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गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

तेरे गीतों पर

तेरे गीतों की स्वरलहरी पर
कदम मेरे मचल जाते हैं
तू बादल बन छा जाता है
मैं मोर सी थिरक जाती हूँ
तेरे गीतों के बोलो पर
दिल मेरा तड़प जाता है
तू दर्द बन छा जाता है
मैं आंसुओं में डूब जाती हूँ
तेरी गीतों की हर धुन पर
इक आह सी निकल जाती है
तू भंवरा सा गुनगुनाता है
मैं कली सी शरमा जाती हूँ

12 टिप्‍पणियां:

अनिल कान्त : ने कहा…

श्रंगार रस से भरी हुई ...वाह

gargi gupta ने कहा…

bhut acchi rachna

Udan Tashtari ने कहा…

सुन्दर रचना!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

गीतों की स्वर-लहरी पर,अरमान मचल जाते हैं।
आँसू के सैलाबों से, पाषाण पिघल जाते हैं।।

गम के नगमें सुन कर, मन से आह निकल जाती है।
दुख में जीवन जीने की, इक राह निकल जाती है।।

SWAPN ने कहा…

bahut sunder vandana ji, aapki rachnaon men kuchh apnapan mil

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

सुन्दर रूमानी भाव लिए है यह रचना ..बढ़िया

अवाम ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना..
शुभकामनायें

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने कहा…

वन्दना है, प्रार्थना है,
अर्चना है, साधना है.
प्यार पूजा-पाठ है-
प्यार ही आराधना है.

यशवन्त माथुर ने कहा…


दिनांक 13/01/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
धन्यवाद!

ऎसा क्यूँ हो जाता है......हलचल का रविवारीय विशेषांक.....रचनाकार...समीर लाल 'समीर' जी

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

वाह .... सुंदर .... आज कल तेवर बदले हुये हैं :)

Onkar ने कहा…

सुन्दर रचना

ana ने कहा…

ati sundar rachana