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शनिवार, 23 मई 2009

एक दास्ताँ ये भी ..............भाग १

न जाने कैसे और कब
तुमने ज़िन्दगी में दस्तक दी
धीरे धीरे खामोशी से
अपने जज्बात बयां करते रहे
तुम कहते रहे और
मैं सुनती रही
बिना कुछ पूछे
बिना कुछ जाने
तुम्हारे साथ बहती रही
तुम्हारे दिल की हर बात को
तुम्हारे नगमों में
तो कभी
तुम्हारी ग़ज़लों में
बार बार पढ़ती रही
तुम्हें जानने का
तुम्हारे जज़्बात पहचानने का
दावा करती रही
तुम्हारे अंदाजे बयां पर
मिटती रही
मेरी खामोशी को
तुम इकरार समझ लोगे
मेरे मौन को मेरा
इकरार समझ लोगे
मौन की भी अपनी
भाषा होती है
कभी इकरार की
तो कभी इंकार की
जानती हूँ मैं
आज मौन को शायद
तोड़ना होगा
अपने मौन को
परिभाषित करना होगा
जानती हूँ तुम तन का नही
मन का रिश्ता चाहते हो
मुझे अपनी प्रेरणा
बनाना चाहते हो
अपनी छवि देखी है मैंने
तुम्हारे हर गीत में
उस गीत में छुपे
हर दर्द में
हर शब्द में
हर भाव में
देह से परे
भावों के रिश्ते
कुछ खास होते हैं
जिन्हें न कोई
समझ पाता है
इसलिए आज
मौन को तोड़ना होगा
तुझे ये समझना होगा
ये सिर्फ़ और सिर्फ़
तेरे जज़्बात हैं
मुझे अपनी चाहत न मान
अपने मचलते हुए अरमानों में
न भटकना होगा तुझे
मैं तो सिर्फ़ एक पड़ाव हूँ .....................

क्रमशः .................

9 टिप्‍पणियां:

SWAPN ने कहा…

vandana ji, is kavita ke liye bahut kuchh kahna chahta hun lekin...................................
bas yahi kahoonga, dil ko chhoo gai.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपने बिल्कुल सही लिखा वन्दना जी।
मन का ही रिश्ता बड़ा होता है।
मतभेद तक तो ठीक,
पर मनभेद होना ठीक नही होता।

ललितमोहन त्रिवेदी ने कहा…

मौन की भी अपनी भाषा होती है ..........भावों के रिश्ते कुछ खास होते हैं ..............मैं तो सिर्फ एक पड़ाव हूँ ...........वंदना जी ,आपकी रचना मन की गहरी हूक से शुरू होती है और टीस पर विराम लेती है !जाने अनजाने मन की गहराइयों में सहज रूप से उतरती चली जाती है आपकी यह कविता और यही सार्थकता होती है रचना की !बहुत सुन्दर !और क्या लिखूं !

Om ने कहा…

maun ko aawaaj de, nahi to we swaron ke abhav men bhatak jayenge!
achchhi rachna.
Abhaar!

VIJAY TIWARI " KISLAY " ने कहा…

वंदना
रचना की चिंतन धारा सही दिशा में जा रही है,
शब्दों से ही शब्द निकलते हैं और अभिव्यक्ति का स्वरूप पाते हैं.
सारगर्भित है .
- विजय

Pyaasa Sajal ने कहा…

chhoti chhoti panktiyo ka aise prayog mujhe hamesha se bahut bhaata raha hai...agle bhaag ka intezaar rahegaa


www.pyasasajal.blogspot.com

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

kya ye "Kramsha:" bhi kavita ka hi part tha?
ya "Kavita Abhi baki hai?"

isliye pooch raha hoon ki ye kavita mujhe bahut bhai aur laga ki abhi adhoori hai

Saagar ने कहा…

स्वर्गीय मुकेश का गया एक गीत याद आया,

... मैं तो एक ख्वाब हूँ, एस ख्वाब से तू प्यार ना कर,
प्यार हो जाये तो उस प्यार का इकरार ना कर.
...

कमेन्ट इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि आपके लिखे यह पंग्तियाँ sach hai.

Priya ने कहा…

pahle 2nd part padha....usne majboor kiya to 1st part padha.... adbhut...bahut sunder