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गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

सफ़र 30 वर्षों का


सफ़र 30 वर्षों का पल में सिमट गया
दामन ज़िन्दगी का खुशियों से भर गया

कि गुजर चुकी उम्र शिकवो शिकायतों की
कि बदल चुकी इबारत दिल की इनायतों की
ये दौर है कोई और
वो दौर था कोई और

अब
नयी है वर्णमाला
नए हैं अक्षर
और नया है व्याकरण रिश्ते का
जहाँ
कोई कोमा नहीं
कोई अर्ध विराम नहीं
अब पूर्ण विराम की अवस्था है
जीवन राग अपने सातवें सुर पर गुनगुना रहा है आदिम गीत

कि धरा ने साँस भरी
और आकाश सिमट गया
लम्हा जो अब तक भटका था
उसके पहलू में ठिठक गया
फिर सजदा कौन किसे करे
जब
मैं तुम...हुए हम

कहो तो अब किस देवता की करें इबादत
जब ज़िन्दगी सुर्खरू है हमारी :) :)



पलक झपकते बीत गए 30 वर्ष और पता भी न चला कैसे ज़िन्दगी गुजर जाती है......लगता ही नहीं, जैसे कल की ही बात हो या फिर कोई स्वप्न जिसमें हम चल रहे थे किसी मदहोशी में......

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

"बुरी औरत हूँ मैं" गंगा शरण सिंह की नजर में

जब एक सजग पाठक और सच्चे आलोचक के द्वारा आपको अपने लेखन पर प्रतिक्रिया मिले तो शायद वो ही एक लेखक का सबसे बड़ा पुरस्कार होता है. उसमे भी गंगा शरण सिंह जी जैसे साहित्य के सजग प्रहरी आपको पढ़ें और आपके कहानी संग्रह पर अपनी प्रतिक्रिया दें तो ये किसी भी लेखक के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं क्योंकि ये वो पाठक हैं जो साहित्य की राजनीति से बहुत दूर हैं लेकिन साहित्य उनकी रग रग में बसा है.
मैं धन्य हुई गंगा जी आपकी बेबाक और सच्ची प्रतिक्रिया पाकर ....आशा है आप समय समय पर इसी तरह हम नव आगंतुकों को अपने विचारों से इसी तरह लाभान्वित करते रहेंगे ..........हार्दिक आभारी हूँ :) :)
"बुरी औरत हूँ मैं" कहानी संग्रह पर गंगा जी द्वारा लिखी समीक्षा आप सबकी नज़र :


Vandana Gupta की पहचान मूलतः एक कवियित्री के रूप में है किन्तु गद्य की अन्य विधाओं मसलन कहानी , उपन्यास, आलोचना, व्यंग्य आदि में भी उनका खासा दखल है।
"बुरी औरत हूँ मैं" उनका पहला कहानी संग्रह है जो 2017 में ए.पी.एन. पब्लिकेशन दिल्ली से प्रकाशित हुआ। व्यक्तिगत रूप से यह शीर्षक मुझे अच्छा नहीं लगा। दरअसल आजकल दौर ही सनसनीे का है। ये सनसनी चाहे शीर्षक द्वारा फैलाई जाय, चाहे किसी घटिया आवरण द्वारा। हालाँकि Kunwar Ravindra साहब द्वारा निर्मित इस किताब का आवरण बहुत बढ़िया है।
शीर्षकों से जुड़ा एक दूसरा पक्ष ये भी है कि तमाम प्रसिद्ध कहानी संग्रहों की तरह शीर्षक धाँसू हो किन्तु पूरे संग्रह में कहानी छोड़कर बाकी सारे तत्व हों , तो भी पाठक के किस काम के।
अपने कई स्वनामधन्य कथाकारों, जिन्हें वे बड़े आदर से समकालीन रचनाकार का ख़िताब देती हैं और बड़े उत्साह से उन्हें पढ़कर बड़ी बड़ी समीक्षाएँ लिखती हैं, से बहुत बेहतर वे स्वयं लिखती हैं। कथ्य के लिहाज से एक दो कमजोर कहानियों को छोड़कर अधिकांश रचनाएँ अलग अलग विषयों और पात्रों को बखूबी प्रस्तुत करती हैं। कुछ प्रेम कहानियों की मूल थीम में भी थोड़ा सा दोहराव जैसा लगा। बावजूद इसके अधिकांश किस्सों में व्याप्त किस्सागोई की विविधता ये दर्शाती है कि रचनाकार अपने आसपास हो रही घटनाओं और चरित्रों को कितनी सजगता और सूक्ष्मता से ग्रहण करने में सक्षम है। किसी भी कहानी संग्रह को पढ़ते समय पाठक अपनी अपनी रुचि की कहानियाँ चुन लेते हैं। मैं भी वही कर रहा हूँ। कुछ ऐसी कहानियाँ जो बेहद उल्लेखनीय लगीं उनका हल्का सा विवरण संग्रह के परिचय के रूप में समझा जाए।

संग्रह की पहली कहानी "ब्याह" एक ऐसी नारी की कथा है जिसका विवाह एक नपुंसक व्यक्ति से हो जाता है। नायिका दुर्भाग्य के इस अध्याय को अपनी नियति मानकर उस घर में शान्ति और सद्भाव से रहने का प्रयास करती है। घर के सदस्यों को एक लड़की के भविष्य खराब करने पर कोई पश्चाताप नहीं है। यहाँ तक कि उसकी सास अपने बेटे की कमी को सार्वजनिक होने से बचाने के लिए अपने पति यानी नायिका के ससुर को रात उसके कमरे में भेजने से गुरेज नहीं करती।
झूठ और छल के सहारे की गयी बहुत सी निरर्थक और विवादित शादियों की स्मृति इस कहानी के साथ ताजा हो आयी।

"उम्मीद" एक अलग सी कथावस्तु पर आधारित प्रेम-कथा है जहाँ कहानी का नायक एक विवाहित महिला से प्यार करने लगता है। पूरी तरह मानसिक धरातल पर स्थित इस प्यार में न तो कोई शारीरिक आकर्षण है न कोई चाहत। नायिका भी उसके नियमित संपर्क में है और वो भी नायक को पसन्द करती है किंतु अपनी अपनी सरहदों और प्रतिबद्धताओं से दोनों बखूबी वाकिफ़ हैं। न कोई इक़रार न इज़हार। अचानक कुछ यूँ होता है कि इस अव्यक्त प्रेम की पीड़ा से त्रस्त नायक धीरे धीरे बीमार पड़ जाता है। लेखकीय नियंत्रण में जरा सी छूट इसे एक साधारण कहानी बना सकती थी, किन्तु एक बेहद नाज़ुक विषय को बड़ी कुशलता से निभाया है वंदना जी ने।
"एक ज़िन्दगी और तीन चेहरे" एक असंतुष्ट प्रवृति के व्यक्ति की कथा है जो विवाहित होने के बावजूद अपनी प्रकृति के कारण संपर्क में आने वाली महिला मित्रों से सदैव अंतरंग होने का प्रयास करता था। कहानी की आख़िरी पात्र उसे इस मानसिकता से किस तरह मुक्त करती है, यह पढ़ना रोचक है।
"पत्ते झड़ने का मौसम" एक ऐसे ख़ुशमिज़ाज़, सहृदय और सुलझे हुए लेखक की आत्मकथा है जो अपनी कैंसर पीड़ित पत्नी की मृत्यु के बाद खुद को लेखन और यात्राओं में इस कदर व्यस्त कर लेते हैं कि देखने वाली ज़िंदादिली और जज्बे से रश्क़ करते हैं और कौतुक भी कि क्या इस इंसान को क्या कभी अकेलापन नहीं व्यापता होगा?
एक दिन जब वो नहीं रहते और कथावाचक मित्र के हाथ उनकी डायरी लगती है तब उसे मालूम पड़ता है कि वो अपनी पत्नी और उसे कितना याद करते रहे।

"बुरी औरत हूँ मैं" यह शीर्षक कहानी एक ऐसी महत्वाकांक्षी औरत की ज़िन्दगी को बयान करती है जो अपने शौक पूरा करने के लिए कॉलेज के समय से ही कॉल गर्ल बन जाती है। उसके सौंदर्य पर मोहित कहानी का नायक सब कुछ जानते हुए भी उसे एक बेहतर जीवन देने का वायदा करते हुए उससे विवाह कर लेता है। इस कहानी का भयावह अंत ऐसे लोगों के लिए एक सबक है जो भौतिक सुख सुविधाओं की अनंत भूलभुलैया में खोकर अपने जीवन से खिलवाड़ करते हैं। इस बार भी व्यक्तिगत जीवन में देखी कुछ इसी तरह की घटनाओं की स्मृति के कारण यह कहानी मेरे लिए प्रासंगिक हो उठी।
"कितने नादान थे हम" एक ऐसे पति पत्नी की कथा है जो एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं किंतु भौतिकता की दौड़ में एक दूसरे से बहुत दूर निकल जाते हैं। तलाक आदि कानूनी प्रक्रियाओं का लंबा रास्ता तय करने के बाद अचानक वे खुद को ज़िन्दगी के रेगिस्तान में अकेले खड़ा पाते हैं और फिर उन्हें एक दूसरे की मूल भावनाओं का समुचित एहसास होता है।
"वो बाइस दिन" इस संग्रह की सबसे बेहतरीन और संवेदनशील कहानी है। नायिका के पिता कोमा की अवस्था में हैं। आसन्न मृत्यु की आहट और पीछे अकेले रह जाने को बाध्य परिजनों की उस विवशता के दौर को बेहद सधे शब्दों और अप्रतिम संवेदना के साथ प्रस्तुत किया है वंदना जी ने।
"स्लीप मोड" इस संग्रह की अंतिम और गुणवत्ता में "वो बाइस दिन" के बाद सबसे अच्छी कहानी है। विस्मरण जैसी खतरनाक बीमारी के शिकार होते जा रहे उम्रदराज परिजन कभी कभी हम सबकी अनजाने में की गई उपेक्षा का शिकार होते हैं। हम उनके बताने पर भी ध्यान नहीं देते और अपनी इन लापरवाहियों पर हमारा ध्यान तब जाता है जब संभावनाओं के सारे दरवाज़े बंद हो चुके रहते हैं।
इस कहानी संग्रह की आरंभिक कहानियों में वंदना जी की भाषा बहुत खटकती है। उनकी कविता का दुष्प्रभाव वाक्य विन्यासों पर बार बार नज़र आता है। शायद ये पुरानी कहानियाँ होंगी जब उनकी भाषा परिमार्जित नहीं थी। किन्तु उत्तरार्द्ध की रचनाएँ पढ़ते हुए स्पष्ट दिखता है कि भाषा और शिल्प पर उनकी पकड़ क्रमशः मजबूत होती गयी है और संभवतः इसीलिए आखिर की कुछ कहानियाँ बेहद असरदार बन पड़ी हैं।

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

चलो चलें बुद्धत्व की ओर...

ज़िन्दगी किसी किताब का फटा पन्ना ही सही
आओ नृत्यांगना करो नृत्य
यहाँ चंचल हैं उदासियाँ भी
मौन की रिदम पर दो थाप
कि सुर लय ताल की बंदिश पर
लिख सको एक प्रेमगीत

मैं विस्तारित अनंत का वो राग
जिस पर न गुनगुनाया कोई गीत
मैं किसी छोर का कोई अछोर
जिसे पकड पाया न कोई मीत

आओ रक्कासा , करो रक्स
एक उनींदे ख्वाब में बुझ रहा है जीवन
और तुम लगा रही हो अभी सम्पुट भर
किसी सुबह की चौखट पर

आत्मभेदन यौगिक क्रिया है और ज़िन्दगी अयौगिकरण का गणित ...
वशीकरण के मन्त्रों को फूंकने भर से
नहीं हो जाता याचक अयाचक
क्योंकि
ज़िन्दगी चुप्पी का विशाल मगर खाली कैनवस है 
 
बंजारों की मुट्ठी में नहीं बंधा होता काला तिल
जो फटे पन्ने की बदल दे तकदीर
चलो चलें बुद्धत्व की ओर...


सोमवार, 22 जनवरी 2018

हे वीणावादिनी हे तमहारिणी

 
 
हे वीणावादिनी हे तमहारिणी
होकर दयाल दे ये वरदान
खुशहाल हो सकल संसार

सुबुद्धि का वास हो
कोई न उदास हो
जीवन में उल्लास हो
बस तुझ पर ही विश्वास हो

बसंत सा हर मन हो
हर आँगन तेरा घर हो
उमंग का नर्तन हो
सप्त सुरों सा जीवन हो

बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें



सोमवार, 8 जनवरी 2018

प्रोफेसर संजीव जैन की नज़र में - गिद्ध गिद्दा कर रहे हैं


जब आपके  संग्रह का जिस दिन विमोचन हुआ हो और रात को सूचना मिले आपके संग्रह को दूर बैठे मर्मज्ञ ने पढ़कर उसपर समीक्षा भी लिख दी तो मेरे ख्याल से ये किसी के लिए भी कितना महत्वपूर्ण हो सकता है ये कोई लेखक/कवि ही समझ सकता है. समीक्षा पढ़कर मुझे लगा बाकी सब काम बाद में पहले ये आवाज़ सब तक पहुँचनी चाहिए. यूँ लगा जैसे उन्होंने संग्रह की नब्ज़ पर हाथ धर दिया हो . किन लफ़्ज़ों में शुक्रिया अदा करूँ नहीं जानती बस नतमस्तक हूँ .
 
भोपाल में रहने वाले प्रोफेसर संजीव जैन जी की नज़र में गिद्धों ने कैसा गिद्दा किया है वो आपके समक्ष है :

मोहित, विकृत और उल्टे समय में
‘गिद्ध गिद्दा कर रहे हैं’ एक जरूरी किताब

वंदना गुप्ता का अभी हाल में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘गिद्ध गिद्दा कर रहे हैं’ समय की विकृत होती चाल और असंगत मानव बोध को रेखांकित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। आज की व्यवस्था ने समाज की ऊपरी सतह पर तैरनेवाली एक आत्ममुग्ध पीढ़ी को पैदा किया है। यह वह पीढ़ी है, ये वे लोग हैं जिनकी दृष्टि में नियोनलाईट की चमक है। रेप म्यूजिक का संगीत है और जेब में प्लास्टिक मनी है। ये अपनी सुख सुविधाओं के प्रति इतने आत्ममुग्ध हैं कि इस पूंजीवाद की झूठन को न देख पा रहे हैं न उसकी क्रूरताओं और मानवीयताओं को महसूस कर पाने की क्षमता उनके पास है। वंदना जी इस समय की आत्ममोहित, विकृत और उल्टीगति को बखूबी महसूस करती हैं और अपनी कविताओं में नये भाषाई अंदाज में बयां करती हैं।

‘‘क्योंकि/दिन उगते नहीं किसी शाख पर/और/विडम्बनाओं की सूक्तियाँ हैं कि/ लुभावने संगीत सी/रस घोलने की कोशिश में/चादर ताने खड़ी हैं।’’

‘‘शोर/अंदर और बाहर बराबर है/ सन्नाटा/अंदर और बाहर बराबर है/’’ (शोर और एक सन्नाटे के बीच, कविता से) क्या हम इस सन्नाटे और शोर के अंतर को महसूस कर पाने में सक्षम हैं? क्या भूमंडलीय भोंपू (मीडिया) आज की सतह पर तैरती हुई पीढ़ी को इस सन्नाटे के पीछे के शोर को सुनने का अवकाश और समय देता है? शायद नहीं, यही कारण है कि सतह के नीचे का जीवन अत्यंत क्रूर और विसंगत होता जा रहा है यद्यपि सतह के ऊपर भी विकृतियाँ कम तीखी नहीं हैं।

इन तीखी विकृतियों को वंदना जी ‘सन्नाटे का दौर’ में इस समय और सोच के बीच की असंगत फांक पर अंगुली रखते हुये इस तरह बयां करतीं हैं - ‘‘ये सन्नाटों का दौर है/कोलाहल विकल्प नहीं तोड़ने का/.......एक दौड़ते भागते/और एक ठहरे हुए समय के मध्य/ नहीं है कोई प्रतिस्पर्धा/अपने अपने वजूद हैं/ और / है उनकी अपनी अपनी पुण्यतिथि/.....तुम सोचो/ कौन से समय के साक्षी हो/ अपनी सोच की जड़ता से पैदा सन्नाटे के/ या फिर/ हहराती मानवता के कोलाहल से उपजी चिंघाड़ के।’’ मानवता के प्रति एक गहरी व्याकुलता का निदर्शन यहाँ दिख रहा है। ‘चिंघाड़ती मानवता’ में चिंघाड़ शब्द गहरी पीड़ा और कुछ न कर पाने की विडम्बना को रेखांकित कर रहा है। चिंघाड़ शब्द सामान्यतया हाथी की आवाज के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है। हाथी की यह चिंघाड़ उसकी विवश पीड़ा को व्यक्त करती है। हाथी एक सक्षम जानवर है पर जब चारों ओर से शेर या शिकारी उसे घेर कर आक्रमण करते हैं और घायल कर देते हैं तो वह विवशता में चिंघाड़ता है। मानवता भी इसी तरह अपनी विकृति और विंसगति की पीड़ा में चिंघाड़ रही है। प्रसाद जी ने कामायनी में लिखा था - ‘विषमता की पीड़ा में व्यस्त’ यह इसी समय का संकेत था।

आज की जिस तैरती हुई पीढ़ी की मैंने बात की थी ‘तुम सोचो’ पदबंध उसी के लिये संबोधित है। कविता उस विडम्बना के प्रति है जो सोच अपनी जड़ता से पैदा सन्नाटे की साक्षी है न कि हहराती चिंघाड़ती मानवता की।

दुर्दांत समय के प्रति वंदना जी संवेदनशील हैं, परंतु वे उस समय के प्रति मौन नहीं रहना चाहती हैं और न हमें रहने देना चाहती हैं। वे चीख का संविधान रचना चाहती हैं। उन अनगिनत चीखों से मानवता की चेतना को रंगना चाहती हैं, जो वास्तव में अन्याय और शोषण के खिलाफ होना चाहिये थीें। सत्ता और व्यवस्था ने जिस तरह से मानव चेतना को आतंकित किया है और डर को उसकी रग रग में भर दिया है, उसके खिलाफ सार्थक और सामूहिक चीख ही कारगर प्रतिरोध हो सकती है।

‘‘आओ चलो/गढ़ें एक चीखों का संविधान/ कि / चीखें अप्रसांगिक तो नहीं/ बना डालें चीखों को जिंदों का पर्याय/ ये समय है/ चीखों की अंतरात्मा को कुरेदने का/ एक दुर्दांत समय के (यह(निरीह) लेखक द्वारा लिखा गया है मूल कविता में नहीं है) साक्षी बनने से बेहतर है/ चीखो चीखो चीखो।’’ ...........‘चीखो/ कि चीख भी एक अभिव्यक्ति है।’’

इस अभिव्यक्ति की सामूहिक आवश्यकता है हमारे देश और समाज को। यदि ऐसा नहीं किया गया, या ऐसा करना लगातार स्थगित किया जाता रहा तो जीवन के आकाश पर ‘गिद्ध गिद्दा करते नजर आयेंगे। गिद्ध जब गिद्दा करते हैं तो वह समय मानवता के पतन और सड़न का होता है। मानवता जमीं पर क्षतविक्षत पढ़ी होती है मनुष्य जब लाश में बदल जाता है तो यह स्थिति पैदा होती है।

इस स्थिति का चित्र देखिये - ‘‘एक शहर रो रहा है/ सुबह की आस में/....यहाँ नग्न परछाइयों के रेखाचित्र/ समय एक अंधी लाश पर सवार / ढो रहा है वृत्तचित्र/ नहीं धोये जाते अब मलमल के कुरते सम्हालियत से/ साबुन का घिसा जाना भर जरूरी है/ बेतरतीबी बेअदबी ने जमाया है जबसे सिंहासन / इंसानियत की सांसें शिव के त्रिशुल पर अटकी / अंतिम साँसें ले रही है / और कोई अघोरी गा रहा है राग मल्हार/’’

मानवता के जिंदा लाश में तब्दील होते जाने की स्थितियों को पूरे कविता संग्रह में धागे की तरह पिरोया गया है। और जब ऐसा होता है तो अघोरी का राग मल्हार गाना और ‘गिद्धों का गिद्दा करना’ अपने कहन और संवेदना में नश्तर की तरह हमारे जेहन में उतर जाता है।

बेफ्रिक तैरती हुई पीढ़ी ने विकास की थोथी और विडम्बना ग्रस्त स्थिति को युग का सबसे सार्थक नारा बना कर पेश करने की स्थितियाँ पैदा की हैं और जब मानवता और संवेदनायें रसातल में जाने को उतावली हों तो ऐसे समय में विकास के नाम पर राज करना और जनता को भ्रमित करने में इस तैरती हुई पीढ़ी की बेफ्रिकी ही एक वजह है। वंदना जी ने इसे इस तरह अभिव्यक्त किया है - ‘‘ये समय का सबसे स्वर्णिम युग है/ क्योंकि / अंधेरों का साम्राज्य चहुँ ओर से सुरक्षित है/ फिर सुबह की फिक्र कौन करे।’’

सुबह की फिक्र करने के लिये हमें निर्णय लेना होगा कि हम किस के साथ अपने मानवीय दायित्व को महसूस करते हैं। समय के अपंग होते जाने के पक्ष में या अपंग हो चुके समय को बदलने के पक्ष में। वंदना जी चुनौती देती हैं अपने आपको भी और हमें भी कि ‘‘निर्णय करो / वर्ना इस अपंग समय के जिम्मेदार कहलाओगे / तुम्हारी बुजदिली कायरता को ढांपने को / नहीं बचा है किसी भी माँ का आंचल/ छातियों में सूखे दूध की कसम है तुम्हें / या तो करो क्रांति / नहीं तो स्वीकार लो / एक अपंग समय के साझीदार हो तुम /

इस कविता संग्रह का मूल स्वर राजनैतिक है। जीवन अपने समय और गति में जिस तरह वक्रता ग्रहण करता जा रहा है। कवियत्री उससे बखूबी परिचति है। लोकतंत्र की सड़ांध अब असहनीय होती जा रही है। जनता को आंकड़ों में बदला जा रहा है और चेतना को अनुकूलित किया जा रहा है निरंतर। डर और आतंक, विकास और प्रलोभन इस भीड़तंत्र के मुख्य राजनैतिक हथकंड़ें हैं - ‘‘वास्तव में तो भीड़तंत्र है ये / प्रतिकार हो, विरोध या बहिष्कार/ स्लोगन भर हैं / हथियार है इनके / खुद को सर्वेसर्वा सिद्ध करने भर के / असलियत में तो सभी तमाशाई है या जुगाडू / ऊँट के करवट बदलने भर से / बदल जाती हैं जिनकी सलवटें / मिला लिये जाते हैं / सिर से सिर, हाथ से हाथ / और बात से बात / वहाँ / मौका परस्त नहीं किया करते / मौकापरस्तों का विरोध, बहिष्कार या प्रतिकार/ ........हाँफते रहो और चलते रहो / बस यही मूलमंत्र है विकास की राह का।’’

लोकतंत्र का भीड़तंत्र में बदलते जाना इसकी नियति है। दरअसल यह पूँजीवादी लोकतंत्र है इसका निहित उद्देश्य ही जनता को भीड़तंत्र में बदलना होता है। क्योंकि जागरूक और सचेत मानव समूह विकास की इतनी फूहड़ और विषमतामूलक परिभाषा को स्वीकार नहीं कर सकता। इस लोकतंत्र में ही तमाम चीजे नारों में बदल दी जाती हैं, ‘विकास’ भी विरोध भी। मानवता भी अमानवीयता भी। हिंसा भी और अहिंसा भी। नारे ही एक मात्र राजनैतिक गतिविधि बन जाते हैं। नारे जो जनता को लुभाते हैं, उनकी चेतना को कुंद करते हैं और अपने पक्ष में मत देने के लिये उसे अनुकूलित करते हैं। यही इस पूंजीवादी लोकतंत्र की तकनीक है, जनता की मानवीय चेतना को भीड़तंत्र में बदलने की। इसे पाओलो फ्रेरे ने रेवणीकरण की संज्ञा दी है। लोकतंत्र में जनता को कुछ सुविधाएं रेवणी की तरह बांटी जाती हैं ताकि उसमें क्रांति या परिवर्तन की चेतना पैदा न हो। हमारे लोकतंत्र के लिये में ‘तमाशाई और जुगाडू’ बहुत सार्थक और कारगर टिप्पणी है राजनैतिक चेतना पर। आज का समय या तो हमें तमाशाई बनाता है और ताली बजाकर लोकतंत्र का समर्थन करना सिखाता है या अपने स्वार्थ साधने के लिये जुगाडू बनाता है। जो जुगाडू बन जाते हैं, वे तमाशाई नहीं रहते वे तमाशा दिखाने वालों में शामिल हो जाते हैं फलस्वरूप लोकतंत्र एक फूहड़ और बर्बरतापूर्ण तंत्र में बदल जाता है।

‘‘यहाँ अपने-अपने अर्थ / और अपने अपने स्यापे हैं/ जुगाड़ के पेंचों पर जहाँ / खड़ी की जाती हैं प्रसिद्धि की इमारत / वहाँ दोष ढूंढने वालों पर ही / भाँजी जाती हैं अनचाही तलवारें / छिन्नमस्तक की लाशों पर / लगाये जाते हैं जहाँ कहकहे / वहाँ प्रतिबद्धतायें वेश्या सी नोची खसौटी जाती हैं / राजनीति के मर्मज्ञ जानते हैं / क्षेत्र कोई हो / कैसे जुगाड़ के साम्राज्य को किया जाये पोषित / जो उनकी सत्ता रहे निर्विघ्न कायम।’’

वर्तमान लोकतंत्र की अलोकतांत्रिकता पर एक सार्थक टिप्पणी है यह। इस राजनीतिक समझ को जिस दिन ‘तैरती हुई पीढ़ी’ समझ लेगी उसका मोहभंग हो जायेगा पर ऐसा होना संभव नहीं दिखता क्योंकि इस पीढ़ी ने व्यापक मानवीय जीवन से अपना नाता तोड़ लिया है। यह अपने नपुंसक स्वर्ग में मस्त है। सुविधाओं का मायाजाल इन्हें घेरे हुये है। इसीलिये वंदना जी ने लिखा - ‘‘नपुंसक से ओढ़े आवरण से खुद को मुक्त करने का समय है ये।’’ किस आवरण की ओर संकेत है? यह विचारणीय है। यह कविता ‘ स्यापा’ हमें बहुत कुछ सोचने विचारने का विवश करती है। जब वे कहती हैं कि - ‘‘शायद हुक्मरानों के कानों में / पड़ जायें कर्णभेदी शहनाइयाँ / और बच जाये एक मसीहा कत्ल होने से / वर्ना अपने समय की विडम्बनाओं को दोहते-दोहते / रीत जायेंगी जाने कितनी पीढ़ियाँ / नपुंसक से ओढ़े आवरण से खुद को मुक्त करने का समय है ये।’’

हमने बहुत से मानव जीवन के सच्चे मसीहाओं को अभी हाल के कुछ वर्षों में कत्ल होते हुए देखा है। यह कत्लेआम न केवल भारत में बल्कि सम्पूर्ण विश्व में घटित होता रहा है। क्या पूरी मानवता इसके खिलाफ चीख नहीं सकती? चीख सकती है, परंतु सत्ता और पूँजी ने सुविधाओं की हड्डी जो गले में डाल रखी है। कैसे चीखेगी यह तैरती हुई पीढ़ी? जब स्थिति यह हो - ‘‘ये शापित वक्त है / जहाँ फलने-फूलने के मौसम / सिर्फ चरण चारण करने वालों को ही नसीब होते हैं।’’ सत्ता ने चरण चारण करने की इतनी गहरी नींव डाल रखी है कि सिर उठाकर चलने वालों के सिर कलम कर दिये जाते हैं ताकि कोई व्यक्ति सिर उठाकर चलने की हिम्मत न करे। और इसके विपरीत वे यह बताना भी नहीं भूलतीं सत्ता कि कदमबोसी ही तुम्हें वक्त के सीने की तहरीर बना सकते हैं - ‘‘कायदे पढ़ना जरूरी है / किसी भी क्षेत्र में पदार्पण से पहले/ क्योंकि / वक्त के सीने की तहरीर बनने को जरूरी है कदमबोसी।’’

वंदना जी बहुत सार्थक और मानवीय राजनैतिक समझ रखती हैं। वे समय की घड़कन और जीवन के बीच की फांक को भी बखूबी समझती हैं। इस पूरे संग्रह में स्त्री विमर्श विषयक कवितायें नहीं है यह आश्चर्यजनक हो सकता है पर यह सुखद है इसलिये कि एक स्त्री जीवन को उसकी समग्रता में देख समझ रही है और मानवीय विकृतियों को व्यापक संदर्भ में परिभाषित कर रही है। यह आधी आबादी में राजनैतिक चेतना के विस्तार का संकेत है। ऐसा नहीं है कि वंदना जी ने स्त्री विमर्श विषयक कवितायें नहीं लिखी हैं। इनके पहले के संग्रहों में बहुत सी गहरी समझ वाली कवितायें हैं।

अंत में कुछ और उम्मीद और निर्णय की चुनौती के साथ बात समाप्त करता हूँ - ‘‘सुनो / अब अपील दलील का समय निकल चुका है / बस फैसले की घड़ी है / तो क्या है / तुममें इतना साहस / जो दिखा सको सूरज को कंदील / हाँ हाँ आज हैवानियत के सूरज से ग्रस्त है मनुष्यता / और तुम्हारी कंदील ही काफी है / इस भयावह समय में रोश्नी की किरण बनकर / मगर जरूरत है तो सिर्फ / तुम्हारे साहस से परचम लहराने की / और पहला कदम उठाने की / क्या तुम तैयार हो।’’ हमें तैयार होना ही होगा इस प्रश्न के उत्तर में नहीं तो समय और स्थितियाँ हाथ से निकलती जायेंगी और शायद हम यह साहस दिखाने की स्थिति में ही न रहें। ऐसा वक्त आये उससे पहले परचम लहराना निहायत ही आवश्यक है।

डॉ. संजीव जैन
भोपाल

शनिवार, 6 जनवरी 2018

एक नज़र इधर भी




विश्व पुस्तक मेले में 7 जनवरी 2018 को मेरे नए कविता संग्रह 'गिद्ध गिद्दा कर रहे हैं' का विमोचन वनिका पब्लिकेशन के स्टॉल पर आदरणीय लक्ष्मी शंकर वाजपेयी जी, सुशील सिद्धार्थ जी और लालित्य ललित जी के करकमलों द्वारा होगा. आप सबकी उपस्थिति सादर प्रार्थनीय है :
वनिका पब्लिकेशन
7 जनवरी 2018
स्टॉल नंबर - 368
समय - 12 बजे
हाल नंबर - 12-12A

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

द्वन्द जारी है ...

क्योंकि
सत्य तो यही है
देते हैं हम ही उपाधियाँ
और बनाते हैं समाधियाँ
वर्ना क्या पहचान किसी की
और न भी हो तो क्या फर्क पड़ जायेगा
अंतिम सत्य तो यही रहेगा
कोई जन्मा और मर गया
छोड़ गया अपने पीछे अपनी निशानियाँ
गायक, चित्रकार, कवि, लेखक के रूप में

जो जिसने कहा
सिर झुका मान लिया
और जिसने नही माना
तो उसे भी किया स्वीकार नतमस्तक हो

कितना आसान होगा कहना एक दिन
जिसे दिए आपने ये नाम
और उसने किये स्वीकार - सप्रेम 

जो तुमने बनाया बनती गयी
जबकि नहीं पाया उसने कभी खुद को किसी गिनती में
कवयित्री , समीक्षक, उपन्यासकार
'वंदना गुप्ता इज नो मोर'
हृदयतल से दे श्रद्धांजलि
हो जाएगी एक और रस्म अदा

जबकि
हकीकत के आईने दुरूह होते हैं
जब देखती हूँ खुद को अनंत की यात्रा पर जाते
सोचती हूँ
बस यही था क्या जीवन का औचित्य?
एक दिन सिमट जायेगी जीवन यात्रा क्या सिर्फ इन चंद लफ़्ज़ों में ?

द्वन्द जारी है ...

रविवार, 8 अक्तूबर 2017

हम आधुनिकाएं

हम आधुनिकाएं
जानती हैं , मानती हैं
फिर क्यों संस्कारगत बोई रस्में
उछाल मारती हैं
प्रश्न खड़ा हो जाता है 
विचारबोध से युक्त संज्ञाओं पर प्रश्नचिन्ह लगा जाता है

हम आधुनिकाएं
निकल रही हैं शनैः शनैः
परम्पराओं के ओढ़े हुए लिहाफ से
जानते बूझते भी आखिर क्यों ढोती हैं उन प्रथाओं को
जो मानसिक और शारीरिक गुलामी का पर्याय बनें
तो हम आज की स्त्री
नहीं मानती पति को देवता
नहीं पूजती उसे
जानती हैं
नहीं बढती उम्र किसी व्रत उपवास से
साँसों की माला में नहीं बढ़ता एक भी मनका
किसी अंधविश्वास से

हम आज की नायिकाएं नहीं ढोतीं अवैज्ञानिक तथ्यों को
हम तो बनाती हैं नयी लकीर प्रेम और विश्वास की
जहाँ कोई बड़ा छोटा नहीं
जहाँ कोई मालिक गुलाम नहीं
यहाँ तो होता है भजन बराबरी का
यहाँ तो होता है कीर्तन आत्मविश्वास का
तभी तो धता बता सब परम्पराओं को
आज की आधुनिकाओं ने
खोज लिया है अपना 'मुस्कान-बिंदु'


बस खुद की ख़ुशी के लिए 
खुद पर मर मिटने के लिए
एक अलग से अहसास को जीने के लिए
बहती हैं कभी कभी बनी बनायी परिपाटियों पर
तो वो
न तो खुद का शोषण है
न ही मान्यताओं का पोषण
ये 'स्व' उत्सव है
ये हमारी मर्ज़ी है
ये हमारी चॉइस है 

वैसे भी बनाव श्रृंगार हमारा गहना जो ठहरा 
तो खुद पर मोहित होना हमारा अधिकार 

बाज़ारवाद महज उपकरण है हमारे 'स्व' को श्रृंगारित करने का
और करवा चौथ एक अवसर

सदियों के सड़े-गले कवच तोड़ 
आज
आत्ममुग्ध हैं हम आधुनिकाएं


हैप्पी करवाचौथ :) :)

बुधवार, 27 सितंबर 2017

भय के ५१ पन्ने

लड़ो स्त्रियों लड़ो
लड़ो कि अब लड़ना नियति है तुम्हारी

करो दफ़न
अपने भय के उन ५१ पन्नो को
जो अतीत से वर्तमान तक
फडफडाते रहे , डराते रहे
युग परिवर्तन का दौर है ये

अतीत और वर्तमान की केंचुलियों में से
तुम्हें चुनना है अपना भविष्य
आने वाली पीढ़ी का भविष्य
तो क्या जरूरी है
शापित युग से उधार ली ही जाएँ साँसें
क्यों नहीं खदेड़ती शापित युग की परछाइयों को

भविष्य की नींव के लिए जरूरी है
अपनी न और हाँ के अंतर को समझना
न केवल समझना बल्कि समझाना भी
ये युग तुम्हारा है
ये जीवन तुम्हारा है
ये देह तुम्हारा है
और भविष्य परछाइयों की रेत से नहीं बना करता
उसके लिए जरूरी है
उलटना आसमां को 



न मतलब न भी नहीं होता
न मतलब हाँ भी नहीं होता
न मतलब वो होता है जो उन्होंने समझा होता है
वो देंगे परिभाषा
और अपनी बनायी परिभाषाएं ही करेंगे इतिहास में वो दर्ज
तो क्या हुआ
कोई दुर्गा कह दे या काली
लड़की कहे दे या दे गाली
अंततः वर्चस्व स्थापित करने को
जरूरी है तानाशाही...जानते हैं वो

चलो बदल लो इस बार
उनके भय को अपने भय से
कि सलीब पर हर बार तुम ही चढो, जरूरी नहीं
इस बार जितना वो दबाएँ डराएँ धमकाएं
उतना तुम खुलो, खिलो और महको
कि
भयभीत हैं वो
तुमसे, तुम्हारी सोच से , तुम्हारी खोज से

वक्त ने दिया है ताबीज तुम्हारे हाथ में
अब तुम पर है
सिरहाने रख सोना चाहती हो
गले पहन इठलाना
या उसे खोल पढना

दहशत के आसमान में सुराख के लिए
जरूरी है जपना ये महामंत्र
लड़ो स्त्रियों लड़ो
लड़ो कि अब लड़ना नियति है तुम्हारी 


©वन्दना गुप्ता vandana gupta 

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

और दे दिया मुझे उपनाम विनम्र अहंकारी का

उसने कहा : आजकल तो छा रही हो
                  बडी कवयित्री /लेखिका बनने के मार्ग पर प्रशस्त हो

मैने कहा : ऐसा तो कुछ नही किया खास

                तुम्हें क्यों इस भ्रम का हुआ आभास
                मुझे मुझमें तो कुछ खास नज़र नहीं आता
                फिर तुम बताओ तुम्हें कैसे पता चल जाता

उसने कहा : आजकल चर्चे होने लगे हैं

                  नाम ले लेकर लोग कहने लगे हैं
                  स्थापितों में पैंठ बनाने लगी हो

मैने कहा : ऐसा तो मुझे कभी लगा नहीं

                क्योंकि कुछ खास मैने लिखा नहीं

वो बोला : अच्छा लिखती हो सबकी मदद करती हो

                फिर भी विनम्र रहती हो
                मैं बता रहा हूँ …………मान लो

मैं कहा : मुझे तो ऐसा नहीं लगता

             वैसे भी अपने बारे में अपने आप
             कहाँ पता चलता है
             फिर भी मुझसे जो बन पडता है करती हूँ
             फिर भी तुम कहते हो तो
             चलो मान ली तुम्हारी बात 

वो बोला : इतनी विनम्रता !!!!!!!

              जानती हो ……अहंकार का सूचक है ?
              ज्यादा विनम्रता भी अहंकार कहलाता है

मैं बोली : सुना तो है आजकल

              सब यही चर्चा करते हैं

तब से प्रश्न खडा हो गया है

जो मेरे मन को मथ रहा है
गर मैं खुद ही अपना प्रचार करूँ
अपने शब्दों से प्रहार करूँ
आलोचकों समीक्षकों को जवाब दूँ
तो अतिवादी का शिकार बनूँ
और विद्रोहिणी कहलाऊँ
दंभ से ग्रसित कह तुम
महिमामंडित कर देते हो
ये तो बहुत मुखर है
ये तो बडी वाचाल है
ये तो खुद को स्थापित करने को
जाने कैसे कैसे हथकंडे अपनाती है
बडी कवयित्री या लेखिका बनने के
सारे गुर अपनाती है
जानते हो क्यों कहते हो तुम ऐसा
क्योंकि तुम्हारे हाथो शोषित नही हो पाती है
खुद अपनी राह बनाती है और बढती जाती है
पर तुम्हें ना अपनी कामयाबी की सीढी बनाती है

तो दूसरी तरफ़

यदि जो तुम कहो
उसे भी चुपचाप बिना ना - नुकुर किये मान लेती हूँ
चाहे मुझे मुझमें कुछ असाधारण ना दिखे
गर ऐसा भी कह देती हूँ
तो भी अहंकारी कहलाती हूँ
क्योंकि आजकल ये चलन नया बना है
जिसे हर किसी को कहते सुना है
ज्यादा विनम्र होना भी
सात्विक अहंकार होता है


तो बताओ अब ज़रा
मैं किधर जाऊँ
कौन सा रुख अपनाऊँ
जो तुम्हारी कसौटी पर खरी उतर पाऊँ ?

जबकि मैं जानती हूँ
नहीं हूँ किसी भी रैट रेस का हिस्सा
बस दो घडी खुद के साथ जीने को
ज़िन्दगी के कुछ कडवे घूँट पीने को
कलम को विषबुझे प्यालों मे डुबोती हूँ
तो कुछ हर्फ़ दर्द के अपने खूँ की स्याही से लिख लेती हूँ
और एक साँस उधार की जी लेती हूँ
बताओ तो ज़रा
इसमें किसी का क्या लेती हूँ

ये तो तुम ही हो
जो मुझमें अंतरिक्ष खोजते हो
मेरा नामकरण करते हो
जबकि मैं तो वो ही निराकार बीज हूँ
जो ना किसी आकार को मचलता है
ये तो तुम्हारा ही अणु
जब मेरे अणु से मिलता है
तो परमाणु का सृजन करता है
और मुझमें अपनी
कपोल कल्पनाओं के रंग भरता है
ज़रा सोचना इस पर
मैने तो ना कभी
आकाश माँगा तुमसे
ना पैर रखने को धरती
कहो फिर कैसे तुमने
मेरे नाम कर दी
अपनी अहंकारी सृष्टि
और दे दिया मुझे उपनाम
विनम्र अहंकारी का ………सोचना ज़रा
क्योंकि
खामोश आकाशगंगाये किसी व्यास की मोहताज़ नहीं होतीं
अपने दायरों में चहलकदमी कैसे की जाती है ………वो जानती हैं


(कविता संग्रह 'बदलती सोच के नएअर्थ' में प्रकाशित) 
©वन्दना गुप्ता vandana gupta  
 

बुधवार, 6 सितंबर 2017

विधवा विलाप की तरह ...

मत बोलना सच
सच बोलना गुनाह है
बना डालो इसे आज का स्लोगन

रावण हो या कंस
स्वनिर्मित भगवान
नहीं चाहते अपनी सत्ता से मोहभंग
और बचाए रहने को खुद का वर्चस्व
जरूरी है
आवाज़ घोंट देना

आवाज़ जो बन न जाए सामूहिक प्रलाप
आवाज़ जिसके शोर से न उखड जाएँ सत्ता के खूँटे
आवाज़ जिसका और कोई पर्याय नहीं
जानते हैं वो

तो जरूरी था दमन
दमन के लिए नहीं होती कोई नियमावली
दमन आज के युग का क्रांतिकारी कदम है
तो कैसे ढूंढते हो उसमें कोई मर्यादा?

सुनो
वो जो रोज करते हैं बड़े बड़े घोटाले
नहीं मारी जातीं उन्हें गोलियाँ
वो जो रोज करते हैं बलात्कार
नहीं खौला करता किसी का खून
वो जो रोज धोखे को बना लेते हैं धर्म का पर्याय
नहीं कसी जातीं उनकी मुश्कें
इस चुप्पे समय के प्रलाप पर मत बहाओ आँसू
कि तुम आ ही नहीं सकते किसी खाते में
जब तक नहीं मिला सकते उनकी हाँ में हाँ

ये वक्त का कमज़ोर पक्ष है
राहू, केतु और शनि का दुर्लभ संयोग है
नहीं सुने या सराहे जायेंगे तुम्हारे नज़रिए 
सुन लो
ओ कलबुर्गी, दाभोलकर,पानसारे, गौरी लंकेश
वो नहीं करते लिंग भेद 
गर करोगे विद्रोह या प्रतिरोध
देशद्रोह की श्रेणी तैयार है तुम्हारे लिए

सच तो बस एक कोने में सिसकने को बेबस है
आओ सत्य का अंतिम संस्कार करें
एक एक मुट्ठी मिटटी डाल अपने हिस्से की
विधवा विलाप की तरह ...

शनिवार, 26 अगस्त 2017

इक गमगीन सुबह

इक गमगीन सुबह के पहरुए
करते हैं सावधान की मुद्रा में
साष्टांग दंडवत
कि
वक्त की चाबी है उनके हाथों में
तो अकेली लकीरें भला किस दम पर भरें श्वांस


ये अनारकली को एक बार फिर दीवार में चिने जाने का वक्त है

रविवार, 13 अगस्त 2017

बच्चे सो रहे हैं

बच्चे सो रहे हैं
माँ अंतिम लोरी सुना रही है

मत ले जाओ मेरे लाल को
वो सो रहा है
चिल्ला रही है , गिडगिडा रही है , बिलबिला रही है

उसके कपडे, खिलौने , सामान संवार रही है
सोकर उठेगा उसका लाल
तब सजाएगी संवारेगी
मत करो तुम हाहाकार
कह, समझा रही है

सुनिए ये सदमा नहीं है
हकीकत है
दर्द है
बेबसी है
हकीकत को झुठलाने की

क्योंकि
मौत तो एक दिन आनी ही होती है , आ गयी
जान जानी ही होती है , चली गयी
कर्णधारों के कान पर जूँ नहीं रेंगनी होती, नहीं रेंगी

फिर नाहक शोर मचाते हो
एक माँ रो रही है , रोने दो उसे
मनाने दो मातम उसे
उम्र भर के लिए
कि
बच्चों की बारात जो निकली है

ये माओं के सम्मिलित रुदन की घड़ी है
जाने क्यों फिर भी
आसमां नहीं फटा
खुदा भी नहीं रोया आज

शायद माओं से डर गया
गर दे दिया श्राप तो?

शायद इसीलिए
अब कंसों से मुक्ति के लिए नहीं जन्म लेते कन्हाई ...

शनिवार, 5 अगस्त 2017

ये बेहया बेशर्म औरतों का ज़माना है

कल तक बात की जाती थी फलानी को पुरस्कार मिला तो वो पुरस्कार देने वाले के साथ सोयी होगी .....आज जब किसी फलाने को मिला तो कहा जा रहा है उसे तब मिला जब वो देने वाली के साथ सोया होगा ........ये किस तरफ धकेला जा रहा है साहित्य को ? क्या एक स्त्री को कभी सेक्स से अलग कर देखा ही नहीं जा सकता? क्या स्त्री सिवाय सेक्स मटेरियल के और कुछ नहीं ? और तब कहते हैं खुद को साहित्य के खैर ख्वाह......अरे बात करनी थी किसी को भी तो सिर्फ कविता पर करते लेकिन स्त्री को निशाना बनाकर अपनी कुत्सित मानसिकता के कौन से झंडे गाड़ रहे हैं ये लोग?

छि: , धिक्कार है ऐसी जड़ सोच के पुरोधाओं पर ......जाने अपने घर की औरतों को किस दृष्टि से देखते होंगे और उनके साथ क्या व्यवहार करते होंगा......स्त्री सिर्फ जंघा के बीच आने वाला सामान नहीं ......किसी को भी किसी भी स्त्री का अपमान करने का अधिकार नहीं मिलता.......जब भी बात करिए उसके लेखन की करिए , उसके निर्णय की करिए न कि उस पर आक्षेप लगाइए ......वर्ना एक दिन यही स्त्रियाँ एकत्र हो कर देंगी तुम्हें साहित्य से निष्कासित .....फिर कोई कितना भी बड़ा साहित्य का दरोगा ही क्यों न हो .......अब समय आ गया है सबको एकत्र हो इसी तरह हर कुंठित मानसिकता को जवाब देने का ....

साहेब
ये बेहया बेशर्म औरतों का ज़माना है
जो नहीं आतीं जंघा के नीचे
फिसल जाती हैं मछली सी
तुम्हारी सोच के दायरे से

बेशक नवाज़ दो तुम उन्हें
अपनी कुंठित सोच के तमगों से
उनकी बुलंद सोच
बुलंद आवाज़
कर ही देगी खारिज तुम्हें
न केवल साहित्य से
बल्कि तुम्हें तुम्हारी नज़र से भी

ये आज की स्त्रियाँ हैं
जो नहीं करवातीं अब चीरहरण शब्दों से भी
और तुम तुले हो
एक बार फिर द्रौपदी बनाने पर
संभल कर रहना
निकल पड़ी है
बेहयाओं की फ़ौज लेकर झंडा
अपनी खुदमुख्तारी का

सुनो
बेहया शब्द तुम्हारी सोच का पर्याय है
स्त्री की नहीं
वो कल भी हयादार थी , आज भी है और कल भी रहेगी
बस तुम सोचो
कैसे खुद को बचा सकोगे कुंठा के कुएं में डूबने से
कि फिर अपना चेहरा ही न पहचान सको

सुनो
मर्यादा का घूँघट इस बार डाल कर ही रहेंगी ये स्त्रियाँ ...तुम्हारी जुबान पर
 
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©वन्दना गुप्ता vandana gupta