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रविवार, 9 दिसंबर 2018

उम्र के तीसरे पहर में मिलने वाले

ओ उम्र के तीसरे पहर में मिलने वाले
ठहर, रुक जरा, बैठ , साँस ले
कि अब चौमासा नहीं
जो बरसता ही रहे और तू भीगता ही रहे

यहाँ मौन सुरों की सरगम पर
की जाती है अराधना
नव निर्माण के मौसमों से
नहीं की जाती गुफ्तगू

स्पर्श हो जाए जहाँ अस्पर्श्य
बंद आँखों में न पलता हो
जहाँ कोई सपना
बस साथ चलने भर से तय हो जाता हो सफ़र
वहाँ जरूरी नहीं
उपासना के लिए गुठने के बल बैठना
और सजदा करना

गुनगुना उम्र की हर शाख को
हर पत्ते को
हर बेल बूटे को
कि महज यहीं रमण करती हैं
सुकून की परियाँ

और शब्द खो जाएँ सारे
किसी अनंत में उड़ जाएँ पंछी बन
सोचना जरा अब
मिलने का अर्थ
जीवन का अर्थ
तब
रूह और प्रकृति का नर्तन ही गूंजेगा दशों दिशाओं में
और मुकम्मल हो जायेगा सफ़र
एक अंतहीन मुस्कराहट के साथ

अंतिम यात्रा के श्लोक हैं ये .... याद कर लेना और गुनगुनाना
फिर
हसरतों के पाँयचों में लटके घुँघरूओं की झंकार हो जायेगी सुरीली इस बार ....




गुरुवार, 22 नवंबर 2018

कुछ_ख्याल_कुछ_ख्वाब

1
मेरे इर्द गिर्द टहलता है
कोई नगमे सा
मैं गुनगुनाऊं तो कहता है
रुक जरा 
इस कमसिनी पर कुर्बान हो तो जाऊँ
जो वो एक बार मिले तो सही
खुदा की नेमत सा
2
दिल अब न दरिया है न समंदर ...
तुम चीरो तो सही
शोख नज़रों के खंजर से
रक्स करती मिलेगी रूह की रक्कासा
उदासियों के उपवन में
3
आओ आमीन कहें
और मोहब्बत के ख्वाबों को एक बोसा दे दें
कि
रुख हवाओं का बदलना लाज़िमी है
4
न रास्ते हैं न ख्वाब न मंजिलें
कहो, कहाँ चलें
कि उम्र फ़ना हो जाए और मोहब्बत सुर्खरू
5
बिना किसी तालीम के हमने तो जी ली
कि
जो कायदों में बंधे
वो भला कैसी मोहब्बत

मंगलवार, 6 नवंबर 2018

राम तुम आओगे

राम क्या तुम आ रहे हो 
क्या सच में आ रहे हो 
राम तुम जरूर आओगे 
राम तुम्हें जरूर आना ही होगा 
आह्वान है ये इस भारतभूमि का 

हे मर्यादापुरुषोत्तम 
मर्यादा का हनन नित यहाँ होता है 
करने वाला ही सबसे बड़ा बिगुल बजाता है 
तुम्हारे नाम का डंका बजवाता है 
ये आज का सच है राम 
कहो, कैसे करोगे स्थापित फिर से 
मर्यादा का कलश?
जब तुम्हारे नाम पर यहाँ 
रोज लूटे जाते हैं जन के मन 

हे राम 
आज हर मन एक अयोध्या है 
हर घर एक अयोध्या है 
कहो, कैसे हर मन औ घर में 
करोगे विचरण 
साधोगे लगाम 
जब हर मन और हर घर में 
रावण रक्तबीज से उगा है 

राम तुम आओगे 
तुम जरूर आओगे 
तुम्हें आना ही होगा 
हम कह रहे हैं सदियों से 
और कहते रहेंगे 
आगे भी सदियों तक 
यहाँ अब पाला पड़ा है संवेदनाओं पर 
निज स्वार्थ से वशीभूत है हर राग 
ऐसे में कैसे होगा तुम्हारा पदार्पण 
जब कंटकाकीर्ण है पथ 
इस बार घायल फिर तुम्हें ही होना होगा 

राम ये त्रेता नहीं है 
कलयुग है 
क्या सच में तुमने हर मन और घर में विराजित 
रावण का अंत कर दिया है ?
क्या सच में तुम दीपोत्सव के हकदार हो?
प्रश्न तो उछाले ही जायेंगे 
क्या सह पाओगे 
या दे पाओगे उत्तर ?

शायद नहीं दे पाओ कोई उत्तर 
देख , इस युग की दीन हीन दशा 
कलयुग में राम नहीं आते 
सिर्फ राम के आने की आस उपजाई जाती है 
और उसी आस पर रक्तपात कर हित साधे जाते हैं 
क्योंकि 
हर बार तुम आ जाते हो एक पुकार पर 
और फिर चले जाते हो हित सधने पर 
समीकरण दुरुस्त रहता है उनका 

राम तुम्हारे नाम का 'पुआ' दिखा 
जीत लिए जाते हैं देश 
ऐसे में तय करो 
किस तरफ होगा तुम्हारा पदार्पण 
क्योंकि 
आना तुम्हारी नियति है 
और तुम आओगे 
फिर छद्म रूप में ही सही 

क्या देख पाओगे उनका बनाया अपना छद्म रूप ?

देखो राम 
तुम्हारे आने पर सम्पूर्ण अयोध्या है जगमग 
हाँ, तो आ रहे हो न ?

तो क्या हुआ जो छद्मता है आज तुम्हारा पर्याय ...

सोमवार, 29 अक्तूबर 2018

बुरा वक्त कहता है

बुरा वक्त कहता है
चुप रहो
सहो
कि
अच्छे दिन जरूर आयेंगे

सब मिटा दूँ, हटा दूँ
कि
आस की नाव पर नहीं गुजरती ज़िन्दगी

छोड़ दूँ सब कुछ
हो जाऊँ गायब
समय के परिदृश्य से
अपने दर्द की लाठी पकड़

फिर
वक्त खोजे मुझे और कहे
आओ न
मैंने संजोये हैं तुम्हारे लिए अच्छे दिन
तुम्हारे मनचाहे दिन
करो जो तुम करना चाहती हो
जियो जैसे जीना चाहती हो
हँसो जैसे हँसना चाहती हो
उडो जैसे उड़ना चाहती हो

और एक पूरी ज़िन्दगी जी जाऊँ मैं जीभर के
अपनी तमन्नाओं हसरतों और चाहतों का कोलाज बनाकर

सपना अच्छा है न ...
लड़की जो सिर्फ स्वप्न देखना ही जानती है बस

मंगलवार, 23 अक्तूबर 2018

जिसकी लाठी उसकी भैंस की तरह

हुआ करते थे कभी
चौराहों पर झगडे
तो कभी सुलह सफाई
वक्त की आँधी सब ले उड़ी

आज बदल चुका है दृश्य
आपातकाल के मुहाने पर खड़ा देश
नहीं सुलझा पा रहा मुद्दे
चौराहों पर सुलग रही है चिंगारी
नफरत की
अजनबियत की
आतंक की
जाति की
धर्म की
फासीवाद की

गवाह सबूत और वायरल विडियो
हथियार हैं आज के समय में
घटनाओं को पक्ष या विपक्ष में करने के
फिर झगडे पैदा करना कौन सा मुश्किल काम है

अब तयशुदा एजेंडों पर होता है काम
मानक तय कर दिए जाते हैं
देखकर मौसम का रुख
सत्ता और कुर्सी के खेल में
चौराहे शरणस्थली हैं
जमा भीड़ स्वयम कर देती है हिसाब किताब

सुलह सफाई बदल चुकी है
जोर जबरदस्ती में
जिसकी लाठी उसकी भैंस की तरह

ये बदलते वक्त के साथ बदलते देश का नया मानचित्र है ...



मंगलवार, 2 अक्तूबर 2018

चौराहे हमारी आरामस्थली हैं

आजकल हम उस चौराहे पर खड़े हैं
जिससे किसी भी ओर
कोई भी रास्ता नहीं जाता

एक दिशाहीन जंगल में
भटकने के सिवा
जैसे कुछ हाथ नहीं लगता
वैसे ही
अब न कोई पथ प्रदर्शक मिलता
यदि होता भी तो
हम नहीं रहे सभ्य
जो उसकी दिखाई दिशा में बढ़ लें आगे

लम्पटता में प्रथम स्थान पाने वाले हम
आजकल ईश्वर को भी
कटघरे में खड़ा कर देते हैं
तो कभी
उसके मंदिर के लिए लड़ लेते हैं
ऐसे सयानों के मध्य
कहाँ है सम्भावना किसी पथ प्रदर्शक की

पथ आजकल हम बनाते हैं
और हम ही जानते हैं
कितने घर चलेगा इस बार घोड़ा अपने कदम
बदल चुकी है चाल
आज घोड़े के ढाई घर की
फिर किस रीत पर रीझ
कोई बनेगा पथ प्रदर्शक

आज प्रासंगिक हो या नहीं
तुम स्वयं ही तय कर लेना
तुम और तुम्हारे विचारों से किसी को क्या लेना देना
हाँ, नोटों पर चमकती तुम्हारी तस्वीर
तोडती है आज प्रासंगिकता के हर कायदे को
जिसके दम पर
पैदा कर लिए जाते हैं आज
चवन्नी चवन्नी में बिकने वाले पथ प्रदर्शक

और हम
न इस ओर होते हैं न उस ओर
हम एक मोहरे से खड़े हैं
राजनीति के चौराहे पर
जिन्हें दशा का ज्ञान है न दिशा का
फिर चलना या जाना
जैसी क्रियायों से कैसे हो सकते हैं अवगत

चौराहे हमारी आरामस्थली हैं



हम कौन हैं -----तुमसे बेहतर कौन जानता होगा बापू !!!

©वन्दना गुप्ता vandana gupta 

बुधवार, 26 सितंबर 2018

मुद्दा ये है, कि हम प्यार में हैं

न जाने किसके अख्तियार में हैं
मुद्दा ये है, कि हम प्यार में हैं

वो कह दें इक बार जो हमको अपना
हम समझेंगे उनके दिल-ओ-जान में हैं

अब पराई अमानत है न परायेपन का भरम
कमाई है दिल की दौलत बस इस गुमान में हैं

नज़र तुम्हारी उठे या हमारी गिरे
मुद्दा अब अंखियों के ईमान में है

नज़र भर देखने की मोहलत किसे
बंदगी तो अब रुख के हर आयाम में है




मंगलवार, 11 सितंबर 2018

अदृश्य हमसफ़र मेरी नज़र में



आज एक हफ्ते बाद यहाँ वापसी हुई है. मम्मी एडमिट थीं उन्हें खून की उल्टियाँ हो गयी थीं लेकिन ईश्वर की कृपा से बहुत बड़ी बीमारी नहीं निकली और जो आई है उसके लिए प्रीकाशन लेनी होंगीं. अब भी तबियत पूरी तरह ठीक नहीं हुई है तो इसी वजह से साहित्य संसार से पूरी तरह कटी हुई थी. कुशल मंगल पता करने के लिए गंगा शरण सिंह जी का मेसेज आया, उन्हें मेरी अनुपस्थिति का आभास हुआ, जानकर अच्छा लगा, चलो कोई तो है जिन्हें हमारी कमी महसूस हुई  और एक दो मित्रों ने अपने काम से बात की. तो लब्बोलुबाब ये कि इसी बीच कल मेरे पास विनय पंवार जी द्वारा भेजा उनके द्वारा लिखित पहला उपन्यास "अदृश्य हमसफ़र" मुझे मिला. अब क्योंकि ये उपन्यास धारावाहिक रूप में लगभग आधे से ज्यादा हमने फेसबुक पर ही पढ़ा था तो अंत में क्या हुआ जानने की बेहद उत्सुकता थी. ये किसी भी किताब की खुशकिस्मती होती है यदि वो पाठक के हाथों में जाने पर एक बैठक में खुद को पढवा ले जाए और ऐसा ही कल हुआ. मम्मी थोडा ठीक थीं, सो गयी थीं तो हमें दो घंटे मिल गए और उपन्यास शुरू से दोबारा खुद को पढवा ले गया. लिखना तो मुझे पहले एक कहानी संग्रह पर था जिसके बारे में मैंने दस दिन पहले जिक्र भी किया था मगर अपनी अपनी किस्मत होती है . आज अभी टाइम मिला तो इस पर लिखने बैठ गयी.
अब बात करती हूँ उपन्यास की. इसमें तीन मुख्य किरदार हैं. अनुराग, ममता और देविका. हम अक्सर चाहते हैं हमें कोई ऐसा प्रेमी मिले जो हमें हमसे ज्यादा जान ले, हम कुछ सोचें उससे पहले उसे पूरा कर दे, हमारी इच्छा ही उसकी इच्छा हो. यानि प्रेम की उच्च स्तरीयता. जहाँ प्रेम है मगर उसका इजहार नहीं है. इजहार तो दूर की चीज किसी को अहसास तक न होने देना. अन्दर ही अन्दर प्रेम को इबादत जिसने बना दिया हो ऐसा ही किरदार है अनुराग, जिसे ममता के बाबा अपने साथ लेकर आते हैं और वो यहीं का होकर रह जाता है. वहीँ ममता, जो जब सात साल की बच्ची थी जिसे उसका आना और अपना स्नेह किसी और पर बाबा द्वारा लुटाना गंवारा नहीं होता. छत्तीस का आंकड़ा पनप जाता है ममता के अन्दर अनुराग के प्रति. वहीँ अनुराग कुशाग्र मेहनती और मर्यादा में रहने वाला लड़का. जिसे ममता पहली ही नज़र में भा जाती है यानि बचपन में पहली झलक से ही उसमें ममता के लिए एक सॉफ्ट कार्नर बन जाता है और फिर अपना पूरा जीवन सिर्फ ममता की ख़ुशी के लिए होम कर देता है बिना उसे बताये या किसी को भी बताये कि ममता की उसके जीवन में क्या जगह है.
प्रेम अपने सुगठित रूप में बहता है यहाँ. ममता की शादी हो जाना, उसके बच्चे होना और फिर पति का देहांत होने के बाद उनके पालन पोषण की जिम्मेदारी कुशलता से निबाहना, वक्त सब ममता को सिखा देता है क्योंकि शादी से पहले अपनी हर जरूरत के लिए जो लड़की अनुराग को मुंह देखा करती थी वो एक कुशल गृहणी और बिज़नस वूमेन का किरदार भी निभा जाती है. वहीँ इस उपन्यास के एक तीसरा कोण है देविका- अनुराग की पत्नी. यहाँ देविका का चरित्र कहीं किसी से जिसकी तुलना नहीं की जा सकती, ऐसा चरित्र है, जिसके लिए पति की ख़ुशी ही उसकी ख़ुशी है. उसके लिए पूरा जीवन तमाम करने वाली, सच जानते हुए भी कि उसके पति के जीवन में उसका कोई स्थान नहीं, वहां ममता विराजमान है. ये है प्रेम की उत्कट मीमांसा, जहाँ एक स्त्री, अपने पति के जीवन में दूसरी स्त्री को स्वीकार कर ले और वो भी ख़ुशी से. लेखिका ने यहाँ अपने लेखन के कौशल से पाठक को चमत्कृत कर दिया.
तीनो किरदार अपने अपने दायरों में बंधे मर्यादा की सीमा कभी क्रॉस ही नहीं करते. वहीँ इस उपन्यास को पढ़ते समय दो बातें ध्यान में आयीं. एक तो जैसे शुरू में उपन्यास चल रहा था उसे पढ़ते हुए फिल्म प्रेमरोग का ध्यान आया जिसमें नायिका को अहसास तक नहीं होता कोई उसे चाहता है, जैसा ऋषि कपूर चुपचाप कूच कर जाता है पद्मिनी कोल्हापुरे की शादी के बाद, उसकी विदाई का वो हिस्सा जैसे यहाँ भी वैसे ही प्रयुक्त हुआ हो लेकिन यहाँ उसे लेखिका ने एक अलग मोड़ दे दिया. वहीँ इस उपन्यास को जब धारावाहिक रूप से पढ़ रही थी तब साथ साथ जैसे मेरे धर्मवीर भारती का गुनाहों का देवता भी चल रहा था. वहां भी प्रेम इज़हार को तरसता है, लेकिन मूक इज़हार दोनों तरफ से होता है और फिर अपनी अपनी सीमा में बंधे सुधा का विवाह हो जाता है और चंदर उसके प्रेम में खुद को बर्बादी के कगार पर ले जाता है. वहीँ सुधा का किरदार वहां मजबूत होते हुए भी मजबूत नहीं रहता और एक तरह से जैसे वो खुद को ख़त्म ही कर लेती है और चंदर को विवाह के लिए मजबूर. पढ़ते पढ़ते यही ध्यान आ रहा था आखिर लेखिका इसे कहाँ ले जाकर अंत देगी क्योंकि बेहद साम्यता थी यहाँ भी दोनों उपन्यासों में. मगर यहीं लेखिका ने वो मोड़ दिया जिसके बारे में मैं 'गुनाहों का देवता' के लिए उम्मीद करती थी और जिसके बारे में मैंने ऐसे ही तर्क देते हुए अभी अपने समीक्षा संग्रह 'अपने समय से संवाद' में दिया है. जो पक्ष मजबूत हो उसे चाहिए दुसरे को जीने के लिए, आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे. यहाँ ऐसा ही होता है. उम्र के उस मोड़ पर जाकर प्रेम का इज़हार होता है जहाँ उसके बेशक कोई मायने न हों फिर भी एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान होता है. प्रेम जब शरीर के स्तर पर होता है तो वो वास्तव में सिवाय वासना के कुछ नहीं लेकिन जहाँ प्रेम शरीर से ऊपर उठकर एक इबादत बन जाए तो खुदा हो जाता है. यहाँ प्रेम की उसी दिव्यता को लेखिका ने प्रस्तुत किया है.
अब बात करते हैं उपन्यास के शीर्षक की तो वाकई उपन्यास का शीर्षक कितना सार्थक है ये पढ़कर जाना जा सकता है जहाँ अनुराग हर पल साए की तरह ममता की ढाल बना रहता है और ममता को पता भी नहीं होता. प्रेम प्रतिकार नहीं चाहता मानो इसी उक्ति को चरितार्थ किया है यहाँ अनुराग ने. वहीँ अंत में ममता के दिल में एक छोटा सा कोना पा जाना मानो प्रेम की सार्थकता है लेकिन यहाँ भी मूक है प्रेम, यहाँ भी कोई इज़हार नहीं, यहाँ भी एकतरफा स्वीकार्यता है. प्रेम की दिव्यता ही यही है मानो एकतरफा प्रेम की यदि कोई सही व्याख्या हो सकती है तो यही हो सकती है जहाँ दूसरे पक्ष को पता भी न चले और कोई अदृश्य रूप में हमसफ़र बन साथ साथ चलता रहे उम्र भर जैसे खुदा.
ज्यादा उपन्यास के बारे में खोलना सही नहीं इसलिए न उसके अंत के बारे में बताऊँगी और न ही कहानी के बारे में वर्ना रोचकता ख़त्म हो जाएगी. लेकिन उपन्यास में पठनीयता का गुण है तो लेखिका में किस्सागोई का. तभी उपन्यास खुद को इतने कम समय में दोबारा पढवा ले गया. चूँकि लेखिका का पहला उपन्यास है तो उस लिहाज से एक अच्छी कोशिश की है जो सराहनीय है. बाकी संभावनाएं तो अनंत होती हैं किसी भी लेखन में और पाठकों के जेहन में. पाठक तो और और और की दरकार रखता है यानि ये भी होता या ऐसा भी होता मगर किसी भी अगर मगर की यहाँ जरूरत नहीं. रोचकता पाठक को अपने पाश में बांधे रखती है और यही किसी भी लेखन का सबसे जरूरी तत्व होता है. लेखिका को पहले उपन्यास के लिए अनंत शुभकामनाएं. उम्मीद है पाठकों को आगे भी उनकी कलम इसी तरह नवाजती रहेगी.