अनुमति जरूरी है

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

'कहीं तुम वही तो नहीं हो जाना '

वो जोगी
अलख जगाता रहा
पूजन अर्चन वंदन
करता रहा
तप की अग्नि में
खुद की आहुति 
देता रहा
देवी दर्शन की
चाह में
लहू से अपने
तिलक लगाता रहा
चौखट पर देवी की
'स्व' को भस्मीभूत
करता रहा 
कठोर व्रत नियम 
करता रहा
और इक दिन
हो गयी
प्रसन्न देवी
दिए दर्शन
कहा ------
"माँग वरदान "
जोगी को 
नव जीवन मिला
वर्षों के तप का
फल मिला 
देवी को देख
स्व को भूल गया
जोगी के हर्ष का
ना पारावार रहा 
हर्षातिरेक में 
भिक्षा ऐसी 
माँग बैठा 
जीवन ही अपना
गँवा बैठा
भिक्षा में देवी से
'मोहब्बत'
मांग बैठा
और जन्मों की 
तपस्या को 
पल में 
जन्मों के लिए
गँवा बैठा
'तथास्तु' कह 
देवी अंतर्धान 
हो गयी
और अब 
ढूँढता फिरता है
मोहब्बत को
अर्धविक्षिप्त सा 
'कहीं तुम वही तो नहीं हो जाना '

35 टिप्‍पणियां:

mridula pradhan ने कहा…

bahut bhawpurn aur khoobsurat likhti hain aap.

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

प्रेम किसी तपस्या से ऊपर है.. परे है.. बस इतना कह सकता हूँ..

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

kya baat hai vandana ji....bahut kuchh seekhne se milta hai aapse.!

इमरान अंसारी ने कहा…

वंदना जी,

वाह.....कमाल कर दिया इस बार तो......बहुत ही सुन्दर पोस्ट....सच बहुत पसंद आई|

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मन में जो सवार हो उसी में रम जाने दो उसको। छेड़ो मत उसे, उसे उसी रास्ते जाने दो।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

pyaar........sunte hi ek lahar si uthti hai aur poora shareer pyaar mein tabdil, phir kuch kahne ko nahi

अनुपमा पाठक ने कहा…

आशीर्वाद स्वरुप मिल जाए प्रेम पर फिर भी उस तक पहुंचना तो स्वयं ही है...

Kailash C Sharma ने कहा…

लाज़वाब..क्या भावपूर्ण कल्पना है. बहुत सुन्दर

ZEAL ने कहा…

बेहद खूबसूरत अंदाज में प्रेम की अभिव्यक्ति।

sada ने कहा…

वाह ...बहुत ही खूबसूरत शब्‍दों का संगत है आपकी इस अभिव्‍यक्ति में ...।

arvind ने कहा…

.......??

JAGDISH BALI ने कहा…

A soully creation. Excellent.

Meenu Khare ने कहा…

सशक्त रचना.बधाई.नव वर्ष की शुभकामनाएँ.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

वंदना जी, बहुत प्‍यारी रचना है।

---------
अंधविश्‍वासी तथा मूर्ख में फर्क।
मासिक धर्म : एक कुदरती प्रक्रिया।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

भावनाओं और कामनाओं को बहुत अच्छे ढंग से बाँधा है आपने इस रचना में!

dev ने कहा…

वंदना. ..... क्या खूब पहचाना......
जिनके होंठो पे हंसी, पाँव में छाले होंगे

हाँ वही लोग तेरे चाहने वाले होंगे....

मेरे प्यार को तथास्तु और मुहब्बत को आशीर्वाद के लिए...क्रम आपका. ...... और ...और ...और...अब ये आशीर्वाद भी दे दो...

डॉ टी एस दराल ने कहा…

इस मांगने वाली बात के पक्ष में हम तो नहीं हैं ।
जैसी करनी वैसी भरनी ।

'उदय' ने कहा…

... kyaa baat hai .... man ke saagar se nikalaa moti !!!

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

उत्तम प्रस्तुति...

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

kya baat hai vandana ji...bhut hi sundar.........mohabbat ki ek nayi paribhasa hai ye....

*काव्य-कल्पना*

दिनेश शर्मा ने कहा…

उत्तम!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना कल मंगलवार 28 -12 -2010
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..


http://charchamanch.uchcharan.com/

anklet ने कहा…

realy nice

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

kash usne muhobbat ki jagah maut maangi hoti...acchhi rachna.

नरेन्द्र व्यास ने कहा…

मन हर्षित कर गई आपकी ये रचना आदरणीय वंदना दी. आपकी रचना कभी-कभी तो दिल पर इतना असर कर जाती है कि मत पूछिए.. ! वाकई बेहद उम्दा रचना. बधाई और आभार वंदना दी.

Dorothy ने कहा…

मर्मस्पर्शी एवं खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर
डोरोथी.

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत खुबसुरत रचना जी, धन्यवाद
एक नजर इधर भी.http://blogparivaar.blogspot.com/

मनोज कुमार ने कहा…

अच्छी लगी यह रचना।

Anjana (Gudia) ने कहा…

और अब
ढूँढता फिरता है
मोहब्बत को...
:-) sunder!

वाणी गीत ने कहा…

देवी से मुहब्बत की भीख मांग बैठा ...
और फिर अपनी सुध बुध भूल बैठा ...
गज़ब !

रंजना ने कहा…

इससे अच्छी चीज और क्या मांग सकता था जोगी...प्रेम मांग उसने तो सर्वस्व मांग लिया...जीवन मांग लिया..

anupama's sukrity ! ने कहा…

एक अनूठी -
बहुत सुंदर रचना -
प्रेम में डूबा हो तो उबर कैसे सकता है -

wish u a very happy new yr-2011

anupama's sukrity ! ने कहा…

एक अनूठी -
बहुत सुंदर रचना -
प्रेम में डूबा हो तो उबर कैसे सकता है -

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

सुन्दर और बेहतरीन रचना,सार्थक प्रस्तुति !

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

आदरणीया वंदना जी
नमस्कार !

ना मांगे ये सोना चांदी, मांगे दर्शन देवी तेरे द्वार खड़ा इक जोगी …
बहुत अच्छी कविता लिखी है आपने , बधाई !
भिक्षा में देवी से
'मोहब्बत'
मांग बैठा
और जन्मों की
तपस्या को
पल में
जन्मों के लिए
गँवा बैठा


प्यार गुनाह तो नहीं … ! लेकिन देवी ने वरदान दे'कर भी तड़पाया यह तो सरासर ज़्यादती है ।
मैं इसका विरोध करता हूं … :)
देवी से इल्तिज़ा है, वादा किया था तो निभाना चाहिये था … … …


~*~नव वर्ष २०११ के लिए हार्दिक मंगलकामनाएं !~*~

शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार