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शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

क्योंकि तख्ता पलट यूँ ही नहीं हुआ करते ...........

अब सिर्फ
लिखने के लिए
नहीं लिखना चाहती
थक चुकी हूँ
वो ही शब्दों के उलटफेर से
भावनाओं के टकराव से
मनोभावों का क्या है
रोज बदलते हैं
और एक नयी
परिभाषा गठित करते हैं
मगर लगता है
सब निरर्थक
रसहीन
उद्देश्यहीन सा
कोई कीड़ा रेंग रहा है
अंतस में चिकोटी भर रहा है
जो चाह रहा है
अपनी परिधि से बाहर आना
निकलना चाहता है
नाली के व्यास से बाहर
बनाना चाहता है
एक अलग मकां अपना
जिसमे
सिर्फ शब्दों के अलंकार ना हों
जिसमे सिर्फ
एकरसता ना हो
जिसमे हो एक नया उद्घोष
जिसमे हो एक नया सूर्योदय
अपने प्रभामंडल के साथ
अपनी आभा बिखेरता
और अपने लिए खुद
अपनी धरती चुनता हुआ
जिस पर रख सकूँ मैं अपने पैर
नहीं हो जिसकी जमीन पर कोई फिसलन
हो तो बस एक
आकाश से भी विस्तृत
मेरा अपना आकाश
जिसके हर सफे पर लिखी इबारत मील का पत्थर बन जाये
और मेरी धरा का रंग गुलाबी हो जाये

कोई तो कारण होगा
खामोश मर्तबान में मची इस उथल पुथल का
जरूरी तो नहीं अचार खट्टा ही बने
शायद
अब वक्त आ गया है देग बदलने का ................
यूँ तो धमनियों में लहू बहता ही रहेगा
और जीवन भी चलता रहेगा
मगर
अन्दर बैठी सत्ता ने बगावत कर दी है
क्योंकि तख्ता पलट यूँ ही नहीं हुआ करते ...........

18 टिप्‍पणियां:

संदीप पवाँर (Jatdevta) ने कहा…

आपकी इस कवितामयी बातों से लग रहा है तख्ता पलट हो जाना ही चाहिए।

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

बहुत ही सुन्दर कविता |नववर्ष की शुभकामनायें |

अरुन शर्मा "अनंत" ने कहा…

बेहद सुन्दर रचना है मन को भा गई बधाई स्वीकारें

kshama ने कहा…

Bahut sundar...takhta palatne ko to koyi Gandhi hee chahiye!
Naya saal bahut mubarak ho...

India Darpan ने कहा…

बहुत ही शानदार और सराहनीय प्रस्तुति....
बधाई

जयपुर न्यूज
पर भी पधारेँ।

संध्या शर्मा ने कहा…

अन्दर बैठी सत्ता ने बगावत कर दी है
क्योंकि तख्ता पलट यूँ ही नहीं हुआ करते ......
शत-प्रतिशत सही है, बिना वहां बगावत हुए कुछ भी नहीं हो सकता और हुई तो आगे कोई ठहर भी नहीं सकता..

Madan Mohan Saxena ने कहा…

वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक .

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

लहू बहेगा,
धरती कभी तो जनेगी,
एक वीर इस खून से,
जो ये धब्बे धोयेगा।

Saras ने कहा…

वंदनाजी ...बहुत सुन्दर कविता

इमरान अंसारी ने कहा…

बगावत का बिगुल बजना शुभ का सन्देश है।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

सच है कई बार मन होता है, रूटिन को बदलने का. एक नई ताजगी आ जायेगी. बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

pran sharma ने कहा…

Haal mein likhee aapkee kavya abhivyakti nissandeh prashasneey
hai .

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

तख्ता पलटना तो जनता के उपर निर्भर है,, सुन्दर कविता

recent post: वजूद,

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अब तख़्ता पलटना ज़रूरी है

कालीपद प्रसाद ने कहा…

जनता की अंतरात्मा जब बगावत करेगी तब अवश्य तख्ता पलटेगी -बहुत सुन्दर रचना
मेरी नई पोस्ट : "गांधारी के राज में नारी !"

कालीपद प्रसाद ने कहा…

जनता की अंतरात्मा जब बगावत करेगी तब अवश्य तख्ता पलटेगी -बहुत सुन्दर रचना
मेरी नई पोस्ट : "गांधारी के राज में नारी !"

Ramakant Singh ने कहा…

सभी सार्थक परिवर्तन समय की सही दें है .ताजा, संतुलित, व्यावहारिक रचना

रचना दीक्षित ने कहा…

सहमत हूँ वंदन जी तख्तापलट भी होगा. भावनायों का ज्वार उत्पीडन के खिलाफ ऐसे शांत होना भी नहीं चाहिये.