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रविवार, 7 फ़रवरी 2010

क्या फिर ऋतुराज का आगमन हुआ है ?

सोमरस -सा
प्राणों को
सिंचित करता
तुम्हारा ये नेह
ज्यों प्रौढता की
दहलीज परवसंत का आगमन
नव कोंपल सी
खिलखिलाती
स्निग्ध मुस्कान
ज्यों वीणा के तार
झनझना गए हो
स्नेहसिक्त नयनो से
बहता प्रेम का सागर
ज्यों तूफ़ान कोई
दरिया में
सिमट आया हो
सांसों के तटबंधों
को तोड़ते ज्वार
ज्यों सैलाब किसी
आगोश में
बंध गया हो
प्रेमारस में
भीगे अधर
ज्यों मदिरा कोई
बिखर गयी हो
धडकनों की
ताल पर
थिरकता मन
ज्यों देवालय में
घंटियाँ बज रही हों
आह ! ये कैसा
अनुबंध है प्रेम का
क्या फिर
ऋतुराज का
आगमन हुआ है ?

29 टिप्‍पणियां:

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत सुन्दर है प्रेम का अनुबन्ध ही है इस ऋतु राज से सुन्दर शब्द और सुन्दर अभिव्यक्ति बधाई

amritwani.com ने कहा…

bahut sundar rachna

shekhar kumawat

limty khare ने कहा…

bahut badiya dil tak chu gaye aapke dil ke bat

भूतनाथ ने कहा…

waah.....mera man bhi saraabor ho gayaa....is mahak se...taaji havaa aur pyari kavita ki khanak se....!!

नरेन्द्र व्यास ने कहा…

’’ज्यों देवालय में..............ऋतुराज का आगमन हुआ हुवा है ?’’ वंदना जी, आपने प्यार और नेह का जो प्रतीमान दिया है, सच में प्राणों को सिंचित कर गया। एक और उत्कृष्ट रचना के लिये आभार!!

sangeeta swarup ने कहा…

आह ! ये कैसा
अनुबंध है प्रेम का
क्या फिर
ऋतुराज का
आगमन हुआ है ?


बहुत खूबसूरत शब्दों में बाँधा है प्रेम के अनुबंध को ....सुन्दत अभिव्यक्ति....

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ऋतुराज के आगमन पर प्रेम का सुंदर अनुबंध .......... बहुत कोमल एहसास से सजी है आपकी सुंदर रचना .....

Mahfooz Ali ने कहा…

मुझे भी ऐसा ही लगता है.... ऋतुराज का आगमन फिर से हुआ है.....प्रेम के अनुबंध में यह कविता बहुत अच्छी लगी...

--
www.lekhnee.blogspot.com


Regards...


Mahfooz..

Mahfooz Ali ने कहा…

मुझे भी ऐसा ही लगता है.... ऋतुराज का आगमन फिर से हुआ है.....प्रेम के अनुबंध में यह कविता बहुत अच्छी लगी...

--
www.lekhnee.blogspot.com


Regards...


Mahfooz..

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

वन्दना जी बड़ी गाढ़ी हिन्दी लिखी है...धीरे धीरे पढ़ना पढ़ा

Razi Shahab ने कहा…

sundar rachna

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बसन्त के मौसम में सुन्दर वासन्ती रचना के लिए
बधाई स्वीकार करें!

JHAROKHA ने कहा…

Bahut hee lajavab kavita ---ekdam prakriti ko sametatee huyee.
Poonam

Suman ने कहा…

nice

kshama ने कहा…

Kitne khobsoorat alfaaz hain is rachnake!

Arvind Mishra ने कहा…

जी सच कहा ऋतुराज के आगमन के संकेत तो मिलने ही लग गए हैं

योगेश स्वप्न ने कहा…

behatareen abhivyakti aur sunder shabdon ka chayan, bahut khoob. vandanaji, achcha laga padhkar.

PRAN SHARMA ने कहा…

VANDANAA JEE,AAPNE ACHCHHE KAVITA
KAHEE HAI.BADHAAEE AUR SHUBH KAMNA.

Harsh ने कहा…

vandana ji bahut sundar............

शोभना चौरे ने कहा…

ati sundar basnt ka svagt .

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

...उम्दा रचना, प्रभावशाली!!!!

नीरज गोस्वामी ने कहा…

वाह वंदना जी वाह...शब्दों के अद्भुत चयन और अनूठे भावों के मिश्रण से आपने कमाल की रचना रच डाली है...बधाई..बधाई...बधाई...
नीरज

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत भावपूर्ण व सुन्दर रचना है।बधाई।

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

निश्चय ही आया है प्रिय ऋतुराज !

कविता की बुनावट खूबसूरत है। वसंत की प्रतीति के वर्णन बेहद सुन्दर हैं । आभार।

दीपक 'मशाल' ने कहा…

Vandanaa ji.. aap lagataar achchha likh rahi hain.. pustak kab prakashit kara rahi hain? :)

विचारों का दर्पण ने कहा…

ऋतूराज ....के आगमन में बहुत सुन्दर रचना .

knkayastha ने कहा…

सोमरस -सा
प्राणों को
सिंचित करता
तुम्हारा ये नेह....

स्निग्ध मुस्कान
ज्यों वीणा के तार
झनझना गए हो...

ताल पर
थिरकता मन
ज्यों देवालय में
घंटियाँ बज रही हों...


वाह! इतनी सुन्दर कविता और ऐसी स्नेहशीलता की मेरे जैसे अदना से लेखक को लगातार प्रोत्साहित करती रहती हैं....धन्यवाद...

Parul ने कहा…

bahut sundar bhav!

प्रीति टेलर ने कहा…

ek pratikshit pratiksha jo har dil ko hoti hai vasant ki ....
khubsurat bhav..