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सोमवार, 7 सितंबर 2009

तुम्हारी कैसे बनूँ मैं

सुनो
सब सुनती हूँ मैं
तुम्हारे हर जज़्बात को
समझती हूँ मैं
जो तुम कहते हो
जो नही कहते
वो भी पहचानती हूँ मैं
फिर भी नही चाहती
तेरा इज़हार -ऐ-मोहब्बत
कभी तो समझो
तुम भी मेरी व्यथा
आत्मा पर मोहब्बत शब्द
इक बदनुमा दाग सा लगता है
ह्रदय को बींध जाता है
वैसे ही छलनी हुए इस दिल में
तुम अपने प्रेम का
एक और छिद्र न अन्वेषित करो
अब इसमें कुछ ठहरता नही
फिर तुम्हारे प्रेम को
कहाँ संजोऊँ मैं
कैसे तुम्हारे प्रेम की
आरती उतारूँ मैं कैसे दिल का दिया जलाऊँ मैंसब छिद्रों से प्रवाहित हो जाता है
तेरे प्रेम का रस
अंतस में कुछ भी ठहरता ही नही
भावनाओं का कोई ज्वार
उठता ही नही
प्रेमरस के महासागर की
कोई लहर भिगोती ही नही
ह्रदय तरंगित होता ही नही
कैसे प्रेम का बीज, रोपित करुँ
कहीं कोई स्फुरण होता ही नही
कहीं कोई स्पंदन होता ही नही
फिर कहो कैसे
तुम्हारे प्रेम को
अपना नाम दूँ
कहीं कोई हिलोर
उठती ही नही
फिर कैसे
तेरे सवालों का जवाब दूँ मैं
कैसे तेरे सपनो को
अपनी अंखियों में पालूँ मैं
इस सूखे ह्रदय को
कहो कैसे
प्रेम रस की चाशनी मैं
डूबा डालूँ मैं
कौन सी धातु से
इन छिद्रों को भरूँ मैं
कैसे तेरे प्रेम का प्याला
पियूं मैं
कैसे तुझे अपना
बनाऊं मैं
बोलो, बोलो न
एक बार तो
जवाब दे जाओ
मेरे इस छलनी
ह्रदय के घाव
कैसे भरेंगे
इतना तो बता जाओ
कैसे तुम्हारी
जोगन बनूँ मैं
कैसे इस अंतस की
पीर सहूँ मैं
तुम्हारी कैसे बनूँ मैं ..............................

31 टिप्‍पणियां:

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

सुंदर अनुभूति

abhishek ने कहा…

good keep it up

रश्मि प्रभा... ने कहा…

दर्द की असीम गहराइयों को उभारा है

kshama ने कहा…

Hameshakee tarah...lajawab...wo dinbhee aahee jayega, jiskee chahat hai..

काव्या शुक्ला ने कहा…

इतनी मर्म भरी रचनाएं कैसे लिख लेती हैं आप?
वैज्ञानिक दृ‍ष्टिकोण अपनाएं, राष्ट्र को उन्नति पथ पर ले जाएं।

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत गहरे भाव!! बधाई इस सुन्दर रचना के लिए.

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

वंदना जी,
आतंरिक पीडा की गहरी अनुभूति शब्दों में ढली है. नारी-मन की बेकसी का सच्चा बयान है यह :
'कभी तो समझो
तुम भी मेरी व्यथा
आत्मा पर मोहब्बत शब्द
इक बदनुमा दाग सा लगता है
ह्रदय को बींध जाता है...'
ये उदास अभिव्यक्ति मन को स्पर्श करती है !
--आ.

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

सुन्दर !

विनय ‘नज़र’ ने कहा…

उत्तम
---
BlueBird

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

वाह...!
बहुत सुन्दर रचना है ये तो...।
अन्तस् की गवेषणा औऱ vivechana donon ho bahut prabhavit karti hain
HINDI TOOL INACTIVE HO GAYA HAI
ISLIYE KISI TARAH MICTURE SE KAM CHALA LIYA HAI>
BAHUT BADHAI>

vinay ने कहा…

अति सुन्दर मार्मिक काव्य रचना

ओम आर्य ने कहा…

नारी व्यथा का सच्चा चित्रण .......बहुत ही सुन्दर .....बधाई

योगेश स्वप्न ने कहा…

vandana ji, behatareen abhivyakti ke liye dheron badhai.

sach maane bahut hi sunder dil ko chhoo lene wali rachna. wah.

समयचक्र ने कहा…

सच्चा चित्रण,बहुत ही सुन्दर...

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

गहरे भावों को गहरे शब्द देकर एक सुंदर रचना रच दी आपने। बहुत बेहतरीन।

M VERMA ने कहा…

व्यथा की अंतर्कथा अच्छी है.
लहरो के बिना भीगना तो नही हो पायेगा.
कब तक शांत रहेंगी लहरे --
लहर हवा के रूख का इंतज़ार कर रही है शायद

Nitish Raj ने कहा…

good one ....nice

raj ने कहा…

kaisee tadap hai jwaab pane ki?really nice one.....pyar or dard se bhari khoobsurat kavita....

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

badhiya bhaav ...

acchi kavita ...

..par vandana ji kahin bikhraav sa bhi lagta hai kavita main.

RAJESHWAR VASHISTHA ने कहा…

संवेदनशील और अनुभूतिपरक सुन्दर रचना ने अभिभूत कर दिया....बधाई...

राकेश जैन ने कहा…

bahut khub vandana ji!

dr. ashok priyaranjan ने कहा…

heart touching poem with deep feelings.

http://www.ashokvichar.blogspot.com

Basanta ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना है!

राकेश कुमार ने कहा…

एक विरहा की व्यथा को जो अपने नायक के प्यार को स्वीकार तो करना चाहती है पर वह अब जैसे एक पाषाण स्वरूप मे परिवर्तित हो चुकी है, उसकी भावनाये समाज के ताने बानो मे उलझी हुई जैसे म्रितप्राय सी हो गयी है, ऐसी नायिका की वेदना को अत्यन्त सुन्दर ढन्ग से चित्रित करने के लिये आपको ढेरो बढाईया.

तुम्हारे हर जज़्बात को
समझती हूँ मैं
जो तुम कहते हो
जो नही कहते
वो भी पहचानती हूँ मैं

एक नायिका विरह की अग्नि मे जलती हुई ना चाहकर भी जैसे सवेदनहीन हो जाती है, उसे अपने जीवन मे आयी रिक्तता को किसी के प्यार से परिपूरित करने का निश्चय ही मन करता होगा पर वह अब जैसे निष्ठुर हो चुकी है, सारी भावनाये मर सी गयी है, किसी के बेवफाई से आहत उसका ह्र्दय तार-तार हो चुका है और ऐसे मे किसी का प्रणय निवेदन उस भयन्कर सूखी धरती की तरह होता होगा, जिसकी छाती सूरज की तपन से फट चुकी है और वह मानसून की हल्की बारिश को ना तो हा कह सकती और ना ही नही. वैसे भी एक बार मुरझायी हुई भावनाओ मे बडी बमुश्किल जीवन आ पाता है, वह कठिनता से फिर उसी तरह शायद लहलहा पाती हो.

और सचमुच मै कहू यही पवित्र प्यार है,तो शायद अतिशयोक्ति नही होगी.

आपने बडे सुन्दर ढन्ग से शब्दो मे इन्हे पिरोया है, पढते हुये जैसे आन्खे नम हो आयी.

Dr. Amarjeet Kaunke ने कहा…

bahut pyare bhavon ko prakat kia hai...mubarak

सुभाष चन्द्र ने कहा…

अदभुत। महानगरों में छीजते मानवीय संवेदनाओं के बीच आप के अंदर 'भावनाओंÓ का अपरिमित संसार है। पयोधि की गहराई है। अपने विचारों को उन्मुक्त आकाश में विचरण कराने का सामथ्र्य भी...
और क्या कहें?

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मन में उठती पीडा को शब्दों का रूप दे दिया आपने ......... गहरी बात और गहरी अनुभूति है इस रचना में .......... दिल के करीब लिका है ...........

प्रीति टेलर ने कहा…

इतनी सारी भावना समजने की ताकत सिर्फ प्यार को समजने वाले में ही होती है ...प्यार को बहने दो उसकी तासीर येही है और देखो प्यार छेद से कहाँ बहा है ??? आपकी कलम से बहता है और हम सब पढ़ते है ....बहुत अच्छे...

Nirmla Kapila ने कहा…

वन्दना आँखेंनम हो गयी दिल मे अंदर तक उतर गयी तुम्हारी ये अनुभूती
फिर भी नही चाहती
तेरा इज़हार -ऐ-मोहब्बत
कभी तो समझो
तुम भी मेरी व्यथा
आत्मा पर मोहब्बत शब्द
इक बदनुमा दाग सा लगता है
ह्रदय को बींध जाता है
वैसे ही छलनी हुए इस दिल में
तुम अपने प्रेम का
एक और छिद्र न अन्वेषित करो
असीम दर्द समेटे सुन्दर रचना शुभकामनायें

Rakesh ने कहा…

कैसे
में तेरी जोगन बनू/कैसे......अंतस की
पीर ..वंदनाजी बहुत ही बढ़िया



अच्छा लगा आपको पढ़कर

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

main kya kahun ji .. aapki is rachna ne kitna dard sambhaale hue hai apne shabdo me .. amazing thoughts and very expressive words..

waaaaaaaaaaaaaaah