पृष्ठ

अनुमति जरूरी है

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

ज़िन्दगी के रंग कैसे- कैसे

उजासों की कतरन
सांसों की धड़कन
लम्हों की सिहरन
अरमानों की थिरकन
भोर की गुनगुन
ज़िन्दगी को जीवंत करती


सांझ का पतझड़
रात का खंडहर
अहसासों का अकाल
चेहरों का बांझपन
दिलों का सूनापन
रिश्तों का बेगानापन
प्रतीक्षित लम्हों का खोखलापन
ज़िन्दगी को मृत्युतुल्य बनाता


आह ! ज़िन्दगी
कब , कैसे
भोर की लालिमा से
सांझ की कालिमा बन जाती

ज़िन्दगी पहेली है न सहेली
ज़िन्दगी एक ऐसी खोज है
जिसकी कोई मंजिल नहीं

अब लब सील लो
या खुलकर जी लो
निर्भर तुम पर करता है

ये आशिकी है न दीवानगी
खामोश सफ़र की कोई इन्तेहा सी
करती है गुफ्तगू
क्या जी सकते हो मुझे सच में ?
है इतनी जिन्दादिली ?

गर हो कोई जवाब तो आ जाना ज़िन्दगी के पालने में झूलने
मीठी लोरी सुना सुला देगी
स्वप्न मीठा फिर दिखा देगी
भोर में फिर जगा देगी
अपने होने के अर्थ बता देगी ...





रविवार, 15 नवंबर 2009

मैं इंतज़ार करूँगा ..........

कभी वादा तो नही किया
मगर फिर भी
मैं इंतज़ार करूँगा तेरा
एक जनम की मुझे चाह नही
तुझसे मिलने की कोई राह नही
मगर फिर भी
मैं इंतज़ार करूँगा तेरा
इस कायनात के उस
आखिरी जनम तक
जब तुम सिर्फ़ मेरी होगी
तुम्हारा दीदार सिर्फ़ मेरा होगा
शरीर तो हर जनम मिलते रहे हैं
इंतज़ार है उस आख़िर जनम का
जब तेरी रूह का प्यार भी
सिर्फ़ मेरा होगा
मैं इंतज़ार करूँगा..............

रविवार, 1 नवंबर 2009

किसी ने कभी लिखा ही नही

मुझे इंतज़ार है
उस एक ख़त का
जिसमें मजमून हो
उन महकते हुए
जज्बातों का
उन सिमटे हुए
अल्फाजों का
उन बिखरे हुए
अहसासों का
जो किसी ने
याद में मेरी
संजोये हों
कुछ न कहना
चाहा हो कभी
मगर फिर भी
हर लफ्ज़ जैसे
दिल के राज़
खोल रहा हो
धडकनों की भी
एक -एक धड़कन
खतों में सुनाई देती हो
आंखों की लाली कर रंग
ख़त के हर लफ्ज़ में
नज़र आता हो
इंतज़ार का हर पल
ज्यूँ ख़त में उतर आया हो
हर शब्द किसी की तड़प का
किस के कुंवारे प्रेम का
किसी के लरजते जज्बातों का
जैसे निनाद करता हो
जिसमें किसी की
प्रतीक्षारत शाम की
उदासी सिमटी हो
आंखों में गुजरी रात का
आलम हो
दिन में चुभते इंतज़ार के
पलों का दीदार हो
किसी के गेसुओं से
टपकती पानी की बूँदें
जलतरंग सुनाती हों
किसी के तबस्सुम में
डूबी ग़ज़ल हो
किसी के बहकते
ज़ज्बातों का रूदन हो
किसी के ख्यालों में
डूबी मदहोशी हो
किसी की सुबह की
मादकता हो
किसी की यादों में
गुजरी शाम की सुगंध हो
हर वो ख्यालात हो
जहाँ सिर्फ़
महबूब का ही ख्वाब हो
प्यार की वो प्यास हो
जहाँ जिस्मों से परे
रूहों के मिलन का
जिक्र हो
हर लफ्ज़ जहाँ
महबूब का ही
अक्स बन गया हो
मुझे इंतज़ार है
उस एक ख़त का
जो किसी ने कभी
लिखा ही नही
किसी ने कभी...................

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

स्वीकार करूँ मैं भी तुमको

अंगीकार किया जब तुमने
क्यूँ नही चाहा तब
स्वीकार करूँ मैं भी तुमको
जब बांधा इस बंधन को
गठजोड़ लगा था हृदयों का
फिर क्यूँ नही चाहा तुमने
अंगीकार करूँ मैं भी तुमको
दान लिया था जब तुमने
तब क्यूँ नही चाहा तुमने
वस्तु बना कर
कोई तुम्हें भी दान करे
सिन्दूर भरा था जब माँग में
वादे किए थे जब जन्मों के
तब क्यूँ नही चाहा तुमने
मेरी उम्र भी दराज़ हो
तुम भी बंधो उसी बंधन में
जिसका सिला चाहा मुझसे
अर्धांगिनी बनाया जब मुझको
तब क्यूँ नही चाहा तुमने
तुम भी अर्धनारीश्वर बनो
अपूर्णता को अपनी
सम्पूर्णता में पूर्ण करो
इक तरफा स्वीकारोक्ति तुम्हारी
क्यूँ तुम्हें आंदोलित नही कर पाती है
मेरी स्वीकारोक्ति क्या तुम्हारे
पौरुष पर आघात तो नही
जब तक मैं न अंगीकार करूँ
जब तक मैं न तुम्हें स्वीकार करूँ
अपना वजूद कहाँ तुम पाओगे
फिर क्यूँ नही चाहा तुमने
अपना वजूद पाना मुझमें
फिर क्यूँ नही चाहा तुमने
स्वीकार करूँ में भी तुमको
स्वीकार करूँ मैं .......................

बुधवार, 28 अक्टूबर 2009

मोहब्बत ये तूने क्या किया

किसी ने ख्वाब भी बनाया
पलकों में भी बसाया
किसी के दिल की धड़कन भी बनी
ज़िन्दगी की आरजू भी बनी
उसे भी अपने दिल की धड़कन बनाया
उसके ख्वाबों को भी
अपनी आंखों में सजाया
उसकी हर चाहत को अपना बनाया
बस उसकी इक हसरत को
जो न अपनाया
उस इक कसूर की
सज़ा ये मिली
उसने भी
पलकों से गिरा दिया
धडकनों को भी
क़ैद कर दिया
बे-मुरव्वत मोहब्बत का
पाक गला भी घोंट दिया
इश्क के न जाने
कौन से मुकाम पर ले जाकर
शाख से टूटे पत्ते की मानिन्द
दर -दर भटकता छोड़ दिया
आह ! मोहब्बत ये तूने क्या किया

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

भावों के टुकड़े

कभी कभी
कुछ भावों को ठांव नही मिलती
जैसे चिरागों को राह नही मिलती

सर्द अहसासों से दग्ध भाव
जैसे अलाव दिल का जल रहा हो

कुछ भाव टूटकर यूँ बिखर गए
जैसे रेगिस्तान में पानी की बूँद जल गई हो

कुछ भावों के पैमाने यूँ छलक रहे हैं
जैसे टूटती साँसे ज़िन्दगी को मचल रही हों



गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009

सिर्फ़ तू ही तू

कल शाम
जब पर्वतों के
साये में
बादलों के
दामन में
ख्यालों की
फसल पक रही थी
तेरी याद ने
दस्तक दी
अन्दर आने की
इजाज़त मांगी
मगर इजाज़त
देता कौन
कुछ ख्याल
तो मेरे
तेरे ख्यालों में
गुम थे
कुछ ख्याल मेरे
तेरे आगोश में
खो गए थे
ना मैं था वहां
ना मेरे ख्याल
सिर्फ़ तेरा ही
तो वजूद था
फिर ख़ुद से
कैसे इजाज़त
मांग रही हो

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009

गुफ्तगू

सुरमई शाम ने झाँका बाहर
निशा दामन फैला रही थी
मिलन को आतुर दोनों सखियाँ
अपने पंख फैला रही थी
शाम का धुंधलका छाने लगा था
निशा का आँचल भी लहराने लगा था
पक्षियों का कलरव भी सो गया था
प्रकृति का दामन भी भिगो गया था
मिलन के इंतज़ार में
कदम आगे बढ़ रहे थे
खामोशी के साये
चहुँ ओर बढ़ रहे थे
कदम-ब-कदम ,धीरे-धीरे
निशा ने शाम का हाथ पकड़ा
सखियों के नैना मिले
कुछ गुफ्तगू हुई
आँखों ही आँखों में
और फिर
निशा ने शाम के हर पल पर
अपना साया फैला दिया
उसका हर हाल जान लिया
और अपने आगोश में
उसके हर दर्द को समेट लिया
इक नई सुबह होने तक............

रविवार, 18 अक्टूबर 2009

बस एक बार ..................

तुम पुकार लो
एक बार
आवाज़ तो दो
मैं वक्त नही
जो वापस आ ना सकूं
मैं ख्वाब नही
जो फिर
देखा जा ना सकूं
तेरी इक आवाज़ पर
रस्मों के बंधन छोड़कर
रिवाजों की जंजीर तोड़कर
नदिया सी
उफनती ,मचलती
अपने सागर में समाने को
दौडी चली आउंगी
तुम एक बार पुकारो तो सही
दिल की कश्ती को
दरिया में उतारो तो सही
मैं वो लहर नही
जो वापस आ न सके
मैं वो डोर नही
जिसे तू सुलझा न सके
तेरे इक इशारे पर
तेरे गीतों के निर्मल धारे पर
पायल छनकाती
प्रीत का गीत गाती
तेरी सरगम की पुकारों पर
प्रेम रस बरसाती
इठलाती,बलखाती
आ जाउंगी
बस तुम एक बार
पुकारो तो सही
मुझे वापस
बुलाओ तो सही

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009

भीगा हूँ बहुत

भीगा हूँ बहुत
अश्कों के बहते धारों में
डूबा हूँ बहुत
तेरे दिए दर्द के सैलाबों में


भटका हूँ बहुत
तेरी जुल्फों के गलियारों में बहका हूँ बहुत
तेरे रेशमीअहसासों में


बस बहुत हुआ
अब और न इम्तिहाँ ले
मत मार मुझे
यूँ याद में तडपा-तडपा कर


सिर्फ़ एक बार आकर
सीने पर खंजर चला दे
दिल के टुकड़े- टुकड़े कर दे

कि
जीने की आरज़ू पूरी हो जाए 
दिल की हर हसरत निकल जाए 
और 
मोहब्बत की यूँ नज़र उतर जाए

रविवार, 11 अक्टूबर 2009

तुम जीत गए ,मैं हार गई

दो विपरीत ध्रुवों सा
जीवन अपना
साजन यूँ ही बीत गयातुम अपने धरातल से
बंधे रहे
मैं अपने बांधों में
सिमटी रही
तुम वक्त के प्रवाह संग
बहते रहे
मैं वक्त के साथ
न चल सकी
तुमने पाया हर
स्वरुप मुझमें
मैं तुममें कृष्ण
न पा सकी
धूप छाँव के
इस खेल में साजन
तुम जीत गए
मैं हार गई

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

सफर निशा का

स्याह रात का तन्हा सफर
ज्यों प्रियतम बिन सजनी का श्रृंगार
किस मिलन को आतुर निशा
पल -पल का अँधेरा समेट रही है
भोर के उजास से मिलन को
क्यूँ विरह के पल गिन रही है
ये क्षण -क्षण गहराता अँधियारा
तन्हाईयाँ बढाता जाता है
निशा के गहरे दामन को
और गहराता जाता है
कौन बने तन्हाई का साथी
स्याह रात के स्याह सायों के सिवा
विरह अगन में दग्ध निशा
ज्यों बेवा नूतन श्रृंगार किए हो
प्रिय मिलन की आस में जैसे
विरहन का कफ़न ओढ़ लिया हो

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

मत छूना

मत छूना
रूह से भी कभी
मेरी रूह को
इस जनम में
मैं अमानत हूँ
किसी और की
तेरा प्यार नही
गैर हूँ तेरे लिए
मेरी पाकीजा रूह
तेरे रूहानी प्रेम के
लिए नही बनी
इस जनम तो
रूह की क़ैद से
आजाद करो
फिर किसी जनम में
शायद तेरे रूहानी
प्रेम की ताकत
मेरी रूह को पुकारे
और हमारी रूहें
उस जनम में
अपने रूहानी प्रेम की
प्यास बुझायें
उस पल तक प्रतीक्षा करो
और तब तक
मत छूना
रूह से भी कभी
मेरी रूह को

बुधवार, 30 सितंबर 2009

आ मेरी चाहत .................


मेरी चाहत
तुझे दुल्हन बना दूँ
तुझे ख्वाबों के
सुनहले तारों से
सजा दूँ
तेरी मांग में
सुरमई शाम का
टीका लगा दूँ
तुझे दिल के
हसीन अरमानों की
चुनरी उढा दूँ
अंखियों में तेरी
ज़ज्बातों का
काजल लगा दूँ
माथे पर तेरे
दिल में मचलते लहू की
बिंदिया सजा दूँ
अधरों पर तेरे
भोर की लाली
लगा दूँ
सिर पर तेरे
प्रीत का
घूंघट उढा दूँ

मेरी चाहत
तुझे दुल्हन बना दूँ

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

मेरे संवेदनहीन पिया

मेरे संवेदनहीन पिया
दर्द के अहसास से विहीन पिया
दर्द की हर हद से गुजर गया कोईऔर तुम मुस्कुराकर निकल गए
कैसे घुट-घुटकर जीती हूँ मैं
ज़हर के घूँट पीती हूँ मैं
साथ होकर भी दूर हूँ मैं
ये कैसे बन गए ,जीवन पिया
मेरे संवेदनहीन पिया
जिस्मों की नजदीकियां
बनी तुम्हारी चाहत पिया
रूह की घुटती सांसों को
जिला न पाए कभी पिया
मेरे संवेदनहीन पिया
आंखों में ठहरी खामोशी को
कभी समझ न पाए पिया
लबों पर दफ़न लफ्जों को
कभी पढ़ न पाए पिया
ये कैसी निराली रीत है
ये कैसी अपनी प्रीत है
तुम न कभी जान पाए पिया
मैं सदियों से मिटती रहीबेनूर ज़िन्दगी जीती रही
बदरंग हो गए हर रंग पिया
मेरे संवेदनहीन पिया
आस का दीपक बुझा चुकी हूँ
अपने हाथों मिटा चुकी हूँ
अरमानों को कफ़न उढा चुकी हूँ
नूर की इक बूँद की चाहत में
ख़ुद को भी मिटा चुकी हूँ
फिर भी न आए तुम पिया
कुछ भी न भाए तुम्हें पिया
कैसे तुम्हें पाऊँ पिया
कैसे अपना बनाऊं पिया
कौन सी जोत जगाऊँ पिया
मेरे संवेदनहीन पिया

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

सात दिनों का मेला

ये दुनिया सात दिनों का मेला
आठवां दिन न आया कभी
ख्वाब बरसों के बुनता रहा
पल भी चैन न पाया कभी
क्षण क्षण जीता मरता रहा
पर ख़ुद को न जान पाया कभी
आठवें दिन की आस में
सात दिन भी न जी पाया कभी
प्राणी जीवन सात दिनों का मेला है
कुछ तो यत्न करना होगा
सात दिनों में मरने से पहले
भवसिंधु से भी तरना होगा
जो जीवन भर न कर पाया
वो यत्न अब करना होगा
जैसा उज्जवल भेजा उसने
वैसा उज्जवल बनना होगा
ये दुनिया सात दिनों का मेला
आठवां दिन न आया कभी



कृपया मेरा नया ब्लॉग भी पढ़ें .................
http://ekprayas-vandana.blogspot.com

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

मौत भी उसकी मौत पर रोया करे

एक मौत,मर कर मरे , तो क्या मरे
आदमी है वो,जो हर पल, मर-मरकर जिया करे
मौत भी हार जाती है उसके आगे
जो ज़िन्दगी से मौत की ज़ंग लड़ा करे
मौत क्या मारेगी उस जीवट को
जो मौत को सामने देख हंसा करे
हो ज़िन्दगी ऐसी आदमी की
कि मौत भी ,उसकी मौत पर , रोया करे

कृपया मेरा नया ब्लॉग पढ़ें :
http://ekprayas-vandana.blogspot.com

बुधवार, 9 सितंबर 2009

विदा करो मुझे

किस शून्य में
छिप गए हो
कहाँ कहाँ ढूंढूं
किस अंतस को चीरूँ
जब से गए हो मुहँ मोड़कर
प्रीत की हर रीत तोड़कर
किस पथ को निहारूं मैं
कैसे बाट जोहारूं मैं
तुम तो मुख मोड़ गए
मुझे अकेला छोड़ गए
अंखियन ने बहना छोड़ दिया है
ह्रदय का स्पंदन रुक गया है
तुम्हारे वियोग में प्रीतम
अंतस मेरा सूख चुका है
वो तेरा रूठ कर जाना
फिर बुलाने पर भी ना आना
जीवन को ग्रहण लगा गया है
कैसे भीगी सदायें भेजूं
किन हवाओं से पैगाम भेजूं
कैसे ख़त पर तेरा नाम लिखूं
लहू भी सूख चुका है अब तो
निष्क्रिय तन है अब तो
सिर्फ़ साँसों की डोर है बाकी
विदाई की अन्तिम बेला है
और आस की डोर कहीं बंधी है
तुम्हारे मिलन को तरस रही है
तेरे दीदार की खातिर
ज़िन्दगी मौत से लड़ रही है
हर आती जाती साँस के साथ
अधरों पर
तेरे नाम की माला जप रही है
निश्चेतन तन में कहीं
कोई चेतना बची नही है
इक श्वास ही कहीं
अटकी पड़ी है
तेरे विरह में कहीं
भटक रही है
अब तो आ जा
अब तो आ जा..........
मुझे एक बार फिर से
अपना बना जा
मेरी विदाई को
मेरा इंतज़ार न बना
शायद यही सज़ा है मेरी
आह ! नही आओगे
लो चलती हूँ अब
विदा करो मुझे
मेरे इंतज़ार के साथ
आस भी टूट गई
रूह भी पथरा गई
और साँस थम गई

सोमवार, 7 सितंबर 2009

तुम्हारी कैसे बनूँ मैं

सुनो
सब सुनती हूँ मैं
तुम्हारे हर जज़्बात को
समझती हूँ मैं
जो तुम कहते हो
जो नही कहते
वो भी पहचानती हूँ मैं
फिर भी नही चाहती
तेरा इज़हार -ऐ-मोहब्बत
कभी तो समझो
तुम भी मेरी व्यथा
आत्मा पर मोहब्बत शब्द
इक बदनुमा दाग सा लगता है
ह्रदय को बींध जाता है
वैसे ही छलनी हुए इस दिल में
तुम अपने प्रेम का
एक और छिद्र न अन्वेषित करो
अब इसमें कुछ ठहरता नही
फिर तुम्हारे प्रेम को
कहाँ संजोऊँ मैं
कैसे तुम्हारे प्रेम की
आरती उतारूँ मैं कैसे दिल का दिया जलाऊँ मैंसब छिद्रों से प्रवाहित हो जाता है
तेरे प्रेम का रस
अंतस में कुछ भी ठहरता ही नही
भावनाओं का कोई ज्वार
उठता ही नही
प्रेमरस के महासागर की
कोई लहर भिगोती ही नही
ह्रदय तरंगित होता ही नही
कैसे प्रेम का बीज, रोपित करुँ
कहीं कोई स्फुरण होता ही नही
कहीं कोई स्पंदन होता ही नही
फिर कहो कैसे
तुम्हारे प्रेम को
अपना नाम दूँ
कहीं कोई हिलोर
उठती ही नही
फिर कैसे
तेरे सवालों का जवाब दूँ मैं
कैसे तेरे सपनो को
अपनी अंखियों में पालूँ मैं
इस सूखे ह्रदय को
कहो कैसे
प्रेम रस की चाशनी मैं
डूबा डालूँ मैं
कौन सी धातु से
इन छिद्रों को भरूँ मैं
कैसे तेरे प्रेम का प्याला
पियूं मैं
कैसे तुझे अपना
बनाऊं मैं
बोलो, बोलो न
एक बार तो
जवाब दे जाओ
मेरे इस छलनी
ह्रदय के घाव
कैसे भरेंगे
इतना तो बता जाओ
कैसे तुम्हारी
जोगन बनूँ मैं
कैसे इस अंतस की
पीर सहूँ मैं
तुम्हारी कैसे बनूँ मैं ..............................

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

उर्मिला की विरह वेदना

१) प्रियतम हे प्रानप्यारे
विदाई की अन्तिम बेला में
दरस को नैना तरस रहे हैं
ज्यों चंदा को चकोर तरसे है
आरती का थाल सजा है
प्रेम का दीपक यूँ जला है
ज्यों दीपक राग गाया गया हो

२) पावस ऋतु भी छा गई है
मेघ मल्हार गा रहे हैं
प्रियतम तुमको बुला रहे हैं
ह्रदय की किवाडिया खडका रहे हैं
विरह अगन में दहका रहे हैं
करोड़ों सूर्यों की दाहकता
ह्रदय को धधका रही है
प्रेम अगन में झुलसा रही है
देवराज बरसाएं नीर कितना ही
फिर भी ना शीतलता आ रही है

३) हे प्राणाधार
शरद ऋतु भी आ गई है
शरतचंद्र की चंचल चन्द्रकिरण भी
प्रिय वियोग में धधकती
अन्तःपुर की ज्वाला को
न हुलसा पा रही है
ह्रदय में अगन लगा रही है

४) ऋतुराज की मादकता भी छा गई है
मंद मंद बयार भी बह रही है
समीर की मोहकता भी
ना देह को भा रही है
चंपा चमेली की महक भी
प्रिय बिछोह को न सहला पा रही है

५) मेरे जीवनाधार
पतझड़ ऐसे ठहर गया है
खेत को जैसे पाला पड़ा हो
झर झर अश्रु बरस रहे हैं
जैसे शाख से पत्ते झड़ रहे हैं
उपवन सारे सूख गए हैं
पिय वियोग में डूब गए हैं
मेरी वेदना को समझ गए हैं
साथ देने को मचल गए हैं
जीवन ठूंठ सा बन गया है
हर श्रृंगार जैसे रूठ गया है

६) इंतज़ार मेरा पथरा गया है
विरहाग्नि में देह भी न जले है
क्यूंकि आत्मा तो तुम संग चले है
बिन आत्मा की देह में
वेदना का संसार पले है

७) मेरे विरह तप से नरोत्तम
पथ आलोकित होगा तुम्हारा
पोरुष को संबल मिलेगा
भात्री - सेवा को समर्पित तुम
पथ बाधा न बन पाऊँगी
अर्धांगिनी हूँ तुम्हारी
अपना फ़र्ज़ निभाउँगी
मेरी ओर न निहारना कभी
ख्याल भी ह्रदय में न लाना कभी
इंतज़ार का दीपक हथेली पर लिए
देहरी पर बैठी मिलूंगी
प्रीत के दीपक को मैं
अश्रुओं का घृत दूंगी
दीपक मेरी आस का है ये
मेरे प्रेम और विश्वास का है ये
कभी न बुझने पायेगा
इक दिन तुमको लौटा लायेगा,लौटा लायेगा .........................

शनिवार, 22 अगस्त 2009

आरजू

चंचल चपल हे मृगनयनी
नयन बाण से बिद्ध ह्रदय लो
अधरामृत का लेप लगाकर
प्रेम को आधार बनाकर
होशो-हवास पर मोहिनी बरसाकर
मुझको अपना श्याम बना लो
महारास की शीतल बेला में
रूप-लावण्य का रंग बिखरे है
पायल की छम-छम छंकारों पर
प्रीत का बादल नृत्य किए है
दास को प्रेम सुधा का पान कराकर
जीवन का अलंकार बनाकर
अपने हृदयांगन का प्रहरी बना लो
चंचल चपल हे मृगनयनी
मुझको अपना दास बना लो

रविवार, 16 अगस्त 2009

अलविदा मत कहा करो

अलविदा मत कहा करो
किसी के दिल पर क्या गुजरी
ये तुम क्या जानो
तेरे जाने और आने के
बीच का वक्त
कैसे गुजरता है
ये तुम क्या जानो
रोज मिलने को दिल
कितना तड़पता है
ये तुम क्या जानो
बातों की महावर लगाने को
दिल कितना मचलता है
दीदार का काजल लगाने को
नज़रें कितना तरसती हैं
ये तुम क्या जानो
लबों पर अल्फाजों का
तबस्सुम खिलाने को
दिल कितना भटकता है
ये तुम क्या जानो
दिलो की ये दूरी मिटाने को
कुछ पल तेरा साथ पाने को
दिल कितना सुबकता है
ये तुम क्या जानो
तेरे गीतों में ढल जाने को
तेरी काव्य धारा बन जाने को
दिल कितना सिसकता है
ये तुम क्या जानो
इसलिए
कभी अलविदा मत कहा करो

बुधवार, 12 अगस्त 2009

एक भाई का दर्द

एक बेबस भाई की मजबूरी
कोई क्या जाने
बेतरतीब से बिखरे बाल ,
पपडाए होंठ, वीरान आँखें
मैली सारी में लिपटी
इक जिंदा लाश को जब देखा हो
बुखार से तपती देह में भी
उफ़ न कर पाए जो
मर - मर कर हर काम
करती जाए जो
और फिर भी न किसी से
शिकायत कर पाए जो
ऐसा हाल जिस भाई ने
देखा हो अपनी बहन का
कितनी मौत मरा होगा
और अपनी बेबसी से लड़ा होगा
खून तो उसका भी खौला होगा
बंद जुबान को खोलना चाहा होगा
इंसान की खाल में छुपे भेडियों से
बहन को बचाना चाहा होगा
उसकी पीड़ा से कितना तडपा होगा
मगर बहन की आंखों में छुपी वेदना ने
हर भेद खोल दिया होगा
चुप रहने को मजबूर कर दिया होगा
क्यूंकि ज़िन्दगी तो उसे
वहीँ गुजारनी होगी
इसलिए खामोशी का ही
ज़हर पिया होगा
और भाई चाहकर भी
कुछ न कर पाया होगा
नाज़ों - नखरों से पली बहन की
दुर्दशा पर खून के आंसू रोया होगा
बहन की कसम से बंधे रिश्ते को
घुट-घुटकर कैसे निभाया होगा
और उसका दर्द माँ बाप से भी
न कह पाया होगा
और राखी का वचन
इस तरह निभाया होगा
बहन की रक्षा के वचन ने
किस कदर रुलाया होगा
तिल-तिल कर बिलखती
बहन को देख
कैसे आक्रोश को
जज्ब कर पाया होगा
अपने भाई होने के फ़र्ज़ को
कैसे छुपाया होगा
और आंखों में समंदर लिए
चुपचाप उसकी दहलीज से
थके क़दमों से चला आया होगा

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

देखा है कभी

इस शहर के हर शख्स की
आँख में उबलता आक्रोश
देखा है कभी
अपने वजूद से लड़ते
आदमी का रूप
देखा है कभी
सीने में धधकता
ज्वालामुखी लिए हर शख्स
रोज कैसे मर-मरकर जीता है
देखा है कभी
कब , किस मोड़ पर ये
ज्वालामुखी फट जाए
और किसी नुक्कड़ पर
सीने की भड़ास ,अपनी बेबसी
उतारता आदमी
देखा है कभी
परेशानियों से जूझता
ज़िन्दगी से लड़ता आदमी
देखा है कभी
रोज नए ख्वाब बुनता
और फिर रोज
उन ख्वाबों के टूटने पर
टूटता - बिखरता आदमी
देखा है कभी
जीवन जीने की
जद्दोजहदसे परेशान
कभी हालत से लड़ता
तो कभी ख़ुद से लड़ता आदमी
देखा है कभी

रविवार, 2 अगस्त 2009

पुरानी यादें

आज कॉलेज के वक्त की एक पुरानी कॉपी के कुछ पन्ने पढने लगी तो सभी पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं । उन्ही में से कुछ यादें आज आप सबके साथ बाँट रही हूँ .ये सब मेरे लिखे हुए तो नही हैं मगर जिसने भी लिखे हैं बहुत ही खूब लिखे हैं .उस वक्त मैं अपने को वक्त दे पाती थी तो सब पढ़ पाती थी और जो पसंद आ जाता था उसे अपनी यादों में सजा लेती थी।


इश्क के मकबरे के गुम्बद की ऊंचाई बहुत ऊंची है
कब्र में फनाई के अफ़साने खुदे हैं जिसकी सच्चाई
सिर्फ़ वहीं सच्ची लगती है । जन्नत और दो़जख
के मोहरबंद लिफाफे खुदा ने ख़ुद तसदीक किए हैं ।
कब्र की पाक जाली में रेशमी इच्छा मैं भी बांधूंगी
और देखूंगी कि मेरे मोहरबंद लिफाफे की तहरीर
क्या होगी ।


अनुरोध

मेरे तन से नही , दोस्त
मेरे मन से प्यार करो
मेरी उपस्थिति को ,
मेरे सामीप्य को ही ,
फकत न चाहो ,
एक रस्म भर न निबाहो ,
प्यार की कोई हद नही होती
तुम यह प्रमाणित कर दिखलाओ
मेरे सपनो से प्यार करो ,
मेरे विचारों को सराहो
सही और इमानदार करो
मेरे ही पर्याय हो जाओ
अपना प्यार महान हो जाए
तुम तुम न रहो , "मैं " हो जाओ ।