उजासों की कतरन
सांसों की धड़कन
लम्हों की सिहरन
अरमानों की थिरकन
भोर की गुनगुन
ज़िन्दगी को जीवंत करती
सांझ का पतझड़
रात का खंडहर
अहसासों का अकाल
चेहरों का बांझपन
दिलों का सूनापन
रिश्तों का बेगानापन
प्रतीक्षित लम्हों का खोखलापन
ज़िन्दगी को मृत्युतुल्य बनाता
आह ! ज़िन्दगी
कब , कैसे
भोर की लालिमा से
सांझ की कालिमा बन जाती
ज़िन्दगी पहेली है न सहेली
ज़िन्दगी एक ऐसी खोज है
जिसकी कोई मंजिल नहीं
अब लब सील लो
या खुलकर जी लो
निर्भर तुम पर करता है
ये आशिकी है न दीवानगी
खामोश सफ़र की कोई इन्तेहा सी
करती है गुफ्तगू
क्या जी सकते हो मुझे सच में ?
है इतनी जिन्दादिली ?
गर हो कोई जवाब तो आ जाना ज़िन्दगी के पालने में झूलने
मीठी लोरी सुना सुला देगी
स्वप्न मीठा फिर दिखा देगी
भोर में फिर जगा देगी
अपने होने के अर्थ बता देगी ...