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बुधवार, 22 मई 2024

मैं जीवन हूँ

 

न मैं सुख हूँ न दुख
न राग न द्वेष
मैं जीवन हूँ
बहता पानी
तुम मिलाते हो इसमें
जाने कितने केमिकल्स
अपने स्वार्थों के
भरते हो इसमें
कभी धूसर रंग
कभी लाल तो कभी सफेद
तुम स्वयं करते हो पीड़ा का आलिंगन
देते हो दावत गमों को
और फिर एक दिन
जब हो जाते हो आजिज़
अपनी महत्त्वाकांक्षाओं से
तब मिलता हूँ "मैं"
सबसे सुलभ साधन के रूप में
मढ़ देते हो मेरे सिर अपने किये सभी कर्म कुकर्म
दोषारोपण करना तुम्हारा प्रिय खेल जो है
जान लो ये सत्य
तुम नहीं हो सकते कभी मुक्त
क्योंकि
बीज तुमने स्वयं बोए
फसल जैसी भी उगे
तुम्हारी ही कहलाएगी
जीवन पारदर्शिता का वो उदाहरण है
जिसमें तुम स्वयं को देख सकते हो
अब स्वीकारो अथवा नकारो
ये तुम तय करो
मैंने तो निस्पृह हो बहना सीखा है

बुधवार, 15 मई 2024

उम्र की दस्तक गुनगुना रही है राग मालकोस...

 


मैंने तकलीफों को रिश्वत नहीं दी
कोई न्यौता भी नहीं दिया
उनकी जी हजूरी भी नहीं की
फिर भी बैठ गयी हैं आसन जमाकर
जैसे अपने घर के आँगन में
धूप में बैठी स्त्री
लगा रही हो केशों में तेल
कर रही हो बातचीत रोजमर्रा की
इधर की उधर की
तेरी मेरी

मेहमान दो चार दिन ही अच्छे लगते हैं
लेकिन इन्होंने जमा ली हैं जड़ें
बना लिया है घर वातानुकूलित
अब चाहे जितना आँगन बुहारो
बाहर निकालो
लानत मलामत करो
ढीठ हो गयी हैं
चिकना घड़ा हो जैसे कोई
नहीं ठहरती एक भी बूँद इनके अंदर

'फेविकोल का जोड़ है टूटेगा नहीं'
के स्लोगन को करते हुए चरितार्थ
तकलीफों ने बनाया है ऐसा गठजोड़
कभी एक घूमने निकलती है
दूसरी पुचकारने, हालचाल लेने चली आती है
नहीं छोड़तीं कभी अकेला
और सुनाने लगती हैं ये गाना
'तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है
अंधेरों से भी मिल रही रौशनी है'

और मैं हक्की बक्की
अपने घर को झाड़ने पोंछने की
कवायद में जुट जाती हूँ
इस आस पर
'वो सुबह कभी तो आएगी'

उम्र की दस्तक गुनगुना रही है राग मालकोस...

रविवार, 21 जनवरी 2024

गुलामी गीत

 

अति उन्माद अराजकता को जन्म देता है
समय रख रहा है आधारशिला
कल की, परसों की
बरसों की

इस दौर में
सत्य का घूँट
हलक से उतरा नहीं करता
तुम बोलोगे
मारे जाओगे

न उन्माद का चेहरा होता है
न उन्मादियों का
शताब्दियों ने मौन होकर
समय की स्लेट पर लिखी हैं कहानियाँ
जहाँ हथियार में तब्दील होता आदमी
धर्म और राजनीति की बिसात पर
मोहरा बन करता है नर्तन

समय स्वर्णाक्षरों में
दर्ज कर रहा है
भावनाओं का कोलाहल
जुनून बेपर्दा हो कर रहा है अट्टहास हंगामों से पटी पड़ी है धरती

श्रद्धा भक्ति और आस्था 
वृद्धाओं की कतार में 
सबसे अंत में खड़ी हैं 
टुकुर टुकुर देख रही हैं भव्यता का उन्माद 
जहाँ हाइजैक हो गए हैं भगवान भी 

आँख मूँद अनुसरण करने का दौर गुनगुना रहा है गुलामी गीत!!!