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शनिवार, 21 अगस्त 2010

एक सफ़र ऐसा भी………………………

भार्या से 
प्रेयसी बनने की 
संपूर्ण चेष्टाओं
को धूल- धूसरित 
करती तुम्हारी
हर चेष्टा जैसे
आंदोलित कर देती
मन को और 
फिर एक बार 
नए जोश से 
मन फिर ढूँढता
नए -नए आयाम
प्रेयसी के भेदों
को टटोलता
खोजता
हर बार 
एक नाकाम -सी
कोशिश करता
और फिर धूमिल 
पड़ जाती आशाओं 
में , अपने नेह 
का सावन भरता
मगर कभी 
ना समझ पाता
एक छोटा सा सच
प्रेयसी को भार्या
बनाया जा सकता है
मगर
भार्या कभी प्रेयसी
नहीं बनाई जाती
उस पर तो
अधिकारों का बोझ
लादा जाता है
मनुहारों से नहीं
उपजाई जाती
इक अपनी 
जायदाद सम
प्रयोग में 
लाया जाता है
माणिकों सी 
सहेजी नहीं जाती
हकीकत के धरातल
पर बैठाई जताई है
ख्वाबों में नहीं
सजाई  जाती
 संस्कारों की वेणी
गुँथवाई जाती है
उसकी वेणी में पुष्प
नहीं सजाये जाते
अरमानो की तपती 
आग मे झुलसायी
जाती है
सपनो के हार नहीं
पहनाये जाते
शब्दों के व्यंग्य 
बाणों से बींधी जाती है
ग़ज़लों की चाशनी में
नहीं डुबाई जाती 
आस्था की बलि वेदी पर
मिटाई जाती है
मगर प्रेम की मूरत बना
पूजी नहीं जाती
बस इतना सा फर्क 
ना समझ पाता है
ये मन
क्यूँ भाग- भाग
जाता है
और इतना ना
समझ पाता है
प्रेयसी बनने की आग में
जलती भार्या का सफ़र
सिर्फ भार्या पर ही सिमट 
जाता है 
सिर्फ भार्या पर ही.................

69 टिप्‍पणियां:

राकेश कुमार ने कहा…

हमारे समाज का एक कडवा सच,और इस कडवे सच को अत्यन्त बेबाकी से प्रस्तुत करती यह कविता स्त्री पुरुष के बीच के सम्बन्धो की कई विसन्गतियो को रेखान्कित करती है.सचमुच एक स्त्री के प्रति पुरूष का दोहरा मापदण्ड उसे रह-रहकर इस बात के लिये आन्दोलित करता होगा कि उसमे, उसके त्याग, नि:स्वार्थ प्रेम , तपस्या और समर्पण मे ऐसी कौन सी कमी रह गयी जो उसे उस मृगमरीचिका की ओर आकृष्ट कर उसे अन्तत: पतन की ओर उन्मुख करने पर आमादा हो जाती है, कविता शायद समाज से यह प्रश्न पूछने का प्रयत्न करती प्रतीत होती है कि पुरूष आखिर इतना अहसान फरामोस क्यो हो जाता है? यही नही एक प्रेयसी भी जब पत्नी बन जाती है तो वह भी एकपुरूष के लियेचन्द दिनो मे उबाऊ क्यो हो जाती है, जबकि एक स्त्री अपने सन्सकारो मे बन्धी जीवन पर्यन्त अपनी भूमिका का बखूबी निर्वाह करती है.आखिर प्रेयसी से पत्नी बनने के बीच उसमे ऐसा कौन सा परिवर्तन हो गया कि वह जन्नत की परी से एक अधिकार विहीन अबला नारी बन कर रह गयी, वे आन्सू जो कभी मोती बनकर शब्दो के स्वरूप मे पन्क्तियो मे उकेरे जाते थे वे अनायास ठहर से गये और अब तो जैसे ये सब उस पुरूष के लिये मूल्यविहीन हो गये जो कभी उसकी जरा सी पीडा पर नसो मे वेदना बनकर उभर जाती जाती थी या यू कहे जैसे घडी की सुईया अचानक रूक सी जाती थी.

सचमुच लाजवाब कविता मै इस पर समीक्षा लिखून्गा

rashmi ravija ने कहा…

गहन वेदना है इन पंक्तियों में.....और सच्चाई भी.....भावपूर्ण अभिव्यक्ति

rashmi ravija ने कहा…

गहन वेदना है इन पंक्तियों में.....और सच्चाई भी.....भावपूर्ण अभिव्यक्ति

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

गजब की रचना। सवालों को उठाए हुए। इतेफाक है ये है कि मैं कल यही सोच रहा था। खैर एक अच्छी रचना,सुन्दर शब्दों से गढी हुई। पर सवाल अभी भी बना हुआ है कि ऐसा क्यों है। राकेश जी ने कुछ प्रकाश डाला है। पर हम ज्यादा कुछ कहने की स्थिती में नहीं। बस पढकर दिमाग में सवाल घूम रहे है। और अच्छी रचना वही है जो पाठक के दिमाग को झकझकोर कर रख दें।

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

vandana ji
namaskar
main kya kahun kavita padhkar awaak rah gaya hoon .
ye kavita nahi ek aisi sacchayi hai , jo hamaare samaj me chahe wo india ho ya koi aur desh , har jagah me mauzood hai ..

main jyaada kuch kahne ki stithi me nahi hoon ..

bas ye kahunga ki ye aapki sabse acchi kavita hai

aapki lekhni ko pranaam

aapka

vijay

Aparajita ने कहा…

bahut khub........ har aurat ke dard ko bakhubi vyak kia ....RAKESH JI NE sab kuch kah diya....mai unse sahmat hu ....

aansu bhar aaye ankho main....kuch likha or kaha nahi ja raha mujhse....

badhayee vandana sundar prastuti ke liye...
mai shant man se is rachna par ek bar fir kuch jarur likhungi....

tum sach much lajawab ho........

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

प्रेयसी बनने की आग में
जलती भार्या का सफ़र
सिर्फ भार्या पर ही सिमट
जाता है
सिर्फ भार्या पर ही.............
--
प्रेयसी तो भार्या बन सकती है
मगर भार्या प्रेयसी नही बन सकती!
--
यदि ऐसा सम्भव हो जाए तो
सारे विवाद ही खत्म हो जाये!

mahendra srivastava ने कहा…

प्रेयसी बनने की आग में,
जलती भार्या का सफर।
सिर्फ भार्या पर ही सिमट
जाता है
सिर्फ भार्या पर ही सिमट....
वाकई समाज के एक पक्ष को आपने बहुत ही साफ सुथरे तथा पूरी गंभीरता से सामने रखा है। मुझे उम्मीद है कि लोग इस बारे में गंभीर चिंतन करेंगे।
वंदना जी बहुत बहुत शुभकामनाएं

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) ने कहा…

bhut behtreen abhivyakti

इमरान अंसारी ने कहा…

बहुत खूब वंदना जी ......बहुत ही सुन्दर विचार .....एक बात कहूँगा ..प्रेमचंद जी के शब्दों में " सुभार्या स्वर्ग की सबसे बड़ी विभूति है "....इन कुछ शब्दों में ही प्रेमचंद जी ने सब कुछ कह दिया .....

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मनोज कुमार ने कहा…

वंदना जी!
सलाम!
आंख खोलती रचना।
यह कविता उस पूरी जाति के हालात पर चिंता करने को प्रेरित करती है। एक नारी द्वारा रचित नारी विषयक इस कविता में सीधे साधे सच्‍चे शब्‍दों में स्‍वानुभूति की बेहद ईमानदारी से अभिव्‍यक्‍त किया गया है। इसमें सदियों से मौजूद स्‍त्री विषयक प्रश्‍न ईमानदारी से उठाया गया हैं। अपनी शिकायत दर्ज कराई गई है। स्‍त्री नियति की परतों को उद्घाटित किया गया है।
यह कविता स्त्रियों के जीवन संघर्ष से हमारा सीधा और सच्‍चा साक्षात्‍कार करवाता है जो इस उम्‍मीद से अपने जीवन को संवारने की कोशिश करती रहती है कि एक दिन उनकी दुनिया संवार जाएगी ।

shikha varshney ने कहा…

गहरी सोच के साथ भावपूर्ण अभिव्यक्ति .

Mithilesh dubey ने कहा…

भार्या से
प्रेयसी बनने की
संपूर्ण चेष्टाओं
को धूल- धूसरित
करती तुम्हारी
हर चेष्टा जैसे
आंदोलित कर देती
मन को और
फिर एक बार
नए जोश से
मन फिर ढूँढता
नए -नए आयाम

हा शायद यही तो फर्क होता है, शायद यही एक मात्र अन्तर होता है प्रयसी और भार्या के बीच । हाँ यही तो होता है , ऐसा प्रयसी के साथ हो तो वह कभी मुड के भी नही देखती, लेकिन भार्या सब कुछ भुलकर नयी शुरुआत करती है हर रोज ही ।

ना समझ पाता
एक छोटा सा सच
प्रेयसी को भार्या
बनाया जा सकता है
मगर
भार्या कभी प्रेयसी
नहीं बनाई जाती
उस पर तो
अधिकारों का बोझ
लादा जाता है
ओह क्या कहूँ कितना दर्द भरी लाईन है । लेकिन मै यहां थोडा सा असहमत हूँ, हाँ ये है तो दर्दनाक मगर हम मात्र खुद को प्रेयसी ना समं पाये या गलतफहमी रहें क्योकि हमरे ऊपर जिम्मदेदारी का बोझ हैृ ये गलत होगा, क्योंकि भार्या का स्थान कभी प्रेयसी ले ही नहीं सकती, तब जाहिर सी बात है अधिकार बढ ही जायेगा ।

ये मन
क्यूँ भाग- भाग
जाता है
और इतना ना
समझ पाता है
प्रेयसी बनने की आग में
जलती भार्या का सफ़र
सिर्फ भार्या पर ही सिमट
जाता है
सिर्फ भार्या पर ही........

इन लाईनों ने तो सारे दर्द को समेट लिया है , सच मे ये पंक्ति दिल को छू गयी ।

सपनो के हार नहीं
पहनाये जाते
शब्दों के व्यंग्य
बाणों से बींधी जाती है
ग़ज़लों की चाशनी में
नहीं डुबाई जाती
आस्था की बलि वेदी पर
मिटाई जाती है
मगर प्रेम की मूरत बना
पूजी नहीं जाती


ऐसा जो करते है वह मेरी नजर मे मनासिक रुप से विक्षीप्त होते हैं । भार्या की जगह तो हमेशा दिल मे होती है पता नहीं लोग एसा कैसे कर लेते हैं। होना ये चाहिए कि शबदो के बाण नहीं शब्दो की मिठास मिलनी चाहिए, प्रेम की मूरत बनाने की क्या जरुरत है उसकी सुरत तो दिल मे होनी चाहिए । रचना दिल को छू लेने वाली लगी ।

महफूज़ अली ने कहा…

निःशब्द कर दिया आपने तो....

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

भार्या और प्रेयसी में अंतर स्पष्ट करती समाज का एक कडवा सच ...बेहतरीन रचना अभिव्यक्ति.....आभार

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

samaj ke ek kadwe sach ko kaise kavita me samahit kiya ja sakta hai, ye isko padhko kar pata chlata hai........
bahut shandaar abhivyakti....

रश्मि प्रभा... ने कहा…

ek katu satya .... bariki se likha hai...........
bahut hi badhiyaa

रश्मि प्रभा... ने कहा…

ek katu satya .... bariki se likha hai...........
bahut hi badhiyaa

Kusum Thakur ने कहा…

बहुत सुन्दर और सच्चाई पूर्ण अभिव्यक्ति !!

Shah Nawaz ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन रचना...... बहुत खूब!

arun c roy ने कहा…

वंदना जी बहुत ही गंभीर कविता आज प्रस्तुत कर दी ! बहुत से लोगों ने काफी अच्छी टिप्पणी कर दी है, इसके इतर कुछ भी कहना अब मेरे लिए संभव नहीं दीखता.. भार्या को प्रेयसी बनाया जा सकता है बस मानसिकता बदलने कि आवश्यकता है.. बहुत से बदलाव हुए हैं समाज में .. प्रेम के रूप और स्वरुप में बदलाव आये हैं.. ऐसे में भार्या में प्रेयसी को देखना संभव भी हो सकता है.. ए़क मनोवैज्ञानिक धरातल पर जाकर आपने कविता प्रस्तुत की है..

Coral ने कहा…

प्रेयसी बनने की आग में
जलती भार्या का सफ़र
सिर्फ भार्या पर ही सिमट
जाता है ...

मार्मिक रचना !

sudhir ने कहा…

वंदना जी ...मेरे लिए कविता सिर्फ सच बयां करने का एक अनूठा माध्यम है ...इसी सन्दर्भ में मेरा कमेन्ट भी होगा ..बहुत बढ़िया लिखा है ...खूबसूरत भाव , और अगर सच है तो इससे अद्भुत कुछ नहीं लिखा जा सकता !!!

डॉ टी एस दराल ने कहा…

इक चादर मैली सी --याद आ गई। समाज की कुछ रीति रिवाजें सोच समझ कर बनाई गई थी । लेकिन वर्तमान परिवेश में उनका कोई महत्त्व नहीं रहा ।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बात सच है, गहरी है और कड़वी है। उत्कृष्ट रचना।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बेहद सटीक और मार्मिक, शुभकामनाएं.

रामराम.

अरुणेश मिश्र ने कहा…

वन्दना जी !
सम्बन्धो का सूक्ष्म संयोजन ।
प्रशंसनीय ।

अरुणेश मिश्र ने कहा…

वन्दना जी !
सम्बन्धो का सूक्ष्म संयोजन ।
प्रशंसनीय ।

JHAROKHA ने कहा…

vandana ji ,
aapki post ke liye soch nahi pa rahi hun ki koun sa shbd likhun.har ek panktiyan ythathata liye hue avam apne prabhav ko daalne me ekdam paripurnata se bhari haui hain.sateek bhavpurn behad hi sundar abhivyakti.
poonam

kshama ने कहा…

Haan Vandana! Yahi sach hai! Tumahare har lafz me ek apariharyta liye simat aayaa hai..

राजेश उत्‍साही ने कहा…

वंदना जी, हर बार की तरह मेरे विचार इस कविता पर भी औरों से कुछ अलग ही हैं।
यह बात सब जानते हैं कि हमारे समाज में स्त्रियों की स्थिति बेहतर नहीं है। तो‍ फिर बार बार उसी बात को रेखांकित करने का क्‍या फायदा। मुश्किल यह भी होती है कि कविता पर टिप्‍पणी करने वाले 99 प्रतिशत लोग भी उस हां में हां मिलाते हैं। यानी बात जहां की तहां ही रह जाती है। क्‍या आप को एक स्‍त्री होने के नाते ऐसी बातों से कोई ऊर्जा मिलती है।

दूसरी बात हम स्‍त्री को या तो पैरों में रखना चाहते हैं या फिर सिर पर । बीच की तो कोई स्थिति शायद सोचते ही नहीं। वह कौन सोचेगा। अगर आपके हाथ में एक कलम है तो आपका उसका उपयोग क्‍यों नहीं स्त्रियों की स्थिति सुधारने के लिए कर रही हैं। केवल समस्‍या की तरफ ध्‍यान खींचने वाले बहुत हैं,समाधान की ओर ले जाने वाले बहुत कम। आप समाधान की ओर ले जानी वाली बनें ना।
तीसरी बात प्रस्‍तुत कविता की करते हैं।
अगर एक पत्‍नी प्रेयसी नहीं है तो वह पत्‍नी भी नहीं हो सकती। ठीक उसी तरह एक पति अगर प्रेमी नहीं है तो वह पति भी नहीं हो सकता। सवाल यह महसूस करने का है। प्रेयसी से जो एक पुरुष को मिलता है,वही पत्‍नी भी उसे देती है। केवल यहां फर्क यही है न कि वह एक साम‍ाजिक रिश्‍ते में तब्‍दील होकर मिल रहा है। जबकि प्रेयसी एक अनौपचारिक रिश्‍ता है। हमारा सामाजिक ढांचा जिस तरह का है उसमें अनौपचारिक रिश्‍तों में कर्तव्‍य ताक पर रखा होता है। जबकि औपचारिक रिश्‍तों में कर्तव्‍य बिलकुल सामने खड़ा होता है। बस यही बुनियादी फर्क है। और हम सब जानते हैं कि कर्तव्‍य के साथ अधिकार भी जुड़ जाते हैं। एक पत्‍नी को जो पति से प्राप्‍त करना है या एक पति को पत्‍नी से जो प्राप्‍त करना है वह इन कर्तव्‍य और अधिकार के दायरे में आ जाता है।
इसलिए मेरा मानना है कि यह बहस बेमानी है कि पत्‍नी प्रेयसी क्‍यों नहीं हो सकती । सच तो यह है कि बिना प्रेयसी हुए कोई स्‍त्री सचमुच पत्‍नी हो ही नहीं सकती। यह बात पुरुष पर भी लागू होती है।

चौथी बात प्रेम एक ऐसा अहसास है जो आप टुकड़ों में महसूस करते हैं। जरूरी नहीं है कि वह आप किसी एक ही व्‍यक्ति में सारा का सारा पा लें। उसकी तलाश जीवन भर चलती रहती है।

राजेश उत्‍साही ने कहा…

वंदना जी, हर बार की तरह मेरे विचार इस कविता पर भी औरों से कुछ अलग ही हैं।
यह बात सब जानते हैं कि हमारे समाज में स्त्रियों की स्थिति बेहतर नहीं है। तो‍ फिर बार बार उसी बात को रेखांकित करने का क्‍या फायदा। मुश्किल यह भी होती है कि कविता पर टिप्‍पणी करने वाले 99 प्रतिशत लोग भी उस हां में हां मिलाते हैं। यानी बात जहां की तहां ही रह जाती है। क्‍या आप को एक स्‍त्री होने के नाते ऐसी बातों से कोई ऊर्जा मिलती है।

दूसरी बात हम स्‍त्री को या तो पैरों में रखना चाहते हैं या फिर सिर पर । बीच की तो कोई स्थिति शायद सोचते ही नहीं। वह कौन सोचेगा। अगर आपके हाथ में एक कलम है तो आपका उसका उपयोग क्‍यों नहीं स्त्रियों की स्थिति सुधारने के लिए कर रही हैं। केवल समस्‍या की तरफ ध्‍यान खींचने वाले बहुत हैं,समाधान की ओर ले जाने वाले बहुत कम। आप समाधान की ओर ले जानी वाली बनें ना।
तीसरी बात प्रस्‍तुत कविता की करते हैं।
अगर एक पत्‍नी प्रेयसी नहीं है तो वह पत्‍नी भी नहीं हो सकती। ठीक उसी तरह एक पति अगर प्रेमी नहीं है तो वह पति भी नहीं हो सकता। सवाल यह महसूस करने का है। प्रेयसी से जो एक पुरुष को मिलता है,वही पत्‍नी भी उसे देती है। केवल यहां फर्क यही है न कि वह एक साम‍ाजिक रिश्‍ते में तब्‍दील होकर मिल रहा है। जबकि प्रेयसी एक अनौपचारिक रिश्‍ता है। हमारा सामाजिक ढांचा जिस तरह का है उसमें अनौपचारिक रिश्‍तों में कर्तव्‍य ताक पर रखा होता है। जबकि औपचारिक रिश्‍तों में कर्तव्‍य बिलकुल सामने खड़ा होता है। बस यही बुनियादी फर्क है। और हम सब जानते हैं कि कर्तव्‍य के साथ अधिकार भी जुड़ जाते हैं। एक पत्‍नी को जो पति से प्राप्‍त करना है या एक पति को पत्‍नी से जो प्राप्‍त करना है वह इन कर्तव्‍य और अधिकार के दायरे में आ जाता है।
इसलिए मेरा मानना है कि यह बहस बेमानी है कि पत्‍नी प्रेयसी क्‍यों नहीं हो सकती । सच तो यह है कि बिना प्रेयसी हुए कोई स्‍त्री सचमुच पत्‍नी हो ही नहीं सकती। यह बात पुरुष पर भी लागू होती है।

चौथी बात प्रेम एक ऐसा अहसास है जो आप टुकड़ों में महसूस करते हैं। जरूरी नहीं है कि वह आप किसी एक ही व्‍यक्ति में सारा का सारा पा लें। उसकी तलाश जीवन भर चलती रहती है।

राजेश उत्‍साही ने कहा…

वंदना जी, हर बार की तरह मेरे विचार इस कविता पर भी औरों से कुछ अलग ही हैं।
यह बात सब जानते हैं कि हमारे समाज में स्त्रियों की स्थिति बेहतर नहीं है। तो‍ फिर बार बार उसी बात को रेखांकित करने का क्‍या फायदा। मुश्किल यह भी होती है कि कविता पर टिप्‍पणी करने वाले 99 प्रतिशत लोग भी उस हां में हां मिलाते हैं। यानी बात जहां की तहां ही रह जाती है। क्‍या आप को एक स्‍त्री होने के नाते ऐसी बातों से कोई ऊर्जा मिलती है।

दूसरी बात हम स्‍त्री को या तो पैरों में रखना चाहते हैं या फिर सिर पर । बीच की तो कोई स्थिति शायद सोचते ही नहीं। वह कौन सोचेगा। अगर आपके हाथ में एक कलम है तो आपका उसका उपयोग क्‍यों नहीं स्त्रियों की स्थिति सुधारने के लिए कर रही हैं। केवल समस्‍या की तरफ ध्‍यान खींचने वाले बहुत हैं,समाधान की ओर ले जाने वाले बहुत कम। आप समाधान की ओर ले जानी वाली बनें ना।
तीसरी बात प्रस्‍तुत कविता की करते हैं।
अगर एक पत्‍नी प्रेयसी नहीं है तो वह पत्‍नी भी नहीं हो सकती। ठीक उसी तरह एक पति अगर प्रेमी नहीं है तो वह पति भी नहीं हो सकता। सवाल यह महसूस करने का है। प्रेयसी से जो एक पुरुष को मिलता है,वही पत्‍नी भी उसे देती है। केवल यहां फर्क यही है न कि वह एक साम‍ाजिक रिश्‍ते में तब्‍दील होकर मिल रहा है। जबकि प्रेयसी एक अनौपचारिक रिश्‍ता है। हमारा सामाजिक ढांचा जिस तरह का है उसमें अनौपचारिक रिश्‍तों में कर्तव्‍य ताक पर रखा होता है। जबकि औपचारिक रिश्‍तों में कर्तव्‍य बिलकुल सामने खड़ा होता है। बस यही बुनियादी फर्क है। और हम सब जानते हैं कि कर्तव्‍य के साथ अधिकार भी जुड़ जाते हैं। एक पत्‍नी को जो पति से प्राप्‍त करना है या एक पति को पत्‍नी से जो प्राप्‍त करना है वह इन कर्तव्‍य और अधिकार के दायरे में आ जाता है।
इसलिए मेरा मानना है कि यह बहस बेमानी है कि पत्‍नी प्रेयसी क्‍यों नहीं हो सकती । सच तो यह है कि बिना प्रेयसी हुए कोई स्‍त्री सचमुच पत्‍नी हो ही नहीं सकती। यह बात पुरुष पर भी लागू होती है।

चौथी बात प्रेम एक ऐसा अहसास है जो आप टुकड़ों में महसूस करते हैं। जरूरी नहीं है कि वह आप किसी एक ही व्‍यक्ति में सारा का सारा पा लें। उसकी तलाश जीवन भर चलती रहती है।

राजेश उत्‍साही ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
अजय कुमार ने कहा…

आमतौर पर यही है

सुमन'मीत' ने कहा…

वन्दना जी .....नारी के इस पहलू को बखूबी उकेरा है आपने शब्दों में....

Deepak Shukla ने कहा…

Hi..

Preyasi ki duniya seemit hai
Patni hai anant aseemit..
Kyon wo Preyasi banana chahe..
Kyon wo rahe vyarth digbramit..

Jo Priy-si hoti priyatam ki..
Wo Patni kahlaati hai..
Jo Preyasi hoti priyatam ki..
Preyasi hi rah jaati hai..

Sundar kavita..

Deepak..

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत बड़ा और कड़वा सच है ये वंदना जी.

boletobindas ने कहा…

एक साथ अनेक प्रश्न उठा दिए हैं आपने। यही वो बात है जिसके चक्कर में आज का आदमी घनचक्कर बना हुआ है। औऱत भी नए रुप में ढलने की कोशिश में कहीं की नहीं रह पा रही। दोनो ही दौड़ रहे हैं वहां जहां सिर्फ क्षितिज है...

शहरोज़ ने कहा…

हिलाकर रख देती है यह कविता!! सच कटु होता है लेकिन हमें अवश्य ही अपने गरीबां में झांकना चाहिये.

क्या बात है!! बहुत खूब!!

माओवादी ममता पर तीखा बखान ज़रूर पढ़ें:
http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html

Asha ने कहा…

"प्रेयसी तो भार्या हो सकती है,पर भार्या प्रेयसी नहीं हो सकती " बहुत गहन विचार है | एक सशक्त रचना |
बधाई
आशा

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

सारगर्भित अच्छी रचना, वन्दना जी !

राजभाषा हिंदी ने कहा…

काफ़ी अर्थपूर्ण रचना।

*** राष्ट्र की एकता को यदि बनाकर रखा जा सकता है तो उसका माध्यम हिन्दी ही हो सकती है।

M VERMA ने कहा…

प्रेयसी को भार्या
बनाया जा सकता है
मगर
भार्या कभी प्रेयसी
नहीं बनाई जाती

यह एक कड़्वा सच है ..
एहसास की बेहतरीन दास्तान .

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत गहराई से किया गया विश्लेषण ...एक कटु सत्य को बताता हुआ ...भार्या पर केवल जिम्मेदारियों का भार ही होता है ...

शहरयार ने कहा…

अच्छी कविता लिखी है अपने

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

सबसे पहिले माफ़ी वंदना जी कि कैसे हम आपके दर तक नहीं पहुँच पाए.. खैर जाने दीजिए नोकसान भी त हमरे हुआ कि एतना अच्छा कविता से हम बंचित रहे... कबिता लिखना त हमरे बस का बात नहीं है लेकिन अच्छा कबिता समझ में आता है..ई कबिता का त एतना लोग एतना गहरा समीक्षा कर दिए हैं कि हमरे लिए कुछ कहने को नहीं रहा.. बस एही कहेंगे कि एक बार उन लोगों के ओर भी देखिए जो परिपाटी से अलग भी हैं अऊर उनको देखना सुखद भी है..हमरी अर्द्धांगिनि, जिनको हम पूर्णांगिनि कहते हैं, हमरी प्रेयसि भी हैं... आपका रचना बहुत गहरा (सम)बेदना लिए है!!

Rajendra Swarnkar ने कहा…

वंदना जी

प्रणाम !

वाकई नारी का मन इतना ही कोमल , संवेदनशील और भावुक होता है , जैसा आपकी रचना में नज़र आ रहा है ।

नारी पुरुष के जीवन में व्याप्त घर , समाज , कारोबार आदि की समस्याओं , बाधाओं को समझ कर स्नेह सहयोग बनाए रखे तो स्वतः ही प्रेयसी से सौ गुना दर्ज़ा पा लेती है ।

निस्संदेह , भार्या प्रेयसी से अधिक ऊंचा स्थान ही रखती है ।
प्रेयसी होने का अर्थ बहुधा एक छद्म - संबंध भी होता है , जबकि भार्या जीवनसंगिनी के रूप में पुरुष के हर सुख के साथ उसके हर दुःख की भी सहभागी होने के कारण प्रेयसी की अपेक्षा पुरुष के हृदय में बहुत ऊंचे आसन पर बिराजमान रहती है ।

हां , पुरुष अक्सर इसका प्रदर्शन नहीं कर पाता , क्योंकि नारी दे्ह का आकर्षण , सहज उपलब्धि के कारण उसे भार्या के सम्मुख विवश तथा लाचार नहीं बनाता ।
जबकि प्रेयसी पुरुष को इसी मृगतृष्णा में भटकाए रखते हुए ही स्वकीर्ति और स्वार्थसिद्धि के उपक्रम करती है ।


पुरुष के नज़रिये से भी एक बार सोचें तो पुरुष जाति पर उपकार होगा ।

शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार

sky-blue freak :D ने कहा…

बेहतरीन रचना..
एक कडवा सच....

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आपकी रचना में बहुत वेदना छिपी है ... पुरुष प्रधान समाज में ऐसे हालातों को आम देखा जा सकता है .... ये विडंबना ही है ... वो स्त्री प्रेयसी हो सकती है वो भार्या बन के कहीं ज़्यादा प्रेयसी बन जाती है ... बस समझने की बात है ...

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

गहन विश्लेषण कर मन रूपी सागर का मंथन कर जो मोती आपने निकाले हैं अत्यंत खूबसूरत, कड़वी सच्चाई से लिपटे हुए हैं.

आपकी महनत झलक रही है इसमें.

बधाई इस सशक्त रचना के लिए.

Akanksha~आकांक्षा ने कहा…

दिल की गहराइयों से लिखी एक सशक्त कविता...बधाई.

Shekhar Suman ने कहा…

bahut hi khubsurat rachna.....
umdaah prastuti...
mere blog par is baar..
पगली है बदली....
http://i555.blogspot.com/

sada ने कहा…

गहरे भावों के साथ अनुपम प्रस्‍तुति ।

sandhyagupta ने कहा…

प्रेयसी और भार्या के मध्य अंतर को रेखांकित करने के बहाने कविता स्त्री पुरुष संबंधों की सूक्ष्मता से पड़ताल करती है. बधाई.

डा. अरुणा कपूर. ने कहा…

भार्या प्रेयसी बन कर जब नए रुपमे सामने आती है..तब...आगे...लेकिन...अगर जैसे सवाल फिरभी सुलगते रह्ते है!...बहुत सुंदर कृति!

भूतनाथ ने कहा…

mere paas shabd nahin vandanaa ji ki kuchh kahun aaj......

दीपक 'मशाल' ने कहा…

आज की कविता की रवानगी देखते ही बनती है... एक बहुत सच बात को कहा आपने.. बहुत कम ही ऐसे उदाहरण होंगे जहाँ पत्नी को प्रेयसी बनाया गया हो.. नए से विषय पर बेहतरीन कविता के लिए आभार.. राखी की शुभकामनाएं..

Babli ने कहा…

रक्षाबंधन पर हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!
बहुत खूब लिखा है आपने! गहरे भाव के साथ लिखी हुई उम्दा रचना !

KK Yadava ने कहा…

एक कडवी सच्चाई को खूबसूरती से आपने शब्द दिए हैं..बधाई.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

रक्षा बंधन पर हार्दिक शुभकामनाएँ.

Rahul Singh ने कहा…

भार्या और पत्‍नी के विश्‍लेषण में उनका पूरक होना भी आपकी काव्‍य दृष्टि से अभिव्‍यक्‍त होना चाहिए.

Sitaram Prajapati ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना !

neelima garg ने कहा…

very true..

S.M.HABIB ने कहा…

जाने मन को कितना मथने के बाद यह रचना निकली होगी... साधू साधू वंदना जी.

vikram7 ने कहा…

प्रेयसी बनने की आग में
जलती भार्या का सफ़र
सिर्फ भार्या पर ही सिमट
जाता है
सिर्फ भार्या पर ही.................
बेहद मार्मिक कविता

रंजना ने कहा…

आपने क्या कह दिया है न.....उफ़, क्या कहूँ !!!
निःशब्द हो गयी....

करोड़ों में कोई एक विवाहिता ऐसी शौभाग्यशालिनी है,जिसके जीवन का सच यह नहीं है...

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

this is your best vandana

manu ने कहा…

bahut khoobsoorat likhaa hai aapne..
kamaal hai...