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बुधवार, 16 जनवरी 2013

सोचती हूँ अघोरी बन जाऊँ

सोचती हूँ अघोरी बन जाऊँ
और अपने मन के शमशान में
कील दूँ तुम्हें 
तुम्हारी यादों को
तुम्हारे वजूद को
अपनी मोहब्बत के 
सिद्ध किये मन्त्रों से 

सुना है --------- मन्त्रों में बहुत शक्ति होती है
और आत्मायें 
जो कीली जाती हैं 
वचनबद्ध होती हैं 
मन्त्रों की लक्ष्मण रेखा में 
बँधे रहने को ------------

क्योंकि
मोहब्बत की शमशानी खामोशी में गूँजते 
मन्त्रोच्चार के भी अपने कायदे होते हैं ……

21 टिप्‍पणियां:

Madan Mohan Saxena ने कहा…

Shandaar.

shikha varshney ने कहा…

गज़ब ..एकदम अलग और बहुत गहरी बात .

इमरान अंसारी ने कहा…

शब्द - शब्द......सन्नाटा......बहुत सुन्दर ।

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बहुत शानदार उम्दा प्रस्तुति,,,

recent post: मातृभूमि,

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अपने में ही बातें, मन्त्र और सन्नाटा

mridula pradhan ने कहा…

gahra andaz......

Ramakant Singh ने कहा…

इतनी तल्खी कभी आपको दुखी न कर दे

KAVITA ने कहा…

कायदे में रहना अघोरी को भी कहाँ पसंद है? .. ..
बहुत बढ़िया रचना ..

sushma 'आहुति' ने कहा…

खुबसूरत अभिवयक्ति.....

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत गहन और सशक्त विचार.

रामराम.

Sunil Kumar ने कहा…

कुछ अलग सी पोस्ट सच्चाई से कही गयी बात अच्छी लगी

रश्मि प्रभा... ने कहा…

मन की सरहदों से बढ़ जाये आगे अपना ही मन ....... तो सोच की उंचाई,गहराई यूँ ही परिलक्षित होती है

वृजेश सिंह ने कहा…

प्रेम का चरमोत्कर्ष कहें या बंधन में बांध लेने की हसरत का बयां।

***Punam*** ने कहा…

बहुत खूब.....
मन की अभिव्यक्ति कुछ ऐसी ही मेरी भी....!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

ये मुहब्बत जो न बना दे कम है :):) ... बिलकुल नया बिम्ब ।

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

प्रभावशाली ,
जारी रहें।

शुभकामना !!!

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Saras ने कहा…

बहुत ही प्यारी लेकिन खूंख्वार कोशिश .....प्यार को बाँधने की...अच्छी लगी ....!

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

अरे, आपने तो चौंका दिया,फिर से पढ़ रही हूँ सचेत होकर !

दिगम्बर नासवा ने कहा…

पर मुहब्बत कहाँ रहती है कायदों में ...

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

पर अघोरी सहज-स्वाभाविक नहीं होता!

Mansa Anand ने कहा…

देने का भाव तो मोल है
तुमने तो उन्‍हें दिया है
कुछ अलमोल
जो लहला रहा है
जीवन बनकर
ओर सिच दो प्रेम ओर संस्‍कार
उसके तरूण ह्रदय में
ताकि वह फैल सके
जग में एक बीज बन कर
स्‍वामी आनंद प्रसाद मनसा