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सोमवार, 5 अक्तूबर 2020

जाने कब गूंगे हुए

जाने कब गूंगे हुए 
एक अरसा हुआ 
अब चाहकर भी जुबाँ साथ नहीं देती 
अपनी आवाज़ सुने भी गुजर चुकी हैं 
जैसे सदियाँ 

ये बात 
न मुल्क की है 
न उसके बाशिंदों की 

लोकतंत्र लगा रहा है उठक बैठक 
उनके पायतानों पर 
और उनके अट्टहास से गुंजायमान हैं 
दसों दिशाएँ 

उधर 
निश्चिन्त हो 
आज भी 
राघव पकड़ रहा है 
बंसी डाले पोखर में मछलियाँ ........

शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

आखिर मैं चाहती क्या हूँ

कभी कभी फ़ुर्सत के क्षणों में
एक सोच काबिज़ हो जाती है
आखिर मैं चाहती क्या हूँ
खुद से या औरों से
तो कोई जवाब ही नहीं आता
क्या वक्त सारी चाहतों को लील गया है
या चाहत की फ़सलों पर कोई तेज़ाबी पाला पड गया है
जो खुद की चाहतों से भी महरूम हो गयी हूँ
जो खुद से ही आज अन्जान हो गयी हूँ
कोई फ़ेहरिस्त अब बनती ही नहीं
मगर ये दुनिया तो जैसे 
चाहतों के दम पर ही चला करती है
और मौत को भी दरवाज़े के बाहर खडा रखती है
बाद में आना ………अभी टाइम नहीं है
बहुत काम हैं 
बहुत सी अधूरी ख्वाहिशें हैं जिन्हें पूरा करना है
और एक तरफ़ मैं हूँ 
जिसमें कोई ख्वाहिश बची ही नहीं
फिर भी मौत है कि मेरा दर खटखटाती ही नहीं

सुना है ……ख्वाहिशों, चाहतों का अंत ही तो ज़िन्दा मौत है 
तो क्या ज़िन्दा हूँ मैं या मौत हो चुकी है मेरी?

शनिवार, 8 अगस्त 2020

मसला तो उसे भुलाने में है

 जब तब छेड़ जाती है उसकी यादों की पुरवाई सूखे ज़ख्म भी रिसने लगते हैं किसी को चाहना बड़ी बात नहीं मसला तो उसे भुलाने में है


यूँ तो तोड़ दिए भरम सारे
न वो याद करे न तुम
फिर भी इक कवायद होती है
आँख नम हो जाए बड़ी बात नहीं
मसला तो उसे सुखाने में है


बुधवार, 5 अगस्त 2020

नया हिन्दुस्तान

आजकल
न दुस्वप्न आते हैं न सुस्वप्न
बहुत सुकून की नींद आती है
अमन चैन के माहौल में

सारी चिंताएं सारी फिक्रें ताक पर रख
हमने चुने हैं कुछ छद्म कुसुम
लाजिमी है फिर
छद्म सुवास का होना
और हम बेहोश हैं इस मदहोशी में

स्वप्न तो उसे आयेंगे
जिसने खिलाने चाहे होंगे आसमान में फूल
गिरेंगे तो वही
जिसने की होगी चलने की कवायद
जागेंगे तो वही
जिन्होंने किया होगा सोने का उपक्रम
हमने तो बेच दिए हैं अपने सब हथियार
दीन ईमान, ज़मीर और इंसानियत भी

अब नया हिन्दुस्तान मेरी ख्वाबगाह है.

बुधवार, 27 मई 2020

उपकृत

ये उपकृत करने का दौर है
संबंधों की फाँक पर लगाकर
अपनेपन की धार

अंट जाते हैं इनमें
मिट्टी और कंकड़ भी
लीप दिया जाता है 
दरो दीवार को कुछ इस तरह
कि फर्क की किताब पर लिखे हर्फ़ धुंधला जाएं

फिर भी 
छुट ही जाता है एक कोना
झाँकने लगता है जहाँ से
संबंधों का उपहार

और धराशायी हो जाती हैं 
अदृश्य दीवारें
नग्न हो जाता है सम्पूर्ण परिदृश्य
आँख का पानी 
अंततः सोख चुके हैं आज के अगस्त्य

मुँह दिखाई की रस्मों का रिवाज़ यहां की तहजीब नहीं...


शनिवार, 16 मई 2020

कितने विवश हैं

कौन हो तुम?
और क्यों हो तुम ?
किसे जरूरत तुम्हारी ?

न किसी बहीखाते में दर्ज हो
न किसी आकलन में
न उन्हें परवाह तुम्हारी


कीड़े मकौडों से
मरने के लिए ही तो पैदा होते हो
मौत से भागते फिरते हो
लेकिन कहाँ बच पाते हो?

सरकार के लिए वोट बैंक भर हो
मान लो और जान लो
तुम मरते रहोगे
वो बस आंकड़े दर्ज करते रहेंगे
और हो जायेगी इतिश्री

तो क्या हुआ
घर पर माँ की आँखें इंतज़ार में पथरा जायेंगी
तो क्या हुआ
पत्नी की मांग सूनी पगडण्डी सी नज़र आएगी
तो क्या हुआ
बच्चों की किलकारियां वक्त से पहले दफ़न हो जायेंगी

यहाँ सुविधाओं की अट्टालिकाएं महज कोरा भ्रम भर हैं
विदेशी भारतीयों को मिला करती हैं वी आई पी सुविधाएं
उड़न खटोलों पर है उनका ही एकाधिकार
तुम्हारा पसीना हो या खून
बस बहने के लिए ही बना है
बताओ तो
क्या तुम्हें नमन कर देने भर से हो जायेंगे हम उऋण?


आज जी भर कर कोसने को मन कर रहा है सिस्टम को, सरकार को, असंवेदनशीलता को........मजदूर रोज मर रहे हैं, मीडिया चीख रहा है, जनता चीख रही है, सुनवाई के नाम पर कानों में तेल डाले बैठे हैं अगली घटना के इंतज़ार तक .......क्या एक बार सभी मजदूरों को आश्वासन नहीं दिया जा सकता था? क्या पता नहीं वो कितना पढ़ा लिखा है और कितना अनपढ़? कैसे वो ट्रेन ऑनलाइन बुक कर सकता है? कितने विवश हैं आज हम मौत का नंगा नाच देखने को  

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

आ अब लौट चलें - कोरोनाकाल

आज के कोरोनाकाल में जब विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है तब भी मानव उससे हारे जा रहा है, आखिर क्या कारण रहे इस हार के, सोचने पर विवश हो जाते हैं. 

पिछले कुछ समय से जो अध्ययन मनन और चिंतन कर रही हूँ तो पाती हूँ आज हमारे रहन सहन, खान पान, आचार विचार और व्यवहार सब में इतनी तबदीली आ गयी है कि पीछे मुड़कर देखो तो जैसे एक युग से दूसरे युग में पदार्पण किया हो. 

मैं आज से ४०-४५ वर्ष पीछे भी यदि मुड़कर देखती हूँ तो पाती हूँ उस समय के लोगों में आचार विचार का बहुत ख्याल रखा जाता था जिसे बाद के वर्षों में छुआछूत का नाम दे दिया गया या कुछ लोग कहने लगे थे, उनके यहाँ तो बहुत सोध करते हैं. घर की चप्पलें बाहर रखो. घर के अन्दर घूमना हो तो खडाऊं पहनी जाती थी. वहीँ रोज नहाना और प्रत्येक कपडा धुलता था यहाँ तक कि तौलिये भी जबकि आज तौलिये रोज कोई नहीं धोता. वहीँ उस समय शौच से निवृत्त होने पर राख से हाथ धोने होते थे और उसके बाद आपको नहाना होता था. यानि आप पूरी तरह से शुद्ध हो गए. कोई भी कीटाणु जीवाणु आपके साथ घर के अन्दर नहीं आ पाते थे. वहीँ रसोई में जब भी कोई काम करना होता तो लोटा रखा होता उसमें पानी भरा होता, पहले हाथ धोओ फिर बर्तनों या सामानों को हाथ लगाओ. यानि कदम कदम पर स्वच्छता का बोलबाला था जिसे समय बीतने के साथ सोध या छुआछूत का नाम दे दिया गया. अस्पृश्यता ने अपनी जड़ें अन्दर तक जमाई हुई थीं. यदि जमादार आता तो उसे भी छुआ नहीं जाता . दूर से ही सामान दे दिया जाता. पैसे भी दूर से जमीन पर रख दिए जाते और वो उठा लेता. शायद इसका भी यही कारण था जो मुझे आज इस महामारी के दौर में समझ आ रहा है, जिसने आज तक अपनी जड़ें गहरी जमाई हुई हैं कि इस कोरोनाकाल में भी कुछ लोग जिन्हें क्वारंटाइन किया हुआ है, वो एक दलित के हाथ का खाना खाने को तैयार नहीं हैं बिना इसका औचित्य जाने उन्होंने इन बातों को गलत सन्दर्भ से जोड़ लिया. 


महामारियों का इतिहास बहुत पुराना है. पहले चालीस पचास साल बाद कोई न कोई महामारी संसार में दस्तक देती ही रहती थी. ऐसे में जनता में या तो जागरूकता फैलाई जाए या फिर जनता स्वयं जागरूक हो. संभव है जब जब महामारियां फैली होंगी, जहाँ संक्रमण छूने भर से फ़ैल जाता होगा, वहां ऐसे ही उपाय अपनाए जाते रहे हों. १९१८ -१९२० के मध्य के बीच जब महामारी फैली तो संभव है उससे बचाव के लिए सबने इसी तरह के स्वच्छता के नियमों को अपनाया हो. अब जब कोई महामारी लम्बे समय तक फैली रहती है ऐसे में लोगों में उससे बचने के लिए जो उपाय किये जाते हैं वो उनकी आदत में धीरे धीरे शुमार हो जाते हैं और फिर उसके वो आदि हो जाते हैं. फिर ऐसी आदतें अपनी जड़ें जमा लेती हैं जो वर्षों बरस चलती चली जाती हैं. फिर पीढियां बदल जाती है लेकिन आदतें नहीं बदलतीं. संभव है इन्हीं आदतों को अस्पृश्यता या छुआछूत का रूप दे दिया गया हो. जिस कारण एक वर्ग विशेष को जैसे समाज से ही काट दिया गया हो इन्हीं आदतों की वजह से. लेकिन कोई इसकी गहराई में नहीं गया. बस वर्ग बना दिया गए और उनके काम बाँट दिए गए. वर्ना देखा जाए हैं तो सभी इंसान ही जिनमें एक जैसा लहू बहता है लेकिन जो नियम महामारी से बचने के लिए बनाए गए उनका कालांतर में दुरूपयोग होने लगा और छुआछूत लहू में पैबस्त हो गयी. 

मुझे याद आती हैं मेरी एक बुआ जो अपने हाथ कोहनियों तक धोती थीं और पैर भी आधे आधे. नहाती थीं तो कोई और बर्मा चलाये और नहाकर धुली हुई चौंकी पर जाकर ही बैठती थीं. कुछ किसी से मँगातीं तो उसे दूर से ही पैसे देती थीं. तब उन्हें सभी सोधन कहते थे लेकिन आज सोचती हूँ तो पाती हूँ शायद ये संस्कार उनमें इतने अधिक पैबस्त थे कि वो उनसे कभी बाहर ही नहीं आयीं जबकि बाकी लोगों ने धीरे धीरे ऐसे संस्कारों से किनारा करना शुरू कर दिया था. 

वहीँ सात्विक भोजन ही हमेशा से मनुष्य के लिए उत्तम भोजन माना गया लेकिन बदलते समय ने खान पान भी इतना बिगाड़ दिया कि आज मानव की इम्युनिटी इतनी कमजोर हो गयी है कि उसका शरीर जरा सा भी झटका नहीं सहन कर पाता. हम देखते हैं पहले के लोग यदि बासी भोजन भी खाते थे तब भी उन्हें कुछ नहीं होता था. लक्कड़ पत्थर सब हजम हो जाता था क्योंकि उनके भोजन में विषैले तत्व शामिल नहीं होते थे. जीव जंतु शामिल नहीं होते थे. समय के साथ विज्ञानं ने भी ये सिद्ध किया की शाकाहारी भोजन ही उत्तम भोजन है और आज जाने कितने ही देश शाकाहार की तरफ लौट रहे हैं. 

आज के सन्दर्भ में जब देखती हूँ तो यही पाती हूँ. किन कारणों से जीवन में बदलाव आये और कालांतर में  उनका कैसे दुरूपयोग होने लगा. वहीँ दूसरी तरफ ये पाती हूँ इंसान की प्रवृत्ति प्रकृति प्रदत्त है. उसी प्रकृति का हिस्सा है. अब यदि प्रकृति का दुरूपयोग होगा तो इंसान की सेहत पर भी उसका असर जरूर पड़ेगा क्योंकि बना तो वो भी उसी प्रकृति से है. आज की ये महामारी मानो एक संकेत या कहो सन्देश है मानव जाति को - अति हर चीज की बुरी होती है मानो यही कहना चाहती है प्रकृति. विज्ञान को भी प्रकृति चाहे तो धता बता सकती है. प्रकृति चाहती है स्वच्छता, निर्मलता लेकिन मानव ने यही उससे छीन लिए हैं तो उन्हीं का शिकार होने से वो कैसे बच सकता है? क्या ये बात विचारणीय नहीं? 

मानव को कुछ बदलाव लाने ही होंगे. जिस गंगा को करोड़ों रूपये लगाकर भी साफ़ नहीं किया जा सका सिर्फ २१ दिन में वो स्वयं साफ़ हो गयी - आखिर क्यों? क्या ये विचारणीय नहीं? 

आज आसमान साफ़ दिखाई देता है, पंछी गगन में उन्मुक्त विहार करते हैं, जो गोरैया अदृश्य हो गयी थी आज उसकी चहचहाट से हर घर गुलजार होने लगा है, साफ़ स्वच्छ वायु , रात को तारों भरा निर्मल आकाश क्या हमें सोचने को मजबूर नहीं करता कि मानो प्रकृति ये सन्देश दे रही है ये है मेरा स्वरुप और तुमने क्या कर दिया. क्या ये बात विचारणीय नहीं?

यदि हम चाहते हैं हम स्वस्थ रहें और एक अच्छा जीवन जीयें तो हमें अपने अन्दर बदलाव लाने ही होंगे. इसके लिए कोई सरकार कुछ नहीं कर सकती. ये एक विडंबना है आज सरकार को विज्ञापन के माध्यम से तो कभी स्वयं आकर जनता को हाथ धोने के तरीके सिखाने पड़ रहे हैं जबकि ये तो हमारे संस्कारों में पैबस्त थे लेकिन आधुनिकता की दौड़ में शामिल होने की चाहत में हमने जो भी सीखा था वो भुलाते चले गए और आज उसका नतीजा भुगत रहे हैं. 

तो सोचिये और विचारिये - क्या अब ये कहने का दौर नहीं आ गया - आ अब लौट चलें 

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

घर वापसी

लॉक डाउन के माहौल में, कोरोना की फ़िक्र में मची चारों तरफ अफरा तफरी .....रात दिन सिर्फ एक ही फ़िक्र में गुजर रहे हैं सभी के.......दूसरी तरफ कामगारों का पलायन एक नयी समस्या बन उभरा तो सोचते सोचते कुछ ख्याल यूँ दस्तक देने लगे :

नहीं होती घर वापसी किसी की भी कभी पूरी तरह
जो गया था वो कोई और था
जो आया है वो कोई और है

तुम जब जाते हो
छोड़ जाते हो थोडा सा
गाँव की मिटटी में खुद को
जो सहेजे रखती है तुम्हें एक लम्बे अरसे तक
मगर वो अरसा कभी कभी इतना लम्बा हो जाता है
कि मिटटी भी भूलने लगती है
तुम्हारी किलकारियां
तुम्हारी शैतानियाँ
तुम्हारा चेहरा
वतन में बेवतन हो जाए जैसे कोई

एक लम्बा वक्फा काफी होता है
स्मृतियों पर जाले बनाने को
तुम झाड़ना चाहो फिर चाहे जितना
वक्त किसी पैकेज का मोहताज नहीं होता
और नमी मिटटी की हो या आँखों की
एक अरसे बाद सूख ही जाती है

अच्छा सच बताना
तुम जो आये - क्या वही हो?
क्या तुम साथ नहीं लाये
अपनी मजबूरियों की पतंग
क्या तुम भूल पाओगे
अपने पाँव में पड़ी गांठें
क्या याद नहीं आयेंगे तुम्हें
शहर की सहूलियतों के लिहाफ
जिन्हें ओढने के तुम हो चुके हो आदी
ये तो मजबूरी की बेसमय बजती शहनाई से आजिज हो
किया है तुमने गाँव की तरफ रुख

ये वापसी घर वापसी नहीं
ये है एक अवसर
ये है एक मजबूरी
ये है एक सहूलियत
ये है एक पड़ाव
क्योंकि कोई भी वापसी कभी पूरी वापसी हो ही नहीं सकती
अकाट्य सत्य है ये .......

शनिवार, 7 मार्च 2020

ठहरना एक खामोश क्रिया है

मुझे
न कहीं जाना है न आना है
मुझे तो यहीं कहीं ठहरना है
जैसे ठहरती है धूप आँगन में
जैसे ठहरती है उम्मीद मन में
जैसे ठहरती है आशा जीवन में

नैराश्य के गह्वरों से
दूर बनाया है मैंने अपना आशियाना
यहाँ सुबह है
सांझ है
हवा है
बारिश है
मिटटी की सौंधी खुशबू है
कण कण में व्याप्त है जीवन

जीवन वो नहीं जो जीया जा रहा है
जीवन वो है जिसने बताया तुम्हें
कहाँ ठहरना है
कहाँ छोडनी है अपनी छाप
कि
कायनात के अंत के बाद भी
बचे रहें मेरी मुस्कराहट के बीज
कि
रक्तबीज सी उगूँ
और कण कण में बिखेर दूँ
खिलखिलाहट का बीज
हर चेहरे की मुस्कराहट के ताबीज में मिलूँ
तो जान लेना
मैंने जान लिया है ठहरना
मैंने पा लिया है अपना होना
शंखनाद सी गूंजूं और हो जाए ज़िन्दगी मुकम्मल

जहाँ आने और जाने में शोर है
वहीं ठहरना एक खामोश क्रिया है
जो किसी प्रतिक्रिया की मोहताज नहीं
करके आने जाने से मुक्त ...मुझे ठहरने दो
क्योंकि
मुसाफिर नहीं जो दो घूँट जल पी जल दूँ गंतव्य पर ...

तानाशाह ! गश्त पर हैं

खिड़की और दरवाज़े बंद रखने का दौर है ये 
तानाशाह ! गश्त पर हैं 

हवाओं पर लगे हैं पहरे 
नहीं है इजाज़त दुपट्टा उड़ाने की 
बंद इमारतें गवाह हैं 

कमसिनी के मौसम हवा हुए 
अब सुलगना नियति है 
मुल्क की 

दर्ज की जा रही हैं इबारतें 
फिर पुख्ता हों न हों 
बहस मुसाहिबे के दौर दफ़न हुए 

नया दौर है ये 
नयी कलम है 
और नयी है सोच 
अंतर मिट चुका है शोषक और शासक का 
तुम तय करो अपना पक्ष 

तस्वीरें भी कभी बदला करती हैं भला?

किश्तों में लुटना तय है 
किश्तों में ही चुकना है 
फिर कैसा विद्रोह और क्यों?
जब आखिरी कदम तय है 
कलम होगा सर हुक्म उदूली पर 
सर नवाना आज के समय का सबसे बड़ा लोकतंत्र है 
यही लोकतंत्र की जय है ...



सोमवार, 2 मार्च 2020

अधूरे सपनों की कसक

कल १ मार्च को रेखा श्रीवास्तव जी के संपादन में "ब्लॉगर्स के अधूरे सपनों की कसक" पुस्तक का मुखर्जी नगर में लोकार्पण हुआ। वहीं ब्लॉग और ब्लॉगिंग को लेकर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। जिसमें अपने समय के सभी दिग्गज ब्लॉगर्स द्वारा चिंता व्यक्त करते हुए समाधान भी प्रस्तुत किया गया। एक सार्थक परिचर्चा की गयी। सबका फोकस पूरी तरह सब्जेक्ट पर रहा। वहीं रंजना यादव जी ने बहुत खूबसूरती से मंच संचालन किया जो रेडियो एंकर भी हैं। रेखा जी के पति, उनकी बेटियाँ तो थी हीं, उनके दामाद भी इस आयोजन में बहुत शिद्दत से शामिल थे। हमें भी अपनी बात रखने का मौका मिला। वहीं काफी ब्लॉगर्स उपस्थित थे तो उन्होंने भी इस आयोजन में अपनी बात कही। यूँ तो जीवन में सबके सब सपने पूरे नहीं होते लेकिन उनसे कोई नहीं पूछता तुम्हारा कौन सा सपना अधूरा रह गया। उस कार्य को अंजाम दिया रेखा श्रीवास्तव जी ने और दे दी सभी ब्लॉगर्स को एक जमीन। सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि कानपुर से दिल्ली आकर उसका ब्लॉगर्स के मध्य विमोचन करवाना कोई आसान काम नहीं था लेकिन यही रेखा जी की खासियत है वो आसान काम करतीं भी नहीं। रेखा जी और पुस्तक में शामिल सभी लेखकों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।































































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