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शनिवार, 15 जनवरी 2011

ओ मेरे जीवन के अनमोल टुकड़े

ओ मेरे जीवन के 
अनमोल टुकड़े 
कर दूँ तुझ पे मैं
वारी तन -मन 

सांसों की माला संग 
धडकनों के मनकों पर
गीत नया गुनगुनाया था
जब तू जीवन में आया था 


भोर की लालिमा 
ओस की नाजुकता
कलियों की कोमलता 
तुझमे समाई थी 
तब तू जीवन में आया था 


सप्त सुरों की सरगम 
संग मेरे गुनगुनायी थी
सुरमई छठा ज़िन्दगी में
छाई थी 
जब तू जीवन में आया था 


इन्द्रधनुषी रंगों की आभा
हर तरफ छाई थी 
मौसम की पोर- पोर 
खिलखिलाई थी 
जब तू जीवन में आया था

ए मेरे जीवन के अनमोल टुकड़े

बहारे भी आकर मुस्कुरायी थीं 
जब तू जीवन में आया था 


मगर
वक्त का साया बढ़ता गया
आँचल मेरा छोटा पड़ता गया 
लम्हों पर वक्त भारी पड़ता गया
लगाया था जो पौधा 
बना वृक्ष था 
वक्त के साथ वो बढ़ता गया
अपना आकार लेता गया 
अपनी रफ़्तार से बढ़ता गया
जीवन का नया अध्याय अब खुला था
वक्त रेत सा  हाथ से फिसला था 
 जो कल थी भोर की पहली किरण
आज दिन का उजाला बन गयी है 
कैसे आँचल को अब मैं बढाऊँ
तुझको दामन में कैसे समाऊँ 
उम्र को तेरी मैं कैसे पकडूँ 
कौन सी खोह में तुझे छुपाऊँ
कैसे वक्त से वक्त चुराऊँ 
वक्त अहसास देने लगा है 
इक अहसास दिल को 
कचोटने लगा है 
दिल का टुकड़ा अब 
मेहमान बनने लगा है
जुदाई का वक्त नजदीक आने लगा है
आ आकार मुझको डराने लगा है 
बार -बार मुझसे ये कहने लगा है
हाँ , लाडली मेरी बड़ी हो गयी है

अब कैसे तुझ बिन जी पाऊँगी 
बिछोह कैसे सह पाऊँगी 
कैसे तुझे परायी कर पाऊँगी
इन अहसासों से गुजरने लगी हूँ
हाँ , लाडली अब मैं डरने लगी हूँ ................


 बस इसके आगे कहने की अब हिम्मत नहीं ...........आज मेरी बिटिया का जन्मदिन है और दिल में ना जाने कितनी बाते हैं मगर शब्द कम पड़ रहे हैं आज  और ना ही वो शब्दों में सिमट रहे हैं.........बस ये  अहसास होने लगा है कि अब बेटी २० साल की हो गयी है तो बस कुछ साल और मेरे साथ है उसके बाद तो ...........ये अहसास ही दिल को कचोट रहा है  ............वक्त कैसे और कितनी जल्दी भागता है कि ज़िन्दगी कम लगने लगती है ...........कल जो मेरी गोद में थी आज इतनी बड़ी हो गयी है ...........शायद हर माँ इन अहसासों से गुजरती होगी और एक मेरे जैसा डर ही उसे भी लगता होगा कि एक दिन जुदा करना पड़ेगा अपने कलेजे के टुकड़े को .............और नहीं लिख पा रही............

बुधवार, 12 जनवरी 2011

मोहब्बत के बीज

आज एक साया
धुंध का कम्बल
लपेटे मेरे दिल के
दरवाज़े पर दस्तक
दे गया
चेहरा  नज़र ही
नहीं आया
कौन था कैसा था
मगर फिर भी
ना जाने किस
अधिकार से
वो सब कह गया
जो मैं सुनना
चाहती रही
शायद इसी के लिए
तो जीती रही

वो आया एक
खामोश तूफ़ान
बनकर
बोला तो दास्ताँ
बन गयी
कहता था---------

 ओ अन्दर ही अन्दर
खुद से लड़ने वाली
मगर कभी ना
स्वीकारने वाली
तुझे आज मैं
मोहब्बत सिखा जाऊँ
कुछ लम्हे मोहब्बत के
तुझमे भी बो जाऊँ
मोहब्बत से इतना
गिला क्यूँकर
हर दिल में इक
सागर समाया है
फिर तुझमे इतना
गरल क्यूँकर
आ आज मोहब्बत की
सांसें तुझमे फूंक जाऊँ
जब भी सांस ले तो
मोहब्बत ही साँसों में
उतर  जाये
हर सांस के साथ
मोहब्बत का ही
आगाज़ हो जाए
आज तेरे दिल
के मरघट में
मोहब्बत के कुछ
गुलाब उगा जाऊँ
फिर हर गुलाब में
तुझे सिर्फ मोहब्बत के
पंख ही मिलें
हर गुलाब तुझमे
मोहब्बत की धडकनें
बिछा जाए
तू ओढ़कर मोहब्बत
की चादर प्रेम
दीवानी हीर बन जाये
बस तू एक बार
मुझे खुद में
उतरने तो दे
एक बार दिल की
इबारत पढने तो दे
दिल की वादी में
मोहब्बत ही मोहब्बत होगी
और तू मोहब्बत की
बिखरी चाँदनी की
श्वेत धवल चादर पर
पाँव जब रखेगी
एक नूर की बूँद
तेरे स्वागत को तरसेगी
और तू फिर खुद
मोहब्बत का गीत बन जाएगी
और जुबाँ तेरी सिर्फ
एक ही गीत गुनगुनायेगी
हाँ ...........मोहब्बत हो गयी मुझे
जैसे भ्रमर ब्रह्म ब्रह्म करते करते
ब्रह्म ही बन जाता है वैसे ही
तू भी  मोहब्बत मोहब्बत

करते करते
मोहब्बत ही बन जायेगी
फिर ना मोहब्बत से
कभी लड़ पायेगी

इतना कह वो साया
धुंध में विलीन हो गया
और मुझमे मोहब्बत की
इक कनी रोप गया
और अब मोहब्बत ही
मेरी ज़िन्दगी बन गयी

अब तलाशती हूँ
उस साये को
जो मिलकर भी
नहीं मिलता

आह! फ़कीरा
ये तूने क्या किया

रविवार, 9 जनवरी 2011

आत्ममंथन की प्रक्रिया सतत चलती रहती है

अब ना कोई चाहत ना कोई खोज
शायद यही होता है खुद को पाना
 जहाँ पहुच कर हर चाह मिट जाये
जहाँ "मैं "का भास हो जाये
हर चिन्ह , हर परछायीं
फिर चाहे वो खुद
की ही क्यूँ ना हो
कोई ना डरा पाए
जहाँ "तू" और "मैं" 
अभेद हो जाए
जहाँ सांसारिक चाह
हर सुख , हर इच्छा
विराम पा जाए
मुक्तिबोध हो जाये
और आत्ममंथन की
प्रक्रिया संपूर्ण हो जाए

ये सब कहना कितना आसान है ना…………बेशक इसमे से गुजरी भी हूँ मगर क्या ऐसा निर्लेप रहना सम्भव है?वो भी संसार मे रहकर्………बड़े बड़े ऋषि मुनि ज्ञानी ध्यानी जब ब्रह्मज्ञान  के मर्मज्ञ हो गए तब भी पथ  से डिग गए तो मेरे जैसी  अदना सी इन्सान क्या इन सबसे खुद को विलग रख पायेगी.........क्या एक छोटा सा झोंका हवा का इसके तिनको को उडा  ना ले जायेगा..........क्या एक हलकी सी  वक्त की ठोकर सारे ज्ञान को धराशायी  ना कर देगी ............समझ आना , खुद को जानना , आत्मतत्व पहचानना सब कितना आसान लगता है मगर वक्त की सिर्फ एक आँधी सारे ज्ञान को निर्मूल सिद्ध कर देती है ...........क्यों?

क्योकि रहना तो आखिर संसार  में ही है ना ..........कैसे मोह के बंधनों से और कब तक मुक्त रख सकते हैं ? कब तक सिर्फ अपने लिए जी सकते हैं ...........कहना आसान है खुद के लिए जीने लगे मगर क्या जीना इतना आसान है  .........जब भी खुद के लिए जिए ज़माने ने जीने ना दिया और जब ज़माने के लिए जिए तो भी जीने ना दिया...........अब सारा ज्ञान  है मगर फिर भी कुछ संशय सिर उठा रहे हैं ............कर्म भी किये , फल भी मिले मगर फिर भी संतुष्ट ना हुए ...........कर्मफल की इच्छा भी नहीं रखी फिर भी कर्तव्यनिष्ठ ना कहलाये............ना जाने ऐसे कितने सवाल अभी भी अपनी दिशा खोज रहे हैं ...........सभी तो कृष्ण नहीं होते ना जो संसार में रहकर भी असंग रहें ..........पल में दामन छुड़ा लें ...........कैसे एक सांसारिक व्यक्ति सब कुछ जानकर , संसार को मिथ्या मानकर, अपने आप को पहचानकर , आत्मावलोकन करके भी संसार में रहते हुए खुद को नि:संग रख सकता है ? अब ये प्रश्न कुलबुला रहा है ............बेशक आत्ममंथन के बाद सारा गरल बह जाता है बचता है तो सिर्फ अमृत्तत्व .................मगर तब भी ये यक्ष प्रश्न एक आम व्यक्ति की दृष्टि से अपना मूँह उठाकर खड़ा है ............कैसे संसार में रहकर संसार से बचे? कहना आसान है जल में कमलवत रहना ऐसे ही संसार में रहना मगर क्या संसार रहने देता है ............क्या संसार में रहकर ऐसे रहा जा सकता है.............संसार के मन की भी करनी ही पड़ती है और कम से कम तब तक तो जरूर जब तक इस समाज में हम सामाजिक प्राणी बनकर रहते हैं वरना सब कुछ छोड़ देना और अपने कर्तव्यों से मुँह मोड़ लेना बहुत आसान होता है मगर एक नारी के लिए वो भी इतना सरल नहीं उसके ऊपर तो ना जाने कितनी जिम्मेदारियां होती हैं ...............उसी ने तो नव निर्माण करना होता है ............वो नींव रखनी होती है जिस पर एक ईमारत सिर उठाकर  बुलंद होती है ...............उसे ही संस्कारों की फसल उगानी होती है ...........उसे ही समाज के सारे आचार -विचार सहेजने होते हैं ............आखिर वो ही तो हस्तांतरित करती है एक पीढ़ी से दूसरी में ................और इन सब जिम्मेदारियों के बीच अपने लिए जीने की जद्दोजहद भी करनी होती है ............ऐसे में कैसे वो विमुख हो सकती है अपने कर्तव्यों से ..............सबमे तालमेल स्थापित करना होता है ..............तभी कहा कि सभी कृष्ण नहीं बन सकते ............प्रेम भी करो मगर लिप्त मत हो किसी में .............यही है ना कृष्ण भाव ..............कोशिश करुँगी ऐसे भी जीने की  ................हाँ इतना अवश्य है इस आत्ममंथन के बाद कि थोडा सा जीवन का ढंग बदल लिया जाए ............कर्त्तव्य पालन भी किया जाए मगर उसमे डूबा ना जाए , अपने अहम् को आड़े ना आने दिया जाये , मैं को ख़त्म कर दिया जाए ................समाज में रहकर समाज से निर्लिप्त रहने का अभ्यास किया जाये  ..........शायद ये इतने बड़े आत्ममंथन के बाद बचे कुछ ज्वारों के अवशेष हैं जो धीरे धीरे वक्त के साथ शांत हो जाएँ कभी कभी ऐसा लगता है ...........चलो जो भी हुआ ............मगर ये पता चला कि मैं हूँ सिर्फ मेरे लिए किसी के लिए नहीं ............मेरे होने ना होने से किसी को फर्क नहीं पड़ेगा इसलिए लगता है ये आत्ममंथन की प्रक्रिया जीवन पर्यंत चलानी  पड़ेगी ताकि कभी कोई कलुषता, कोई विषमता, कोई भी तूफ़ान मिले आत्मज्ञान को मिटा ना सके ...........अपने चक्रव्यूह में फिर से ना फँसा सके ............आत्ममंथन एक सतत प्रक्रिया है निरंतर बहने वाला झरना जिसमे डूबे रहने पर फिर किसी अवलंबन की जरूरत नहीं पड़ती ............दृष्टि स्थिर हो जाती है .............एक्य भाव समाहित हो जाता है .


 मगर फिर भी यही निचोड़ निकल कर आया ...........सांसारिक व्यक्ति के जीवन में आत्ममंथन की प्रक्रिया निरंतर चलती रहनी चाहिए तभी वो संसार में रहकर भी संसार से विलग रह सकेगा ..............

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

आत्ममंथन की प्रक्रिया मे ……………………(4)

आह! दर्द आज बहुत रुला रहा है ..........क्यूँ? क्या कारण है नहीं जान पा रही मगर कुछ तो है जो कहीं तो घटित हो रहा है मगर ह्रदय इतना व्याकुल क्यूँ हो रहा है ? कौन सा इसका सामान छीन   रहा है जो इसका आसमां इसे छोटा पड़ रहा हो ..........क्या आत्ममंथन की प्रक्रिया में यथार्थ का धरातल भी कम पड़ने लगता है या उस पर पैर नहीं टिक पाते हैं ...........कौन सी फाँस है जो निकल नहीं पा रही या कौन सा ऐसा चूल्हा है जिसमे आँच नहीं रही और मंथन की प्रक्रिया में विष का असर बढ़ता ही जा रहा है शायद अमृत से पहले का आखिरी विष है ये तभी इतना मथ रहा है कि विचार एकत्र नहीं हो पा रहे .............सब छिन्न भिन्न हो रहा है .............सब ओर सिर्फ भटकन ही भटकन .................सिर्फ घोर अन्धकार के सिवा और कुछ नहीं ............सुबह से पहले गहराते अंधियारे का अंदेशा लग रहा है शायद .............ओह! ये क्या हो रहा है ..............इतना विचलन ? इतनी अस्थिरता तो पहले कभी नहीं हुई ? उफ़ ! नहीं सहन हो रहा ! कैसे विषवमन करूँ कि खुद को सार्थक कर सकूँ?

हर क्रिया की

प्रतिक्रिया होती है
हर सुबह की
शाम होती है
हर रात का
दिन होता है
सुना करती थी
मगर ये क्या
यहाँ तो
घटाटोप अंधियारे
घन छा रहे हैं
बिजलियाँ कड़क रही हैं
तूफानी हवाएं
अपने साथ सारे
विचारों को
उडा ले जा रही हैं
कहीं कहीं तो
भयावह चक्रवात
अपने साथ
हर छोटी बड़ी
अडिग, धीर -गंभीर
उम्मीदों , आशाओं
संवेदनाओं  की
चट्टानों को भी
धराशायी कर रहे हैं
सब हो रहा है
मगर सागर
ऊपर से शांत है
और उसके अन्दर
ये कैसी कैसी
सूनामियां आ रही हैं
क्या आत्ममंथन में
ऐसे विषबुझे बाण लगते हैं
कि हर ओर
सिर्फ शिव तांडव
ही दिखाई देता है
प्रकृति का उपसंहार
ही नज़र आता है
शायद यही होता है
शांति की ओर
अग्रसित पहला कदम
शायद यही होता है
अमृतत्व की प्राप्ति
की ओर पहला कदम
शायद यही होता है
आत्ममंथन से
आत्मदर्शन की
ओर पहला कदम

शायद यही होता है
आत्ममंथन के बाद प्राप्त
वो अमूल्य धन 
जिसे पाने के बाद 
और कोई चाह नही रहती
और आत्ममंथन की
प्रक्रिया  पूर्णता
प्राप्त कर लेती है………

क्रमशः ...........

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

आत्ममंथन की प्रक्रिया में…………………(3)

क्या आत्ममंथन इतना सरल होता है ? पीछे जो चिन्ह छोड़ आई हूँ उसके निशाँ एक काले साये की तरह पीछे पीछे आ जाते हैं ..........सोचती हूँ ना याद  करूँ इन्हें मगर कुछ साये ऐसे होते हैं जो आप चाहो या ना चाहो स्वयं आकर लिपट जाते हैं ...........क्या मैं एक खिलोने के अलावा कुछ नहीं ? क्या मुझे सबकी ख़ुशी के लिए जीना चाहिए चाहे इसके लिए मेरी मर्यादा ही ध्वस्त  क्यूँ ना हो जाये ?
 आज कुछ याद आ गया .........कृष्ण का प्रेम कहो या गोपियों का प्रेम मगर कुछ तो था वो भी ........सोच रही थी कि हम कहते हैं कृष्ण तुम निष्ठुर हो , निर्मम हो .........गोपियों के निस्स्वार्थ प्रेम को नहीं समझे अगर समझे होते तो उन्हें यूँ तन्हा ना छोड़ गए होते या कहो राधा को अपना लिया होता या कहो राधा से विवाह कर लिया होता..........मगर क्या सम्पूर्णता सिर्फ शादी में ही प्राप्त होती है ? ऐसे ना जाने कितने प्रश्न व्यथित करते थे ?और देखो ना आज उसी मोड़ पर ले आये हो कृष्ण तुम मुझे..........अब कैसे खुद का आत्मविश्लेषण करूँ ? ............जिधर देखती हूँ तुम्हारा ही कोई ना कोई प्रतिरूप मुझे चाहता प्रतीत होता है ..........मुझे भी नहीं मेरे ख्यालों को , मेरे विचारों को , मेरी भावनाओं को ..........कभी कभी लगता है जैसे अगर उसके विचार ना सुने तो शायद वो ज़िन्दा ही ना रहे ..........आह ! कृष्ण ऐसा लगता है जैसे तुम मुझे कुछ समझा रहे हो ..........मेरे माध्यम से कुछ कहलवाना चाहते हो .........प्रेम तो सिर्फ राधा थी मगर वो तुमसे कब जुदा थी इसलिए सबको यही लगता रहा कि तुम निष्ठुर हो जबकि वो तुममे ही तो समायी थी ...........ऐसा ही अनुभव शायद मुझे करा रहे हो ...........है ना ! मुझे भी सब निष्ठुर , निर्मम कहते हैं............लेकिन प्रीत की डोर तो सिर्फ एक से ही बंधती है तो फिर कैसे सारे जहाँ को समेटूं स्वयं में .........मैं शायद आज समझी हूँ तुम्हारे नि:संग रहने का राज़ ................. मगर ये सबको कैसे समझाऊँ?

ये तो सिर्फ आत्मविश्लेषण का एक पड़ाव भर है ............आगत की चिंता नहीं विगत की अब परवाह नहीं मगर वर्तमान भी जब बोझिल होने लगे तो कैसे जिए कोई ?.............वर्तमान की हर कड़ी मुझमे जुड़ना चाहती है मगर मैं उसे जोड़ नहीं पाती हूँ ये कैसी उहापोह में फँस गयी हूँ ..........कैसी कशमकश है .........है ना ? क्या चाहती है अब ज़िन्दगी मुझसे? पलायन करने का शौक नहीं है सामना कर भी रही हूँ मगर तब भी लगता है कहीं भटक रही हूँ ..........ये जो आंतरिक सूक्ष्म विश्लेषण होते हैं ना ये मुझे नोचने लगते हैं जैसे ही कोई उजाले की किरण दस्तक देने लगती है .........कुछ भयावह , बेजान आवाजें सुनने लगती हूँ जो मुझे मुझसे छीनने लगती हैं...........अब इन आवाजों से मुक्त कैसे होऊं? जिन्हें सिर्फ मैं ही सुन सकती हूँ ...........सब कुछ तितर - बितर हो चुका है मेरा पूरा अस्तित्व ध्वस्त  हो रहा है ...........कितनी गहन है ना आत्ममंथन की ये प्रक्रिया ...........कोई नव निर्माण नहीं सिर्फ विध्वंस ही विध्वंस ............और उसके बाद कुछ अवशेष जिनका कोई संग्रहकर्ता नहीं ...........नहीं बनते ऐसे अवशेष किसी संग्रहालय की धरोहर .............सुना था मंथन के बाद पहले विष निकलता है और उसके बाद अमृत मगर यहाँ तो सिर्फ विष ही विष निकला जिसकी अग्नि में सब स्वाहा हो गया ..............अवशेष ही अपनी किस्मत पर आँसू बहाते मिले ..............लगता है प्रक्रिया जारी रहेगी ..............अभी पूर्ण आत्ममंथन नहीं हुआ................   

क्रमश:……………

बुधवार, 5 जनवरी 2011

आत्ममंथन की प्रक्रिया मे……………………(2)

ना जाने किसने
ओस की नमी चुरा ली
ना जाने कहाँ खो गयी
मुझे " मै " नही मिल रही
आज आत्मावलोकन करने बैठी हूँ और मन के आईने में खुद को ढूँढ रही हूँ ...........कहाँ हूँ मैं ? मैं क्या थी और आज क्या हूँ?..........इसी उहापोह में भटक रही हूँ ...........क्या हुआ है मुझे ..........कैसे इतना बदल गयी, कहाँ मेरी सारी संवेदनाएं स्वाहा हो गयीं ...........कौन सा यज्ञ  किया जिसने मेरी मानवीय , चंचल , भयभीत हिरनी सी कोमल भावनाओं को तिरोहित किया ............क्या जीवन यज्ञ  इतना कठोर होता है कि हर संवेदना  को  ठूंठ बना देता है जिस पर कभी कोमल कुसुम पुष्पित , पल्लवित हुए थे उस शाख को वक्त और हालात की अग्नि में भस्मीभूत   कर देता है और फिर एक बेसहारा , बदरंग , निर्बल , निसहाय ठूंठ का अवशेष मूँह चिढ़ाता स्वयं का अवलोकन कर रहा होता है ............कभी याद आता है वो वक्त जब सिर्फ उमंगो के रथ पर सवार किसी शाही राजकुमारी सी भावनाएं  प्रवाहित होती थीं............जैसे कोई चंचल शोख नदिया बेतकल्लुफ सी बही जा रही हो अपने अन्दर ना जाने कितने भीने भीने अरमानो को संजोये ...........फिर क्यूँ ऐसे हालात  के पत्थर राह में आते गए जो उसकी उमंगों को , उसकी कुंवारी अभिलाषाओं को , उसकी निश्छल मुस्कान को बर्दाश्त ना कर पाए और उसे भी एक उमगती .चंचल हिरनी से वक्त की सलीब पर एक  निष्ठुर  व् निर्मम संवेदनहीन तूफ़ान बना दिया .............क्या विश्वासघात, धोखे और प्रपंच इन्सान की इस तरह निर्मम हत्या कर देते हैं कि वक्त के आईने में वो खुद कोभी नहीं पहचान पाता ...........कैसे संवेदनाएं इतनी क्रूर हो जाती हैं कि अपने भी पराए नज़र आने लगते हैं या कहो अपनों में से भी कोई अपना मिलता ही नहीं ...........सब रसहीन , रंगहीन , गंधहीन बासी फल ही नज़र आते हैं  जिनमे कहीं आत्मीयता का दर्शन होता ही नहीं सब अपनी जरूरतों के पुतले ही नज़र आते हैं ..............शायद इसीलिए आज आत्मावलोकन की जरूरत पड़ गयी ...........मगर मुझे इस सफ़र में "मैं" कहीं नहीं मिली ..........वो जो दुनियादारी जानती ही नहीं थी ..........वो जो सबको अपना मानती थी ...............वो जिसका दिल हर प्यार  भरे दिल के लिए धड़कता था ...............वो जो अपने लिए ना जीकर  दूसरे के लिए जीती थी और सबकी ख़ुशी में खुश हो लेती थीआज वो कहीं खो गयी है ना जाने कौन से रसातल में  उसका वजूद समाहित  हो गया है कि अब ढूँढ रही है मगर सूखे बेजान मुर्दा  अहसास कब ज़िन्दा होते हैं...........देखा क्या थी और क्या बन गयी हूँ.....शायद इम्तिहान अभी और बाकी हैं …………खुद से मिलने तक ...............

क्रमशः................

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

आत्ममंथन की प्रक्रिया में..................(1)

आत्ममंथन की प्रक्रिया में
कार्य प्रगति पर है
कृपया दस्तक ना दें
कहीं ऐसा ना हो
दस्तक देते ही प्रहार
आप पर हो जाये
और रिश्ता जो
कोई कहता है
कि है हमारा कुछ
वो टूट जाए
बच कर चलें
कहीं यूँ ना हो
सारा गरल आप पर
ही उंडेल दिया  जाए 





ज़िन्दगी ही इक गरल है जिसे सभी को खुद पीना पड़ता है ............मगर हर पीने वाला शंकर  नहीं होता .............अपने आप को चटकते देखना और कुछ भी करने में असमर्थ होना .............मगर फिर भी जीना ............आह ! जब अपने आप को ही तुम खुद चुभने लगो फिर कैसे बचोगे? और किससे? उफ़ ! खुद को सीना कितना मुश्किल होता है ना………देखो ना बीच बीच मे बखिया अब भी गायब हो रही है शायद टांके ठीक नही लग रहे…………अभी और आत्मविश्लेषण करना होगा…………शायद कोई सिरा जो छूट गया था किसी मोड पर एक बार मिल जाये और जीने का अर्थ समझ आ जाये………तब तक तो ये गरल पीना ही होगा .

क्रमशः .............

रविवार, 2 जनवरी 2011

विदा करो मुझे

विदा करो मुझे
अब अपनी रूह से
अब नहीं रुक पायेगी
रूह मेरी तेरे साथ
रूह की चादर पर
टंगे तेरे ख्वाब
अब नयी ताबीर
नहीं लिख पाएंगे
मेरी ज़ख़्मी रूह के
हर नासूर  पर
एक ठुकी कील
ज़ख्मों को
हरा भरा रखती है
और रूह का तंतु
अब तार तार हो चुका है
देख ना
झुलस चुका है
हर तागा रूह के
तंतुओं का
फिर बता
अब कैसे रुकूं
कैसे चिथड़ों को
समेटेगा
जहाँ रूह का
अस्तित्व भी
क्षत विक्षत
हो चुका है
वहाँ कैसे
अब अपने
प्रेम का
आसमाँ उकेरेगा
अगर हुआ कोई जन्म
तो मिलेंगे शायद
बस अब
तब तक के लिए
विदा करो मुझे
मेरे प्यार !

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

लम्हों की कहानी सदियों की जुबानी हो जाये ..............200 वी पोस्ट

कल तेरे शहर की हवा ने
दस्तक दी मेरे दरवाज़े पर
ना जाने किसने राह दिखाई
कैसे खबर हुई ,किसने पता बताया

गुमनाम पता कौन ढूँढ  लाया
क्या तुम जानते थे मैं कहाँ हूँ ?

मुद्दत बाद देखा है तुम्हें
इक अरसा हुआ देखे हुए
लगा जैसे सदियाँ बह गयी हों
सिर्फ एक लम्हे में
कहो ना ............
कैसे जाना मैं कहाँ हूँ ?

क्या करोगी जानकर
ये दिल के सौदे होते हैं
तुम्हारे लिए मैं सिर्फ
एक ख्याल रहा
हवाओं में तैरता हुआ
फिर कैसे जानोगी
दिल के उफनते लावे को
क्या क्या  बह रहा है
तुम्हारे साथ तुम्हारे बिन
मैं पता किससे पूछता
तुमने कब बताया था
ये तो हवाओं ने ही
मुझे  तुमसे मिलवाया है
और पाँव खुद-ब-खुद
तुम्हारे शहर में ले आये हैं
आखिर दिल के मोड़ों पर
तुम्हारा ही तो नाम लिखा है

आज कह लो सब
सुन रही हूँ
वो दरिया जो सिकुड़ गया था
तुम्हारी उदासियों में
और वो जो दिल की मिटटी पर
ख्यालों का लेप तुमने लगाया था 
जब मैंने अपनी कसम में तुम्हें
और तुम्हारे अरमानों को जिंदा लिटाया था
उन सभी तुम्हारे अनकहे जज्बातों  को
शायद आज समझी हूँ
उम्र के उस मोड़ को
जो पीछे छोड़ आई हूँ
आज पकड़ने की ख्वाहिश जन्म ले रही है
कहो आज दिल की दास्ताँ ..............

तुम क्या जानो
प्रेम डगर की सूक्ष्मता
कैसे तुम्हारे बिना पलों ने  मुझे बींधा है
देखो 
मेरे दिल का हर तागा
कैसे ज़ख़्मी हुआ है
जैसे अर्जुन ने शर- शैया पर भीष्म को बींधा हो
और वो तब भी हँस रहा हो
आखिर ज़ख्म भी तो मोहब्बत ने दिया है
तुम्हारे बिना जीया ही कब था 
ये तो एक लाश ने वक्त को
कफ़न में लपेटा हुआ था
शायद कभी कफ़न चेहरे से हट जाये
शायद कभी दीदार तेरा हो जाये
शायद कभी जिसे तुमने नेस्तनाबूद किया
वो बीज एक बार फिर उग जाए
प्रेम का तुम्हें भी कभी कोई लम्हा चुभ जाये
तुम भी शायद कभी मुझे आवाज़ दो
वैसे ही तड़पो
जैसे कोई चकवी चकोर को तरस रही हो
मगर तुमने ना आवाज़ दी
न तड्पी मेरे लिए
तुम तो वो जोगिन बन गयीं 
जिसे श्याम सिर्फ सपनो में मिलता है
प्रेम की अनंत ऋचाएं
और तुम उसकी परिणति
सिर्फ अँधेरे कोनो में ही
समेट लेना चाहती थीं
पता है तुम्हें
जब भी तुम सिसकती थीं
वो आह जब मुझ तक पहुँचती  थी
देखना चाहती हो क्या होता था
देखो ...
देख रही हो ना
ये जलता हुआ निशान 
ये उसी सिसकी की निशानी है मेरे सीने पर
देखो कितने निशाँ हैं तुम्हारी चाहत के
क्या गिन पाओगी इन्हें ...
देखो तो
अब तक हरे हैं ...

उफ़ !
ज़िन्दगी ना मैं जी पायी हूँ
ना तुमने कभी करवट ली
जानती हूँ
मगर देर हो गयी न
तुम और तुम्हारी दुनिया
मैं और मेरी दुनिया
अपना अपना संसार
दो ध्रुव ज़िन्दगी के
कभी देखा है ध्रुवों को
एकाकार होते हुए

अरे क्या कह रही हो
कब और कैसे ध्रुवीकरण कर दिया तुमने
मैं तो आज भी तुम्हें खुद में समाहित पाता हूँ
जब खुद से भटक जाता हूँ
तुममे खुद को पाता हूँ
जब भी तुम्हारी
याद की ओढनी ओढ़कर
चाहत चली आई
तारों की मखमली चादर मैंने बिछायी
उस पर तुम्हारी याद की सेज सजाई
कहो फिर कैसे कहती हो
जुदा हैं हम
क्या नहीं जानतीं
चाहतों का सुहाग अमर होता है


चलो आओ आज फिर
एक नयी शुरुआत करें
जो छूट गया था
कुछ तुममे और कुछ मुझमे
कुछ तुम्हारा और कुछ मेरा
वो सामान तलाश करें

जो चाहत परवान ना चढ़ी

जो दुनिया के अरमानो पर जिंदा दफ़न हुयी
चलो आओं आज उसी चाहत को
अपने दिल के आँगन में एक साथ उगायें
आखिर बरसों की जुदाई के
तप में कुछ तो तपिश होगी
कुछ तो अंकुर होंगे
जो अभी बचे होंगे
जिन्हें अभी नेह के मेह की तलाश होगी 
कुछ फूल तो जरूर खिलेंगे...है ना 


वक्त की दहलीज पर
तेरा मेरा मिलना
ज्यूँ संगम किसी क्षितिज का होना
तुम और मैं
आज मोहब्बत को नया आयाम दें
तुम्हारे लरजते अधर
आमंत्रण देते नयन बाण
ये उठती गिरती पलकें
दिल की धडकनों का
पटरी पर दौड़ती रेल की
आवाज़ सा स्पंदन
हया की लालिमा
सांझ की लालिमा को भी शर्मसार करती हुई
मुझे बेकाबू कर रही है
मैं भीग रहा हूँ
तुम्हारे नेह की धारा में
अब होश कैसे रखूँ
देखो ना ...
मेरी आँखों में तैरते गुलाबी डोरों को
क्या इनमे तुम्हें
एक तूफ़ान नज़र नहीं आता
बताओ तो
कहाँ जाऊँ अब?
कैसे सागर की प्यास बुझाऊँ ?
अधरामृत की मदिरा में कैसे रसपान करूँ ?
कुछ तो कहो ना ..
तुम तो यूँ
सकुचाई शरमाई
इक अलसाई सी अंगडाई लग रही हो
क्या तुम्हें मेरे प्रेम  की तपिश
नेह निमंत्रण नहीं दे रही
कैसे इतना सहती हो ?
मैं झुलस रहा हूँ
तुम्हारा मौन और झुलसा रहा है


अरे रे रे ...
ये क्या सोचने लगीं
देखो ये वासनात्मक राग नहीं है
ये तो प्रेम की उद्दात तरंगो पर बहता अनुराग है
तुम इसे कोई दूसरा अर्थ ना देना
जानती हो ना
प्रेम के पंछी तो सिर्फ तरंगों में बहते हैं
वहाँ वासना दूर कोने में खडी सुबकती है
ये प्रेमानुभूति तो सिर्फ 
रूहों के स्पंदन की नैसर्गिक क्रिया है



जानती हूँ ...
रूहें भटक रही हैं
मगर तब भी इम्तिहान अभी बाकी है
बेशक तुम्हारे संग
मैंने भी ख्वाबों की चादर लपेटी है
जहाँ तुम , तुम्हारी सांसें
तुम्हारे बाहुपाश में बंधा मेरा अक्स
जैसे कोई मुसाफिर
राह के सतरंगी सपने में
एक टूटा तारा सहेज रहा हो
जैसे कोई दरवेश
खुदा से मिल रहा हो
जैसे खुदा खुद आज
आसमां में मोतियों की झालर टांग रहा हो
है ना ....यही अहसास !
मगर फिर भी
ना तुम ना मैं
अभी अपने किनारों से अलग हुए हैं
फिर कहो कैसे बाँध तोड़ोगे ?
क्या भावनाएं बाँधों से बड़ी हो गयीं
या हमारी पाक़ मोहब्बत छोटी हो गयी
मोहब्बत ने तो कभी
रुसवा नहीं किया किरदारों को
फिर तुम कैसे झुलस गए अंगारों पर
माना ...मोहब्बत है
इम्तिहान भी तो यही है
जब तुम हो और मैं हूँ
दिल भी है धड़कन भी है
अरमान भी मचल रहे हैं
मगर यूँ 
सरे बाज़ार बेआबरू नहीं होती मोहब्बत
किसी एक चाहत की लाश पर नहीं सोती मोहब्बत


तो फिर तुम ही कहो क्या करें
कैसे अब के मिले
फिर कभी ना बिछडें
अब दूरियां नहीं सही जातीं
जानता हूँ ...
हालात इक तरफा नहीं
जो तूफ़ान यहाँ ठहरा है
उसी में तुम भी घिरी हो
अपनी मर्यादा की दहलीज पर
मगर अब तो कोई हल ढूंढना होगा
मोहब्बत को मुकाम देना होगा
जो कल ना मिला
वो सब आज हासिल करना होगा
बहुत हुआ
जी लिए बहुत ज़माने के लिए
चलो अब कुछ पल
खुद के लिए भी जी लें
 जो अरमान राख़ बन चुके थे
उन्हें ज़िन्दा कर लें


मगर कैसे?

क्या बता सकोगे ?
कैसे जहाँ से बचोगे
जो दुनिया
गोपी कृष्ण भाव को ना जान पाई
वहाँ भी जिसने तोहमत लगायी
वो क्या प्रेम की दिव्यता जान पायेगी
तुम्हारे और मेरे
प्रेम को कसौटी की
चिता पर ना सुलायेगी
जहाँ जिस्म नहीं आत्माएं सुलगेंगी
वहाँ प्रेम की सुगंध नहीं बिखरेगी
दुनिया की नृशंसता नर्तन करेगी
वो तो इसे जिस्मानी प्रेम ही समझेगी
ऐसे मे
क्या दुनिया को समझा सकोगे?
मोहब्बत की पाक़ तस्वीर दिखा सकोगे?
क्या दुनिया समझ सकेगी?
क्या फिर से मोहब्बत दीवारों में ना चिनेगी ?


तो बताओ तुम ही क्या करूँ मैं
अब नहीं जी सकता
एक बार खो चुका हूँ
अब फिर से नहीं खो सकता

वो तो अब मैं भी
इतनी आगे आ चुकी हूँ
वापस जा नहीं सकती
तुमसे खुद को जुदा कर नहीं सकती
तुम्हारे बिन इक पल अब
फिर से जी नहीं सकती


तो फिर आओ

आज निर्णय करना होगा
क्या मेरा साथ दोगी उसमे
आज मोहब्बत तेरा इम्तिहान लेगी
क्या दे सकोगी ?

तुम कहो तो सही
यहाँ ज़िन्दा रहकर मिल नहीं सकते
और काँटों की सेज पर
फिर से सो नहीं सकते
तो क्यूँ ना ऐसा करें
.......................
हाँ हाँ कहो ना
......................
तुम जानते हो
क्या कहना चाहती हूँ
ये तो जिस्मों की बंदिशें हैं
रूहें तो आज़ाद हैं


हाँ सही कह रही हो
मेरा तो हर कदम
तेरी रहनुमाई के सदके देता है
तेरे साथ जी ना सके
गम नहीं
रूह की आवाज़ पर भी थिरकता है


तो फिर आओ
चलें .............
उस जहाँ की ओर
जहाँ मोहब्बत
चिरायु हो जाए
लम्हों की कहानी
सदियों की जुबानी हो जाये ..............

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

'कहीं तुम वही तो नहीं हो जाना '

वो जोगी
अलख जगाता रहा
पूजन अर्चन वंदन
करता रहा
तप की अग्नि में
खुद की आहुति 
देता रहा
देवी दर्शन की
चाह में
लहू से अपने
तिलक लगाता रहा
चौखट पर देवी की
'स्व' को भस्मीभूत
करता रहा 
कठोर व्रत नियम 
करता रहा
और इक दिन
हो गयी
प्रसन्न देवी
दिए दर्शन
कहा ------
"माँग वरदान "
जोगी को 
नव जीवन मिला
वर्षों के तप का
फल मिला 
देवी को देख
स्व को भूल गया
जोगी के हर्ष का
ना पारावार रहा 
हर्षातिरेक में 
भिक्षा ऐसी 
माँग बैठा 
जीवन ही अपना
गँवा बैठा
भिक्षा में देवी से
'मोहब्बत'
मांग बैठा
और जन्मों की 
तपस्या को 
पल में 
जन्मों के लिए
गँवा बैठा
'तथास्तु' कह 
देवी अंतर्धान 
हो गयी
और अब 
ढूँढता फिरता है
मोहब्बत को
अर्धविक्षिप्त सा 
'कहीं तुम वही तो नहीं हो जाना '

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

अंकुर जरूर फ़ूटेंगे एक दिन

मै तो
कल भी
वही थी
और आज भी
तुम ही
ना जाने
किस मोड
पर मुड गये
अब खाली
मोड ही
रोज चिढाता है
मगर
आस का
दीप अभी
बुझा नही है
शायद
किसी
गोधुलि वेला मे
तुम आओगे
जीवन को
मुकाम देने
और अपने
नेह को
आयाम देने

देखो
सूखने मत देना
इस आस के
वृक्ष को
तुम्हारे इंतज़ार के
पवित्र जल से
सींच देना
अंकुर जरूर फ़ूटेंगे
एक दिन
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-------------

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

कोई तो है

कोई तो है
जो रूह बना
लहू बन
रगो मे बहा
फिर कैसे कहूं
कोई नही है


कोई तो है
जो अहसास
जगा गया
अरमानो को
दीप दिखा गया
 
फिर कैसे कह दूं
कोई नही है

कोई तो है
जो सच कह गया
मगर दिल भी
जला गया
कुछ अपना
दुखा गया
कुछ मेरा
फिर कैसे कह दूं
कोई नही है
कोई तो है
कहीं तो है
मगर अब
ख़्वाब
आकार नहीं लेते
हसरतें जवाँ नहीं होतीं
एक टीस सी उठती है
शायद दर्द बन कर
पल रही है
फिर कैसे कहूं
कोई नहीं है

कोई तो है
जरूर है ............कोई ना कोई
शायद तुझमे मैं और मुझमे तू
कहीं तो हैं...........है ना

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

मै मौन का वो शब्द हूं

मै मौन का वो शब्द हूं
जो तुम्हारे लिये लिखा गया
जिसे पढने की समझ
सिर्फ़ तुम जानते हो
जिसकी भाषा का हर शब्द
तुम्हारी अंतरआत्मा की
अभिव्यक्ति है
मगर कहती मै हूँ
गुनते तुम हो
एक भाषा जो शब्दो की
मोहताज़ नही होती
सिर्फ़ भावनाओ मे
बिखरी होती है
सिर्फ़ पढने के लिये
तुम्हारी निगाह की
जरूरत होती है
जहाँ की भाषा को
तुम शब्द देते हो
और मौन मुखर हो
जाता है और मैं 

व्यक्त 

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

ये प्रेम के कौन से मोड आ गये

ये प्रेम के कौन से मोड आ गये
जहाँ लम्हे तो गुजर गये
मगर हम बेजुबाँ हो गये
कहानी कहते थे तुम अपनी
और हम बयाँ हो गये
ये बादल मेरी बदहाली के
क्यूँ तेरी पेशानी पर छा गये
इस रूह के उठते धुयें मे
तुम कैसे समा गये
काश!
कोई नश्तर तो चुभता
कुछ लहू तो बहता
कुछ दर्द हुआ होता
तो शायद
तेरा दर्द मेरे दामन से
लिपट गया होता
फिर न यूँ रुसवाइयों
के डेरे होते और
जिस्म के दूसरे छोर पर
तुम मेरे होते
जहाँ रूहों के रोज
नये सवेरे होते

मगर ना जाने 
ये कैसे प्रेम के
मोड़ आ गए
जो सिर्फ भंवर 
में ही समा गए
अब ना तुम हो
ना मैं हूँ 
ना भंवर है 
बस प्रेम का ये 
मोड़ सूखे अलाव 
 ताप रहा है

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

अब लक्ष्य निर्धारण नहीं करती

अब लक्ष्य निर्धारण नहीं करती
निर्धारण कर लो तो 
पाने की चाह
प्रबल हो जाती है
और उस जूनून में 
काफी कुछ बह जाता है
और बचता है तो सिर्फ 
रेतीले मटमैले पैरों में
चुभते से कुछ कंकर पत्थर 
और गाद में सड़ते पाँव 
और उनके निशाँ 
पीछे मुड़ने पर देखो तो
सिर्फ निशाँ ही होते हैं 
अकेले , नितांत एकाकी
बाकी तो वक्त के दरिया 
में बह जाता है और तब
लक्ष्य को पाना 
उसकी सफलता 
खोखली बेमानी हो जाती है
जब उन पदचिन्हों के साथ
एक भी निशाँ नज़र नहीं आता
इसलिए अब दिशाहीन जी लेती हूँ
जहाँ खोने को कुछ नहीं होता
और जो मिलता है वो ही 
लक्ष्य बन जाता है
या कहो जीवन की 
उपलब्धि इसी में है 
पाने की चाहत में 
सब कुछ खो देना तो 
लक्ष्य नहीं होता ना 
इसलिए
अब लक्ष्य निर्धारण नहीं करती

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

अदृश्य रेखा

दिल की मुश्किलें 
बढ़ जाती हैं
जब तुम सामने होती हो
ना तुम्हें छू सकता हूँ
ना पा सकता हूँ
तुम्हारे वजूद को 
आकार देना चाहता हूँ
जिसे मैंने कभी 
देखा भी नहीं
मगर फिर भी 
हर पल नज़रों में 
समायी रहती हो
तुम्हारे अनन्त 
विस्तृत आकाश को
मैं अपने ह्रदयाकाश में
समेटना चाहता हूँ
हर सम्भावना को
स्वयं में समाहित 
करना चाहता हूँ
ताकि तुम 
तुम्हारा वजूद
हर पल
मेरे अस्तित्व में
एक अदृश्य रेखा सा
मौजूद रहे

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

ऊष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में मौसम नहीं बदला करते

ऊष्मा
कभी देह की
कभी साँसों  की
कभी बातों की
कभी नातों की
कभी भावो की
तो कभी 
शुष्क मौसमों की
बंजर भूमि में 
उगते कुछ 
सवालों की.......
झुलसा जाती है
हर नेह को
हर गेह को
हर देह को
और बचे 
रह जाते हैं 
राख़ के ढेर में 
कुछ तड़पते
सिसकते
काँटों की सी 
चुभन लिए
कुछ अल्फाज़ 
कुछ घाव
कुछ बिखरे- बिखरे
से अहसास
अपनी बेबसी पर
लाचार से 
आँसू बहाते
उम्र भर के 
तड़पने के लिए
जो इतना नहीं जानते
ऊष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में 
मौसम नहीं बदला करते

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

अब सदायें आसमां के पार नहीं जातीं

आज तेरी 
याद का बादल
ख्यालों से
टकरा गया 
एक बिजली सी 
गिर गयी
आशियाँ जल गया
कभी हम मिले थे
यूँ ही चलते चलते
किसी अन्जान शहर में
किसी अन्जान मोड़ पर  
 और एक रिश्ता बना 
कुछ तेरा था उसमे 
कुछ मेरा था शायद
 बह रहे थे समय 
के दरिया में दोनों 
कभी उफ़ान खाता
सागर था तो
कभी  खामोश 
रह्गुजारें थीं 
मगर तब भी 
तुम भी थे
और मैं भी थी 
ये अहसास क्या 
कम थे 
मगर आज 
ना तुम हो
ना मैं हूँ
ना हमारे
अहसास हैं
वक्त की गर्द में
दबे शायद
कुछ जज़्बात हैं
जिन्हें तेरी 
पूजा की थाली में
उंडेल रही हूँ
जिसे तू खुदा 
कहता था
उसी में आज 
सहेज रही हूँ
वो तेरा जाना
और मेरा 
तड़प जाना
मगर रोक 
ना पाना
आज भी 
तड़पाता  है 
तेरे होने का
अहसास कराता है 
 मुझे मुझसे 
चुराता है
मगर यादें परवान 
नहीं चढतीं
शायद इसीलिए
अब सदायें
आसमां के पार
नहीं जातीं
और तुझ तक
पहुँच नही पातीं

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

इंतजार के युग

पता नहीं
हम गुजर 
रहे थे
या 
वक्त हमें
गुजार रहा था 
बस जी 
रहे थे
यादों की 
रोशनाई से 
वक्त के 
लिहाफ पर 
दास्ताँ 
लिख के
कुछ तेरी 
कुछ मेरी
और कुछ
वक्त की
सलाखों 
के पीछे
छुपे सच की
कुछ तेरे
बिखरे 
अरमानो की 
तो कुछ 
मेरे दिल के
छालों पर 
गिरते तेरे
अश्कों की
कभी 
अश्कों 
में छुपे 
दर्द की 
कलम  से
कोई तहरीर 
उतर आती थी
और हम
सहम जाते थे
तो कभी
तेरे जलते 
दिल की 
आग से 
एक कोयला
जो रूह को
छू जाता था
हर छाले पर 
एक फफोला 
और पड़
जाता था
मगर वक्त 
अपनी रफ़्तार 
से गुजर 
रहा था
या कहो
वक्त की
अँधेरी खोह 
में से
दो मासूम 
दिल 
गुजर रहे थे
और वक्त 
के साथ
तड़प रहे थे
शायद 
कभी वक्त को
रहम आ जाये
और मिलन 
हमारा 
हो जाये 
इसी एक 
आस पर
इंतजार के 
युग 
गुजर रहे थे 


रविवार, 5 दिसंबर 2010

आहटों के गुलाब

कुछ आहटों के गुलाब
सजाये दिल के
गुलदस्ते में
अब एक एक करके
हर गुलाब
निकालती हूँ
जैसे यादें निकलती हों
दरीचों से
फिर सूखने के लिए
आहों की धूप में
रख देती हूँ
हर काले पड़ते
गुलाब पर
तेरे साये की
सांझ उकेरती हूँ
कहीं कोई गुलाब
फिर से ना खिल जाये
इसलिए हर गुलाब पर
अश्कों का तेज़ाब
उंडेलती हूँ
और इंतज़ार की
शाख पर
आहटों के गुलाबों
की रूह दफ़न
करती हूँ

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

कील.........ख्यालों की

एक ख्याल
दिल की कील
पर लटका पड़ा है
तो एक ख्याल
दिमाग की 
बालकोनी में
सूख रहा है
और कोई ख्याल
तो किसी ख्याल की
अलंगनी पर टंगा है
कौन से कोने से
शुरू करूँ
हर कोना
अपने ख्यालों
की तरह ही
रीता दिखाई
देता है
वहाँ जहाँ
ख्यालों ने
अपनी दुनिया
बसाई थी
हर मोड़ पर
सिर्फ एक
बेवफाई थी
कहीं ना किसी
ख्याल की
सुनवाई थी
सभी ख्यालों
ने शायद
मुझसी ही
किस्मत पाई थी
कुछ कीलें
कभी नहीं
निकलतीं
फाँस सी
ताउम्र
चुभती ही
रहती हैं

सोमवार, 29 नवंबर 2010

मेरे सपनो का शहर

अनंत यात्राओं की 
अंतहीन पगडंडियों
पर चलते चलते 
जब कभी थक जाती हूँ 
तब कुछ पल 
जीना चाहती हूँ
सिर्फ तुम्हारे साथ
तुम्हारी आशाओं 
अपेक्षाओं और 
अपनी चाहतों के साथ
जहाँ मेरी हर चाहत
परवान चढ़ सके 
और तुम्हारे वजूद का
हिस्सा बन सके 
जहाँ तुम्हारे ह्रदय के
हर गली कूचे पर
सिर्फ मेरा नाम लिखा हो 
हर मोड़ पर 
मेरा बुत खड़ा हो
जिसके हर घर में 
तुम्हारी मुस्कराहट 
तैर रही हो और 
मेरे पाँव थिरक रहे हों 
तुम्हारी प्रेममयी झंकार पर
जहाँ एक ऐसा आशियाना हो 
जिसमे सिर्फ तुम्हारा 
और मेरा वजूद
अपना वजूद पा रहा हो 
और कभी हम किसी 
भीड़ के रेले में 
चुपचाप हाथों में हाथ डाले
चल  रहे हों और
इक दूजे की धडकनें
सुन रहे हों
बस कुछ पल 
इसी सुकून के 
जीना चाहती हूँ
जिसे तुमने 
मेरा नाम दिया है
और मेरे अस्तित्व का
प्रमाण दिया है
उसी अपने घर में 
रहना चाहती हूँ
जानते हो ना 
कौन सी है वो जगह
 वो है तुम्हारा ह्रदय
मेरे सपनो का शहर

शनिवार, 27 नवंबर 2010

आँच

मद्धम- मद्धम 
सुलगती आँच 
और सीली 
लकड़ियाँ 
चटकेंगी तो
आवाज़ तो 
होगी ही
लकड़ियों का 
आँच की
तपिश से 
एकीकृत होना
और अपना 
स्वरुप खो देना
आँच की 
सार्थकता 
का प्रमाण 
बन जाना
हाँ , आँच
का होना
जीवंत बनाता 
है उसे 
सार्थकता का
अहसास 
कराता है 
आँच पर 
तपकर ही 
कुंदन खरा 
उतरता है
फिर चाहे 
ज़िन्दगी हो 
या रिश्ते 
 या अहसास
आँच का होना
उसमे तपना ही
जीवन का
सार्थक प्रमाण
होता है
लकड़ियाँ
सुलगती 
रहनी चाहिए
फिर चाहे 
ज़िन्दगी की 
हों या 
दोस्ती की 
या रिश्ते की
मद्धम आँच
का होना 
जरूरी है
पकने के लिए
सार्थकता के लिए
अस्तित्व बोध के लिए

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

बस एक बार तू कदम बढाकर तो देख .........

ख्याल  : मजाक है क्या ये 
                   मुझे भी बता दो 
             अरसा हुए हँसे हुए
             चलो , मैं भी हँस लेती हूँ 
             हा हा हा ...........

हकीकत :ऐसा क्या हो गया ?
              रोज हँसा करो 
              मगर किसी के सामने नहीं 

  ख्याल:  तो फिर कहाँ ?

हकीकत :  अकेले में 

  ख्याल :  क्यूँ ?
           अकेले में तो 
           पागल हँसते हैं 
           क्या अब यही ख़िताब 
           दिलाना बाकी है
           याद को यूँ दबाना बाकी है 
           किसी दर्द को यूँ जगाना बाकी है 
           आखिर कैसे हँसूँ ?
           किस लीक का कोना पकडूँ 
           किस वटवृक्ष की छांह पकडूँ 
           कौन -सी अब राह पकडूँ
           बिना लफ्ज़ के कैसे बात करूँ
           ख़ामोशी भी डंस रही है 
           नासूरों सी पलों में बस गयी है 
           फिर कैसे अकेले में हँसे कोई?

हकीकत : ख़ामोशी भी पिघलने लगेगी
               यादें भी सिमटने लगेंगी 
               दर्द भी बुझने लगेंगे
               बस एक बार मुझे 
               गले लगाकर तो देख
               मुझे अपना बनाकर तो देख
               लबों पर मुस्कराहट भर दूँगा 
               तेरे ग़मों को अंक में भर लूँगा 
               बस एक बार मुझे  
               अपना बनाकर तो देख 
               चाहत का लिबास पहना दूँगा 
               तुझे तुझसे चुरा लूँगा
               तेरे साये को भी 
               अपना साया बना लूँगा
               बस एक बार मुझे 
               हमसफ़र बना कर तो देख
               मेरी चाहत को अपना
               बनाकर तो देख
               रंगों को दामन में
               सजाकर तो देख
               मोहब्बत की रेखा
               लांघकर तो देख
               हर मौसम गुलों सा
               खिल जायेगा
               चाँद तेरे आगोश में 
               सिमट जायेगा
               चाँदनी सी तू भी
               खिल जाएगी
               झरने सी झर- झर
               बह जाएगी
               बस एक बार तू
               कदम बढाकर तो देख .........

शनिवार, 20 नवंबर 2010

वो ही पुरातन भारतीय नारी हूँ

चाहे शोषित  करे कोई 
चाहे उपेक्षित भी होती हूँ 
मगर मन के धरातल पर
डटकर खडी रहती हूँ
संस्कारों की वेणी में जकड़ी

मन से तो मैं आज भी वही
पुरातन भारतीय नारी हूँ 


चाहे मानक रोज नए बनाती हूँ
अपनी सत्ता का आभास कराती हूँ 
मगर मन की अतल गहराइयों से तो
आज भी १८वीं  सदी की नारी हूँ 


चाहे आसमां को छू आऊँ 
अन्तरिक्ष में उड़ान भर आऊँ
पर पैर जमीन पर ही रखती हूँ 
अपने मूल्यों की थाती को 
ना ताक पर रखती हूँ
चाहे विचारों में समरसता हो 
चाहे भावों में एकरसता हो
मित्रता के आयाम बनाती हूँ
पर पुरुष मन में उठे भावों की
गंध पहचानती हूँ इसीलिए 
पर पुरुष की छाया का 
ख्वाबों में भी प्रवेश वर्जित है 
मैं ऐसी संस्कारों में जकड़ी नारी हूँ


चाहे कितनी आधुनिक कहलाती हूँ 
अधिकारों के लिए दुनिया से लड़ जाती हूँ
उन्मुक्तता , स्वतंत्रता मेरे अधिकार हैं
स्वच्छंद हवा में विचरण करना मेरी नियति है
मगर उसका दुरूपयोग कभी ना करती हूँ
अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों 
को भी खूब समझती हूँ 
तभी तो  मन से आज भी 
अपनी जड़ों से जुडी नारी हूँ


वक्त पड़ने पर 
दृढ संकल्प शक्ति 
की बदौलत
चाहे दुर्गा बन जाऊँ
काली सा संहार करूँ 
लक्ष्मीबाई सी लड़ जाऊँ
मगर फिर भी मुझमें  बसती 
वो ही पुरातन नारी है 

जो बीज रोपित किये थे सदियों ने 
उन्ही से पोषित होती हूँ
इसीलिए कभी भी अपनी 
संस्कारों की ज़मीन नहीं खोती हूँ 
मैं आज भी संस्कारों के 
बीज रोपती हूँ  और 
संस्कारों की फसल उगाती हूँ
क्योंकि आज भी मन से तो मैं
वो ही पुरातन भारतीय नारी हूँ