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शुक्रवार, 6 जनवरी 2023

मंगलाचरण

 

मैंने अक्सर छोड़ा हर वो रास्ता
जिससे दूसरे को तकलीफ हुई
छवि मेरी यूँ बनती बिगड़ती रही
क्योंकि
छवियाँ बनती ही टूटने के लिये हैं

पलायन नहीं था ये और न होगा
बस फितरत है
खुद को बदलने की
एक नयी राह पर चलने की
अकेले, बिल्कुल अकेले
कि
नहीं निभाए जाते झूठ फरेब के रिश्ते
कि
पेट में उगी दाढ़ियों से नहीं बना सकती द्वार पर तोरण
कि
तुम्हारे गणित से नहीं मिल सकता कभी मेरा गणित

तुम्हारी भीड़ से भरा है हर गली मोहल्ला हर चौराहा
मुझे नहीं चाहिए तुम्हारे मध्य अपने लिये स्थान
मैं बनाती हूँ हर बार अपने लिये अपना स्थान
पाती हूँ एक नया मुकाम
और तुम हर बार
चेहरे बदल काटते हो मेरी राहें
सिलसिला है कि खत्म ही नहीं होता

मैंने न सड़क पर चलना छोड़ा है और न ही पकड़ी है पगडंडी
मेरी अपनी गति है और अपना लक्ष्य
चयनित मार्ग ही तय करते हैं अक्सर मंज़िलें मगर
तुम काटोगे जितनी बार मेरे हाथ
बंद करोगे जितनी बार द्वार
मंज़िलें स्वयं बनाएंगी मेरे लिये नयी राहें
जाना है जब से
मुस्कुराहट के फूल उछाल देती हूँ आसमाँ की तरफ

ये मेरी यात्रा है
अंतिम पड़ाव नहीं
जो दो दो हाथ करने पर निर्धारित हो जीत हार
जीने का हुनर जरूरी नहीं मरकर ही सीखा जाए
मैंने यथार्थ के गिट्टों से जीती हैं बाजियाँ
और इस बार भी विदाईगीत मुझे ही गाना है
नियति ने पकड़ी हुई है मेरी ऊँगली
तय कर रही है दिशा
हर बार की तरह
मुड़ना है फिर मुझे एक नए मोड़ पर
एक नयी यात्रा का मुसाफिर बन

सुप्रभात से आरम्भ दिन का अंत शुभरात्रि ही हुआ करता है एक नए आरम्भ हेतु
मंगलाचरण इसे ही कहते हैं

सोमवार, 14 नवंबर 2022

धधकती ज्वाला






चाहत की बाँझ कोख


 

काश! मुझमें मोहब्बत बची होती
कुछ तुझे दे देती कुछ मैं जी लेती
जैसे खारे समंदर में गुलाब नहीं खिला करते जानाँ
वैसे ही आँखों में उगी नमी से नहीं की जा सकतीं दस्तकारियाँ
सीने के तूफान ने अश्रुओं से किया है प्रणय
अब जुगलबंदी पर नृत्यरत है उम्र की कस्तूरी
बताओ अब
किस सीप से मोती निकाल
करूँ मोहब्बत का श्रृंगार
मैंने अंतिम क्षण तक तुझे
न देखने की
न मिलने की
न चाहने की
कसम खायी है
चाहत की बाँझ कोख में नहीं रोपे जा सकते कभी बीज मोहब्बत के

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2022

स्त्री की जुबान

 

1
मैंने खुद से प्यार किया और जी उठी
अब तुम ढूँढते रहो स्त्री होने के अनेक अर्थ शब्दकोशों में
देते रहो अनेक परिभाषाएं
करते रहो व्याख्याएं
तुम्हारी स्वप्निल दुनिया से परे
मैंने पा लिया है अपने होने का अर्थ

2
मेरी पहली छलांग से तुम्हारी आँखों की गोटियाँ बाहर निकल आयीं
सोचो ज़रा
आखिरी छलांग से नापूँगी कौन सा ब्रह्मांड

3
समय की धारा ने बदल लिया है चेहरा
दे रही है एकमुश्त मुझे मेरा हिस्सा
तो
बदहवासी की छाया से क्यों ग्रसित है मुख तुम्हारा
प्रकृति स्वयमेव लाती है संतुलन सृष्टि में
जो मेरा था मुझे मिल रहा है


4
तुम्हारी एक भृकुटि से थरथराता था सारा जहान
आज मेरी एक फूँक से हिल जाता है तुम्हारा आसमान
वक्त वक्त की बात है बस


5
तिर्यक रेखाओं के गणित जान गयी हूँ
जब से
तुम्हारी आँख की किरकिरी बन गयी हूँ तब से
है साहस तो उठाओ गांडीव
चढ़ाओ प्रत्यंचा
भेदो मेरे अंतरिक्ष को
मैंने नहीं खींची है कोई लक्ष्मण रेखा जिसे तुम लांघ न सको
एक स्त्री की जुबान है ये




मंगलवार, 16 अगस्त 2022

लठैत - बकैत

 


शर्मा जी: नमस्कार वर्मा जी

 
वर्मा जी: नमस्कार शर्मा जी

 
शर्मा जी: कहाँ थे इतने दिनों से?


वर्मा जी: हैं तो यहीं लेकिन अदृश्य हैं जी

 
शर्मा जी : वह क्यों? क्या आप भी भगवान बन गए हैं?


वर्मा जी: अब हमें कौन पढता है जी, तो अदृश्य ही रहेंगे न

 
शर्मा जी: अजी नहीं आप तो छाये हुए हैं.

 
वर्मा जी: आप हकीकत नहीं जानते वर्ना ऐसा न कहते. आज कोई किसी को पढना ही नहीं चाहता. पाठक न जाने कहाँ गायब हो गए हैं? लेखकों की अलग रामलीला चलती रहती है ऐसे में हम जैसों को अदृश्य होना ही पड़ता है जिनका न कोई गढ़ है न मठ, जिनके न कोई लठैत हैं न बकैत. 

शर्मा जी: अजी छोडिये भी ये रोना.पाठकों की कमी के दौर में लेखक ही पाठक हैं आज. वे भी बंटे हुए हैं. सबके अपने मठ गढ़ विचारधाराएँ हैं. जब इतने विभक्त होंगे तब एक लेखक को कौन पढ़ेगा यह प्रश्न उठता है. सच्चा पाठक आज के दौर में दुर्लभ होता जा रहा है. यदि गलती से कोई सच्चा पाठक है भी और यदि उसने कुछ कटु कह दिया तो वह लेखक को स्वीकार्य नहीं. वहीँ एक लेखक यदि दूसरे लेखक के लेखन के विषय में कुछ कह दे तो भी तलाक निश्चित है. ऐसे में गिने चुने ही लेखक बचते हैं जो दूसरे लेखकों को पढ़ते हैं.

 सबके पास अपना एक दोस्तों का गुट होता है, वही पढ़ते हैं, वही सराहते हैं और आगे बढ़ जाते हैं. कुछ अन्य ग्रुप के लेखक यदि किसी लेखक को पढ़ते हैं तभी वह लेखक भी उस लेखक को पढता है यानि आदान प्रदान का दौर है ये जहाँ यदि आप किसी को पढेंगे तभी वह आपको पढ़ेगा. अब होता यह है कि जैसे ही किसी लेखक की कोई नयी किताब आती है बधाइयों का तो तांता लग जाता है लेकिन किताब पढने वालों का या तो अकाल पड़ जाता है या फिर उन पर पाला पड़ जाता है जब कोई यदि पाठक हो, वह भी लेखन के क्षेत्र में अपनी टांग अड़ा दे. सब एक दूसरे तक अपनी किताब की सूचना पहुंचाने में लग जाते हैं. कुछ जो पढना चाहते हैं खरीद लेते हैं, पढ़ भी लेते हैं लेकिन उस पर कुछ कहते नहीं क्योंकि उन्हें अपने गुट से निष्कासित नहीं होना होता. वहीँ कुछ हाँ जी हाँ जी कहते हुए उसी गाँव में रहने लगते हैं लेकिन न खरीदते न पढ़ते. अब ऐसे में शिकायतों का दौर अपने चरम पर रहता है. 

कुल मिलाकर इतना सब कहने का बस यही हेतु है यदि आप स्वयं को पढवाना चाहते हैं, आप भी लेखक हैं तो आपको भी पाठक बनना होगा, औरों को पढना होगा अन्यथा एक दिन सभी अपनी अपनी ढपली और अपना अपना राग बजाते रह जायेंगे क्योंकि मूर्ख यहाँ कोई नहीं है. सभी रोटी खाते हैं तो इतनी अक्ल तो रखते ही हैं कि आप हमें पढेंगे तभी हम आपको पढेंगे, आप हम पर लिखेंगे तभी हम आप पर लिखेंगे और यदि गलती से आपने किसी किताब पर कुछ न कहा तो हम आपका बहिष्कार कर देंगे फिर आप चाहे कितना ही अच्छा लिखते हों, सारे पुरस्कारों सम्मानों से आपका दामन भरा हो. 

बाकी कुछ ऐसे भी हैं जो स्वयं लेखक होते हैं और बेचारे इस आस पर दूसरों को पढ़ते हैं शायद वो भी हमें पढ़े और दो शब्द हम पर कहे लेकिन उसके सभी प्रयत्न व्यर्थ चले जाते हैं और वे बेचारे आसमान के तारे गिनते ही रह जाते हैं. 

जब ऐसा लेखन का दौर चल रहा हो वहां साहित्य की गति की किसे चिंता. पहले अपनी चिंता कर ली जाए और जीते जी मोक्ष प्राप्त कर लिया जाए, उसके बाद देख लिया जाएगा साहित्य किस चिड़िया का नाम है. आज का दौर नयी भाषा, नए शब्द, नयी विधा गढ़ने का दौर है इसलिए जो भी लिखेंगे सब मनवा लेंगे, स्वीकार करवा लेंगे, वे जानते हैं. बस पहले अपनी गोटी सेट कर ली जाए फिर तो पाँचों घी में ही रहेंगी इसलिए बस यही अंतिम पहलू बचा है जिस पर आज बुद्धिजीवी काम करने में जुटे हैं वर्मा जी.

शर्मा जी: ओह! यानि अब हमें भी इस मार्ग पर चलना पड़ेगा?

वर्मा जी: यह तो आप पर निर्भर करता है कछुआ रहना है या खरगोश. बाकी इस डगर पर चलने के लिए अब आप सोचिये आपको क्या बनना है केवल लेखक या साथ में पाठक भी ...इसलिए जो हाथ में हैं उन्हें बचा सको तो बचा लो. 


डिस्क्लेमर: पिछले कई महीनों से बहुत से लेखकों से बात हुई और उनकी पीड़ा जानी समझी तो सोचा उस पर कुछ प्रकाश डाल दिया जाए संभव है किसी का मार्गदर्शन हो, किसी को राहत मिले और कोई यह पढ़कर और खफा हो ले लेकिन अपुन क्या करें जी साहित्य जगत की सेहत दुरुस्त करने के लिए लेखनी कभी कभी पंगे लेने से चूकती ही नहीं - इसे भी ऊँगल करने में ही मज़ा आता है - हाँ नहीं तो 😜😜😎😎

मंगलवार, 26 जुलाई 2022

नए सफ़र की मुसाफिर बन ...

 


मेरे सीने में कुछ घुटे हुए अल्फाज़ हैं जिनकी ऐंठन से तड़क रही हूँ मैं
मगर मेघ हैं कि बरसते ही नहीं,
वो जो कुरेद रहा है जमी हुई परतों को
वो जो छील रहा है त्वचा पर पसरे अवसाद को
जाने कहाँ ले जाएगा, किस रंग में रंगेगा चूनर
मेरा हंस अकेला उड़ जाएगा
और मैं हो जाऊँगी असीम ... पूर्णतः मुक्त

ॐ शांति ॐ शांति ॐ शांति कहने भर से छूट जायेगा हर बंधन
उस पार से आती आवाजें ही करेंगी मेरा स्वीकार और सबका परिहार
ये अंतिम इबादत का समय है
रूकती हुई धडकनों की बांसुरी से अब नहीं बजेगी कोई धुन
घुटते गले से नहीं उचारा जाता राम नाम
बस आँखों के ठहरने भर से हो जाएगा सफल मुकम्मल

बहुत गा लिए शोकगीत
बस गाओ अब मुक्ति गीत
देह साधना पूर्णता की ओर अग्रसित है

तुम्हारा रुदन मेरी अंतिम यात्रा की अंतिम परिणति है
और मैं बैठी हूँ पुष्पक विमान में
नए सफ़र की मुसाफिर बन ...


 

रविवार, 24 जुलाई 2022

कलर ऑफ लव

 

सादर सूचनार्थ: 

भारतीय ज्ञानपीठ-वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित मेरे उपन्यास 'कलर ऑफ लव' का दूसरा संस्करण अब अमेज़न पर उपलब्ध है। नीचे दिए लिंक से आप किताब मँगवा सकते हैं और अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया से अवगत भी करवा सकते हैं :

https://www.amazon.in/dp/9355182597?ref=myi_title_dp


गुरुवार, 30 जून 2022

इश्क मैं क्यों करया...

 


खामोशी के पग में खामोशी के घुंघरू
अब न मोहब्बत की आहट पर खनकते हैं
ये वो बिखरे दरिया हैं जो खामोशियों मे ही भटकते हैं

तुम ले गए इक उम्र चुराकर मुझसे
अब मलाल की उम्र तक जीना है मुझको
कि नाकाम मोहब्बत का फलसफा कौन लिखता है

अब न कोई खुदा बचा न फ़रियाद
बस एक उदासी का जंगल है
गले लग रोने को न सागर है न साहिल

इश्क मैं क्यों करया...

शनिवार, 21 मई 2022

अमर होने के लिए जरूरी नहीं अमृत ही पीया जाये

आह !मेरी रोटियाँ अब सिंकती ही नही 
आदत जो हो गयी है तुम्हारे अंगारों की 
हे! एक अंगार तो और जलाओ 
अंगीठी थोड़ी और सुलगाओ 
ज़रा फूंक तो मारो फूंकनी से 
ताकि कुछ तो और तपिश बढे 
देखो तो ज़रा रोटी मेरी अभी कच्ची है ……
पकने के लिये मन की चंचलता पर कुछ ज़ख्मों का होना जरूरी होता है ……देव मेरे!

अमर होने के लिए जरूरी नहीं अमृत ही पीया जाये

बुधवार, 2 मार्च 2022

शाश्वत किन्तु अभिशप्त सत्य

 

वास्तव में हम जंगली ही हैं
लड़ना हमारी फितरत रही
'सभ्य' कहा जाना
हमारा ओढा हुआ नकाब है

खिल जाती हैं हमारी बांछें
जब भी होता है मानवता का ह्रास
युद्धोन्माद से ग्रस्त जेहन दरअसल क्रूरता और अमानवीयता के गरम गोश्त खाकर नृत्यरत हैं
अट्टहास से कम्पित है धरती का सीना

प्रेम के विभ्रम रचते
हम इक्कीसवीं सदी के वासी
दे रहे हैं एक नयी सभ्यता को जन्म
जहाँ आँसू, दुःख, पीड़ा, क्षोभ शब्द किये जा चुके हैं खारिज शब्दकोष से
यही है आज के समय की अवसरवादी तस्वीर

जद में आने वाले बालक हों, जवान या बूढ़े
क्षत विक्षत चेहरे
बिखरे अंग प्रत्यंग साक्षी हैं
लालसा के दैत्य ने लील लिया है मासूमियत को
लगा दिया है ग्रहण
एक चलते फिरते हँसते खेलते खुशहाल देश को
तबाही के निशानों के मध्य 
देश का नाम मायने कहाँ रखता है? 

उजड़े दयार कैसे लिखेंगे कहानी
जहाँ बह रहा है खून का दरिया
किस माँ के सीने को बनायेंगे कागज़ 
कैसे बनायेंगे लहू को स्याही
किस कलम को बनायेंगे हथियार
जब बित्ते भर जमीन भी न बची हो खड़े होने को
जब कहानी लिखने को बचा न हो जहाँ कोई 'इंसान'
चीखों से दहल रहा हो जहाँ आसमान
और आंसुओं के नमक से चाक हो धरती का सीना
वहाँ के इतिहास को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं

देवासुर संग्राम हो या महाभारत का युद्ध
प्रथम विश्व युद्ध हो या द्वितीय
हो तृतीय, चतुर्थ या पंचम 
हर दौर में खोज ही लेते हैं अपनी प्रासंगिकता
आज सर्वशक्तिशाली होने की हवस में बिला गयी मानवता
वास्तव में हम जंगली ही हैं
लड़ना हमारी फितरत रही
यही है शाश्वत किन्तु अभिशप्त सत्य
इस भूमंडल का

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2022

अब पंजाबी में

सिन्धी में कविता के अनुवाद के बाद अब पंजाबी में "प्रतिमान पत्रिका" 

में 
मेरी कविता " हाँ ......बुरी औरत हूँ मैं " का अनुवादप्रकाशित हुआ है 

सूचना तो अमरजीत कौंके जी ने पहले ही दे दी थी मगर मन सही नहीं 

था इसलिए नहीं लगा पायी 
.........हार्दिक आभार‪#‎amarjeetkaunke
 ji 



सोमवार, 4 अक्तूबर 2021

कलर ऑफ़ लव

 सूचनार्थ:

भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित मेरा नया उपन्यास "कलर ऑफ़ लव" जो प्रकृति प्रदत्त विशेष गुण पर केन्द्रित है, वह विशेषता क्या है, जानने के लिए किताब पढ़ें.
संपर्क सूत्र: 9350536020, 011- 24626467, 011- 41523423
आवरण : प्रिय अनुप्रिया के हाथों का जादू 🙂 🙂

बुधवार, 4 अगस्त 2021

कांस्य प्रतिमा

 शब्दविहीन मैं किस भाषा में बोलूँ अर्थ संप्रेषित हो जाएँ

रसहीन मैं
किस शर्करा में घुलूं
स्वाद जुबाँ पर रुक जाए

रंगहीन मैं
किस रंग में ढलूँ
केवल एक रंग ही बच जाए

गाढे वक्त के एकालाप से लिखी कांस्य प्रतिमा हूँ मैं

शुक्रवार, 11 जून 2021

बख्श दो

 बख्श दो काल बख्श दो अब तो

जैसे पेड़ों से झरती हैं पत्तियां पतझड़ में
जैसे टप टप टपकते हैं आंसू पीड़ा में
जैसे झरता है सावन सात दिन बिना रुके
कुछ ऐसे लील रहे हो तुम जीवन

वो जो अभी बैठा था महफ़िल में
बीच से उठ चला जाता है अचानक
मगर कहाँ और क्यों?
क्यों जरूरी है महफ़िलों को तेज़ाब से नहलाना?
क्यों जरूरी है हँसते चेहरों पर खौफ की कहानी लिखना?
क्यों जरूरी है मासूमों के सर से साया उठाना?

किसी का जाना, केवल जाना नहीं होता
वो ले जाता है अपने साथ
जीवन के तमाम रंग, खुशबुएँ और गुलाब
पथरीले पथ, काँटों की सेज और ज़िन्दगी की तपिश से
कौन सी नयी इबारत लिखोगे?

चाक दिल से निकलता है बस यही
काल के क्रूर चेहरे पर कोई रेशम फहरा दो
इसे किसी और ब्रह्माण्ड का रास्ता दिखा दो

बस बहुत हुआ - अब रुकना चाहिए ये सिलसिला
बख्श दो काल बख्श दो अब तो

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

भारत का नाम कब बदलने वाला है?

 भारत का नाम कब बदलने वाला है?

कब 'उनका' नाम दिए जाने का शुभ मुहूर्त निकला है?
प्रश्न उठने लाजिमी हैं
चरणबद्ध तरीके से परिवर्तन किये जाते हैं ताकि कल कोई उन पर आक्षेप न लगाए
नाम बदलने की परंपरा में अब आवश्यक हो गया है देश का नाम भी बदल दिया जाए.
विश्वगुरु की पंक्ति में अग्रणी होने के लिए आवश्यक है नाम को कुर्बान करना. क्या देश उनके लिए इतना सा त्याग नहीं कर सकता?
खबरदार जो किसी ने आवाज़ उठायी, देशद्रोही कहीं के...
देखा नहीं आज सम्पूर्ण विश्व जयजयकार कर रहा है
आओ नाम बदलने की परंपरा को कायम रखते हुए एक देश को महादेश बनाया जाए
ईश्वर की मूर्ति स्थापना हेतु आवश्यक है मंदिर निर्माण
मंदिर बनने के बाद आवश्यक है उसका नामकरण
जिस देवता को स्थापित किया जाता है
उसी के नाम पर मंदिर का नामकरण होता है - सर्वविदित तथ्य है यह
आओ देव पूजन कर स्वयं को लाभान्वित करें
ईश्वर की प्रसन्नता में ही भक्तों की प्रसन्नता निहित होती है
यह है जीते जी मुक्ति की परंपरा में नया चरण
आओ करें नमन

सोमवार, 14 दिसंबर 2020

इंसान


इंसान
तुम्हारी फुफकार से भयभीत हैं
आज सर्प भी
ढूंढ रहे हैं अपने बिल
क्योंकि जान गए हैं
उनके काटने से बचा भी जा सकता है
मगर तुम्हारे काटे कि काट के अभी नहीं बने हैं कोई मन्त्र
नहीं बनी है कोई वैक्सीन

हे विषधर
तुम्हारे गरल से सुलग रही है धरा
तो ये नाम आज से तुम्हारा हुआ
सर्पों ने त्याग दिया न केवल नाम
अपितु छोड़ दी है केंचुली भी
कि तुम ही उत्तराधिकारी हो
उनके हर कृत्य के

वंशज बनने हेतु स्वीकारो पद
सर्पों ने ग्रहण कर लिया है संन्यास

शनिवार, 5 दिसंबर 2020

आकलन

 सदियों से अपना आकलन करवाती रही मगर कभी ना खुद अपना आकलन किया बस खुद को सिर्फ़ एक गृहिणी का ही दर्जा दिया


जब किसी ने प्रश्न किया
क्या करती हो तुम ?
तब जाकर ये अहसास हुआ
सिर्फ़ "अर्थ" ही कार्यक्षमता का मापदंड हुआ
चाहे आर्थिक रूप से
मैं सक्षम नहीं
लेकिन घर का सबसे कमाऊ सदस्य मैं ही हूँ
रिश्तों की दौलत से बढकर और कौन सी कमाई होती है
मैं नहीं जानती
और ना जानना चाहती हूँ

देखो ………कितनी अमीर हूँ मैं
क्या तुम हो ?

शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

मुकम्मल

 मुझे कुछ बात कहनी थी लेकिन मन कहीं ठहरे तो कहूँ


मुझे कुछ काम करने थे
लेकिन मन कहीं रुके तो करूँ

मुझे कुछ पहाड़ चढ़ने थे
लेकिन मन कहीं चले तो चलूँ

ये प्रान्त प्रान्त से निकलतीं नदियाँ
गंतव्य तक पहुँचने को आतुर
नहीं जानतीं
हर राह अंततः स्वयं तक पहुंचकर ही मुकम्मल होती है

सोमवार, 5 अक्तूबर 2020

जाने कब गूंगे हुए

जाने कब गूंगे हुए 
एक अरसा हुआ 
अब चाहकर भी जुबाँ साथ नहीं देती 
अपनी आवाज़ सुने भी गुजर चुकी हैं 
जैसे सदियाँ 

ये बात 
न मुल्क की है 
न उसके बाशिंदों की 

लोकतंत्र लगा रहा है उठक बैठक 
उनके पायतानों पर 
और उनके अट्टहास से गुंजायमान हैं 
दसों दिशाएँ 

उधर 
निश्चिन्त हो 
आज भी 
राघव पकड़ रहा है 
बंसी डाले पोखर में मछलियाँ ........

शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

आखिर मैं चाहती क्या हूँ

कभी कभी फ़ुर्सत के क्षणों में
एक सोच काबिज़ हो जाती है
आखिर मैं चाहती क्या हूँ
खुद से या औरों से
तो कोई जवाब ही नहीं आता
क्या वक्त सारी चाहतों को लील गया है
या चाहत की फ़सलों पर कोई तेज़ाबी पाला पड गया है
जो खुद की चाहतों से भी महरूम हो गयी हूँ
जो खुद से ही आज अन्जान हो गयी हूँ
कोई फ़ेहरिस्त अब बनती ही नहीं
मगर ये दुनिया तो जैसे 
चाहतों के दम पर ही चला करती है
और मौत को भी दरवाज़े के बाहर खडा रखती है
बाद में आना ………अभी टाइम नहीं है
बहुत काम हैं 
बहुत सी अधूरी ख्वाहिशें हैं जिन्हें पूरा करना है
और एक तरफ़ मैं हूँ 
जिसमें कोई ख्वाहिश बची ही नहीं
फिर भी मौत है कि मेरा दर खटखटाती ही नहीं

सुना है ……ख्वाहिशों, चाहतों का अंत ही तो ज़िन्दा मौत है 
तो क्या ज़िन्दा हूँ मैं या मौत हो चुकी है मेरी?

शनिवार, 8 अगस्त 2020

मसला तो उसे भुलाने में है

 जब तब छेड़ जाती है उसकी यादों की पुरवाई सूखे ज़ख्म भी रिसने लगते हैं किसी को चाहना बड़ी बात नहीं मसला तो उसे भुलाने में है


यूँ तो तोड़ दिए भरम सारे
न वो याद करे न तुम
फिर भी इक कवायद होती है
आँख नम हो जाए बड़ी बात नहीं
मसला तो उसे सुखाने में है