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शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

कहाँ सजाऊँ इसे

तेरे रूप के सागर में
उछलती -मचलती
लहरों सी
चंचल चितवन
जब तिरछी होकर
नयन बाण चलाती है
ह्रदय बिंध- बिंध जाता है
धडकनें सुरों के सागर पर
प्रेम राग बरसाती हैं
केशों का बादल
जब लहराता है
सावन के कजरारे
मेघ छा जाते हैं
अधरों की अठखेलियाँ
कमल पर ठहरी ओस -सी
बहका- बहका जाती हैं
क़दमों की हरकत पर तो
मौसम भी थिरक जाते हैं
ऋतुओं के रंग भी
बदल- बदल जाते हैं
रूप- लावण्य की
अप्रतिम राशि पर तो
चांदनी भी शरमा जाती है
फिर कैसे धीरज
रख पाया होगा
तुझे रचकर विधाता
कुछ पल ठिठक गया होगा
और सोच रहा होगा
लय और ताल के बीच
किसके सुरों में सजाऊँ इसे
किस शिल्पकार की
कृति बनाऊँ इसे
किस अनूठे संसार में
बसाऊँ इसे
किसके ह्रदय आँगन में
सजाऊँ इसे
किस भोर की उजास
बनाऊँ इसे
किस श्याम की राधा
बनाऊँ इसे

35 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

तुझे रचकर विधाता
कुछ पल ठिठक गया होगा
और सोच रहा होगा
लय और ताल के बीच
किसके सुरों में सजाऊँ इसे
किस शिल्पकार की
कृति बनाऊँ इसे
किस अनूठे संसार में
बसाऊँ इसे

कल्पना का सुन्दर रूप सजाया है आपने अपने इस नवगीत में।।
बधाई!

निर्मला कपिला ने कहा…

वन्दना बहुत ही सुन्दर रचना है बधाई

मीत ने कहा…

क्या रूप की स्वर्णिम अनुपम मूरत के बारे में जिसे आपने शब्दों में रचा है...
बेहद सुंदर रचना है... आपकी रचना की नायिका को देखने को मन मचलता है...
मीत

अजय कुमार ने कहा…

सुखद अनुभूति , बहुत सुंदर रचना

मनोज द्विवेदी ने कहा…

behatarin kavita..dhanyabad

रश्मि प्रभा... ने कहा…

बहुत ही बढ़िया

kshama ने कहा…

Wah! Harek lafz lavanymayi....rachnako sajata hua..apne roopse nikharta hua!

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

लय और ताल के बीच
किसके सुरों में सजाऊँ इसे
किस शिल्पकार की
कृति बनाऊँ इसे
किस अनूठे संसार में
बसाऊँ इसे
सुन्दर भावनात्मक कविता !

मनोज कुमार ने कहा…

तुझे रचकर विधाता
कुछ पल ठिठक गया होगा
और सोच रहा होगा
लय और ताल के बीच
किसके सुरों में सजाऊँ इसे

रचना अच्छी लगी।

परमजीत बाली ने कहा…

वन्दना जी, बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

sangeeta ने कहा…

फिर कैसे धीरज
रख पाया होगा
तुझे रचकर विधाता
कुछ पल ठिठक गया होगा
और सोच रहा होगा
लय और ताल के बीच
किसके सुरों में सजाऊँ इसे
किस शिल्पकार की
कृति बनाऊँ इसे
बहुत सुन्दर भावों से रचाई है ये रचना....बधाई

shikha varshney ने कहा…

वंदना जी आपके ब्लॉग से कॉपी पेस्ट नहीं हो रहा तो जो पंक्तियाँ संगीता जी ने लिखी हैं मुझे भी बहुत ज्यादा पसंद आई...बहुत ही खुबसूरत रचना रची है आपने..बधाई स्वीकारें.

psingh ने कहा…

बेहतरीन रचना
बहुत -२ हार्दिक शुभ कामनाएं

Arvind Mishra ने कहा…

सौन्दर्यानुभूति की सुन्दर कविता

अर्शिया ने कहा…

दिल को छू लेने वाले भाव।
------------------
जिसपर हमको है नाज़, उसका जन्मदिवस है आज।
कोमा में पडी़ बलात्कार पीडिता को चाहिए मृत्यु का अधिकार।

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

Wahwa...achhi kavita....

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया रचना.आनन्द आया.

योगेश स्वप्न ने कहा…

bahut khoobsurat abhivyakti. khaskar ye panktian.

तुझे रचकर विधाता
कुछ पल ठिठक गया होगा
और सोच रहा होगा
लय और ताल के बीच
किसके सुरों में सजाऊँ इसे. umda.

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

... sundar rachanaa, prasanshaneey !!!

psingh ने कहा…

इस जोरदार रचना के लिए
बहुत -२ बधाइयाँ

रचना दीक्षित ने कहा…

तुझे रचकर विधाता
कुछ पल ठिठक गया होगा
और सोच रहा होगा
लय और ताल के बीच
किसके सुरों में सजाऊँ इसे

कविता की ही तरह एक अद्भुत अद्वितीय अनूठी प्रेयसी की तस्वीर

chetan anand ने कहा…

vandana ji pahli baar padha magar baar- baar padhne ko mann karta hai. apka mere blog par bhi swagat hai.

dweepanter ने कहा…

बहुत ही सुंदर रचना है। ब्लाग जगत में द्वीपांतर परिवार आपका स्वागत करता है।
pls visit....
www.dweepanter.blogspot.com

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

बहुत से सवाल.
सुंदर अनुभूति

सर्वत एम० ने कहा…

शब्द चयन के लिए प्रशंसा करूं, कल्पना की उड़ान को सराहूं, शिल्प की तारीफ की जाये या बुनावट के लिए, समझ पाना मुश्किल है. कविता संसार के लिए आप एक उपलब्धि हैं. मैं खुद को बदकिस्मत समझ रहा हूँ जो आप तक इतनी देरी से पहुंचा. आप में आग है, इसे और दह्काएं. मैं इस रचना के लिए आपको मुबारकबाद पेश करता हूँ.

Sadhana Vaid ने कहा…

बहुत ही सुन्दर शब्द विन्यास और उससे भी सुन्दर भाव और उनका प्रस्तुतिकरण । बहुत बहुत बधाई !

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत खूबसूरत रचना है .. बधाई आपको !!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

विधाता की रची इस अनुपम कृति को बहुत सुंदर शब्दों में बँधा है आपने ..........

Devendra ने कहा…

सुंदर चित्र खींचा है आपने अपनी कलम से
बधाई।

नीरज गोस्वामी ने कहा…

रूप- लावण्य की
अप्रतिम राशि पर तो
चांदनी भी शरमा जाती है
फिर कैसे धीरज
रख पाया होगा
तुझे रचकर विधाता

वाह...वंदना जी वाह...इस बेहद खूबसूरत एहसास वाली रचना के लिए आपकी जितनी प्रशंशा करूं कम है...वाह
नीरज

Kavi Kulwant ने कहा…

अच्छी रचना है..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (09-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (06-01-2013) के चर्चा मंच-1116 (जनवरी की ठण्ड) पर भी होगी!
--
कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि चर्चा में स्थान पाने वाले ब्लॉगर्स को मैं सूचना क्यों भेजता हूँ कि उनकी प्रविष्टि की चर्चा चर्चा मंच पर है। लेकिन तभी अन्तर्मन से आवाज आती है कि मैं जो कुछ कर रहा हूँ वह सही कर रहा हूँ। क्योंकि इसका एक कारण तो यह है कि इससे लिंक सत्यापित हो जाते हैं और दूसरा कारण यह है कि किसी पत्रिका या साइट पर यदि किसी का लिंक लिया जाता है उसको सूचित करना व्यवस्थापक का कर्तव्य होता है।
सादर...!
नववर्ष की मंगलकामनाओं के साथ-
सूचनार्थ!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kailash Sharma ने कहा…

वाह! भावों की बहुत लाज़वाब अभिव्यक्ति...

Kalipad "Prasad" ने कहा…

वंदना जी ,आपकी कल्पना की,प्रेम भाव की ,लेखन शैली की जवाब नहीं :बधाई
नई पोस्ट में :" अहंकार " http://kpk-vichar.blogspot.in