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रविवार, 11 अक्तूबर 2009

तुम जीत गए ,मैं हार गई

दो विपरीत ध्रुवों सा
जीवन अपना
साजन यूँ ही बीत गयातुम अपने धरातल से
बंधे रहे
मैं अपने बांधों में
सिमटी रही
तुम वक्त के प्रवाह संग
बहते रहे
मैं वक्त के साथ
न चल सकी
तुमने पाया हर
स्वरुप मुझमें
मैं तुममें कृष्ण
न पा सकी
धूप छाँव के
इस खेल में साजन
तुम जीत गए
मैं हार गई

33 टिप्‍पणियां:

ओम आर्य ने कहा…

BEHAD BHAWPURNA RACHANA...BADHAYI VANADANA JI

Unknown ने कहा…

bahut khub chand shabd me sab kuch kah diya aapne .

मोहन वशिष्‍ठ ने कहा…

बहुत अच्‍छी और भावपूर्ण रचना के लिए ढेरों बधाई वंदना जी

रश्मि प्रभा... ने कहा…

hare ko hari naam.......to jeeta to wahi n

प्रिया ने कहा…

aap krishnamay ho jati to achcha tha........but achcha laga

Himanshu Pandey ने कहा…

"दो विपरीत ध्रुवों सा
जीवन अपना"...

शुरुआत ही इतनी प्रभावी थी कि पूरी रचना बाँध गयी । आभार ।

Yogesh Verma Swapn ने कहा…

sunder abhivyakti . badhai.

समयचक्र ने कहा…

दो विपरीत ध्रुवों सा
जीवन अपना
साजन यूँ ही बीत गया
तुम अपने धरातल से
बंधे रहे
मैं अपने बांधों में
सिमटी रही

वंदना जी
आपकी रचना मन को छू गई . कितना सुन्दर कम शब्दों में आप अच्छा लिखती है . बधाई

Mishra Pankaj ने कहा…

दो विपरीत ध्रुवों सा
जीवन अपना
साजन यूँ ही बीत गया
तुम अपने धरातल से
बंधे रहे
वन्दना जी कविता अच्छी है

दिगम्बर नासवा ने कहा…

aksar kabhi kbhi insan jeevan bhar saath to chalta hai par nadi ke do kinaaron ki taarah .... bahoot cchaa likha hai ...

Vinashaay sharma ने कहा…

बहुत ही सुन्दर अपने में,सुन्दर भाव समेटे हुई रचना ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

वन्दना जी !
आपने जीत-हार की बहुत सुन्दर व्याख्या
अपने शब्द-चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत की है।
बधाई!

मनोज कुमार ने कहा…

संस्मरणात्मक वक्तव्य सयास बांध लेते हैं, और कुतूहल पैदा करते हैं।

M VERMA ने कहा…

दो विपरीत ध्रुवों सा
जीवन अपना
भावो की अप्रतिम प्रगाढता आपकी रचनाओ मे दिखती है
बहुत खूब

Vipin Behari Goyal ने कहा…

धूप छाँव के
इस खेल में साजन
तुम जीत गए
मैं हार गई

हार मानने से काम नहीं चलेगा
बहुत अच्छी कविता है

Kusum Thakur ने कहा…

रचना जी ,इस भावपूर्ण रचना के लिए बधाई .

दर्पण साह ने कहा…

तुमने पाया हर
स्वरुप मुझमें
मैं तुममें कृष्ण
न पा सकी


wah agar main is poem ko sahi samajh paya hoon ko gulazaar sa'ab ki ek nazm ka antra iske comment ke roop main...
"Mora gora ang leiye le...
Mohe shyaam rang daiye de."

mehek ने कहा…

bhavpurn rachana badhai

Nirbhay Jain ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना
सायद पहले बार ये बात हुई होगी किसी महिला ने अपने साजन से ये बात कही होगी
"तुम जीत गए मैं हार गई"

बधाई !

Preeti tailor ने कहा…

प्यार में हार भी जीत के समान है और हार के भी जीत ही होती है ...बढ़िया रचना

Urmi ने कहा…

बहुत ही ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने! इस बेहतरीन और शानदार रचना के लिए बधाई !

ktheLeo (कुश शर्मा) ने कहा…

वाह सुन्दर भाव वाली एक मनोहारी अभिव्यक्ति!

अमित ने कहा…

ये 'हार के भी जीत है' वाली हार नहीं लग रही !पता साजन भी जीता या नहीं !

"तुम अपने धरातल से
बंधे रहे" ..... "तुमने पाया हर
स्वरुप मुझमें".... "तुम जीत गए
मैं हार गई"

भाव बहुत अच्छे !

Science Bloggers Association ने कहा…

प्रेम में तो हार की ही जीत होती है।
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अजय कुमार ने कहा…

kya kahoon- AAH ya WAAH

kshama ने कहा…

Apne,apne paridhi bandh se ghire ham tanha hee rah jate hain...

शरद कोकास ने कहा…

यह स्वीकारोक्ति अच्छी है लेकिन ..फिरभी .. ।

vijay kumar sappatti ने कहा…

vandana..

this is one of your best compositions.. truly showing colours of a destroyed life/love .

regards

vijay

Dev ने कहा…

WiSh U VeRY HaPpY DiPaWaLi.......

Subhash Ujjwal ने कहा…

bahut achaa likhty hain aap eshi likhty rahiye

deepawali ki subhkamnayen

Pawan Kumar ने कहा…

भावपूर्ण रचना...

samaj.darshanindia.blogspot.com ने कहा…

vah kya man ki bat apne kahi hai bahut khub

samaj.darshanindia.blogspot.com ने कहा…

wah kya man ki bat aap ne kaha hai bahut khub.