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बुधवार, 11 अगस्त 2010

इक बार दफ़न हुई चाहतें............

जब चाहतें थीं तो
हर हसरतें फ़ना हो गयी 
अब चाहतें नहीं तो
हर हसरत जवाँ हो गयी
कल जब बुलाते थे तो
दूर छिटक जाते थे
आज बिन बुलाये 
चले आते हैं 
ये कैसे हसरतों के साये हैं 
बंद किवड़िया खडकाए हैं
खुशियों के दरवाजे
जब बंद कर दिए हमने 
तो देहरी पर 
दस्तक दिए जाते हैं
अब शाख से टूटे पत्ते को
दोबारा कैसे जोडूँ
मुरझाये फूल को
कैसे खिला  दूँ
कौन सा वो सावन लाऊँ
जो गुलशन हरा हो जाये
अरमानो की कब्र पर
कौन सा दीया जलाऊँ
जो हर अरमान एक बार
फिर जी जाए
इक बार दफ़न हुई
अरमानों की दुनिया
फिर आबाद नहीं होती
किसी भी आरजू
किसी भी हसरत की
तलबगार नहीं होती
मुर्दे कब जिंदा हुए हैं
भुने हुए बीजों से
अंकुर नहीं उगते
इसीलिए शायद
इक बार दफ़न 
हुई चाहतें
दोबारा  कफ़न 
नहीं ओढती

40 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति!

shikha varshney ने कहा…

क्या बात है ..बहुत भावपूर्ण लिखा है.

सुमन'मीत' ने कहा…

इक बार दफ़न
हुई चाहतें
दोबारा कफ़न
नहीं ओढती
कितनी गहराई है इसमें..............
वन्दना जी आपकी कलम हमेशा जज्बातों का सैलाब लेकर आती है ...............

सुमन'मीत' ने कहा…

इक बार दफ़न
हुई चाहतें
दोबारा कफ़न
नहीं ओढती
कितनी गहराई है इसमें..............
वन्दना जी आपकी कलम हमेशा जज्बातों का सैलाब लेकर आती है ...............

निर्मला कपिला ने कहा…

सही बात है एक बार चाहतें दफन हो जायें तो मुश्किल से जिन्दगी पटरी पर्5 आती है बहुत भावमय रचना है। शुभकामनायें

मनोज कुमार ने कहा…

शीर्षक से ही भावनाओं की गहराई का एह्सास होता है।

रवि कान्त शर्मा ने कहा…

मुर्दे कब जिंदा हुए हैं
भुने हुए बीजों से
अंकुर नहीं उगते
इसीलिए शायद
इक बार दफ़न
हुई चाहतें
दोबारा कफ़न
नहीं ओढती|
अति सुन्दर सात्विक भावना!

arun c roy ने कहा…

सहज शब्दों में घेरा भाव लिखती हैं आप.. जिन्दगी कि विडंबना को बहुत सहजता से लिखा है.. सुंदर कविता

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

थैंक्स गॉड!
आपका ब्लॉग खुला तो सही!
--
जब चाहतें थीं तो
हर हसरतें फ़ना हो गयी
अब चाहतें नहीं तो
हर हसरत जवाँ हो गयी
--
बहुत ही बढ़िया अभिव्यक्ति!
--
इन पंक्तियों पर तो
गीत भी रचा जा सकता है!

शोभना चौरे ने कहा…

sundar bhavabhvykti

kshama ने कहा…

Aah! Ye kya likh dala tumne!Dilpe ajeeb se saaye mandrane lage...

रचना दीक्षित ने कहा…

इक बार दफ़न
हुई चाहतें
दोबारा कफ़न
नहीं ओढती


एक खूबसूरत एहसास से परिपूर्ण सुंदर रचना और साथ ही बिम्बों का बेहतरीन प्रयोग, बहुत बधाई

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

कितनी सुंदर पर कितनी नैराश्य से भरी कविता ।

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

S.M.HABIB ने कहा…

वंदना जी, शुभप्रभात.
सुबह सुबह ऐसी भाव पूर्ण रचना पढ़ना अच्छा अनुभव है. आपको बधाई. .

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

भुने हुए बीजों से
अंकुर नहीं उगते
इसीलिए शायद
इक बार दफ़न
हुई चाहतें
दोबारा कफ़न
नहीं ओढती

बहुत गहराई लिए हुए ..अच्छी प्रस्तुति

राजेश उत्‍साही ने कहा…

जी नहीं,

चाहतें कभी दफ़न नहीं होती
चाहतें कभी रहन नहीं होतीं
चाहतें न हों आपके मन में
तो दुनिया चमन नहीं होती

बहरहाल यह कहने का मौका देने के लिए शुक्रिया।

सलीम ख़ान ने कहा…

uf khudaya

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत उम्दा और सशक्त अभिव्यक्ति.

रामराम.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

बहुत भावपूर्ण लिखा है ।

sanu shukla ने कहा…

बहुत ही उम्दा रचना ...!!

दीपक 'मशाल' ने कहा…

गज़ब के बिम्ब तराशे हैं आपने इस बार फिर से.. खुद का ही एक शेर याद आ गया कि 'चलती नब्ज़ देखकर कहने लगा हकीम.. कि चाहतें बाकी रहीं बस, जिंदगी नहीं'

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

wahwa....kya baat hai......

रानीविशाल ने कहा…

Waah! bahut sundar likha hai aapane.

'उदय' ने कहा…

...behatreen ... jabardast rachanaa ... bahut bahut badhaai !!!

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत ही भावपूर्ण रचना...

Babli ने कहा…

सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार और लाजवाब रचना लिखा है आपने! बधाई!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

gar dastaken hain to nihsandeh ankurit hongi chahten ....

JHAROKHA ने कहा…

vandana ji, bahut hi bhavpurn avam prabhav shali abhivyakti.har ek paira dil ki gahraiyo ko chhute hue nikla lagta hai.ati sundar----
poonam

JHAROKHA ने कहा…

vandana ji,
bahut hi gahanta liye bhavnatmak abhivykti.behad prashanshaniy.जब चाहतें थीं तो
हर हसरतें फ़ना हो गयी
अब चाहतें नहीं तो
हर हसरत जवाँ हो गयी
कल जब बुलाते थे तो
दूर छिटक जाते थे
आज बिन बुलाये
चले आते हैं
ये कैसे हसरतों के साये हैं
बंद किवड़िया खडकाए हैं
ek dam sahi chitran-----
poonam

दीर्घतमा ने कहा…

दफ़न हुई चादरे कभी कफ़न नहीं ओढ़ती
बहुत सुन्दर प्रस्तुति
धन्यवाद.

दीर्घतमा ने कहा…

दफ़न हुई चादरे कभी कफ़न नहीं ओढ़ती
बहुत सुन्दर प्रस्तुति
धन्यवाद.

भूतनाथ ने कहा…

ant tak aate-aate dil bhaari ho gayaa sach.....

Ashish Khandelwal ने कहा…

अच्छी लगी आपकी पंक्तियां

स्वतंत्रता दिवस की अग्रिम शुभकामनाएं

हैपी ब्लॉगिंग

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

सच में बहुत मुश्किल है दफ़न हुई चाहतो को जिन्दा करना....फिर भी मुखोटे बदलने पड़ते हैं.
बहुत भावपूर्ण रचना.

Vijay Pratap Singh Rajput ने कहा…

अति सुन्दर सात्विक भावना!
वन्दे मातरम !

धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’ ने कहा…

आपको भी स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ और एक सुन्दर रचना के लिए बधाई ख़ास कर यह पंक्ति "भुने हुए बीजों से अंकुर नहीं उगते" मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल की जा सकती है।

अशोक बजाज ने कहा…

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आपको बहुत बहुत बधाई .कृपया हम उन कारणों को न उभरने दें जो परतंत्रता के लिए ज़िम्मेदार है . जय-हिंद

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत खूब ... ये ही तो ज़माने की रीत है ... अरमान जागने पर हसरत नही रहती ... बहुत गहरी बात ...

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

dard aur sirf dard ..hasrato ne dard ki chaadar aod rakhi hai