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सोमवार, 31 मई 2010

यूँ आवाज़ ना दिया करो

सुनो
यूँ आवाज़ ना दिया करो 
दिल की बढती धड़कन 
आँखों की शोखियाँ 
कपोलों पर उभरती 
हया की लाली
कंपकंपाते अधर 
तेरे प्यार की 
चुगली कर जाते हैं 
कभी ख्वाब तेरे
रातों में जगा जाते हैं
और चंदा की बेबसी से
सामना करा जाते हैं
तारे गिनते- गिनते 
कटती तनहा  रात 
भोर की लाली से
सहम- सहम जाती है 
मद्धम मद्धम बहती बयार
तेरी साँसों की 
सरगोशियाँ कर जाती है
तेरी इक आवाज़ पर
मोहब्बत का हर रंग
बसंत सा खिल जाता है 
बता अब कैसे 
मुट्ठी में क़ैद करूँ 
इस बिखरती खुशबू को 
बस तुम 
यूँ आवाज़ ना दिया करो 

रविवार, 23 मई 2010

तेरे मन का मंदिर

तेरे मन की 
खुली खिड़की 
में झाँकता 
अक्स मेरा 
तेरे मनोभावों 
की हर तह 
को खोलता
परत- दर- परत
तेरे अहसासों
को छूता 
ज्यों चाँदनी का
स्पर्श हो 
तेरे मन की 
हर तह में
प्रेम के अथाह
सागर की
अनगिनत
उछलती 
मचलती
टकराती 
और टूट कर
बिखरती 
लहरों का
खामोश 
रुदन
तेरे सूखे 
हुए आँसुओं
की कहानी 
सुनाता है
किसी परत में
दबे तेरे
असफल प्रेम 
की पुकार
का करुण 
क्रन्दन
तेरी आत्मा की
बेकली का
दीदार कराता है
और किसी 
परत में
तेरे दर्द की
पराकाष्ठा मिली 
जहाँ तूने
प्रेम की 
कब्रगाह में
वो बुत बनाया 
जिसकी खुशबू
के आगे 
पुष्प भी 
महकना छोड़ दे 
जिसकी 
शिल्पकारी में
शिल्पकार भी
मूर्ती गढ़ना 
छोड़ दे
बुतपरस्ती
का ऐसा 
मक़ाम बनाया
मुझे वहाँ 
खुदा ना मिला
बस तूने
मुझे ही 
खुदा बनाया
ये तेरे प्रेम
का नगर
तेरी मोहब्बत 
का मंदिर बना
जहाँ आकर
मेरा अक्स भी 
हार गया
और तेरे प्रेम के
बुत में समां गया

गुरुवार, 20 मई 2010

बिना बात के भी शिकायत होती है

बिना बात के भी शिकायत होती है
हुस्न वालों की भी अजीब फितरत होती है

कभी शिकवों की लम्बी फेहरिस्त होती है
कभी बिना फेहरिस्त के भी शिकायत होती है

हुस्न की ये अदा भी गज़ब होती है
जब शिकायत भी प्यार भरी होती है

तकरार में भी इकरार नज़र आता है
तब हुस्न  कुछ और निखर जाता है

शोख चंचल आँखों में खिले तबस्सुम 
हुस्न का हुस्न और खिला जाते हैं 

प्यार की तकरार की मिठास बढ़ा जाते हैं
रूठे हुस्न को मनाने की प्यास जगा जाते हैं

जब  इश्क क़दमों में झुका होता है
हुस्न का वो ही अंदाज़ तो कातिल होता है

रविवार, 16 मई 2010

ख्वाब को पकड़ना चाहता हूँ...........

तेरा मेरा यूँ मिलना
जैसे आकाश का 
धरती को तकना
पूजन , अर्चन,वंदन बन 
आई हो मेरे जीवन में
जब से दीदार किया तेरी
रिमझिम सी  इठलाती ,
मुस्काती चितवन का
 होशोहवास सब गुम हो गए
तुम्हारे ही ख्यालों में
ना जाने कहाँ खो  गए
ये कैसी मदहोशी छाई है 
तुम्हें पाने की चाह
दिल  में समायी है
जानता हूँ छू नहीं सकता
फिर भी आस की लौ 
जलाई है 
 ख्वाबों को तुम्हारे प्रेम की
पैरहन पहनाई है
तुम पैरों में महावर लगाये
आओगी इक दिन जीवन में 
इसी आस की रंगोली रोज
दिल की चौखट पर सजाता हूँ 
तुम्हारी चूड़ियों की खनक
जब  दरवाज़ा मेरा खड्काएगी 
तब कैसे दिल को सम्हालूँगा
ये सोच -सोच घबराता हूँ
जब भी तस्वीर निहारा करता हूँ
अधरामृत पान की
लालसा मुखर हो जाती है
जब सामने तुम्हारा वजूद होगा 
तब कैसे खुद को सम्हालूँगा
ये सोच -सोच शरमाता हूँ
मगर फिर भी प्रेम का
प्रतिकार तुम ही से चाहता हूँ
ख्वाब में ही सही मगर 
अपने इंतज़ार के मंदिर में
तुझे अपने ख्वाब की देवी बना 
तेरी वंदना कर
विजय रथ पर सवार हो
ख्वाब के प्रेम क्षितिज पर
मिलना चाहता हूँ
जानता हूँ तुम हकीकत नहीं
ख्वाब हो मेरा फिर भी
ख्वाब को पकड़ना चाहता हूँ...........

गुरुवार, 13 मई 2010

मैं भीग जाता हूँ

जब भी 
तेरे गेसुओं से 
टपकती बूँदें
गिरती हैं मेरे 
ह्रदय नभ पर
मैं भीग जाता हूँ 

जब भी तेरे अधरों पर
कुछ कहते -कहते
लफ्ज़ रुक जाते हैं
मैं भीग जाता हूँ

जब भी तेरी 
पेशानी पर
चुहचुहाती बूँदें
चाँदनी सी आभा
बिखेरती हैं
मैं भीग जाता हूँ

जब भी तेरे
दिल की धडकनें
मौसम - सी 
बदलती हैं
मैं भीग जाता हूँ

जब भी तेरा
मुखड़ा 
ओस की बूँद सा
सतरंगी आभा 
बिखेरता है
मैं भीग जाता हूँ

शनिवार, 8 मई 2010

हाँ , मैंने खुशबू को क़ैद कर लिया

हाँ , मैंने 
खुशबू को 
क़ैद कर लिया 
तेरी सोमरस 
छलकाती बातों को
मीठी -मीठी 
मुस्कानों को
हिरनी से चंचल
नैनों की चितवन को 
बिजली से मचलते 
पैरों की थिरकन को
तेरे मिश्री घुले 
मधुर अल्फाजों को 
मधुर- मधुर
गुंजार करते गीतों को
तेरे  कभी दौड़ते , 
भागते ,कभी हाँफते 
पलों को
हर पल
प्रफुल्लित 
उल्लसित
पुलकित 
जीवन को भरपूर
जीने की तमन्ना को
तेरे छोटे -छोटे
तारों में सिमटे 
रंगीन ख्वाबों को
मेरे दर्द में
तड़पकर
तेरी अंखियों में
उभरे मोतियों को 
तेरे भीने -भीने
अहसास की महक को
तेरा उछलकर 
बादलों को 
छूने  की चाह को
तेरा मचलकर 
मेरी गोद में
सिर रखकर
रूठने की अदा को
अपनी यादों में
समेट लिया
हाँ , लाडली
मेरे आँगन 
की गोरैया
मैंने खुशबू को
क़ैद कर लिया

मंगलवार, 4 मई 2010

बस एक बार आजा जानाँ..................

तेरी मेरी मोहब्बत
खाक हो जाती
गर तू वादा ना करती
इसी जन्म में मिलने का
एक अरसा हुआ
तेरे वादे पर ऐतबार
करते - करते
पल- छिन्न युगों से
लम्बे हो गए हैं
मगर तेरे वादे की
इन्तिहाँ ना हुई
आज जान जाने को है
आस की हर लौ
बुझने को है
तुझे पुकारता है प्यार मेरा
याद दिलाता है वादा तेरा
क्या भूल गयी हो जानाँ
मोहब्बत की तपिश से
वादे को जलाना
मेरी आवाज़ की
स्वर लहरी पर
हर रस्मो- रिवाज़ की
जंजीरों को तोड़कर
आने के वादे को
क्या भूल गयी हो
धड़कन के साथ
गुंजार होते मेरे नाम को
देख , मुझे तो
तेरी हर कसम
हर वादा
आज भी याद है
ज़िन्दगी की आखिरी
साँस तक सिर्फ
तुझे चाहने का
वादा किया था
और आज भी
उसे ही निभा रहा हूँ
इसी जन्म में
मिलन की बाट
जोह रहा हूँ
तेरे वादे की लाश
को ढोह रहा हूँ
अब तो आजा जानाँ
यारा
मुझे मेरे यार से
मिला जा जानाँ
मेरे प्यार को
मेरे इंतज़ार को
अमर बना जा जानाँ
बस एक बार
आजा जानाँ
बस एक बार…………

सोमवार, 3 मई 2010

मौन मुखर हो जाये

अश्कों का बहना
कोई बड़ी बात नहीं 
मज़ा तब है जब
अश्क बहें भी और
 नज़र भी ना आयें
और  जहाँ मौन भी
नज़रों में मुखर हो जाये 

शनिवार, 1 मई 2010

आज्ञाकारी पुत्र ?

पिता ने पुत्र 
को उपदेश दिया 
जीवन का
सन्देश दिया
बेटा, काम कुछ
ऐसा कर जाना 
दुनिया की यादों 
में बस जाना
पशुवत जीवन तो
सब जीते हैं 
ज़हर का घूँट 
तो सब पीते हैं
तुम राम -सा 
जीवन जी जाना
नाम अपना रौशन 
कर जाना
अब पुत्र ने
चिंतन- मनन किया 
राम के जीवन का
अवलोकन किया
इक गहन चिंता 
में डूब गया 
आज के युग में
कहाँ से लाउँगा 
भारत- सा
त्यागी भाई
लक्षमण -सा 
आज्ञाकारी भाई
सीता हर किसी को
मिला नहीं करती 
राम अगर बन जाऊँगा
केकैयी तो बहुत 
मिल जाएँगी पर 
कौशल्या- सी माँ
कहाँ से लाऊँगा 
जहाँ माँ ही 
स्वार्थ की खातिर 
बेटो की बलि 
चढ़ा  देती है 
पत्नी भी प्रेमी 
के साथ 
भाग जाती है
जन्म भर का बंधन 
इक पल में 
भुला देती है
भाई ही भाई का
गला उतार देते हैं
जहाँ पग -पग पर
मर्यादाएँ टूटा करती हैं
कैसे मर्यादा पुरुषोत्तम 
बन पाऊँगा 
कैसे राम- सा जीवन
जी पाऊँगा
बहुत चिंतन -मनन के बाद
पुत्र निष्कर्ष पर पंहुचा 
सिर्फ नाम ही तो करना है
लोगों के ज़ेहन में
अपनी छवि अंकित 
ही तो करनी है 
काम ही तो 
ऐसा करना है
जिससे नाम 
रौशन  हो जाये 
 राम बनना आसान 
नहीं इस युग में
इसलिए वो
"रावण"बन गया 

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

जब सवाल करने का हक हो ?

कोई चीत्कार 
सुनी नहीं 
मगर फिर भी
चीत्कार होती है 
जो बिना सुने 
भी सुनाई देती है
अंतर्मन को 
झकझोरती है
सागर के फेन 
सा जीवन 
उसमें भी
वक़्त के तरकश में 
दबी , ढकी , 
अंधकार में डूबी 
कुछ वीभत्स करती
आत्मा को 
झिंझोड़ती आवाजें
 बिना कहे भी
बहुत कुछ 
कह जाती हैं 
उस अंधकार की
कालकोठरी में
चीत्कारती हैं
मगर उन्हें 
वहीँ उन्ही 
तहखानो में 
दफ़न कर दिया 
जाता है
जवाब तो तब मिले
जब सवाल करने 
का हक हो  ?

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

पत्थर हूँ मैं

पत्थर हूँ ना 
खण्ड- खण्ड 
होना मंजूर
पर पिघलना 
मंजूर नहीं 

स्थिर , अटल 
रहना  मंजूर 
पर श्वास , गति 
लय मंजूर नहीं

पत्थर हूँ ना
पत्थर- सा 
ही रहूँगा 
अच्छा है 
पत्थर हूँ
कम से कम 
किसी दर्द 
आस , विश्वास
का अहसास 
तो नहीं
कहीं कोई 
जज़्बात तो नहीं
किसी गम में 
डूबा तो नहीं
किसी के लिए 
रोया तो नहीं
किसी को धोखा 
दिया तो नहीं
अच्छा है
पत्थर हूँ
वरना 
मानव 
बन गया होता
और स्पन्दनहीन बन
मानव का ही
रक्त चूस गया होता
अच्छा है
पत्थर हूँ
जब स्पन्दनहीन 
ही बनना है
संवेदनहीन 
ही रहना है
मानवीयता से
बचना है
अपनों पर ही
शब्दों के 
पत्थरों से 
वार करना है
मानव बनकर भी 
पत्थर ही 
बनना है
तो फिर 
अच्छा है
पत्थर हूँ मैं  

रविवार, 28 मार्च 2010

संजीवनी

हृदय तिमिर को  बींधती
तेरी रूह की 
सिसकती आवाज़
जब मेरे हृदय की
मरुभूमि से टकराती है
मुझे मेरे होने का 
अहसास करा जाती है
जब तेरे प्रेम की 
स्वरलहरियाँ हवा के
रथ पर सवार हो
मेरा नाम गुनगुना जाती हैं
मुझे जीने का सबब
सिखा जाती हैं
जब  दीवानगी की 
इम्तिहाँ पार कर 
तेरी चाहत मेरा
नाम पुकारा करती है
मेरी रूह देह की 
कब्र में फ़ड्फ़डाती है
और ना मिलने के 
अटल वादे की 
आहुतियाँ दिए जाती है
तेरे दर्द को भी जीती हूँ
अपने दर्द को भी पीती हूँ
प्रेम के इस मंथन में
हलाहल भी पीती हूँ
मगर फिर भी
तेरी इक पुकार की 
संजीवनी से जी उठती हूँ
मैं मर- मरकर भी 
मर नहीं पाती हूँ

रविवार, 21 मार्च 2010

गर प्यार से छू ले

आज भी 
सिहर जाए 
रोम रोम
गर तू
प्यार से 
छू ले मुझे
आज भी
डूब जाऊँ 
नैनों की 
मदिरा में
 गर तू
नज़र भर 
देख ले मुझे
आज भी 
बंध  जाऊँ
बाहुपाश में तेरे
 गर तू
स्नेहमय निमंत्रण दे 
उर स्पन्दनहीन
नहीं है
बस नेह जल के 
अभाव में
बंजर हो गया है

बुधवार, 17 मार्च 2010

तेरे पास

सुन 
तेरे चेहरे पर 
गुलाब सी खिली 
मधुर स्मित 
नज़र आती है मुझे
जब तू दूर -बहुत दूर
निंदिया के आगोश में
स्वप्नों के आरामगाह में
विचरण कर रहा होता है
तेरे सीने के मचलते ज्वार 
यहीं भिगो जाते हैं मुझे 
मेरे तड़पते जज्बातों को 
तेरी बेखुदी में
महकते ख्याल 
तेरे अहसासों की
 लोरियां सुना 
जाते हैं मुझे
तेरी धड़कन की 
हर आवाज़ सुना 
करती हूँ
तेरे हर पैगाम को
पढ़ा करती हूँ
और मैं यहीं 
तुझसे दूर होकर भी
तेरे पास होती हूँ

गुरुवार, 11 मार्च 2010

अब तो आ जा .......

आ जा
अब तो
एक बार
तड़प की
हर हद
पार हो चुकी है
बिन आंसू के
रोती हूँ
तुझ बिन
कैसे जीती हूँ
जानता है
तू भी
मगर फिर भी
मुझे तड़पाकर
कितना सुकून
तुझे मिलता होगा
ये पता है मुझे
अहसास सिर्फ
अहसास होते हैं
उनका नाम
नहीं होता ना
इसीलिए
तुझे अहसास
नाम दिया
और तूने
उसे सार्थक
कर दिया
अहसास बनकर
आया ज़िन्दगी में
अहसास सा
वजूद पर
छा गया
उस अहसास
की तड़प
तडपाती है
जो नही
कहना चाहती
वो भी
कह जाती है
अब तो आ जा
यार मेरे
अहसास का भी
अहसास अब तो
तड़पाता है
मत इम्तिहान ले
मेरे अहसास का
कहीं आज
धडकनें रुक
ना जायें
तेरे दीदार की
हसरत लिए
ना दफ़न
हो जायें
अब तो
आ जा
एक बार
बस एक बार.........

रविवार, 7 मार्च 2010

टूटे टुकड़े

१) सुनो
कुछ ख्वाब बोये थे
तुम्हारे साथ जीने के

बंजर ज़मीन में


२) वेदनाओं के ताबूत में
आखिरी कील जो
लगायी तुमने

रूह को सुकून आ गया


३) तेरी चाहत की
बैसाखियों ने
अपाहिज बनाया मुझे

बस लाश बनना बाकी है


४) कैसे समेटेगा
इन बिखरे टुकड़ों को
जिन्हें कभी
तू ने ही ....................


५) बिन बादल बरसती हूँ
बिन आंसू के रोती हूँ

कहीं सैलाब में बह ना जाऊं


६) दस्तक कोई देता ही नही
आवाज़ कोई आती ही नही

शायद हवाओं का रुख बदल रहा है

गुरुवार, 4 मार्च 2010

तेरी ख़ामोशी

तेरी ख़ामोशी
जब बातें करती है
मुझसे
बस वहीं धडकनें
रूक जाती हैं
जो तुझसे
नहीं कह पातीं
वो अफसाने
मेरे कानो में
बयां कर जाती हैं
कभी तेरा
तितलियों सा
उड़ना
कभी तूफ़ान सा
मचलना
कभी खग सदृश
आकाश में उड़ना
कभी यादों के
कटहरे में
सजायाफ्ता
मुजरिम सा
खामोश ठहर जाना
कभी मेघों सा
गरजना
कभी वेणी में गुंथे
पुष्पों सा महकना
और फिर कभी- कभी
कांच की तरह टूटे
ख्वाबों सा तेरा टूटना
कभी किसी
रुके दरिया सा
ख़ामोशी का सन्नाटा
कभी आँख से गिरे
अश्क सा मिटटी
में मिल जाना
तेरे हर पल
हर लम्हे की
दास्ताँ सुना जाती हैं
तेरी ख़ामोशी मुझे
बता फिर कैसे
कोई जिंदा रहे
और धडकनों की
आवाज़ सुने

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

किससे करें बरजोरी........कैसे खेलें होली ?

होली होली
खेलें होली
रंगों की है
बरजोरी
चलो चलो
सब खेलें होली
आवाज़ ये
आ रही है
दिल को मेरे
दुखा रही है
कैसी होली
कौन सी होली
कौन से रंगों से
करें बरजोरी
कहीं है देखो
रिश्तों के
व्यापार की होली
कहीं है प्यार के
इम्तिहान की होली
कहीं पर देखो
जाति की होली
कहीं है भ्रष्टाचार
की होली
कोई तो फेंके
बमों के गुब्बारे
कहीं पर है
नक्सलिया टोली
लहू का पानी
डाल रहे हैं
नफरतों के
बाज़ार लगे हैं
सियासती चालों की
होली खेल रहे हैं
दाँव पेंच सब
चल रहे हैं
बन्दूक की
पिचकारी बना
निशाना दाग रहे हैं
देश को कैसे
बाँट रहे हैं
ये कैसी होली
खेल रहे हैं
लहू के रंग
बिखेर रहे हैं
केसरिया भी
सिसक रहा है
टेसू के फूलों से
भी जल रहा है
हरियाली भी
रो रही है
अपना दामन
भिगो रही है
अमन शान्ति का
हर रंग उड़ गया है
आसमान भी
बिखर गया है
माँ भी लाचार खडी है
अपनों के खून से
सनी पड़ी है
बेबस निगाहें
तरस रही हैं
जिसके बच्चे
मर रहे हों
आतंक की भेंट
चढ़ रहे हों
जो घात पर घात
सह रही हो
तड़प- तड़प कर
जी रही हो
जिस माँ को
अपने ही बच्चे
टुकड़ों में
बाँट रहे हों
वो माँ बताओ
कैसे खेले होली
जहाँ दिमागों पर
पाला पड़ गया हो
स्पंदन सारे
सूख गए हों
ह्रदयविहीन सब
हो गए हों
अपनों के लहू से
हाथ धो रहे हों
बताओ फिर
कैसे खेलें होली
किसकी होली
कैसी होली
किससे करें
बरजोरी
अब कैसे खेलें होली ?

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

कैसे खेलें होरी

तिरछी चितवन
सुर्ख कपोल
भीगे अधर
प्रिये
कैसे प्रवेश करूँ
ह्रदय में
पहरे तुमने
बिठा रखे हैं
चितवन बांकी
बींध रही है
किस रंग से
तुम्हें सजाऊँ
कपोल सुर्ख
किये हुए हैं
कौन से नीर से
तुम्हें भिगाऊं
अधर अमृत का
पान किये हैं
प्रिये
कैसे खेलूँ होरी
तुझ संग कैसे
खेलूँ होरी
प्रिये
एक बार बस
आलिंगनबद्ध
हो जाओ
प्रेम रस में
तुम भीग जाओ
प्रीत मनुहार
के रंगों से
आओ सजनिया
अब खेलें होरी

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

कमरों वाला मकान

इस मकान के
कमरों में
बिखरा अस्तित्व
घर नही कहूँगी
घर में कोई
अपना होता है
मगर मकान में
सिर्फ कमरे होते हैं
और उन कमरों में
खुद को
खोजता अस्तित्व
टूट -टूट कर
बिखरता वजूद


कभी किसी
कमरे की
शोभा बनती
दिखावटी मुस्कान
यूँ एक कमरा
जिंदा लाश का था
तो किसी कमरे में
बिस्तर बन जाती
और मन पर
पड़ी सिलवटें
गहरा जाती
यूँ एक कमरा
सिसकती सिलवटों का था


किसी कमरे में
ममता का
सागर लहराता
मगर दामन में
सिर्फ बिखराव आता
यूँ एक कमरा
आँचल में सिसकते
दूध का था


किसी कमरे में
आकांक्षाओं , उम्मीदों
आशाओं की
बलि चढ़ता वजूद
यूँ एक कमरा
फ़र्ज़ की कब्रगाह का था


कभी रोटियों में ढलता
कभी बर्तनों में मंजता
कभी कपड़ों में सिमटता
तो कभी झाड़ू में बिखरता
कभी नेह के दिखावटी
मेह में भीगता
कभी अपशब्दों की
मार सहता
हर तरफ
हर कोने में
टुकड़े - टुकड़े
बिखरे अस्तित्व
को घर कब
मिला करते हैं
ऐसे अस्तित्व तो सिर्फ कमरों में ही सिमटा करते हैं.

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

देशभक्ति का दानव

देशभक्ति का दानव मुझमें
जाने क्यूँ मचलता रहता है
इसका कोई मान नही
इसकी कोई पहचान नही
फिर भी अपना राग सुनाता रहता है
सिर्फ चुनावी बिगुल बजने
पर ही सबको याद ये आता है
वरना सियासतदारों को
फूटी आँख ना भाता है
आज के युग में
दानव ही ये कहलाता है
इसकी माला जपने वाला
यहाँ महादानव कहलाता है
हर नेता इससे बचकर
निकलना चाहता है
जब बजती देशभक्ति की घंटी
संसद में आँख मूँद सो जाता है
इसके भयंकर रूप से तो
हर नेता घबराता है
जान की कीमत पर अब
कौन शोहरत पाना चाहता है
अब तो हर इंसान बस
पैसे की तराजू में तुलना चाहता है
देशभक्ति के पल्लू से तो बस
हाथ पोछना चाहता है
फिर क्यूँ ना भ्रष्टाचार , आतंकवाद
स्वार्थपरता के यज्ञ में
इसकी आहुति दे दें हम
फिर क्यूँ ना ऐसे दानव से
अब मुक्ति पा लें हम
आओ देशभक्ति के दानव से
मुक्त होने का प्रण लें हम
आओ प्रण करें
देशभक्ति के दानव का
सर कुचलकर रहेंगे हम
स्वार्थपरता , भ्रष्टाचार और आतंक
का नारा बुलंद करेंगे हम
तभी (भार + त ) भार से अटे
भारत को
देशभक्ति के चुंगुल से
मुक्त कर पाएंगे हम
और सही मायनो में
आने वाली पीढ़ी को
सन्मार्ग(कुमार्ग) दिखा जायेंगे हम

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

प्रेम की परिधि

मुझे
रेखांकित किया
जब तुमने
अपने प्रेम की
परिधि में
बाँधा जब तुमने
अपने मूक प्रेम
की डोर से तुमने
मेरे भटकते
अर्धव्यास को
स्वयं के व्यास से
जोड़कर संपूर्ण
घेरा बना लिया
जब तुमने
तब उसी परिधि में
अपनी धुरी पर
घूमते- घूमते
कब मैं
तेरा ही रूप हो गयी
पता ही ना चला
आओ अब इस
परिधि में
एक दूजे को
समा लें हम
अपने अस्तित्व की
पूर्णता से सजा लें हम
एक दूजे की
सम्पूर्णता में
खो जायें हम
जहाँ दो ना रहें
एक हो जायें हम

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

चक्रव्यूह

विरह दंश से
पीड़ित धड़कन
तेरे नाम से ही
धड़क जाती है
सोच ज़रा
क्या होगा
उस पल जब
युगों के चक्रव्यूह
में फँसी
जन्म -जन्मान्तरों
से भटकती रूहों
का मिलन होगा
और दीदार को
तरसते नैन
चार होंगे
जब प्रेम अपने
चरम पर होगा
उस चिर प्रतीक्षित
क्षणिक पल में

धड़कन रूक नही जाएगी
साँस थम नही जाएगी
और एक बार फिर
प्रेम , विरह और मिलन
के चक्रव्यूह में
अगले कई युगों तक
कई जन्मो के लिए
रूहें हमारी
फिर उसी दलदल में
फँस नही जाएँगी

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

क्या फिर ऋतुराज का आगमन हुआ है ?

सोमरस -सा
प्राणों को
सिंचित करता
तुम्हारा ये नेह
ज्यों प्रौढता की
दहलीज परवसंत का आगमन
नव कोंपल सी
खिलखिलाती
स्निग्ध मुस्कान
ज्यों वीणा के तार
झनझना गए हो
स्नेहसिक्त नयनो से
बहता प्रेम का सागर
ज्यों तूफ़ान कोई
दरिया में
सिमट आया हो
सांसों के तटबंधों
को तोड़ते ज्वार
ज्यों सैलाब किसी
आगोश में
बंध गया हो
प्रेमारस में
भीगे अधर
ज्यों मदिरा कोई
बिखर गयी हो
धडकनों की
ताल पर
थिरकता मन
ज्यों देवालय में
घंटियाँ बज रही हों
आह ! ये कैसा
अनुबंध है प्रेम का
क्या फिर
ऋतुराज का
आगमन हुआ है ?

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

" कल "

कल
जब आई थी
मैं
क्यूँ नही बांधा
तुमने
प्रेमापाश में
क्यूँ नही
पकड़ा दामन
क्यूँ नही
डालीं पाँव में
जंजीरें
अपने इंतज़ार की
क्यूँ नही दी
दुहाई
अपने जज्बातों की
क्यूँ नही सुनाई
इक-इक पल में
सौ- सौ बार
मर- मर कर
जीने की दास्ताँ
अब कल
फिर आऊँगी
तब कह लेना
अनकही बातें
दिखा देना
अपनी धडकनों पर
लिखा मेरा नाम
हवाओं पर तैरता
मोहब्बत का पैगाम
सुना देना
सारे जहान को
अपने ख्वाबों की
दास्ताँ
मगर एक बात
याद रखना
कल आई थी
कल आऊँगी
पर ये भूल
ना जाना
कल कभी नही आता
कभी नही आता