अनुमति जरूरी है

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

बुधवार, 23 जून 2010

आशिकों के बीच बहस- सी छेड़ जाते थे

वो रेशमी दुपट्टा तेरा जो लहराता था 
 एक तूफ़ान आकर गुजर जाता था 

जब हिरनी सी -कुलांचें भरती तू चलती थी 
कितने आवारा बदल टकरा जाते थे 

तेरी मदमाती खनखनाती सुरीली तान पर 
मंदिरों में घंटियाँ घनघना जाती थीं

जब कपोलों पर गिरी लट तू सुलझाती थी
एक मदहोशी- सी जहन पर छा जाती थी 

सुर्ख लबों को जब तू दाँत के नीचे दबाती थी 
कितने ही दिलों की धडकनें रुक जाती थीं

सुराहीदार ग्रीवा जब नजाकत से बल खाती थी
दिलों पर सैंकड़ों बिजलियाँ- सी गिर जाती थीं

जब मदभरे चंचल नयन लजाते थे 
आशिकों के बीच बहस- सी छेड़ जाते थे 

जब आफताब के साथ तेरा दीदार हुआ करता था
दिल में इन्द्रधनुषी -से रंग बिखर जाते थे

26 टिप्‍पणियां:

kshama ने कहा…

Bahut sundar! Ek yuwa kavita!

राकेश कुमार ने कहा…

एक नायिका के सौन्दर्य का बहुत ही सुन्दर चित्रण,

किसी स्त्री के शारीरिक सौन्दर्य के आल्हादित पलो का अनुपम चित्रण करते हुये जब आप यह लिखती है " तेरी मदमाती खनखनाती सुरीली तान पर, मंदिरों में घंटियाँ घनघना जाती थीं" तो यहा पर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे कवियित्री किसी स्त्री के उन्मादित स्वरूप को सात्विकता की परिधि मे बान्धने का प्रयास कर रही हो,

एक जगह पर आपने बहुत ही सुन्दर लिखा है "जब मदभरे चंचल नयन लजाते थे...


अन्त की एक बहुत ही सुन्दर पन्क्ति ..." जब आफताब के साथ तेरा दीदार हुआ करता था
दिल में इन्द्रधनुषी -से रंग बिखर जाते थे"

लेकिन इन सब के साथ हमे यह भी कहना ही होगा कि किसी स्त्री का सौन्दर्य, केवल उपभोग की विषय वस्तु नही अपितु जीवन के कठिन क्षणो को उनके आन्चल के छाव मे एक अनन्त विस्तार प्राप्त करने की स्वीकारोक्ति भी होनी चाहिये.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सौंदर्य रस में डूबी ... प्रेमिका की भाव-भंगिमाओं का सुंदर चित्रण खैंचा है आपने ...

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

ek purush ki najar se dekh kar badi pyari panktiyan......aapne gadhi hai!! mere pass to itne shabd bhi nahi ki uss par tippani kar sakhun.......:)

lekin Rakesh jee ke ek ek baat se sahmat hoon...!

kunwarji's ने कहा…

rakesh ji bahut kuchh or bilkul sahi-sahi keh diya hai ji....

bahut badhiya...

kunwar ji,

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बेहद उम्दा रचना !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बढ़िया रचना है!
--
इसे तो युवा धड़कनों की वन्दना ही कहूँगा!
--
यदि छन्द संयोजन में कुछ सुधार कर लें तो
यह रचना बहुत ही सशक्त और जीवन्त
अभिव्यक्ति बन जायेगी!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बढ़िया रचना है!
--
इसे तो युवा धड़कनों की वन्दना ही कहूँगा!
--
यदि छन्द संयोजन में कुछ सुधार कर लें तो
यह रचना बहुत ही सशक्त और जीवन्त
अभिव्यक्ति बन जायेगी!

Apanatva ने कहा…

umr ke sath sub dhah jata hai jee..........
bus yado ke lamhe sath rahte hai...........
sunder varnan......

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

वाह वाह क्या वर्णन है....बहुत सुन्दर

शहरोज़ ने कहा…

@mayank ji

यदि छन्द संयोजन में कुछ सुधार कर लें तो
यह रचना बहुत ही सशक्त और जीवन्त
अभिव्यक्ति बन जायेगी

vikas ने कहा…

सच में आपने तो युवाओं के मन की बात कह डाली...शास्त्री जी ने कहा इसे टी युवा दिलो की वंदना ही कहूँगा ,,,,बिलकुल सत्य ,,,बहुत ही बेहतरीन रचना ,,आभार ..

विकास पाण्डेय
www.vicharokadarpan.blogspot.com

Virendra Singh Chauhan ने कहा…

Vandna ji, aapki Rachna bahut achhi hai. 'HUSN' ka behtreen varnaan kiya hai aapne. Iske liye aapka
dhanyabaad.

रचना दीक्षित ने कहा…

वाह !कितनी मनभावन कविता

shikha varshney ने कहा…

वाह जी वाह अतिसुन्दर.

चैन सिंह शेखावत ने कहा…

sunder shabd....machalte bhaav...achchi rachna.
vandna ji... bura mat maaniyega,lekin chhand ke star par aapki rachna kharee nahi utarti..tanik chand ko sadhiye..phir dekhiye kamal..

kshma chahta hu..

ALOK KHARE ने कहा…

behtreen prastuti, padhna achha laga
badhai

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता है। धन्यवाद।

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

उम्दा रचना...

rashmi ravija ने कहा…

क्या बात है...बहुत ही मूड में लिखा है...एकदम युवा दिलों को धड़काने वाली...सुन्दर कविता

सलीम ख़ान ने कहा…

ओए होए ओए होए ओए होए ओए होए ओए होए

बेचैन आत्मा ने कहा…

इसे पढ़कर अपनी उम्र २० वर्ष कम हो गई...!

sada ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति, बधाई ।

ज्योति सिंह ने कहा…

जब कपोलों पर गिरी लट तू सुलझाती थी
एक मदहोशी- सी जहन पर छा जाती थी

सुर्ख लबों को जब तू दाँत के नीचे दबाती थी
कितने ही दिलों की धडकनें रुक जाती थीं
collage ke din lahra uthe ,jab dil ki umange hoti hai jawan ,masti me dooba hota hai shama .jhoomta hai dil liye apna jahan .bha gayi rachna

राजेश उत्‍साही ने कहा…

सुंदर अभिव्‍यक्ति है। वंदना जी निश्चित ही छंद में तो सुधार करना ही चाहिए। पर मेरा एक सवाल है और उसके जवाब में सुझाव भी कि आप इसे बीते हुए समय में क्‍यों कह रही हैं। इसे वर्तमान में कहिए न। यानी कि कुछ कुछ इस तरह-
रेशमी दुपट्टा तेरा जो लहराता है
एक तूफ़ान आकर गुजर जाता है

हिरनी सी-कुलांचें जब भरती है तू
कितने आवारा बदल टकरा जाते हैं

तेरी खनखनाती सुरीली तान पर
मंदिरों की घंटियाँ घनघना जाती हैं

कपोलों पर गिरी लट जब सुलझाती है
एक बेहोशी सी जहन पर छा जाती है

सुर्ख लबों को जब तू दाँतों तले दबाती है
कितने ही दिलों की धडकनें रुक जाती हैं

सुराहीदार ग्रीवा जब नजाकत से बल खाती है
दिलों पर सैंकड़ों बिजलियाँ गिर जाती हैं

जब तेरे मद भरे चंचल नयन लजाते हैं
आशिकों के बीच बहस-सी छेड़ जाते हैं

जब आफताब से तेरा दीदार हुआ करता है
दिल में इन्द्रधनुषी रंग बिखर जाते हैं

Renu Sharma ने कहा…

kya baat hai ji
jawani yaad dila di,
bahut mast likha hai
ise or aage badhiye
bahut khoob