्तस्त्राव से ग्रसित है

ये जिन्ना गोडसे रावण और कंसों को पूजने का दौर है
तुम निश्चित कर लो अपनी पगडण्डी
वक्त ने बदल दिए हैं अपने मन्त्र
उच्च स्वर में किये गए उच्चारण ही बनेंगे अब वेदों की ऋचाएं

ये खौलती खदबदाती भावनाओं को व्यक्त न करने का दौर है
जी हजूरी और गुलामी के ही शिखर पर पहुँचने की प्रबल संभावनाएं हैं
पाले बदलने वाले ही बचे रह पायेंगे

अब नहीं आयेंगे गोविन्द धर्मयुद्ध करने
इस बार वो नहीं थामेंगे अर्जुन के घोड़ों की रास
बदल लिया है उन्होंने भी पाला
आखिर क्यों ढोयें अपने सर पर एक और कुरुक्षेत्र कराने का इलज़ाम

बहती गंगा में हाथ धोने का रिवाज़ है हमारे यहाँ
तुम सोचो
रास्तों ने बदल दी है जमीन
और जमीन ने बदल दिया है तेवर
ऐसे में फुंफकारना भी न बन जाए कहीं
राजाज्ञा का उल्लंघन

सर झुकाना अदब है ... आज की परिभाषा में
फिर तुम क्यों दायरों के बाहर जा
फहराना चाहते हो परचम
जिसका न कोई गवाह होगा और न परिचय

कौए के मोती खाने का दौर है ये
पिपासा रक्तस्त्राव से ग्रसित है

©वन्दना गुप्ता