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मंगलवार, 21 मार्च 2017

रचनी हैं अब साजिशें

रचनी हैं अब साजिशें
स्वप्न तो बहुत देख दिखा चुके
ये वक्त का बदला लहजा है
जिस पर इंसानियत तलवों का उपालम्भ है
और साजिश एक आदतन शिकारी

चौतरफा बहती बयार में
जरूरी है बह जाना
जिंदा रहना जरूरत जो ठहरी आज की
हकीकतों के चिंघाड़ते जंगल
दे रहे हैं दलीलें
वक्त अपनी नब्ज़ बदल चुका है
तुम कब बदलोगे ?

आदर्शों उसूलों के धराशायी होते महल
कबीलों में बदलते जल जंगल और जमीन
ऊँची दुकान फीके पकवान समान
अब नहीं करते जिरह ...
हकीकतें दुरूह हुआ करती हैं
जानते हैं वो ....

सीख सको तो सीख लेना
स्वप्नों से बगावत करना
और साजिशों से दोस्ती करना
कि
ये समय की सबसे बड़ी साजिश है
कोई अठखेली नहीं ...
बदलाव के कबूतरों ने मुंडेरों पर उतरना छोड़ दिया है

साजिशें स्वप्नों का हिस्सा हों
या स्वप्न साजिश का
हलाक तुम्हें ही होना है अंततः ...
कहो अब किस ओर का साक्षी है तुम्हारा जमीर ?


क्योंकि
हर मुस्कराहट का अर्थ अलग हुआ करता है .........जानते हो न

बुधवार, 8 मार्च 2017

अघायी औरतें

मर्दों के शहर की अघायी औरतें 
जब उतारू हो जाती हैं विद्रोह पर 
तो कर देती हैं तार तार 
सारी लज्जा की बेड़ियों को 
उतार देती हैं लिबास हया का 
जो ओढ़ रखा था बरसों से सदियों ने 
और अनावृत हो जाता है सत्य 
जो घुट रहा होता है औरत की जंघा और सीने में 


अघायी औरतों के तिलिस्म 
यूँ ही नहीं टूटा करते हैं 
परिपक्व होने में बरसों 
मिटटी में ज़मींदोज़ होना पड़ता है 
फिर काटने और तराशने की प्रक्रिया से 
गुजरना पड़ता है 
तब कहीं जाकर अघायी औरत का 
स्वरुप निखरता है 
तब जाकर वो अपने तिलिस्म के 
भेदों को अनावरित करती है 
तब जाकर वो अपनी 
बुनियादों से निकलती है 
और करती है बेनकाब मर्दों के शहरों को 
करती है ध्वस्त बरसों से बनाये गए 
मर्दों के अहम् के किलों को 
जब होती है वो भी संलग्न 
मर्दों की बनायीं दुनिया के रिवाजों में 


अघायी औरत बनने के सफ़र में 
आते हैं जाने कितने जलज़ले 
सिल बनी बट्टे के मार में 
पिसती रहती हैं उसकी संवेदनाएं 
फिर चाहे चोट धड के निचले हिस्से पर हो 
या ऊपरी हिस्से पर 
आघात शारीरिक हो या मानसिक 
सहनशीलता के रक्त की अन्तिम बूँद तक 
करती है कोशिश 
मर्द के शहर की 
ईंट ईंट को जोड़े रखने की 
उसे स्थायित्व प्रदान करने की 
मगर जब मर्द की संवेदनहीनता का पाँव 
अंगद सा औरत के स्वाभिमान को ललकारता है 
उसे नेस्तनाबूद करने को लालायित होता है 
तब अघायी औरत उतार देती हैं खोल 
सदियों से ओढ़ी सभ्यताओं का 
कर देती हैं खुद को निर्वस्त्र 
उतार देती है लिबास 
मर्द और औरत के बेजान रिश्ते से 
खोल लेती है बाल तब तक 
जब तक न मर्दों के शहर पर 
बिजली बन न गिरती है ये 
जब खोलने लगती है उसके 
अतिक्रमण के पेंचों को कि
कैसे अमानवीयता चरम को छूती गयी 
जब उसने लड़की से औरत के सफ़र को तय किया था 
फिर चाहे उसका शारीरिक दोहन हुआ हो 
मानो बिछी है धरा चटाई सी 
और हल की फाँक उसकी अस्मिता पर गाड़ी हो 
और बो दिया गया हो बीज उसकी कोख में 
बिना सींचे , सहेजे , सहलाए 
फिर भी तिरस्कार , उपेक्षा की 
शिकार होती रही हो मानसिक शोषण के साथ 

आखिर कब तक ? 
कब तक स्वयं का दोहन होने दे 
कब तक मर्द के शहर की 
बेजुबान मिटटी बन धूल धूसरित होती रहे 
और जब हो जाती है 
दोहन और शोषण की पराकाष्ठा 
और सहने की अति कर देती है अतिक्रमण 
हर सीमा रेखा का 
तब 
अघायी औरतों का हल्ला, कानफ़ोडू शोर
कर देता है भंग शांति 
मर्दों के शहर के गली- कूचों की 

आखिर ये बोली कैसे ? 
कहाँ से सीखी जुबान ?
किसने दिया इसे कलम रुपी हथियार ? 
कैसे आया इसकी वाणी में व्यभिचार ?
कैसे छोड़ दी इसने अपनी मर्यादा ?
कैसे लांघ दी इसने लक्ष्मण रेखा ?
कैसे खोल रही है ये भेद 
ना केवल मर्द के शहर के 
बल्कि उसके गुप्त रास्तों पर भी 
कर रही है प्रहार 
कभी वाणी द्वारा तो कभी लेखन द्वारा 
कहाँ से पनपा इतना विद्रोह 
जो मर्द के शहर की दीवारें भरभराने लगीं 
आखिर कैसे ये इतनी उच्छ्रंखल हुयी 
जो मर्द के बिस्तर की 
सलवटें भी खोलने लगी 
वो बिस्तर जिसे वो जैसे चाहे जब चाहे 
अपनी सुविधानुसार 
ओढ़ा , बिछाया , लपेटा 
या तोडा मरोड़ा करता था 
मगर बिस्तर की सलवट के माथे पर 
ना कोई ख़म पड़ता था 
और मर्द अपने शहर का 
एकछत्र बादशाह बन 
जिसे चाहे जब चाहे 
अपने हरम की जीनत बना लिया करता था 
कैसे बर्दाश्त हो सकता था 
अघायी औरत का गुप्तांग पर वार 
जब खोलने शुरू कर दिए 
उसने मर्द के हरम के 
किवाड़ पर किवाड़ 
होने लगी मुखर 
बन गयी वाचाल 
और कह उठी वो भी 
उस किसी एक को , जो अपना सा लगा हो 
जिसमे पाया होता है 
उसने अपना स्वर्णिम संसार 
तब कह उठती है 
उसकी शोखी बेबाकी से 
काश वो मर्द तुम होते 
जिसके लिए कौड़ी में भी मैं बिक जाती 
तो भी आरती का दीया ही कहलाती 
काश तुम पहले मेरे जीवन में आये होते 
तो सम्पूर्णता पाने को 
इधर उधर न भटक रहे होते 
एक सम्पूर्ण मर्द से एक सम्पूर्ण औरत तब गुजरी होती 
कायनात के ज़र्रे ज़र्रे पर उस मोहब्बत की दास्ताँ उभरी होती 
देह की रश्मियाँ भी निखरी होतीं 
रूह की बेचैनी भी मोहब्बत के जलाशय में भीगी होती 
तो आज ना कोई अघायी औरत होती 


उफ़ ! आखिर किसने दिया 
अघायी औरत को ये अधिकार 
जो हो जाए तो इतनी मुखर 
इतनी वाचाल 
स्त्री पुरुष अन्तरंग संबंधों पर 
चलने लगी हो जिसकी कलम 
कैसे उसे होने दिया जाए इतना बेबाक 
कैसे उतारने दिया जाए उसे 
लज्जा के घूंघट को 
जो कर दे निर्वस्त्र 
मर्दों की पूरी सभ्यता को 
और होने लगते हैं 
उस पर तुषारापात 
बेमौसम गिराई जाती हैं 
उसकी मान मर्यादा और अस्मिता पर 
शब्दबाण रुपी बिजलियाँ 
काटने होते हैं 
अघायी औरत की 
सोच की उड़ान के पंख 
ताकि मर्द के शहर की 
निर्वस्त्र सभ्यता न हो जाए और निर्वस्त्र 
कुल्टा , कुलच्छिनी 
ख्याति पाने को आतुर 
होती हैं अघायी औरतें 
नवाजी जाती हैं इन विशेषणों से 
संज्ञा और सर्वनाम से परे 
विशेष विशेषणों से सुसज्जित 
अघायी औरतें बेपरवाह 
आखिर बना ही लेती हैं 
अपना एक शहर 
"अघायी औरतों का शहर " 
स्वतंत्रता , उन्मुक्तता , बेबाकी का शहर 
आज़ादी की सांस का शहर 
कुछ पल अपने साथ जीने का शहर 
हँसी की खिलखिलाहट का शहर 
और जब बसा लेती हैं 
शहर को खिलखिलाहट से 
तब उनके हौसले 
उनके जज्बे 
उनके साहस के आगे 
नतमस्तक हो जाता है 
मर्दों का शहर 
और स्वीकार कर ही लेता है उपादेयता अघायी औरतों की 
पूरे मनोयोग के साथ 
बस जरूरत होती है 
तो सिर्फ इतनी 
कि 
अघायी औरत पहला पत्थर अपने हाथ में उठा ले ………


बुधवार, 1 मार्च 2017

अंतिम विकल्प ...

मुझे दस्तकों से ऐतराज नहीं
यहाँ अपनी कोई आवाज़ नहीं
ये किस दौर में जीते हैं
जहाँ आज़ादी का कोई हिसाब नहीं

चलो ओढ़ लें नकाब
चलो बाँध लें जुबान
कि
ये दौर-ए-बेहिसाब है
यहाँ कोई किसी का खैरख्वाह नहीं

दांत अमृतांजन से मांजो या कोलगेट से
साँसों पे लगे पहरों पर
तुम्हारा कोई अख्तियार नहीं

आज के दर का यही है बस एकमात्र गणित
मूक होना ही है निर्विकल्प समाधि का प्रतीक
तो
शोर देशद्रोह है, राष्ट्रद्रोह है
हाथ ताली के लिए
मुँह खाने के लिए
सिर झुकाने के लिए
इससे आगे कोई रेखा लांघना नहीं
कि
सीमा रेखा के पार सीता का निष्कासन ही है अंतिम विकल्प ...

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

जी-मेल एक्सप्रेस मेरी नज़र से

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जी-मेल एक्सप्रेस अलका सिन्हा जी द्वारा लिखित उपन्यास किताबघर प्रकाशन से प्रकाशित है . अलका सिन्हा जी किसी परिचय की मोहताज नहीं इसलिए उनसे परिचित कराने की बजाय सीधे उपन्यास पर ही बात की जाए .
पुरुष विमर्श को केंद्र में रख लिखा गया उपन्यास पाठक को एक अलग ही दुनिया में ले जाता है . उपन्यास की शुरुआत धीमी गति से होती है तक़रीबन आधे से ज्यादा उपन्यास पढने तक पाठक समझ भी नहीं पाता आखिर लेखिका कहाँ ले जाना चाहती हैं या क्या कहना चाहती हैं. जैसे कोई रबड़ को खींच रहा हो बस इसी तरह यात्रा चलती जाती है लेकिन कहानी रफ़्तार तब पकडती है जब कहानी का मुख्य पात्र देवेन त्रिपाठी चेन्नई घूम कर वापस आता है तो सारी दुनिया ही बदल जाती है. अचानक कहानी एकदम ऐसे मोड़ पर मुड़ जाती है जो उसे रोचक बनाती है और फिर अंत तक ले जाकर ही रूकती है यानि यूँ लगा जैसे एक्सप्रेस गाडी में ही पाठक बैठ गया हो.
सबसे जरूरी है जी-मेल की व्याख्या क्योंकि आधा उपन्यास पढने तक यही प्रश्न अन्दर ही अन्दर उठता रहता है आखिर जी मेल से क्या तात्पर्य है लेखिका का ? तो जरूरी है सबसे पहले उसी का अर्थ जो लेखिका ने दिया है – जी मतलब जिगोलो और मेल मतलब मेल यानि पुरुष . तो यहाँ पाठक के प्रश्न को उत्तर मिल जाता है कि इसका किसी जीमेल जैसी ईमेल साईट से सम्बन्ध नहीं है लेकिन वहीँ एक प्रश्न उठता है जब एक तरफ खुद लेखिका लिख रही हैं जिगोलो यानि मेल प्रोसटीटयूट तो फिर अलग से मेल शब्द जोड़ने की जरूरत ही क्या थी? क्योंकि जिगोलो शब्द का प्रयोग ही मेल प्रोसटीटयूट के लिए होता है . शायद पाठक मन में उत्सुकता पैदा करने के लिए इस तरह का नाम दिया गया है यही लगा .
अब बात करते हैं उपन्यास की जहाँ मुख्य पात्र देवेन एक पुरानी डायरी दरियागंज से ले आता है और जब उसे पढना शुरू करता है तो उसमे कोड में लिखे अल्फाबेट को अपनी सोच के अनुसार मेल और फिमेल में ढाल लेता है और उन्हें अपनी सोच के अनुसार ढाल पढने लगता है और उसके साथ अपने ख्यालों की ज़िन्दगी भी जीने लगता है . अपनी ज़िन्दगी की असंतुष्टि के साथ फिर वो ऑफिस की हो या घर की . आधे से ज्यादा उपन्यास इसी उधेड़बुन में गुजर जाता है जहाँ उस डायरी के पात्र एक ज़िन्दगी जी रहे होते हैं तो दूसरी देवेन त्रिपाठी. लेकिन जैसे ही उपन्यास अपने अंत की ओर बढना शुरू करता है घटनाएं तेजी से रंग बदलती हैं तो नया ही संसार खुल जाता है जहाँ लेखिका ने जिगोलो क्यों बनते हैं पर प्रकाश डाला है. कैसे पुरुष शोषण होता है और वो जिगोलो बनने को बाध्य हो जाते हैं, पर बहुत ही गहराई से प्रकाश डाला है वहीँ साथ साथ स्त्री विमर्श का जो मुख्य बिंदु है उसे भी उजागर किया है. एक बहुत ही बोल्ड विषय जिस पर अक्सर बात कोई करना ही नहीं चाहता उस पर एक स्त्री ने लिखा ये बहुत साहस की बात है. स्त्री यौनिकता की बात करना वैसे ही हमारे समाज में गुनाह माना जाता है वहां इतनी मुखरता से न केवल स्त्री की यौनिकता की बात की गयी है बल्कि पुरुष की यौनिकता को भी विमर्श का हिस्सा बनाया है . पुरुष का भी बलात्कार होता है , उसका भी शोषण होता है कभी दैहिक कभी मानसिक लेकिन उस पर बात नहीं की जाती . उसी पर लेखिका ने ऐसे प्रश्नों को उठाया है. कैसे कॉलेज स्टूडेंट इस दलदल में फंसते हैं , कैसे जरूरतें उन्हें इसमें घसीटती हैं तो कुछ मौकापरस्त लोग उसका फायदा उठाते हैं एक एक पहलू पर लेखिका की कलम चलती गयी. एक आम इंसान जो घर और बच्चों के साथ अपनी आजीविका तक ही सीमित रहता है जब उसके सामने एक नया संसार खुलता है तो वो हतप्रभ हुए बिना नहीं रहता. लेकिन जब उस स्थिति को स्वीकार लेता है तो सहज भी हो जाता है ऐसा ही देवेन के साथ होता है. वहीँ लेखिका ने आध्यात्मिकता का पुट भी उपन्यास में दिया है तो दूसरी ओर देशभक्ति का जज्बा भी साथ चलता है . यानि ज़िन्दगी के तमाम पहलुओं को छूती हुई कहानी चलती है जैसा कि एक आम इंसान की ज़िन्दगी में होता है और फिर अचानक कैसे ज़िन्दगी करवट लेती है तो एक नयी दुनिया ही उसके सामने खुलती है और वो उसमे खुद को कुछ हद तक फंसा पाता है तो कैसा बेचैन महसूस करता है और फिर जब अपनों का भरोसा पाता है तो उसका आत्मविश्वास वापस आ जाता है फिर दुनिया से वो हर हाल में भिड सकता है यानी उसके माध्यम से मानो लेखिका कहना चाहती हो कि अपनों का साथ और विश्वास इंसान के लिए कितना आवश्यक है यदि उसमे कमी हो जाए या न मिले तो वो भटक सकता है और गलत राह भी पकड़ सकता है या फिर आत्महत्या तक का विचार करने लगता है. मानो इसी बहाने लेखिका ने परिवार के सहयोग की आवश्यकता पर तो बल दिया ही है वहीं इससे दूर रहने वालों के बिखराव को भी चिन्हित किया है .
यहाँ जरूरत नहीं कि हर पात्र का नाम लेकर लिखा जाए क्योंकि यहाँ पात्र गौण हैं बल्कि मुद्दा मुख्य है तो मुद्दे पर बात जरूरी है. इसलिए पात्रों के नाम न लेते हुए जरूरी है मुख्य समस्या पर ही ध्यान केन्द्रित किया जाए. कैसे ऑफिस आदि में काम होते हैं और कैसे स्त्री हो या पुरुष आगे बढ़ने के लिए एक दूसरे को जरिया बनाते हैं , हर पहलू पर लेखिका की कलम चली है जो यही सिद्ध कर रही है कि आज के युग में स्त्री हो या पुरुष , मौका मिलते ही एक दूसरे का शोषण करने से नहीं चूकते. फिर आखिर हम दोषारोपण करते ही क्यों हैं ? या फिर आज स्त्री समझ गयी है अपनी जरूरतों को तो उसने अपनी देह को माध्यम बनाया है लेकिन समझ नहीं पायी आखिर कहीं न कहीं अब भी उसी का शोषण किया जा रहा है बस उसका मानसिक दोहन कर. ऐसे मुद्दे उठा लेखिका तमाम स्त्री पुरुष विमर्श को उकेर रही हैं .
यदि कहानी के एक दो पहलुओं पर यदि ध्यान दें तो जब पाठक कहानी पढ़ रहा होता है तो जब देवेन अल्फाबेट को अपने मनानुसार मेल फिमेल में बांटता है जहाँ क्यू को क्वीना बना देता है तभी पाठक मन में प्रश्न उठता है कहीं लेखक गलत न साबित हो जाए और उल्टा अर्थ निकले उसका यानि वो फिमेल न होकर मेल हो और ऐसा ही अंत में होता है यानि कुछ बातें शुरू में ही पकड़ में आनी शुरू हो जाती हैं. वहीँ चरित नाम के पात्र को जब बीच कहानी से थोड़ी देर गायब कर दिया जाता है तब उसी पर शंका का बादल मंडराता है और वो भी सही सिद्ध होता है . यानि कुछ बातें बीच में समझ आने लगती हैं कि क्या हुआ होगा और क्यों?
वहीँ इस कहानी में जो शुरुआत में थोडा ज्यादा कहानी को घसीटा गया है यदि वो थोडा कम कर दिया जाता तो रोचकता कुछ ज्यादा बन जाती क्योंकि कुछ लोग तो शुरू के २५-५० पेज ही पढ़कर निर्णय ले लेते हैं आगे पढ़ा जाए या नहीं क्योंकि यदि कहानी पाठक को बाँध न पाए तो वो उसे छोड़ देता है . यदि इन बातों पर ध्यान देकर लिखा जाए तो और रोचकता बन जाती है और उपन्यास खुद को पढवा ले जाता है . वैसे देखा जाए तो ऐसा अक्सर लिखा जाता है लेकिन पाठक की रूचि का भी ध्यान जरूर रखा जाना चाहिए. उपन्यास वो जो खुद को खुद पढवा ले जाए.
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बाकी अंत में जब दो डायरियों का भेद खुलता है तो ये भी अपने में एक लेखिका के लेखन का कौतुक ही है . एक ऐसे विषय पर उपन्यास का लिखा जाना जिस पर बात तक करना जुर्म समझा जाता है लेखिका के साहस का परिचायक होते हुए भी एक जरूरी उपन्यास है जिस पर बात की जानी चाहिए. आखिर क्या कारण हैं जो पुरुष वेश्या उर्फ़ जिगोलो बनते हैं जबकि स्त्री वेश्या को हमारा समाज आसानी से स्वीकार लेता है लेकिन पुरुष वेश्या को नहीं. जाने कितने ही ऐसे प्रश्न मुँह उठाये समाज से उत्तर की अपेक्षा कर रहे हैं वहीँ कहीं कहीं उत्तर खुद भी दे रहे हैं मानो कह रहे हों ये सब आपकी ही देन है . आपने ही स्त्री पुरुष के बीच खाई उत्पन्न की उन्हें एक दूसरे की जरूरतों को जानने समझने नहीं दिया बल्कि स्त्री को प्रयोग की वस्तु बना दिया जिस कारण उससे इतर कोई कुछ समझ ही नहीं पाया जबकि स्त्री हो या पुरुष यौन जरूरतें दोनों की सामान होती हैं . दोनों को ही बराबर संतुष्टि की जरूरत होती है वो भी सिर्फ शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक भी . तभी पूर्ण संतुष्टि दोनों को मिलती है यही वो मुख्य बिंदु है जिस पर लेखिका ध्यान केन्द्रित कराना चाहती हैं. बेशक शरीर दोनों को मिल सकते हैं लेकिन पूर्ण संतुष्टि वहीँ मिलती है जब मानसिक लेवल दोनों का बराबर हो और दोनों ही एक दूसरे को पूर्ण रूप से संतुष्ट करने का प्रयास करें . बस इतना सा ही तो फ़साना है लेकिन ये इतना सा ही कोई समझना नहीं चाहता जिस कारण एक भटकाव कैसे समाज को उसकी आने वाली पीढ़ी को लील रहा है उसी को लेखिका कहना चाहती हैं. उपन्यास खुद को पढ़े जाने की मांग करने के साथ इस विषय पर विमर्श की मांग भी करता है . लेखिका बधाई की पात्र हैं जो उस विषय पर उपन्यास लिखा जिस पर अब तक चर्चा तक नहीं की जाती फिर उपन्यास लिखना तो दूर की कौड़ी ही हुई. उम्मीद है इसी तरह नए नए विषयों पर लिख लेखिका समाज को जागरूक करती रहेंगी और समाज के उस हिस्से पर वार करती रहेंगी जो कमजोर हो......शुभकामनाओं के साथ .

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

वही रजाई वही कम्बल

यहाँ तो वही रजाई वही कम्बल
गरीबी के उलाहने
भ्रष्टाचार के फरेब
जाति धर्म का लोच
वोट का मोच
लुभावने वादों का गुलदस्ता
प्यार मोहब्बत का वही किस्सा
कुछ नहीं बदला
कुछ नहीं बदलना

संवेदना संवेदनहीनता बहनों सी गलबहियाँ डाले कुहुकती
किसी मन में न पीली सरसों खिलती
ऐसे में
किस दौर से गुजरे कोई
जो सोच की आँख पर पर्दा डाल सके

और वो कहते हैं
कुछ नया कहो
क्या तोते हो तुम ?

तो आओ
कुछ अलग कुछ हट के
चलो तीसरी दुनिया की बात करें
कल्पना का सिरहाना बनाएं
ख्वाब के हुक्के को गुडगुडायें
हकीकत से नज़र चुराएं
फरमानों के ज़मीन पर फर्शी सलाम ठोकें
कि
अता हो जाए फ़र्ज़

अपने अपने मुल्क में
नमक का हक़ अदा करने का रिवाज़ मुख्तलिफ हुआ करता है 
 
सच कहने और मुस्कुराहटों के दौर किस देश में जिंदा हैं ... बताना तो ज़रा
बस खानाबदोशी पर जिंदा है रवायतें ...


सोमवार, 2 जनवरी 2017

मुझे रीतना था

उम्मीद के टोकरे में होकर सवार
आया नववर्ष मेरे द्वार
तो क्या हुआ

मुझे रीतना था , रीत गयी
वक्त ने जीतना था , जीत गया

एक नामालूम , बेवजह सा सपना था
टूटना था , टूट गया
ज़िन्दगी पाँव में पायल डाल जरूरी नहीं झंकार ही करे

मैंने उम्मीदों की शाख पर नहीं सुखाई अपनी हसरतें
क्योंकि
वक्त ने खार सा चुभना था , चुभ गया

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

धा धिन धिन धा ...

एक शहर रो रहा है
सुबह की आस में

जरूरी तो नहीं
कि
हर बार सूरज का निकलना ही साबित करे
मुर्गे ने बांग दे दी है

यहाँ नग्न हैं परछाइयों के रेखाचित्र
समय एक अंधी लाश पर सवार
ढो रहा है वृतचित्र
नहीं धोये जाते अब मलमल के कुरते सम्हालियत से
साबुन का घिसा जाना भर जरूरी है
बेतरतीबी बेअदबी ने जमाया है जबसे सिंहासन
इंसानियत की साँसें शिव के त्रिशूल पर अटकी
अंतिम साँस ले रही है
और कोई अघोरी गा रहा है राग मल्हार

इश्क और जूनून के किस्से तब्दील हो चुके हैं
स्वार्थ की भट्टी में 
आदर्शवाद राष्ट्रवाद जुमला भर है
और स्त्री सबसे सुलभ साधन

ये समय का सबसे स्वर्णिम युग है
क्योंकि 
अंधेरों का साम्राज्य चहुँ ओर से सुरक्षित है
फिर सुबह की फ़िक्र कौन करे


आओ कि
ताल ठोंक मनाएं उत्सव ...एक शहर के रोने पर 
धा धिन धिन धा ...

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

बुरी औरत हूँ मैं ...कहानी संग्रह

मित्रों
मेरा पहला कहानी संग्रह "बुरी औरत हूँ मैं" आप सब की नज़र विश्व पुस्तक मेले में APN PUBLICATION के स्टाल पर 8 जनवरी 2017 को हॉल संख्या 12ए, स्टॉल नंंबर 107 पर दिन में 3 बजे लोकार्पित होगा ..........आप सबकी उपस्थिति सादर प्रार्थनीय है . APN से ही मेरा पहला उपन्यास 'अँधेरे का मध्य बिंदु' आया था जिसे आपका बहुत प्यार मिला . उम्मीद है ऐसा ही प्यार मेरे पहले कहानी संग्रह को भी मिलेगा . 


APN के निदेशक Nirbhay Kumar जी की मैं अत्यंत आभारी हूँ जो उन्होंने मुझ पर अपना विश्वास बनाए रखा और अगला संग्रह छापने के लिए आग्रह किया . बस प्रकाशक और लेखक के रिश्ते में यही विश्वास आने वाले कल की सुखद उम्मीद है . ये रिश्ता इसी तरह कायम रहे यही कामना करती हूँ .
मित्रों Kunwar Ravindra जी की शुक्रगुजार हूँ जो उन्होंने जैसा मैं चाहती थी वैसा ही कवर बना इस कृति को जीवंत कर दिया . उन्हें जब भी जैसा कहा वैसा ही बनाते हैं , इतने सहज सहृदयी इंसान हैं . पहला कवर भी उन्होंने ही बनाया और अब ये दूसरा भी जो बुरी औरत को जस्टिफाई कर रहा है .

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

16 दिसम्बर

16 दिसम्बर हर साल आएगा और चला जाएगा
समय का पंछी एक बार फिर हाथ मल बिलबिलायेगा
मगर इन्साफ न उसे मिल पायेगा

स्त्रियाँ और इन्साफ की हकदार
हरगिज़ नहीं
चलो खदेड़ो इन्हें इसी तरह
कानून की दहलीज पर सिसका सिसकाकर
ताकि कल फिर कोई न दिखा सके ये हिम्मत

ये देश है वीर जवानों का अलबेलों का मस्तानों का
बस सिर्फ स्त्रियों का नहीं

चलो बदल लो इस बार खुदा अपना
सुना है वो बहरा है
जिसकी तुम अराधना करते हो

तारीखें बेशक खुद को दोहरायें
जरूरी नहीं
इन्साफ भी दोहराए जाए
संजय गीता मर्डर जैसे केस
रंगा बिल्ला जैसे अपराधी
और मिल जाए उन्हें सजा भी मनचाही सिर्फ चार साल में
जानते हो क्यों
तुम नहीं हो कोई बड़ी हस्ती या देशभक्त या ब्यूरोक्रेटिक संतान

आम जनता के दुखदर्द के लिए नहीं है ये पुख्ता समय ...

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

मन , एक बदमाश बच्चा

मन में जाने कितनी बातें चलती रहती हैं . कहीं कुछ पढो तो मन करता है कुछ चुहल की जाए लेकिन फिर लगता है छोडो , गीत बनाने के दौर गुजर चुके हैं ....आओ हकीकतों से करो सामना

ये मन , एक बदमाश बच्चा ,
छेड़खानी खुद करता है
खामियाज़ा
या तो दिल या आँखें उठाती हैं

'कहीं दूर जब दिन ढल जाए'
कितना ही गुनगुना लो नगमों को
मन के गीतों के लिए नहीं बने कोई अलंकार

जानते हुए हकीकतें
कलाबाजी खाने के हुनर से अक्सर
मात खा ही जाती हैं हसरतें
और ये , नटखट बच्चा
अपनी गुलाटियों से करके अचंभित
फिर ओढ़कर सो जाता है रजाई
कि
दर्द के रेतीले समन्दरों में डूबने को
दिल की कश्ती में
आँखों के चप्पू जो हैं
बिना मल्लाह के कब कश्तियों को मिला है किनारा भला !
 
बदमाश बच्चों की बदमाशियाँ
कहने सुनने का विषय भर होती हैं
न कि ओढ़ने या बिछाने का...