हम तो डूबे हुए अशआर हैं
दर्द बिन ग़ज़ल बन नहीं सकते
बहर मात्राओं की जुगलबंदी बिन
मुकम्मल शेर बन नहीं सकते
अब कौन पड़े जुल्फों के पेंचोखम में सनम
गिर- गिर के दरिया में अब संभल नहीं सकते
उजालों का सदा ही तलबगार रहा ज़माना
हम तो अंधेरों के सायों से भी अब लड़ नहीं सकते
ये मय्यतों पर झूठे आँसू बहाने वाले
कभी ज़िन्दगी के तलबगार बन नही सकते
दुआ दें या बददुआ उसके दरबार के कानून
किसी के लिए कभी बदल नहीं सकते
मुमकिन है बदल जाए ईमान शैतान का
इंसान में छुपे शैतान को कभी बदल नहीं सकते
पृष्ठ
शनिवार, 28 अगस्त 2010
शनिवार, 21 अगस्त 2010
एक सफ़र ऐसा भी………………………
भार्या से
प्रेयसी बनने की
संपूर्ण चेष्टाओं
को धूल- धूसरित
करती तुम्हारी
हर चेष्टा जैसे
आंदोलित कर देती
मन को और
फिर एक बार
नए जोश से
मन फिर ढूँढता
नए -नए आयाम
प्रेयसी के भेदों
को टटोलता
खोजता
हर बार
एक नाकाम -सी
कोशिश करता
और फिर धूमिल
पड़ जाती आशाओं
में , अपने नेह
का सावन भरता
मगर कभी
ना समझ पाता
एक छोटा सा सच
प्रेयसी को भार्या
बनाया जा सकता है
मगर
भार्या कभी प्रेयसी
नहीं बनाई जाती
उस पर तो
अधिकारों का बोझ
लादा जाता है
मनुहारों से नहीं
उपजाई जाती
इक अपनी
जायदाद सम
प्रयोग में
लाया जाता है
माणिकों सी
सहेजी नहीं जाती
हकीकत के धरातल
पर बैठाई जताई है
ख्वाबों में नहीं
सजाई जाती
संस्कारों की वेणी
गुँथवाई जाती है
उसकी वेणी में पुष्प
नहीं सजाये जाते
अरमानो की तपती
आग मे झुलसायी
जाती है
सपनो के हार नहीं
पहनाये जाते
शब्दों के व्यंग्य
बाणों से बींधी जाती है
ग़ज़लों की चाशनी में
नहीं डुबाई जाती
आस्था की बलि वेदी पर
मिटाई जाती है
मगर प्रेम की मूरत बना
पूजी नहीं जाती
बस इतना सा फर्क
ना समझ पाता है
ये मन
क्यूँ भाग- भाग
जाता है
और इतना ना
समझ पाता है
प्रेयसी बनने की आग में
जलती भार्या का सफ़र
सिर्फ भार्या पर ही सिमट
जाता है
सिर्फ भार्या पर ही.................
प्रेयसी बनने की
संपूर्ण चेष्टाओं
को धूल- धूसरित
करती तुम्हारी
हर चेष्टा जैसे
आंदोलित कर देती
मन को और
फिर एक बार
नए जोश से
मन फिर ढूँढता
नए -नए आयाम
प्रेयसी के भेदों
को टटोलता
खोजता
हर बार
एक नाकाम -सी
कोशिश करता
और फिर धूमिल
पड़ जाती आशाओं
में , अपने नेह
का सावन भरता
मगर कभी
ना समझ पाता
एक छोटा सा सच
प्रेयसी को भार्या
बनाया जा सकता है
मगर
भार्या कभी प्रेयसी
नहीं बनाई जाती
उस पर तो
अधिकारों का बोझ
लादा जाता है
मनुहारों से नहीं
उपजाई जाती
इक अपनी
जायदाद सम
प्रयोग में
लाया जाता है
माणिकों सी
सहेजी नहीं जाती
हकीकत के धरातल
पर बैठाई जताई है
ख्वाबों में नहीं
सजाई जाती
संस्कारों की वेणी
गुँथवाई जाती है
उसकी वेणी में पुष्प
नहीं सजाये जाते
अरमानो की तपती
आग मे झुलसायी
जाती है
सपनो के हार नहीं
पहनाये जाते
शब्दों के व्यंग्य
बाणों से बींधी जाती है
ग़ज़लों की चाशनी में
नहीं डुबाई जाती
आस्था की बलि वेदी पर
मिटाई जाती है
मगर प्रेम की मूरत बना
पूजी नहीं जाती
बस इतना सा फर्क
ना समझ पाता है
ये मन
क्यूँ भाग- भाग
जाता है
और इतना ना
समझ पाता है
प्रेयसी बनने की आग में
जलती भार्या का सफ़र
सिर्फ भार्या पर ही सिमट
जाता है
सिर्फ भार्या पर ही.................
गुरुवार, 19 अगस्त 2010
ब्लॉग गुरु की पाठशाला ...............
आइये साथियों ब्लॉग गुरु की पाठशाला में और हर समस्या का समाधान पाइए ................हा हा हा
ब्लॉगिंग गुरु ने स्कूल खोला
विज्ञापन लगाया ---------
ब्लॉगिंग के गुर सीखिए ------
फायदा ना होने पर
बेनामी के रूप में
सबको धमका दीजिये
विज्ञापन देख दुनिया का मारा
एक चँगुल में फँस गया
और गुरु के दरबार में
पहुँच गया
बोला -----गुरु जी
मेरी कोई सुनता नहीं
घर में पत्नी और बच्चो
की ही राजनीति गरमाई है
वहाँ मेरी अक्ल चकराई है
ऑफिस में बॉस की फटकार
खाई है पर बात की
वहाँ भी नहीं सुनवाई है
यार दोस्त अपनी- अपनी सुनाते हैं
और मेरी बारी आते ही
अपने घर चले जाते हैं
कोई ऐसा चमत्कार कीजिये
मेरा भी उद्धार हो जाये
और जो अन्दर ही अन्दर
उबल रहा है उसके बाहर
आने का उपाय कीजिये
गुरु बोले ------बेटा
क्यूँ घबराता है
बिलकुल सही जगह तू आया है
आजकल जिसकी कोई नहीं सुनता
उसके लिए ही ये मंच बनाया है
हम तुझे ब्लॉगिंग के
ऐसे -ऐसे गुर सिखायेंगे
कि बड़े- बड़े सूरमा
मैदान छोड़कर भाग जायेंगे
सबसे पहले तू
किसी नामी- गिरामी संगठन का
सदस्य बन जाना
और फिर बिना बात किसी
से भी भिड जाना
आपत्तिजनक टिप्पणियां करना
बस फिर देखना
पूरा संगठन तेरे समर्थन में
उतर आएगा और ब्लॉगजगत में
तुझे ख्याति दिला जायेगा
बस पहली बाधा पार की जिसने
वो तो सिकंदर बन ही जाता है
फिर तू जो भी कहना चाहे
कह देना , अपनी हर भड़ास
निकाल लेना
कोई न तुझसे पंगा लेगा
और ब्लॉगजगत में
नाम तेरा रोशन होगा
महशूर होने का सबसे
सुगम तरीका है
अब बस इतना काम
और कर लेना
ब्लॉगजगत के अपने
संगठन के हर सदस्य के
ब्लॉग पर उनकी पोस्ट के
कसीदे पढ़ देना
चाहे लिखा उसमें
कुछ भी काम का ना हो
मगर टिपण्णी ऐसी कर देना
जैसे उसकी भाषा को
समझने का हुनर
सिर्फ खुदा ने तुम्हें
ही बख्शा है
फिर देखना कैसे
ब्लॉगजगत तुम्हें
आँखों पर बिठाता है
और अच्छी -अच्छी पोस्टों के
कैसे तोते उडाता है
और तुम्हारी पोस्ट को
कैसे सबसे ऊपर पहुँचाता है
अगर फिर भी किसी कारणवश
कभी टिप्पणियां कम आने लगें
कोई और धुरंधर
अपना सिक्का ज़माने लगे
बस तू इतना कर देना
ब्लॉगजगत को छोड़ने की
धमकी दे देना
फिर देखना सारा
ब्लॉगजगत तुझे
मनाने आ जायेगा
और एक बार फिर
तेरा सिक्का जम जायेगा
अब अच्छी पोस्टों का
दीवाला निकालने का गुर
सिखलाता हूँ
चाहे तुझे लिखना भी आता हो
कविता के भाव भी जानता हो
लेख की भाषा का भी ज्ञान हो
मगर तब भी इतना करते रहना
सिर्फ अपने संगठन के
सदस्यों को छोड़कर
बाकी ब्लोगरों की पोस्टों पर
सिर्फ "अच्छी है" , "उम्दा भाव हैं "
"गहरी बात कही" , "सुन्दर लेखन"
ऐसी छोटी -छोटी टिप्पणियाँ
ही करना ताकी
लिखने वाला भी समझ जाये
उसका होंसला भी
पस्त हो जाये
और वो घबराकर
मैदान छोड़कर भाग जाये
बस इतना सब तू करते रहना
तब देखना एक दिन
ब्लॉगिंग में नाम तेरा भी
चमक जायेगा और
अख़बारों के पन्नों पर
"बिग बी "की तरह
तू भी छा जायेगा
बेटा आज के लिए
बस इतना काफी है
तब तक तुम इसका अभ्यास करना
वरना पढने वालों के तोते उड़ जायेंगे
ज्यादा बड़े पाठ से घबराएंगे
इनको और पोस्टों पर भी जाना है
इतना ध्यान भी रखना होगा
फिर भी कोई समस्या आये
तो ब्लोगगुरु के पास आ जाना
हर समाधान पा और जानासोमवार, 16 अगस्त 2010
बस इतना वादा करती जाओ................
हर जन्म
जब भी मिलीं
मेरी ना हुयीं
हर बार
मिलकर भी
ना मिलीं
अब एक वादा
करती जाओ
अगले जन्म
की आस को
कुछ तो
संबल
देती जाओ
मेरी
चिर प्रतीक्षित
प्यास को
अपने वादे के
अमृत से
सींचती जाओ
इस बुझते
दिए की
टिमटिमाती
लौ को
अपनी स्वीकृति
की छाप से
भिगोती जाओ
अगले किसी जन्म
जब भी मिलोगी
सिर्फ मेरी
बनकर मिलोगी
बस इतना
वादा करती जाओ ............
जब भी मिलीं
मेरी ना हुयीं
हर बार
मिलकर भी
ना मिलीं
अब एक वादा
करती जाओ
अगले जन्म
की आस को
कुछ तो
संबल
देती जाओ
मेरी
चिर प्रतीक्षित
प्यास को
अपने वादे के
अमृत से
सींचती जाओ
इस बुझते
दिए की
टिमटिमाती
लौ को
अपनी स्वीकृति
की छाप से
भिगोती जाओ
अगले किसी जन्म
जब भी मिलोगी
सिर्फ मेरी
बनकर मिलोगी
बस इतना
वादा करती जाओ ............
बुधवार, 11 अगस्त 2010
इक बार दफ़न हुई चाहतें............
जब चाहतें थीं तो
हर हसरतें फ़ना हो गयी
अब चाहतें नहीं तो
हर हसरत जवाँ हो गयी
कल जब बुलाते थे तो
दूर छिटक जाते थे
आज बिन बुलाये
चले आते हैं
ये कैसे हसरतों के साये हैं
बंद किवड़िया खडकाए हैं
खुशियों के दरवाजे
जब बंद कर दिए हमने
तो देहरी पर
दस्तक दिए जाते हैं
अब शाख से टूटे पत्ते को
दोबारा कैसे जोडूँ
मुरझाये फूल को
कैसे खिला दूँ
कौन सा वो सावन लाऊँ
जो गुलशन हरा हो जाये
अरमानो की कब्र पर
कौन सा दीया जलाऊँ
जो हर अरमान एक बार
फिर जी जाए
इक बार दफ़न हुई
अरमानों की दुनिया
फिर आबाद नहीं होती
किसी भी आरजू
किसी भी हसरत की
तलबगार नहीं होती
मुर्दे कब जिंदा हुए हैं
भुने हुए बीजों से
अंकुर नहीं उगते
इसीलिए शायद
इक बार दफ़न
हुई चाहतें
दोबारा कफ़न
नहीं ओढती
हर हसरतें फ़ना हो गयी
अब चाहतें नहीं तो
हर हसरत जवाँ हो गयी
कल जब बुलाते थे तो
दूर छिटक जाते थे
आज बिन बुलाये
चले आते हैं
ये कैसे हसरतों के साये हैं
बंद किवड़िया खडकाए हैं
खुशियों के दरवाजे
जब बंद कर दिए हमने
तो देहरी पर
दस्तक दिए जाते हैं
अब शाख से टूटे पत्ते को
दोबारा कैसे जोडूँ
मुरझाये फूल को
कैसे खिला दूँ
कौन सा वो सावन लाऊँ
जो गुलशन हरा हो जाये
अरमानो की कब्र पर
कौन सा दीया जलाऊँ
जो हर अरमान एक बार
फिर जी जाए
इक बार दफ़न हुई
अरमानों की दुनिया
फिर आबाद नहीं होती
किसी भी आरजू
किसी भी हसरत की
तलबगार नहीं होती
मुर्दे कब जिंदा हुए हैं
भुने हुए बीजों से
अंकुर नहीं उगते
इसीलिए शायद
इक बार दफ़न
हुई चाहतें
दोबारा कफ़न
नहीं ओढती
शनिवार, 7 अगस्त 2010
और हँसी मेरी लौटा जायें ....................
चलो अच्छा हुआ
हँसा दिया
आज सुबह से
हँसी ही नहीं
ना जाने कहाँ
काफूर हो गयी थी
किस कोने में
दुबकी पड़ी थी
क्या करूँ
हँसी आती ही नहीं
दिल के गहरे
सन्नाटों में
खो जाती
पता नहीं कौन से
सन्नाटे हैं
जो हँसी को बाहर
आने ही नहीं देते
सन्नाटों का कारण
क्या है, पता ही नहीं
बहुत ढूँढा ,मिला ही नहीं
तुम्हें मिले तो
बता जाना
ना मिले तब भी
कोशिश करना
शायद कभी
किसी चौराहे पर
भीड़ के बीच
मिल जायें
और हँसी मेरी
लौटा जायें...............
हँसा दिया
आज सुबह से
हँसी ही नहीं
ना जाने कहाँ
काफूर हो गयी थी
किस कोने में
दुबकी पड़ी थी
क्या करूँ
हँसी आती ही नहीं
दिल के गहरे
सन्नाटों में
खो जाती
पता नहीं कौन से
सन्नाटे हैं
जो हँसी को बाहर
आने ही नहीं देते
सन्नाटों का कारण
क्या है, पता ही नहीं
बहुत ढूँढा ,मिला ही नहीं
तुम्हें मिले तो
बता जाना
ना मिले तब भी
कोशिश करना
शायद कभी
किसी चौराहे पर
भीड़ के बीच
मिल जायें
और हँसी मेरी
लौटा जायें...............
सोमवार, 2 अगस्त 2010
हाय !ये मैंने क्या किया?
इक सौंदर्य का
बीज रोपा
धरती के सीने में
जग नियंता ने
और सौंदर्य
की महकती फसल
लहलहा उठी
फिर उसने
मानव नाम का
प्राणी धरती
पर उतारा
और चाहा ये
उसकी फुलवारी को
और निखारे
उसकी बगिया के
हर फूल को
गुलज़ार करे
मगर मानव के
स्वार्थ ने
बनाने वाले को
दगा दे दिया
उसकी कृति का
दुरूपयोग किया
सौंदर्य को
कुरूपता में
बदल दिया
अब पछता रहा था
जगनियंता
पालनहारा
जगसृष्टा
हाय !ये मैंने क्या किया?
ये मैंने क्या किया………
क्यूँ मानव का अविष्कार किया ?
बीज रोपा
धरती के सीने में
जग नियंता ने
और सौंदर्य
की महकती फसल
लहलहा उठी
फिर उसने
मानव नाम का
प्राणी धरती
पर उतारा
और चाहा ये
उसकी फुलवारी को
और निखारे
उसकी बगिया के
हर फूल को
गुलज़ार करे
मगर मानव के
स्वार्थ ने
बनाने वाले को
दगा दे दिया
उसकी कृति का
दुरूपयोग किया
सौंदर्य को
कुरूपता में
बदल दिया
अब पछता रहा था
जगनियंता
पालनहारा
जगसृष्टा
हाय !ये मैंने क्या किया?
ये मैंने क्या किया………
क्यूँ मानव का अविष्कार किया ?
गुरुवार, 29 जुलाई 2010
मेरा तो मुझमें कुछ बचा ही नहीं............150
सुनो .............
हाँ .................
कुछ कहना था ........
हाँ कहो ना ...........
मैं सुन रहा हूँ .............
नहीं , रहने दो .............
शायद तुम नहीं समझोगे .........
तुम कोशिश तो करो...........
मैं भी कोशिश करूंगा.............
मुझे तुम्हारी चुप में छुपी
ख़ामोशी का दर्द पीना है
दे सकोगे.......................
मैं खामोश कहाँ हूँ .........
बोल तो रहा हूँ (दर्द के गहरे कुएं से निकली आवाज़ सा )
क्या दे सकते हो ?
मेरा तो मुझमें कुछ बचा ही नहीं .........
अच्छा ऐसा करो
अपने अनकहे ज़ज्बात
कुछ बिखरे अहसास
कुछ टूटे पल
कुछ सिमटी घड़ियाँ
कुछ अंतस के रुदन
कुछ वो दिल का
जला हुआ टुकड़ा
जिस पर मेरा
नाम लिखा था
सिर्फ इतना मेरे
नाम कर दो
मैं तुम्हारा हर गम
हर आह , हर आँसू
हर दर्द पी जाना चाहती हूँ
क्या तुम इतना भी
नहीं कर सकते
मेरे लिए ..............
नहीं , मेरा तो मुझमें कुछ बचा ही नहीं..........
सब वक्त की
आँधियाँ उडा ले गयीं
ज़माने ने मेरा
हर ख्वाब , हर ख़ुशी
हर तमन्ना ,हर आरज़ू
कब छीन ली
पता ही ना चला
अब यहाँ सिर्फ
अरमानो की
सुलगती हुई
लकड़ियाँ
सिसक रही हैं
मेरी जिंदा लाश
अब सड़ने लगी है
जब से तुम गयी हो............
कब तक मेरे बुत से
दिल बहलाओगे
मैं तुम से जुदा होकर भी
तुम्हारी यादो की
क़ैद से आज़ाद
ना हो पाई हूँ
बस बहुत हुआ
अब मेरी सारी
अमानतें मुझे दे दो
तुम तो बुत
के सहारे जी भी
लेते हो मगर मैं
मैं तो पल- पल
तुम्हें सिसकते
तड़पते देखती हूँ
सोचो मुझ पर
क्या गुजरती होगी
दे दो ना मुझे
मेरे सारे लम्हात
शायद कुछ पल
का सुकून मेरी
रूह को भी मिल जाये
तुम्हें मेरे सूखे
अश्कों की कसम
दोगे ना ..........
मगर , मेरा तो मुझमें कुछ बचा ही नहीं............
रूह और जिस्म
के इस प्रेम पर
सितारे भी
रश्क कर रहे थे
कुछ पल इस
पवित्र प्रेम के
पीने को तरस रहे थे
रूह और जिस्म के
इस अद्भुत मिलन के
गवाह बन रहे थे
हाँ .................
कुछ कहना था ........
हाँ कहो ना ...........
मैं सुन रहा हूँ .............
नहीं , रहने दो .............
शायद तुम नहीं समझोगे .........
तुम कोशिश तो करो...........
मैं भी कोशिश करूंगा.............
मुझे तुम्हारी चुप में छुपी
ख़ामोशी का दर्द पीना है
दे सकोगे.......................
मैं खामोश कहाँ हूँ .........
बोल तो रहा हूँ (दर्द के गहरे कुएं से निकली आवाज़ सा )
क्या दे सकते हो ?
मेरा तो मुझमें कुछ बचा ही नहीं .........
अच्छा ऐसा करो
अपने अनकहे ज़ज्बात
कुछ बिखरे अहसास
कुछ टूटे पल
कुछ सिमटी घड़ियाँ
कुछ अंतस के रुदन
कुछ वो दिल का
जला हुआ टुकड़ा
जिस पर मेरा
नाम लिखा था
सिर्फ इतना मेरे
नाम कर दो
मैं तुम्हारा हर गम
हर आह , हर आँसू
हर दर्द पी जाना चाहती हूँ
क्या तुम इतना भी
नहीं कर सकते
मेरे लिए ..............
नहीं , मेरा तो मुझमें कुछ बचा ही नहीं..........
सब वक्त की
आँधियाँ उडा ले गयीं
ज़माने ने मेरा
हर ख्वाब , हर ख़ुशी
हर तमन्ना ,हर आरज़ू
कब छीन ली
पता ही ना चला
अब यहाँ सिर्फ
अरमानो की
सुलगती हुई
लकड़ियाँ
सिसक रही हैं
मेरी जिंदा लाश
अब सड़ने लगी है
जब से तुम गयी हो............
कब तक मेरे बुत से
दिल बहलाओगे
मैं तुम से जुदा होकर भी
तुम्हारी यादो की
क़ैद से आज़ाद
ना हो पाई हूँ
बस बहुत हुआ
अब मेरी सारी
अमानतें मुझे दे दो
तुम तो बुत
के सहारे जी भी
लेते हो मगर मैं
मैं तो पल- पल
तुम्हें सिसकते
तड़पते देखती हूँ
सोचो मुझ पर
क्या गुजरती होगी
दे दो ना मुझे
मेरे सारे लम्हात
शायद कुछ पल
का सुकून मेरी
रूह को भी मिल जाये
तुम्हें मेरे सूखे
अश्कों की कसम
दोगे ना ..........
मगर , मेरा तो मुझमें कुछ बचा ही नहीं............
रूह और जिस्म
के इस प्रेम पर
सितारे भी
रश्क कर रहे थे
कुछ पल इस
पवित्र प्रेम के
पीने को तरस रहे थे
रूह और जिस्म के
इस अद्भुत मिलन के
गवाह बन रहे थे
सोमवार, 26 जुलाई 2010
एक पल
तेरी
एक पल में
ज़िन्दगी
जीने की
हसरत
मेरे जीने का
सबब बनी
अब खोजता
फिरता हूँ
उस एक
पल को
मगर
कहीं नहीं मिलता
हर पल पर
ज़िन्दगी की
उलझनों के
लगे पहरे
कभी ज़िन्दगी
को ठहरने
नहीं देते
इक पल को
ढूँढते - ढूँढते
बरसों बीत गए
शायद तुम तो
भूल चुकी होंगी
मगर मैं
आज भी
उसी इक पल
की तलाश में
भटक रहा हूँ
एक पल में
ज़िन्दगी
जीने की
हसरत
मेरे जीने का
सबब बनी
अब खोजता
फिरता हूँ
उस एक
पल को
मगर
कहीं नहीं मिलता
हर पल पर
ज़िन्दगी की
उलझनों के
लगे पहरे
कभी ज़िन्दगी
को ठहरने
नहीं देते
इक पल को
ढूँढते - ढूँढते
बरसों बीत गए
शायद तुम तो
भूल चुकी होंगी
मगर मैं
आज भी
उसी इक पल
की तलाश में
भटक रहा हूँ
शनिवार, 24 जुलाई 2010
सावन को हरा कर जाये कोई
कब तक जलाऊँ अश्कों को
भीगी रात के शाने पर
सावन भी रीता बीत गया
अरमानों के मुहाने पर
जब चोट के गहरे बादल से
बिजली सी कोई कड़कती है
तब यादों के तूफानों की
झड़ी सी कोई लगती है
खाक हुई जाती है तब
मोहब्बत जो अपनी लगती है
कब तक धधकते सावन की
बेदर्द चिता जलाए कोई
रात की बेरहम किस्मत को
साँसों का कफ़न उढाये कोई
उधार की सांसों का क़र्ज़
हँसकर चुका तो दूँ मगर
इक कतरा अश्क
तो बहाए कोई
और बरसों से सूखे सावन
को हरा कर जाये कोई
भीगी रात के शाने पर
सावन भी रीता बीत गया
अरमानों के मुहाने पर
जब चोट के गहरे बादल से
बिजली सी कोई कड़कती है
तब यादों के तूफानों की
झड़ी सी कोई लगती है
खाक हुई जाती है तब
मोहब्बत जो अपनी लगती है
कब तक धधकते सावन की
बेदर्द चिता जलाए कोई
रात की बेरहम किस्मत को
साँसों का कफ़न उढाये कोई
उधार की सांसों का क़र्ज़
हँसकर चुका तो दूँ मगर
इक कतरा अश्क
तो बहाए कोई
और बरसों से सूखे सावन
को हरा कर जाये कोई
मंगलवार, 20 जुलाई 2010
ख़ामोशी पर लगे पहरे
यूँ तो
खामोश थी
हूँ और रहूँगी
ना गिला कोई
ना शिकवा
ना आँसू
ना मुस्कान
ना चाहत कोई
ना अरमान
मगर ख़ामोशी
पर लगे तेरी
याद के पहरे ही
ख़ामोशी तोड़
जाते हैं
बता अब
यादों को तेरी
किस चीन की
दीवार में
चिनवाऊँ
किस सागर की
गहराई में दबाऊँ
कौन से रसातल
में छुपाऊँ
और ख़ामोशी का
कफ़न ओढ़
सो जाऊँ
खामोश थी
हूँ और रहूँगी
ना गिला कोई
ना शिकवा
ना आँसू
ना मुस्कान
ना चाहत कोई
ना अरमान
मगर ख़ामोशी
पर लगे तेरी
याद के पहरे ही
ख़ामोशी तोड़
जाते हैं
बता अब
यादों को तेरी
किस चीन की
दीवार में
चिनवाऊँ
किस सागर की
गहराई में दबाऊँ
कौन से रसातल
में छुपाऊँ
और ख़ामोशी का
कफ़न ओढ़
सो जाऊँ
शनिवार, 17 जुलाई 2010
खुले विचारों वाली औरत
खुले विचारों
के साथ
स्वच्छंद उड़ान
भरती औरत
माँ बनते ही
वो भी एक
बेटी की माँ
उस पर
जवान होती
बेटी की माँ
के सभी
खुले विचार
ना जाने कब
दरवाज़े की
चूल में
फँसकर
चकनाचूर
हो जाते हैं
आधुनिकता का दंभ
स्वच्छंद विचारों
की खुशबू
कब कपूर सी
तिरोहित हो जाती है
पता भी नहीं चलता
और फिर
वहाँ रह जाती
है सिर्फ माँ
एक ऐसी माँ
जो अपनी
जवान होती
बेटी को
समाज के
नरभक्षियों
के हाथों से
बचाने की
फिक्र में
रात भर
सो नहीं पाती
ऊपर से हँसती
मुस्कुराती
खिलखिलाती
पर भीतर ही भीतर
दहशत में जीती
एक दकियानूसी माँ
कब बन जाती है
पता ही नहीं चलता
हर निगाह में
उसे सिर्फ
भयावह डरावने
खूँखार चेहरे
नज़र आते हैं
तब तक
जब तक वो
उसके हाथ
पीले नहीं कर देती
के साथ
स्वच्छंद उड़ान
भरती औरत
माँ बनते ही
वो भी एक
बेटी की माँ
उस पर
जवान होती
बेटी की माँ
के सभी
खुले विचार
ना जाने कब
दरवाज़े की
चूल में
फँसकर
चकनाचूर
हो जाते हैं
आधुनिकता का दंभ
स्वच्छंद विचारों
की खुशबू
कब कपूर सी
तिरोहित हो जाती है
पता भी नहीं चलता
और फिर
वहाँ रह जाती
है सिर्फ माँ
एक ऐसी माँ
जो अपनी
जवान होती
बेटी को
समाज के
नरभक्षियों
के हाथों से
बचाने की
फिक्र में
रात भर
सो नहीं पाती
ऊपर से हँसती
मुस्कुराती
खिलखिलाती
पर भीतर ही भीतर
दहशत में जीती
एक दकियानूसी माँ
कब बन जाती है
पता ही नहीं चलता
हर निगाह में
उसे सिर्फ
भयावह डरावने
खूँखार चेहरे
नज़र आते हैं
तब तक
जब तक वो
उसके हाथ
पीले नहीं कर देती
मंगलवार, 13 जुलाई 2010
देवता बन नहीं पाते
उर का मंथन करता
विचारों का मंदराचल
सोच के गहरे सागर में
छुपे , डूबे रत्नों को
निकालने की कोशिश
करता , मगर
कभी सार्थक तो
कभी निरर्थक
प्रश्नों के झंझावात
उर मंथन से निकले
हलाहल को पीने
पर विवश करते
मगर हलाहल को
पीने वाला हर बार
शिव नहीं होता
इच्छाओं के सुनहरी
पंखों की अभिलाषा
हमेशा कामधेनु सी
पूर्ण नहीं होती
ख्यालों पर ख्वाबों
की मोहिनी
कितना भी डालो
ख्याल मोहित
हो नहीं पाते
और उर मंथन से
निकले अमृत को
पी नहीं पाते
देवताओं सा आचरण
कर नहीं पाते
आसक्ति को छोड़
नहीं पाते
मोह के मकडजाल
में फँसे
लोभ की दलदल
में धँसे
अहंकार से ऊपर
उठ नहीं पाते
कामनाओं के
वशीभूत हो
क्रोधाग्नि में जलते
पल- पल खुद से ही
लड़ते रहते हैं
पर कभी सुधापान
कर नहीं पाते
आसुर वृत्ति को
धारण करने वाले
इंसान , इंसान ही रहते हैं
देवता बन नहीं पाते
विचारों का मंदराचल
सोच के गहरे सागर में
छुपे , डूबे रत्नों को
निकालने की कोशिश
करता , मगर
कभी सार्थक तो
कभी निरर्थक
प्रश्नों के झंझावात
उर मंथन से निकले
हलाहल को पीने
पर विवश करते
मगर हलाहल को
पीने वाला हर बार
शिव नहीं होता
इच्छाओं के सुनहरी
पंखों की अभिलाषा
हमेशा कामधेनु सी
पूर्ण नहीं होती
ख्यालों पर ख्वाबों
की मोहिनी
कितना भी डालो
ख्याल मोहित
हो नहीं पाते
और उर मंथन से
निकले अमृत को
पी नहीं पाते
देवताओं सा आचरण
कर नहीं पाते
आसक्ति को छोड़
नहीं पाते
मोह के मकडजाल
में फँसे
लोभ की दलदल
में धँसे
अहंकार से ऊपर
उठ नहीं पाते
कामनाओं के
वशीभूत हो
क्रोधाग्नि में जलते
पल- पल खुद से ही
लड़ते रहते हैं
पर कभी सुधापान
कर नहीं पाते
आसुर वृत्ति को
धारण करने वाले
इंसान , इंसान ही रहते हैं
देवता बन नहीं पाते
बुधवार, 7 जुलाई 2010
मौत से बड़ी सौगात मिली हो जिसे
चाँदनी से झुलसे जिस्म को
जब चाँदनी भी जलाने लगे
रूह पर पड़ते फालों पर
आहों की सुइयाँ गुबने लगें
पाँव में छाले पड़ने लगें
छालों को अश्कों से सींचने लगें
तब किस आग से सहलाऊँ
कौन सा वो दीप जलाऊँ कि
छालों पर भी छाले पड़ने लगें
तेरी दी हर सौगात पर
चाहे जिस्म सारा सिसकने लगे
रूह भी फ़ना होने लगे
दर्द के सीने पर पाँव रखकर
दर्द जब हद से गुजरने लगे
हर अहसास दफ़न होने लगे
मौत से बड़ी सौगात मिली हो जिसे
उसे दर्द का अहसास कैसे मिले?
जब चाँदनी भी जलाने लगे
रूह पर पड़ते फालों पर
आहों की सुइयाँ गुबने लगें
पाँव में छाले पड़ने लगें
छालों को अश्कों से सींचने लगें
तब किस आग से सहलाऊँ
कौन सा वो दीप जलाऊँ कि
छालों पर भी छाले पड़ने लगें
तेरी दी हर सौगात पर
चाहे जिस्म सारा सिसकने लगे
रूह भी फ़ना होने लगे
दर्द के सीने पर पाँव रखकर
दर्द जब हद से गुजरने लगे
हर अहसास दफ़न होने लगे
मौत से बड़ी सौगात मिली हो जिसे
उसे दर्द का अहसास कैसे मिले?
मंगलवार, 6 जुलाई 2010
फलक पे झूम रही साँवली घटाएँ हैं
फलक पे झूम रही साँवली घटाएँ हैं
मेघ सारे तेरे गेसुओं में उतर आये हैं
बहक रही फिजा में शोख हवायें हैं
उड़ा के तेरा आँचल नाज़ से इतराए हैं
बदरी जो बरस के आज इठलाये है
जुल्फों के पेंचोखम तेरे भटकाए हैं
भटकते आवारा बादलों की छटाएँ हैं
गोरी के मुखड़े को क्यूँ लजाएँ हैं
रिमझिम के गीत हर दिल ने गाये हैं
लबों पर तेरे सभी उतर आये हैं
अदायें तेरी बिजलियाँ सी गिरायें हैं
खोई- खोई सी तेरी सब अदायें हैं
मुखड़े पर छाई शोख चंचल अदायें हैं
अरमाँ सारे तेरे आगोश में सिमट आये हैं
फलक पर झूमते सभी सितारे हैं
तेरे रूप के आगे सभी शरमाये हैं
रुखसार पर छाए मोहब्बत के साये हैं
नैनों में तेरी मेरे अहसास उतर आये हैं
तेरे रूप पर फ़िदा सारी फिजायें हैं
ये किस मोड़ पे हालात ले आये हैं
कुछ ख्याल तेरे निगाहों में उतर आये हैं
हम इक ज़िन्दगी वहाँ गुजार आये हैं
अँखियों के पेंच जब से लड़ाए हैं
सुबहो शाम तेरे नाम लिख आये हैं
प्रीत के दीप देहरी पर सजाये हैं
आस की बाती से सभी जगमगाए हैं
उमड़- घुमड़ कर बदरा जब छाए हैं
पिय मिलन को सजनिया अकुलाये हैं
फलक पे झूम रही साँवली घटाएँ हैं
रह -रह कर यादें उनकी सताएँ हैं
दोस्तों ,
सबसे पहली लाइन पंकज सुबीर जी के ब्लॉग से ली है क्यूंकि वहाँ उन्होंने मुशायरा रखा हुआ है और हमारा उस विधा में हाथ तंग है ----नुक्ता,बहर , मात्रा इन सबसे हम तो अंजान हैं इसलिए वहाँ भेजने का तो सवाल ही नहीं उठता था मगर उस दिन जैसे ही ये पहली पंक्ति पढ़ी दिल झूम उठा और कुछ ख्याल उसी दिन दिल से निकले और कागजों पर उतर आये --------अब इसमें सिर्फ भावों को ही देखियेगा शायरी की रूह मत खोजियेगा क्यूंकि यहाँ तो जो भी लिखा जाता है सिर्फ भावों से ही लिखा जाता है --------उम्मीद है पसंद आएगी .
मेघ सारे तेरे गेसुओं में उतर आये हैं
बहक रही फिजा में शोख हवायें हैं
उड़ा के तेरा आँचल नाज़ से इतराए हैं
बदरी जो बरस के आज इठलाये है
जुल्फों के पेंचोखम तेरे भटकाए हैं
भटकते आवारा बादलों की छटाएँ हैं
गोरी के मुखड़े को क्यूँ लजाएँ हैं
रिमझिम के गीत हर दिल ने गाये हैं
लबों पर तेरे सभी उतर आये हैं
अदायें तेरी बिजलियाँ सी गिरायें हैं
खोई- खोई सी तेरी सब अदायें हैं
मुखड़े पर छाई शोख चंचल अदायें हैं
अरमाँ सारे तेरे आगोश में सिमट आये हैं
फलक पर झूमते सभी सितारे हैं
तेरे रूप के आगे सभी शरमाये हैं
रुखसार पर छाए मोहब्बत के साये हैं
नैनों में तेरी मेरे अहसास उतर आये हैं
तेरे रूप पर फ़िदा सारी फिजायें हैं
ये किस मोड़ पे हालात ले आये हैं
कुछ ख्याल तेरे निगाहों में उतर आये हैं
हम इक ज़िन्दगी वहाँ गुजार आये हैं
अँखियों के पेंच जब से लड़ाए हैं
सुबहो शाम तेरे नाम लिख आये हैं
प्रीत के दीप देहरी पर सजाये हैं
आस की बाती से सभी जगमगाए हैं
उमड़- घुमड़ कर बदरा जब छाए हैं
पिय मिलन को सजनिया अकुलाये हैं
फलक पे झूम रही साँवली घटाएँ हैं
रह -रह कर यादें उनकी सताएँ हैं
दोस्तों ,
सबसे पहली लाइन पंकज सुबीर जी के ब्लॉग से ली है क्यूंकि वहाँ उन्होंने मुशायरा रखा हुआ है और हमारा उस विधा में हाथ तंग है ----नुक्ता,बहर , मात्रा इन सबसे हम तो अंजान हैं इसलिए वहाँ भेजने का तो सवाल ही नहीं उठता था मगर उस दिन जैसे ही ये पहली पंक्ति पढ़ी दिल झूम उठा और कुछ ख्याल उसी दिन दिल से निकले और कागजों पर उतर आये --------अब इसमें सिर्फ भावों को ही देखियेगा शायरी की रूह मत खोजियेगा क्यूंकि यहाँ तो जो भी लिखा जाता है सिर्फ भावों से ही लिखा जाता है --------उम्मीद है पसंद आएगी .
शुक्रवार, 2 जुलाई 2010
प्यार तो तब था जब ..........
जब भी मिले
जिस्म मिले
रूह ने तो
रूह को कभी
छुआ ही नहीं
कभी किसी को
किसी से
प्यार हुआ
ही नहीं
सिर्फ जरूरतों
के ख्वाहिशमंद
रिश्तो ने कभी
इक दूजे को
पाया ही नहीं
यूँ ही ज़िन्दगी
गुजार गए
दिखावटी प्यार
के भरम में
मगर प्यार के
तो कभी
करीब से भी
गुजरा ही नहीं
तेरी मौत पर
रोने वाला
दो दिन में
तुझको भूल गया
बता फिर
प्यार वहाँ
कहाँ हुआ ?
प्यार तो तब था
जब , तेरे विरह में
उसकी सांस भी
थम जाती
धड़कन उसकी भी
रुक जाती
रूह से रूह
मिल जाती
जिस्म मिले
रूह ने तो
रूह को कभी
छुआ ही नहीं
कभी किसी को
किसी से
प्यार हुआ
ही नहीं
सिर्फ जरूरतों
के ख्वाहिशमंद
रिश्तो ने कभी
इक दूजे को
पाया ही नहीं
यूँ ही ज़िन्दगी
गुजार गए
दिखावटी प्यार
के भरम में
मगर प्यार के
तो कभी
करीब से भी
गुजरा ही नहीं
तेरी मौत पर
रोने वाला
दो दिन में
तुझको भूल गया
बता फिर
प्यार वहाँ
कहाँ हुआ ?
प्यार तो तब था
जब , तेरे विरह में
उसकी सांस भी
थम जाती
धड़कन उसकी भी
रुक जाती
रूह से रूह
मिल जाती
रविवार, 27 जून 2010
मोहब्बत के पंख कतरे पड़े थे
मोहब्बत के पंख कतरे पड़े थे
हैवानियत के अब ये
सिलसिले चले थे
आन के नाम पर
मिटा दिया था गुलों को
ये किस मज़हब के
बाशिंदे थे
अभी तो परवाज़ भी
भरी ना थी परिंदों ने
सैयाद ने जाल
फैला दिया था
सिर्फ नाक बचाने
की खातिर
अपनों ने ही अपनों का
लहू बहा दिया था
ये २१ वी सदी में
जीने वाले
क्यूँ रूढ़ियों की
बेड़ियों में
जकड़े खड़े थे
खुदा ने तो
ना फर्क किया
लहू एक -सा
अता फ़रमाया
फिर क्यूँ इंसान
ने ही इन्सान को
इंसानियत का
दुश्मन बनाया
कभी रिश्तों का
कभी मज़हब का
कभी जाति का
कभी खाप का
जामा पहनाया
और इज्जत की
आड़ में
मौत का वीभत्स
तांडव कराया
ज़िन्दगी दे नहीं सकते
तो ज़िदगी लेने का
हक़ किसने दिलाया
ये इंसान की सोच को
किस श्राप ने
अभिशप्त बनाया
किस श्राप ने.....................
दोस्तों,
मन बहुत व्यथित था रोज की इन घटनाओं से ..............जब भी पेपर उठाओ सिर्फ यही पढने को मिलता और दिल दुखने लगता ...........आज के युग में भी जब ये हाल है तो कैसे हम कह सकते हैं कि देश तरक्की कर रहा है .........क्या इसी का नाम तरक्की है जहाँ अभी तक इंसानी सोच जड़ बनी हुई है ?
हैवानियत के अब ये
सिलसिले चले थे
आन के नाम पर
मिटा दिया था गुलों को
ये किस मज़हब के
बाशिंदे थे
अभी तो परवाज़ भी
भरी ना थी परिंदों ने
सैयाद ने जाल
फैला दिया था
सिर्फ नाक बचाने
की खातिर
अपनों ने ही अपनों का
लहू बहा दिया था
ये २१ वी सदी में
जीने वाले
क्यूँ रूढ़ियों की
बेड़ियों में
जकड़े खड़े थे
खुदा ने तो
ना फर्क किया
लहू एक -सा
अता फ़रमाया
फिर क्यूँ इंसान
ने ही इन्सान को
इंसानियत का
दुश्मन बनाया
कभी रिश्तों का
कभी मज़हब का
कभी जाति का
कभी खाप का
जामा पहनाया
और इज्जत की
आड़ में
मौत का वीभत्स
तांडव कराया
ज़िन्दगी दे नहीं सकते
तो ज़िदगी लेने का
हक़ किसने दिलाया
ये इंसान की सोच को
किस श्राप ने
अभिशप्त बनाया
किस श्राप ने.....................
दोस्तों,
मन बहुत व्यथित था रोज की इन घटनाओं से ..............जब भी पेपर उठाओ सिर्फ यही पढने को मिलता और दिल दुखने लगता ...........आज के युग में भी जब ये हाल है तो कैसे हम कह सकते हैं कि देश तरक्की कर रहा है .........क्या इसी का नाम तरक्की है जहाँ अभी तक इंसानी सोच जड़ बनी हुई है ?
बुधवार, 23 जून 2010
आशिकों के बीच बहस- सी छेड़ जाते थे
वो रेशमी दुपट्टा तेरा जो लहराता था
एक तूफ़ान आकर गुजर जाता था
जब हिरनी सी -कुलांचें भरती तू चलती थी
कितने आवारा बदल टकरा जाते थे
तेरी मदमाती खनखनाती सुरीली तान पर
मंदिरों में घंटियाँ घनघना जाती थीं
जब कपोलों पर गिरी लट तू सुलझाती थी
एक मदहोशी- सी जहन पर छा जाती थी
सुर्ख लबों को जब तू दाँत के नीचे दबाती थी
कितने ही दिलों की धडकनें रुक जाती थीं
सुराहीदार ग्रीवा जब नजाकत से बल खाती थी
दिलों पर सैंकड़ों बिजलियाँ- सी गिर जाती थीं
जब मदभरे चंचल नयन लजाते थे
आशिकों के बीच बहस- सी छेड़ जाते थे
जब आफताब के साथ तेरा दीदार हुआ करता था
दिल में इन्द्रधनुषी -से रंग बिखर जाते थे
एक तूफ़ान आकर गुजर जाता था
जब हिरनी सी -कुलांचें भरती तू चलती थी
कितने आवारा बदल टकरा जाते थे
तेरी मदमाती खनखनाती सुरीली तान पर
मंदिरों में घंटियाँ घनघना जाती थीं
जब कपोलों पर गिरी लट तू सुलझाती थी
एक मदहोशी- सी जहन पर छा जाती थी
सुर्ख लबों को जब तू दाँत के नीचे दबाती थी
कितने ही दिलों की धडकनें रुक जाती थीं
सुराहीदार ग्रीवा जब नजाकत से बल खाती थी
दिलों पर सैंकड़ों बिजलियाँ- सी गिर जाती थीं
जब मदभरे चंचल नयन लजाते थे
आशिकों के बीच बहस- सी छेड़ जाते थे
जब आफताब के साथ तेरा दीदार हुआ करता था
दिल में इन्द्रधनुषी -से रंग बिखर जाते थे
शनिवार, 19 जून 2010
पिता का योगदान
एक बच्चे के व्यक्तित्व के सम्पूर्ण विकास में एक पिता का योगदान माँ से किसी भी तरह कम नहीं होता.माँ तो वात्सल्य की मूर्ति होती है जहाँ अपने बच्चे के लिए प्रेम ही प्रेम होता है मगर पिता उसकी भूमिका यदि माँ से बढ़कर नहीं तो माँ से कम भी नहीं होती. ज़िन्दगी की कठिन से कठिन परिस्थिति में भी पिता अपना धैर्य नहीं खोता और उसकी यही शक्ति बच्चों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है. बच्चों के जीवन के छोटे -बड़े उतार -चढ़ावों में पिता चट्टान की तरह खड़ा हो जाता है और अपने बच्चों पर आँच भी नहीं आने देता. बेशक ऊपर से कितना भी कठोर क्यूँ ना दिखे पिता का व्यक्तित्व मगर ह्रदय में उसके जो प्यार होता है अपने बच्चों के लिए वो शायद दूसरा समझ ही नहीं सकता. बेशक ज्यादा लाड - प्यार ना जताए मगर वो भी अपने बच्चों की छोटी से छोटी ख़ुशी के लिए उसी प्रकार जी -जान लड़ा देता है जैसे माँ.बस वो अपने स्नेह का उस प्रकार प्रदर्शन नहीं कर पाता. समर्पण ,प्रेम और त्याग में पिता कहीं भी पीछे नहीं होता बस वो जता नहीं पता. माँ तो रो भी पड़ेगी मुश्किल हालात में मगर पिता वो हमेशा अन्दर ही अन्दर सिर्फ अपने आप से जूझता रहेगा मगर कहेगा नहीं वरना ममता और भावुकता में वो किसी से पीछे नहीं रहता.ना पिता में जज्बात कम होते हैं ना ही अहसास बस अपने प्यार को वो अपनी कमजोरी नहीं बनने देता और यही उसकी ताकत होती है ज़िन्दगी से लड़ने की और आगे बढ़ने की.
ज़िन्दगी का व्यावहारिक ज्ञान जिस प्रकार पिता बच्चों को दे सकता है शायद उतनी अच्छी तरह और कोई नहीं दे सकता . बच्चे के अन्दर से भय का दानव वो ही निकालता है . माँ तो फिर भी अपनी ममता के कारण बच्चे को कहीं अकेले जाने के लिए मना भी कर दे मगर पिता वो बड़ी बेफिक्री से बच्चे को प्रोत्साहित करता है जिससे बच्चे में आत्मविश्वास बढ़ता है. एक पिता अपने बच्चों को सुरक्षा की भावना प्रदान करता है. जैसे यदि माँ होती तो चाहे बेटा हो या बेटी उन्हें कोई भी वाहन चलाने पर चिंतित हो जाएगी . हाय !मेरा बच्चा ठीक- ठाक घर आ जाये या उसे चलाने से ही मना कर दे क्यूंकि हर माँ जीजाबाई जैसे ह्रदय की नहीं होती मगर माँ की जगह पिता इस कार्य को चुटकियों में और खेल -खेल में पूरा कर देता है और माँ भी उस वक्त बेकिफ्र हो जाती है जब बच्चा पिता के साये में ज़िन्दगी जीना सीख रहा होता है.
जब बच्चा मुश्किल घडी में अपने पिता को धैर्य और आत्मविश्वास के साथ हालत का मुकाबला करते देखता है तो ये भावना भी उसके दिल में घर कर जाती है और बच्चा भी अपने पिता के पदचिन्हों पर चलने के लिए प्रेरित हो जाता है . किसी भी असफलता की घडी में उसे अपने पिता की सहनशक्ति ही आगे बढ़ने को प्रोत्साहित करती है और फिर बच्चा हर कठिन से कठिन परिस्थिति का हँसते -हँसते मुकाबला करने में सक्षम हो जाता है.
एक बच्चे के समुचित विकास में लिए माँ के साए के साथ- साथ पिता का योगदान भी उतना ही आवश्यक है तभी बच्चे का सर्वांगीण विकास संभव है.
ज़िन्दगी का व्यावहारिक ज्ञान जिस प्रकार पिता बच्चों को दे सकता है शायद उतनी अच्छी तरह और कोई नहीं दे सकता . बच्चे के अन्दर से भय का दानव वो ही निकालता है . माँ तो फिर भी अपनी ममता के कारण बच्चे को कहीं अकेले जाने के लिए मना भी कर दे मगर पिता वो बड़ी बेफिक्री से बच्चे को प्रोत्साहित करता है जिससे बच्चे में आत्मविश्वास बढ़ता है. एक पिता अपने बच्चों को सुरक्षा की भावना प्रदान करता है. जैसे यदि माँ होती तो चाहे बेटा हो या बेटी उन्हें कोई भी वाहन चलाने पर चिंतित हो जाएगी . हाय !मेरा बच्चा ठीक- ठाक घर आ जाये या उसे चलाने से ही मना कर दे क्यूंकि हर माँ जीजाबाई जैसे ह्रदय की नहीं होती मगर माँ की जगह पिता इस कार्य को चुटकियों में और खेल -खेल में पूरा कर देता है और माँ भी उस वक्त बेकिफ्र हो जाती है जब बच्चा पिता के साये में ज़िन्दगी जीना सीख रहा होता है.
जब बच्चा मुश्किल घडी में अपने पिता को धैर्य और आत्मविश्वास के साथ हालत का मुकाबला करते देखता है तो ये भावना भी उसके दिल में घर कर जाती है और बच्चा भी अपने पिता के पदचिन्हों पर चलने के लिए प्रेरित हो जाता है . किसी भी असफलता की घडी में उसे अपने पिता की सहनशक्ति ही आगे बढ़ने को प्रोत्साहित करती है और फिर बच्चा हर कठिन से कठिन परिस्थिति का हँसते -हँसते मुकाबला करने में सक्षम हो जाता है.
एक बच्चे के समुचित विकास में लिए माँ के साए के साथ- साथ पिता का योगदान भी उतना ही आवश्यक है तभी बच्चे का सर्वांगीण विकास संभव है.
बुधवार, 16 जून 2010
आखिरी वसीयत
तेरी गली के
कोने पर
घर के सामने
खड़ा वो
गुलमोहर का पेड़
आरामगाह
है मेरी
बस आखिरी
आरजू
आखिरी वसीयत
है मेरी
वहीँ बिस्तर
लगा देना मेरा
कब्रगाह बनवा
देना मेरी
मुझे वहाँ
सुला देना
और चेहरा मेरा
खुला रखना
बाकी जिस्म
सारा दबा देना
बस दीदार
होता रहेगा तेरा
और रूह को
सुकून मिलता रहेगा
कोने पर
घर के सामने
खड़ा वो
गुलमोहर का पेड़
आरामगाह
है मेरी
बस आखिरी
आरजू
आखिरी वसीयत
है मेरी
वहीँ बिस्तर
लगा देना मेरा
कब्रगाह बनवा
देना मेरी
मुझे वहाँ
सुला देना
और चेहरा मेरा
खुला रखना
बाकी जिस्म
सारा दबा देना
बस दीदार
होता रहेगा तेरा
और रूह को
सुकून मिलता रहेगा
शनिवार, 12 जून 2010
इसे क्या नाम दूं?
भोर की
सुरमई
लालिमा सी
मुस्काती
थी वो
नभ में
विचरण
करते
उन्मुक्त
खगों सी
खिलखिलाती
थी वो
और सांझ के
सिंदूरी रंग के
झुरमुट में
सो जाती
थी वो
वो थी
उसकी
पावन
निश्छल
मधुर
मनभावन
मुस्कान
हाँ --एक नवजात
शिशु की
अबोध
चित्ताकर्षक
पवित्र मुस्कान
सुरमई
लालिमा सी
मुस्काती
थी वो
नभ में
विचरण
करते
उन्मुक्त
खगों सी
खिलखिलाती
थी वो
और सांझ के
सिंदूरी रंग के
झुरमुट में
सो जाती
थी वो
वो थी
उसकी
पावन
निश्छल
मधुर
मनभावन
मुस्कान
हाँ --एक नवजात
शिशु की
अबोध
चित्ताकर्षक
पवित्र मुस्कान
मंगलवार, 8 जून 2010
तुम्हें याद है वो..................
तुम्हें याद है वो
मौसम की पहली
बारिश में भीगना
और इतना भीगना
कि हाथ -पैर
और होठों का
नीला पड़ जाना
फिर ठण्ड से
ठिठुरना और
ठिठुरते -ठिठुरते
तेरे आगोश में
सिमट जाना
तुम्हें याद है वो
जेठ की तपती
धूप में
छत पर नंगे
पाँव दौड़कर
आना मेरा
आकाश से
गिरते अंगारों
की भी परवाह
ना करना
और तुझसे
मिलने की
बेचैनी में
पाँव में पड़ते
छालों का
दर्द भी
बिसरा देना
तुम्हें याद है वो
आसमान से गिरते
रूई के फाहों
पर नंगे पाँव
चलना और
सर्द हवाओं से
ठिठुरते हुए
किटकिटाते
दाँतों के साथ
आइसक्रीम
खाना और
फिर कंपकंपाते
हुए तेरी बाँहों
के घेरे में
कैद हो जाना
क्या याद है
तुम्हें वो सब मंज़र
जहाँ शोखियों
और प्यार का
खुमार था
निगाहों में बस
इंतज़ार ही
इंतज़ार था
प्रेम के वो
शोख चंचल पल
क्या अब भी
तुम्हारी यादों
में क़ैद हैं
क्या वो स्मृतियाँ
अब भी जीवंत हैं
या वक़्त की
धूल पड़ गयी है ?
मैंने कतरनों को संभाला है
देख इस आषाढ़ में
कितने गरज गरज आमंत्रित कर रहे हैं बदरा
आओ पुनः उन्हीं लम्हों को जीवंत कर लें
पल जो अधूरे छुट गए थे
फिर से जी लें
अधूरी हसरतों को शायद मुकाम मिल जाए
किसी और जन्म मिलन की हसरत को
आ इसी जन्म पूरा कर लिया जाए
कल हों न हों ......
मौसम की पहली
बारिश में भीगना
और इतना भीगना
कि हाथ -पैर
और होठों का
नीला पड़ जाना
फिर ठण्ड से
ठिठुरना और
ठिठुरते -ठिठुरते
तेरे आगोश में
सिमट जाना
तुम्हें याद है वो
जेठ की तपती
धूप में
छत पर नंगे
पाँव दौड़कर
आना मेरा
आकाश से
गिरते अंगारों
की भी परवाह
ना करना
और तुझसे
मिलने की
बेचैनी में
पाँव में पड़ते
छालों का
दर्द भी
बिसरा देना
तुम्हें याद है वो
आसमान से गिरते
रूई के फाहों
पर नंगे पाँव
चलना और
सर्द हवाओं से
ठिठुरते हुए
किटकिटाते
दाँतों के साथ
आइसक्रीम
खाना और
फिर कंपकंपाते
हुए तेरी बाँहों
के घेरे में
कैद हो जाना
क्या याद है
तुम्हें वो सब मंज़र
जहाँ शोखियों
और प्यार का
खुमार था
निगाहों में बस
इंतज़ार ही
इंतज़ार था
प्रेम के वो
शोख चंचल पल
क्या अब भी
तुम्हारी यादों
में क़ैद हैं
क्या वो स्मृतियाँ
अब भी जीवंत हैं
या वक़्त की
धूल पड़ गयी है ?
मैंने कतरनों को संभाला है
देख इस आषाढ़ में
कितने गरज गरज आमंत्रित कर रहे हैं बदरा
आओ पुनः उन्हीं लम्हों को जीवंत कर लें
पल जो अधूरे छुट गए थे
फिर से जी लें
अधूरी हसरतों को शायद मुकाम मिल जाए
किसी और जन्म मिलन की हसरत को
आ इसी जन्म पूरा कर लिया जाए
कल हों न हों ......
शुक्रवार, 4 जून 2010
एक दिन में सिमटती यादें
कहते हैं यादों का कोई मौसम नहीं होता ....... यादों की फसल हर मौसम में लहलहाती रहती है मगर ऐसा होता कहाँ है ..............ज़िन्दगी इतनी फुरसत देती ही कब है जो यादों में जिया जाये ............ बड़ी मुश्किल से कुछ गिने -चुने दिनों में यादों को समेट देती है और यादों का हर मौसम उन्ही चुनिन्दा दिनों में लहलहा उठता है ...........अपने होने का अहसास करा जाता है .
सिर्फ एक दिन यादों का बवंडर आ जाना ........ सारी की सारी यादें सिर्फ एक दिन में सिमट जाना.............ना जाने क्या होता है उस एक दिन में. .........बाकी भी तो दिन होते हैं तब हमें कुछ भी याद नहीं आता ......अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी जीते चले जाते हैं......... सुबह से ही दिनचर्या शुरू हो जाती है और रात को बिस्तर पर ख़त्म ...........मगर उस सारे दिन एक बार भी यादें दरवाज़ा नहीं खट्खटातीं.........फुरसत ही नहीं मिलती कि किसी को याद किया जाए............इतना वक़्त कब देती है ज़िन्दगी..........मगर जब आपका जन्म दिन हो , वैवाहिक वर्षगाँठ हो ,कोई आपसे बिछड़ा हो या किसी खास का आपकी ज़िन्दगी में आगमन हुआ हो या कोई हादसा हुआ हो..........उस दिन यादों की लहरें बाँध तोड़कर सैलाब सी उमड़ पड़ती हैं और हर तटबंध को तोड़ देती हैं............स्मृति की हर कुण्डी खडखडा जाती हैं ............क्या हमारा नाता यादों से सिर्फ एक दिन का होता है या फिर हम उस एक दिन में ही अपनी पूरी ज़िन्दगी जी लेते हैं ..........दिल के हर कोने से खुरच- खुरच कर यादों को निकाल लाते हैं ........हर दबी -ढकी, धुंधली याद भी उस एक दिन को महका जाती है फिर चाहे वो याद कडवी हो या मीठी, तीखी हो या कसैली मगर यादें तो सिर्फ यादें होती हैं जो उस एक दिन की शोभा बन कर उस सारे दिन पर कब्ज़ा कर लेती हैं और हम उनके साथ- साथ बहते हुए यादों की संकरी पगडंडियों से गुजरते हुए उसके हर अहसास में डूबते -उतरते यादों की वादियों में खो जाते हैं ..........उस एक दिन में हम होते हैं और हमारी यादें..........यादों के बिस्तर पर हम यादों का ही सिरहाना लगाये यादों में खोये होते हैं उनके अलावा उस दिन कुछ याद ही नहीं आता ..........ज़िन्दगी की हर चिंता उस एक दिन में ना जाने कहाँ काफूर हो जाती है ........उस एक दिन में एक ज़िन्दगी को जीना एक अलग ही अहसास होता है ............ज़िन्दगी को ज़िन्दगी से दूर अपने आगोश में समेट लेती हैं यादें और ज़िन्दगी के हर दुःख तकलीफ , हर गम ख़ुशी से दूर ले जाती हैं ..........मगर हमारी ज़िन्दगी का एक हिस्सा होती हैं यादें शायद इसीलिए यादें ही हैं जो हमें जीने की उर्जा देती हैं क्यूंकि उस एक दिन में हम ना जाने किन -किन पलों से रु-ब-रु होते हैं और अपने अन्दर एक नयी शक्ति का संचार पाते हैं क्यूंकि इन्ही यादों में हमारे जीवन की सफलता और असफलता का दर्शन होता है और फिर उन्ही से प्रेरित हो हम अगले दिन से एक नए जोश और उत्साह के साथ ज़िन्दगी की मंजिल की ओर बढ़ने लगते हैं ..........एक और यादों को मुकाम देने के लिए..............शायद इसीलिए सिर्फ एक दिन में सिमट जाती हैं यादें .
सिर्फ एक दिन यादों का बवंडर आ जाना ........ सारी की सारी यादें सिर्फ एक दिन में सिमट जाना.............ना जाने क्या होता है उस एक दिन में. .........बाकी भी तो दिन होते हैं तब हमें कुछ भी याद नहीं आता ......अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी जीते चले जाते हैं......... सुबह से ही दिनचर्या शुरू हो जाती है और रात को बिस्तर पर ख़त्म ...........मगर उस सारे दिन एक बार भी यादें दरवाज़ा नहीं खट्खटातीं.........फुरसत ही नहीं मिलती कि किसी को याद किया जाए............इतना वक़्त कब देती है ज़िन्दगी..........मगर जब आपका जन्म दिन हो , वैवाहिक वर्षगाँठ हो ,कोई आपसे बिछड़ा हो या किसी खास का आपकी ज़िन्दगी में आगमन हुआ हो या कोई हादसा हुआ हो..........उस दिन यादों की लहरें बाँध तोड़कर सैलाब सी उमड़ पड़ती हैं और हर तटबंध को तोड़ देती हैं............स्मृति की हर कुण्डी खडखडा जाती हैं ............क्या हमारा नाता यादों से सिर्फ एक दिन का होता है या फिर हम उस एक दिन में ही अपनी पूरी ज़िन्दगी जी लेते हैं ..........दिल के हर कोने से खुरच- खुरच कर यादों को निकाल लाते हैं ........हर दबी -ढकी, धुंधली याद भी उस एक दिन को महका जाती है फिर चाहे वो याद कडवी हो या मीठी, तीखी हो या कसैली मगर यादें तो सिर्फ यादें होती हैं जो उस एक दिन की शोभा बन कर उस सारे दिन पर कब्ज़ा कर लेती हैं और हम उनके साथ- साथ बहते हुए यादों की संकरी पगडंडियों से गुजरते हुए उसके हर अहसास में डूबते -उतरते यादों की वादियों में खो जाते हैं ..........उस एक दिन में हम होते हैं और हमारी यादें..........यादों के बिस्तर पर हम यादों का ही सिरहाना लगाये यादों में खोये होते हैं उनके अलावा उस दिन कुछ याद ही नहीं आता ..........ज़िन्दगी की हर चिंता उस एक दिन में ना जाने कहाँ काफूर हो जाती है ........उस एक दिन में एक ज़िन्दगी को जीना एक अलग ही अहसास होता है ............ज़िन्दगी को ज़िन्दगी से दूर अपने आगोश में समेट लेती हैं यादें और ज़िन्दगी के हर दुःख तकलीफ , हर गम ख़ुशी से दूर ले जाती हैं ..........मगर हमारी ज़िन्दगी का एक हिस्सा होती हैं यादें शायद इसीलिए यादें ही हैं जो हमें जीने की उर्जा देती हैं क्यूंकि उस एक दिन में हम ना जाने किन -किन पलों से रु-ब-रु होते हैं और अपने अन्दर एक नयी शक्ति का संचार पाते हैं क्यूंकि इन्ही यादों में हमारे जीवन की सफलता और असफलता का दर्शन होता है और फिर उन्ही से प्रेरित हो हम अगले दिन से एक नए जोश और उत्साह के साथ ज़िन्दगी की मंजिल की ओर बढ़ने लगते हैं ..........एक और यादों को मुकाम देने के लिए..............शायद इसीलिए सिर्फ एक दिन में सिमट जाती हैं यादें .
सोमवार, 31 मई 2010
यूँ आवाज़ ना दिया करो
सुनो
यूँ आवाज़ ना दिया करो
दिल की बढती धड़कन
आँखों की शोखियाँ
कपोलों पर उभरती
हया की लाली
कंपकंपाते अधर
तेरे प्यार की
चुगली कर जाते हैं
कभी ख्वाब तेरे
रातों में जगा जाते हैं
और चंदा की बेबसी से
सामना करा जाते हैं
तारे गिनते- गिनते
कटती तनहा रात
भोर की लाली से
सहम- सहम जाती है
मद्धम मद्धम बहती बयार
तेरी साँसों की
सरगोशियाँ कर जाती है
तेरी इक आवाज़ पर
मोहब्बत का हर रंग
बसंत सा खिल जाता है
बता अब कैसे
मुट्ठी में क़ैद करूँ
इस बिखरती खुशबू को
बस तुम
यूँ आवाज़ ना दिया करो
यूँ आवाज़ ना दिया करो
दिल की बढती धड़कन
आँखों की शोखियाँ
कपोलों पर उभरती
हया की लाली
कंपकंपाते अधर
तेरे प्यार की
चुगली कर जाते हैं
कभी ख्वाब तेरे
रातों में जगा जाते हैं
और चंदा की बेबसी से
सामना करा जाते हैं
तारे गिनते- गिनते
कटती तनहा रात
भोर की लाली से
सहम- सहम जाती है
मद्धम मद्धम बहती बयार
तेरी साँसों की
सरगोशियाँ कर जाती है
तेरी इक आवाज़ पर
मोहब्बत का हर रंग
बसंत सा खिल जाता है
बता अब कैसे
मुट्ठी में क़ैद करूँ
इस बिखरती खुशबू को
बस तुम
यूँ आवाज़ ना दिया करो
रविवार, 23 मई 2010
तेरे मन का मंदिर
तेरे मन की
खुली खिड़की
में झाँकता
अक्स मेरा
तेरे मनोभावों
की हर तह
को खोलता
परत- दर- परत
तेरे अहसासों
को छूता
ज्यों चाँदनी का
स्पर्श हो
तेरे मन की
हर तह में
प्रेम के अथाह
सागर की
अनगिनत
उछलती
मचलती
टकराती
और टूट कर
बिखरती
लहरों का
खामोश
रुदन
तेरे सूखे
हुए आँसुओं
की कहानी
सुनाता है
किसी परत में
दबे तेरे
असफल प्रेम
की पुकार
का करुण
क्रन्दन
तेरी आत्मा की
बेकली का
दीदार कराता है
और किसी
परत में
तेरे दर्द की
पराकाष्ठा मिली
जहाँ तूने
प्रेम की
कब्रगाह में
वो बुत बनाया
जिसकी खुशबू
के आगे
पुष्प भी
महकना छोड़ दे
जिसकी
शिल्पकारी में
शिल्पकार भी
मूर्ती गढ़ना
छोड़ दे
बुतपरस्ती
का ऐसा
मक़ाम बनाया
मुझे वहाँ
खुदा ना मिला
बस तूने
मुझे ही
खुदा बनाया
ये तेरे प्रेम
का नगर
तेरी मोहब्बत
का मंदिर बना
जहाँ आकर
मेरा अक्स भी
हार गया
और तेरे प्रेम के
बुत में समां गया
खुली खिड़की
में झाँकता
अक्स मेरा
तेरे मनोभावों
की हर तह
को खोलता
परत- दर- परत
तेरे अहसासों
को छूता
ज्यों चाँदनी का
स्पर्श हो
तेरे मन की
हर तह में
प्रेम के अथाह
सागर की
अनगिनत
उछलती
मचलती
टकराती
और टूट कर
बिखरती
लहरों का
खामोश
रुदन
तेरे सूखे
हुए आँसुओं
की कहानी
सुनाता है
किसी परत में
दबे तेरे
असफल प्रेम
की पुकार
का करुण
क्रन्दन
तेरी आत्मा की
बेकली का
दीदार कराता है
और किसी
परत में
तेरे दर्द की
पराकाष्ठा मिली
जहाँ तूने
प्रेम की
कब्रगाह में
वो बुत बनाया
जिसकी खुशबू
के आगे
पुष्प भी
महकना छोड़ दे
जिसकी
शिल्पकारी में
शिल्पकार भी
मूर्ती गढ़ना
छोड़ दे
बुतपरस्ती
का ऐसा
मक़ाम बनाया
मुझे वहाँ
खुदा ना मिला
बस तूने
मुझे ही
खुदा बनाया
ये तेरे प्रेम
का नगर
तेरी मोहब्बत
का मंदिर बना
जहाँ आकर
मेरा अक्स भी
हार गया
और तेरे प्रेम के
बुत में समां गया
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