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सोमवार, 23 अप्रैल 2018

स्वप्नपाश मेरी नज़र में :


हम सब एक काल्पनिक दुनिया में विचरण करते हैं अक्सर ...शायद वही जीने का एक बहाना बन जाती है, एक आस का पंछी ही जीवन को दिशा दे जाता है लेकिन क्या हो यदि हम उस काल्पनिक दुनिया में वीभत्सता को जीने लगें? हमें पता है ये गलत है लेकिन फिर भी एक सोच अपनी जकड़न में ऐसे जकड़े कि चाहकर भी निकल न पायें? मानव का दिमाग आज भी साइंस के लिए कौतुहल का विषय है और उसी दिमाग में उठाते फितूर के साथ यही किसी को जीना पड़े तो वो कैसे जी सकेगा जिसमें हर पल दिन हो या रात एक दूसरा ही संसार साथ साथ चलता रहे? अवास्तविक रूप , वास्तविकता का आभास कराएं, आपसे बतियाएं, आपको अपने कण्ट्रोल में कर लें, आपकी सोचने समझने की क्षमता को ऐसे जकड लें कि आप उनके नियंत्रण में हो जाएँ और कुछ भी करने को तत्पर फिर वो दूसरे को नुक्सान पहुँचाना हो या खुद को.....एक स्किज़ोफ्रेनिक की ज़िन्दगी की ये कडवी हकीकत होती है....वो चाहकर भी नार्मल ज़िन्दगी नहीं जी पाता.....उसे अपने आस पास एक दूसरी दुनिया ही हर पल दिखाई देती है....वो संवाद आपसे कर रहा होता है लेकिन अन्दर भी एक संवाद अदृश्य रूप में चल रहा होता है जो दृश्य उसे दिखाई दे रहे होते हैं उनसे....एक ही पल में दो दो ज़िन्दगी जीना कहाँ आसान होता है? ऐसी ही ज़िन्दगी जी रही है उपन्यास 'स्वप्नपाश' की नायिका गुलनाज फरीबा.

मनीषा कुलश्रेष्ठ द्वारा लिखित किताबघर से प्रकाशित उपन्यास 'स्वप्नपाश' पाठक को एक ऐसी दुनिया में ले जाता है जिससे उसका परिचय नहीं होता. हकीकत से बेहतर उसे उसके सपनो की दुनिया लगती है. कभी हकीकत डराती है कभी स्वप्न. दोनों जिंदगियों में सामंजस्य बिठाना आसान नहीं होता होगा...इसी को दर्शाया है लेखिका ने. उपन्यास में एक ही पहलू नहीं बल्कि कई पहलुओं पर प्रकाश डाला है लेखिका ने जैसे आखिर गुल ऐसी क्यों हुई? क्या वजह रही उसके स्किज़ोफ्रेनिक होने की तो एक वजह तो यही निकलकर आती है कि उसकी माँ ने गर्भावस्था के अंतिम महीनो तक डांस किया जिसका असर उस पर पड़ा. वहीँ स्मोक करना भी एक कारण होता है ऐसा होने का उसे भी लेखिका ने बताया है. साथ ही लेखिका ने एक और पहलू पर ध्यान दिलाया कि ऐसे बच्चों को अपनों के साथ की बहुत जरूरत होती है. उनकी स्पेशल केयर की जाए तो संभव है वो नार्मल ज़िन्दगी जी सकें लेकिन जिसके माता पिता दोनों ही अपनी महत्त्वाकांक्षाओं से घिरे हों, बच्ची आया के सुपुर्द हो वहां तो ये समस्या हमेशा समस्या ही रहेगी क्योंकि जो प्यार और देखभाल माता पिता दे सकते हैं आया नहीं, मानो यही कहना चाहा है लेखिका ने. क्योंकि गुलनाज़ ऐसे ही ट्रामा से लगातार गुजरती रही, वो चाहती थी अपनी माँ का साथ, उससे सब शेयर करना लेकिन माँ का व्यक्तित्व ही हावी रहा उस पर, कभी वो सुरक्षा महसूस ही नहीं हुई जिनसे सब शेयर किया जा सके यहाँ तक कि जिस उम्र में एक माँ की सबसे ज्यादा एक जवान होती लड़की को जरूरत होती है उस उम्र में भी वो आया पर ही निर्भर रही और अपने शरीर में होते बदलाव को लेकर वो बच्ची आशंकित ही रही, यहाँ तक कि सेक्स भी उसके लिए कभी रुचिकर विषय नहीं रहा. फिर भी प्यार की प्यास थी उसके अन्दर जो चाहती थी कोई उसे चाहे उसके शरीर को नहीं लेकिन वो हमेशा प्यासी ही रही. यहाँ तक कि एक चित्रकार होने के नाते वो अपने चित्रों में शायद अपने मन की उन्ही ग्रंथियों को उकेरती रही जो उसने कच्ची उम्र से भोगा फिर वो सेक्स हो, घृणा या जीवन या फिर न्युड़ीटी ... क्योंकि अभिव्यक्ति को माध्यम की जरूरत थी और वो शायद इसी रूप में बाहर आ रही थी. बहुत आसान होता है कला और साहित्य में न्युड़ीटी के माध्यम से ऊपर चढ़ना लेकिन वो तो ऐसा चाहती भी नहीं थी लेकिन तब भी उसकी चेतना उससे ऐसे ही स्केच बनवाती थी जो शायद यही बताते थे कि कहीं न कहीं सेक्स का विषय उनके लिए एक दुखद या सुखद अनुभूति की तरह होता है क्योंकि बचपन से ही अवांछित शोषण की शिकार हो जाती है लेकिन उस घुटन को किसी से न कह पाना कितना मुश्किल होता है ऐसे में जीना और खुद को एक अपने सोच के दायरे में कैद कर लेना क्योंकि कोई उन पर न विश्वास करने वाला था और न ही सुनने वाला फिर बड़े होने पर फिर सेक्स के वक्त मतिभ्रम का शिकार हो जाना तो कैसे नहीं ऐसे लोग वो ही बनायेंगे या लिखेंगे जो ऐसे दुखद दौर से गुजरे हों. मानसिक उद्वेलन क्यों नही उभरेगा उनकी कृतियों में ? खुद को बाहर निकालने का एक सशक्त माध्यम था चित्रकारी लेकिन उसी माध्यम ने उससे उसका सब कुछ छीन भी लिया जब वो एक कला समीक्षक के द्वारा बलात्कार की शिकार हो जाती है और खुद पर नियंत्रण खो देती है. कितना अकेलापन महसूस किया उसने उस वक्त कोई अंदाज़ा भी नहीं लगा सकता क्योंकि पिता की मृत्यु के बाद माँ लन्दन में रहने लगी और वो यहाँ अकेली नाना के घर में, जहाँ अनेक स्मृतियाँ थीं और फिर एक दिन वो भी बेच दिया हो .......पूरे संसार में जैसे कोई नहीं उसका और यदि कोई है उसका तो उसके आभासी किरदार, जिसे डॉक्टर मतिभ्रम कहते हैं. यूँ तो हर इंसान साथ होते भी अकेला होता है और यदि कोई उसके साथ होता है तो उसके विचार , उसकी सोच और उसकी कल्पना ही होती है फिर वो कल्पना ईश्वर ही क्यों न हो तो लगता है जैसे हर व्यक्ति स्किज़ोफ्रेनिक ही तो है मगर यहाँ सोचिये जो व्यक्ति मतिभ्रम की उच्चतम अवस्था में पहुँच जाए , जिसका खुद पर से नियंत्रण ही ख़त्म हो जाए...आखिर क्यों? क्योंकि कहीं न कहीं वो बहुत अकेला हो गया, कोई नहीं मिला उसे जिससे अपने मन की कह सके तो उसके पास आखिरी रास्ता आखिर क्या बचेगा? शायद आत्महत्या ही और वो ही गुल्नाज़ करती है ........वहीँ डॉ मृदुल का रोल भी इसमें बहुत मायने रखता था........बेशक जो डॉ होता है उसे मरीज से सिर्फ उतना ही रिश्ता रखना चाहिए जितना मरीज और डॉ में होता है लेकिन ऐसे मरीजों के अन्दर की बात जानने के लिए डॉ को आत्मीयता दिखानी पड़ती है, उनको अहसास कराना होता है वो उनको न केवल सुनेंगे बल्कि समझेंगे भी और ऐसा ही डॉ करता है लेकिन गुलनाज़ की हालत डॉ को उसके बेहद करीब ले आती है तो गुल के लिए एक आकर्षण का कारण बन जाता है जैसा कि ऐसे केसों में हो जाता है और डॉ मृदुल भी उसके लिए हमेशा फिक्रमंद रहता है लेकिन उसका अर्थ ये नहीं कि वो भी नजदीकियां बढाए और जैसे ही समझ आता है वो किनारा कर लेता है शायद ये भी एक वजह बनी उसके इस ट्रामा के बढ़ने की......आशा और निराशा के संसार का चित्रण है स्वप्नपाश, मानसिक उद्वेलना को जैसे किसी ने टंकित कर दिया हो ....लेखिका ने बेहद गहन अध्ययन कर एक ऐसी समस्या की ओर ध्यान आकर्षित करवाया है जिसमें हम बहुत जल्दी खिताब दे देते हैं सामने वाले को पागल होने का लेकिन जरूरी है सामने वाले की समस्या को समझना और उसे अपनेपन का अहसास करवाना.......मानो इस कहानी के द्वारा यही लेखिका कहना चाहती हैं.

बहुत संवेदनशील होते हैं ऐसे लोग ऐसे में उनकी उपेक्षा ही उनको आक्रामक बनाती है. यदि उन्हें प्यार दुलार और व्यवहार उचित मिले तो संभव है वो एक नार्मल लाइफ जी सकें और अपनी इस परिस्थिति से बाहर आ सकें क्योंकि कहीं न कहीं उपेक्षा तो हर व्यक्ति को व्यथित करती है, आक्रामक करती है. छोटा सा उदाहरण साहित्य में ही देखिये जो भी उपेक्षित होता है वो कैसे आरोप लांछन का खेल खेलकर अपनी आक्रामकता प्रदर्शित करता है बिना बड़े छोटे का लिहाज किये तो जो अपने दिमाग के हाथों की कठपुतली बने हों उनका तो आक्रामक होना लाजिमी है.

हैलूसिनेशन कहना आसान है लेकिन जो झेलता है उसको समझना बहुत मुश्किल. वहम किसे नहीं होते ? आम इंसान भी वहम में ही जीता है उम्र भर. ऐसे में जो पेशेंट होता है वो कुछ ज्यादा ही उनमें जीता है. एक डॉ का क्या रोल हो, घरवालों का क्या रोल हो और पेशेंट को कैसे हैंडल किया जाना चाहिए मानो इसी को रेखांकित करना चाहती है लेखिका. खुद नृत्य में पारंगत होने के कारण उसके पहलुओं को भी बेहद सघनता से उकेरा है तो कला दीर्घा के प्रति उनकी रूचि परिलक्षित होती है. एक बेहद जटिल विषय पर बहुत ही सहज रेखांकन है स्वप्नपाश. पढ़ते पढ़ते कई बार ऐसा लगा जैसे जॉयश्री रॉय को पढ़ रहे हों. दोनों लेखिकाओं के लेखन में कई जगह समानता दिखाई दी. उसी तरह कई पहलुओं को लेखिका ने उभारा जैसे जॉयश्री रॉय ने दर्द्जा में उभारा तो ध्यान जाना स्वाभाविक है. सबसे बड़ी बात उपन्यास का कवर खुद पूरी कहानी व्यक्त कर जाता है. लेखिका किसी पहचान की मोहताज नहीं, उनका लेखन ही उनकी पहचान है. उम्मीद है आगे भी पाठकों को ऐसे ही नए विषय पढने को मिलते रहेंगे. शुभकामनाओं के साथ ...




विश्व पुस्तक दिवस पर पुस्तक की ही बात क्यों न की जाए और उसे सार्थक किया जाए.

गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

उड़ा क्यूँ है दुपट्टा मलमल का

आज क्यूँ है खड़ी, ये उदासी बड़ी
सुलगे क्यूँ हैंअरमान, बेबसी है कड़ी

ज़िन्दगी दुल्हन बनी, बेजारी की घडी
राख क्यूँ है पड़ी, मासूमियत है झड़ी

रूह क्यूँ है मरी, बेसाख्ताअट्टहास करी
लाश पे लाश पे लाश, आखिर क्यूँ है गिरी

कब्र में क्यूँ है दबी, वो खामोश सिसकी
अनारकली जब भी चिनी, क्यूँ है जिंदा चिनी

रात क्यूँ है खड़ी, इंतज़ार में हर पल मरी
सुबह आएगी बड़ी, क्यूँ ऐतबार में पड़ी

बेटी क्यूँ है जनी, सुन सुन माँ रो ही पड़ी
बलात्कार की शिकार, चक्रव्यूह में क्यूँ है फँसी

रात क्यूँ है आधी रही, रवायत जारी रही
बात आधी रही, राजनीति की मारी रही

शिकन क्यूँ है तारी रही, किस बात की खुमारी रही 
बेहयाई के दौर की, कैसी ये गैंगवारी रही

उड़ा क्यूँ है दुपट्टा मलमल का,आँखों में यही सुर्ख लाली रही
सोच में सारी खुद्दारी रही , घोड़े पे क्यूँ न लगाम लगाई गयी 

©वन्दना गुप्ता

गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

दर्द्जा और हलाला मेरी नज़र में



धर्म एक ऐसी अफीम है जिसके नाम पर सौ गुनाह भी माफ़ हो जाते हैं. धर्म की अफीम जिसने चाटी वो बुलंदियों पर पहुँच गया, कौन नहीं जानता. सबसे आसान है धर्म के नाम पर शोषण. उसमें भी यदि धर्म इस्लाम हो तो वहाँ की जटिलताओं से कौन वाकिफ नहीं. आम इंसान को नहीं पता होता आखिर उनके शास्त्रों में क्या वर्णित है और क्या नहीं. वो जो अपने गुरुओं पैगम्बरों से जो सुनता है उसे ही धर्म मान लेता है और फिर उसी के अनुसार जीवन व्यतीत करता है. उसमें यदि जरा भी व्यवधान आये तो डर का भूत उसकी बुद्धि के पाँव को जकड लेता है फिर वो कितना ही पढ़ा लिखा हो या जाहिल या अशिक्षित. शायद यही सबसे बड़ा कारण है किसी भी धर्म को मनवाने का वो भी अपनी इच्छानुसार. डर से बढ़कर दुनिया में कोई राक्षस नहीं. लेकिन इसी डर के कारण कैसे इस्लाम में जीवन भयावह होता है इसका दिग्दर्शन यदि करना है तो वाणी प्रकाशन से प्रकाशित जॉय श्री रॉय का उपन्यास ‘दर्द्जा’ और भगवान् दास मोरवाल जी का उपन्यास ‘हलाला’ पढ़ा जाना चाहिए. 

दर्द्जा हव्वा की बेटियों की दर्दभरी दास्तान का मानीखेज दस्तावेज है. लेखिका ने अफ्रीका के सोमाली देश को चुना जहाँ आज भी सुन्नत जैसी प्रथा ने स्त्रियों के जीवन को नरक बना रखा है. आज इक्कीसवीं सदी में जबकि इतनी जागरूकता आ गयी है तब भी बहुत सी ऐसी जगहें हैं जहाँ अभी तक अशिक्षा का अन्धकार व्याप्त है. यहीं बंजारों का सा जीवन जीते लोग हैं जो सुन्नत को ऐसे मानता देते हैं जैसे कोई अपने ईश्वर को देता है. माहरा नाम की लड़की को कैसे लड़की से स्त्री बनाया जाता है वो भी छोटी सी उम्र में जब अभी वो मासिक धर्म से भी नहीं होती वो एक भयावह दृश्य है. लेकिन उससे भी भयावह है उनका जीवन जो स्त्रियाँ इस नारकीय यंत्रणा से गुजरती हैं जब या तो सुन्नत की वजह से वो दर्द और इन्फेक्शन होने, अधिक रक्तस्त्राव होने के कारण मर जाती हैं या फिर एड्स जैसी गंभीर बीमारी का शिकार हो जाती हैं या फिर कच्ची उम्र में ही जब वो माँ बनती हैं तो प्रसव पीड़ा में उनके आन्तरिक हिस्से इतने कमजोर हो जाते हैं कि हर वक्त पेशाब रिसता रहता है जिसके कारण छोटी सी उम्र में ही पति द्वारा निकाल दी जाती हैं और बल्कि समाज से भी निष्कासित हो जाती हैं. फिर एक अलग झोंपड़ी बना रहने को विवश, उसमें भी टाँगे और गुठने जोड़ कर बैठने के कारण कुछ सालों में चलने फिरने से भी मोहताज. वहीँ जो बच जाती हैं , सह जाती हैं तो आगे जीवन भर इसी प्रक्रिया से गुजरती हैं. बचपन में सुन्नत, फिर पति द्वारा उसका छेदन, फिर प्रसव उपरान्त सुन्नत जैसे स्त्री न हो कोई खिलौना हो या कोई जानवर जिसे चाहे जितनी बार जिबह किया जा सके. 

इतना सब होते हुए भी कभी उनके मन में ये भाव न उठना कि ये गलत है. बचपन से घुट्ठी में घोटकर पिलाया जाता है औरत का शरीर पति को सुख देना और उसके लिए बच्चे पैदा करना है. तभी जन्नत मिलेगी. दादियों द्वारा उल्टी सीधी कहानियां सुना डराया जाता है जो कच्चे मन पर गहरा प्रभाव छोड़ता है. शायद यही है भय का भूत जिससे पार जाने की कोई स्त्री कभी कोशिश भी नहीं कर पाती और पुरुष के हाथ का उम्र भर खिलौना बनी रहती है मगर विद्रोह उसकी रग में नहीं होता. फिर वो चाहे लड़की दस बारह साल की ही क्यों न हो और पति 65-70 साल का ही क्यों न हो. फिर चाहे पांच सात साल में ही वो परलोक क्यों न सिधार जाए और लड़की जो अभी खुद एक बच्ची होती है उसके सर पर दो तीन बच्चों की जिम्मेदारी छोड़ जाए, कैसे संभाल सकती है? इन बातों से किसी को कोई लेना देना नहीं. धर्म की आड़ में औरत देह का ऐसा शोषण शायद ही कहीं और देखने को मिले, जिसे लेखिका ने बखूबी वर्णन किया है. वहीँ लेखिका ने इसमें कैसे बड़ी बड़ी संस्थाएं इस बारे में जागृति लाने का प्रयास कर रही हैं, कहानी के माध्यम से उस पर भी प्रकाश डाला है. 

लेकिन अभी भी पूर्ण रूप से इस भयावह दुखदायी प्रक्रिया से औरतों को मुक्ति नहीं मिली है क्योंकि उनकी सोच को भी धर्म के धागे से ही सीला गया है तो वो भी उससे बाहर आने का नहीं सोचतीं. लेखिका ने माहरा के माध्यम से सुन्नत कराने से उपजी समस्याओं पर प्रकाश डाला है वहीँ उसे इतना जागरूक दिखाया है कि अपनी बेटी का जब वक्त आता है तो वो उसके खिलाफ भी जाती है क्योंकि इसी वजह से उसने अपनी बहन को एड्स की वजह से मरते देखा था और उसका विश्वास था जैसे उसकी बेटी के रूप में उसकी बहन ने ही जन्म लिया है. और अंत में बेशक खुद मिट जाती है लेकिन बेटी को एक सुरक्षित जीवन दे जाती है. एक मर्मान्तक वर्णन लेखिका शुरू से आखिर तक करती रही मानो कहना चाहती हो हम किस विकास के दौर में जी रहे हैं जहाँ एक ओर प्रकाश ही प्रकाश है तो दूसरी ओर अंधकार ही अंधकार. आखिर कब स्त्री को इस दोजख से मुक्ति मिलेगी? ब्यौरेवार लेखिका ने इस प्रथा पर प्रकाश डाला है कि कितने देशों में आज भी ये प्रथा जारी है और कहाँ कहाँ इस प्रथा से मुक्ति मिली है, कहाँ कितनी जागरूकता आई है, सिलसिलेवार लेखिका बयां करती गयी हैं. 


एक ऐसे विषय को उठाना और लिखना कोई आसान काम नहीं होता वो भी एक स्त्री के लिए जब धर्म से जुड़ा हो लेकिन लेखिका ने ये साहस किया है, निश्चित ही वो सराहनीय हैं. आज धर्म के नाम पर पल में बबाल खड़ा हो जाता है ऐसे में ये जोखिम उठाना निश्चित ही साहस का विषय है. लेकिन ये साहस एक लेखक को उसकी कलम प्रदान करती है और वो ही लेखिका ने किया है.

भगवान् दास मोरवाल जी का उपन्यास ‘हलाला’ भी इस्लाम में फैली एक विसंगति को ही दर्शाता है. इसमें भी धर्म के नाम पर एक बार फिर स्त्री का ही शोषण है. कैसे अपनी गलती होते हुए भी स्त्री को दोषी ठहरा उसका शोषण किया जाता है उसे वर्णित किया गया है. यहाँ उत्तरप्रदेश के गाँव को दर्शाया गया है जो मुस्लिम बहुल है और जहाँ वहीँ की बोली, बोली जाती है. पूरा उपन्यास उसी बोली में है जैसे बृज में बोली जाती है बस वैसे ही.
यहाँ एक पात्र है डमरू जो बेहद काला है कि जिसे देख कोई उससे बात भी नहीं करता , यही कारण रहा उसकी शादी नहीं हुई. उसका परिवार है जिसमे उसके तीन बड़े भाई और तीन भाभियाँ हैं जिनमे से आमना भाभी से उसका छत्तीस का आंकड़ा रहता है. जिस कारण उसे जमात में भी जाना पड़ता है. वहीँ एक और परिवार है जहाँ नियाज़ और उसकी पत्नी नजराना हैं. नज़राना बेहद सुशील बहु, तीन बच्चे, घर भर की लाडली. ऐसे ही किसी बात पर नाराज होकर उसका शौहर उसे तलाक दे देता है और वो रूठकर अपने मायके चली जाती है. अब प्रयास होता है उसे लाने का और पंचायत बैठती है तो पता चलता है उसे ऐसे ही माफ़ी मांगकर नहीं लाया जा सकता. उसे तो हलाला के बाद ही लाया जा सकता है. गाँव के ऐसे लोग हैं जो हैं तो पांच वक्त के नमाजी लेकिन जानते ही नहीं आखिर हलाला होता है क्या है. तब पता चलता है अब नजराना तभी वापस आ सकती है जब किसी और से उसका निकाह हो और उसका वो पति उसे तलाक दे तब उसका अपने शौहर से दोबारा निकाह हो सकता है. सुन सब अचंभित रह जाते हैं लेकिन धर्म में यदि ये वर्णित है तो उसका पालन जरूरी है, यहीं तक उनकी सोच है. अब शुरू होती है खोज ऐसे शख्स की जो निकाह के बाद तलाक दे दे, उसकी नियत न बिगड़े. लेकिन ऐसा कोई नहीं मिलता तो उसके सास ससुर हार कर डमरू के लिए तैयार होते हैं और नजराना और नियाज़ को भी इस बात के लिए तैयार किया जाता है. सबकी सहमति से डमरू से निकाह करवाया जाता है और फिर पंचायत बैठती है और जैसे ही वो तलाक देने लगता है इमाम कहता है क्या धर्मानुसार हलाला हुआ? यानि वो अपने शौहर के साथ हमबिस्तर हुई? यदि नहीं तो भी ये तलाक मान्य नहीं. एक ऐसा जाल जहाँ खरबूजा छुरी पर गिरे या छुरी खरबूजे पर काटना खरबूजे को ही है यानि गलत शौहर हो और सजा स्त्री भोगे उस गुनाह की जो उसने किया ही न हो. इस बीच दोनों घर में भूचाल सा आ जाना, नजराना की सास द्वारा ये बात न स्वीकारना या कहो हलाला के बाद बहु को न स्वीकारे जाने की जिद करना, वहीँ डमरू जिसे पता ही नहीं हमबिस्तर का सही अर्थ, उसका इतना मासूम होना और पता चलने पर सहम उठना फिर नज़राना द्वारा डमरू के नोहरे में जाना आदि घटनाओं का होना. अंत में एक बार फिर पंचायत का बैठना और वहां इमाम द्वारा हलाला किये जाने को पूछना और डमरू द्वारा हाँ कह देना. फिर इमाम द्वारा कहा जाना चलो दो अब तलाक और जैसे ही डमरू तलाक देने लगता है नजराना द्वारा ये कहना हलाला तो हुआ ही नहीं एक भूचाल ला देता है. लेकिन यहाँ लेखक ने एक सही दिशा भी दिखाई है जब नजराना कहती है कि क्यों जाऊं उस शौहर के पास जिसे अपनी पत्नी पर विश्वास नहीं. एक डमरू है जो जमात में होकर आ चुका, पांच वक्त का नमाजी है लेकिन सिर्फ मेरे लिए आज अपने दीन ईमान को ताक पर रख झूठ बोल दिया. मैं गयी उसके नोहरे में, उसे कहा भी लेकिन उसने छुआ तक नहीं. इससे बढ़कर स्त्री के मान का सम्मान करने वाला भला कहाँ मिलेगा? और क्या गारंटी नियाज़ मुझे वो ही सम्मान दे मुझे जब हलाला हो जाए या उसके घरवाले मुझे स्वीकारें. यहाँ लेखक ने नजराना के रूप में एक जागरूक स्त्री का दर्शन कराया है जो अपने अधिकारों के प्रति सचेत है , जो अपने निर्णय स्वयं ले सकती है न कि धर्म की आड़ में अपना शोषण स्वीकार्य करे. वर्ना तो आज जाने कितनी ही स्त्रियों का जीवन तीन तलाक की वजह से बर्बाद हो गया तो हलाला की वजह से दोज़ख बन गया. नयी रौशनी की जरूरत है और उसे दिखाना ही लेखक का कर्तव्य. जिसमे लेखक सफल है. 

अब बात करते हैं उपन्यास की भाषा की तो हलाला उपन्यास की भाषा ने इसकी रोचकता में रोड़े अटकाए हैं. एक तो पूरे उपन्यास में गालियों की भरमार है यानि कोई वाक्य नहीं जो गाली के बिना शुरू हो फिर वो आदमी दें या औरतें. जिस कारण एक वितृष्णा जन्म लेती है. आखिर क्या जरूरत थी लेखक को गालियों के प्रयोग की? क्या बिना गाली के बात नहीं की जा सकती. मानती हूँ, किसी क्षेत्र विशेष में ऐसे बोलना उनकी आदत में शुमार हो और लेखक साहित्य समाज का दर्पण होता है उस उक्ति को प्रमाणित कर रहा है, कहा जाए मगर कभी कभी कोई कोई चीज अति से ज्यादा हो तो हलक से नीचे नहीं उतरती बेशक वो समाज का दर्पण ही क्यों न हो. ऐसा ही यहाँ लगा. वहीँ उर्दू के शब्दों का भी काफी प्रयोग है तो कुछ शब्द ऐसे जो समझ से परे थे लेकिन क्योंकि कहानी समझ आ रही थी इसलिए उनके अर्थ जानने की ख़ास जिज्ञासा ने जन्म नहीं लिया. वहीँ लेखक ने कुछ दोहों का भी प्रयोग किया है जिनमे से कुछ तो समझ आ गए लेकिन कुछ नहीं. क्या ही अच्छा होता यदि लेखक उनके अर्थ नीचे या पीछे दे देता तो और ज्यादा रोचकता का आभास होता. 

बाकि यदि देखा जाए तो दोनों ही उपन्यासों में धर्म के नाम पर कैसे स्त्री का शोषण होता है उस पर ही प्रकाश डाला गया है. साथ ही दोनों ही लेखकों ने एक ही बात पर जोर दिया है जैसे कहना चाहते हों कि स्त्री चाहे तो अपनी दशा बदल सकती है, इस अजाब से मुक्ति पा सकती है बशर्ते वो कोशिश करे क्योंकि दोनों ने ही बदलाव की बयार स्त्री के माध्यम से ही दर्शायी है. जहाँ लेखक की भाषा में गालियों की भरमार और भाषा के खुलेपन से थोडा बहुत अश्लीलता का बोध होता है वहीँ लेखिका की भाषा काफी संतुलित और नपी तुली रही फिर चाहे यौन संबंधों का भी कितना ही जिक्र किया गया हो मगर कहीं भी भाषा असंतुलित नहीं हुई. थोडा बहुत तो चल जाता है लेकिन अधिकता जरूर प्रश्न खड़ा करती है आखिर बिना इस तरह कहे भी तो असर डाला जा सकता था जैसा कि लेखिका ने किया. दोनों ही उपन्यास वाणी प्रकाशन से हैं लेकिन सिर्फ एक भाषा की वजह से ही दोनों के प्रभाव में फर्क पड़ जाता है. बेशक लेखक ने भी बहुत बारीकी से तथ्यों से अवगत कराया जिसे नकारा नहीं जा सकता कि कैसे संबंधों पर प्रभाव पड़ता है, समाज क्या सोचता है, वहीँ लपरलैंडी का किरदार आदि के माध्यम से कहानी को रोचकता प्रदान की मगर लेखिका जॉय श्री द्वारा एक मर्यादित सीमा रेखा बनाए रखना थोडा भारी पड़ जाता है वर्ना दोनों ही उपन्यासों में कोई कमी नहीं. दोनों ही बराबर से प्रभाव डालते हैं पाठक मन पर. वहीँ लेखिका द्वारा अत्यंत विवरणात्मक वर्णन कई बार व्यवधान उत्पन्न करता है लेकिन यदि ध्यान से देखा जाए तो वैसा वर्णन करना भी आसान नहीं. उसका भी अपना एक सौन्दर्य है और जो उस सौन्दर्य के उपासक होंगे उनके लिए काफी रुचिकर होगा वो सब पढना. लेकिन फिर भी यही कहूँगी अत्यधिक वर्णन से बचना चाहिए नहीं तो उपन्यास शोधपरक बन जाते हैं और कहानी की रोचकता पर असर करते हैं. 

धर्म ने कैसे सोच को जकड़ा हुआ है उसका दिग्दर्शन दोनों ही उपन्यास कराते हैं क्योंकि दोनों ने ही अलग अलग विषय पकडे हैं. बेशक धर्म एक है लेकिन उसमे व्याप्त कुरीतियों से कैसे मानवता अभिशापित है उसका हृदयविदारक चित्रण दहलाता है और प्रश्न करता है – ये कैसा सभ्य समाज है? ये कौन से युग में जी रहे हैं हम? क्या वाकई मानवता शर्मसार नहीं होती ऐसी दुर्दशा पर जिसकी कोख से जन्म लिया जाता है और उसे ही यूँ अभिशापित किया जाता है? दोनों उपन्यास प्रश्न छोड़ते हैं जिसके उत्तर हमें ढूँढने हैं और बदलना है वक्त की लकीरों को तब शायद मानवता शर्मसार न हो. 

जॉय श्री रॉय और भगवान् दास मोरवाल जी बधाई के पात्र हैं जो धर्म के नाम पर शोषण को अपनी लेखनी द्वारा प्रस्तुत किया .

शनिवार, 31 मार्च 2018

नहीं, ये मैं नहीं

नहीं ये मैं नहीं
नहीं वो भी मैं नहीं
मैं कोई और थी
अब कोई और हो गयी


बेदखली के शहर का आखिरी मज़ार हूँ
जिस पर कोई दीया अब जलता नहीं
हाँ, मैं वो नहीं
मैं ये नहीं


मैं कोई और थी
जिसकी चौखट पर
आसमाँ का सज़दा था
पीर फ़क़ीर दरवेश का कहकहा था


सच, वो कोई और थी
ये कोई और है
पहचान के चिन्हों से परे
इक रूह आलाप भरती है
मगर सुकूँ की मिट्टी से
न रुत ख्वाब की बदलती है


जो बिखरी मिटटी से बुत बना दे और बुतपरस्ती कर ले
यकीं कर
मैं वो नहीं, वो नहीं, वो नहीं


अब दरका हुआ आईना हूँ मैं
पहचान के तमाम चिन्हों से परे
उम्र जब लिबास बदलती है
न खोजचिन्ह छोड़ती है
अब खोजती हूँ खुद को
मैं कौन? मैं कौन? मैं कौन?

रविवार, 25 मार्च 2018

राम...बधाई और शुभकामनाओं तक

राम
बधाई और शुभकामनाओं तक ही बची है तुम्हारी प्रासंगिकता
जानते हो
प्रयोग होते हो तुम अब एक अस्त्र की तरह
जिससे जीती जाती हैं जंग

तुम, तुम्हारी मर्यादा और तुम्हारा औचित्य
महज प्रायोगिक हथियार हैं
जिनसे काटी जाती हैं सभ्यताओं की नस्लें
इस मर्यादाविहीन समय में
मर्यादा महज वो खिलौना है
जिससे दूसरों को ही सिखाया जाता है
खुद पर अमल करना शर्म का विषय गिना जाता है

क्या सोचा था कभी तुमने
जो राह तुम दिखा रहे हो
वहां ऐसी नागफनियाँ उगेंगी ?
अब काटने को नहीं बचा कोई औजार
क्योंकि
यहाँ सभी औजारों में तब्दील हो चुके हैं

भय का कोलाहल मथ रहा है
पंगु है चेतना
हावी है वासना
तत्वचिंतन महज कोरा ज्ञान भर है
भुनाने का एकमात्र अवसर हो तुम

क्या वाकई खुश होते होंगे तुम देख कर
झूठी संवेदनाएं और प्रतिक्रियाएं
जबकि जानते हो आज तुम महज एक मुद्दा भर रह गए हो

बताओ तो जरा
ऐसे निसहाय समय में कैसे दूँ तुम्हारे जन्म पर तुम्हें शुभकामनाएं
जब शुभकामनाओं का कटोरा भरा है
समय की दुर्दान्तता से
असामाजिक तत्व सी हो गयी है समय रेखा
ह्रदय उमगे भी तो भला किस बिनाह पर ?

क्या नहीं लगता राम तुम्हें
आज तुम्हारे जन्म को बना दिया
इस स्वार्थी जगत ने एक अभिशाप तुम्हारे लिए ...ऐसा तो नहीं सोचा था न तुमने?

उन्होंने तुम्हें
न भगवान् रहने दिया न इंसान
विडंबना की दहलीज पर
कैसे चटखती होंगी तुम्हारी श्वासें तिल तिल
मापने को नहीं मेरे पास कोई यंत्र 
 
बस इतना समझ लो .....काफी है
बदल चुके हैं अब रिवाज़
जन्मदिन मनाना महज दिखावा भर रह गया है
और
यहाँ जन्म लेना अब नियति है तुम्हारी... बार बार हर बार


बुधवार, 21 मार्च 2018

एक लम्बे अरसे बाद

एक लम्बे अरसे बाद
जब खोलती है घूँघट
अपने मुख से कविता
चकित रह जाता है कवि
देख उसका अनुपम सौन्दर्य

उसकी काम कमान भवें
नेत्रों की चपलता
धीर गंभीर मुखाकृति पर
छोड़ जाती हैं एक विरोधाभास

वो कोई और थी
या तुम कोई और हो
पहचान के सभी चिन्ह मिलते हैं जब नदारद
हो जाता है कवि
चारों खाने चित्त

अब किसे सहेजे
उठ खड़ा होता है प्रश्न
और समय के गर्भ से मिलता है उत्तर
बचपन हो या यौवन
अवसान तो होता है
और जो परिपक्वता प्रौढ़ावस्था को प्राप्त होती है
वहीँ अनुभव की पोटली से सजी श्वेत केशराशी
कर देती है द्विगुणित सौन्दर्य कविता का
जिसका कभी अवसान नहीं हुआ करता 
आओ करो उद्घोष कवि
वक्त जो बीता 
उदासीन निरुद्देश्य 
किसी निरर्थक समाधि सा
उसी के गर्भ में छुपे होते हैं बीज कविता के
वही रचता है कालजयी कविता 
और तुम बन जाते हो कालजयी कवि
मान लेना 
वो खाली दीवारों को तकना 
छत पर मकड़ी के जालों को देखते रहना 
खुद से भी बेजार हो उठना
नहीं था निरर्थक , निरुद्देश्य 
बेचैनी बेसब नहीं हुआ करती ... जानते हो न 

खालीपन वास्तव में खालीपन नहीं होता 
भर रहे होते हो तुम उस वक्त 
जरूरी हवा, पानी और धूप
यही है खाद 
तुम्हारी तरलता की 
क्योंकि 
संवेदनाओं के बीज 
मौसम के अनुकूल  होने पर ही प्रस्फुटित हुआ करते हैं


समय के सीने पर छोड़ने को पदचाप 
जरूरी है तुम्हारा गूंगे वक्त से मौन संवाद

#विश्वकवितादिवस


गुरुवार, 15 मार्च 2018

भामती मेरी नज़र में








प्राचीन ग्रंथों वेदों उपनिषदों से आम इंसान अनजान ही रहता है. जितना उसे कहीं सुनने को या थोडा बहुत पढने को मिलता है उसी के आधार पर अपनी सोच बना लेता है. ऐसी सोच खतरनाक होती है क्योंकि आधा ज्ञान कभी समाज को सही दिशा नहीं दे सकता. ऐसे में जरूरी है ज्ञान का प्रचार प्रसार. उसके लिए जरूरी है उन ग्रंथों को खंगालना और फिर उनके मूल तत्व की व्याख्या सरल शब्दों में करना. इसके लिए जरूरी है किसी प्रकांड पंडित का होना और ऐसा ही किरदार है Ushakiran Khan उषा किरण खान जी के उपन्यास ‘भामती’ में वाचस्पति का, जिसके बचपन में माता पिता मर जाते हैं और गाँव के लोग और गुरु के आश्रम में उनका और उनकी बहन सुलक्षणा का जीवन यापन होता है. 


उपन्यास का मुख्य तत्व है उस समय के लोगों का आपसी विश्वास, प्यार और भाईचारा. जहाँ आज के जीवन जैसे मतलब के रिश्ते नहीं थे. जैसे कण कण अपना हो ऐसा प्यार वाचस्पति और सुलक्षणा को मिलता है. विद्वानों का गाँव है तो विद्वता कण कण से फूटती है. जिसने आधार दिया वाचस्पति को, उनके लेखन को. वहीँ समयानुसार बहन का विवाह होना, वाचस्पति का बीमार पड़ना और फिर गुरुपुत्री भामा से विवाह होना. यहाँ तक सब सहज लगेगा लेकिन सहज है नहीं. वाचस्पति जब प्रकांड पंडित बन जाते हैं तो उन पर जिम्मेदारी आ जाती है ग्रंथों की टीका लिखने की और वो लिखते भी हैं. यहाँ वाचस्पति का चरित्र कितना जुझारू था वो जानना जरूरी है. जिसने अपने आप को पूरी तरह टीका में झोंक दिया. कोई मतलब नहीं संसार से. सिर्फ अपने कमरे में दीये की रोशनी में संलग्न रहना. भोजन पानी के लिए उठना उसमे भी बात न करना. कोई आ जाए तो जरूरी बात का संक्षिप्त उत्तर देना बस. ऐसा व्यक्तित्व जो तीन पहर सोता है बाकी पूरा वक्त टीका करने में लगा देता है. ऐसा समर्पण जिसका हो वो कैसे नहीं इतिहास रचेगा. दूसरी बात उनकी ख्याति का फैलना, राजा द्वारा उचित सहायता देना, बेशक राजा कमजोर है, दरबारी भी स्वार्थी हैं फिर भी वो वक्त ऐसा था जब विद्वान का सम्मान हुआ करता था. उनके लेखन पर राजा का अधिकार होता था. वो उन्हें सभी तरह की सुविधाएँ मुहैया करवाया करते थे. ये तो बात हुई वाचस्पति की. लेकिन यहाँ एक मुख्य किरदार है जो अँधेरे में बेशक रहा लेकिन उसी के त्याग ने वाचस्पति को वो स्थान दिलवाया जो शायद तब तक संभव ही नहीं होता जब तक ऐसा न हुआ होता. ये है वाचस्पति की पत्नी ‘भामती’. भामती सिर्फ पत्नी ही नहीं रही बल्कि जैसे एक माँ बच्चे का पालन पोषण करती है उस तरह वाचस्पति की सेवा की. पति पत्नी के सम्बन्ध क्या होते हैं वो तो उसने जाने ही नहीं. उसने सिर्फ ये जाना स्वामी एक बहुत बड़ा कार्य कर रहे हैं तो उनके कार्य में कोई विघ्न न आये. रात और दिन एक कर यदि वाचस्पति टीका करने में व्यस्त रहे तो भामती ने उन्हें समय से भोजन देने, कलम तैयार करने, दीपक में तेल डालने में ही अपना जीवन होम कर दिया. क्या संभव है आज की किसी स्त्री में ऐसा समर्पण. जहाँ पति दीं दुनिया से इतना बेखबर हो जाए कि उसे पता ही न चले कि 18 साल लग गए उसे इस कार्य में और वो भूल चुका है कि उसकी कोई पत्नी भी है. 18 साल साथ रहकर भी वियोगी का जीवन जीती है भामती शायद सीता ने भी इतना वियोग राम का न सहा होगा जितना भामती ने सहा. और सबसे बड़ी विडंबना उसके जीवन की तब थी जब अंत में वो पति का मुख देख समझ जाती है आज कार्य पूर्ण हो गया पंडित जी का, तब दीपक में तेल डालती है तब उनकी दृष्टि जब भामती पर पड़ती है और वो कोशिश करते हैं उन्हें पहचानने की लेकिन पहचान नहीं पाते तब पूछते हैं – “सुमुखी आप कौन हैं?” उफ़! कितना बड़ा कुठाराघात होगा किसी स्त्री के लिए, किसी पत्नी के लिए जब पति पूछे तुम कौन हो? शायद ही ऐसा उदाहरण कहीं देखने को मिले सिवाय दुष्यंत और शकुन्तला के वो भी श्राप के वशीभूत. यहाँ पत्नी 18 साल से सामने हैं लेकिन वो अपने मनन और चिंतन में खुद को भी भूल गए इस हद तक कि अंत में पत्नी को भी न पहचान पाए. बेशक समाजोपयोगी कार्य किया, जिसकी देश को बहुत आवश्यकता थी लेकिन वहीँ पतिधर्म से तो च्युत ही रहे. वो कैसा जीवन जिसमे सांसारिक निर्वाह का कर्तव्य भी कोई न निभा पाए. हम कह सकते हैं बुद्ध ने भी तो गृहत्याग किया और फिर समाज को एक दिशा दी, जीने का मूलमंत्र दिया तो इन्होने भी ऐसा किया तो क्या बुरा किया? लेकिन कम से कम वहां बुद्ध ने गृहत्याग तो किया था , पत्नी को उनके लौटने की कोई आशा तो नहीं बची थी लेकिन यहाँ पति सामने है, उसका हर कार्य पत्नी कर रही है फिर भी वो इतना डूब गया कि अपनी पत्नी को ही भूल गया. यौवन का स्वर्णिम काल जिसने पति के कार्य में होम कर दिया हो और वो जब ऐसा प्रश्न करे तो विचारिये उस पत्नी के दिल के कितने टुकड़े टुकड़े हो गए होंगे लेकिन फिर भी वो खुद को संभालती है और जवाब देती है – ‘भामती, आपकी अर्धांगिनी स्वामी’ जाने कितने ज्वालामुखी फट जाते हैं एक साथ वाचस्पति के ह्रदय में और तब अहसास होता है उन्हें अपनी भूल का. तब याद आता है क्या रूप था उसका जब विवाह किया था और आज एक भी चिन्ह नहीं बचा. हृदय ग्लानि से भर उठता है लेकिन ‘का वर्षा जब कृषि सुखानी’ यहीं लागू होता है जब भामती के ह्रदय में एक काँटा हर पल चुभता है और वो व्यक्त करती है –‘मैं आपकी कुल परंपरा को आगे बढाने योग्य नहीं रही’. स्त्री मन की व्यथा. अपना पूरा यौवन दीप की बाती सा होम कर दिया जैसे दीप संग वो खुद जली और मातृत्व सुख से भी वंचित हो गयी इतना लम्बा समय उसने बिना किसी शिकायत के बिता दिया. सौदामिनी एक वैद्य है वो कहती भी है उसकी ये तपस्या देख कि ऐसी औषधि दे दूंगी जिससे पंडित जी थोडा समय तुम्हें भी दे सकेंगे लेकिन भामती जैसी दृढ निश्चयी शायद ही मिले जो जानती है लोक कल्याण के मार्ग पर अग्रसर हैं उसके स्वामी इसलिए वो सौदामिनी का प्रस्ताव अस्वीकार कर देती है. बेशक स्त्री है तो स्त्री सुलभ चाहतें जन्म लेती हैं लेकिन स्वयं पर कितना नियंत्रण है उसका ये पढ़कर ही जाना जा सकता है. अंत में वाचस्पति का जय जयकार होना, उत्तर से दक्षिण तक की पैदल यात्रा पत्नी संग करना और वहां शंकराचार्य और अन्य विद्वानों में मध्य अपने लेखन को मान दिलवाना, फिर वापस आना और वापसी में भामती का बीमार पड़ जाना और इस हद तक कि अंत में सौदामिनी जैसी वैद्य जिसका डंका दूर दूर तक फैला होता है , जो मुर्दे तक को जिला सकती थी वो भी हार जाती है और भामती इस दुनिया से चली जाती है और छोड़ जाती है अपने पीछे अपना अस्तित्व. पूरा जीवन पति के लिए होम किया, कुछ पल पति का सानिध्य मिला तब वो वक्त आया था जब वो उसके साथ सुख का जीवन व्यतीत कर सकती थी लेकिन वो भी उसकी किस्मत में नहीं था. क्या मिला भामती को आखिर उसके पूरे जीवन की तपस्या का फल? क्या सिर्फ इतना कि वाचस्पति जब जानते हैं कि उनकी पत्नी का कितना बड़ा योगदान रहा उनके लेखन को स्थायित्व प्रदान करने में तो कहने वालों ने बेशक कह दिया ये तो खुद को ग्लानि से मुक्त करने हेतु किया या फिर पत्नी को जैसे बहलाने का साधन किया, तब उन्होंने अपनी पत्नी के अतुलनीय योगदान के निमित्त अपने भाष्य का नाम रखा- ‘भामती टीका’ और पत्नी को कहा – पुत्र पुत्री या वंश परंपरा तो कभी भी नष्ट हो जाती है. किसकी आज तक चली है लेकिन तुम्हारे और मेरे युग्म से जो उत्पन्न हुआ है उसका युग युगांत तक संसार में नाम होगा अर्थात ये जो भामती टीका लिखी है यही हमारी वंश परंपरा है अब. क्या इतना कर देना भर काफी है एक स्त्री की उम्र भर की तपस्या का प्रतिफल? ये कहने सुनने में बेशक अच्छा लगे लेकिन हकीकत के धरातल पर उससे गुजरना कोई आसान नहीं होता. पल पल सिर्फ दीप की बाती को देखते बिताना क्या संभव है? 

वहीँ लेखिका ने उस समय की व्यवस्था का भी दिग्दर्शन कराया है. कैसे उस समाज में स्त्री हो या पुरुष सभी का वेद पुराण पढने पर समान अधिकार था. स्त्रियाँ भी परम ज्ञानी थीं लेकिन समय एक सा नहीं रहता और सौदामिनी के वाकये ने उनके क्षेत्र में भी स्त्रियों को घर गृहस्थी तक सीमित कर दिया. वो स्त्रियाँ जो परम ज्ञानी थीं अब घर गृहस्थी तक सीमित रह गयीं. देश के अन्य भागों में बेशक स्त्री के लिए रोक टोक बढ़ने लगी थी लेकिन उनके गाँव में ऐसा नहीं था लेकिन एक तांत्रिक द्वारा सौदामिनी को उठा ले जाना वहां की सभी स्त्रियों के लिए जैसे एक शाप बन उभरा. क्योंकि गुरुकुल में भामती सुलक्षणा और वाचस्पति सबने साथ ही शिक्षा ली थी. तभी तो परम ग्यानी थी भामती. वो देश और समाज में आये अंतर से व्यथित थी. वहीँ वो अपना योगदान समय समय पर देती रही. अपनी विद्या को उसने समाज के कल्याण में उपयोग किया जब घर बैठे लड़कियों को शिक्षा देने लगी क्योंकि लड़कियों का पाठशाला जाना बंद हो गया था. उस समय की स्त्रियाँ सुनकर ही सब याद कर लिया करती थीं. लेकिन सुना हुआ धीरे धीरे जब ख़त्म होने लगा तब जरूरत महसूस हुई उसे लिपिबद्ध करने की और उसी दिशा में कार्य को अंजाम दिया गया उस समय के विद्वानों द्वारा. स्त्री पुरुष का भेद उसी काल से शुरू हुआ जो आज तक इतना बढ़ चुका है कि सुरसा का मुख हो गया है. शायद यही कारण है आज जब फिर से शिक्षा का प्रचार प्रसार बढ़ा है तब स्त्री ने खुद को पहचाना है, अपने अस्तित्व के लिए वो उठ खड़ी हुई है. यानि शिक्षा का कितना बड़ा योगदान रहा हमेशा. 

लेखिका ने उस काल में अन्य धर्मों जैसे बौद्ध धर्म के प्रति लोगों की कैसी धारणा थी उस पर भी प्रकाश डाला है तो वहीँ उस समय के राजा कैसे थे उस पर भी कलम चलाई है - कोई कमजोर तो कोई शक्तिशाली, कोई विद्वानों का सम्मान करने वाला तो कोई सबसे पहले विद्या को ही जड़ में मिटा देने को उत्सुक. एक युग परिवर्तन का दौर था वो जिसे लेखिका ने अपनी कलम द्वारा बखूबी उकेरा है. 

यूँ तो जाने और भी कितने पहलू हैं इस उपन्यास में यदि सब पर लिखूँगी तो एक और उपन्यास तैयार हो जायेगा. लेखिका ने 'भामती-एक अविस्मर्णीय प्रेमकथा' नाम दिया है जो यही सिद्ध करता है लेखिका ने वहाँ प्रेम को तरजीह दी है और यदि देखा जाए तो शायद एक सत्य भी है जब वाचस्पति को भामती के त्याग और समर्पण का अहसास होता है तो उन्हें अपना लेखन तुच्छ लगने लगता है क्योंकि जो भामती ने लिखा बेशक वो कलमबद्ध नहीं हुआ लेकिन उसे सिर्फ और सिर्फ वाचस्पति ने ही गुना , महसूस किया और फिर अपनी हर रचना में अपना परिचय भामती पति वाचस्पति मिश्र के नाम से दिया. शायद प्रेम का इतना सुन्दर प्रतिदान किसी ने नहीं दिया होगा. न भामती का प्रेम कम था और न वाचस्पति का मानो यही लेखिका कहना चाहती हैं. शायद यही सच्चे प्रेम की पहचान है. 

ब्रह्म तत्व का निरूपण वाचस्पति द्वारा किया जाना, उसकी स्थापना करना , द्वैत और अद्वैत के मध्य के  भेद पर अपनी कलम चलाना कोई आसान नहीं रहा होगा, जाने कितना अध्ययन मनन लेखिका ने किया होगा तभी इतने पुख्ता रूप में प्रस्तुत कर पायीं . 

सबसे बड़ी बात लेखिका अपनी कलम के माध्यम से उस पात्र को संज्ञान में लायीं जिसके बारे में शायद ही लोगों को पता हो या कहा जाए बहुत ही कम पता होगा. कैसे हमारे देश की स्त्रियाँ नींव की ईंट बनी जिसके ऊपर के सुदृढ़ ईमारत खड़ी हो सकी ये हमें ऐसे ही प्रकरणों के माध्यम से पता चल सकता है. इतिहास कभी गवाह नहीं रहा स्त्री के योगदान का क्योंकि लिखा पुरुषों द्वारा गया. ये तो स्त्री ही स्त्री की व्यथा को समझ सकती है और उकेर सकती है जिसके लिए लेखिका बधाई की पात्र हैं क्योंकि ये मैथिली  में लिखा गया उपन्यास है जिसे लेखिका ने खुद अनुवाद कर हिन्दी के पाठकों तक पहुँचाया, जो एक बेहद सराहनीय कदम है. शायद हम जैसे लोग तो अनभिज्ञ ही रह जाते यदि ये उपन्यास न पढ़ते कि कैसे समय समय पर स्त्रियों ने अपनी चुप्पी से भी नव निर्माण किया और एक इतिहास रच दिया. हो सकता है इसमें भी कुछ शब्द पाठकों को समझ न आयें क्योंकि विशुद्ध हिंदी में लेखिका ने अनुवाद किया है फिर भी मूल तत्व पाठक को बांधे रखेगा. वो पूरा पढ़े बिना खुद को उससे अलग नहीं कर सकेगा. अंत में उपन्यास पढ़कर यही पंक्तियाँ याद आती हैं - ‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी’ जो भामती के जीवन पर पूरी तरह लागू होती हैं. उपन्यास पढने के बाद पाठक मन इतना व्यथित हो जाता है कि उससे बाहर ही नहीं आ पाता. सोच में पड़ जाता है पाठक मन ये कौन सी गली में ले गया समय हमें जिसकी हर दरो दीवार किसी स्त्री के आंसुओं से लाल है जिसका मोल तो खुद समय भी नहीं चुका सकता. एक कालजयी कृति के लिए लेखिका को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं. उनके पाठकों को आगे भी उनसे ऐसे ही उपेक्षित पात्रों पर अन्य कृतियाँ मिलती रहेंगी और पाठक उन्हें पढ़ लाभान्वित होते रहेंगे.

गुरुवार, 8 मार्च 2018

मुँह फाड़ हँसती लड़की

मुँह फाड़ हँसती लड़की
आज बन चुकी है
आश्चर्य का प्रतीक

हँसी का फूटता फव्वारा
जब गुजरता है कानों के बीहड़ से गुजरकर
ह्रदय की संकुचता तक
मुड़कर ठहरकर देखी जाती है
कभी ईर्ष्या से
तो कभी अचम्भे से

कल बेशक अशोभनीय था
उसका मुँह फाड़ हँसना

तो क्या हुआ
बदली है सभ्यता
मगर सोच तो नहीं

खटकती है वो आज भी
आँख में किरकिरी सी

पहले उपदेशों से होती थी ग्रस्त
और आज तमगों से
कितनी बेहया है
चालू दिखती है
तेज तर्रार  होगी
घाट घाट का पानी पीये दिखती है 

मगर छोड़ चुकी है वो परवाह करना तमगों की
क्योंकि
उसके हवा में उड़ते बाल
आँखों में ख़्वाबों का संसार
और मुँह फाड़ कर हँसने से खिली उसकी सुन्दरता
आज किसी पर्याय की मोहताज नहीं

उन्मुक्तता का भी अपना दर्शन होता है...

स्त्रीशतक मेरी नज़र में

आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का शुभ अवसर है तो मुझे लगा आज के लिए इससे उपयुक्त प्रस्तुति और क्या होगी जब एक पुरुष स्त्री मन को, उसकी भावनाओं को इतना मान सम्मान दे तो सार्थक हो जाता है महिला दिवस .....इसी बदलाव की तो समाज को जरूरत है ..... पवन करण जी ने जो स्त्री शतक लिखा है उस पर मेरे विचार पढ़िए .....आसान काम नहीं था ये जिसे उन्होंने सार्थक बनाया और उपेक्षितों को महिमामंडित किया ...

स्त्रीशतक मेरी नज़र में
*****************
जो पुरुष ये कहता हो ‘स्त्री मेरे भीतर’ वो कितना संवेदनशील होगा, अंदाज़ा लगाया जा सकता है. स्त्री होना बेशक अलग है और स्त्री को अपने अन्दर जीना एक अलग ही अहसास है. पुरुष जब स्त्री को अपने अन्दर जीने लगे अर्थात स्त्री की मनोदशा का गहन चिंतन करने लगे तब एक अलग ही रचना का जन्म होता है. वहाँ वो पुरुष भाव का त्याग कर देता है, भूल जाता है वो पुरुष है. शरीर से ही तो स्त्री और पुरुष हैं जबकि आन्तरिक चेतना के स्तर पर न कोई स्त्री है न पुरुष तो ऐसे में जब चेतना का प्रसार होता है तब स्त्री के भावों से लबरेज होना कोई आश्चर्य नहीं. ऐसा ही कवि ‘पवन करण’ जी के साथ होता है शायद तभी तो जब भी कोई कृति आती है उसमें स्त्रीमन को जैसे किसी स्त्री ने ही पढ़कर लिखा हो, ऐसा लगता है. शायद यही है आंतरिक चेतना की वो शक्ति जो इंसान को बहुत ऊपर उठा देती है. 


ज्ञानपीठ से प्रकाशित हाल में आया कविता संग्रह ‘स्त्रीशतक’ कवि पवन करण का नया संग्रह है जिसमें महाभारत, रामायण, पुराणों और उपनिषदों से स्त्री पात्रों को चुना गया है. यूँ जो स्त्री पात्र हम सभी जानते हैं उनके बारे में न लिखकर कवि ने एक नया जोखिम उठाया है. कवि ने वहाँ से ऐसे उपेक्षित पात्रों को उठाया है जिन्हें समाज किसी गिनती में नहीं गिनता या फिर जिनका होना किसी की निगाह में कोई महत्त्व नहीं रखता. वंचितों को तो वैसे भी इतिहास में कभी स्थान मिला ही नहीं फिर ये तो पौराणिक पात्र हैं जिन्हें उनकी उपयोगिता तक ही सराहा गया अन्यथा स्त्रियों का वहाँ कभी कोई रोल रहा ही नहीं सिवाय भोग्या के और कवि ने मानो उसकी उसी छवि के माध्यम से उस समाज पर कटाक्ष किया है. प्रश्न उठाये हैं, सोचने को विवश किया है. स्त्री कोई हो राजमहिषी या फिर वेश्या या अप्सरा वो सिर्फ एक देह भर है जैसे, फिर चाहे वो देवता हों, राजा हों या फिर ऋषि मुनि. ये तो अक्सर पुराणों में कथाओं आदि में सबने पढ़ा और सुना भी है तो इस सत्य को कतई नकारा नहीं जा सकता कि आदिकाल से स्त्री को कभी किसी ने उसके अस्तित्व के साथ नहीं स्वीकारा और वो संघर्ष आज तक जारी है. ऐसे में ये पहल करना कवि का स्त्रियों के प्रति उसके कोमल भाव को तो दर्शाता ही है बल्कि यहाँ कवि की मेहनत भी परिलक्षित होती है. आसान था कवि के लिए नामचीन स्त्री पात्रों पर लिख इतिश्री करना लेकिन कवि ने वो जोखिम उठाया जिसे उठाने की हिम्मत करना आसान नहीं होता. सभी पुराण आदि पढना और फिर उनमें से वंचितों के भावों, उनकी मनोदशा को आत्मसात करना और फिर उन पर लिखना कोई आसान कार्य नहीं. कई वर्षों की मेहनत का नतीजा ही है ये. 

कवि ने कई ऐसे पात्र लिए हैं जिनके बारे में हमने कभी न पढ़ा न सुना तो पाठक आश्चर्य से भर उठता है जब उसे पता चलता है गोकुल में कृष्ण की कोई बहन ‘एका’ भी थी. उसकी मनोदशा या उसके भाव व्यक्त करना तो अलग बात हो गयी यहाँ तो यही सत्य हलक से नीचे उतारना आसान नहीं होता. कृष्ण ने तो सभी वंचितों को उपेक्षितों को अपनाया तो फिर उस बहन का जिक्र क्यूँ गायब रहा इतिहास से? क्या ये विचारणीय नहीं? मानो उसका जिक्र कर कवि यही प्रश्न उठाना चाहता है. यहाँ कवि का उद्देश्य महज कविता करना नहीं है बल्कि प्रश्नों की अदालत ही लगाईं है कवि ने .

अप्सराओं का जीवन क्या होता है किस से छुपा है. नाम बेशक सुन्दर दे दिया जाए लेकिन कार्य तो उनका वेश्या वाला ही होता है बस फर्क है वहां देव और ऋषि मुनि भोगी होते हैं. ऐसे में उन्हें कठपुतली बनना होता है इंद्र की और उसकी आज्ञा का पालन भर करना होता है. फिर चाहे वो किसी के प्रति अनुरक्त हो भी जाएँ तो भी उनकी आकांक्षाओं का वहां कोई महत्त्व नहीं होता फिर वो पूर्वचित्ति हो या उर्वशी, मेनका या रम्भा. 

इसी तरह पिता पुत्री के संबंधों की मर्यादा भी कब और कैसे खंडित हो जाती रही या फिर रिश्तों को ताक पर रख अपनी ही पत्नी को संसर्ग हेतु किसी भी ऋषि या देवता के पास भेज देना क्या है ऐसे संबंधों का औचित्य जिन्हें हम देवता मान हाथ जोड़ देते हैं लेकिन वो अपने स्वार्थ के लिए स्त्री को हथियार के रूप में प्रयोग करते हैं फिर भी पूजनीय कहलाते हैं. मानो इन सन्दर्भों को देकर कवि यही प्रश्न उठाना चाहता है क्यों आदिकाल से विरोध नहीं किया गया गलत का? क्यों हम पूजनीय मानें और इस रोग को पीढ़ी दर पीढ़ी फैलाएं? क्यों न सत्य सामने लाकर बेनकाब करें? और यही किया है कवि ने. 

ऐसा ही दासियों का जीवन रहा. दासी चाहे रानी से कितनी ही सुन्दर और सुशील हो, जिसकी यदि रानियाँ भी प्रशंसा क्यों न करती हों लेकिन वो रहती ही दासी है. उसका स्थान कभी ऊंचा नहीं हो सकता. वो बेशक भोग्या बन जाए लेकिन राजमहिषी होने का स्वप्न नहीं देख सकती क्योंकि वो दासी है कोई राजकन्या नहीं. मानो उंच नीच के भेद के माध्यम से कवि यही कहना चाहता है ये वर्गभेद परम्परा से चली आ रही वो प्रथा है जिसने जाने कितनी ही स्त्रियों के जीवन को दांव पर लगा दिया. जो इतिहास के पन्नों में कहीं दबी रह गयीं. यहाँ कवि ने उन दासियों के मनों में झाँका है और उनके मन के भावों को उल्लखित किया है क्योंकि थीं तो वो भी हाड मांस का इंसान ही तो भावनाएं तो उनमें भी जन्मती थीं. वो भी सोचने समझने की शक्ति रखती थीं तो किसी राजकुमार को देखकर उनके मन में भी तो उसका होने की भावना जग सकती थी. कवि ने उसी नब्ज़ पर ऊंगली रखी जिसमें दर्द था. ये एक भावुक ह्रदय ही कर सकता था. वहीँ दासियों के मध्य अपनी रानी को लेकर किये गए संवाद भी हिस्सा बने संग्रह का जहाँ वो अपनी रानी से इतनी जुडी हुई हैं कि उसके दुखदर्द अपने लगते हैं जैसे गांधारी के विषय में केशनी और वासंती का संवाद होता है मानो कहना चाहता हो कवि कैसे अपने मन की कसक को गांधारी ने दबाया होगा और कैसे उसका दर्द उसकी दासियों ने महसूस किया होगा क्योंकि एक स्त्री ही दूसरी स्त्री के दर्द को बेहतर तरीके से महसूस कर सकती है:


मैं चाहती हूँ कि मेरा पति/ अपने सुसज्जित रथ पर नहीं/ अपने अश्व की पीठ पर/ पीछे बिठाकर/ आर्यावर्त की सभी/ नदियों के किनारे ले जाए मुझे/ गांधारी का यह कहना / तुम्हें याद है न वासंती 

वहीँ ‘अनामिका’ के माध्यम से कवि ने करारी चोट की है वर्ण व्यवस्था पर, पितृ सत्ता की सोच पर जहाँ पवित्रता और अपवित्रता को वर्ण से बाँध दिया गया. अरे गया तो पुरुष ही है एक स्त्री के पास फिर वो दासी हो या देवी लेकिन नहीं, ये देवता स्वीकार नहीं कर सकते, देवता यानि उच्च कुल वाले. ये कैसी शुद्र प्रथाएं थीं जिन्होंने पूरे समाज को एक ऐसे दुश्चक्र में बाँध दिया जिससे मुक्त होने को आज भी छटपटा रहा है लेकिन मुक्त नहीं हो पा रहा. ये पीढ़ियों की बोई फसल है जो आज भी जितना काटो उतनी ही बढती जा रही है शायद यही खोज कवि को पुराणों तक घसीट लायी क्योंकि परम्पराएं कोई अकेला नहीं बना सकता. ये तो इतिहास की धरोहर होती हैं जिन्हें वक्त के साथ और कड़ा कर दिया जाता है ताकि जो उपेक्षित है वो उपेक्षित ही रहे. कभी सिर न उठा सके. जो आदिकाल से होता रहा वो ही परंपरा बन दीमक की तरह पीढ़ियों को काटता रहा बस मानो यही कवि कहना चाहता है :

दासी होना स्त्री होना नहीं/ बस दासी होना है, जिस तरह देवी होना/ बस देवी होना है, स्त्री होना नहीं / मैं दासी थी तो मेरे साथ/ संसर्ग अपवित्र था, अजामिल के लिए/ मैं देवी होती तो मेरे साथ सहवास/ पवित्र होता उसके लिए 

ऐसे अनेक पात्रों से भरा पड़ा है संग्रह जो किसी ने कभी न पढ़े न सुने लेकिन जिनकी मर्मभेदी आवाज़ शायद कवि के कर्णरंध्रों तक पहुँची और कवि की कलम ने रच दिया एक नया इतिहास. यूँ पूरा संग्रह यदि देखा जाए तो स्त्री मन का आईना है. मगर कहीं कहीं कवि कुछ पात्रों के भावों को यदि थोडा और विस्तार देता तो सन्दर्भ और साफ़ हो जाते क्योंकि सबको नहीं पता कौन पात्र कहाँ से आया है और उसका वहां क्या रोल था. बेशक सन्दर्भ के रूप में कविता के नीचे दिया गया है कौन क्या था लेकिन फिर भी कहीं कहीं एक कमी सी खलती है जहाँ कवि ने कुछ एक पात्रों को उनके अधूरेपन के साथ छोड़ दिया है, वो पात्र विस्तार चाहते थे. लेकिन फिर भी इन कुछ एक पात्रों को यदि छोड़ दिया जाए तो पूरे संग्रह में हर पात्र के साथ न्याय करता नज़र आया है कवि. वहीँ शिव हों या पार्वती या विष्णु किसी पर भी आक्षेप लगाने से नहीं चूका कवि. यही कविकर्म है जहाँ भी विसंगति देखे करे प्रहार. ऐसा ही संग्रह में जगह जगह दिखाई देता है. संग्रह बेशक पठनीय और संग्रहणीय है. छोटी मगर मारक कविताओं का दस्तावेज है स्त्रीशतक. कवि की बरसों की मेहनत साफ़ परिलक्षित हो रही है. उम्मीद है आगे भी उनके पाठकों को उनकी लेखनी के माध्यम से ऐसे ही नए सन्दर्भों का पता चलता रहेगा.

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

आइये फटकारें खुद को

आइये फटकारें खुद को
थोडा झाडें पोंछें
कि
भूल चुके हैं सभी तहजीबों की जुबान

संवेदनशीलता और संवेदनहीनता के मध्य
ख़ामोशी अख्तियार कर रुकें , सोचें, समझें
वक्त बेशक बेजुबान है
मगर जालिम है
नहीं पूछेगा तुमसे तुम्हारे इल्म
धराशायी करने को काफी है उसकी एक करवट

आरोपों आक्षेपों तक ही नहीं हो तुम प्रतिबद्ध
चिंतन मनन से मापी जायेगी तुम्हारी प्रमाणिकता
जानते हो
न वक्त की कोई जुबाँ होती है और न मौत की

ये जानते हुए भी कि
करवटों के भारी शोर तले दब चुकी हैं मुस्कुराहटें
तुम कैसे बजा सकते हो बाँसुरी
जिसमे न सुर हैं न लय न ताल

खुरदुरी सतहों पर चलने वालों
चलना जरा संभल कर
यहाँ घुटने छिलने के रिवाज़ से वाकिफ हैं सभी

ये वक्त का वो दौर है
जहाँ नदारद हैं पक्ष प्रतिपक्ष
और
कल जो हुआ
आज जो हुआ
कल जो होगा के मध्य खड़े हो तुम भी ... पता है न
या तो ठोको वक्त को फर्शी सलाम
या फिर हो जाओ तटस्थ
अन्यथा अगला निशाना तुम भी बन सकते हो
बस यही है
तुम्हारे चिंतन मनन की सही दिशा
खुद की झाड पोंछ का मूलमंत्र




गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

सफ़र 30 वर्षों का


सफ़र 30 वर्षों का पल में सिमट गया
दामन ज़िन्दगी का खुशियों से भर गया

कि गुजर चुकी उम्र शिकवो शिकायतों की
कि बदल चुकी इबारत दिल की इनायतों की
ये दौर है कोई और
वो दौर था कोई और

अब
नयी है वर्णमाला
नए हैं अक्षर
और नया है व्याकरण रिश्ते का
जहाँ
कोई कोमा नहीं
कोई अर्ध विराम नहीं
अब पूर्ण विराम की अवस्था है
जीवन राग अपने सातवें सुर पर गुनगुना रहा है आदिम गीत

कि धरा ने साँस भरी
और आकाश सिमट गया
लम्हा जो अब तक भटका था
उसके पहलू में ठिठक गया
फिर सजदा कौन किसे करे
जब
मैं तुम...हुए हम

कहो तो अब किस देवता की करें इबादत
जब ज़िन्दगी सुर्खरू है हमारी :) :)



पलक झपकते बीत गए 30 वर्ष और पता भी न चला कैसे ज़िन्दगी गुजर जाती है......लगता ही नहीं, जैसे कल की ही बात हो या फिर कोई स्वप्न जिसमें हम चल रहे थे किसी मदहोशी में......

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

"बुरी औरत हूँ मैं" गंगा शरण सिंह की नजर में

जब एक सजग पाठक और सच्चे आलोचक के द्वारा आपको अपने लेखन पर प्रतिक्रिया मिले तो शायद वो ही एक लेखक का सबसे बड़ा पुरस्कार होता है. उसमे भी गंगा शरण सिंह जी जैसे साहित्य के सजग प्रहरी आपको पढ़ें और आपके कहानी संग्रह पर अपनी प्रतिक्रिया दें तो ये किसी भी लेखक के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं क्योंकि ये वो पाठक हैं जो साहित्य की राजनीति से बहुत दूर हैं लेकिन साहित्य उनकी रग रग में बसा है.
मैं धन्य हुई गंगा जी आपकी बेबाक और सच्ची प्रतिक्रिया पाकर ....आशा है आप समय समय पर इसी तरह हम नव आगंतुकों को अपने विचारों से इसी तरह लाभान्वित करते रहेंगे ..........हार्दिक आभारी हूँ :) :)
"बुरी औरत हूँ मैं" कहानी संग्रह पर गंगा जी द्वारा लिखी समीक्षा आप सबकी नज़र :


Vandana Gupta की पहचान मूलतः एक कवियित्री के रूप में है किन्तु गद्य की अन्य विधाओं मसलन कहानी , उपन्यास, आलोचना, व्यंग्य आदि में भी उनका खासा दखल है।
"बुरी औरत हूँ मैं" उनका पहला कहानी संग्रह है जो 2017 में ए.पी.एन. पब्लिकेशन दिल्ली से प्रकाशित हुआ। व्यक्तिगत रूप से यह शीर्षक मुझे अच्छा नहीं लगा। दरअसल आजकल दौर ही सनसनीे का है। ये सनसनी चाहे शीर्षक द्वारा फैलाई जाय, चाहे किसी घटिया आवरण द्वारा। हालाँकि Kunwar Ravindra साहब द्वारा निर्मित इस किताब का आवरण बहुत बढ़िया है।
शीर्षकों से जुड़ा एक दूसरा पक्ष ये भी है कि तमाम प्रसिद्ध कहानी संग्रहों की तरह शीर्षक धाँसू हो किन्तु पूरे संग्रह में कहानी छोड़कर बाकी सारे तत्व हों , तो भी पाठक के किस काम के।
अपने कई स्वनामधन्य कथाकारों, जिन्हें वे बड़े आदर से समकालीन रचनाकार का ख़िताब देती हैं और बड़े उत्साह से उन्हें पढ़कर बड़ी बड़ी समीक्षाएँ लिखती हैं, से बहुत बेहतर वे स्वयं लिखती हैं। कथ्य के लिहाज से एक दो कमजोर कहानियों को छोड़कर अधिकांश रचनाएँ अलग अलग विषयों और पात्रों को बखूबी प्रस्तुत करती हैं। कुछ प्रेम कहानियों की मूल थीम में भी थोड़ा सा दोहराव जैसा लगा। बावजूद इसके अधिकांश किस्सों में व्याप्त किस्सागोई की विविधता ये दर्शाती है कि रचनाकार अपने आसपास हो रही घटनाओं और चरित्रों को कितनी सजगता और सूक्ष्मता से ग्रहण करने में सक्षम है। किसी भी कहानी संग्रह को पढ़ते समय पाठक अपनी अपनी रुचि की कहानियाँ चुन लेते हैं। मैं भी वही कर रहा हूँ। कुछ ऐसी कहानियाँ जो बेहद उल्लेखनीय लगीं उनका हल्का सा विवरण संग्रह के परिचय के रूप में समझा जाए।

संग्रह की पहली कहानी "ब्याह" एक ऐसी नारी की कथा है जिसका विवाह एक नपुंसक व्यक्ति से हो जाता है। नायिका दुर्भाग्य के इस अध्याय को अपनी नियति मानकर उस घर में शान्ति और सद्भाव से रहने का प्रयास करती है। घर के सदस्यों को एक लड़की के भविष्य खराब करने पर कोई पश्चाताप नहीं है। यहाँ तक कि उसकी सास अपने बेटे की कमी को सार्वजनिक होने से बचाने के लिए अपने पति यानी नायिका के ससुर को रात उसके कमरे में भेजने से गुरेज नहीं करती।
झूठ और छल के सहारे की गयी बहुत सी निरर्थक और विवादित शादियों की स्मृति इस कहानी के साथ ताजा हो आयी।

"उम्मीद" एक अलग सी कथावस्तु पर आधारित प्रेम-कथा है जहाँ कहानी का नायक एक विवाहित महिला से प्यार करने लगता है। पूरी तरह मानसिक धरातल पर स्थित इस प्यार में न तो कोई शारीरिक आकर्षण है न कोई चाहत। नायिका भी उसके नियमित संपर्क में है और वो भी नायक को पसन्द करती है किंतु अपनी अपनी सरहदों और प्रतिबद्धताओं से दोनों बखूबी वाकिफ़ हैं। न कोई इक़रार न इज़हार। अचानक कुछ यूँ होता है कि इस अव्यक्त प्रेम की पीड़ा से त्रस्त नायक धीरे धीरे बीमार पड़ जाता है। लेखकीय नियंत्रण में जरा सी छूट इसे एक साधारण कहानी बना सकती थी, किन्तु एक बेहद नाज़ुक विषय को बड़ी कुशलता से निभाया है वंदना जी ने।
"एक ज़िन्दगी और तीन चेहरे" एक असंतुष्ट प्रवृति के व्यक्ति की कथा है जो विवाहित होने के बावजूद अपनी प्रकृति के कारण संपर्क में आने वाली महिला मित्रों से सदैव अंतरंग होने का प्रयास करता था। कहानी की आख़िरी पात्र उसे इस मानसिकता से किस तरह मुक्त करती है, यह पढ़ना रोचक है।
"पत्ते झड़ने का मौसम" एक ऐसे ख़ुशमिज़ाज़, सहृदय और सुलझे हुए लेखक की आत्मकथा है जो अपनी कैंसर पीड़ित पत्नी की मृत्यु के बाद खुद को लेखन और यात्राओं में इस कदर व्यस्त कर लेते हैं कि देखने वाली ज़िंदादिली और जज्बे से रश्क़ करते हैं और कौतुक भी कि क्या इस इंसान को क्या कभी अकेलापन नहीं व्यापता होगा?
एक दिन जब वो नहीं रहते और कथावाचक मित्र के हाथ उनकी डायरी लगती है तब उसे मालूम पड़ता है कि वो अपनी पत्नी और उसे कितना याद करते रहे।

"बुरी औरत हूँ मैं" यह शीर्षक कहानी एक ऐसी महत्वाकांक्षी औरत की ज़िन्दगी को बयान करती है जो अपने शौक पूरा करने के लिए कॉलेज के समय से ही कॉल गर्ल बन जाती है। उसके सौंदर्य पर मोहित कहानी का नायक सब कुछ जानते हुए भी उसे एक बेहतर जीवन देने का वायदा करते हुए उससे विवाह कर लेता है। इस कहानी का भयावह अंत ऐसे लोगों के लिए एक सबक है जो भौतिक सुख सुविधाओं की अनंत भूलभुलैया में खोकर अपने जीवन से खिलवाड़ करते हैं। इस बार भी व्यक्तिगत जीवन में देखी कुछ इसी तरह की घटनाओं की स्मृति के कारण यह कहानी मेरे लिए प्रासंगिक हो उठी।
"कितने नादान थे हम" एक ऐसे पति पत्नी की कथा है जो एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं किंतु भौतिकता की दौड़ में एक दूसरे से बहुत दूर निकल जाते हैं। तलाक आदि कानूनी प्रक्रियाओं का लंबा रास्ता तय करने के बाद अचानक वे खुद को ज़िन्दगी के रेगिस्तान में अकेले खड़ा पाते हैं और फिर उन्हें एक दूसरे की मूल भावनाओं का समुचित एहसास होता है।
"वो बाइस दिन" इस संग्रह की सबसे बेहतरीन और संवेदनशील कहानी है। नायिका के पिता कोमा की अवस्था में हैं। आसन्न मृत्यु की आहट और पीछे अकेले रह जाने को बाध्य परिजनों की उस विवशता के दौर को बेहद सधे शब्दों और अप्रतिम संवेदना के साथ प्रस्तुत किया है वंदना जी ने।
"स्लीप मोड" इस संग्रह की अंतिम और गुणवत्ता में "वो बाइस दिन" के बाद सबसे अच्छी कहानी है। विस्मरण जैसी खतरनाक बीमारी के शिकार होते जा रहे उम्रदराज परिजन कभी कभी हम सबकी अनजाने में की गई उपेक्षा का शिकार होते हैं। हम उनके बताने पर भी ध्यान नहीं देते और अपनी इन लापरवाहियों पर हमारा ध्यान तब जाता है जब संभावनाओं के सारे दरवाज़े बंद हो चुके रहते हैं।
इस कहानी संग्रह की आरंभिक कहानियों में वंदना जी की भाषा बहुत खटकती है। उनकी कविता का दुष्प्रभाव वाक्य विन्यासों पर बार बार नज़र आता है। शायद ये पुरानी कहानियाँ होंगी जब उनकी भाषा परिमार्जित नहीं थी। किन्तु उत्तरार्द्ध की रचनाएँ पढ़ते हुए स्पष्ट दिखता है कि भाषा और शिल्प पर उनकी पकड़ क्रमशः मजबूत होती गयी है और संभवतः इसीलिए आखिर की कुछ कहानियाँ बेहद असरदार बन पड़ी हैं।