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सोमवार, 13 अप्रैल 2020

आ अब लौट चलें - कोरोनाकाल

आज के कोरोनाकाल में जब विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है तब भी मानव उससे हारे जा रहा है, आखिर क्या कारण रहे इस हार के, सोचने पर विवश हो जाते हैं. 

पिछले कुछ समय से जो अध्ययन मनन और चिंतन कर रही हूँ तो पाती हूँ आज हमारे रहन सहन, खान पान, आचार विचार और व्यवहार सब में इतनी तबदीली आ गयी है कि पीछे मुड़कर देखो तो जैसे एक युग से दूसरे युग में पदार्पण किया हो. 

मैं आज से ४०-४५ वर्ष पीछे भी यदि मुड़कर देखती हूँ तो पाती हूँ उस समय के लोगों में आचार विचार का बहुत ख्याल रखा जाता था जिसे बाद के वर्षों में छुआछूत का नाम दे दिया गया या कुछ लोग कहने लगे थे, उनके यहाँ तो बहुत सोध करते हैं. घर की चप्पलें बाहर रखो. घर के अन्दर घूमना हो तो खडाऊं पहनी जाती थी. वहीँ रोज नहाना और प्रत्येक कपडा धुलता था यहाँ तक कि तौलिये भी जबकि आज तौलिये रोज कोई नहीं धोता. वहीँ उस समय शौच से निवृत्त होने पर राख से हाथ धोने होते थे और उसके बाद आपको नहाना होता था. यानि आप पूरी तरह से शुद्ध हो गए. कोई भी कीटाणु जीवाणु आपके साथ घर के अन्दर नहीं आ पाते थे. वहीँ रसोई में जब भी कोई काम करना होता तो लोटा रखा होता उसमें पानी भरा होता, पहले हाथ धोओ फिर बर्तनों या सामानों को हाथ लगाओ. यानि कदम कदम पर स्वच्छता का बोलबाला था जिसे समय बीतने के साथ सोध या छुआछूत का नाम दे दिया गया. अस्पृश्यता ने अपनी जड़ें अन्दर तक जमाई हुई थीं. यदि जमादार आता तो उसे भी छुआ नहीं जाता . दूर से ही सामान दे दिया जाता. पैसे भी दूर से जमीन पर रख दिए जाते और वो उठा लेता. शायद इसका भी यही कारण था जो मुझे आज इस महामारी के दौर में समझ आ रहा है, जिसने आज तक अपनी जड़ें गहरी जमाई हुई हैं कि इस कोरोनाकाल में भी कुछ लोग जिन्हें क्वारंटाइन किया हुआ है, वो एक दलित के हाथ का खाना खाने को तैयार नहीं हैं बिना इसका औचित्य जाने उन्होंने इन बातों को गलत सन्दर्भ से जोड़ लिया. 


महामारियों का इतिहास बहुत पुराना है. पहले चालीस पचास साल बाद कोई न कोई महामारी संसार में दस्तक देती ही रहती थी. ऐसे में जनता में या तो जागरूकता फैलाई जाए या फिर जनता स्वयं जागरूक हो. संभव है जब जब महामारियां फैली होंगी, जहाँ संक्रमण छूने भर से फ़ैल जाता होगा, वहां ऐसे ही उपाय अपनाए जाते रहे हों. १९१८ -१९२० के मध्य के बीच जब महामारी फैली तो संभव है उससे बचाव के लिए सबने इसी तरह के स्वच्छता के नियमों को अपनाया हो. अब जब कोई महामारी लम्बे समय तक फैली रहती है ऐसे में लोगों में उससे बचने के लिए जो उपाय किये जाते हैं वो उनकी आदत में धीरे धीरे शुमार हो जाते हैं और फिर उसके वो आदि हो जाते हैं. फिर ऐसी आदतें अपनी जड़ें जमा लेती हैं जो वर्षों बरस चलती चली जाती हैं. फिर पीढियां बदल जाती है लेकिन आदतें नहीं बदलतीं. संभव है इन्हीं आदतों को अस्पृश्यता या छुआछूत का रूप दे दिया गया हो. जिस कारण एक वर्ग विशेष को जैसे समाज से ही काट दिया गया हो इन्हीं आदतों की वजह से. लेकिन कोई इसकी गहराई में नहीं गया. बस वर्ग बना दिया गए और उनके काम बाँट दिए गए. वर्ना देखा जाए हैं तो सभी इंसान ही जिनमें एक जैसा लहू बहता है लेकिन जो नियम महामारी से बचने के लिए बनाए गए उनका कालांतर में दुरूपयोग होने लगा और छुआछूत लहू में पैबस्त हो गयी. 

मुझे याद आती हैं मेरी एक बुआ जो अपने हाथ कोहनियों तक धोती थीं और पैर भी आधे आधे. नहाती थीं तो कोई और बर्मा चलाये और नहाकर धुली हुई चौंकी पर जाकर ही बैठती थीं. कुछ किसी से मँगातीं तो उसे दूर से ही पैसे देती थीं. तब उन्हें सभी सोधन कहते थे लेकिन आज सोचती हूँ तो पाती हूँ शायद ये संस्कार उनमें इतने अधिक पैबस्त थे कि वो उनसे कभी बाहर ही नहीं आयीं जबकि बाकी लोगों ने धीरे धीरे ऐसे संस्कारों से किनारा करना शुरू कर दिया था. 

वहीँ सात्विक भोजन ही हमेशा से मनुष्य के लिए उत्तम भोजन माना गया लेकिन बदलते समय ने खान पान भी इतना बिगाड़ दिया कि आज मानव की इम्युनिटी इतनी कमजोर हो गयी है कि उसका शरीर जरा सा भी झटका नहीं सहन कर पाता. हम देखते हैं पहले के लोग यदि बासी भोजन भी खाते थे तब भी उन्हें कुछ नहीं होता था. लक्कड़ पत्थर सब हजम हो जाता था क्योंकि उनके भोजन में विषैले तत्व शामिल नहीं होते थे. जीव जंतु शामिल नहीं होते थे. समय के साथ विज्ञानं ने भी ये सिद्ध किया की शाकाहारी भोजन ही उत्तम भोजन है और आज जाने कितने ही देश शाकाहार की तरफ लौट रहे हैं. 

आज के सन्दर्भ में जब देखती हूँ तो यही पाती हूँ. किन कारणों से जीवन में बदलाव आये और कालांतर में  उनका कैसे दुरूपयोग होने लगा. वहीँ दूसरी तरफ ये पाती हूँ इंसान की प्रवृत्ति प्रकृति प्रदत्त है. उसी प्रकृति का हिस्सा है. अब यदि प्रकृति का दुरूपयोग होगा तो इंसान की सेहत पर भी उसका असर जरूर पड़ेगा क्योंकि बना तो वो भी उसी प्रकृति से है. आज की ये महामारी मानो एक संकेत या कहो सन्देश है मानव जाति को - अति हर चीज की बुरी होती है मानो यही कहना चाहती है प्रकृति. विज्ञान को भी प्रकृति चाहे तो धता बता सकती है. प्रकृति चाहती है स्वच्छता, निर्मलता लेकिन मानव ने यही उससे छीन लिए हैं तो उन्हीं का शिकार होने से वो कैसे बच सकता है? क्या ये बात विचारणीय नहीं? 

मानव को कुछ बदलाव लाने ही होंगे. जिस गंगा को करोड़ों रूपये लगाकर भी साफ़ नहीं किया जा सका सिर्फ २१ दिन में वो स्वयं साफ़ हो गयी - आखिर क्यों? क्या ये विचारणीय नहीं? 

आज आसमान साफ़ दिखाई देता है, पंछी गगन में उन्मुक्त विहार करते हैं, जो गोरैया अदृश्य हो गयी थी आज उसकी चहचहाट से हर घर गुलजार होने लगा है, साफ़ स्वच्छ वायु , रात को तारों भरा निर्मल आकाश क्या हमें सोचने को मजबूर नहीं करता कि मानो प्रकृति ये सन्देश दे रही है ये है मेरा स्वरुप और तुमने क्या कर दिया. क्या ये बात विचारणीय नहीं?

यदि हम चाहते हैं हम स्वस्थ रहें और एक अच्छा जीवन जीयें तो हमें अपने अन्दर बदलाव लाने ही होंगे. इसके लिए कोई सरकार कुछ नहीं कर सकती. ये एक विडंबना है आज सरकार को विज्ञापन के माध्यम से तो कभी स्वयं आकर जनता को हाथ धोने के तरीके सिखाने पड़ रहे हैं जबकि ये तो हमारे संस्कारों में पैबस्त थे लेकिन आधुनिकता की दौड़ में शामिल होने की चाहत में हमने जो भी सीखा था वो भुलाते चले गए और आज उसका नतीजा भुगत रहे हैं. 

तो सोचिये और विचारिये - क्या अब ये कहने का दौर नहीं आ गया - आ अब लौट चलें 

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

घर वापसी

लॉक डाउन के माहौल में, कोरोना की फ़िक्र में मची चारों तरफ अफरा तफरी .....रात दिन सिर्फ एक ही फ़िक्र में गुजर रहे हैं सभी के.......दूसरी तरफ कामगारों का पलायन एक नयी समस्या बन उभरा तो सोचते सोचते कुछ ख्याल यूँ दस्तक देने लगे :

नहीं होती घर वापसी किसी की भी कभी पूरी तरह
जो गया था वो कोई और था
जो आया है वो कोई और है

तुम जब जाते हो
छोड़ जाते हो थोडा सा
गाँव की मिटटी में खुद को
जो सहेजे रखती है तुम्हें एक लम्बे अरसे तक
मगर वो अरसा कभी कभी इतना लम्बा हो जाता है
कि मिटटी भी भूलने लगती है
तुम्हारी किलकारियां
तुम्हारी शैतानियाँ
तुम्हारा चेहरा
वतन में बेवतन हो जाए जैसे कोई

एक लम्बा वक्फा काफी होता है
स्मृतियों पर जाले बनाने को
तुम झाड़ना चाहो फिर चाहे जितना
वक्त किसी पैकेज का मोहताज नहीं होता
और नमी मिटटी की हो या आँखों की
एक अरसे बाद सूख ही जाती है

अच्छा सच बताना
तुम जो आये - क्या वही हो?
क्या तुम साथ नहीं लाये
अपनी मजबूरियों की पतंग
क्या तुम भूल पाओगे
अपने पाँव में पड़ी गांठें
क्या याद नहीं आयेंगे तुम्हें
शहर की सहूलियतों के लिहाफ
जिन्हें ओढने के तुम हो चुके हो आदी
ये तो मजबूरी की बेसमय बजती शहनाई से आजिज हो
किया है तुमने गाँव की तरफ रुख

ये वापसी घर वापसी नहीं
ये है एक अवसर
ये है एक मजबूरी
ये है एक सहूलियत
ये है एक पड़ाव
क्योंकि कोई भी वापसी कभी पूरी वापसी हो ही नहीं सकती
अकाट्य सत्य है ये .......