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बुधवार, 18 जुलाई 2018

भीड़

भीड़ का कोई धर्म नहीं होता
सच ही तो कहा गया
भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता
सच ही तो कहा गया
फिर आज प्रश्न क्यों?
फिर आज उस पर लगाम लगाने की जरूरत क्यों?

आदत है तुम्हारी
हर उक्ति-लोकोक्ति को स्वीकारना
उसी की बनायी लकीर पर चलना
बिना सोचे समझे उसके परिणाम
तो फिर आज क्यों डर रहे हो
क्यों आज प्रश्न उठ रहे हैं ?

सोचने का वक्त अब आया
तब न सोचा
बिना सोचे समझे मानते गए
जबकि जानते हैं वो तुम्हारी कमजोरी
फायदा उठाना है उनका धर्म
नहीं है कोई एक कातिल
नहीं है कोई एक मुजरिम
और दुनिया की किसी अदालत में
नहीं दी गयी आज तक भीड़ को सजा

कहो कैसे चेहरे पहचानोगे?
पहचान भी लिया तो क्या कर लोगे?
कोई मूक दर्शक ही होगा
तो देखना उसका जुर्म हुआ?
किस किस को सजा दोगे?

क्या दे सकते हो भीड़ को फाँसी क़त्ल पर?

लेकिन एक बात का जवाब देना
ये भीड़ आखिर पैदा किसने की और कैसे?
कहाँ कमी रही जो आज भीड़ उग्र हुई
या फिर जान गयी है वो अपने होने का अर्थ
क्या ये आकलन का वक्त नहीं है?
क्या ये अपने गिरेबान में झाँकने का समय नहीं है?

भीड़ स्वयं से नहीं होती
भीड़ पैदा की जाती है
और तुमने पैदा की
और आज अपनी ही पैदा संतानों से भयभीत हो उठे ओ हुक्मरानों ?
सवालिया निगाहों के प्रश्नों पर तुम्हारा मौन
सांत्वना का फाहा नहीं

जान लो
सिर्फ कानून बनाने भर से कुछ नहीं होना
उग्रता के बीज बोये हैं तो काटोगे भी तुम ही
कल राजनीति की बिसात पर भीड़ एक मोहरा थी
आज जिंदगी की बिसात पर
सोचो जरा
ये किस मोड़ पर खड़े हो तुम
और तुम्हारी भीड़
क्योंकि
कहते हैं चोर को नहीं उसकी माँ को पकड़ो
अब है कोई हल आपके पास
या निरुत्तर भीड़
दिशाहीन भीड़ ही बचा है अब इस देश का भविष्य ?





मंगलवार, 10 जुलाई 2018

बहुत से दिन बीते सखी रीते

करूँ क्या संवाद दिन से
बहुत से दिन बीते सखी रीते

नयापन न मिला दिन में
तब बाँझ हुईं आस मन में

न घट भरा न सुरा ने तृप्त किया
किस शुभ दिन के मोह में रहें जीते

आह ! मेरी दग्ध हुई चेतना
कौन से सावन से कहो बुझे

मिलन हो जिस पल प्रियतम से
उसी दिन की हो गणना जीवन में

जर्जर काया सुलग सुलग
करे निहोरा अब रिमझिम से

बेमौसम बरसे जब बदरा
रोम रोम की मिटे तब तृष्णा

हरियल हो जाए आस की कोख
करूँ तब सखी संवाद मैं दिन से

करूँ क्या संवाद दिन से
बहुत से दिन बीते सखी रीते


©वन्दना गुप्ता vandana gupta 




सोमवार, 9 जुलाई 2018

तुम्हारी नज़र में दिल्ली क्या है ?



उसने कहा
तुम्हारी नज़र में दिल्ली क्या है ?

वो नज़र कहाँ से लाऊँ
जो आत्मा में झाँक सके
जो धड़कन को सुन सके
जो साँसों का संगीत हो
कौन कर सका है उसे व्याख्यायित

दिल्ली कोई शहर नहीं , राजधानी नहीं
ये दिल है
न केवल मेरा बल्कि सारे देश का
जहाँ धडकता है सुगम संगीत
'मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा'
फिर भी बाँट दी गयी है आज जाने कितने खेमों में
अपनी अपनी राजनीति
अपनी अपनी सहूलियत की मीनार
ऐसे में कैसे संभव है
दिल में पलती मोहब्बत की लहरों को गिनना

अपने पराये से परे है
हाशिये को भी जो सहेज ले और अट्टालिकाओं को भी
गंगा हो या जमुना
दोनों गलबहियाँ डाले
गुजरती हैं गली कूचों से खिलखिलाती हुई
अजान और ओंकार साथ साथ कुहुकती हों कोयल सी
नहीं लगाए गए जहाँ ताले घरों में
खुले रहते थे किवाड़
भरोसा था जिसका आधार
बदल दिया है उसे आज अविश्वास ने
उग आई हैं शक की खरपतवारें
संदेह के कब्जों से हिलने लगी हैं विश्वास की चूलें
रात के खौफ पर भारी है दिन के पहर
तांडव करती है जहाँ भूख, बेईमानी और बदहाली
वहाँ आज उगने लगा है कंक्रीट का जंगल धीरे धीरे
सोख ली है जिसने सारी नमी
वाष्पित होने लगी हैं संवेदनाएं
बदलता मौसम बन गया है सूचक एक अंतहीन विलाप का

मेरे शहर में मेरा ही बाशिंदा नहीं कोई आज
गिने चुने ही मिलेंगे सहेजे अपनी विरासत
फिर भी हर आगत का किया स्वागत
निष्कासित करना सीखा ही नहीं
दिल से लगा लिया अपना बना लिया
बस यही तो दिल्ली का फलसफा रहा
फिर खुद चाहे क्यों न अक्सर तोहमतों का शिकार हुई
दिल्ली ऐसी, दिल्ली वैसी
मगर विचारना जरा
दिल्ली को ऐसा वैसा बनाया किसने?

तुम आये - क्या लाये अपने साथ ?
जो लाये वो ही दिया तुमने दिल्ली को
खुद सा बना लिया
तो आज संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पर विधवा विलाप क्यों?

दिल्ली तुम्हारे सपनों का वो ब्रह्माण्ड है
जिसमे दाखिल तो हो गए तुम
लेकिन उसकी जड़ों में ही मट्ठा देते रहे, गरियाते रहे
लेकिन फिर भी न कर सके पलायन
सहूलियतों के पायों ने जकड़े रखा
फिर वो रेहड़ी वाला हो, रिक्शा वाला या मजदूर
या फिर हो कोई अफसर या इंजीनियर
कवि हो, लेखक या साहित्यकार
पत्रकार या व्यापारी
तुम्हारी अपेक्षाओं पर खरी उतरती रही
फिर भी तुम्हारी ही बदजुबानी की शिकार होती रही
तो सोचो जरा
कैसी है दिल्ली ?
और आज जैसी है तो वैसी क्यों है दिल्ली ?

एक बार आकलन के लिए खुद को कटघरे में खड़ा करके देखना
फिर किसी जवाब के मोहताज नहीं रहोगे

बार बार उजड़ना और बसना बेशक इसकी फितरत ही रही
बाहरी हमलों का हमेशा शिकार होती रही
जाने कितनी बार नेस्तनाबूद होकर भी
फिनिक्स सी अपना अस्तित्व बचाती रही
वक्त के उतार चढ़ावों से चाहे जितना बोझिल रही
इसकी जिजीविषा ही इसकी पहचान रही
तभी तो हमेशा ये कहा गया
दिल्ली तो दिलवालों की ही रही ...

क्या कर सकता है कोई परिभाषित दिल्ली होने की विडंबना
दिल्ली सुकूं का महल भी है
तो बेचैनी की आतिश भी
सोचो, विचारो और फिर बताओ
दिल्ली होना आखिर है क्या?

दिल्ली वो संग्रहालय है
जिसने संजोयी हैं स्मृतियाँ
कटु, रुखी, तीक्ष्ण, दाहक भी
तो मधुर, मधुर और मधुर भी
अब अपने चश्मे का नंबर बदलो
शायद तब देख पाओ
अपनायियत की मिसाल है
दिल्ली खूबियों का जिंदा ताजमहल है 

जिसके सिर पर सदा काँटों का ताज रहा 
मगर फिर भी न दिल्ली का दिल डोला 


दिल्ली का दर्द जिस दिन जान जाओगे

चैन की नींद न इक पल सो पाओगे
हमने देखी है दिल्ली की आँखों में पलती मोहब्बत 
ज़रा रुक के इक बार दीदार तो करो 
अपने सपनों के शहर से बाहर निकल 
तो शायद जान पाओ क्या है दिल्ली ?

इक सफ़र है दिल्ली 
तो इक मंजिल भी है दिल्ली 
इक आग है दिल्ली 
तो ख़्वाबों की ताबीर भी है दिल्ली 
दिल्ली यूँ ही नहीं दिलवालों की बनी जनाब 
झुलसाते तेज़ाब से नहाकर निकली है 
तब जाकर सबको गले लगाने की इसे आदत पड़ी है 

अब कैसे बताएं तुम्हें 
हमारी नज़र में क्या है दिल्ली 
अपनी तो दिल , जिगर और जां है दिल्ली ...

शनिवार, 7 जुलाई 2018

क्रूरतम अट्टहास

न रास्ता था न मंज़िल
न साथी न साहिल
और
एक दिन दृश्य बदल गया
कछुआ अपने खोल में सिमट गया

शब्द हिचकियाँ लेकर रोते रहे
अब बेमानी था सब
खोखली थीं वहां भावनाएं, संवेदनाएं
एक शून्य आवृत्त हो कर रहा था नर्तन

ये था ज़िन्दगी का क्रूरतम अट्टहास

सोमवार, 2 जुलाई 2018

आह ! अब दर्द का पर्याय नहीं

दर्द जब कट फट जाता है
मैला हो जाता है
तब बहुत मुस्काता है
शब्दबाण विहीन हो

फैला है यूँ, बिखरा हो जैसे पानी
और रपट जाए कोई बेध्यानी में
कचोट कितना छलछलाये
मौन को नहीं तोड़ पाती

मूक अभिव्यक्तियों से बंधा है गठजोड़
अब खुश्क हैं आँखें और अंतर्मन दोनों ही

कहते हैं
उस तरफ बज रही है एक सरगम अहर्निश
जाने क्यों
तोड़ नहीं पाती साँकल बंद दरवाज़ों की

खामोश रुदन श्रृंगार है दर्द की तहरीरों का
आह ! अब दर्द का पर्याय नहीं



शुक्रवार, 22 जून 2018

एक बार फिर इश्क की होली

दर्द की नदी में
छप छप करते नंगे पाँव
आओ
तुम और मैं खेलें
एक बार फिर इश्क की होली

उदासियों के चेहरे पर
बनाते हुए आड़ी तिरछी रेखाएं
आओ
तुम और मैं लायें
एक बार फिर इश्क का मौसम

सूनी आँखों के संक्रमण काल में
डालकर बेखुदी की ड्राप
आओ
तुम और मैं करें
एक बार फिर इश्क का मोतियाबिंद दूर

रकीब के दरवाज़े पर
सजदा करते हुए
आओ
तुम और मैं बनाएं
एक बार फिर इश्क को खुदा

प्यास के जंगल में
खोदकर आँसुओं का कुआं
आओ
तुम और मैं बुझायें
एक बार फिर इश्क की अबूझ प्यास

यहाँ सुलग रही हैं भट्टियाँ सदियों से
इश्क का घी है कि खत्म ही नहीं होता
सुकून के लम्हे इश्क की तौहीन है रब्बा
क्योंकि
बेपरवाही इश्क की लाचारी है आदत नहीं

फासले हों तो तय करे कोई ...

शनिवार, 2 जून 2018

"अँधेरे का मध्य बिंदु" समीर लाल जी की नज़र में


कैनेडा में रहने वाले "उड़न तश्तरी " के नाम से प्रसिद्ध लेखक, कवि, उपन्यासकार "समीर लाल"जी द्वारा उपन्यास "अँधेरे का मध्य बिंदु" की एक सारगर्भित समीक्षा सेतु पत्रिका के मई अंक में प्रकाशित ..........समीर जी ब्लॉग के वक्त से मित्र हैं और ब्लॉग मित्र जितने हैं लगता है जैसे हम एक परिवार का हिस्सा हैं ......समीर जी की प्रतिक्रिया कितनी मायने रखती है इसका अंदाज़ा कोई नहीं लगा सकता क्योंकि जब हम नए नए आये थे तब वो अपनी टिप्पणियों द्वारा उत्साहवर्धन किया करते थे ......शायद उनका उत्साहवर्धन ही नींव बना है लेखन की .......तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ समीर जी, आपने उपन्यास पढ़ा और उस पर अपनी प्रतिक्रिया दी...एक लेखक के लिए प्रतिक्रिया ही सबसे अनमोल पूँजी होती है क्योंकि यही तो हमारी खुराक है 




’अँधेरे का मध्य बिंदु’ – वन्दना गुप्ता: समीर लाल ’समीर’ की नजर में
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वन्दना गुप्ता रचित उपन्यास ’अँधेरे का मध्य बिंदु’ मिली. वन्दना गुप्ता से परिचय एक दशक के ऊपर ब्लॉग के समय से रहा है और दिल्ली में व्यक्तिगत मुलाकात भी रही और नियमित फोन से बातचीत भी होती रही. अक्सर उन्होंने मेरी कविताओं पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कविता को ही एक अलग अंदाज में आगे बढ़ाया है या एक अन्य नजरिया पेश किया है. उनका आत्मीय व्यवहार कुछ ऐसा रहा कि हमेशा अहसास एक परिवार के सदस्य सा रहा.
उनकी साहसी और बोल्ड लेखनी सदा काफी चर्चा का विषय रही ब्लॉगजगत में किन्तु उनसे मिलकर और उनकी लेखनी को देखकर अचरज होता रहा कि क्या यही वो वन्दना गुप्ता हैं जिन्हें मैने पढ़ा था? मगर यही एक लेखक, एक कवियत्री, एक चिंतक को अलग श्रेणी में लाकर खड़ा करता है. लेखक की पहचान उसका लेखन है, को निश्चित ही वन्दना गुप्ता चरितार्थ करती है. बातचीत और मिलने पर सहज एक घरेलु सी महिला, अपने लेखन में कितना उन्मुक्त और साहस प्रस्तुत करती है, यह सीखने लायक है.
कविताओं से इतर जब उनकी किताब ’अँधेरे का मध्य बिंदु’ मैने उठाई तो मुझे उम्मीद थी कि कोई न कोई समाज का ऐसा पहलु, जिस पर लिखने से लोग कतरा जाते हैं उसे जरुर छुआ होगा. और आशा के अनुरुप ही आज के समाज की नई सोच, नई उपज के रुप में पनप रही ’लिव इन रिलेशन’ पर ही कहानी को केन्द्रित पाया. अक्सर कहानीकार इस तरह की नई सामाजिक मान्याताओं का विरोध करते नजर आते हैं या पुरातनकालीन मान्यताओं की वकालत करते हुए विवाह के स्थापित संस्थान की दुहाई देते हुए नई सोच को गलत ठहराने की पुरजोर कोशिश में नजर आते हैं. कहानीकार अक्सर लेखन में किसी भी विवादात्मक विषय से बचता है.
मगर इसके विपरीत, लेखिका ने इस उपन्यास के मुख्य पात्र रवि और शीना के माध्यम से, न सिर्फ स्थापित मान्यताओ को तोड़ा है वरन इस सोच में निहित एक बेहतर समाज की स्थापना की परिकल्पना भी जाहिर की है. न कोई विरोध और न कोई नई सोच पर आक्षेप. एक सकारात्मक सोच..एक साक्षी भाव.
रवि और शीना, दो अलग मजहबों से आकर भी जिस तरह से विवाह की स्थापित मान्यताओं से अलग लिव इन रिलेशनशीप में सफल और खुशहाल जीवन बसर करने के लिए सफल प्रयास करते हैं वो एक आईना सा बनता दिखता है इन स्थापित माध्यमों से विवाहित हो लड़ते झगड़ते, अपने अहम का परचम लहराते, तलाक की कागार पर खड़े नई पीढ़ी के युवा युगलों के लिए जो भूल गया है कि खुशहाल जीवन साथ गुजारने के लिए विवाह के बंधन से ज्यादा जरुरी एक दूसरे को समझना, कम्प्रोमाईज करना और एक दूसरे की खुशियों का ख्याल रखना है.
जैसे जैसे उपन्यास से पन्ना दर पन्ना गुजरता गया, बस एक ही ख्याल मन में उपजता रहा कि काश!! यह सोच आज के विवाहित जोड़े अपना लें तो कितना कुछ बदल जाये. कितनी खुशहाल हो जाये जिन्दगी.
रवि की सोच..’मैं और शीना एक दूसरे से कोई अपेक्षा नहीं रखते, कभी कहीं आना जाना हो तो दोनों अपने हिसाब से अपना कार्यक्रम तय रखते हैं. जिस सोसाइटी में हम रहते हैं वहाँ अभी किसी को हमारे बारे में नहीं पता लेकिन हर शक्स हमें जानता है फिर बच्चा हो, बड़ा या बूढ़ा क्योंकि हम सबसे बराबर मिलते जुलते हैं, एक आम जीवन जीते हैं. कोई दूसरे ग्रह से आये प्राणी थोड़े हैं जो अपना सामाजिक दायरा ही बिसरा दें जैसे आप सब की तरह सिर्फ एक सम्बन्ध नहीं स्वीकारते शादी का, बाकी आप बताइए क्या कमी है? और सबसे बड़ी बात हम खुश हैं.
वाकई सबसे बड़ी बात हम खुश हैं...यही तो कोशिश है हर हमसफर साथी की..चाहे विवाहित हों या लिव इन रिलेशन...
एक और बानगी देखें शीना की सोच से:
जब मैने और रवि ने ये जीवन शुरु करने की सोची तो मैने उसे यह कहानी बताई और कहा कि रवि वैसे तो हम लिव इन में रहेंगे ही और अगर साथ रहना संभव नहीं होगा तो अपनी डगर भी पकड़ लेंगे मगर हमेशा इस सीख को भी याद रखेंगे ताकि हमारा सम्बन्ध सही दिशा में आकार ले सके और जानती हैं उसी गुरुमंत्र पर हम इस साथ को जी पायें क्योंकि अच्छाईयों और बुराईयों का पुतला होता है इन्सान. वह मुझमें भी है और रवि में भी मगर हमने उन बुराईयों को थोड़ी दूरी पर रखा बल्कि एक दूसरे की अच्छाईयों के साथ उनकी अहमियत को समझा तब जाकर यह संबंध आगे बढ़ पाया और इसने यह मुकाम पायावर्ना छोटी छोटी बातों पर लड़ते झगड़ते रहते और अपना जीवन हम बर्बाद कर लेते.
बिना किसी वकालत..बिना किसी का पक्ष लिए..बिना कोई दलील...बहुत कुछ सोचने विचारने को छोड़ देती है यह एक सांस में पढ़ ली जाने को बाध्य करती पुस्तक.. क्या सही और क्या गलत..एक सोच मात्र और वो भी हमारी.
बदलते समाज पर चली एक सधी हुई कलम का नाम ’वन्दना गुप्ता’.
आप पसंद करें या नापसंद करें...मगर इग्नोर करना अफोर्ड नहीं कर सकते मित्र वन्दना गुप्ता की ’अँधेरे का मध्य बिन्दु’.
सोचिये मत..आर्डर करिये और पढ़िये इस पुस्तक को..एक अति आवश्यक पठन आज की जिन्दगी को समझने के लिए ..सही तरीके से!!
किताब: ’अँधेरे का मध्य बिन्दु’
लेखक: वन्दना गुप्ता
मूल्य: ₹ १४०.००
प्रकाशक: एपीएन पब्लिकेशन, नई दिल्ली
फोन: ९३१०६७२४४३
ईमेल: apnlanggraph@gmail.com
सेतु के मई २०१८ के अंक में:
http://www.setumag.com/2018/05/Book-Andhere-Ka-Madhya.html

गुरुवार, 24 मई 2018

चलूँ कि बहुत अँधेरा है

चलूँ कि बहुत अँधेरा है 
हाथ को हाथ दिखाई नहीं देता
रूह जाने किस द्वारका में प्रवेश कर गयी है 

कि अजनबियत तारी है खुद पर ही...

रुके हुए हों रस्ते जैसे, मंजिलों ने किया हो अलगाववाद का शोर 
और किसी रहस्यमयी जंगल में घूम रहा हो मन का मोर ...

संवाद के लिए जरूरी हैं शब्द और शब्दों के लिए जरूरी है अक्षरज्ञान 
एक निपट अज्ञानता से सूख चुकी हैं उम्मीद की कड़ियाँ 
हिज्जों में बंटा है अस्तित्व 
खुद से संवाद के लिए भी मुझमें मेरा होना तो जरूरी है और मैं ...प्रश्नचिन्ह सा टंगा हूँ वक्त के ताखे पर

रविवार, 20 मई 2018

आओ फासलों को गुनगुनाएं

मैं एक चुका हुआ ख्याल हूँ
तू क्यूँ उम्मीद की गाँठ बाँधता है
मुसाफिर चलता चल जहाँ ले जाएँ कदम
कि सूखे हुए दरख़्त हरे नहीं हुआ करते
नदी वापस नहीं मुड़ा करती
और रूहें आलिंगनबद्ध नहीं हुआ करतीं

इक सोये हुए शहर के आखिरी मकान पर दस्तक
नहीं तोड़ा करती शताब्दियों की नींद

आओ फासलों को गुनगुनाएं
इश्क न जन्मों का मोहताज है न शरीर का ...




शुक्रवार, 4 मई 2018

पिपासा रक्तस्त्राव से ग्रसित है

ये जिन्ना गोडसे रावण और कंसों को पूजने का दौर है
तुम निश्चित कर लो अपनी पगडण्डी
वक्त ने बदल दिए हैं अपने मन्त्र
उच्च स्वर में किये गए उच्चारण ही बनेंगे अब वेदों की ऋचाएं

ये खौलती खदबदाती भावनाओं को व्यक्त न करने का दौर है
जी हजूरी और गुलामी के ही शिखर पर पहुँचने की प्रबल संभावनाएं हैं
पाले बदलने वाले ही बचे रह पायेंगे

अब नहीं आयेंगे गोविन्द धर्मयुद्ध करने
इस बार वो नहीं थामेंगे अर्जुन के घोड़ों की रास
बदल लिया है उन्होंने भी पाला
आखिर क्यों ढोयें अपने सर पर एक और कुरुक्षेत्र कराने का इलज़ाम

बहती गंगा में हाथ धोने का रिवाज़ है हमारे यहाँ
तुम सोचो
रास्तों ने बदल दी है जमीन
और जमीन ने बदल दिया है तेवर
ऐसे में फुंफकारना भी न बन जाए कहीं
राजाज्ञा का उल्लंघन

सर झुकाना अदब है ... आज की परिभाषा में
फिर तुम क्यों दायरों के बाहर जा
फहराना चाहते हो परचम
जिसका न कोई गवाह होगा और न परिचय

कौए के मोती खाने का दौर है ये
पिपासा रक्तस्त्राव से ग्रसित है

©वन्दना गुप्ता

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

घुटन की आतिशबाजी फूँक रही है

जब आ चुको तुम आजिज़
रोजमर्रा के कत्लोआम से
शून्य हो जाती हैं संवेदनाएं
नहीं दीखता तुम्हें फिर
आस पास बिखरा समंदर, नीला आकाश या उडती तितलियाँ

अजीजों का महाप्रयाण हो
या नन्हें कमलों का असमय नष्ट होना
या फिर हो अर्धविकसित कलियों से व्यभिचार
दिमाग की नसें करने लगती हैं चीत्कार
शिराओं में बहते खून ने कर दिया है विद्रोह
जमाव बिंदु की ओर कर प्रस्थान
दिल शून्यता की अवधि में हो जाता है लाचार 
और सन्नाटे के शोर से 
लहुलुहान है रूह

शब्द भाव करके इनकार
निकल जाते हैं होने शामिल देशव्यापी हड़ताल में
तो कभी बैठ जाते हैं अनशन पर

मैं आत्माविहीन
कौन से बाज़ार में बेचूँ खुद को
कि
उतर आये आँख में खून
और अंतड़ियों में उबाल

सिरकती लाशों का तांडव देखती
भीड़ का हिस्सा हूँ मैं
मौन का दूसरा नाम पलायन नहीं
बस
भागना जरूरी होता है कभी कभी
साँस लेने के लिए
खुद को जिंदा महसूस करने के लिए

घुटन की आतिशबाजी फूँक रही है
रफ्ता रफ्ता
हँसते हुए चेहरे लगा रहे हैं चपत
सभ्यता के मुँह पर
और
कै करने को जरूरी है मुँह का होना

संवेदनाओं से दलाली का मौसम बहुत निखरा हुआ है आजकल 

©वन्दना गुप्ता