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रविवार, 28 मार्च 2010

संजीवनी

हृदय तिमिर को  बींधती
तेरी रूह की 
सिसकती आवाज़
जब मेरे हृदय की
मरुभूमि से टकराती है
मुझे मेरे होने का 
अहसास करा जाती है
जब तेरे प्रेम की 
स्वरलहरियाँ हवा के
रथ पर सवार हो
मेरा नाम गुनगुना जाती हैं
मुझे जीने का सबब
सिखा जाती हैं
जब  दीवानगी की 
इम्तिहाँ पार कर 
तेरी चाहत मेरा
नाम पुकारा करती है
मेरी रूह देह की 
कब्र में फ़ड्फ़डाती है
और ना मिलने के 
अटल वादे की 
आहुतियाँ दिए जाती है
तेरे दर्द को भी जीती हूँ
अपने दर्द को भी पीती हूँ
प्रेम के इस मंथन में
हलाहल भी पीती हूँ
मगर फिर भी
तेरी इक पुकार की 
संजीवनी से जी उठती हूँ
मैं मर- मरकर भी 
मर नहीं पाती हूँ

29 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना । आभार
ढेर सारी शुभकामनायें.

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना!

संजय भास्कर ने कहा…

भावों को इतनी सुंदरता से शब्दों में पिरोया है
सुंदर रचना....

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

सुशीला पुरी ने कहा…

behad bhauk abhivyakti...

M VERMA ने कहा…

तेरी इक पुकार की
संजीवनी से जी उठती हूँ
मैं मर- मरकर भी
मर नहीं पाती हूँ
हर एक के जीवन में कोई न कोई संजीवनी जरूर होती है.
आपकी रचनाएँ मन को छूती हैं

sangeeta swarup ने कहा…

हृदय तिमिर को बींधती
तेरी रूह की
सिसकती आवाज़
जब मेरे हृदय की
मरुभूमि से टकराती है
मुझे मेरे होने का
अहसास करा जाती है

दिल की गहराई से निकले जज़्बात.....खूबसूरत रचना....

HEY PRABHU YEH TERA PATH ने कहा…

तेरे दर्द को भी जीती हूँ
अपने दर्द को भी पीती हूँ
प्रेम के इस मंथन में
हलाहल भी पीती हूँ
मगर फिर भी
तेरी इक पुकार की
संजीवनी से जी उठती हूँ
मैं मर- मरकर भी
मर नहीं पाती हूँ


sunder... atti sundar Rachnaa.....

seema gupta ने कहा…

मेरी रूह देह की
कब्र में फ़ड्फ़डाती है
और ना मिलने के
अटल वादे की
आहुतियाँ दिए जाती है

" वाह क्या पंक्तियाँ हैं.....सुन्दर"
regards

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

तेरी इक पुकार की
संजीवनी से जी उठती हूँ
मैं मर- मरकर भी
मर नहीं पाती हूँ

बहुत बढ़िया!
ऐसा सुन्दर साहित्य लिखने में आप सिद्धहस्त हैं!

limty khare ने कहा…

padhkar aanand aa gaya vandna jee, sanjay bhaskar ne sach he kaha hai
भावों को इतनी सुंदरता से शब्दों में पिरोया है
सुंदर रचना....
badhai bahut bahut badhai

दिगम्बर नासवा ने कहा…

तेरी इक पुकार संजीवनी का काम करती है ... प्रेम के रंग में डूब कर ऐसा ही एहसास होता है ... लाजवाब लिखा है ..

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

प्रेम के इस मंथन में
हलाहल भी पीती हूँ
...बेहतरीन अभिव्यक्ति,बधाई!!!!

P.N. Subramanian ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना. आभार.

Babli ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण रचना! दिल को छू गयी!

सुमन'मीत' ने कहा…

हमेशा की तरह बेहद सुन्दर अभिव्क्ति

Shekhar kumawat ने कहा…

achi post lagi

kavita pad kar man ko shanti mili

http://kavyawani.blogspot.com/

SHEKHAR KUMAWAT

Yatish ने कहा…

क्या खूब पिरोया है ज़ज्बातो को आपने...


कभी अजनबी सी, कभी जानी पहचानी सी, जिंदगी रोज मिलती है क़तरा-क़तरा…
http://qatraqatra.yatishjain.com/

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

मेरी रूह देह की
कब्र में फ़ड्फ़डाती है
और ना मिलने के
अटल वादे की
आहुतियाँ दिए जाती है
तेरे दर्द को भी जीती हूँ
अपने दर्द को भी पीती हूँ
प्रेम के इस मंथन में
हलाहल भी पीती हूँ
मगर फिर भी
तेरी इक पुकार की
संजीवनी से जी उठती हूँ

waah bahut khoob likha he..
yahi to hota he nari man...kisi ne ek awaaz di nahi ki mom ki tarah pighla chala jata hai.
bahut man ko bhayi apki ye rachna.
badhayi.

गिरीश पंकज ने कहा…

pyar ki bhavanao ko sundar abhiyakti milee hai.umeed hai ab aap jeevan ke kuchh kaduye yathaarth se bhi roo-b-roo ho kar apnee pratibhi ko nyaa aakaash dengee. roomaan kee ek-od kavitaaye ho. bakee jeevan ko garhane valee kavitaayen bhi zaroori hai. aap me vo pratibha hai.

kavisurendradube ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है आपने

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत भावपूर्ण रचना है।

knkayastha ने कहा…

आपकी कविताओं को पढ़ कर लगता है कि हमारी राष्ट्रभाषा आज भी जीवित है अपने शुद्ध रूप में...
मेरी रूह देह की
कब्र में फ़ड्फ़डाती है
और ना मिलने के
अटल वादे की
आहुतियाँ दिए जाती है...

तेरी इक पुकार की
संजीवनी से जी उठती हूँ
मैं मर- मरकर भी
मर नहीं पाती हूँ...

अति प्रभावशाली रचना...

knkayastha ने कहा…

आपकी कविताओं को पढ़ कर लगता है कि हमारी राष्ट्रभाषा आज भी जीवित है अपने शुद्ध रूप में...
मेरी रूह देह की
कब्र में फ़ड्फ़डाती है
और ना मिलने के
अटल वादे की
आहुतियाँ दिए जाती है...

तेरी इक पुकार की
संजीवनी से जी उठती हूँ
मैं मर- मरकर भी
मर नहीं पाती हूँ...

अति प्रभावशाली रचना...

arun c roy ने कहा…

"...तेरी इक पुकार की
संजीवनी से जी उठती हूँ
मैं मर- मरकर भी
मर नहीं पाती हूँ... "

bahut khoobsurti se bhavon ko piroya hai aapne... sunder kavita ...

महफूज़ अली ने कहा…

बहुत सुंदर पंक्तियों के साथ ..... बहुत सुंदर रचना....

sandhyagupta ने कहा…

Bhavpurn aur sundar abhivyakti.

Dimpal Maheshwari ने कहा…

काबिलेतारीफ है प्रस्तुति।.सारी रचनाये आपकी बहुत ही अच्छी है|

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

तेरे पुकार की संजीवनी, क्या बात है वंदना जी, बहुत सुंदर ।

neera ने कहा…

मानवता की आत्मा पर पत्थर का प्रहार ...जागती है कविता पढ़कर! ..