अनुमति जरूरी है

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

बुधवार, 27 मई 2020

उपकृत

ये उपकृत करने का दौर है
संबंधों की फाँक पर लगाकर
अपनेपन की धार

अंट जाते हैं इनमें
मिट्टी और कंकड़ भी
लीप दिया जाता है 
दरो दीवार को कुछ इस तरह
कि फर्क की किताब पर लिखे हर्फ़ धुंधला जाएं

फिर भी 
छुट ही जाता है एक कोना
झाँकने लगता है जहाँ से
संबंधों का उपहार

और धराशायी हो जाती हैं 
अदृश्य दीवारें
नग्न हो जाता है सम्पूर्ण परिदृश्य
आँख का पानी 
अंततः सोख चुके हैं आज के अगस्त्य

मुँह दिखाई की रस्मों का रिवाज़ यहां की तहजीब नहीं...


शनिवार, 16 मई 2020

कितने विवश हैं

कौन हो तुम?
और क्यों हो तुम ?
किसे जरूरत तुम्हारी ?

न किसी बहीखाते में दर्ज हो
न किसी आकलन में
न उन्हें परवाह तुम्हारी


कीड़े मकौडों से
मरने के लिए ही तो पैदा होते हो
मौत से भागते फिरते हो
लेकिन कहाँ बच पाते हो?

सरकार के लिए वोट बैंक भर हो
मान लो और जान लो
तुम मरते रहोगे
वो बस आंकड़े दर्ज करते रहेंगे
और हो जायेगी इतिश्री

तो क्या हुआ
घर पर माँ की आँखें इंतज़ार में पथरा जायेंगी
तो क्या हुआ
पत्नी की मांग सूनी पगडण्डी सी नज़र आएगी
तो क्या हुआ
बच्चों की किलकारियां वक्त से पहले दफ़न हो जायेंगी

यहाँ सुविधाओं की अट्टालिकाएं महज कोरा भ्रम भर हैं
विदेशी भारतीयों को मिला करती हैं वी आई पी सुविधाएं
उड़न खटोलों पर है उनका ही एकाधिकार
तुम्हारा पसीना हो या खून
बस बहने के लिए ही बना है
बताओ तो
क्या तुम्हें नमन कर देने भर से हो जायेंगे हम उऋण?


आज जी भर कर कोसने को मन कर रहा है सिस्टम को, सरकार को, असंवेदनशीलता को........मजदूर रोज मर रहे हैं, मीडिया चीख रहा है, जनता चीख रही है, सुनवाई के नाम पर कानों में तेल डाले बैठे हैं अगली घटना के इंतज़ार तक .......क्या एक बार सभी मजदूरों को आश्वासन नहीं दिया जा सकता था? क्या पता नहीं वो कितना पढ़ा लिखा है और कितना अनपढ़? कैसे वो ट्रेन ऑनलाइन बुक कर सकता है? कितने विवश हैं आज हम मौत का नंगा नाच देखने को