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सोमवार, 17 दिसंबर 2012

पपडाए अधरों की बोझिल प्यास

सुनो
कहाँ हो ............?
मेरी सोच के जंगलों में
देखो तो सही
कितने खरपतवार उग आये हैं

कभी तुमने ही तो

इश्क के घंटे बजाये थे
पहाड़ों के दालानों में
सुनो ज़रा
गूंजती है आज भी टंकार
प्रतिध्वनित होकर

श्वांस  की साँय -साँय करती ध्वनि

सौ मील प्रतिघंटा की रफ़्तार से
चलने वाली वेगवती हवाओं को भी
प्रतिस्पर्धा दे रही है ..........

दिशाओं ने भी छोड़ दिया है

चतुष्कोण या अष्ट कोण बनाना
मन की दसों दिशाओं से उठती
हुआं - हुआं  की आवाजें
सियारों की चीखों को भी
शर्मसार कर रही हैं ........

क्या अब तक नहीं पहुंची

मेरी रूह के टूटते तारे की आवाज़ .........तुम तक ?

उफ़ ............सिर्फ एक बार आवाज़ दो

सांस थमने से पहले
जान निकलने से पहले 

धडकनों के रुकने से पहले
(पपडाए अधरों की बोझिल प्यास फ़ना होने से पहले )

ये इश्क के चबूतरों पर बाजरे के दाने हमेशा बिखरते क्यों हैं ............प्रेमियों के चुगने से पहले .........जानां !!

25 टिप्‍पणियां:

Madan Mohan Saxena ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको .

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अगर दाने नहीं होंगे तो प्रेमी कबूतर चुगेंगे कैसे :):)

इश्क़ वो आतिश है गालिब
जो लगाए न लगे बुझाये न बुझे ....बहुत खूब

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

Maheshwari kaneri ने कहा…

बहुत खूब ..बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मन के गहरे भावों का संगम ...

Aruna Kapoor ने कहा…

...बहुत सुन्दर मनोभाव!

Akhil ने कहा…

behad sundar shabdvinyas..man ko chu lene wali rachna...bahut bahut badhai sundar rachna ke liye.

संध्या शर्मा ने कहा…

क्या अब तक नहीं पहुंची
मेरी रूह के टूटते तारे की आवाज़ .........तुम तक ?

उफ़ ............सिर्फ एक बार आवाज़ दो
सांस थमने से पहले
बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार 18/12/12 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका इन्तजार है

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत ही खोजपूर्ण अभिव्यक्ति!
पढ़कर आनन्द आ गया!

sushma 'आहुति' ने कहा…

bhaut khubsurat abhivaykti....

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत ही लाजवाब रचना.

रामराम

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

प्रतिध्वनि सी छोड़ती हैं पंक्तियाँ

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

ये इश्क के चबूतरों पर बाजरे के दाने हमेशा बिखरते क्यों हैं ............प्रेमियों के चुगने से पहले .........जानां !!
uff !! kyon hota hai aisa...!!

कालीपद प्रसाद ने कहा…

दिल की तड़प को प्रतिध्वनित करती खुबसूरत रचना

सदा ने कहा…

क्या अब तक नहीं पहुंची
मेरी रूह के टूटते तारे की आवाज़ .........तुम तक ?
वाह ... बहुत खूब

लाजवाब प्रस्‍तुति

sangita ने कहा…

मन की मन जाने सुरंगमा ,मन की मन माने रे ,
भावभीनी रचना ,सुन्दर बधाई .

इमरान अंसारी ने कहा…

इश्क के चबूतरे पर.............वाह बहुत खूब।

pran sharma ने कहा…

KAVITA DO BAAR PADH GAYAA HUN .
USKEE GOONJ AB TAK MAN , MASTISHK
MEIN SAMAAYEE HAI .

pran sharma ने कहा…

KAVITA DO BAAR PADH GAYAA HUN .
USKEE GOONJ AB TAK MAN , MASTISHK
MEIN SAMAAYEE HAI .

रश्मि प्रभा... ने कहा…

http://www.parikalpnaa.com/2012/12/blog-post_9575.html

मन के - मनके ने कहा…

’क्या अब तक नहीं पहुंची
मेरे रूह के टूतते तारे की आवाज’ मर्मस्पर्शी.

मन के - मनके ने कहा…

’क्या अब तक नहीं पहुंची
मेरे रूह के टूतते तारे की आवाज’ मर्मस्पर्शी.

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

सुन्दर तरीके से अभिव्यक्त हुए हैं भाव और अर्थ .

Dr. shyam gupta ने कहा…

...दाने तो चुगने से पहले ही बिखरेंगे, चुगने के लिए ...बाद में बिखरकर क्या करेंगे ..

----------सभी बकवास, असाहित्यिक, विरोधाभासी व तथ्यहीन प्रयोग हैं...
-"पपडाए अधरों की बोझिल प्यास..".
------क्या प्यास भी बोझिल होती है वह भी प्यार में बोझिल लग रहे है तो फिर प्रेमी को बुलाया क्यों जा रहा है...
"मन की दसों दिशाओं से उठती
हुआं - हुआं की आवाजें
सियारों की चीखों को भी
शर्मसार कर रही हैं "..
----- वह ! क्या बात है एसा प्यार है कि मन की आवाजें सियार की आवाजों जैसी होगयीं क्या प्यारी अभिव्यक्ति है प्यार की..
"कितने खरपतवार उग आये हैं.." वह क्या बात है सोच में खरपतवार उग आये हैं तो फिर प्यार कैसा , क्यों बुलाया जा रहा है प्रेमी को इतनी आतुरता से ...सच्चे परम में तो आनंदमय सोच बनती है ..