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शुक्रवार, 21 जुलाई 2023

बनो स्त्रियों रणचंडी बनो

 


बनो स्त्रियों रणचंडी बनो
काली खप्पर वाली बनो
महिषासुर मर्दिनी बनो
किन्तु चुप मत रहो
समय की प्रचंड पुकार है
धरा पर मचा हाहाकार है

खामोश चीत्कारों से ही सुलगा करता है धरती का सीना,
ये मंद मंद सुगबुगाहटें कहर बन लील लें वजूद
उससे पहले
एक चिंगारी बने मशाल
उठाओ शिव का त्रिशूल
करो तांडव
करो संहार व्यभिचारी सोच का, व्यभिचारियों का
बता दो अच्छे दिनों का सपना दिखाने वालों को
नहीं मिलेगी पनाह किसी को भी
ब्रह्माण्ड के अंतिम छोर पर भी
नहीं बख्शेंगी किसी को भी
सोयी शेरनियां जागने पर बहुत खूँखार हुआ करती हैं

कहीं थाम ने लें समाज और सत्ता की कमान
हो जाए इन्हीं का वर्चस्व कायम
वो वक्त आये
उससे पहले हो जाओ

सावधान
सावधान
सावधान

स्त्रियों की चुनौती से तो थरथरा उठता है समस्त ब्रह्माण्ड - वाकिफ हो न 


#मणिपुर 

शनिवार, 1 जुलाई 2023

चिंतातुर कवि बैठे हैं

 चिंतातुर कवि बैठे हैं

सोचते हुए
ये कहाँ आ गए हम
अब जाएंगे कहाँ
कि आज सँवरा नहीं
फिर कल कैसे संवरेगा
किस चिड़िया के हाथों भेजें संदेसा
जो गगन हो जाये थोड़ा और नीला
कि बाधित न हो उड़ान पंछियों की
कोयल की कुहू कुहू
पपीहे की पीहू पीहू से
होती थी जब सुबहें
वो सुबह कब आएगी
कब सूरज शरमा कर
बादलों के आगोश में सिमट जाएगा
हर मन केवल एक ही फसाना गायेगा
प्रतीक्षा की पाँखें कुम्हला न जाएं
कैसे इस दौर से मुक्ति पाएं
जहाँ राम और रहीम बेबसी की कैद में
एक दूजे को केवल देखने को विवश हैं
कैसे बोलें, प्रश्न मुँह बाए खड़ा है
कोई होता सुनने वाला
तो सुनाते हाल-ए-दिल
जब बदला जाता है इतिहास
तब समय की मूक आवाज़ के क्रंदन से ठहर जाती है पृथ्वी अपनी धुरी पर
और हो जाते हैं कवि चिंतित
कौन सी लिखें कविता
जो हो एक नया सवेरा...



Yatish Kumar जी की वाल पर ये फोटो देखी। फ़ोटो देख पसंद की और आगे बढ़ने लगी किंतु उनके भावों ने जकड़ लिया और इन भावों का जन्म हो गया - गगन गिल जी व् यतीश कुमार जी