अनुमति जरूरी है

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

छीजती ज़िन्दगी और मेरा संग्राम

मौन हो जाती है मेरी कलम
मौन हो जाती हैं मेरी संवेदनायें
मौन हो जाती है मेरी सोच
मौन हो जाती हैं मेरी भावनायें
अब तुम तक आते - आते
जानते हो क्यों
तुमने कोई सिरा छोडा ही नहीं
जुडने का या कहो जोडने का
सुनो
अब ना प्रेम उपजता
ना भावनायें हिलोरें लेतीं
ना कोई स्पन्दन होता
क्योंकि
हम आदत भी तो नहीं बन सके
एक दूसरे की
हम चाहत भी तो नहीं बन सके
एक दूसरे की
हम राहत भी तो नहीं बन सके
एक दूसरे की
कहो फिर क्या बचा
जो बाँधे रखे उन धागों को
जहाँ सिवाय गांठों के कुछ बचा ही ना हो
ना …………अब नही दूँगी तुम्हें उलाहना कोई
क्योंकि
कोई ख्वाहिश ही नही बची तुमसे
बोलूँ , बतियाऊँ , हँसूँ या रोऊँ
ऐसा भी कोई स्रोता नहीं फ़ूट रहा
देखा ………द्रव्यमान
कितनी निरीहता छा गयी है
कितनी विवशता आ गयी है
जहाँ संज्ञाशून्य सी हो गयी हूँ
और सोच रही हूँ
अभी तो पहला ही पडाव गुजरा है
सफ़र का ……………
आगे क्या होगा
क्या ये बंधन
ये संबंध
ये रिश्ता
ये समझ
इसे कोई मुकाम भी मिलेगा
या यूँ ही हाथियों के पैर तले कुचल जायेगा……चींटी बनकर

सच कहूँ
उम्र के इस पडाव का
सबको इंतज़ार होता है
मुझे भी था ………मगर
वक्त ने नमी छोडी ही नहीं
अब कैसे मन की शाखायें
फिर से हरी भरी हो जायें
कैसे इन पर कोई
कँवल खिल जाये
नहीं , नही………दोषारोपण नहीं कर रही
बस वक्त की कामयाब कोशिशों को देख रही हूँ
और सोच रही हूँ
क्यों जीत गया वक्त हमसे
हमारे संबंध से
क्या कमी रह गयी थी
जिसका फ़ायदा वक्त उठा गया
और हमें बिखरा गया

शायद
कहीं ना कहीं
ना चाहते हुये भी
हमारे दम्भ , हमारा अहम
ही वक्त के हाथों का खिलौना बन गया
और वो अपना काम कर गया

देखो अब ………क्या बचा ?
ना तुम मुझमें
ना मैं तुममें
दो खोखले अस्थिपंजर
देह का लिबास ओढे
दुनियावी रस्म निभाने के लिये
कटिबद्ध हैं ………ज़िन्दगी रहने तक
आखिर जिम्मेदारियों से तो
नहीं मूँह मोडा जा सकता ना
चाहे रिश्ता कचरे के डिब्बे में पडा
सडांध मारता अपनी आखिरी साँस ही क्यों ना ले रहा हो
जीना है अब हमें इसी तरह
क्योंकि
माफ़ी माँगने या देने की सीमा से पार आ चुके हैं हम
क्योंकि
अब हमारे बीच आ चुकी है अभद्रता , असंयमता
ना केवल आचरण में बल्कि शब्दों में भी
फिर कैसे संभव है
नव निर्माण , नवांकुर , नव सृजन
बिना नमी के ……………

मौन की कचोट , मौन का वार और मौन का संग्राम

शब्दहीन , भावहीन , रसहीन कर गया मुझको …………और
जीवन की तल्खियों ने स्वादहीन बना दिया मुझको
क्या है कोई टंकारता घंटा उस ओर जो खोल सके
मेरे मन मन्दिर के कपाटों को दुर्लभ देव दर्शन हेतु???

छीजती ज़िन्दगी और मेरा संग्राम अब हार जीत से परे हो चुका है

क्योंकि
कोई जीते या हारे ………हार निश्चित ही दोनो तरफ़ से मेरी ही है ………सनम !!!

22 टिप्‍पणियां:

Ravi Beck ने कहा…

लकीरों में क्या रखा है
आज शब्दों का अनोखा मेल देखा है
ऐसा किसी के साथ ना हो यही मेरी दुआ है

Pratibha Verma ने कहा…

it's just amazing poem ...अगर मैं तारीफ में और कुछ कहने की भी सोंचू तो शायद शब्द नहीं हैं ...बधाई!!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जीवन की धुरी प्रेम है ओर जब वो नहीं तो सब कुछ बेमाना ही होता है ... बाकी कुछ नहीं रहता ...

Akhil ने कहा…

बहुत मार्मिक और सार्थक रचना ...

संध्या शर्मा ने कहा…

सही कहा है आपने... दम्भ , अहम रिश्तों को घुन की तरह खोखला कर देते हैं... मार्मिक प्रस्तुति

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अन्दर अन्दर कौन लड़ रहा,
शब्द थक गये, मौन लड़ रहा।

Rajendra Kumar ने कहा…

दंभ और अहम रिस्तो को खोखला कर देता है,बहुत ही भावपूर्ण प्रस्तुती।

रविकर ने कहा…

बहुत सुन्दर भाव आदरेया ||

जती जात्रा पर चला, छोड़-छाड़ कर मोह |
उलझे या सुलझे सिरा, क्या लेना अब टोह |

क्या लेना अब टोह, हुआ रविकर आरोही |
करे भोग से द्रोह, आज अपना है वो ही |

सुनिए कृष्ण पुकार, गोपियाँ हाथ मींजती |
प्रभु पथ पर यह गोप, जिन्दगी तेज छीजती ||

Ramakant Singh ने कहा…

आज भी बेबसी की कहानी

pran sharma ने कहा…

AAPKEE KAVYA - PRATIBHA KA NIKHAAR
IS KAVITA MEIN HAI . BAHUT KHOOB !

Roshan Jaswal Vikshipt ने कहा…

सुन्‍दर रचना आपको साधुवाद

सरिता भाटिया ने कहा…

वंदना जी स्त्री मन की व्यथा को बखूबी ब्यान किया आपने
गौर कीजिएगा....
गुज़ारिश : ''........तुम बदल गये हो..........''

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि कि चर्चा कल मंगलवार 12/213 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

द्वंद

mahendra verma ने कहा…

ज़िंदगी के मौन और मुखर होने की प्रक्रिया कुछ इसी तरह आगे बढ़ती रहती है।

एक उत्कृष्ट कविता।

कुश्वंश ने कहा…

शब्द कुछ जीते नहीं
शब्द कुछ कहते नहीं
शब्द जमकर बैठते हैं
कोई करवट बदलते नहीं

ववाह वंदना जी , एकदम अद्भुत अभ्व्यक्ति बधाई

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

जीवन की परिस्थितियों को और आपस के सम्बन्धों को विस्तार से ज्यों का त्यों रख दिया है ....

सदा ने कहा…

बेहद सशक्‍त भाव लिये ... उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति

आभार

mridula pradhan ने कहा…

badi sugadhdta ke saath parton ko khola hai.....

Anita (अनिता) ने कहा…

आपके शब्द उस कड़वाहट और बेचैनी का एहसास दिला गये ... जिसमें सराबोर ये रचना है...
~सादर!!!

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

प्रेम ही आधार है जिस पर जिन्दगी पाँव टिका सकती है विस्वास के साथ । वह नही तो कुछ भी नही । पर वह आधार क्या सबको मिल पाता है ।

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

प्रेम बिना सब सून

प्रेम की डोर मजबूत होनी चाहिए

बहुत सुन्दर तरीके से मनोभाव का चित्रण