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रविवार, 27 जून 2010

मोहब्बत के पंख कतरे पड़े थे

मोहब्बत के पंख कतरे पड़े थे
हैवानियत के अब ये 
सिलसिले चले थे
आन के नाम पर 
मिटा दिया था गुलों को
ये किस मज़हब के 
बाशिंदे थे
अभी तो परवाज़ भी 
भरी ना थी परिंदों ने
 सैयाद ने जाल 
फैला दिया था
सिर्फ नाक बचाने 
की खातिर 
अपनों ने ही अपनों का
लहू बहा दिया था
ये २१ वी सदी में 
जीने वाले 
क्यूँ रूढ़ियों की 
बेड़ियों में 
जकड़े खड़े  थे
 खुदा ने तो 
ना फर्क किया 
लहू एक -सा 
अता फ़रमाया 
फिर क्यूँ इंसान
ने ही इन्सान को
इंसानियत का
दुश्मन  बनाया
कभी रिश्तों का
कभी मज़हब का
कभी जाति का
कभी खाप का
जामा पहनाया
और इज्जत की 
आड़ में
मौत का वीभत्स
तांडव कराया
ज़िन्दगी दे नहीं सकते
तो ज़िदगी लेने का
हक़ किसने दिलाया
ये इंसान की सोच को
किस श्राप ने 
अभिशप्त बनाया
किस श्राप ने.....................


दोस्तों,
मन बहुत व्यथित था रोज की इन घटनाओं से ..............जब भी पेपर उठाओ सिर्फ यही पढने को मिलता और दिल दुखने लगता ...........आज के युग में भी जब  ये हाल है तो कैसे हम कह सकते हैं कि देश तरक्की कर रहा है .........क्या इसी का नाम तरक्की है जहाँ अभी तक इंसानी सोच जड़ बनी हुई है ?

32 टिप्‍पणियां:

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

vandana ji...
ek bahut he samvedansheel mudaa uthaaya apne, waakai mein padh ke laga ki aatm-chintan ki bahut aavshaykta hai....
sundar kalpna aur varnan....
aabhar...isey saanjha karne ke liye!

M VERMA ने कहा…

खुदा ने तो
ना फर्क किया
लहू एक -सा
अता फ़रमाया
फिर क्यूँ इंसान
ने ही इन्सान को
इंसानियत का
दुश्मन बनाया
यही तो वो प्रश्न है जो हृदयशील व्यक्ति को व्यथित करता है.
सुन्दर कविता और सार्थक प्रश्न

ज्योति सिंह ने कहा…

मोहब्बत के पंख कतरे पड़े थे
हैवानियत के अब ये
सिलसिले चले थे
आन के नाम पर
मिटा दिया था गुलों को
ये किस मज़हब के
बाशिंदे थे
अभी तो परवाज़ भी
भरी ना थी परिंदों ने
सैयाद ने जाल
फैला दिया था
सिर्फ नाक बचाने
की खातिर
अपनों ने ही अपनों का
लहू बहा दिया था
bahut gahri baate kah gayi sundar andaj me ,aap aai khushi hui ,aapki rachna padhkar aur bhi khushi hui .umda .

kshama ने कहा…

Kya kahun Vandana? Ham jitne 21 vi sadi me badhte jaate hain,utne hi pichhade jaate hain!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज के ये ऑनर किलिंग की बात पर लिखी सटीक रचना.....बधाई

चैन सिंह शेखावत ने कहा…

हमारी पूरी प्रगतिशीलता तो धता बताने वाली इन घटनाओं ने समूचे समाज को शर्मशार किया है. ऑनर किलिंग का नाम देकर इसे महिमामंडित किया जाना और भी शर्मनाक है.
आपकी कविता पूरी संवेदना के साथ इस मुद्दे को उठती है,बधाई.

rashmi ravija ने कहा…

ज़िन्दगी दे नहीं सकते
तो ज़िदगी लेने का
हक़ किसने दिलाया
बस इतनी सी बात लोगों की समझ में क्यूँ नहीं आती...बहुत अच्छी तरह इस संवेदनशील मुद्दे को शब्दों में बांधा है

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

मोहब्बत के पंख कतरे पड़े थे
हैवानियत के अब ये
सिलसिले चले थे
--
नाम मुहब्बत है इसीलिए तो दुश्मन ज़माना है!
--
इस खूबसूरत रचना के लिए बधाई!

निर्मला कपिला ने कहा…

ज़िन्दगी दे नही सकते तो जिन्दगी लेने का हक किस ने दिया। वन्दना जी जिस ने जिन्दगी देना ही नही सीखा उसे जिन्दगी की कीमत कैसे पता छलेव्गी? बहुत अच्छी रचना बधाई।

राजेश उत्‍साही ने कहा…

वंदना जी इसमें कोई शक नहीं है कि आपका मन बहुत संवेदनशील है।

राजकुमार सोनी ने कहा…

संवेदनशील लोग जब विचलित होते हैं तो इस तरह की सार्थक रचना बन ही जाती है। आपको बधाई एक बेहतर रचना के लिए।

Akshita (Pakhi) ने कहा…

बहुत सुन्दर सोच..शानदार रचना.


***************************
'पाखी की दुनिया' में इस बार 'कीचड़ फेंकने वाले ज्वालामुखी' !

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

samvedansheel mudde par utna hi samvedansheel rachna......dil ko chhuti hui.....

फिर क्यूँ इंसान
ने ही इन्सान को
इंसानियत का
दुश्मन बनाया


bahut sateek.!!

Renu Sharma ने कहा…

vandna ji ,
behad khree baat kahi hai aapne
sharm aani chahiye in darindon ko , kaise apane hi bachchon ko masal dete hain ,
maha pap hai ,
iishvar inhain kbhi maaf nahi karega .

Renu Sharma ने कहा…

vandna ji ,
behad khree baat kahi hai aapne
sharm aani chahiye in darindon ko , kaise apane hi bachchon ko masal dete hain ,
maha pap hai ,
iishvar inhain kbhi maaf nahi karega .

arvind ने कहा…

खुदा ने तो
ना फर्क किया
लहू एक -सा
अता फ़रमाया
फिर क्यूँ इंसान
ने ही इन्सान को
इंसानियत का
दुश्मन बनाया
....saarthak prashn acchi kavitaa.

हिमान्शु मोहन ने कहा…

मुहब्बत उनसे - अदावत है ज़माने भर की
प्यार का जुर्म कभी काबिले-माफ़ी न हुआ
पीके देखो सुकूँ मिल जाय तुम्हें भी शायद
ये लहू सिर्फ़ बहाना ही तो काफ़ी न हुआ

आप की बहुत ही सम्वेदनशील इस रचना के लिए बधाई, बड़ा सार्थक और चुभता हुआ सवाल उठाया है आपने जो इधर हुई घटनाओं के मद्देनज़र बहुत मौजूँ भी है और आपकी कविताऽपने में माकूल भी।

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

ज़िन्दगी दे नहीं सकते
तो ज़िदगी लेने का
हक़ किसने दिलाया
ये इंसान की सोच को
किस श्राप ने
अभिशप्त बनाया
किस श्राप ने.....................

सही बहुत खूब ..बहुत सुन्दर ..सच्ची पंक्तियाँ

hem pandey ने कहा…

इस मजहब का नाम हैवानियत है.

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

ज़िन्दगी दे नहीं सकते
तो लेने का हक़ किसने दिलाया .....

वंदना जी ....यह बात सबकी समझ में आ जाये तो शांति न हो जाये .....!!

महफूज़ अली ने कहा…

आजकल कुछ व्यस्तता ज़्यादा है.... फिर भि कोशिश पूरी रहती है..... आपके ब्लॉग को पढने की....आज के ये ऑनर किलिंग की बात पर लिखी सटीक रचना..... अच्छी लगी....

sanu shukla ने कहा…

संवेदनशील रचना...!!

आचार्य जी ने कहा…

सुन्दर लेखन।

raj ने कहा…

वन्दना जी, आपने खूबसूरत अंदाज में समाज की समस्या को उठाया है। बधाई!

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) ने कहा…

समाज में हो रहे हर उतार चढाव पर आप की नजर रहती है ,,,, और आप उसे ह्रदय से अनुभव कर जो शब्द देती है ,,,, अदभुद है
अभी तो परवाज़ भी
भरी ना थी परिंदों ने
सैयाद ने जाल
फैला दिया था
सिर्फ नाक बचाने
की खातिर
अपनों ने ही अपनों का
लहू बहा दिया था
saadar
praveen pathik
9971969084

Virendra Singh Chauhan ने कहा…

Jo bhi aapne likha hai bilkul sahi hai. owner killing ko kisi bhi surat men zayaj nahi tharaya ja sakta hai.
Apne bade mahatavpurn mudde per ek
shaandaar kavita likhi hai. Iske liye Dhanybaad.

राकेश कुमार ने कहा…

सचमुच आपकी कविता जितनी प्रासन्गिक है उतनी है, समाज की विद्रुपताओ और नग्न चेहरे को उजागर करती है, आज समाज का हर व्यक्ति दोहरे चरित्र के साथ जी रहा है, हम अपनी तथाकथित आधुनिक सोच को जिसे समाज के सम्मुख रखते है वह तो एकान्गी चेहरा मात्र है, असल चेहरा तो हम कभी प्रदर्शित ही नही करते.कोई भी माता पिता इस वास्तविकता को स्वीकार ही नही पाया है कि पूर्व वैदिक काल का समाज जाति विहीन समाज था, कई स्थानो पर इसका वर्णन मिलता है, एक स्थान पर एक व्यक्ति कहता है कि मै एक सुनार हू, मेरे पिता लुहार थे और मेरी मा कुम्हार थी, इस व्यवसाय के जिस आधार को हमारे पूर्वजो ने त्रुटिवश जाति प्रथा के रूप मे स्वीकार कर लिया, वह अवगुण हमारी सामाजिक व्यवस्था के साथ ऐसे चिपक गयी कि लाख प्रयत्न के बाद भी इससे हम मुक्त नही हो पा रहे.मुझे इस सन्दर्भ मे समाजशास्त्री डा. शर्मा का वह कथन अनायास याद हो आता है, उन्होने कहा था "जाति प्रथा मे एक प्रकार की अनुकूलन की क्षमता पायी जाती है, यह समय के साथ अपने स्वरूप को परिवर्तित कर स्वयम को व्यवस्था के साथ अनुकूलित कर लेती है, और यह भारत से कभी समाप्त नही हो सकती." वैसे इसे हवा देने मे हमारी राजनीतिक प्रणाली और राजनेताओ की स्वार्थपरक भूमिका कम नही है , यदि इन्हे वोटो की राजनीति ना करनी होती तो जाति आधारित जनगणना का प्रश्न ही पैदा नही होता था, बस यू समझ लीजीये इस कुप्रथा से उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामो को हम आने वाले कई सालो तक भोगते रहेन्गे और हम कवियो की कलम अपनी भावनाओ को व्यक्त करने के लिये इसी तरह चलती रहेगी.

Apanatva ने कहा…

isee mudde ko le maine kruty likhee........
kam samaj kee soch badlegee.?samaj...?
par ye to humse hee hai hum sabhee to ikaaee hai hum sabhee ko milkar kadam uthana hoga tabhee soch badlegee .

girish pankaj ने कहा…

maarmik kavitaa. lekhak hi hai jo apne samay se samvaad karata hai.

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

फिर क्यूँ इंसान
ने ही इन्सान को
इंसानियत का
दुश्मन बनाय………शानदार रचना।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सड़ी गली मान्यताओं पर कड़ा प्रहार करती आपकी रचना बहुत मार्मिक है .... बधाई हो इस रचना के लिए ...

MY HEART ने कहा…

आप की रचना बहुत सुन्दर है "जिंदिगी दे नहीं सकते तो जिंदिगी लेने का हक़ किसने दिया"बहुत सुन्दर आप यू ही लिखते रहे ताकी समाज को कुछ सिखने को मिले .मेरे रचना "तुम्हारी परछाई" और "आ भी जाओ अब" कैसा लगा लिखागे .