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रविवार, 21 जून 2009

धरती और आकाश का क्षितिज

धरती और आकाश का क्षितिज
दूर बहुत दूर ..........अनन्त में
कभी मिलकर भी
नही मिल पाते
धरती यूँ ही
आकाश की तरफ़
एकटक , टकटकी बांधे
ताकती रहती है
नेह को उसके
तरसती रहती है
और आकाश
जब मन चाहे तब
बरस जाता है
उसकी चुनरिया को
धानी कर जाता है
और धरती प्रेम के
अथाह सागर में
डूब जाती है
और कभी कभी
ऐसा भी होता है
धरती जो आकाश की ओर
निहारते - निहारते
अपने वजूद को भी
खोने लगती है
तब भी आकाश
अपने अहम् में चूर
धरती की प्रीत को
उसके स्नेह को
उसके धैर्य को
भुलाकर , उसे
वृक्ष के ठूंठ सा
बाँझ बना देता है
उसके रूप - सौष्ठव को
उसकी गरिमा को
उसके त्याग को
बंजर बना देता है
प्रेम के अंकुर को सुखा देता है
उसकी सहनशीलता को
तीक्ष्ण ताप से
कुम्हला देता है
इतनी उपेक्षित होकर भी
धरती आकाश से
मिलन की चाह में
अपने को मिटाती रहती है
एक क्षितिज की चाह में
ख़ुद को भुलाती रहती है
और क्षितिज कभी
नही मिलता उसे
कभी नही मिलता ..........

सोमवार, 8 जून 2009

सिर्फ़ एक दिन

अपनी ज़िन्दगी से
सिर्फ़ एक दिन
उधार दे दो मुझे
उस एक दिन में
उम्र गुजार लेने दो मुझे
एक -एक पल को
यादों में सजा लेने दो मुझे
मेरे संग ,
उम्र के हर बंधन को तोड़ते हुए
कुछ पलों के लिए
ज़िन्दगी को जी लेने दो मुझे
तुम मुझमें और मैं तुम में
ऐसे डूब जायें जहाँ
तुम आंखों से बोलो
और मैं उन अंखियों की
हर भाषा को
हर शब्द को
दिल में उतार लूँ
सिर्फ़ एक दिन तुम
मुझे अपना दे दो
और उस एक दिन में
मेरी उम्र बीत जाए
फिर आँख न खुले
फिर ये सपना न टूटे
बस
ज़िन्दगी की हर तमन्ना
पूरी हो जाए
तुम्हारा हाथ हो मेरे हाथ में
उस स्पर्श को
दिल के एक खास हिस्से में
सहेज लूँ
उस अहसास को कुछ पलों
में ही जी लूँ
सिर्फ़ एक दिन तुम
मुझे अपना दे दो
उस एक दिन में
मेरी ज़िन्दगी बसर हो जाए
तुम्हारे हाथों में
रजनीगंधा के फूल हों
मेरे दिल के हर कोने को
उसकी खुशबू से ऐसे महका दो
फिर कोई सुगंध न बसे मन में
तुम्हारी यादों की खुशबू में
तन मन रच बस जाए
बस एक दिन
तुम मुझे अपना उधार दे दो
मुझे मेरी ज़िन्दगी
जी लेने दो
सिर्फ़ एक दिन तुम
प्रेमी बन जाओ
मैं तुमसे रूठ जाऊँ
और तुम
मनुहार करके
मनाओ मुझे
एक दिन के लिए
प्रेमिका अपनी बनाओ मुझे
और उस एक दिन में
प्रेम के सारे रंग
दिखाओ मुझे
प्रेम रंग में ऐसे डूब जाऊँ
फिर न कोई रंग चढ़े
हर ख्वाहिश पूरी हो जाए
और फिर
उसी प्रेम रंग में
ज़िन्दगी तमाम हो जाए
फिर उस दिन की
कोई शाम न हो
कोई सुबह न हो
कोई कल न हो
कोई दिन न हो
कोई रात न हो
सिर्फ़ इसी एक दिन में
पूरी उम्र गुजर जाए

गुरुवार, 4 जून 2009

एक मुलाक़ात -----सायों की

एक अनजाने
अनदेखे
अजनबी से मोड़ पर
तेरा साया
मेरे साये से
टकरा गया
चारों आँखें
जब टकराई
तो देखा
मेरे साये ने
तेरे साये की
आंखों में
वहां शमशान की
वीरानी थी
सूखे हुए
अश्कों के निशान
तेरी कहानी
कह गए
एक वीराने की
खामोशी
एक अजनबियत
लिए तेरी आँखें
सब हाल बयां
कर गयीं
मेरे साये ने
तेरे साये की
आंखों में
मेरी तस्वीर
ढूंढनी चाही
राख के ढेर में
चाहत की
इक चिंगारी
ढूंढनी चाही
पर वहां तो
एक बेजुबान चीख
दबी दिखी
बिना किसी हलचल के
बिना किसी चाहत के
छुपी हुयी खामोशी देखी
तेरी चाहत की
इंतहा देखी
कोई उम्मीद
न बाकी देखी
पहचानना तो
दूर की बात थी
तेरे साये की
आंखों में
मेरे साये ने
लाश की सी
वीरानी दखी
और फिर
उस अजनबी मोड़ पर
बिना रुके
बिना मुडे
बिना देखे
बिना बात किए
तेरा साया
आगे बढ़ता गया
और मेरा साया
तेरे साये के
क़दमों के निशां तले
तेरे मेरे रिश्ते की
राख को
संजोता रहा

शुक्रवार, 29 मई 2009

बेदर्द मौसम

मौसम का क्या है
बदलता ही रहता है
और फिर लौट कर
भी आता रहता है
मगर कुछ मौसम
ऐसे भी होते हैं
एक बार जो चले जायें
फिर कभी लौट कर नही आते
फिर कितना भी पुकारो
कितने ही पैगाम भेजो
बंजर जमीन की तरह
फिर वहां कोई फूल नही खिलता
बड़े बेदर्द मौसम होते हैं कुछ
यादों में ही बरसते हैं
यादों में ही उलझते हैं
कभी सर्द रातों की तरह
तो कभी धूप की चादर की तरह
कभी मौसमी बरसात की तरह
तो कभी पतझड़ में ठूंठ हुए
पेड़ की तरह
ये बेदर्द मौसम
सिर्फ़ दर्द देकर चले जाते हैं
ऊम्र भर का
लौट कर फिर न आने के लिए।

मंगलवार, 26 मई 2009

एक दास्ताँ ये भी ..........भाग २

आज मौन को तोड़ती हूँ
और बताती हूँ तुम्हें
हम तो सिर्फ़ अहसास हैं
ख्यालों में आस पास हैं
रिश्ता नही कहूँगी इसे
वरना बंधन बन जाएगा
एक बेनामी सा अहसास है
तू कभी मेरा था ही नही
और न ही मैं कभी तेरी
फिर भी ख्यालों में अपने- अपने
हम दोनों पास-पास हैं
मैंने तो कोई वादा किया ही नही
कभी कोई कसम खायी ही नही
और तू जानता है ये
तुझे कभी चाहा भी नही
फिर भी एक अहसास है तू मेरा
जिसे खो भी नही सकती
और पा भी नही सकती
न तूने मुझे देखा
न मैंने तुझे देखा
ऐ मेरे बिन देखे अहसास
न भटक इस मृगतृष्णा में
तुझसे दूर होकर भी पास हूँ मैं
फिर भी न जाने क्यूँ
तुमने या कहो
तेरी चाहत ने खुदा बनाया मुझे
तेरे अनकहे जज़्बात
तेरी भटकती भावनाएं
तेरे खामोश अल्फाज़
तेरे दर्द की इम्तिहान कह जाते हैं
तेरी चाहत का इल्म करा जाते हैं
फिर क्यूँ तू उन्हें
शब्दों में ढालना चाहता है
शब्दों का जामा पहनाकर
इक नया रूप देना चाहता है
कुछ तार दिल से बंधे होते हैं
शब्द जहाँ गौन हो जाते हैं
बंधन दिल के होते हैं
शब्दों के नही
फिर क्यूँ तू मुझे अपनी
ख्याली चाहत में बांधना चाहता है
क्यूँ हर बात का इकरार चाहता है
कुछ बातें बिना किए भी होती हैं
कुछ चाहतें खामोश भी हुआ करती हैं
बिना किसी आडम्बर के
बिना किसी बंधन के
बिना किसी वादे के
और तुम हो कि
चाहत को बाँध रहे हो
शब्दों के तराजू में
तोल रहे हो
क्या हर बात का
इकरार जरूरी होता है
शब्दों में बांधने का
व्यापार जरूरी होता है
मेरे अनकहे जज्बातों को
तुझे समझना होगा
मुझे मुझसे छीनने का जूनून
तुझे छोड़ना होगा
अपने ख्यालों के बंधन में
न बांधना होगा
कुछ मेरे जज्बातों को भी
समझना होगा
चाहत के रंग को
बदलना होगा
मुझे खुदा बनाने वाले
अब तुझे ख़ुद बदलना होगा
क्या अपने खुदा की
एक बात नही मानोगे
सिर्फ़ अहसासों में
चाहत को समेटना होगा
दिल की बात को
जुबान पर न लाना होगा
खामोश रहकर चाहत को
निभाना होगा
तेरी चाहत न रुसवा कर दे मुझको
अब अपनी चाहत को
तुझे दफ़न करना होगा
अरमानों की कब्र सजानी होगी
क्या ये इम्तिहान दे पायेगा
इश्क के इम्तिहान दुनिया ने लिए
आज तेरा इम्तिहान है
तेरे इश्क का इम्तिहान है
जहाँ इश्क तुझसे
तेरी चाहत का
तेरे जूनून का
तेरे सब्र का
इम्तिहान लेगा
तेरी चाहत को
दोस्ती का कफ़न उढाकर
उसे एक नया रूप देगा
क्या इतना तू कर पायेगा
चाहत को दोस्ती में
बदल पायेगा
गर तू ऐसा कर पाया
तो तेरा नाम भी
इश्क की किताब में
अमर हो जाएगा

शनिवार, 23 मई 2009

एक दास्ताँ ये भी ..............भाग १

न जाने कैसे और कब
तुमने ज़िन्दगी में दस्तक दी
धीरे धीरे खामोशी से
अपने जज्बात बयां करते रहे
तुम कहते रहे और
मैं सुनती रही
बिना कुछ पूछे
बिना कुछ जाने
तुम्हारे साथ बहती रही
तुम्हारे दिल की हर बात को
तुम्हारे नगमों में
तो कभी
तुम्हारी ग़ज़लों में
बार बार पढ़ती रही
तुम्हें जानने का
तुम्हारे जज़्बात पहचानने का
दावा करती रही
तुम्हारे अंदाजे बयां पर
मिटती रही
मेरी खामोशी को
तुम इकरार समझ लोगे
मेरे मौन को मेरा
इकरार समझ लोगे
मौन की भी अपनी
भाषा होती है
कभी इकरार की
तो कभी इंकार की
जानती हूँ मैं
आज मौन को शायद
तोड़ना होगा
अपने मौन को
परिभाषित करना होगा
जानती हूँ तुम तन का नही
मन का रिश्ता चाहते हो
मुझे अपनी प्रेरणा
बनाना चाहते हो
अपनी छवि देखी है मैंने
तुम्हारे हर गीत में
उस गीत में छुपे
हर दर्द में
हर शब्द में
हर भाव में
देह से परे
भावों के रिश्ते
कुछ खास होते हैं
जिन्हें न कोई
समझ पाता है
इसलिए आज
मौन को तोड़ना होगा
तुझे ये समझना होगा
ये सिर्फ़ और सिर्फ़
तेरे जज़्बात हैं
मुझे अपनी चाहत न मान
अपने मचलते हुए अरमानों में
न भटकना होगा तुझे
मैं तो सिर्फ़ एक पड़ाव हूँ .....................

क्रमशः .................

शुक्रवार, 15 मई 2009

जिस्म के रिश्ते

प्यार यहाँ होता है कहाँ
सिर्फ़ शरीरों का व्या
पार  होता है यहाँ
रोटी , कपड़ा और मकान के बदले
सिर्फ़ शरीरों के सौदे होते हैं यहाँ
सौदों का बाज़ार सजा है
जिस्म जहाँ व्यापार बना है
जरूरत के बाज़ार में सिर्फ़
जरूरतों के सौदे होते हैं
कीमत चुकाकर शरीरों की
आत्मा को बेचा जाता है
प्यार की कीमत न जाने कोई
शरीरों को जाना जाता है
जिस्म की भूख से पीड़ित जो
वो रूह की भूख को क्या जाने
ये शरीर के भूखे भेडिये
दिलों की आवाज़ कब सुन पाते हैं
शरीरों को चाहने वाले कब
प्यार को पहचान पाते हैं
जिस्मों के बाज़ार में
प्यार का कोई मोल नही
ख़ुद को मिटा देती है जो
उसके अरमानों का कोई मोल नही
जिस्म खुदा बन जाए जहाँ
वहां जज्बातों का मोल कहाँ
ये जिस्मों से बंधे जिस्मों के रिश्ते
जिस्मों के बाज़ार में ख़रीदे बेचे जाते हैं
जिस्मफरोशी की रूह भी काँपे जहाँ
ये इतनी क़यामत ढाते हैं
ये जिस्मों के रिश्ते
जिस्मों पर ही सिमट जाते हैं 

आत्मा को ना छू पाते हैं 

बुधवार, 13 मई 2009

तेरा नाम

मुझे आइना दिखाने वाले
मुझे मुझसे मिलाने वाले
कल तक तुझे था इंतज़ार
आज तुम बन गए हो मेरा प्यार
मेरे इस जनम को सजाने वाले
कल तक थे तुम अजनबी
आज तुम बन गए हो हमराही
मेरी रूह की प्यास बुझाने वाले
मेरी जन्मों की थकन मिटाने वाले
मेरी खामोशी को जुबान देने वाले
मेरे दर्द को भी पी जाने वाले
कल तक तुझे था प्यार
आज मेरी जुबान पर है
बस तेरा नाम , तेरा नाम, तेरा नाम .......................

शनिवार, 2 मई 2009

ऐसा भी होता है

खुश्क आँखें भी रोया करती हैं
पत्थर भी सदाएं देते हैं
ठहरे हुए हर लम्हे की
खामोशी भी पुकारा करती है

खुशियाँ भी रोया करती हैं
गम भी हंसा करते हैं
चलती हुई ज़िन्दगी का
वक्त भी रुका करता है


रूहें भी रोया करती हैं
ज़ख्म भी हंसाया करते हैं
दफ़न होने के बाद भी ,रूहें
ज़िन्दगी को बुलाया करती हैं.

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

निर्णय करें ................क्या मुझे लिखना छोड़ देना चाहिए?

दोस्तों,

आज मैं मजबूर होकर आपके दरबार में आई हूँ .अब आप ही निर्णय करें और बताएं मुझे क्या करना चाहिए।
मेरे एक शुभचिंतक हैं रावेन्द्र रवि जी.............वो बेचारे मेरे लेखन से बहुत त्रस्त हैं। जब भी मौका मिलता है कहने से नही चूकते.उन्हें मेरा लेखन कभी भी पसंद नही आया । मेरे ब्लॉग पर ही कई बार मुझे उनकी टिप्पणियां मिलीं मगर मैंने उन्हें डिलीट नही किया क्यूंकि कहने का सभी को अधिकार है । जब तक कोई बताएगा नही तो कमियां कैसे पता चलेंगी । बस इसीलिए उन्होंने जो कहा मैंने हमेशा वो वैसा ही प्रकाशित भी किया । मगर अब तो उन्हें मेरी की हुई टिप्पणियां भी पसंद नही आतीं या कहिये जहाँ भी मैं टिपण्णी करती हूँ वहीँ जाकर मेरे लेखन के बारे में जी भरकर लिखते हैं ।

मैंने अपने प्रोफाइल में शुरू में ही लिखा है कि जो भी मन में आता है मैं वो ही लिखती हूँ । ये सब मैं आत्संतुष्टि के लिए लिखती हूँ । और मेरे ख्याल से आत्मसंतुष्टि के लिए कुछ भी करना कोई गुनाह तो नही है , कम से कम वो तो जिससे किसी का कुछ बुरा न हो। वैसे भी हम ऐसे देश के नागरिक हैं जहाँ कानून और संविधान भी हमें कुछ भी कहने की इजाज़त देता है। तो ऐसे में अगर मैं अपने सुख के लिए कुछ करती हूँ तो इसमें किसी को भी कोई परेशानी तो नही होनी चाहिए। मेरे बारे में ग़लत बातें कहकर मुझे लिखने से रोकना या मेरे लिखे को ग़लत कहना ------------क्या यह मेरे अधिकारों का हनन नही है।
एक बात और कहना चाहती हूँ .............यह जो रवि जी हैं ...........अपने ब्लॉग पर अपना लिखा कम और दुनिया का ज्यादा लगाते हैं..................क्या ऐसे मैं उन्हें कुछ कहने का अधिकार है? जब आप अपना नही लिख सकते तो मेरे ख्याल से दूसरे को भी कुछ कहने का अधिकार नही बनता । कम से कम उन लोगों को तो नही कह सकते जो कोशिश तो करते हैं अपने दिल की बातों को शब्द देने की । मेरे ख्याल से ...........शीशे के घर में रहने वालों को दूसरे पर पत्थर नही फेंकने चाहिए।

हों सकता है मुझे हिन्दी के व्याकरण पक्ष का कुछ कम ज्ञान हो ,शायद मैं छंद , दोहे,सोरठे,गीत या ग़ज़ल के बारे में इतना कुछ न जानती होऊं ..........मगर किसी के दिल से निकले जज़्बात तो अच्छे से समझती हूँ । और इसीलिए चाहती हूँ .....................अब आप ही निर्णय करें .............क्या मैं गलत हूँ?
क्या मुझे लिखना छोड़ देना चाहिए?

सोमवार, 27 अप्रैल 2009

क्या खोजा क्या पाया

दोस्तों ,

ज़िन्दगी पर आज मैं अपनी ५० वीं पोस्ट डाल रही हूँ , उम्मीद है हमेशा की तरह इसे भी आपका प्यार मिलेगा।


आज खोजने चली मैं
क्या ? पता नही
पर , फिर भी चली मैं
हर तरफ़ इक
भीड़ नज़र आई
भागती , दौड़ती
ज़िन्दगी नज़र आई
न जाने किस उधेड़बुन में
गुजरती ज़िन्दगी
नज़र आई
अपनी ही उलझनों में
उलझती ज़िन्दगी
नज़र आई
कभी खुशियों को
तो कभी ग़मों को
छूती , ज़िन्दगी नज़र आई
तो कहीं
वक्त रुका हुआ नज़र आया
जैसे कहीं ठहर गया था
कहीं कोई स्पंदन न था
अनुभूतियाँ सब रुक चुकी थीं
अवलंबन सब टूट चुके थे
अपने सब पीछे छूट चुके थे
तो कहीं
सिर्फ़ खामोशी ही नज़र आई
सागर सी गहराई नज़र आई
वक्त की सुइयों पर टिकी
निगाहें ही नज़र आयीं
पल -पल को काटता
वक्त नज़र आया
अकेलेपन को झेलता
वो दर्द नज़र आया
आज खोजने चली मैं
तो पता नही
क्या खोजा क्या पाया

शनिवार, 25 अप्रैल 2009

किसका दोष ?

पता नही चेहरे में दोष था या आईने में
सूरत बदली ही नज़र आई
रुख आईने का बदल बदल कर देखा
हर बार सूरत में भी फर्क पाया
ऐ यार , दोष किसका था , कैसे जानें
यहाँ तो रोज आईने भी बदल जाते हैं
और सूरत भी
कभी आइना सूरत सा लगा
और
कभी सूरत आईने सी लगी
हर सूरत आईने का ही प्रतिबिम्ब लगी
फिर कैसे ढूंढें वो अक्स
जो आईने सा न लगे
या फिर
कैसे ढूंढें वो आईना
जो सूरत सा न लगे

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

तेरे गीतों पर

तेरे गीतों की स्वरलहरी पर
कदम मेरे मचल जाते हैं
तू बादल बन छा जाता है
मैं मोर सी थिरक जाती हूँ
तेरे गीतों के बोलो पर
दिल मेरा तड़प जाता है
तू दर्द बन छा जाता है
मैं आंसुओं में डूब जाती हूँ
तेरी गीतों की हर धुन पर
इक आह सी निकल जाती है
तू भंवरा सा गुनगुनाता है
मैं कली सी शरमा जाती हूँ

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

पुकार

कान्हा तेरे दरस के दीवाने
नैन मेरे बरसे हर पल
कब दोगे दरस कन्हाई
अब तो हो गई जग में हंसाई
मैं तो हो गई तेरी दीवानी
दर दर भटकूँ मारी मारी
खोजत खोजत मैं तो हारी
अब तो दे दो दर्शन कन्हाई
जन्मों से मैं भटक रही हूँ
तेरे मिलन को तरस रही हूँ
जनम जनम की प्यासी हूँ
तेरे विरह में तड़प रही हूँ
अब तो दिखा दो झलक कन्हाई
वरना होगी जग में रुसवाई
सुनते हो तुम सबकी पुकार
मेरी बारी क्यूँ चुप्पी साधी
क्या मैं तेरे लायक नही हूँ
या मेरी पुकार में कमी है
एक बार बतला जा कान्हा
कैसे होगा मिलन हमारा

रविवार, 12 अप्रैल 2009

मत ढूंढो कविता इसमें

दिल से निकले उदगारों का नाम कविता है
मत बंधो इसे गद्य या पद्य में
मत ढूंढो इसमें छंदों को
जो भी दिल की हो आवाज़
उसी का नाम कविता है
क्यूँ ढूंढें हम छंदों को
जब छंद बसे हों दिल में
क्यूँ जाने हम गद्य को
जब हर लफ्ज़ में हों भाव भरे
मत रोको इन हवाओं को
जो किसी के मन में बह रही हैं
चाहे हों कविता रूपी
चाहे हों ग़ज़लों रूपी
या न भी हों मगर
साँस साँस की आवाज़ को
मत बांधो तुम पद्यों में
मत ढूंढो साहित्य इसमें
मत ढूंढो काव्य इसमें
ये तो दिलों की धड़कन हैं
जो भाव रूप में उभरी हैं
भावों में जीने वाले
क्या जाने काव्यात्मकता को
वो तो भावों को ही पीते हैं
और भावों में ही जीते हैं
बस भावाव्यक्ति के सहारे ही
दिल के दर्द को लिखते हैं
कभी पास जाओ उनके
तो जानोगे उनके दर्द को
कभी कुछ पल ठहरो
तो जानोगे उनकी गहराई को
वो तो इस महासमुद्र की
तलहटी में दबे वो रत्न हैं
जिन्हें न किसी ने देखा है
जिन्हें न किसी ने जाना है
अभी तुम क्या जानो
सागर की गहराई को
एक बार उतरो तो सही
फिर जानोगे इस आशनाई को
किसी के दिल के भावों को
मत तोड़ो व्यंग्य बाणों से
ये तो दिल की बातें हैं
दिलवाले ही समझते हैं
तुम मत ढूंढो कविता इसमें
तुम मत ढूंढो कविता इसमें............................

शनिवार, 11 अप्रैल 2009

अविरल प्रेम को जाना होता

तू कृष्ण बनकर जो आया होता
तो मुझमें ही राधा को पाया होता

कभी कृष्ण सी बंसी बजायी होती
तो मैं भी राधा सी दौडी आई होती

कभी कृष्ण सा प्रेमी बना होता
तो तुझमें ही राधा समायी होती

गर तूने कृष्ण को जाना होता
तो कब का राधा को पा लिया होता

इन अनन्य प्रेमियों की फेहरिस्त में
अपना नाम भी सजा लिया होता

अनन्य प्रेम में एक बार पगा होता
तो अविरल प्रेम को पा लिया होता

फिर वहां न मैं होती न तू होता
कृष्ण राधा सा स्वरुप पा लिया होता

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

उम्र के पड़ाव

उम्र के इक पड़ाव पर
सब कुछ अच्छा लगता है
साथी का हर अंदाज़
निराला लगता है
हर खामी भी
इक अदा सी लगती है

उम्र के अगले पड़ाव पर
सब कुछ बदलने लगता है
साथी का सादा वक्तव्य भी
शूल सा चुभने लगता है
शब्दों के रस की जगह
अब ज़हर सा घुलने लगता है

उम्र के आखिरी पड़ाव पर
कुछ भी न अच्छा लगता है
साथी की तो बात ही क्या
अपना साथ भी न अच्छा लगता है
कभी दिल बच्चा बनने लगता है
कभी उम्र का बोझ बढ़ने लगता है
उम्र के इस पड़ाव पर
कोई न चाहत होती है
सिर्फ़ खामोशी होती है
और इंतज़ार ..........................
एक खामोश पल का .........................

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

इक ताजमहल दिल का

मुझे ताजमहल अपना बनाया होता
फिर दर्द ज़िन्दगी में न आया होता

कभी मुझसे दिल लगाया होता
ज़ख्म खाकर यूँ न मुरझाया होता

कुछ पल खामोश गुजर गए होते
गर मुझको ज़िन्दगी में बुलाया होता

लबों पे ये खामोशी न होती
गर मुझे दिल में बसाया होता

दर-ओ-दीवार यूँ ना सूने होते
गर मेरी तस्वीर को लगाया होता

मुझे मुमताज अपनी बनाया होता
तो रूह को तेरी सुकून आया होता

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

ये कैसा इंतज़ार !

तुमने दर्द माँगा
मैं दे न सकी
तुमने दिल माँगा
मैं दे न सकी
तुमने आंसू मांगे
मैं दे न सकी
तुमने प्यार माँगा
मैं दे न सकी
तुमने मुझे चाहा
मैं तुम्हें चाह न सकी
दिल की बात कभी
होठों पर ला न सकी
न जाने किस मिटटी के बने हो तुम
जन्मों के इंतज़ार के लिए खड़े हो तुम
ये कैसी खामोशी है
ये कैसा नशा है
ये कैसा प्यार है
जिसे जन्मों का इंतज़ार है
क्यूँ ज़हर ये पी रहे हो
क्यूँ इश्क में मर रहे हो
मैं इक ख्वाब हूँ , हकीकत नही
किसी की प्रेयसी हूँ,तेरी नही
फिर क्यूँ इस पागलपन में
जी रहे हो
इतना दीवानावार प्यार कर रहे हो
अगले जनम मिलन की आस में
क्यूँ मेरा इंतज़ार कर रहे हो

रविवार, 29 मार्च 2009

टुकडियां

एक कल
कल आया था
एक कल
आज आया है
एक कल
कल आएगा
ये कल कल
में जीवन
यूँ ही गुजर जाएगा



इस बार
मौसम की तरह
मैं भी बदली
कभी कली सी खिली
कभी पतझड़ सी मुरझाई
कभी बदली सी बरसी
कभी कुहासे सी शरमाई


बिना कहे भी बात होती है
बिना मिले भी मुलाक़ात होती है
जब बंधे हो दिल के तार दिल से
तब बिन सावन भी बरसात होती है


दिल ने दिल से पूछा
दिल ने दिल से बात की
दिल ने दिल को आवाज़ दी
दिल से दिल की आवाज़ आई
दिल को न ढूंढ यारा
अब दिल दिल न रहा


अपनी बेबसी को बयां करती हो
ज़ख्म दिल के छुपा लेती हो
अंखियों तुम हो कमाल की
नज़रों में ठहरे मोतियों को भी
पलकों के कोरों में दबा लेती हो

शनिवार, 21 मार्च 2009

मंथन

मंथन किसी का भी करो
मगर पहले तो
विष ही निकलता है
शुद्धिकरण के बाद ही
अमृत बरसता है
सागर के मंथन पर भी
विष ही पहले
निकला था
विष के बाद ही
अमृत बरसा था
विष को पीने वाला
महादेव कहलाया
अमृत को पीने वालों ने भी
देवता का पद पाया
आत्म मंथन करके देखो
लोभ , मोह , राग ,द्वेष
इर्ष्या , अंहकार रुपी
विष ही पहले निकलेगा
इस विष को पीना
किसी को आता नही
इसीलिए कोई
महादेव कहलाता नही
आत्म मंथन के बाद ही
सुधा बरसता है
इस गरल के निकलते ही
जीवन बदलता है
पूर्ण शुद्धता पाओगे जब
तब अमृत्व स्वयं मिल जाएगा
उसे खोजने कहाँ जाओगे
अन्दर ही पा जाओगे
आत्म मंथन के बाद ही
स्वयं को पाओगे
मंथन किसी का भी करो
पहले विष तो फिर
अमृत को भी
पाना ही होगा
लेकिन मंथन तो करना ही होगा

मंगलवार, 17 मार्च 2009

क्या मैं इंसान हूँ ?

क्या मैं इंसान हूँ?
क्या मुझमें
संवेदनाएं हैं ?
जब किसी का दर्द
मुझे विचलित नही करता
किसी के दुःख से
मैं द्रवीभूत नही होता
किसी की खुशी से
मैं खुश नही होता
किसी के लिए भी
मेरे दिल में
अहसास नही होते
मैं अपनी ही धुन में
बेखबर ,
अपने सुख के लिए ही
जीना चाहता हूँ
क्या मैं इंसान हूँ?
ना अपना देखता हूँ
ना पराये को
जो हूँ बस मैं हूँ
मैं किसी भी
हादसे को देखकर भी
अनदेखा कर देता हूँ
मगर अपने साथ हुए
हर हादसे के प्रति
मैं दुखित हो जाता हूँ
कभी बोध नही कर पाता
दुख तो सबका बराबर है
क्या मैं इंसान हूँ?
एक धमाके से
घरों को बरबाद करता हूँ
घरों के सूने आँगन से
सिसकती आहों से
मुझे कोई सरोकार नही
बस मैं जो चाहता हूँ
वो पाना चाहता हूँ
फिर चाहे किसी का
आँगन सूना हो
या मांग सूनी हो
कोई अनाथ हो या
किसी के सर से ही
बाप का साया उठे
मुझे तो सिर्फ़ अपना
आँगन सजाना है
अपने दर्द से निजात पाना है
क्या मैं इंसान हूँ?
संवेदनहीन ,संवेदनाशून्य,
निर्मम ,निष्ठुर
क्या मैं इंसान हूँ ?

शुक्रवार, 13 मार्च 2009

टीस

खुशियाँ भी कभी
खुशी से न मिलीं
जब भी मिली
कोई खुशी
अपने साथ
लाखों ग़मों की
सौगात लेकर मिली
दामन था छोटा
किस किस को सँभालते
जो था ज्यादा
उससे ही दामन भर गया
और खुशी जा जाने
कब फिसल गई
हर खुशी ऐसे ही
फिसल जाती है
दामन में न समाती है
ये तो वो अमृत की बूँद है
जो ज़हर में पड़ जाती है
फिर भी असर न दिखाती है

बुधवार, 11 मार्च 2009

ये कैसी होली

कहीं तो रंग ,अबीर ,गुलाल उडाते
रंगों की बोछार उडाते
होली लोग मनाते
और
कहीं कोई जिंदगी को
जीने की जुगाड़ लगाता
होली के इस हुडदंग में
शाम की रोटी के जुगाड़ में
गुब्बारों की खाली
पन्नियाँ बटोरता जीवन
क्या उनमें उमंग नही
होली की वो तरंग नही
हाय ! यह कैसी होली है
यह कैसी होली है ?

रविवार, 8 मार्च 2009

श्यामा श्याम की होरी का रंग

श्याम रंग में रंग गई राधे
श्यामल श्यामल हो गई राधे
एक रंग हैं , एक रूप हैं
होरी का हर रंग खूब है
प्रीत के रंग में रंग गई राधे
श्यामल श्यामल हो गई राधे
श्याम प्रीत में सुध बुध भूली
प्रेम की तो खान है राधे
श्याम के रंग की दीवानी राधे
श्यामल श्यामल हो गई राधे
कौन श्याम है कौन है राधे
कैसे कोई पहचाने राधे
प्रेम के रंग में रंग गई राधे
श्यामल श्यामल हो गई राधे
श्याम रंग में रंग गई राधे.