अंगीकार किया जब तुमने
क्यूँ नही चाहा तब
स्वीकार करूँ मैं भी तुमको
जब बांधा इस बंधन को
गठजोड़ लगा था हृदयों का
फिर क्यूँ नही चाहा तुमने
अंगीकार करूँ मैं भी तुमको
दान लिया था जब तुमने
तब क्यूँ नही चाहा तुमने
वस्तु बना कर
कोई तुम्हें भी दान करे
सिन्दूर भरा था जब माँग में
वादे किए थे जब जन्मों के
तब क्यूँ नही चाहा तुमने
मेरी उम्र भी दराज़ हो
तुम भी बंधो उसी बंधन में
जिसका सिला चाहा मुझसे
अर्धांगिनी बनाया जब मुझको
तब क्यूँ नही चाहा तुमने
तुम भी अर्धनारीश्वर बनो
अपूर्णता को अपनी
सम्पूर्णता में पूर्ण करो
इक तरफा स्वीकारोक्ति तुम्हारी
क्यूँ तुम्हें आंदोलित नही कर पाती है
मेरी स्वीकारोक्ति क्या तुम्हारे
पौरुष पर आघात तो नही
जब तक मैं न अंगीकार करूँ
जब तक मैं न तुम्हें स्वीकार करूँ
अपना वजूद कहाँ तुम पाओगे
फिर क्यूँ नही चाहा तुमने
अपना वजूद पाना मुझमें
फिर क्यूँ नही चाहा तुमने
स्वीकार करूँ में भी तुमको
स्वीकार करूँ मैं .......................
पृष्ठ
शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009
बुधवार, 28 अक्टूबर 2009
मोहब्बत ये तूने क्या किया
किसी ने ख्वाब भी बनाया
पलकों में भी बसाया
किसी के दिल की धड़कन भी बनी
ज़िन्दगी की आरजू भी बनी
उसे भी अपने दिल की धड़कन बनाया
उसके ख्वाबों को भी
अपनी आंखों में सजाया
उसकी हर चाहत को अपना बनाया
बस उसकी इक हसरत को
जो न अपनाया
उस इक कसूर की
सज़ा ये मिली
उसने भी
पलकों से गिरा दिया
धडकनों को भी
क़ैद कर दिया
बे-मुरव्वत मोहब्बत का
पाक गला भी घोंट दिया
इश्क के न जाने
कौन से मुकाम पर ले जाकर
शाख से टूटे पत्ते की मानिन्द
दर -दर भटकता छोड़ दिया
आह ! मोहब्बत ये तूने क्या किया
पलकों में भी बसाया
किसी के दिल की धड़कन भी बनी
ज़िन्दगी की आरजू भी बनी
उसे भी अपने दिल की धड़कन बनाया
उसके ख्वाबों को भी
अपनी आंखों में सजाया
उसकी हर चाहत को अपना बनाया
बस उसकी इक हसरत को
जो न अपनाया
उस इक कसूर की
सज़ा ये मिली
उसने भी
पलकों से गिरा दिया
धडकनों को भी
क़ैद कर दिया
बे-मुरव्वत मोहब्बत का
पाक गला भी घोंट दिया
इश्क के न जाने
कौन से मुकाम पर ले जाकर
शाख से टूटे पत्ते की मानिन्द
दर -दर भटकता छोड़ दिया
आह ! मोहब्बत ये तूने क्या किया
रविवार, 25 अक्टूबर 2009
भावों के टुकड़े
कभी कभी
कुछ भावों को ठांव नही मिलती
जैसे चिरागों को राह नही मिलती
सर्द अहसासों से दग्ध भाव
जैसे अलाव दिल का जल रहा हो
कुछ भाव टूटकर यूँ बिखर गए
जैसे रेगिस्तान में पानी की बूँद जल गई हो
कुछ भावों के पैमाने यूँ छलक रहे हैं
जैसे टूटती साँसे ज़िन्दगी को मचल रही हों
कुछ भावों को ठांव नही मिलती
जैसे चिरागों को राह नही मिलती
सर्द अहसासों से दग्ध भाव
जैसे अलाव दिल का जल रहा हो
कुछ भाव टूटकर यूँ बिखर गए
जैसे रेगिस्तान में पानी की बूँद जल गई हो
कुछ भावों के पैमाने यूँ छलक रहे हैं
जैसे टूटती साँसे ज़िन्दगी को मचल रही हों
गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009
सिर्फ़ तू ही तू
कल शाम
जब पर्वतों के
साये में
बादलों के
दामन में
ख्यालों की
फसल पक रही थी
तेरी याद ने
दस्तक दी
अन्दर आने की
इजाज़त मांगी
मगर इजाज़त
देता कौन
कुछ ख्याल
तो मेरे
तेरे ख्यालों में
गुम थे
कुछ ख्याल मेरे
तेरे आगोश में
खो गए थे
ना मैं था वहां
ना मेरे ख्याल
सिर्फ़ तेरा ही
तो वजूद था
फिर ख़ुद से
कैसे इजाज़त
मांग रही हो
जब पर्वतों के
साये में
बादलों के
दामन में
ख्यालों की
फसल पक रही थी
तेरी याद ने
दस्तक दी
अन्दर आने की
इजाज़त मांगी
मगर इजाज़त
देता कौन
कुछ ख्याल
तो मेरे
तेरे ख्यालों में
गुम थे
कुछ ख्याल मेरे
तेरे आगोश में
खो गए थे
ना मैं था वहां
ना मेरे ख्याल
सिर्फ़ तेरा ही
तो वजूद था
फिर ख़ुद से
कैसे इजाज़त
मांग रही हो
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009
गुफ्तगू
सुरमई शाम ने झाँका बाहर
निशा दामन फैला रही थी
मिलन को आतुर दोनों सखियाँ
अपने पंख फैला रही थी
शाम का धुंधलका छाने लगा था
निशा का आँचल भी लहराने लगा था
पक्षियों का कलरव भी सो गया था
प्रकृति का दामन भी भिगो गया था
मिलन के इंतज़ार में
कदम आगे बढ़ रहे थे
खामोशी के साये
चहुँ ओर बढ़ रहे थे
कदम-ब-कदम ,धीरे-धीरे
निशा ने शाम का हाथ पकड़ा
सखियों के नैना मिले
कुछ गुफ्तगू हुई
आँखों ही आँखों में
और फिर
निशा ने शाम के हर पल पर
अपना साया फैला दिया
उसका हर हाल जान लिया
और अपने आगोश में
उसके हर दर्द को समेट लिया
इक नई सुबह होने तक............
निशा दामन फैला रही थी
मिलन को आतुर दोनों सखियाँ
अपने पंख फैला रही थी
शाम का धुंधलका छाने लगा था
निशा का आँचल भी लहराने लगा था
पक्षियों का कलरव भी सो गया था
प्रकृति का दामन भी भिगो गया था
मिलन के इंतज़ार में
कदम आगे बढ़ रहे थे
खामोशी के साये
चहुँ ओर बढ़ रहे थे
कदम-ब-कदम ,धीरे-धीरे
निशा ने शाम का हाथ पकड़ा
सखियों के नैना मिले
कुछ गुफ्तगू हुई
आँखों ही आँखों में
और फिर
निशा ने शाम के हर पल पर
अपना साया फैला दिया
उसका हर हाल जान लिया
और अपने आगोश में
उसके हर दर्द को समेट लिया
इक नई सुबह होने तक............
रविवार, 18 अक्टूबर 2009
बस एक बार ..................
तुम पुकार लो
एक बार
आवाज़ तो दो
मैं वक्त नही
जो वापस आ ना सकूं
मैं ख्वाब नही
जो फिर
देखा जा ना सकूं
तेरी इक आवाज़ पर
रस्मों के बंधन छोड़कर
रिवाजों की जंजीर तोड़कर
नदिया सी
उफनती ,मचलती
अपने सागर में समाने को
दौडी चली आउंगी
तुम एक बार पुकारो तो सही
दिल की कश्ती को
दरिया में उतारो तो सही
मैं वो लहर नही
जो वापस आ न सके
मैं वो डोर नही
जिसे तू सुलझा न सके
तेरे इक इशारे पर
तेरे गीतों के निर्मल धारे पर
पायल छनकाती
प्रीत का गीत गाती
तेरी सरगम की पुकारों पर
प्रेम रस बरसाती
इठलाती,बलखाती
आ जाउंगी
बस तुम एक बार
पुकारो तो सही
मुझे वापस
बुलाओ तो सही
एक बार
आवाज़ तो दो
मैं वक्त नही
जो वापस आ ना सकूं
मैं ख्वाब नही
जो फिर
देखा जा ना सकूं
तेरी इक आवाज़ पर
रस्मों के बंधन छोड़कर
रिवाजों की जंजीर तोड़कर
नदिया सी
उफनती ,मचलती
अपने सागर में समाने को
दौडी चली आउंगी
तुम एक बार पुकारो तो सही
दिल की कश्ती को
दरिया में उतारो तो सही
मैं वो लहर नही
जो वापस आ न सके
मैं वो डोर नही
जिसे तू सुलझा न सके
तेरे इक इशारे पर
तेरे गीतों के निर्मल धारे पर
पायल छनकाती
प्रीत का गीत गाती
तेरी सरगम की पुकारों पर
प्रेम रस बरसाती
इठलाती,बलखाती
आ जाउंगी
बस तुम एक बार
पुकारो तो सही
मुझे वापस
बुलाओ तो सही
गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009
भीगा हूँ बहुत
भीगा हूँ बहुत
अश्कों के बहते धारों में
डूबा हूँ बहुत
तेरे दिए दर्द के सैलाबों में
भटका हूँ बहुत
तेरी जुल्फों के गलियारों में बहका हूँ बहुत
तेरे रेशमीअहसासों में
बस बहुत हुआ
अब और न इम्तिहाँ ले
मत मार मुझे
यूँ याद में तडपा-तडपा कर
सिर्फ़ एक बार आकर
सीने पर खंजर चला दे
दिल के टुकड़े- टुकड़े कर दे
कि
जीने की आरज़ू पूरी हो जाए
दिल की हर हसरत निकल जाए
और
मोहब्बत की यूँ नज़र उतर जाए
अश्कों के बहते धारों में
डूबा हूँ बहुत
तेरे दिए दर्द के सैलाबों में
भटका हूँ बहुत
तेरी जुल्फों के गलियारों में बहका हूँ बहुत
तेरे रेशमीअहसासों में
बस बहुत हुआ
अब और न इम्तिहाँ ले
मत मार मुझे
यूँ याद में तडपा-तडपा कर
सिर्फ़ एक बार आकर
सीने पर खंजर चला दे
दिल के टुकड़े- टुकड़े कर दे
कि
जीने की आरज़ू पूरी हो जाए
दिल की हर हसरत निकल जाए
और
मोहब्बत की यूँ नज़र उतर जाए
रविवार, 11 अक्टूबर 2009
तुम जीत गए ,मैं हार गई
दो विपरीत ध्रुवों सा
जीवन अपना
साजन यूँ ही बीत गयातुम अपने धरातल से
बंधे रहे
मैं अपने बांधों में
सिमटी रही
तुम वक्त के प्रवाह संग
बहते रहे
मैं वक्त के साथ
न चल सकी
तुमने पाया हर
स्वरुप मुझमें
मैं तुममें कृष्ण
न पा सकी
धूप छाँव के
इस खेल में साजन
तुम जीत गए
मैं हार गई
जीवन अपना
साजन यूँ ही बीत गयातुम अपने धरातल से
बंधे रहे
मैं अपने बांधों में
सिमटी रही
तुम वक्त के प्रवाह संग
बहते रहे
मैं वक्त के साथ
न चल सकी
तुमने पाया हर
स्वरुप मुझमें
मैं तुममें कृष्ण
न पा सकी
धूप छाँव के
इस खेल में साजन
तुम जीत गए
मैं हार गई
शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009
सफर निशा का
स्याह रात का तन्हा सफर
ज्यों प्रियतम बिन सजनी का श्रृंगार
किस मिलन को आतुर निशा
पल -पल का अँधेरा समेट रही है
भोर के उजास से मिलन को
क्यूँ विरह के पल गिन रही है
ये क्षण -क्षण गहराता अँधियारा
तन्हाईयाँ बढाता जाता है
निशा के गहरे दामन को
और गहराता जाता है
कौन बने तन्हाई का साथी
स्याह रात के स्याह सायों के सिवा
विरह अगन में दग्ध निशा
ज्यों बेवा नूतन श्रृंगार किए हो
प्रिय मिलन की आस में जैसे
विरहन का कफ़न ओढ़ लिया हो
ज्यों प्रियतम बिन सजनी का श्रृंगार
किस मिलन को आतुर निशा
पल -पल का अँधेरा समेट रही है
भोर के उजास से मिलन को
क्यूँ विरह के पल गिन रही है
ये क्षण -क्षण गहराता अँधियारा
तन्हाईयाँ बढाता जाता है
निशा के गहरे दामन को
और गहराता जाता है
कौन बने तन्हाई का साथी
स्याह रात के स्याह सायों के सिवा
विरह अगन में दग्ध निशा
ज्यों बेवा नूतन श्रृंगार किए हो
प्रिय मिलन की आस में जैसे
विरहन का कफ़न ओढ़ लिया हो
मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009
मत छूना
मत छूना
रूह से भी कभी
मेरी रूह को
इस जनम में
मैं अमानत हूँ
किसी और की
तेरा प्यार नही
गैर हूँ तेरे लिए
मेरी पाकीजा रूह
तेरे रूहानी प्रेम के
लिए नही बनी
इस जनम तो
रूह की क़ैद से
आजाद करो
फिर किसी जनम में
शायद तेरे रूहानी
प्रेम की ताकत
मेरी रूह को पुकारे
और हमारी रूहें
उस जनम में
अपने रूहानी प्रेम की
प्यास बुझायें
उस पल तक प्रतीक्षा करो
और तब तक
मत छूना
रूह से भी कभी
मेरी रूह को
रूह से भी कभी
मेरी रूह को
इस जनम में
मैं अमानत हूँ
किसी और की
तेरा प्यार नही
गैर हूँ तेरे लिए
मेरी पाकीजा रूह
तेरे रूहानी प्रेम के
लिए नही बनी
इस जनम तो
रूह की क़ैद से
आजाद करो
फिर किसी जनम में
शायद तेरे रूहानी
प्रेम की ताकत
मेरी रूह को पुकारे
और हमारी रूहें
उस जनम में
अपने रूहानी प्रेम की
प्यास बुझायें
उस पल तक प्रतीक्षा करो
और तब तक
मत छूना
रूह से भी कभी
मेरी रूह को
बुधवार, 30 सितंबर 2009
आ मेरी चाहत .................
आ
मेरी चाहत
तुझे दुल्हन बना दूँ
तुझे ख्वाबों के
सुनहले तारों से
सजा दूँ
तेरी मांग में
सुरमई शाम का
टीका लगा दूँ
तुझे दिल के
हसीन अरमानों की
चुनरी उढा दूँ
अंखियों में तेरी
ज़ज्बातों का
काजल लगा दूँ
माथे पर तेरे
दिल में मचलते लहू की
बिंदिया सजा दूँ
अधरों पर तेरे
भोर की लाली
लगा दूँ
सिर पर तेरे
प्रीत का
घूंघट उढा दूँ
आ
मेरी चाहत
तुझे दुल्हन बना दूँ
मेरी चाहत
तुझे दुल्हन बना दूँ
तुझे ख्वाबों के
सुनहले तारों से
सजा दूँ
तेरी मांग में
सुरमई शाम का
टीका लगा दूँ
तुझे दिल के
हसीन अरमानों की
चुनरी उढा दूँ
अंखियों में तेरी
ज़ज्बातों का
काजल लगा दूँ
माथे पर तेरे
दिल में मचलते लहू की
बिंदिया सजा दूँ
अधरों पर तेरे
भोर की लाली
लगा दूँ
सिर पर तेरे
प्रीत का
घूंघट उढा दूँ
आ
मेरी चाहत
तुझे दुल्हन बना दूँ
गुरुवार, 24 सितंबर 2009
मेरे संवेदनहीन पिया
मेरे संवेदनहीन पिया
दर्द के अहसास से विहीन पिया
दर्द की हर हद से गुजर गया कोईऔर तुम मुस्कुराकर निकल गए
कैसे घुट-घुटकर जीती हूँ मैं
ज़हर के घूँट पीती हूँ मैं
साथ होकर भी दूर हूँ मैं
ये कैसे बन गए ,जीवन पिया
मेरे संवेदनहीन पिया
जिस्मों की नजदीकियां
बनी तुम्हारी चाहत पिया
रूह की घुटती सांसों को
जिला न पाए कभी पिया
मेरे संवेदनहीन पिया
आंखों में ठहरी खामोशी को
कभी समझ न पाए पिया
लबों पर दफ़न लफ्जों को
कभी पढ़ न पाए पिया
ये कैसी निराली रीत है
ये कैसी अपनी प्रीत है
तुम न कभी जान पाए पिया
मैं सदियों से मिटती रहीबेनूर ज़िन्दगी जीती रही
बदरंग हो गए हर रंग पिया
मेरे संवेदनहीन पिया
आस का दीपक बुझा चुकी हूँ
अपने हाथों मिटा चुकी हूँ
अरमानों को कफ़न उढा चुकी हूँ
नूर की इक बूँद की चाहत में
ख़ुद को भी मिटा चुकी हूँ
फिर भी न आए तुम पिया
कुछ भी न भाए तुम्हें पिया
कैसे तुम्हें पाऊँ पिया
कैसे अपना बनाऊं पिया
कौन सी जोत जगाऊँ पिया
मेरे संवेदनहीन पिया
दर्द के अहसास से विहीन पिया
दर्द की हर हद से गुजर गया कोईऔर तुम मुस्कुराकर निकल गए
कैसे घुट-घुटकर जीती हूँ मैं
ज़हर के घूँट पीती हूँ मैं
साथ होकर भी दूर हूँ मैं
ये कैसे बन गए ,जीवन पिया
मेरे संवेदनहीन पिया
जिस्मों की नजदीकियां
बनी तुम्हारी चाहत पिया
रूह की घुटती सांसों को
जिला न पाए कभी पिया
मेरे संवेदनहीन पिया
आंखों में ठहरी खामोशी को
कभी समझ न पाए पिया
लबों पर दफ़न लफ्जों को
कभी पढ़ न पाए पिया
ये कैसी निराली रीत है
ये कैसी अपनी प्रीत है
तुम न कभी जान पाए पिया
मैं सदियों से मिटती रहीबेनूर ज़िन्दगी जीती रही
बदरंग हो गए हर रंग पिया
मेरे संवेदनहीन पिया
आस का दीपक बुझा चुकी हूँ
अपने हाथों मिटा चुकी हूँ
अरमानों को कफ़न उढा चुकी हूँ
नूर की इक बूँद की चाहत में
ख़ुद को भी मिटा चुकी हूँ
फिर भी न आए तुम पिया
कुछ भी न भाए तुम्हें पिया
कैसे तुम्हें पाऊँ पिया
कैसे अपना बनाऊं पिया
कौन सी जोत जगाऊँ पिया
मेरे संवेदनहीन पिया
शुक्रवार, 18 सितंबर 2009
सात दिनों का मेला
ये दुनिया सात दिनों का मेला
आठवां दिन न आया कभी
ख्वाब बरसों के बुनता रहा
पल भी चैन न पाया कभी
क्षण क्षण जीता मरता रहा
पर ख़ुद को न जान पाया कभी
आठवें दिन की आस में
सात दिन भी न जी पाया कभी
प्राणी जीवन सात दिनों का मेला है
कुछ तो यत्न करना होगा
सात दिनों में मरने से पहले
भवसिंधु से भी तरना होगा
जो जीवन भर न कर पाया
वो यत्न अब करना होगा
जैसा उज्जवल भेजा उसने
वैसा उज्जवल बनना होगा
ये दुनिया सात दिनों का मेला
आठवां दिन न आया कभी
कृपया मेरा नया ब्लॉग भी पढ़ें .................
http://ekprayas-vandana.blogspot.com
आठवां दिन न आया कभी
ख्वाब बरसों के बुनता रहा
पल भी चैन न पाया कभी
क्षण क्षण जीता मरता रहा
पर ख़ुद को न जान पाया कभी
आठवें दिन की आस में
सात दिन भी न जी पाया कभी
प्राणी जीवन सात दिनों का मेला है
कुछ तो यत्न करना होगा
सात दिनों में मरने से पहले
भवसिंधु से भी तरना होगा
जो जीवन भर न कर पाया
वो यत्न अब करना होगा
जैसा उज्जवल भेजा उसने
वैसा उज्जवल बनना होगा
ये दुनिया सात दिनों का मेला
आठवां दिन न आया कभी
कृपया मेरा नया ब्लॉग भी पढ़ें .................
http://ekprayas-vandana.blogspot.com
मंगलवार, 15 सितंबर 2009
मौत भी उसकी मौत पर रोया करे
एक मौत,मर कर मरे , तो क्या मरे
आदमी है वो,जो हर पल, मर-मरकर जिया करे
मौत भी हार जाती है उसके आगे
जो ज़िन्दगी से मौत की ज़ंग लड़ा करे
मौत क्या मारेगी उस जीवट को
जो मौत को सामने देख हंसा करे
हो ज़िन्दगी ऐसी आदमी की
कि मौत भी ,उसकी मौत पर , रोया करे
कृपया मेरा नया ब्लॉग पढ़ें :
http://ekprayas-vandana.blogspot.com
आदमी है वो,जो हर पल, मर-मरकर जिया करे
मौत भी हार जाती है उसके आगे
जो ज़िन्दगी से मौत की ज़ंग लड़ा करे
मौत क्या मारेगी उस जीवट को
जो मौत को सामने देख हंसा करे
हो ज़िन्दगी ऐसी आदमी की
कि मौत भी ,उसकी मौत पर , रोया करे
कृपया मेरा नया ब्लॉग पढ़ें :
http://ekprayas-vandana.blogspot.com
बुधवार, 9 सितंबर 2009
विदा करो मुझे
किस शून्य में
छिप गए हो
कहाँ कहाँ ढूंढूं
किस अंतस को चीरूँ
जब से गए हो मुहँ मोड़कर
प्रीत की हर रीत तोड़कर
किस पथ को निहारूं मैं
कैसे बाट जोहारूं मैं
तुम तो मुख मोड़ गए
मुझे अकेला छोड़ गए
अंखियन ने बहना छोड़ दिया है
ह्रदय का स्पंदन रुक गया है
तुम्हारे वियोग में प्रीतम
अंतस मेरा सूख चुका है
वो तेरा रूठ कर जाना
फिर बुलाने पर भी ना आना
जीवन को ग्रहण लगा गया है
कैसे भीगी सदायें भेजूं
किन हवाओं से पैगाम भेजूं
कैसे ख़त पर तेरा नाम लिखूं
लहू भी सूख चुका है अब तो
निष्क्रिय तन है अब तो
सिर्फ़ साँसों की डोर है बाकी
विदाई की अन्तिम बेला है
और आस की डोर कहीं बंधी है
तुम्हारे मिलन को तरस रही है
तेरे दीदार की खातिर
ज़िन्दगी मौत से लड़ रही है
हर आती जाती साँस के साथ
अधरों पर
तेरे नाम की माला जप रही है
निश्चेतन तन में कहीं
कोई चेतना बची नही है
इक श्वास ही कहीं
अटकी पड़ी है
तेरे विरह में कहीं
भटक रही है
अब तो आ जा
अब तो आ जा..........
मुझे एक बार फिर से
अपना बना जा
मेरी विदाई को
मेरा इंतज़ार न बना
शायद यही सज़ा है मेरी
आह ! नही आओगे
लो चलती हूँ अब
विदा करो मुझे
मेरे इंतज़ार के साथ
आस भी टूट गई
रूह भी पथरा गई
और साँस थम गई
छिप गए हो
कहाँ कहाँ ढूंढूं
किस अंतस को चीरूँ
जब से गए हो मुहँ मोड़कर
प्रीत की हर रीत तोड़कर
किस पथ को निहारूं मैं
कैसे बाट जोहारूं मैं
तुम तो मुख मोड़ गए
मुझे अकेला छोड़ गए
अंखियन ने बहना छोड़ दिया है
ह्रदय का स्पंदन रुक गया है
तुम्हारे वियोग में प्रीतम
अंतस मेरा सूख चुका है
वो तेरा रूठ कर जाना
फिर बुलाने पर भी ना आना
जीवन को ग्रहण लगा गया है
कैसे भीगी सदायें भेजूं
किन हवाओं से पैगाम भेजूं
कैसे ख़त पर तेरा नाम लिखूं
लहू भी सूख चुका है अब तो
निष्क्रिय तन है अब तो
सिर्फ़ साँसों की डोर है बाकी
विदाई की अन्तिम बेला है
और आस की डोर कहीं बंधी है
तुम्हारे मिलन को तरस रही है
तेरे दीदार की खातिर
ज़िन्दगी मौत से लड़ रही है
हर आती जाती साँस के साथ
अधरों पर
तेरे नाम की माला जप रही है
निश्चेतन तन में कहीं
कोई चेतना बची नही है
इक श्वास ही कहीं
अटकी पड़ी है
तेरे विरह में कहीं
भटक रही है
अब तो आ जा
अब तो आ जा..........
मुझे एक बार फिर से
अपना बना जा
मेरी विदाई को
मेरा इंतज़ार न बना
शायद यही सज़ा है मेरी
आह ! नही आओगे
लो चलती हूँ अब
विदा करो मुझे
मेरे इंतज़ार के साथ
आस भी टूट गई
रूह भी पथरा गई
और साँस थम गई
सोमवार, 7 सितंबर 2009
तुम्हारी कैसे बनूँ मैं
सुनो
सब सुनती हूँ मैं
तुम्हारे हर जज़्बात को
समझती हूँ मैं
जो तुम कहते हो
जो नही कहते
वो भी पहचानती हूँ मैं
फिर भी नही चाहती
तेरा इज़हार -ऐ-मोहब्बत
कभी तो समझो
तुम भी मेरी व्यथा
आत्मा पर मोहब्बत शब्द
इक बदनुमा दाग सा लगता है
ह्रदय को बींध जाता है
वैसे ही छलनी हुए इस दिल में
तुम अपने प्रेम का
एक और छिद्र न अन्वेषित करो
अब इसमें कुछ ठहरता नही
फिर तुम्हारे प्रेम को
कहाँ संजोऊँ मैं
कैसे तुम्हारे प्रेम की
आरती उतारूँ मैं कैसे दिल का दिया जलाऊँ मैंसब छिद्रों से प्रवाहित हो जाता है
तेरे प्रेम का रस
अंतस में कुछ भी ठहरता ही नही
भावनाओं का कोई ज्वार
उठता ही नही
प्रेमरस के महासागर की
कोई लहर भिगोती ही नही
ह्रदय तरंगित होता ही नही
कैसे प्रेम का बीज, रोपित करुँ
कहीं कोई स्फुरण होता ही नही
कहीं कोई स्पंदन होता ही नही
फिर कहो कैसे
तुम्हारे प्रेम को
अपना नाम दूँ
कहीं कोई हिलोर
उठती ही नही
फिर कैसे
तेरे सवालों का जवाब दूँ मैं
कैसे तेरे सपनो को
अपनी अंखियों में पालूँ मैं
इस सूखे ह्रदय को
कहो कैसे
प्रेम रस की चाशनी मैं
डूबा डालूँ मैं
कौन सी धातु से
इन छिद्रों को भरूँ मैं
कैसे तेरे प्रेम का प्याला
पियूं मैं
कैसे तुझे अपना
बनाऊं मैं
बोलो, बोलो न
एक बार तो
जवाब दे जाओ
मेरे इस छलनी
ह्रदय के घाव
कैसे भरेंगे
इतना तो बता जाओ
कैसे तुम्हारी
जोगन बनूँ मैं
कैसे इस अंतस की
पीर सहूँ मैं
तुम्हारी कैसे बनूँ मैं ..............................
सब सुनती हूँ मैं
तुम्हारे हर जज़्बात को
समझती हूँ मैं
जो तुम कहते हो
जो नही कहते
वो भी पहचानती हूँ मैं
फिर भी नही चाहती
तेरा इज़हार -ऐ-मोहब्बत
कभी तो समझो
तुम भी मेरी व्यथा
आत्मा पर मोहब्बत शब्द
इक बदनुमा दाग सा लगता है
ह्रदय को बींध जाता है
वैसे ही छलनी हुए इस दिल में
तुम अपने प्रेम का
एक और छिद्र न अन्वेषित करो
अब इसमें कुछ ठहरता नही
फिर तुम्हारे प्रेम को
कहाँ संजोऊँ मैं
कैसे तुम्हारे प्रेम की
आरती उतारूँ मैं कैसे दिल का दिया जलाऊँ मैंसब छिद्रों से प्रवाहित हो जाता है
तेरे प्रेम का रस
अंतस में कुछ भी ठहरता ही नही
भावनाओं का कोई ज्वार
उठता ही नही
प्रेमरस के महासागर की
कोई लहर भिगोती ही नही
ह्रदय तरंगित होता ही नही
कैसे प्रेम का बीज, रोपित करुँ
कहीं कोई स्फुरण होता ही नही
कहीं कोई स्पंदन होता ही नही
फिर कहो कैसे
तुम्हारे प्रेम को
अपना नाम दूँ
कहीं कोई हिलोर
उठती ही नही
फिर कैसे
तेरे सवालों का जवाब दूँ मैं
कैसे तेरे सपनो को
अपनी अंखियों में पालूँ मैं
इस सूखे ह्रदय को
कहो कैसे
प्रेम रस की चाशनी मैं
डूबा डालूँ मैं
कौन सी धातु से
इन छिद्रों को भरूँ मैं
कैसे तेरे प्रेम का प्याला
पियूं मैं
कैसे तुझे अपना
बनाऊं मैं
बोलो, बोलो न
एक बार तो
जवाब दे जाओ
मेरे इस छलनी
ह्रदय के घाव
कैसे भरेंगे
इतना तो बता जाओ
कैसे तुम्हारी
जोगन बनूँ मैं
कैसे इस अंतस की
पीर सहूँ मैं
तुम्हारी कैसे बनूँ मैं ..............................
मंगलवार, 25 अगस्त 2009
उर्मिला की विरह वेदना
१) प्रियतम हे प्रानप्यारे
विदाई की अन्तिम बेला में
दरस को नैना तरस रहे हैं
ज्यों चंदा को चकोर तरसे है
आरती का थाल सजा है
प्रेम का दीपक यूँ जला है
ज्यों दीपक राग गाया गया हो
२) पावस ऋतु भी छा गई है
विदाई की अन्तिम बेला में
दरस को नैना तरस रहे हैं
ज्यों चंदा को चकोर तरसे है
आरती का थाल सजा है
प्रेम का दीपक यूँ जला है
ज्यों दीपक राग गाया गया हो
२) पावस ऋतु भी छा गई है
मेघ मल्हार गा रहे हैं
प्रियतम तुमको बुला रहे हैं
ह्रदय की किवाडिया खडका रहे हैं
विरह अगन में दहका रहे हैं
करोड़ों सूर्यों की दाहकता
ह्रदय को धधका रही है
प्रेम अगन में झुलसा रही है
देवराज बरसाएं नीर कितना ही
फिर भी ना शीतलता आ रही है
३) हे प्राणाधार
शरद ऋतु भी आ गई है
शरतचंद्र की चंचल चन्द्रकिरण भी
प्रिय वियोग में धधकती
अन्तःपुर की ज्वाला को
न हुलसा पा रही है
ह्रदय में अगन लगा रही है
४) ऋतुराज की मादकता भी छा गई है
मंद मंद बयार भी बह रही है
समीर की मोहकता भी
ना देह को भा रही है
चंपा चमेली की महक भी
प्रिय बिछोह को न सहला पा रही है
५) मेरे जीवनाधार
पतझड़ ऐसे ठहर गया है
खेत को जैसे पाला पड़ा हो
झर झर अश्रु बरस रहे हैं
जैसे शाख से पत्ते झड़ रहे हैं
उपवन सारे सूख गए हैं
पिय वियोग में डूब गए हैं
मेरी वेदना को समझ गए हैं
साथ देने को मचल गए हैं
जीवन ठूंठ सा बन गया है
हर श्रृंगार जैसे रूठ गया है
६) इंतज़ार मेरा पथरा गया है
विरहाग्नि में देह भी न जले है
क्यूंकि आत्मा तो तुम संग चले है
बिन आत्मा की देह में
वेदना का संसार पले है
७) मेरे विरह तप से नरोत्तम
पथ आलोकित होगा तुम्हारा
पोरुष को संबल मिलेगा
भात्री - सेवा को समर्पित तुम
पथ बाधा न बन पाऊँगी
अर्धांगिनी हूँ तुम्हारी
अपना फ़र्ज़ निभाउँगी
मेरी ओर न निहारना कभी
ख्याल भी ह्रदय में न लाना कभी
इंतज़ार का दीपक हथेली पर लिए
देहरी पर बैठी मिलूंगी
प्रीत के दीपक को मैं
अश्रुओं का घृत दूंगी
दीपक मेरी आस का है ये
मेरे प्रेम और विश्वास का है ये
कभी न बुझने पायेगा
इक दिन तुमको लौटा लायेगा,लौटा लायेगा .........................
प्रियतम तुमको बुला रहे हैं
ह्रदय की किवाडिया खडका रहे हैं
विरह अगन में दहका रहे हैं
करोड़ों सूर्यों की दाहकता
ह्रदय को धधका रही है
प्रेम अगन में झुलसा रही है
देवराज बरसाएं नीर कितना ही
फिर भी ना शीतलता आ रही है
३) हे प्राणाधार
शरद ऋतु भी आ गई है
शरतचंद्र की चंचल चन्द्रकिरण भी
प्रिय वियोग में धधकती
अन्तःपुर की ज्वाला को
न हुलसा पा रही है
ह्रदय में अगन लगा रही है
४) ऋतुराज की मादकता भी छा गई है
मंद मंद बयार भी बह रही है
समीर की मोहकता भी
ना देह को भा रही है
चंपा चमेली की महक भी
प्रिय बिछोह को न सहला पा रही है
५) मेरे जीवनाधार
पतझड़ ऐसे ठहर गया है
खेत को जैसे पाला पड़ा हो
झर झर अश्रु बरस रहे हैं
जैसे शाख से पत्ते झड़ रहे हैं
उपवन सारे सूख गए हैं
पिय वियोग में डूब गए हैं
मेरी वेदना को समझ गए हैं
साथ देने को मचल गए हैं
जीवन ठूंठ सा बन गया है
हर श्रृंगार जैसे रूठ गया है
६) इंतज़ार मेरा पथरा गया है
विरहाग्नि में देह भी न जले है
क्यूंकि आत्मा तो तुम संग चले है
बिन आत्मा की देह में
वेदना का संसार पले है
७) मेरे विरह तप से नरोत्तम
पथ आलोकित होगा तुम्हारा
पोरुष को संबल मिलेगा
भात्री - सेवा को समर्पित तुम
पथ बाधा न बन पाऊँगी
अर्धांगिनी हूँ तुम्हारी
अपना फ़र्ज़ निभाउँगी
मेरी ओर न निहारना कभी
ख्याल भी ह्रदय में न लाना कभी
इंतज़ार का दीपक हथेली पर लिए
देहरी पर बैठी मिलूंगी
प्रीत के दीपक को मैं
अश्रुओं का घृत दूंगी
दीपक मेरी आस का है ये
मेरे प्रेम और विश्वास का है ये
कभी न बुझने पायेगा
इक दिन तुमको लौटा लायेगा,लौटा लायेगा .........................
शनिवार, 22 अगस्त 2009
आरजू
चंचल चपल हे मृगनयनी
नयन बाण से बिद्ध ह्रदय लो
अधरामृत का लेप लगाकर
प्रेम को आधार बनाकर
होशो-हवास पर मोहिनी बरसाकर
मुझको अपना श्याम बना लो
महारास की शीतल बेला में
रूप-लावण्य का रंग बिखरे है
पायल की छम-छम छंकारों पर
प्रीत का बादल नृत्य किए है
दास को प्रेम सुधा का पान कराकर
जीवन का अलंकार बनाकर
अपने हृदयांगन का प्रहरी बना लो
चंचल चपल हे मृगनयनी
मुझको अपना दास बना लो
नयन बाण से बिद्ध ह्रदय लो
अधरामृत का लेप लगाकर
प्रेम को आधार बनाकर
होशो-हवास पर मोहिनी बरसाकर
मुझको अपना श्याम बना लो
महारास की शीतल बेला में
रूप-लावण्य का रंग बिखरे है
पायल की छम-छम छंकारों पर
प्रीत का बादल नृत्य किए है
दास को प्रेम सुधा का पान कराकर
जीवन का अलंकार बनाकर
अपने हृदयांगन का प्रहरी बना लो
चंचल चपल हे मृगनयनी
मुझको अपना दास बना लो
रविवार, 16 अगस्त 2009
अलविदा मत कहा करो
अलविदा मत कहा करो
किसी के दिल पर क्या गुजरी
ये तुम क्या जानो
तेरे जाने और आने के
बीच का वक्त
कैसे गुजरता है
ये तुम क्या जानो
रोज मिलने को दिल
कितना तड़पता है
ये तुम क्या जानो
बातों की महावर लगाने को
दिल कितना मचलता है
दीदार का काजल लगाने को
नज़रें कितना तरसती हैं
ये तुम क्या जानो
लबों पर अल्फाजों का
तबस्सुम खिलाने को
दिल कितना भटकता है
ये तुम क्या जानो
दिलो की ये दूरी मिटाने को
कुछ पल तेरा साथ पाने को
दिल कितना सुबकता है
ये तुम क्या जानो
तेरे गीतों में ढल जाने को
तेरी काव्य धारा बन जाने को
दिल कितना सिसकता है
ये तुम क्या जानो
इसलिए
कभी अलविदा मत कहा करो
किसी के दिल पर क्या गुजरी
ये तुम क्या जानो
तेरे जाने और आने के
बीच का वक्त
कैसे गुजरता है
ये तुम क्या जानो
रोज मिलने को दिल
कितना तड़पता है
ये तुम क्या जानो
बातों की महावर लगाने को
दिल कितना मचलता है
दीदार का काजल लगाने को
नज़रें कितना तरसती हैं
ये तुम क्या जानो
लबों पर अल्फाजों का
तबस्सुम खिलाने को
दिल कितना भटकता है
ये तुम क्या जानो
दिलो की ये दूरी मिटाने को
कुछ पल तेरा साथ पाने को
दिल कितना सुबकता है
ये तुम क्या जानो
तेरे गीतों में ढल जाने को
तेरी काव्य धारा बन जाने को
दिल कितना सिसकता है
ये तुम क्या जानो
इसलिए
कभी अलविदा मत कहा करो
बुधवार, 12 अगस्त 2009
एक भाई का दर्द
एक बेबस भाई की मजबूरी
कोई क्या जाने
बेतरतीब से बिखरे बाल ,
पपडाए होंठ, वीरान आँखें
मैली सारी में लिपटी
इक जिंदा लाश को जब देखा हो
बुखार से तपती देह में भी
उफ़ न कर पाए जो
मर - मर कर हर काम
करती जाए जो
और फिर भी न किसी से
शिकायत कर पाए जो
ऐसा हाल जिस भाई ने
देखा हो अपनी बहन का
कितनी मौत मरा होगा
और अपनी बेबसी से लड़ा होगा
खून तो उसका भी खौला होगा
बंद जुबान को खोलना चाहा होगा
इंसान की खाल में छुपे भेडियों से
बहन को बचाना चाहा होगा
उसकी पीड़ा से कितना तडपा होगा
मगर बहन की आंखों में छुपी वेदना ने
हर भेद खोल दिया होगा
चुप रहने को मजबूर कर दिया होगा
क्यूंकि ज़िन्दगी तो उसे
वहीँ गुजारनी होगी
इसलिए खामोशी का ही
ज़हर पिया होगा
और भाई चाहकर भी
कुछ न कर पाया होगा
नाज़ों - नखरों से पली बहन की
दुर्दशा पर खून के आंसू रोया होगा
बहन की कसम से बंधे रिश्ते को
घुट-घुटकर कैसे निभाया होगा
और उसका दर्द माँ बाप से भी
न कह पाया होगा
और राखी का वचन
इस तरह निभाया होगा
बहन की रक्षा के वचन ने
किस कदर रुलाया होगा
तिल-तिल कर बिलखती
बहन को देख
कैसे आक्रोश को
जज्ब कर पाया होगा
अपने भाई होने के फ़र्ज़ को
कैसे छुपाया होगा
और आंखों में समंदर लिए
चुपचाप उसकी दहलीज से
थके क़दमों से चला आया होगा
कोई क्या जाने
बेतरतीब से बिखरे बाल ,
पपडाए होंठ, वीरान आँखें
मैली सारी में लिपटी
इक जिंदा लाश को जब देखा हो
बुखार से तपती देह में भी
उफ़ न कर पाए जो
मर - मर कर हर काम
करती जाए जो
और फिर भी न किसी से
शिकायत कर पाए जो
ऐसा हाल जिस भाई ने
देखा हो अपनी बहन का
कितनी मौत मरा होगा
और अपनी बेबसी से लड़ा होगा
खून तो उसका भी खौला होगा
बंद जुबान को खोलना चाहा होगा
इंसान की खाल में छुपे भेडियों से
बहन को बचाना चाहा होगा
उसकी पीड़ा से कितना तडपा होगा
मगर बहन की आंखों में छुपी वेदना ने
हर भेद खोल दिया होगा
चुप रहने को मजबूर कर दिया होगा
क्यूंकि ज़िन्दगी तो उसे
वहीँ गुजारनी होगी
इसलिए खामोशी का ही
ज़हर पिया होगा
और भाई चाहकर भी
कुछ न कर पाया होगा
नाज़ों - नखरों से पली बहन की
दुर्दशा पर खून के आंसू रोया होगा
बहन की कसम से बंधे रिश्ते को
घुट-घुटकर कैसे निभाया होगा
और उसका दर्द माँ बाप से भी
न कह पाया होगा
और राखी का वचन
इस तरह निभाया होगा
बहन की रक्षा के वचन ने
किस कदर रुलाया होगा
तिल-तिल कर बिलखती
बहन को देख
कैसे आक्रोश को
जज्ब कर पाया होगा
अपने भाई होने के फ़र्ज़ को
कैसे छुपाया होगा
और आंखों में समंदर लिए
चुपचाप उसकी दहलीज से
थके क़दमों से चला आया होगा
शुक्रवार, 7 अगस्त 2009
देखा है कभी
इस शहर के हर शख्स की
आँख में उबलता आक्रोश
देखा है कभी
अपने वजूद से लड़ते
आदमी का रूप
देखा है कभी
सीने में धधकता
ज्वालामुखी लिए हर शख्स
रोज कैसे मर-मरकर जीता है
देखा है कभी
कब , किस मोड़ पर ये
ज्वालामुखी फट जाए
और किसी नुक्कड़ पर
सीने की भड़ास ,अपनी बेबसी
उतारता आदमी
देखा है कभी
परेशानियों से जूझता
ज़िन्दगी से लड़ता आदमी
देखा है कभी
रोज नए ख्वाब बुनता
और फिर रोज
उन ख्वाबों के टूटने पर
टूटता - बिखरता आदमी
देखा है कभी
जीवन जीने की
जद्दोजहदसे परेशान
कभी हालत से लड़ता
तो कभी ख़ुद से लड़ता आदमी
देखा है कभी
आँख में उबलता आक्रोश
देखा है कभी
अपने वजूद से लड़ते
आदमी का रूप
देखा है कभी
सीने में धधकता
ज्वालामुखी लिए हर शख्स
रोज कैसे मर-मरकर जीता है
देखा है कभी
कब , किस मोड़ पर ये
ज्वालामुखी फट जाए
और किसी नुक्कड़ पर
सीने की भड़ास ,अपनी बेबसी
उतारता आदमी
देखा है कभी
परेशानियों से जूझता
ज़िन्दगी से लड़ता आदमी
देखा है कभी
रोज नए ख्वाब बुनता
और फिर रोज
उन ख्वाबों के टूटने पर
टूटता - बिखरता आदमी
देखा है कभी
जीवन जीने की
जद्दोजहदसे परेशान
कभी हालत से लड़ता
तो कभी ख़ुद से लड़ता आदमी
देखा है कभी
रविवार, 2 अगस्त 2009
पुरानी यादें
आज कॉलेज के वक्त की एक पुरानी कॉपी के कुछ पन्ने पढने लगी तो सभी पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं । उन्ही में से कुछ यादें आज आप सबके साथ बाँट रही हूँ .ये सब मेरे लिखे हुए तो नही हैं मगर जिसने भी लिखे हैं बहुत ही खूब लिखे हैं .उस वक्त मैं अपने को वक्त दे पाती थी तो सब पढ़ पाती थी और जो पसंद आ जाता था उसे अपनी यादों में सजा लेती थी।
इश्क के मकबरे के गुम्बद की ऊंचाई बहुत ऊंची है
कब्र में फनाई के अफ़साने खुदे हैं जिसकी सच्चाई
सिर्फ़ वहीं सच्ची लगती है । जन्नत और दो़जख
के मोहरबंद लिफाफे खुदा ने ख़ुद तसदीक किए हैं ।
कब्र की पाक जाली में रेशमी इच्छा मैं भी बांधूंगी
और देखूंगी कि मेरे मोहरबंद लिफाफे की तहरीर
क्या होगी ।
अनुरोध
मेरे तन से नही , दोस्त
मेरे मन से प्यार करो
मेरी उपस्थिति को ,
मेरे सामीप्य को ही ,
फकत न चाहो ,
एक रस्म भर न निबाहो ,
प्यार की कोई हद नही होती
तुम यह प्रमाणित कर दिखलाओ
मेरे सपनो से प्यार करो ,
मेरे विचारों को सराहो
सही और इमानदार करो
मेरे ही पर्याय हो जाओ
अपना प्यार महान हो जाए
तुम तुम न रहो , "मैं " हो जाओ ।
इश्क के मकबरे के गुम्बद की ऊंचाई बहुत ऊंची है
कब्र में फनाई के अफ़साने खुदे हैं जिसकी सच्चाई
सिर्फ़ वहीं सच्ची लगती है । जन्नत और दो़जख
के मोहरबंद लिफाफे खुदा ने ख़ुद तसदीक किए हैं ।
कब्र की पाक जाली में रेशमी इच्छा मैं भी बांधूंगी
और देखूंगी कि मेरे मोहरबंद लिफाफे की तहरीर
क्या होगी ।
अनुरोध
मेरे तन से नही , दोस्त
मेरे मन से प्यार करो
मेरी उपस्थिति को ,
मेरे सामीप्य को ही ,
फकत न चाहो ,
एक रस्म भर न निबाहो ,
प्यार की कोई हद नही होती
तुम यह प्रमाणित कर दिखलाओ
मेरे सपनो से प्यार करो ,
मेरे विचारों को सराहो
सही और इमानदार करो
मेरे ही पर्याय हो जाओ
अपना प्यार महान हो जाए
तुम तुम न रहो , "मैं " हो जाओ ।
बुधवार, 22 जुलाई 2009
ठहरा हुआ इंतज़ार ......................एक प्रेम कथा
कल की सी बात लगती है
याद है तुम्हें प्रिये
तेरा आना जीवन में मेरे
ज्यों बहारों ने डेरा डाला हुआ हो
छुप -छुपकर कनखियों से
खिड़की के झरोखों से वो तकना मुझे
चांदनी रात में घंटों इंतज़ार करना
सिर्फ़ एक बार देखने की चाहत में
वो पल पल का हिसाब रखना तेरा
यादों के तारों को झंझोड़ जाता है
कभी प्रेम का इजहार किया नही
फिर भी प्रेम के हर रंग को जिया
अंखियों के मौन निमंत्रण को
मौन में ही संजो लिया
तन की प्यास कभी जगी ही नही
मन के प्यासे प्रेमी हम
प्रेम - वंदन में पगे रहे
ख्वाबों की चादर बुनते रहे
प्यार के मोती टांकते रहे
मेरे जिस्म , मेरे अधरों ,
मेरे गेसुओं पर कोई
कविता कभी लिखी ही नही
मगर फिर भी बिना कहे
प्रेम के हर अहसास से गुजरते रहे
इन्द्रधनुषी रंगों से प्रेम रंग में रंगते रहे
कल की सी बात लगती है
याद है तुम्हें प्रिये
फिर एक दिन तुम
मेरे प्रणय - निवेदन को भुला
मातृभूमि की पुकार पर
अपने विजय-रथ पर सवार हो
अपने हर ख्वाब को ,उस पर टंगे मोतियों को
चांदनी रात की परछाइयों को
यादों के दामन में संजो कर
देशभक्ति का कफ़न उढाकर चले गए
और मैं ..............................
तेरे विरह की अग्नि में जलती रही
पर तेरे पथ की न शिला बनी
पल - पल युगों सा निष्ठुर बन गया
कभी चांदनी रात में
तारावली की अनन्य घाटी में
तेरे दीदार को तरसती रही
कभी पतझड़ सी मुरझाती रही
तेरे आने की आस में
दिल को मैं समझाती रही
और फिर एक दिन .............
वो मनहूस ख़बर आई
जीवन का हर रंग उडा ले गई
ये कैसे हो सकता है !
जब धड़कन चल रही हो
तो दिल कैसे रुक सकता है
जब साँस मेरी चल रही हो
तो मौसम कैसे बदल सकता है
मैं न समझ पाई कुछ
तेरे इंतज़ार में इक उम्र गुजार दी मैंने
ज़माने ने 'बावरी' नाम दे दिया
और मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया
अब दर-दर भटकती फिरती थी
सिर्फ़ तुझे खोजती फिरती थी
तेरे ही नाम की माला जपती थी
कभी तेरे ख्यालों से खेलती थी
कभी तेरी याद से उलझती थी
सीने के दर्द को मैं
ज़हर बनाकर पीती थी
मगर फिर भी
साँस गर मेरी चलती है तो
मौजूद है तू कहीं न कहीं
बस इसी आस में जीती थी
सदियाँ गुजर गयीं यूँ ही सूनी
कोई भी सावन मेरा
कभी न हरा हो पाया
और पतझड़ ने जीवन में
अपना डेरा लगा लिया
और उम्र के एक पड़ाव पर आकर
जब आंखों के सतरंगी सपने सारे
चूर - चूर हो चुके
आस का दामन भी जब
लहू सा रिसने लगा
तब एक दिन अच्चानक तुमने
मेरे जीवन में ठहरे हुए
अमावस को दूर करते हुए
अपनी मोहब्बत की चांदनी बिखेरते हुए
मेरे विश्वास को अटल करते हुए
बरसों की प्रीत को
अपने प्रेम की चादर उढाकर
मेरी बरसों से सूनी मांग में
अपने अनुपम प्रेम का सिन्दूर लगाकर
मुझे अपनी प्राणप्रिया बनाकर
हमारे चिर-प्रतीक्षित प्रेम को अमर कर दिया
याद है तुम्हें प्रिये
तेरा आना जीवन में मेरे
ज्यों बहारों ने डेरा डाला हुआ हो
छुप -छुपकर कनखियों से
खिड़की के झरोखों से वो तकना मुझे
चांदनी रात में घंटों इंतज़ार करना
सिर्फ़ एक बार देखने की चाहत में
वो पल पल का हिसाब रखना तेरा
यादों के तारों को झंझोड़ जाता है
कभी प्रेम का इजहार किया नही
फिर भी प्रेम के हर रंग को जिया
अंखियों के मौन निमंत्रण को
मौन में ही संजो लिया
तन की प्यास कभी जगी ही नही
मन के प्यासे प्रेमी हम
प्रेम - वंदन में पगे रहे
ख्वाबों की चादर बुनते रहे
प्यार के मोती टांकते रहे
मेरे जिस्म , मेरे अधरों ,
मेरे गेसुओं पर कोई
कविता कभी लिखी ही नही
मगर फिर भी बिना कहे
प्रेम के हर अहसास से गुजरते रहे
इन्द्रधनुषी रंगों से प्रेम रंग में रंगते रहे
कल की सी बात लगती है
याद है तुम्हें प्रिये
फिर एक दिन तुम
मेरे प्रणय - निवेदन को भुला
मातृभूमि की पुकार पर
अपने विजय-रथ पर सवार हो
अपने हर ख्वाब को ,उस पर टंगे मोतियों को
चांदनी रात की परछाइयों को
यादों के दामन में संजो कर
देशभक्ति का कफ़न उढाकर चले गए
और मैं ..............................
तेरे विरह की अग्नि में जलती रही
पर तेरे पथ की न शिला बनी
पल - पल युगों सा निष्ठुर बन गया
कभी चांदनी रात में
तारावली की अनन्य घाटी में
तेरे दीदार को तरसती रही
कभी पतझड़ सी मुरझाती रही
तेरे आने की आस में
दिल को मैं समझाती रही
और फिर एक दिन .............
वो मनहूस ख़बर आई
जीवन का हर रंग उडा ले गई
ये कैसे हो सकता है !
जब धड़कन चल रही हो
तो दिल कैसे रुक सकता है
जब साँस मेरी चल रही हो
तो मौसम कैसे बदल सकता है
मैं न समझ पाई कुछ
तेरे इंतज़ार में इक उम्र गुजार दी मैंने
ज़माने ने 'बावरी' नाम दे दिया
और मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया
अब दर-दर भटकती फिरती थी
सिर्फ़ तुझे खोजती फिरती थी
तेरे ही नाम की माला जपती थी
कभी तेरे ख्यालों से खेलती थी
कभी तेरी याद से उलझती थी
सीने के दर्द को मैं
ज़हर बनाकर पीती थी
मगर फिर भी
साँस गर मेरी चलती है तो
मौजूद है तू कहीं न कहीं
बस इसी आस में जीती थी
सदियाँ गुजर गयीं यूँ ही सूनी
कोई भी सावन मेरा
कभी न हरा हो पाया
और पतझड़ ने जीवन में
अपना डेरा लगा लिया
और उम्र के एक पड़ाव पर आकर
जब आंखों के सतरंगी सपने सारे
चूर - चूर हो चुके
आस का दामन भी जब
लहू सा रिसने लगा
तब एक दिन अच्चानक तुमने
मेरे जीवन में ठहरे हुए
अमावस को दूर करते हुए
अपनी मोहब्बत की चांदनी बिखेरते हुए
मेरे विश्वास को अटल करते हुए
बरसों की प्रीत को
अपने प्रेम की चादर उढाकर
मेरी बरसों से सूनी मांग में
अपने अनुपम प्रेम का सिन्दूर लगाकर
मुझे अपनी प्राणप्रिया बनाकर
हमारे चिर-प्रतीक्षित प्रेम को अमर कर दिया
सोमवार, 20 जुलाई 2009
मचलते अरमान
दोस्तों
जो लिखने जा रही हूँ उसके लिए मैं रूपचंद्र शास्त्री जी की शुक्रगुजार हूँ । मैं इस पोस्ट में १-२ जगह अटक गई थी तो उनकी सहायता से ये पोस्ट पूरी हो पाई। मैं शास्त्री जी की आभारी हूँ उन्होंने अपना कीमती समय दिया ।
नूतन नवल कुसुम खिले हैं
अमल धवल रंग में मिले हैं
सावन की रिमझिम फुहारों सा
मन मयूर भी नृत्य किए है
किसी के आने का पैगाम लिए हैं
जीवन को मदमस्त किए है
जागृत में भी स्वप्न दिखे है
मौसम भी अलमस्त किए है
बादल बिजुरिया चमक रहे हैं
अरमान दिलों में मचल रहे हैं
किसी के साथ को तरस रहे हैं
तन मन को भिगो रहे हैं
न जाने कैसे फंद पड़े हैं
उलझ उलझ का सुलझ रहे हैं
मन का मीत आज आ रहा है
इसीलिए हम संवर रहे हैं
जो लिखने जा रही हूँ उसके लिए मैं रूपचंद्र शास्त्री जी की शुक्रगुजार हूँ । मैं इस पोस्ट में १-२ जगह अटक गई थी तो उनकी सहायता से ये पोस्ट पूरी हो पाई। मैं शास्त्री जी की आभारी हूँ उन्होंने अपना कीमती समय दिया ।
नूतन नवल कुसुम खिले हैं
अमल धवल रंग में मिले हैं
सावन की रिमझिम फुहारों सा
मन मयूर भी नृत्य किए है
किसी के आने का पैगाम लिए हैं
जीवन को मदमस्त किए है
जागृत में भी स्वप्न दिखे है
मौसम भी अलमस्त किए है
बादल बिजुरिया चमक रहे हैं
अरमान दिलों में मचल रहे हैं
किसी के साथ को तरस रहे हैं
तन मन को भिगो रहे हैं
न जाने कैसे फंद पड़े हैं
उलझ उलझ का सुलझ रहे हैं
मन का मीत आज आ रहा है
इसीलिए हम संवर रहे हैं
मंगलवार, 14 जुलाई 2009
नदिया की रवानी अभी देखी कहाँ है
तूने नदिया की रवानी
अभी देखी कहाँ है
बहते पानी की मदमस्त जवानी
अभी देखी कहाँ है
बलखाती ,मदमाती , अल्हड नदिया की
लहरों से छेड़खानी
अभी देखी कहाँ है
लहरों के गीतों पर
उछलती नदिया की
अंगडाइयां अभी देखी कहाँ हैं
तूफानों के साये में
पलने वाली नदिया की
तूफानों को बहा ले जाने की अदा
अभी देखी कहाँ है
तूने नदिया की रवानी
अभी देखी कहाँ है
अभी देखी कहाँ है
बहते पानी की मदमस्त जवानी
अभी देखी कहाँ है
बलखाती ,मदमाती , अल्हड नदिया की
लहरों से छेड़खानी
अभी देखी कहाँ है
लहरों के गीतों पर
उछलती नदिया की
अंगडाइयां अभी देखी कहाँ हैं
तूफानों के साये में
पलने वाली नदिया की
तूफानों को बहा ले जाने की अदा
अभी देखी कहाँ है
तूने नदिया की रवानी
अभी देखी कहाँ है
सदस्यता लें
संदेश (Atom)