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शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

सफर निशा का

स्याह रात का तन्हा सफर
ज्यों प्रियतम बिन सजनी का श्रृंगार
किस मिलन को आतुर निशा
पल -पल का अँधेरा समेट रही है
भोर के उजास से मिलन को
क्यूँ विरह के पल गिन रही है
ये क्षण -क्षण गहराता अँधियारा
तन्हाईयाँ बढाता जाता है
निशा के गहरे दामन को
और गहराता जाता है
कौन बने तन्हाई का साथी
स्याह रात के स्याह सायों के सिवा
विरह अगन में दग्ध निशा
ज्यों बेवा नूतन श्रृंगार किए हो
प्रिय मिलन की आस में जैसे
विरहन का कफ़न ओढ़ लिया हो

16 टिप्‍पणियां:

निर्मला कपिला ने कहा…

विररह वेदना को बहुत मार्मिक शब्दों मे संजोया है ।बहुत अच्छी,भावमय रचना है शुभकामनायें

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

विरह अगन में दग्ध निशा
जैसे बेवा श्रृंगार किए हो।
ऐसा लगता है जैसे,
क्वारी कन्या परिवार लिए हो।।

बहुत सुन्दर भाव भरे है आपने इस पोस्ट में।
गीत लिखने को मेरा मन मचल उठा है।
बहुत-बहुत बधाई!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

virah agan me shabd shabd dagdh hain

दिगम्बर नासवा ने कहा…

भाव पूर्ण शब्दों में सजाया है इस निशा के सफ़र को ........... सुन्दर अभिव्यक्ति .......

Preeti tailor ने कहा…

intzaar ki inteha hai ye kavita

Mishra Pankaj ने कहा…

सुन्दर रचना

M VERMA ने कहा…

बहुत मार्मिक -- बहुत संवेदनशील
अत्यंत कोमल रचना
कौन बने तन्हाई का साथी
स्याह रात के स्याह सायों के सिवा
स्याह साये उजास पाते ही गुम हो जायेंगे.

अजय कुमार ने कहा…

विरह का जलजात
जीवन
विरह का जलजात

Apanatva ने कहा…

virah bhav se ot prot kavita .

Yogesh Verma Swapn ने कहा…

virah agan men...........odh liya ho.

behatareen panktian,

vandana ji, aapki rachnaon men bahut nikhaar aa raha hai, bahut gahre utarne lagi hain aap. badhaai.

vikram7 ने कहा…

विरह अगन में दग्ध निशा
ज्यों बेवा नूतन श्रृंगार किए हो
प्रिय मिलन की आस में जैसे
विरहन का कफ़न ओढ़ लिया हो
अति मार्मिक भावो से युक्त रचना

मनोज कुमार ने कहा…

इस रचना में भावावेग की स्थिति में अभिव्यक्ति की स्वाभाविक परिणति दीखती है।

दर्पण साह ने कहा…

Every night has a day following to it...

....and vice versa is also true !!

marmik abhivyakti khasskar antim ki ye lines:
"कौन बने तन्हाई का साथी
स्याह रात के स्याह सायों के सिवा
विरह अगन में दग्ध निशा
ज्यों बेवा नूतन श्रृंगार किए हो
प्रिय मिलन की आस में जैसे
विरहन का कफ़न ओढ़ लिया हो"

ktheLeo (कुश शर्मा) ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति है.यदि माफ़ करें तो अन्तिम पंक्ति शायद कुछ ऐसे भी फ़बती,

"बिरहन ने कफ़न ओढ़ लिया हो."
या फ़िर
’विरह का कफ़न ओढ़ लिया हो’

’सच में’पर कभी कभी आया करिये.आदर सहित.

vijay kumar sappatti ने कहा…

vandana ji

virah ras me doobi hui is achooti rachna ke liye meri badhayi sweekar kare..

vijay

रंजू भाटिया ने कहा…

कौन बने तन्हाई का साथी
स्याह रात के स्याह सायों के सिवा

बहुत सुन्दर भाव हैं आपकी इस रचना के ..स्याह रात तनहा ही साथ निभाती है ...