ज़ार ज़ार रोती है
इक दुल्हन मुझमें
ये आस्माँ के सीने पर
किसने अलाव जला दिया
जो घटा तो सुलगता चाँद बना……अमावस्या का
और बढा तो वक्र गति मे चलता ग्रहण बना ………पूनम का
उम्र के दोज़ख में
पनाहों के परदे नहीं लगा करते
हवा के आने जाने को
कुछ देर ठहरने को
साँस लेने को
झिर्रियों का होना भी तो जरूरी होता है
फिर चाहे आर पार
ना जमीन हो ना आसमान
बस एक निर्वात
अनन्त से अनन्त तक
और उसमे
घूँघट डाले खडी
उम्र की साँझ की दुल्हन
इंतज़ार की बैसाखी लिये
सुदूर दक्षिण में खोज रही हो
कहीं अपना कोई …………एक शून्य
जो घूँघट उठाने की परम्परागत
रस्म को निभाने की ज़हमत उठाये
और चाँद उम्र की दहलीज़ पर नीला हो जाये
नीलगगन में चाँद का नीलापन
मानो घूँघट उठाती दुल्हन के चेहरे पर हया की लाली हो
और मैं नीलगगन में नीले चाँद की अन्तिम अरदास बन जाऊँ ………
उफ़ ! ख्वाबों के बिछौने पर नींद का कम्बल
उलझी लट कोई गिरी हो कपोलों पर मचलती हुयी
और फ़ूँक मार उसे उडा रहा हों …………कोई
जीने के लिये इतना सामान बहुत है …………अब और क्या चाहूँ ?
पृष्ठ
गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013
सोमवार, 11 फ़रवरी 2013
छीजती ज़िन्दगी और मेरा संग्राम
मौन हो जाती है मेरी कलम
मौन हो जाती हैं मेरी संवेदनायें
मौन हो जाती है मेरी सोच
मौन हो जाती हैं मेरी भावनायें
अब तुम तक आते - आते
जानते हो क्यों
तुमने कोई सिरा छोडा ही नहीं
जुडने का या कहो जोडने का
सुनो
अब ना प्रेम उपजता
ना भावनायें हिलोरें लेतीं
ना कोई स्पन्दन होता
क्योंकि
हम आदत भी तो नहीं बन सके
एक दूसरे की
हम चाहत भी तो नहीं बन सके
एक दूसरे की
हम राहत भी तो नहीं बन सके
एक दूसरे की
कहो फिर क्या बचा
जो बाँधे रखे उन धागों को
जहाँ सिवाय गांठों के कुछ बचा ही ना हो
ना …………अब नही दूँगी तुम्हें उलाहना कोई
क्योंकि
कोई ख्वाहिश ही नही बची तुमसे
बोलूँ , बतियाऊँ , हँसूँ या रोऊँ
ऐसा भी कोई स्रोता नहीं फ़ूट रहा
देखा ………द्रव्यमान
कितनी निरीहता छा गयी है
कितनी विवशता आ गयी है
जहाँ संज्ञाशून्य सी हो गयी हूँ
और सोच रही हूँ
अभी तो पहला ही पडाव गुजरा है
सफ़र का ……………
आगे क्या होगा
क्या ये बंधन
ये संबंध
ये रिश्ता
ये समझ
इसे कोई मुकाम भी मिलेगा
या यूँ ही हाथियों के पैर तले कुचल जायेगा……चींटी बनकर
सच कहूँ
उम्र के इस पडाव का
सबको इंतज़ार होता है
मुझे भी था ………मगर
वक्त ने नमी छोडी ही नहीं
अब कैसे मन की शाखायें
फिर से हरी भरी हो जायें
कैसे इन पर कोई
कँवल खिल जाये
नहीं , नही………दोषारोपण नहीं कर रही
बस वक्त की कामयाब कोशिशों को देख रही हूँ
और सोच रही हूँ
क्यों जीत गया वक्त हमसे
हमारे संबंध से
क्या कमी रह गयी थी
जिसका फ़ायदा वक्त उठा गया
और हमें बिखरा गया
शायद
कहीं ना कहीं
ना चाहते हुये भी
हमारे दम्भ , हमारा अहम
ही वक्त के हाथों का खिलौना बन गया
और वो अपना काम कर गया
देखो अब ………क्या बचा ?
ना तुम मुझमें
ना मैं तुममें
दो खोखले अस्थिपंजर
देह का लिबास ओढे
दुनियावी रस्म निभाने के लिये
कटिबद्ध हैं ………ज़िन्दगी रहने तक
आखिर जिम्मेदारियों से तो
नहीं मूँह मोडा जा सकता ना
चाहे रिश्ता कचरे के डिब्बे में पडा
सडांध मारता अपनी आखिरी साँस ही क्यों ना ले रहा हो
जीना है अब हमें इसी तरह
क्योंकि
माफ़ी माँगने या देने की सीमा से पार आ चुके हैं हम
क्योंकि
अब हमारे बीच आ चुकी है अभद्रता , असंयमता
ना केवल आचरण में बल्कि शब्दों में भी
फिर कैसे संभव है
नव निर्माण , नवांकुर , नव सृजन
बिना नमी के ……………
मौन की कचोट , मौन का वार और मौन का संग्राम
शब्दहीन , भावहीन , रसहीन कर गया मुझको …………और
जीवन की तल्खियों ने स्वादहीन बना दिया मुझको
क्या है कोई टंकारता घंटा उस ओर
मौन हो जाती हैं मेरी संवेदनायें
मौन हो जाती है मेरी सोच
मौन हो जाती हैं मेरी भावनायें
अब तुम तक आते - आते
जानते हो क्यों
तुमने कोई सिरा छोडा ही नहीं
जुडने का या कहो जोडने का
सुनो
अब ना प्रेम उपजता
ना भावनायें हिलोरें लेतीं
ना कोई स्पन्दन होता
क्योंकि
हम आदत भी तो नहीं बन सके
एक दूसरे की
हम चाहत भी तो नहीं बन सके
एक दूसरे की
हम राहत भी तो नहीं बन सके
एक दूसरे की
कहो फिर क्या बचा
जो बाँधे रखे उन धागों को
जहाँ सिवाय गांठों के कुछ बचा ही ना हो
ना …………अब नही दूँगी तुम्हें उलाहना कोई
क्योंकि
कोई ख्वाहिश ही नही बची तुमसे
बोलूँ , बतियाऊँ , हँसूँ या रोऊँ
ऐसा भी कोई स्रोता नहीं फ़ूट रहा
देखा ………द्रव्यमान
कितनी निरीहता छा गयी है
कितनी विवशता आ गयी है
जहाँ संज्ञाशून्य सी हो गयी हूँ
और सोच रही हूँ
अभी तो पहला ही पडाव गुजरा है
सफ़र का ……………
आगे क्या होगा
क्या ये बंधन
ये संबंध
ये रिश्ता
ये समझ
इसे कोई मुकाम भी मिलेगा
या यूँ ही हाथियों के पैर तले कुचल जायेगा……चींटी बनकर
सच कहूँ
उम्र के इस पडाव का
सबको इंतज़ार होता है
मुझे भी था ………मगर
वक्त ने नमी छोडी ही नहीं
अब कैसे मन की शाखायें
फिर से हरी भरी हो जायें
कैसे इन पर कोई
कँवल खिल जाये
नहीं , नही………दोषारोपण नहीं कर रही
बस वक्त की कामयाब कोशिशों को देख रही हूँ
और सोच रही हूँ
क्यों जीत गया वक्त हमसे
हमारे संबंध से
क्या कमी रह गयी थी
जिसका फ़ायदा वक्त उठा गया
और हमें बिखरा गया
शायद
कहीं ना कहीं
ना चाहते हुये भी
हमारे दम्भ , हमारा अहम
ही वक्त के हाथों का खिलौना बन गया
और वो अपना काम कर गया
देखो अब ………क्या बचा ?
ना तुम मुझमें
ना मैं तुममें
दो खोखले अस्थिपंजर
देह का लिबास ओढे
दुनियावी रस्म निभाने के लिये
कटिबद्ध हैं ………ज़िन्दगी रहने तक
आखिर जिम्मेदारियों से तो
नहीं मूँह मोडा जा सकता ना
चाहे रिश्ता कचरे के डिब्बे में पडा
सडांध मारता अपनी आखिरी साँस ही क्यों ना ले रहा हो
जीना है अब हमें इसी तरह
क्योंकि
माफ़ी माँगने या देने की सीमा से पार आ चुके हैं हम
क्योंकि
अब हमारे बीच आ चुकी है अभद्रता , असंयमता
ना केवल आचरण में बल्कि शब्दों में भी
फिर कैसे संभव है
नव निर्माण , नवांकुर , नव सृजन
बिना नमी के ……………
मौन की कचोट , मौन का वार और मौन का संग्राम
शब्दहीन , भावहीन , रसहीन कर गया मुझको …………और
जीवन की तल्खियों ने स्वादहीन बना दिया मुझको
क्या है कोई टंकारता घंटा उस ओर
जो खोल सके
मेरे मन मन्दिर के कपाटों को दुर्लभ देव दर्शन हेतु???
छीजती ज़िन्दगी और मेरा संग्राम अब हार जीत से परे हो चुका है
क्योंकि
कोई जीते या हारे ...हार निश्चित ही दोनो तरफ़ से मेरी ही है ...सनम !!!
मेरे मन मन्दिर के कपाटों को दुर्लभ देव दर्शन हेतु???
छीजती ज़िन्दगी और मेरा संग्राम अब हार जीत से परे हो चुका है
क्योंकि
कोई जीते या हारे ...हार निश्चित ही दोनो तरफ़ से मेरी ही है ...सनम !!!
शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013
एक दिन पुस्तक मेले के नाम …………2013
दिल गुलशन
गुलशन हो गया
जब दोस्तों का साथ मिल गया
किताबों से नाता जुड गया
यूँ मन का
कँवल खिल गया
कल पुस्तक मेले के सफ़र में सबसे पहले अन्दर कदम रखते ही आनन्द द्विवेदी जी से मुलाकात हो गयी वो जा रहे थे वापस और हम तो अभी आये ही थे लेकिन छोटी सी मुलाकात ही काफ़ी खुशगवार रही…………वैसे भी दोस्तों से मुलाकात कैसी भी हो खुशगवार ही होती है………उसके बाद हाल 12 से हमने अपने सफ़र की शुरुआत की और पहुँचे सीधे हिंद युग्म के स्टाल पर जहाँ अपने दोस्तों की पुस्तकों का तो अवलोकन किया ही उनसे मुलाकात भी हुयी जिनमें मुकेश कुमार सिन्हा, इंदु सिंह , राकेश कुमार जी, सुनीता शानू आदि शामिल थे ………उसके बाद हमारे कदम बढ गये बोधि प्रकाशन की तरह ………वहाँ से कुछ पुस्तकों को अपना साथी बनाया ………जैसा नाम वैसा काम को चरितार्थ करता बोधि प्रकाशन का स्टाल ……कम कीमत में काफ़ी बढिया रचनाकारों की किताबें हमें मिल गयीं जो अपने आप में एक मिसाल बन रहा है ……सिर्फ़ 100 रुपये में दस किताबों का सैट और बाकि की किताबें भी कोई ज्यादा कीमत की नहीं थीं जो आज के दौर में अपनी पहचान बना रही हैं बेशक सराहनीय और संग्रहणीय हैं ………उसके बाद विभिन्न स्टाल्स पर घूमते घूमते कुछ किताबें खरीदते खरीदते पेट मे चूहों ने हमला बोल दिया तो जलपान के लिये चल दिये और एक ब्रेक के बाद फिर सफ़र पर निकल पडे जहाँ हमने कहीं से अमृता को तो कहीँ से बुल्लेशाह को तो कहीं से कान्हा को लिया और आखिर में ज्योतिपर्व प्रकाशन पर जो हमारा साझा काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ है उसके विमोचन के लिये गये मगर वहाँ तो अभी देर थी इसलिये कुछ इंगलिश बुक्स बिटिया को दिलाने निकल पडे और इसी बीच मे कवि महोदय ने आकर जल्दी से विमोचन भी कर दिया और हम वहाँ तक पहुँच भी नहीं सके क्योंकि कवि उदभ्रांत जी सुना है बहुत जल्दी में थे ………और इस प्रकार आखिर में आकर हमने अपनी एक प्रति ली और घर की ओर रवाना हो गये ……मगर इस सफ़र का अपना ही मज़ा रहा ………जो सबसे बडी बात नोटिस की वो ये कि इस बार पाठक पुस्तकें खरीद रहे थे जो एक शुभ संकेत है …………चलिये कुछ चित्रों के माध्यम से आप भी आनन्द लीजिये हमारे सफ़र का
खिलते गुलाब
दो दिल मिल रहे हैं
हिन्द युग्म पर
ज्योतिपर्व प्रकाशन पर एक शाम
माया के मृग ने मन मोह लिया
गिरिराज शरण जी के साथ
मैं और मेरी परछाईं मन पखेरु के साथ
आ गये आ गये आ गये रंग जमाने वाले
जहाँ मिल जायें चार यार
तेरे मेरे बीच मे कैसा है ये बंधन अंजाना
यूँ चलते चलते वैलकम कर दिया
सुमित प्रताप के संग
ऐसे भी बातें होती हैं
यूँ भी मुलाकातें होती हैं
तुम और मैं खुश हैं यूँ आज मिल के
क्या अदा क्या जलवे तेरे
एक स्टाइल ये भी
शब्दों की चहलकदमी का विमोचन हो गया्………जिसमें कुछ शब्द मेरे भी हैं
( फ़ोटो राजीव तनेजा जी ,सरस दरबारी जी से साभार और कुछ मेरे )
मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013
हाय ! सोशल मिडिया तूने बड़ा दुःख दीन्हा
बरसात के बाद उग आये
कुकुरमुत्तों से हम
आज के दौर के
कवि कहलाते हैं
एक लाइक और एक टिपण्णी
पर फूले नहीं समाते हैं
एक पत्रिका में छपने पर
एक सम्मान पाने पर
एक जुगाड़ लगाने पर
बांछें खूब खिलाते हैं
मगर असलियत
नहीं जान पाते हैं
पल दो पल के जीवन सा
ये सोशल दरबार सजाया है
जिसने हर लिखने वाले को कवि बनाया है
जो छोटी -छोटी उपलब्धियों पर
उड़ान भरने लगता है
मगर एक दिन खुद को
कुएं के मेंढक सा
जब घिरा पाता है
तब हाथ मलके पछताता है
हाय सोशल मिडिया
तूने बड़ा दर्द दीन्हा
मेरा मुझमे जो
सुख चैन था
वो भी है छीना
अब न वो उड़ान
भर पाता हूँ
न मस्ती से जी पाता हूँ
बस कुछ न कुछ
जरूर लिखना है
चाहे साहित्यिक हो या नहीं
लिखने से न बच पाता हूँ
और ये सच भूल जाता हूँ
बरसाती कुकुरमुत्तों का
जीवन ना ज्यादा होता है
एक न एक दिन
उन्हें तो मिटना होता है
बिना किसी
पहचान के
हाय ! सोशल मिडिया
तूने बड़ा दुःख दीन्हा
कुकुरमुत्तों से हम
आज के दौर के
कवि कहलाते हैं
एक लाइक और एक टिपण्णी
पर फूले नहीं समाते हैं
एक पत्रिका में छपने पर
एक सम्मान पाने पर
एक जुगाड़ लगाने पर
बांछें खूब खिलाते हैं
मगर असलियत
नहीं जान पाते हैं
पल दो पल के जीवन सा
ये सोशल दरबार सजाया है
जिसने हर लिखने वाले को कवि बनाया है
जो छोटी -छोटी उपलब्धियों पर
उड़ान भरने लगता है
मगर एक दिन खुद को
कुएं के मेंढक सा
जब घिरा पाता है
तब हाथ मलके पछताता है
हाय सोशल मिडिया
तूने बड़ा दर्द दीन्हा
मेरा मुझमे जो
सुख चैन था
वो भी है छीना
अब न वो उड़ान
भर पाता हूँ
न मस्ती से जी पाता हूँ
बस कुछ न कुछ
जरूर लिखना है
चाहे साहित्यिक हो या नहीं
लिखने से न बच पाता हूँ
और ये सच भूल जाता हूँ
बरसाती कुकुरमुत्तों का
जीवन ना ज्यादा होता है
एक न एक दिन
उन्हें तो मिटना होता है
बिना किसी
पहचान के
हाय ! सोशल मिडिया
तूने बड़ा दुःख दीन्हा
शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013
सिद्धांत लागू हो रहा है हम पर
तुम ---
खामोश मोहब्बत हो कोई
और मैं ---
जैसे विराम कोई मिल जाये
तुम ----
दहकती ख्वाहिश हो कोई
और मैं---
जैसे बहकता सावन कोई बरस जाये
सिद्धांत लागू हो रहा है हम पर
विपरीत ध्रुवों के आकर्षण का ………है ना !!!!!!!
खामोश मोहब्बत हो कोई
और मैं ---
जैसे विराम कोई मिल जाये
तुम ----
दहकती ख्वाहिश हो कोई
और मैं---
जैसे बहकता सावन कोई बरस जाये
सिद्धांत लागू हो रहा है हम पर
विपरीत ध्रुवों के आकर्षण का ………है ना !!!!!!!
मंगलवार, 29 जनवरी 2013
सुनो………।
सुनो
तुम ज़लालत की ज़िन्दगी जीने
और मरने के लिये ही पैदा होती हो
सुनो
तुम जागीर हो हमारी
कैसे तुम्हारे भले का हम सोच सकते हैं
सुनो
तुम इंसान नहीं हो जान लो
कैसे तुम्हें न्याय दे
खुद अपने पाँव पर कुल्हाडी मार सकते हैं
सुनो
तुम बलात्कृत हो या मरो
कानून तुम्हारे लिये नहीं बदलेगा
सुनो
तुम्हारी कुर्बानी को सारा जहान क्योँ ना माने
मगर कानून तो अपनी डगर ही चलेगा
सुनो
शहादत तो सीमा पर होती है
और तुम शहीद नहीं
इसलिये नाबालिग के तमगे तले
बलात्कारी पोषित होता रहेगा
सुनो
तुम , तुम्हारे शुभचिन्तक, ये बबाली
चाहे जितना शोर मचा लो, नारे लगा लो
आन्दोलन कर लो
व्यवस्थायें , शासन और देश
तुम्हारे हिसाब से नहीं चलेगा
सुनो
तुम्हारे जैसी रोज मरा करती हैं
और तुम जैसी के मरने से
या बलात्कृत होने से
देश और व्यवस्थायें , समाज और कानून
परिवर्तित नहीं हुआ करते
संविधान में यूँ ही संशोधन नहीं हुआ करते
जब तक कि कोई कानून बनाने वाले
या देश पर शासन करने वालों के
घर की अस्मिता ही ना बलात्कृत हो
इसलिये
सुनो
सो जाओ एक बार फिर कु्म्भकर्णी नींद में
क्योंकि
नाबालिगता और दो साल की कैद
काफ़ी है तुम्हारे ज़ख्म भरने के लिये
इसलिये जान लो
विशेष परिस्थिति का आकलन और समयानुसार निर्णय लेना हमारे देश का चलन नहीं ………………
रविवार, 27 जनवरी 2013
"रास्ता है तो पहुँचेगा अपने अन्तिम छोर तक भी "
रास्ता है तो पहुँचेगा अपने अन्तिम छोर तक भी फिर चाहे राह मे कितने गहन अन्धेरे ही क्यों ना हों
कितने ही बीहड कंटीले बियाबान हों
फिर चाहे पगडंडी पर ही क्यों ना चलना पडे
मगर यदि रास्ता है तो जरूर पहुँचेगा अपने अन्तिम छोर तक
फिर चाहे राह मे मोह मत्सर के नाले हों
या अहंकार के प्याले हों
या फिर क्रोधाग्नि से दग्ध ज्वाले हों
फिर चाहे पगडंडी पर ही क्यों ना चलना पडे
यदि रास्ता है तो जरूर पहुँचेगा अपने अन्तिम छोर तक
फिर चाहे वेदना नृत्य करती हो
या रूह कितना ही सिसकती हो
चाहे भटकन कितनी हो
पर अन्तिम सत्य तक पहुँचना होगा
पगडंडी पर भी चलना होगा
क्योंकि
सीधी सपाट राहें जरूरी नहीं मंज़िल का पता दे ही दें
क्योंकि फ़िसलन भी वहीं ज्यादा होती है
इसलिये
गर हो हिम्मत तो पगडंडियों के दुर्गम
अभेद , जटिलताओं से भरे किनारों पर
पाँव रख कर देखना
गर चल सको तो चल कर देखना
फिर जटिलताओं की आँच पर तपकर
कुन्दन जब बन जाओगे
तो मंज़िल भी पा जाओगे
रास्तों के सफ़र मे पगडंडियों की अनदेखी
करने वालों को मंज़िल नहीं मिला करती
हाँ, रास्ता है तो तय करना ही होगा
खुद से अन्तिम छोर पर मिलना ही होगा
वो ही जीवन का वास्तविक उत्सव होगा
कितने ही बीहड कंटीले बियाबान हों
फिर चाहे पगडंडी पर ही क्यों ना चलना पडे
मगर यदि रास्ता है तो जरूर पहुँचेगा अपने अन्तिम छोर तक
फिर चाहे राह मे मोह मत्सर के नाले हों
या अहंकार के प्याले हों
या फिर क्रोधाग्नि से दग्ध ज्वाले हों
फिर चाहे पगडंडी पर ही क्यों ना चलना पडे
यदि रास्ता है तो जरूर पहुँचेगा अपने अन्तिम छोर तक
फिर चाहे वेदना नृत्य करती हो
या रूह कितना ही सिसकती हो
चाहे भटकन कितनी हो
पर अन्तिम सत्य तक पहुँचना होगा
पगडंडी पर भी चलना होगा
क्योंकि
सीधी सपाट राहें जरूरी नहीं मंज़िल का पता दे ही दें
क्योंकि फ़िसलन भी वहीं ज्यादा होती है
इसलिये
गर हो हिम्मत तो पगडंडियों के दुर्गम
अभेद , जटिलताओं से भरे किनारों पर
पाँव रख कर देखना
गर चल सको तो चल कर देखना
फिर जटिलताओं की आँच पर तपकर
कुन्दन जब बन जाओगे
तो मंज़िल भी पा जाओगे
रास्तों के सफ़र मे पगडंडियों की अनदेखी
करने वालों को मंज़िल नहीं मिला करती
हाँ, रास्ता है तो तय करना ही होगा
खुद से अन्तिम छोर पर मिलना ही होगा
वो ही जीवन का वास्तविक उत्सव होगा
गुरुवार, 24 जनवरी 2013
जवाब दो मनुज ………जवाब दो?
गुफ़्तगू के मार्च अंक (2013)में प्रकाशित मेरी ये कविता ………कुछ लोगों ने सूचित किया मैसेज द्वारा तो पता चला क्योंकि पत्रिका तो मिली नहीं और सुना है वो पत्रिका भी सिर्फ़ सदस्यों को भेजते हैं और हम सदस्य नहीं हैं ………वैसे और जगह भी छप रहे हैं मगर सब जगह से पत्रिका आदि आते रहते हैं ये ही एक जगह है जहाँ से डब्बा गोल है :) ………
इक तरफ़ कटा सिर उसका
जो बना देश का प्रहरी
कहीं ना कोई मचा हल्ला
क्योंकि कर्तव्य है ये उसका
कह पल्ला झाडा जाता हो जहाँ
इक तरफ़ बहन बेटी की आबरू
सरेआम लुट जाती हो
और कातिल अस्मत का
नाबालिगता के करार में
बचने की फ़ेहरिस्त मे जुड जाता हो जहाँ
सफ़ेदपोश चेहरों पर शिकन
ना आती हो चाहे कितना ही
मुश्किल वक्त आ पडा हो
घोटालों के घोटालों मे जिनके चेहरे
साफ़ नज़र आते हों जहाँ
न्याय के नाम पर
खिलवाड किया जाता हो जहाँ
कानून के ही मंदिर में
कानून का अपमान किया जाता हो जहाँ
फिर चाहे संविधान की कोई
कितनी धज्जियाँ उडाये कैसे कोई संवैधानिक पर्व मनाये वहाँ
वहाँ कैसे कोई आस्था का पर्व मनाये
क्यों ना शर्म से डूब मर जाये
क्यों नहीं एक शमशीर उठाये
और झोंक दे हर उस आँख में
जहाँ देखे दरिन्दगी के निशाँ
जहाँ देखे वतन की पीठ पर
दुश्मन का खंजरी वार
जहाँ देखे घर के अन्दर बसे
शैतानों के व्यभिचार
कहो तो जब तक ना हो
सभी दानवों का सफ़ाया
जब तक ना हो विषपान
करने को शिव का अवतार
बिना मंथन के
कैसे अमृत कलश निकलेगा
और कैसे घट से अमृत छलकेगा
तब तक कैसे कोई करेगा
आस्था की वेदी पर कुंभ स्नान ?
कुम्भ स्नान के लिये
देनी होगी आहुति यज्ञ में
निर्भिकता की, सत्यता की, हौसलों की
ताकि फिर ना दानव राज हो
सत्य, दया और हौसलों की परवाज़ हो
और हो जाये शक्ति का आहवान
और जब तक ना ऐसा कर पाओगे
कैसे खुद से नज़र मिलाओगे
तब तक कैसे ढकोसले की चादर लपेटे
करोगे तुम कुम्भ स्नान…………?
क्योंकि
स्नान का महत्त्व तब तक कुछ नहीं
जब तक ना मन को पवित्र किया
तन की पवित्रता का तब तक ना कोई महत्त्व
जब तक ना मन पवित्र हुआ
जब तक ना हर शख्स के मन में
तुमने आदर ,सच्चाई और हौसलों का
दीप ना जला दिया
दुश्मन का ह्रदय भी ना साफ़ किया
तब तक हर स्नान बेमानी ही हुआ
इसलिये
जब तक ना ऐसा कर सको
कैसे कर सकोगे कुम्भ स्नान
जवाब दो मनुज ………जवाब दो?
शनिवार, 19 जनवरी 2013
"तुम्हारी मूक अभिव्यक्ति की मुखर पहचान हूँ मैं"
सुनो
प्रश्न किया तुमने
देह के बाहर मुझे खोजने का
और खुद को सही सिद्ध करने का
कि देह से इतर तुम्हें
कभी देख नहीं पाया
जान नहीं पाया
एक ईमानदार स्वीकारोक्ति तुम्हारी
सच ……अच्छा लगा जानकर
मगर
बताना चाहती हूँ तुम्हें
मैं हूँ देह से इतर भी
और देह के संग भी
बस बीच की सूक्ष्म रेखा कहो
या दोनो के बीच का अन्तराल
उसमें कभी देखने की कोशिश करते
तो जान पाते
मै और मेरा प्रेम
मैं और मेरी चाहतें
मैं और मेरा होना
देहजनित प्रेम से परे
मेरे ह्रदयाकाश मे अवस्थित
अखण्ड ब्रह्मांड सा व्यापक है
जिसमें मेरा देह से इतर होना समाया है
बस भेदना था तुम्हें उस ब्रह्मांड को
अपने प्रेमबाण से
जो देह पर आकर ही ना
अपना स्वरूप खो बैठे
क्या चाहा देह से इतर
सिर्फ़ इतना ना
कभी कभी आयें वो पल
जब तुम्हारे स्पर्श में
मुझे वासनामयी छुअन
का अहसास ना हो
कभी लेते हाथ मेरा अपने हाथ में
सहलाते प्रेम से
देते ऊष्मा स्पर्श की
जो बताती ………
मैं हूँ तुम्हारे साथ
तुम्हारे हर अनबोले में
तु्म्हारे हर उस भाव में
जिन्हें तुम शब्दों का जामा नही पहना पातीं
"तुम्हारी मूक अभिव्यक्ति की मुखर पहचान हूँ मैं"
ओह ! सिर्फ़ इन्हीं शब्दो के साथ
मैं सम्पूर्ण ना हो जाती
या कभी पढते आँखों की भाषा
जहाँ वक्त की ख्वाहिशों तले
मेरा वजूद दब गया था
मगर अन्दर तो आज भी
एक अल्हड लडकी ज़िन्दा थी
कभी करते कोशिश
पढने की उस मूक भाषा को
और करते अभिव्यक्त
मेरे व्यक्त करने से पहले
आह ! मैं मर कर भी ज़िन्दा हो जाती
प्रेम की प्यास कितनी तीव्र होगी ……सोचना ज़रा
क्या ज्यादा चाहा तुमसे
इतने वर्ष के साथ के बाद
जहाँ पहुँचने के बाद शब्द तो गौण हो जाते हैं
जहाँ पहुँचने के बाद शरीर भी गौण हो जाते हैं
क्या इतना चाहना ज्यादा था
कम से कम मेरे लिये तो नही था
क्योंकि
मैने तुम्हें देह के साथ भी
और देह से इतर भी चाहा है
जानते हो
कभी कभी जरूरत होती है
देह से इतर भी प्रेम करने की ……राधा कृष्ण सा
सम्पूर्णता की चाह में ही तो भटकाव है ,प्यास है , खोज है
जो मेरी भी है और तुम्हारी भी
बस फ़र्क है तो स्वीकार्यता में
बस फ़र्क है तो महसूसने में
बस फ़र्क है तो उसके जीने में
और मैं और मेरी प्यास अधूरी ही रही
मुझे पसन्द नहीं अधूरापन ………
क्योंकि
ना तुम आदि पुरुष हो ना मैं आदि नारी
इसलिये
खोज जारी है …………देह से इतर प्रेम कैसे होता है
अधूरी हसरतों को प्यास के पानी से सींचना सबके बस की बात नहीं …………
प्रश्न किया तुमने
देह के बाहर मुझे खोजने का
और खुद को सही सिद्ध करने का
कि देह से इतर तुम्हें
कभी देख नहीं पाया
जान नहीं पाया
एक ईमानदार स्वीकारोक्ति तुम्हारी
सच ……अच्छा लगा जानकर
मगर
बताना चाहती हूँ तुम्हें
मैं हूँ देह से इतर भी
और देह के संग भी
बस बीच की सूक्ष्म रेखा कहो
या दोनो के बीच का अन्तराल
उसमें कभी देखने की कोशिश करते
तो जान पाते
मै और मेरा प्रेम
मैं और मेरी चाहतें
मैं और मेरा होना
देहजनित प्रेम से परे
मेरे ह्रदयाकाश मे अवस्थित
अखण्ड ब्रह्मांड सा व्यापक है
जिसमें मेरा देह से इतर होना समाया है
बस भेदना था तुम्हें उस ब्रह्मांड को
अपने प्रेमबाण से
जो देह पर आकर ही ना
अपना स्वरूप खो बैठे
क्या चाहा देह से इतर
सिर्फ़ इतना ना
कभी कभी आयें वो पल
जब तुम्हारे स्पर्श में
मुझे वासनामयी छुअन
का अहसास ना हो
कभी लेते हाथ मेरा अपने हाथ में
सहलाते प्रेम से
देते ऊष्मा स्पर्श की
जो बताती ………
मैं हूँ तुम्हारे साथ
तुम्हारे हर अनबोले में
तु्म्हारे हर उस भाव में
जिन्हें तुम शब्दों का जामा नही पहना पातीं
"तुम्हारी मूक अभिव्यक्ति की मुखर पहचान हूँ मैं"
ओह ! सिर्फ़ इन्हीं शब्दो के साथ
मैं सम्पूर्ण ना हो जाती
या कभी पढते आँखों की भाषा
जहाँ वक्त की ख्वाहिशों तले
मेरा वजूद दब गया था
मगर अन्दर तो आज भी
एक अल्हड लडकी ज़िन्दा थी
कभी करते कोशिश
पढने की उस मूक भाषा को
और करते अभिव्यक्त
मेरे व्यक्त करने से पहले
आह ! मैं मर कर भी ज़िन्दा हो जाती
प्रेम की प्यास कितनी तीव्र होगी ……सोचना ज़रा
क्या ज्यादा चाहा तुमसे
इतने वर्ष के साथ के बाद
जहाँ पहुँचने के बाद शब्द तो गौण हो जाते हैं
जहाँ पहुँचने के बाद शरीर भी गौण हो जाते हैं
क्या इतना चाहना ज्यादा था
कम से कम मेरे लिये तो नही था
क्योंकि
मैने तुम्हें देह के साथ भी
और देह से इतर भी चाहा है
जानते हो
कभी कभी जरूरत होती है
देह से इतर भी प्रेम करने की ……राधा कृष्ण सा
सम्पूर्णता की चाह में ही तो भटकाव है ,प्यास है , खोज है
जो मेरी भी है और तुम्हारी भी
बस फ़र्क है तो स्वीकार्यता में
बस फ़र्क है तो महसूसने में
बस फ़र्क है तो उसके जीने में
और मैं और मेरी प्यास अधूरी ही रही
मुझे पसन्द नहीं अधूरापन ………
क्योंकि
ना तुम आदि पुरुष हो ना मैं आदि नारी
इसलिये
खोज जारी है …………देह से इतर प्रेम कैसे होता है
अधूरी हसरतों को प्यास के पानी से सींचना सबके बस की बात नहीं …………
बुधवार, 16 जनवरी 2013
सोचती हूँ अघोरी बन जाऊँ
सोचती हूँ अघोरी बन जाऊँ
और अपने मन के शमशान में
कील दूँ तुम्हें
तुम्हारी यादों को
तुम्हारे वजूद को
अपनी मोहब्बत के
सिद्ध किये मन्त्रों से
सुना है --------- मन्त्रों में बहुत शक्ति होती है
और आत्मायें
जो कीली जाती हैं
वचनबद्ध होती हैं
मन्त्रों की लक्ष्मण रेखा में
बँधे रहने को ------------
क्योंकि
मोहब्बत की शमशानी खामोशी में गूँजते
मन्त्रोच्चार के भी अपने कायदे होते हैं ……
और अपने मन के शमशान में
कील दूँ तुम्हें
तुम्हारी यादों को
तुम्हारे वजूद को
अपनी मोहब्बत के
सिद्ध किये मन्त्रों से
सुना है --------- मन्त्रों में बहुत शक्ति होती है
और आत्मायें
जो कीली जाती हैं
वचनबद्ध होती हैं
मन्त्रों की लक्ष्मण रेखा में
बँधे रहने को ------------
क्योंकि
मोहब्बत की शमशानी खामोशी में गूँजते
मन्त्रोच्चार के भी अपने कायदे होते हैं ……
मंगलवार, 15 जनवरी 2013
सोचती हूँ क्या दूं तुम्हें तोहफा
सोचती हूँ
क्या दूँ तुम्हें तोहफा
बहुत हो चुका देना
वस्तुओं का
कपडे, पर्स ,ज्वेलरी
सब भौतिक वस्तुएं
क्योंकि अब तुम
पदार्पण कर चुकी हो
बचपन से उम्र के उस
पड़ाव में जहाँ
हर तरफ ज़िन्दगी
एक जुंग बनकर खड़ी मिलेगी
दुआएं तो हमेशा
हर हाल में
तुम्हारे साथ रहती हैं
इसलिए चाहती हूँ देना
एक ऐसा तोहफा
जिसे तुम हमेशा संजो कर रख सको
और पीढ़ी दर पीढ़ी
उसे आबंटित करती रहो
सुनो बेटी
जब से तुम्हें जन्म दिया
न कोई रोक टोक किया
न कोई फर्क किया
क्योंकि
मुझे कहीं कोई फर्क ही नहीं दिखा
नहीं लगा ऐसा कहीं
जो तुम पर थोपती
कोई मान्यता
मगर आज बदल गया ज़माना
आज बदल गयी इंसानियत
आज बदल गयी हर तस्वीर
आज 21 वीं सदी की नारी कहाती हूँ
इसलिए तुम्हें बताती हूँ
बेशक वक्त का खौफनाक
चेहरा सामने आया है
बेशक एक जंग छिड़ी है
मगर चाहती हूँ अब
तुम्हारा भी योगदान
चाहती हूँ तुम्हें निडर बनाना
अपने हक़ के लिए लड़ना सिखाना
अपनी आवाज़ उठाना
ताकि कल कोई सामाजिक मान्यता
बेडी बनकर तुम्हारे पाँव न रोक सके
अब अपनी जुंग तुम्हें खुद लड़नी है
किसी निगाह में अपने लिए
हमदर्दी नहीं देखनी है
बल्कि अपनी पहचान आप बनना है
एक ऐसा ताजमहल तुम्हें खड़ा करना है
जिस दिन अपनी अस्मिता
अपनी अहमियत , अपनी पहचान
तुम्हें मिलेगी .........देखना
यही दुनिया , यही लोग
यही सोच तुम्हारे आगे
नतमस्तक होंगे
बस अपने हौसलों को न टूटने देना है
बस एक आगाज़ तुम्हें करना है
मुश्किलों से न डरना है
क्योंकि
इतिहास में तारीखें तभी अमर हुआ करती हैं
जब शख्सियतें इबारत लिखा करती हैं
और इस बार तुम्हें गढ़नी है इबारत
अपने अस्तित्व की, अपनी पहचान की , अपने स्वाभिमान की
बिटिया के जन्मदिन पर आज के हालत को देखते हुए एक माँ का बस यही है तोहफा उसके लिए
शनिवार, 12 जनवरी 2013
मौत की नमाज़ पढ रहा है कोई
मौत की नमाज़ पढ रहा है कोई
कीकर के बीज बो रहा है कोई
ये तो वक्त की गर्दिशें हैं बाकी
वरना सु्कूँ की नीद कब सो रहा है कोई
आईनों को फ़ाँसी दे रहा है कोई
सब्ज़बागों को रौशन कर रहा है कोई
ये तो बेबुनियादी दौलतों की हैं कोशिशें
वरना हकीकतों में कब लिबास बदल रहा है कोई
नक्सलवाद की भेंट चढ रहा है कोई
काट सिर दहशत बो रहा है कोई
ये तो किराये के मकानों की हैं असलियतें
वरना तस्वीर का रुख कब बदल रहा है कोई
आशिकी की ज़मीन हो या भक्ति के पद
यहाँ ना धर्म बदल रहा है कोई
मीरा की जात हो या कबीर की वाणी
सबमें ना उगता सूरज देख रहा है कोई
ये तो बुवाई हो रही है गंडे ताबीज़ों की
वरना फ़सल के तबाह होने से कब डर रहा है कोई
बिसात चौसर की बिछा रहा है कोई
दाँव पर दाँव चल रहा है कोई
ये तो अभिशापित पाँसे हैं शकुनि के
वरना यहाँ धर्मयुद्ध कब जीत रहा है कोई
कीकर के बीज बो रहा है कोई
ये तो वक्त की गर्दिशें हैं बाकी
वरना सु्कूँ की नीद कब सो रहा है कोई
आईनों को फ़ाँसी दे रहा है कोई
सब्ज़बागों को रौशन कर रहा है कोई
ये तो बेबुनियादी दौलतों की हैं कोशिशें
वरना हकीकतों में कब लिबास बदल रहा है कोई
नक्सलवाद की भेंट चढ रहा है कोई
काट सिर दहशत बो रहा है कोई
ये तो किराये के मकानों की हैं असलियतें
वरना तस्वीर का रुख कब बदल रहा है कोई
आशिकी की ज़मीन हो या भक्ति के पद
यहाँ ना धर्म बदल रहा है कोई
मीरा की जात हो या कबीर की वाणी
सबमें ना उगता सूरज देख रहा है कोई
ये तो बुवाई हो रही है गंडे ताबीज़ों की
वरना फ़सल के तबाह होने से कब डर रहा है कोई
बिसात चौसर की बिछा रहा है कोई
दाँव पर दाँव चल रहा है कोई
ये तो अभिशापित पाँसे हैं शकुनि के
वरना यहाँ धर्मयुद्ध कब जीत रहा है कोई
बुधवार, 9 जनवरी 2013
ये फ़ितूरों के जंगल हमेशा बियाबान ही क्यों होते हैं?
काश !
मौन के ताले की भी कोई चाबी होती
तो जुबाँ ना यूँ बेबस होती
कलम ना यूँ खामोश होती
कोई आँधी जरूर उमडी होती
इन बेबसी के कांटों का चुभना …
मानो रूह का ज़िन्दगी के लिये मोहताज़ होना
बस यूँ गुज़रा हर लम्हा मुझ पर
ज्यूँ बदली कोई बरसी भी हो
और चूनर भीगी भी ना हो
ये फ़ितूरों के जंगल हमेशा बियाबान ही क्यों होते हैं?
मौन के ताले की भी कोई चाबी होती
तो जुबाँ ना यूँ बेबस होती
कलम ना यूँ खामोश होती
कोई आँधी जरूर उमडी होती
इन बेबसी के कांटों का चुभना …
मानो रूह का ज़िन्दगी के लिये मोहताज़ होना
बस यूँ गुज़रा हर लम्हा मुझ पर
ज्यूँ बदली कोई बरसी भी हो
और चूनर भीगी भी ना हो
ये फ़ितूरों के जंगल हमेशा बियाबान ही क्यों होते हैं?
मंगलवार, 8 जनवरी 2013
कल , आज और कल
पता नहीं क्यों
आदत हो गयी है हमें
इतिहास से फूल चुनने की
और काँटों पर शयन करने की
आखिर क्यों हम बार- बार
पलट कर देखते हैं
जबकि वक्त ना जाने कितनी
करवटें बदल चुका है
ना वैसा आलम रहा
ना वैसा आचरण
ना वैसे संस्कार
तो फिर क्यों हम
आज की तुलना
बीते कल से करते हैं
और खोजते हैं
अपना बीता वक्त आज में
जबकि जो बीत चुका
वो वापस नहीं आता
कालातीत हो चुका होता है जो
क्यों उसे ज़िन्दा करने की
उसे कुरेदने की कोशिश करते हैं
फिर चाहे समाज की कुरीतियाँ हों
या मन के दंश
या घर की औरतें
खींच लाते हैं उन्हें अतीत से वर्तमान में
और थोपने लगते हैं
कल के पलों पर आज के जंगल
ढूँढने लगते हैं अमरबेलें
जो कभी मुरझाएं नहीं
ज़िन्दा रखते हैं हम उन्हें
अपनी यादों में चिताओं की अग्नि जलाये
क्यों नहीं इतना समझते
कल के सन्दर्भ कल के माहौल
को इंगित करते हैं .........आज को नहीं
फिर कैसे उम्मीद कर लें
बीता कल आज बन जाए
क्यों नहीं समझते
कल काल कवलित हो चुका
और आज भी सिर्फ आज है
दिन गुजरते ही ये भी
काल कवलित हो जायेगा
तो क्यों ना उसके गुजरने से पहले
कुछ ऐसे दस्तावेज़ लिख दें
कि आने वाले कल में कोई
आज जो बीत कर कल बन जायेगा
उसकी परछाइयाँ ना देखे
लिख दें ऐसा पल स्वर्णिम अक्षरों में
जो कभी काल कवलित ना हो
फिर चाहे कल , आज और कल हो
हर युग में प्रासंगिक हो ..............
आदत हो गयी है हमें
इतिहास से फूल चुनने की
और काँटों पर शयन करने की
आखिर क्यों हम बार- बार
पलट कर देखते हैं
जबकि वक्त ना जाने कितनी
करवटें बदल चुका है
ना वैसा आलम रहा
ना वैसा आचरण
ना वैसे संस्कार
तो फिर क्यों हम
आज की तुलना
बीते कल से करते हैं
और खोजते हैं
अपना बीता वक्त आज में
जबकि जो बीत चुका
वो वापस नहीं आता
कालातीत हो चुका होता है जो
क्यों उसे ज़िन्दा करने की
उसे कुरेदने की कोशिश करते हैं
फिर चाहे समाज की कुरीतियाँ हों
या मन के दंश
या घर की औरतें
खींच लाते हैं उन्हें अतीत से वर्तमान में
और थोपने लगते हैं
कल के पलों पर आज के जंगल
ढूँढने लगते हैं अमरबेलें
जो कभी मुरझाएं नहीं
ज़िन्दा रखते हैं हम उन्हें
अपनी यादों में चिताओं की अग्नि जलाये
क्यों नहीं इतना समझते
कल के सन्दर्भ कल के माहौल
को इंगित करते हैं .........आज को नहीं
फिर कैसे उम्मीद कर लें
बीता कल आज बन जाए
क्यों नहीं समझते
कल काल कवलित हो चुका
और आज भी सिर्फ आज है
दिन गुजरते ही ये भी
काल कवलित हो जायेगा
तो क्यों ना उसके गुजरने से पहले
कुछ ऐसे दस्तावेज़ लिख दें
कि आने वाले कल में कोई
आज जो बीत कर कल बन जायेगा
उसकी परछाइयाँ ना देखे
लिख दें ऐसा पल स्वर्णिम अक्षरों में
जो कभी काल कवलित ना हो
फिर चाहे कल , आज और कल हो
हर युग में प्रासंगिक हो ..............
शनिवार, 5 जनवरी 2013
क्या कहूँ अब ?
क्या कहूँ अब ?
एक प्रश्न बन खड़ा है मेरे सामने
न मैं बची न मेरा अस्तित्व
और फिर किससे कहूँ ?
कौन है सुनने वाला ?
कहने के लिए
दो का होना जरूरी होता है
एक कहने वाला और एक सुनने वाला
मगर आज तो लगता है
सिवाय मेरे
और कोई नहीं है सुनने वाला
ये कौन से देश में आ गयी हूँ
ये कौन से परिवेश में आ गयी हूँ
ऐसा तो न देखा था न सुना था
बस यही सुनते बड़ी हुयी
ये राम का देश है
जहाँ सीता की अस्मिता के लिए
रावण का अंत किया जाता है
और प्रतीकात्मक रूप से
आज भी रावण का अंत होता है
जहाँ आज भी स्त्री को इतना मान मिलता है
कि देवी रूप में पूजी जाती है
मगर मुझे न पता था
यहाँ स्त्री को सिर्फ भोग्या का ही स्थान मिला
फिर चाहे द्रौपदी हो या अहिल्या या आज की दामिनी
हर बार वो ही दांव पर लगी
हर बार उसकी ही अस्मिता से खेला गया
हर बार उसकी ही आत्मा को लहूलुहान किया गया
सन्दर्भ या काल कोई भी रहा हो
मगर हर बार दोहन मेरा ही हुआ
तो फिर कहने को क्या बचा ?
कौन सा कानून ऐसा बना
जिसमे मेरे वजूद को इन्सान के रूप में स्वीकारा गया
आज जब वाकिफ हो गयी हूँ इस सत्य से
तो चाहती हूँ बदलना अपने रूप को
अपने स्वरुप को
करना चाहती हूँ एक ऐसा तप
जिसमे मांग सकूँ खुदा से
सिर्फ अपने लिए एक वर
"अब से जब भी पृथ्वी पर जन्म देना
मुझमे ना वो अंग देना
जो इंसान को हैवान बनाते हैं
जो माँ, बहन, बेटी तक का फर्क भुलाते हैं
या फिर इतना सबल बनाना
कि आँख न कोई उठ सके
हाथ न कोई बढ़ सके
मेरी अस्मिता तक "
हाँ माँगना चाहती हूँ अब खुदा से ही
क्योंकि
इंसानों का देश कहे जाने वाले इस देश में तो
मैं घर में भी सुरक्षित नहीं .............
जहाँ मेरे शव पर राजनीति होती है
जहाँ मेरी अस्मिता जार - जार रोती है
जहाँ रूह मेरी तार - तार होती है
और फिर यही प्रश्न मूंह बाए खड़ा हो जाता है ...........क्या कहूँ अब और किससे ?
एक प्रश्न बन खड़ा है मेरे सामने
न मैं बची न मेरा अस्तित्व
और फिर किससे कहूँ ?
कौन है सुनने वाला ?
कहने के लिए
दो का होना जरूरी होता है
एक कहने वाला और एक सुनने वाला
मगर आज तो लगता है
सिवाय मेरे
और कोई नहीं है सुनने वाला
ये कौन से देश में आ गयी हूँ
ये कौन से परिवेश में आ गयी हूँ
ऐसा तो न देखा था न सुना था
बस यही सुनते बड़ी हुयी
ये राम का देश है
जहाँ सीता की अस्मिता के लिए
रावण का अंत किया जाता है
और प्रतीकात्मक रूप से
आज भी रावण का अंत होता है
जहाँ आज भी स्त्री को इतना मान मिलता है
कि देवी रूप में पूजी जाती है
मगर मुझे न पता था
यहाँ स्त्री को सिर्फ भोग्या का ही स्थान मिला
फिर चाहे द्रौपदी हो या अहिल्या या आज की दामिनी
हर बार वो ही दांव पर लगी
हर बार उसकी ही अस्मिता से खेला गया
हर बार उसकी ही आत्मा को लहूलुहान किया गया
सन्दर्भ या काल कोई भी रहा हो
मगर हर बार दोहन मेरा ही हुआ
तो फिर कहने को क्या बचा ?
कौन सा कानून ऐसा बना
जिसमे मेरे वजूद को इन्सान के रूप में स्वीकारा गया
आज जब वाकिफ हो गयी हूँ इस सत्य से
तो चाहती हूँ बदलना अपने रूप को
अपने स्वरुप को
करना चाहती हूँ एक ऐसा तप
जिसमे मांग सकूँ खुदा से
सिर्फ अपने लिए एक वर
"अब से जब भी पृथ्वी पर जन्म देना
मुझमे ना वो अंग देना
जो इंसान को हैवान बनाते हैं
जो माँ, बहन, बेटी तक का फर्क भुलाते हैं
या फिर इतना सबल बनाना
कि आँख न कोई उठ सके
हाथ न कोई बढ़ सके
मेरी अस्मिता तक "
हाँ माँगना चाहती हूँ अब खुदा से ही
क्योंकि
इंसानों का देश कहे जाने वाले इस देश में तो
मैं घर में भी सुरक्षित नहीं .............
जहाँ मेरे शव पर राजनीति होती है
जहाँ मेरी अस्मिता जार - जार रोती है
जहाँ रूह मेरी तार - तार होती है
और फिर यही प्रश्न मूंह बाए खड़ा हो जाता है ...........क्या कहूँ अब और किससे ?
बुधवार, 2 जनवरी 2013
निर्णायक स्थिति के लिए
सारे नियमों को ताक पर रखकर
आज निकल पड़ी हूँ मैं
समाज की हर खोखली रीत को तोड़ने
जो न किया होगा कभी किसी ने
अब मैं करूँगी वो
ताकि सोच बदले , समाज बदले और ये देश बदले
क्योंकि
कुछ करने के लिए पहले आहूति तो खुद की ही दी जाती है
और मैं तैयार हूँ इस हवि में आहूत होने के लिए
और अपने आने वाले कल के नव निर्माण के लिए
तोडना होगा मुझे ही अपनी बेड़ियों को
अपनी कुंठित सोच को बदलना होगा
और करना होगा आह्वान ससम्मान जीने के लिए
और उसके लिए एक बारगी तो क्रांति करनी ही होगी
और इस बार मैं हूँ तैयार
अपनी एक नयी सोच के साथ
सोच लिया है मैंने
करवाऊंगी जरूर लिंग परीक्षण
और यदि लड़की हुयी तो दूँगी जरूर जन्म
मगर
लड़का हुआ तो कराऊँगी गर्भपात
जानते हो क्यों ?
क्योंकि
नहीं चाहती ऐसी पीढ़ी को जन्म देना
जिसकी निगाह में स्त्री की तस्वीर सिर्फ भोग्या की ही हो
जब तक ना मैं ऐसा कदम उठाऊंगी
तब तक ना तस्वीर बदलेगी
जब खुद के अस्तित्व पर आन पड़ेगी
तभी पुरुष की सोच बदलेगी
जानती हूँ ...........इसमें भी
बहुत प्रश्न उठ जायेंगे
कहीं तो समाज के संतुलन के
तो कहीं वक्त से लड़ने के
तो कहीं अतिवादी होने के
मगर आज जान गयी हूँ मैं
कहीं न कहीं मैं भी गलत हूँ
गलती मेरी ही है जो न रोपित कर पायी ऐसे संस्कार
जो स्त्री को दे सकते सम्मान
इसलिए इस बार
बदलने को सोच की तस्वीर
देनी होगी मुझे अपनी ही आहूति
शायद तब तस्वीर बदलने लगे
और औरत अबला न कहलाये
अपनी शक्ति से सबको परिचित करवाए
और कह सके बाइज्जत
हाँ ............गर सृजन का है मुझे अधिकार
तो होगा मेरा ही मनचाहा संसार
जिसमे ना कोई लिंग भेद हो
अब तो तभी तस्वीर बदलेगी
गर हर स्त्री ये प्रण लेगी
जो पीढ़ियों से रोपित है
वो पौध अब बदलेगी
क्योंकि
जनने के अधिकार से आप्लावित मैं
जान गयी हूँ अपनी शक्ति को
जो चाहे तो ब्रह्मा की संरचना बदल सकती है
नारी की छवि को विश्व पटल पर बदल सकती है
बस इसके लिए अब यही आह्वान करती हूँ
हर स्त्री से यही कहती हूँ ...............
जाग , उठ , बन ऐसी माँ
जिसके आगे नतमस्तक हो सारा जहान
पुरुष प्रधान समाज में
पुरुष को ललकारने का साहस कर
दिखा अपनी अदम्य इच्छाशक्ति को
फिर देख कैसे न तस्वीर बदलेगी
फिर चाहे सतयुग हो या कलयुग
कोई भी स्त्री न बलात्कृत होगी ..............
बस एक बार गूंजा दे पांचजन्य की गूँज
जो कौरव (कापुरुष) ह्रदय दहल जाएँ
और तुझे मुक्ति का मार्ग मिल जाए
वैसे भी महाभारत के युद्ध में
नींव तो द्रौपदी के केश और उसकी हँसी ही बने थे ना
तो इस बार गुंजा पांचजन्य और कर उद्घोष
नहीं देगी तब तक जन्म उस कापुरुष को
जब तक न मिलेगा तुझे तेरा स्वरुप
धर्म और अधर्म की सूक्ष्म रेखा के बीच से ही शांति की स्थापना होती है
और किसी भी धर्मयुद्ध में
कुछ हिस्सा आहुति के रूप में अपना भी देना पड़ता है ...........निर्णायक स्थिति के लिए
और इस बार मैं तैयार हूँ ………………
आज निकल पड़ी हूँ मैं
समाज की हर खोखली रीत को तोड़ने
जो न किया होगा कभी किसी ने
अब मैं करूँगी वो
ताकि सोच बदले , समाज बदले और ये देश बदले
क्योंकि
कुछ करने के लिए पहले आहूति तो खुद की ही दी जाती है
और मैं तैयार हूँ इस हवि में आहूत होने के लिए
और अपने आने वाले कल के नव निर्माण के लिए
तोडना होगा मुझे ही अपनी बेड़ियों को
अपनी कुंठित सोच को बदलना होगा
और करना होगा आह्वान ससम्मान जीने के लिए
और उसके लिए एक बारगी तो क्रांति करनी ही होगी
और इस बार मैं हूँ तैयार
अपनी एक नयी सोच के साथ
सोच लिया है मैंने
करवाऊंगी जरूर लिंग परीक्षण
और यदि लड़की हुयी तो दूँगी जरूर जन्म
मगर
लड़का हुआ तो कराऊँगी गर्भपात
जानते हो क्यों ?
क्योंकि
नहीं चाहती ऐसी पीढ़ी को जन्म देना
जिसकी निगाह में स्त्री की तस्वीर सिर्फ भोग्या की ही हो
जब तक ना मैं ऐसा कदम उठाऊंगी
तब तक ना तस्वीर बदलेगी
जब खुद के अस्तित्व पर आन पड़ेगी
तभी पुरुष की सोच बदलेगी
जानती हूँ ...........इसमें भी
बहुत प्रश्न उठ जायेंगे
कहीं तो समाज के संतुलन के
तो कहीं वक्त से लड़ने के
तो कहीं अतिवादी होने के
मगर आज जान गयी हूँ मैं
कहीं न कहीं मैं भी गलत हूँ
गलती मेरी ही है जो न रोपित कर पायी ऐसे संस्कार
जो स्त्री को दे सकते सम्मान
इसलिए इस बार
बदलने को सोच की तस्वीर
देनी होगी मुझे अपनी ही आहूति
शायद तब तस्वीर बदलने लगे
और औरत अबला न कहलाये
अपनी शक्ति से सबको परिचित करवाए
और कह सके बाइज्जत
हाँ ............गर सृजन का है मुझे अधिकार
तो होगा मेरा ही मनचाहा संसार
जिसमे ना कोई लिंग भेद हो
अब तो तभी तस्वीर बदलेगी
गर हर स्त्री ये प्रण लेगी
जो पीढ़ियों से रोपित है
वो पौध अब बदलेगी
क्योंकि
जनने के अधिकार से आप्लावित मैं
जान गयी हूँ अपनी शक्ति को
जो चाहे तो ब्रह्मा की संरचना बदल सकती है
नारी की छवि को विश्व पटल पर बदल सकती है
बस इसके लिए अब यही आह्वान करती हूँ
हर स्त्री से यही कहती हूँ ...............
जाग , उठ , बन ऐसी माँ
जिसके आगे नतमस्तक हो सारा जहान
पुरुष प्रधान समाज में
पुरुष को ललकारने का साहस कर
दिखा अपनी अदम्य इच्छाशक्ति को
फिर देख कैसे न तस्वीर बदलेगी
फिर चाहे सतयुग हो या कलयुग
कोई भी स्त्री न बलात्कृत होगी ..............
बस एक बार गूंजा दे पांचजन्य की गूँज
जो कौरव (कापुरुष) ह्रदय दहल जाएँ
और तुझे मुक्ति का मार्ग मिल जाए
वैसे भी महाभारत के युद्ध में
नींव तो द्रौपदी के केश और उसकी हँसी ही बने थे ना
तो इस बार गुंजा पांचजन्य और कर उद्घोष
नहीं देगी तब तक जन्म उस कापुरुष को
जब तक न मिलेगा तुझे तेरा स्वरुप
धर्म और अधर्म की सूक्ष्म रेखा के बीच से ही शांति की स्थापना होती है
और किसी भी धर्मयुद्ध में
कुछ हिस्सा आहुति के रूप में अपना भी देना पड़ता है ...........निर्णायक स्थिति के लिए
और इस बार मैं तैयार हूँ ………………
रविवार, 30 दिसंबर 2012
क्या संभव है सुदृढ़ इलाज ??????????
मेरी आत्मा
लाइलाज बीमारी से जकडी
विवश खडी है इंसानियत के मुहाने पर
मुझे भी कुछ पल सुकून के जीने दो
लगा गुहार रही है इस नपुंसक सिस्टम से
मेरी सडी गली कोशिकाओं को काट फ़ेंको
ये बढता मवाद कहीं सारे शरी्र को ही
ना नेस्तनाबूद कर दे
उससे पहले
उस कैंसरग्रस्त अंग को काट फ़ेंकना ही समझदारी होगी
क्या आत्मा मुक्त हो सकेगी बीमारी से
इस प्रश्न के चक्रव्यूह मे घिरी
निरीह आँखों से देख रही है
लोकतंत्र की ओर
जनतंत्र की ओर
मानसतंत्र की ओर
क्या संभव है सुदृढ़ इलाज ??????????
बुधवार, 26 दिसंबर 2012
क्योंकि ………सब ठीक है
चलो क्रिसमस मनायें
नया साल मनायें
क्योंकि ………सब ठीक है
क्या हुआ जो किसी की दुनिया मिट गयी ………मगर मैं बच गया
क्या हुआ जो किसी का बलात्कार हुआ …………मगर मैं बच गया
क्या हुआ जो आन्दोलन बेअसर हुआ……………मेरा घर तो बच गया
क्या हुआ जो मै उनके साथ ना लडा ……………क्योंकि ये मेरी लडाई नहीं
क्या हुआ जो समाज बिगड गया ………………मगर मेरा तो कुछ ना बिगडा
क्या हुआ जो समयानुकूल ना कोई कदम उठा …………मैं तो घर पहुँच गया
क्या हुआ जो दोषारोपण हुआ …………मुझ पर तो ना इल्ज़ाम लगा
क्या हुआ जो व्यवस्था दूषित हुयी …………मगर मेरी इज़्ज़त तो बच गयी
जब तक मेरी ऐसी सोच रहेगी
मैं कहता रहूँगा …………सब ठीक है
और मनाता रहूँग़ा क्रिसमस नया साल उसी उल्लास के साथ
क्योंकि …………ऐसा कुछ ना मेरे साथ घटित हुआ
जब तक ये सोच ना बदलेगी
जब तक दूजे का दर्द ना अपना लगेगा
तब तक हर खास-ओ-आम यही कहेगा
सब ठीक है …………सब ठीक है
सोमवार, 24 दिसंबर 2012
और कैसे होगा लोकतंत्र का बलात्कार ?
अब देखिये इस चित्र को और बताइये ये किस बर्बरता से कम है……कल को कहीं फिर से जलियाँवाला बाग कांड भी हो जाये तो कोई हैरानगी नहीं होगी
इसे क्या कहेंगे आप ?
पुलिस की बर्बरता या सरकार का फ़रमान या अनदेखी या लोकतंत्र का बलात्कार राजशाही द्वारा …………जहाँ न्याय की माँग करने पर पैरों से रौंदा जाता है ………धिक्कार है !!!!!!!!
बर्बरता शब्द भी आज रो उठा
देखा जो हाल इंडिया गेट पर
कैसा देश कैसा लोकतंत्र
ये तो बन गया कठपुतली तंत्र
सुना है कृष्ण ने उद्धार हेतु
किया था भौमासुर का संहार
और किया था मुक्त सोलह हजार को
वो भी तो दानव था ऐसा
जो बलात कन्या अपहृत करता था
उनको कृष्ण ने न्याय दिया
राजा का धर्म निभा दिया
आज कैसे राजा राज करते हैं
जो बलात्कारियों को ही संरक्षण देते हैं
और विरोध करने वालों पर ही
अत्याचार करते हैं
सुना है जब अधर्म की अति होती है
तभी कोई नयी क्रांति होती है
इस बार जो बीज बोये हैं
फ़सल उगने तक इन्हें सींचना होगा
हौसलों को ना पस्त होने देना होगा
मेरे देश के बच्चों …कल तुम्हारा है
बस ये याद रखना होगा
जो कदम आगे बढे
उन्हें ना पीछे हटने देना होगा
फिर देखें कैसे ना तस्वीर बदलेगी
कैसे ना पर्वत से गंगा निकलेगी
बेशक आज अन्याय की छाती चौडी है
मगर न्याय की डगर से भी ना दूरी है
बस इस बार ना कदम पीछे करना
और इस देश के नपुंसक तंत्र को उखाड देना
बस न्याय मिल जायेगा
हर दामिनी का चेहरा गर्व से दमक जायेगा
शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012
क्योंकि तख्ता पलट यूँ ही नहीं हुआ करते ...........
अब सिर्फ
लिखने के लिए
नहीं लिखना चाहती
थक चुकी हूँ
वो ही शब्दों के उलटफेर से
भावनाओं के टकराव से
मनोभावों का क्या है
रोज बदलते हैं
और एक नयी
परिभाषा गठित करते हैं
मगर लगता है
सब निरर्थक
रसहीन
उद्देश्यहीन सा
कोई कीड़ा रेंग रहा है
अंतस में चिकोटी भर रहा है
जो चाह रहा है
अपनी परिधि से बाहर आना
निकलना चाहता है
नाली के व्यास से बाहर
बनाना चाहता है
एक अलग मकां अपना
जिसमे
सिर्फ शब्दों के अलंकार ना हों
जिसमे सिर्फ
एकरसता ना हो
जिसमे हो एक नया उद्घोष
जिसमे हो एक नया सूर्योदय
अपने प्रभामंडल के साथ
अपनी आभा बिखेरता
और अपने लिए खुद
अपनी धरती चुनता हुआ
जिस पर रख सकूँ मैं अपने पैर
नहीं हो जिसकी जमीन पर कोई फिसलन
हो तो बस एक
आकाश से भी विस्तृत
मेरा अपना आकाश
जिसके हर सफे पर लिखी इबारत मील का पत्थर बन जाये
और मेरी धरा का रंग गुलाबी हो जाये
कोई तो कारण होगा
खामोश मर्तबान में मची इस उथल पुथल का
जरूरी तो नहीं अचार खट्टा ही बने
शायद
अब वक्त आ गया है देग बदलने का ................
यूँ तो धमनियों में लहू बहता ही रहेगा
और जीवन भी चलता रहेगा
मगर
अन्दर बैठी सत्ता ने बगावत कर दी है
क्योंकि तख्ता पलट यूँ ही नहीं हुआ करते ...........
नहीं लिखना चाहती
थक चुकी हूँ
वो ही शब्दों के उलटफेर से
भावनाओं के टकराव से
मनोभावों का क्या है
रोज बदलते हैं
और एक नयी
परिभाषा गठित करते हैं
मगर लगता है
सब निरर्थक
रसहीन
उद्देश्यहीन सा
कोई कीड़ा रेंग रहा है
अंतस में चिकोटी भर रहा है
जो चाह रहा है
अपनी परिधि से बाहर आना
निकलना चाहता है
नाली के व्यास से बाहर
बनाना चाहता है
एक अलग मकां अपना
जिसमे
सिर्फ शब्दों के अलंकार ना हों
जिसमे सिर्फ
एकरसता ना हो
जिसमे हो एक नया उद्घोष
जिसमे हो एक नया सूर्योदय
अपने प्रभामंडल के साथ
अपनी आभा बिखेरता
और अपने लिए खुद
अपनी धरती चुनता हुआ
जिस पर रख सकूँ मैं अपने पैर
नहीं हो जिसकी जमीन पर कोई फिसलन
हो तो बस एक
आकाश से भी विस्तृत
मेरा अपना आकाश
जिसके हर सफे पर लिखी इबारत मील का पत्थर बन जाये
और मेरी धरा का रंग गुलाबी हो जाये
कोई तो कारण होगा
खामोश मर्तबान में मची इस उथल पुथल का
जरूरी तो नहीं अचार खट्टा ही बने
शायद
अब वक्त आ गया है देग बदलने का ................
यूँ तो धमनियों में लहू बहता ही रहेगा
और जीवन भी चलता रहेगा
मगर
अन्दर बैठी सत्ता ने बगावत कर दी है
क्योंकि तख्ता पलट यूँ ही नहीं हुआ करते ...........
सोमवार, 17 दिसंबर 2012
पपडाए अधरों की बोझिल प्यास
सुनो
कहाँ हो ............?
मेरी सोच के जंगलों में
देखो तो सही
कितने खरपतवार उग आये हैं
कभी तुमने ही तो
इश्क के घंटे बजाये थे
पहाड़ों के दालानों में
सुनो ज़रा
गूंजती है आज भी टंकार
प्रतिध्वनित होकर
श्वांस की साँय -साँय करती ध्वनि
सौ मील प्रतिघंटा की रफ़्तार से
चलने वाली वेगवती हवाओं को भी
प्रतिस्पर्धा दे रही है ..........
दिशाओं ने भी छोड़ दिया है
चतुष्कोण या अष्ट कोण बनाना
मन की दसों दिशाओं से उठती
हुआं - हुआं की आवाजें
सियारों की चीखों को भी
शर्मसार कर रही हैं ........
क्या अब तक नहीं पहुंची
मेरी रूह के टूटते तारे की आवाज़ .........तुम तक ?
उफ़ ............सिर्फ एक बार आवाज़ दो
सांस थमने से पहले
जान निकलने से पहले
धडकनों के रुकने से पहले
(पपडाए अधरों की बोझिल प्यास फ़ना होने से पहले )
ये इश्क के चबूतरों पर बाजरे के दाने हमेशा बिखरते क्यों हैं ............प्रेमियों के चुगने से पहले .........जानां !!
कहाँ हो ............?
मेरी सोच के जंगलों में
देखो तो सही
कितने खरपतवार उग आये हैं
कभी तुमने ही तो
इश्क के घंटे बजाये थे
पहाड़ों के दालानों में
सुनो ज़रा
गूंजती है आज भी टंकार
प्रतिध्वनित होकर
श्वांस की साँय -साँय करती ध्वनि
सौ मील प्रतिघंटा की रफ़्तार से
चलने वाली वेगवती हवाओं को भी
प्रतिस्पर्धा दे रही है ..........
दिशाओं ने भी छोड़ दिया है
चतुष्कोण या अष्ट कोण बनाना
मन की दसों दिशाओं से उठती
हुआं - हुआं की आवाजें
सियारों की चीखों को भी
शर्मसार कर रही हैं ........
क्या अब तक नहीं पहुंची
मेरी रूह के टूटते तारे की आवाज़ .........तुम तक ?
उफ़ ............सिर्फ एक बार आवाज़ दो
सांस थमने से पहले
जान निकलने से पहले
धडकनों के रुकने से पहले
(पपडाए अधरों की बोझिल प्यास फ़ना होने से पहले )
ये इश्क के चबूतरों पर बाजरे के दाने हमेशा बिखरते क्यों हैं ............प्रेमियों के चुगने से पहले .........जानां !!
गुरुवार, 13 दिसंबर 2012
ओ राँझेया ............देख वे तेरी हीर दीवानी होयी !!!
भीगते मौसम की कराहटें
जैसे जिस्म की खाल में
कोई रेशमी बूंटे टाँग रहा हो
तेज़ाब में सुईयाँ डुबा डुबाकर …
देख ना कितनी खूबसूरत
कशीदाकारी हुई है
रोम- रोम पर पड़े फफोलों पर
तेरा नाम ही उभर कर आया है
अब कौन चीरे उन फोड़ों को
जिन पर महबूब का नाम उभरा हो
जीने का मज़ा तो अब आएगा
जब टीस में भी तेरा अक्स नज़र आएगा
मैंने मांग ली है दुआ रब से
ओ खुदा अब ना करना मुझे मेरे यार से जुदा
मोहब्बत में मिलन कैसे भी हुआ करे
बस यार का दीदार हुआ करे
देख ना मेरी मोहब्बत की इन्तेहाँ
सोचती हूँ ..............उन फफोलों पर
तेरे साथ अपना भी नाम अंकित कर दूं
एक बार फिर तेज़ाब में सुइयां डुबाकर
क्या हुआ जो एक बार फिर से
दर्द की बारादरियों से गुजरना पड़ेगा
तेरे नाम के साथ मेरा नाम तो जुड़ जाएगा
और दुनिया कहेगी
तेरे नाम पे शुरू तेरे नाम पे ख़त्म जिसकी कहानी हुयी
ओ राँझेया ............देख वे तेरी हीर दीवानी होयी !!!
जैसे जिस्म की खाल में
कोई रेशमी बूंटे टाँग रहा हो
तेज़ाब में सुईयाँ डुबा डुबाकर …
देख ना कितनी खूबसूरत
कशीदाकारी हुई है
रोम- रोम पर पड़े फफोलों पर
तेरा नाम ही उभर कर आया है
अब कौन चीरे उन फोड़ों को
जिन पर महबूब का नाम उभरा हो
जीने का मज़ा तो अब आएगा
जब टीस में भी तेरा अक्स नज़र आएगा
मैंने मांग ली है दुआ रब से
ओ खुदा अब ना करना मुझे मेरे यार से जुदा
मोहब्बत में मिलन कैसे भी हुआ करे
बस यार का दीदार हुआ करे
देख ना मेरी मोहब्बत की इन्तेहाँ
सोचती हूँ ..............उन फफोलों पर
तेरे साथ अपना भी नाम अंकित कर दूं
एक बार फिर तेज़ाब में सुइयां डुबाकर
क्या हुआ जो एक बार फिर से
दर्द की बारादरियों से गुजरना पड़ेगा
तेरे नाम के साथ मेरा नाम तो जुड़ जाएगा
और दुनिया कहेगी
तेरे नाम पे शुरू तेरे नाम पे ख़त्म जिसकी कहानी हुयी
ओ राँझेया ............देख वे तेरी हीर दीवानी होयी !!!
सोमवार, 10 दिसंबर 2012
जब इश्क ही मेरा मज़हब बना ………
आह! आज ना जाने क्या हुआ
धडकनों ने आज इक राग गाया है
बस इश्क इश्क इश्क ही फ़रमाया है
जो जुनून बन मेरे दिलो दिमाग पर छाया है
ये कोई असबाब या साया नहीं
बस इश्क का खुमार चढ आया है
इश्क को ही मैने अपना
मज़हब चुना है
तभी तो देखो
बंजारन बन कैसे अलख जगाती हूँ
और इश्क इश्क इश्क ही चिल्लाती हूँ
इश्क अन्दर जब उतरता है
सीसे सा पिघलता है
ना दर्द होता है
ना कोई अहसास होता है
बस मीठा मीठा सा सुरूर होता है
जिसमें तू और मैं हों जरूरी नहीं
क्योंकि
आज इश्क को खुदा बना लिया मैने
देख खुद को सूली पर चढा लिया मैने
जो दर्द उठा हुस्न के सीने में
अश्क इश्क की आँख से बह गये
मुकम्मल मोहब्बत में सराबोर
दो जिस्म इक जान हो गये………
अब बता और क्या तज़वीज़ करूँ
इश्क की और कौन सी माला जपूँ
जहाँ कुछ बचा ही नहीं
सिर्फ़ इश्क ने इश्क को आवाज़ दी
इश्क ही इश्क की दुल्हन बना
इश्क ने ही इश्क का घूँघट पल्टा
और इश्क ही इश्क में डूब गया
अब कौन कहाँ बचा
जिसका कोई सज़दा करे
ओ यारा मेरे……तभी तो
इश्क ही मेरी दीद बना
इश्क ही मेरी प्रीत बना
इश्क का ही मैने घूँट भरा
इश्क ही मेरा खुदा बना
अब और कौन सा नया मज़हब ढूँढूं
जब इश्क ही मेरा मज़हब बना
जब इश्क ही मेरा मज़हब बना ………
धडकनों ने आज इक राग गाया है
बस इश्क इश्क इश्क ही फ़रमाया है
जो जुनून बन मेरे दिलो दिमाग पर छाया है
ये कोई असबाब या साया नहीं
बस इश्क का खुमार चढ आया है
इश्क को ही मैने अपना
मज़हब चुना है
तभी तो देखो
बंजारन बन कैसे अलख जगाती हूँ
और इश्क इश्क इश्क ही चिल्लाती हूँ
इश्क अन्दर जब उतरता है
सीसे सा पिघलता है
ना दर्द होता है
ना कोई अहसास होता है
बस मीठा मीठा सा सुरूर होता है
जिसमें तू और मैं हों जरूरी नहीं
क्योंकि
आज इश्क को खुदा बना लिया मैने
देख खुद को सूली पर चढा लिया मैने
जो दर्द उठा हुस्न के सीने में
अश्क इश्क की आँख से बह गये
मुकम्मल मोहब्बत में सराबोर
दो जिस्म इक जान हो गये………
अब बता और क्या तज़वीज़ करूँ
इश्क की और कौन सी माला जपूँ
जहाँ कुछ बचा ही नहीं
सिर्फ़ इश्क ने इश्क को आवाज़ दी
इश्क ही इश्क की दुल्हन बना
इश्क ने ही इश्क का घूँघट पल्टा
और इश्क ही इश्क में डूब गया
अब कौन कहाँ बचा
जिसका कोई सज़दा करे
ओ यारा मेरे……तभी तो
इश्क ही मेरी दीद बना
इश्क ही मेरी प्रीत बना
इश्क का ही मैने घूँट भरा
इश्क ही मेरा खुदा बना
अब और कौन सा नया मज़हब ढूँढूं
जब इश्क ही मेरा मज़हब बना
जब इश्क ही मेरा मज़हब बना ………
शनिवार, 8 दिसंबर 2012
जानते हो ! प्रेम में कुछ शेष नहीं रहता …………
तुमने स्वीकारा अपना प्रेम
और छोड दिया एक प्रश्न
मेरी तरफ़ …मेरी स्वीकार्यता
मेरे जवाब का इंतज़ार
तुम्हारे लिये शेष रहा …………मगर
शेष रहा …………क्या?
प्रेम ? उसकी स्वीकार्यता
क्या तभी तक है प्रेम का अस्तित्व
जब तक ना हो जाये स्वीकार्य
सुनो …मैने तो सुना है
स्पन्दनों के तारों पर स्वंय प्रवाहित होता है प्रेम
बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये ………
जानते हो ! प्रेम में कुछ शेष नहीं रहता …………
ना तू्……… ना मैं
बस प्रेम मे तो बस प्रेम ही बचता है मिश्री की डली के स्वाद सा
जिसका कोई आकार नहीं , प्रकार नहीं मगर भासित होता है ………बस यही है मेरे लिये प्रेम
क्या अब भी जरूरत है तुम्हें
स्वीकार्यता के भाव की
क्या अब भी जरूरत है तुम्हें
शेष कहने की…………
क्योंकि
मैने तो सुना है
जहाँ शेष रहता है वहाँ प्रेम पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है
और मैं जानती हूँ
तुम्हें प्रश्नचिन्ह पसन्द नहीं …………(एक आयाम ये भी होता है प्रेम में )
और छोड दिया एक प्रश्न
मेरी तरफ़ …मेरी स्वीकार्यता
मेरे जवाब का इंतज़ार
तुम्हारे लिये शेष रहा …………मगर
शेष रहा …………क्या?
प्रेम ? उसकी स्वीकार्यता
क्या तभी तक है प्रेम का अस्तित्व
जब तक ना हो जाये स्वीकार्य
सुनो …मैने तो सुना है
स्पन्दनों के तारों पर स्वंय प्रवाहित होता है प्रेम
बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये ………
जानते हो ! प्रेम में कुछ शेष नहीं रहता …………
ना तू्……… ना मैं
बस प्रेम मे तो बस प्रेम ही बचता है मिश्री की डली के स्वाद सा
जिसका कोई आकार नहीं , प्रकार नहीं मगर भासित होता है ………बस यही है मेरे लिये प्रेम
क्या अब भी जरूरत है तुम्हें
स्वीकार्यता के भाव की
क्या अब भी जरूरत है तुम्हें
शेष कहने की…………
क्योंकि
मैने तो सुना है
जहाँ शेष रहता है वहाँ प्रेम पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है
और मैं जानती हूँ
तुम्हें प्रश्नचिन्ह पसन्द नहीं …………(एक आयाम ये भी होता है प्रेम में )
मंगलवार, 4 दिसंबर 2012
जरूरी तो नहीं देव उठाने की रस्म हमेशा मैं ही निभाऊँ ………
ना जाने किस नींद में सोयी थी
युग बीत चुके ……टूटी ही नहीं
ये कल्पनाओं के तकियों पर
ख्वाहिशों के बिस्तर पर
बेहोशी की नींद आना तो लाज़िमी था
मगर उस दिन हकीकत ने जो
ख्वाबों को आँखों से खीचा
सिर से पल्लू को हटाया
धडधडाती हुयी धरती पर गिर पडी
जब तुमने कहा …………
नहीं है ये तुम्हारा घर, बच्चे और संसार
नहीं है तुम्हारा कोई अधिकार
सिर्फ़ गृहिणी हो
ना स्वच्छंद बनो
बस नून, तेल और रोटी का ही
हिसाब रखा करो
यही तुम्हारी नियति है
जीती रहो जैसे सब जीया करती हैं
क्या तुम्हारे लिये ही बंधन है
क्या तुम्हारे लिये ही जीवन दुष्कर है
क्या करोगी बाहर निकलकर
क्या करोगी इतिहास रचकर
कौन जानेगा तुम्हें
कौन पहचानेगा तुम्हें
ये सिर्फ़ सब्ज़बाग हैं
मन को बहलाने के ख्यालात हैं
वापसी यहीं करनी होगी
क्योंकि
किस्मत में तुम्हारी तो फिर भी
सिर्फ़ चूल्हा , चौका और बर्तन हैं
नहीं जानती थी
समर्पण सिर्फ़ किताबी लफ़्ज़ हुआ करता है
प्रेम सिर्फ़ किताबों में ही मिला करता है
और गृहिणी का जीवन तो सिर्फ़
चूल्हे की राख सा हुआ करता है
कितनी उडान भर ले
कितना खुद को सिद्ध कर ले
मगर कुछ नज़रों में
उनकी उपलब्धियों का
ना कोई मोल होता है
उनके लिये तो जीवन
एक आखेट होता है
जहाँ वो ही शिकार होती हैं
तब बहुत विश्लेषण किया
बहुत सोचा तो पाया
यूँ ही थोडे बेसूझ साया हमारे जीवन में लहराया था
हाँ ………देव उठनी एकादशी
मै तो इसी ख्वाब संग जीती रही
मेरे देवता तो कभी सोयेंगे ही नहीं
क्योंकि
इसी दिन तो तुमने मुझे ब्याहा था
पता नहीं
मैं नींद में थी या तुम्हारे मोहपाश में बँधी मैं
देख नही पायी
तुम तो हमेशा अधसोये ही रहे
अपनी चाहतों के लिये जागते
मेरी ख्वाहिशों के लिये सोते
अर्धनिद्रित अवस्था को धारण किये
हमेशा एक मुखौटा लगाये रहे
और मैं
अपनी अल्हड ख्वाहिशों में
तुम्हारी बेरुखी का पैबन्द लगा
जीने का उपक्रम करती
भूल गयी थी एक सच
"सोये देवता भी एक दिन उठा करते हैं …………"
सुनो
सोचती हूँ
इस बार मैं सो जाती हूँ ………गहरी नींद में
अपनी चाहतों को परवाज़ देने के लिये
और जब उठूँ तो
क्या मिलोगे तुम मुझे इसी मोड पर ठहरे हुये
अपना हाथ मेरी ओर बढाते हुये
और शायद उस वक्त
मेरा मूड ना हो हाथ पकडने का
जागने का …………गहन निद्रा से
क्या तब भी देवता उठाने की रस्म परांत के नीचे
प्रेम का दीया जलाकर
प्रेम राग गाकर
मुझे पुकार कर
कर सकोगे …………सोचना ज़रा इस बार तुम भी
क्योंकि
मैने देवता उठाने की रस्म बंद कर दी है
और
जरूरी तो नहीं देव उठाने की रस्म हमेशा मैं ही निभाऊँ ………
युग बीत चुके ……टूटी ही नहीं
ये कल्पनाओं के तकियों पर
ख्वाहिशों के बिस्तर पर
बेहोशी की नींद आना तो लाज़िमी था
मगर उस दिन हकीकत ने जो
ख्वाबों को आँखों से खीचा
सिर से पल्लू को हटाया
धडधडाती हुयी धरती पर गिर पडी
जब तुमने कहा …………
नहीं है ये तुम्हारा घर, बच्चे और संसार
नहीं है तुम्हारा कोई अधिकार
सिर्फ़ गृहिणी हो
ना स्वच्छंद बनो
बस नून, तेल और रोटी का ही
हिसाब रखा करो
यही तुम्हारी नियति है
जीती रहो जैसे सब जीया करती हैं
क्या तुम्हारे लिये ही बंधन है
क्या तुम्हारे लिये ही जीवन दुष्कर है
क्या करोगी बाहर निकलकर
क्या करोगी इतिहास रचकर
कौन जानेगा तुम्हें
कौन पहचानेगा तुम्हें
ये सिर्फ़ सब्ज़बाग हैं
मन को बहलाने के ख्यालात हैं
वापसी यहीं करनी होगी
क्योंकि
किस्मत में तुम्हारी तो फिर भी
सिर्फ़ चूल्हा , चौका और बर्तन हैं
नहीं जानती थी
समर्पण सिर्फ़ किताबी लफ़्ज़ हुआ करता है
प्रेम सिर्फ़ किताबों में ही मिला करता है
और गृहिणी का जीवन तो सिर्फ़
चूल्हे की राख सा हुआ करता है
कितनी उडान भर ले
कितना खुद को सिद्ध कर ले
मगर कुछ नज़रों में
उनकी उपलब्धियों का
ना कोई मोल होता है
उनके लिये तो जीवन
एक आखेट होता है
जहाँ वो ही शिकार होती हैं
तब बहुत विश्लेषण किया
बहुत सोचा तो पाया
यूँ ही थोडे बेसूझ साया हमारे जीवन में लहराया था
हाँ ………देव उठनी एकादशी
मै तो इसी ख्वाब संग जीती रही
मेरे देवता तो कभी सोयेंगे ही नहीं
क्योंकि
इसी दिन तो तुमने मुझे ब्याहा था
पता नहीं
मैं नींद में थी या तुम्हारे मोहपाश में बँधी मैं
देख नही पायी
तुम तो हमेशा अधसोये ही रहे
अपनी चाहतों के लिये जागते
मेरी ख्वाहिशों के लिये सोते
अर्धनिद्रित अवस्था को धारण किये
हमेशा एक मुखौटा लगाये रहे
और मैं
अपनी अल्हड ख्वाहिशों में
तुम्हारी बेरुखी का पैबन्द लगा
जीने का उपक्रम करती
भूल गयी थी एक सच
"सोये देवता भी एक दिन उठा करते हैं …………"
सुनो
सोचती हूँ
इस बार मैं सो जाती हूँ ………गहरी नींद में
अपनी चाहतों को परवाज़ देने के लिये
और जब उठूँ तो
क्या मिलोगे तुम मुझे इसी मोड पर ठहरे हुये
अपना हाथ मेरी ओर बढाते हुये
और शायद उस वक्त
मेरा मूड ना हो हाथ पकडने का
जागने का …………गहन निद्रा से
क्या तब भी देवता उठाने की रस्म परांत के नीचे
प्रेम का दीया जलाकर
प्रेम राग गाकर
मुझे पुकार कर
कर सकोगे …………सोचना ज़रा इस बार तुम भी
क्योंकि
मैने देवता उठाने की रस्म बंद कर दी है
और
जरूरी तो नहीं देव उठाने की रस्म हमेशा मैं ही निभाऊँ ………
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