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सोमवार, 20 दिसंबर 2010

मै मौन का वो शब्द हूं

मै मौन का वो शब्द हूं
जो तुम्हारे लिये लिखा गया
जिसे पढने की समझ
सिर्फ़ तुम जानते हो
जिसकी भाषा का हर शब्द
तुम्हारी अंतरआत्मा की
अभिव्यक्ति है
मगर कहती मै हूँ
गुनते तुम हो
एक भाषा जो शब्दो की
मोहताज़ नही होती
सिर्फ़ भावनाओ मे
बिखरी होती है
सिर्फ़ पढने के लिये
तुम्हारी निगाह की
जरूरत होती है
जहाँ की भाषा को
तुम शब्द देते हो
और मौन मुखर हो
जाता है और मैं 

व्यक्त 

42 टिप्‍पणियां:

यशवन्त माथुर ने कहा…

कविता के रूप में अंतर्मन के भावों को बखूबी उभारा है.

सादर

विजय प्रताप सिंह राजपूत (निकू ) ने कहा…

नमस्कार जी
बहोत सुंदर

रश्मि प्रभा... ने कहा…

maun prakhar hota hai , us prakharta ko wahi aatmsaat karta hai , jo maun kahta bhi hai

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मौन का लिखा पढ़ पाना अन्तरमन की योग्यता है।

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

maun ko shabdo me kaise vyakt kar diya:)
bhut khub...........sayad yahi karan hai aapke 305 follower hain....!
regards!

saanjh ने कहा…

ek bhasha jo shabdon ki mohtaaj nahin hoti.....bohot bohot badhiya
khoobsurat nazm

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

मै मौन का वो शब्द हूं
जो तुम्हारे लिये लिखा गया
--
रचना का प्रारम्भ आपने बहुत ही रोचक ढंग से किया है!
--
नये विचारों से ओत-प्रोत रचना पढ़कर सुखद लगा!

डॉ टी एस दराल ने कहा…

निगाहों की भाषा में मौन सब कुछ बोल जाता है ।
बहुत सुन्दर रचना वंदना जी ।

dev ने कहा…

वंदना.....आज काफी वक़्त लगा...ये सोचने में कि क्या कहूँ........या क्या क्या ना कहूँ.....

आप कविता लिखतीं हैं.....ये कम है....आप वो आईना हैं...जिसमें मैं अपने आप को देखता हूँ....

और कुछ नहीं कह सकता............बस एहसास.....और क्या कहूँ.....

"अब बारी तुम्हारी......" पर आप कि प्रतिक्रिया का इंतज़ार है........

'उदय' ने कहा…

... gahan bhaavpoorn rachanaa !!!

Smriti यादें ने कहा…

मौन यानी मुखरित ख़ामोशी ..... जिसे एक प्रेम भरी आत्मा ही पढ़ सकती है....! बहुत सुंदर अभीव्यक्ति...! :)

shikha varshney ने कहा…

भावपूर्ण अभिव्यक्ति.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वाह .. मौन के बोलते स्वर ... कितना कुछ कह जाते हैं बिन बोले ही ... गहरी बात है इस रचना में .

kshama ने कहा…

Hamara antarman bhee ek paheli sa hota hai!
Bahut,bahut sundar rachana!

Suman Sinha ने कहा…

yah maun yah shabd ... nirarthak nahin , bahut kuch suna gaye

ZEAL ने कहा…

.

Voice of silence !
Beautiful creation Vandana ji.
Thanks.

.

राजेश उत्‍साही ने कहा…

बात तो सही है। जौहरी ही जानता है हीरे की परख। मौन की भाषा मन रखने वाले ही जानते हैं। आपका मौन सचमुच पढ़ने योग्‍य है।

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर कविता जी धन्यवाद

Swarajya karun ने कहा…

खामोशी की भी एक भाषा तो होती ही है. अभिव्यक्ति का एक नया अंदाज़ .

Anupriya ने कहा…

wah jee wah...kamal kaha hai aapne to...dil khush ho gaya...bahot khubsurat panktiya hai jee.

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

"और मौन मुखर हो जाता है और मैं व्यक्त !"
वंदना जी,
सही है,भावनाओं का सम्प्रेषण कभी शब्दों का मोहताज नहीं रहा है !
आपकी कविता में शब्दों का चयन बहुत ही प्रभाव पूर्ण है और भाव पक्ष प्रबल है !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

अनुपमा पाठक ने कहा…

वाह! सुन्दर...
मौन का मुखर हो जाना!

मनोज कुमार ने कहा…

भाषा को
तुम शब्द देते हो
और मौन मुखर हो
जाता है और मैं
व्यक्त
एक शब्द मे कहूं तो ....
अद्भुत !

धीरेन्द्र सिंह ने कहा…

कविता अंत में जिस ऊंचाई तक ले गई उसकी अनुभूति असाधारण थी, धन्यवाद।

खबरों की दुनियाँ ने कहा…

अन्तरमन की सुन्दर भाषा । मेरे मन में तेरी भाषा । सुन्दर सी अभिलाषा … शुभकामनाएं । पढ़िए "खबरों की दुनियाँ"

दीपक बाबा ने कहा…

जहाँ की भाषा को
तुम शब्द देते हो
और मौन मुखर हो
जाता है और मैं व्यक्त

जब भावों को शब्द मिल जाते है तो सही मायने में कविता बन जाती है...... यही न........

बेहतरी कविता.

Kunwar Kusumesh ने कहा…

वंदना जी,
इस भाषा को हम body language कहें तो कैसा रहेगा ?

mahendra verma ने कहा…

एक भाषा जो शब्दों की
मोहताज नहीं होती
सिर्फ भावनाओं में
बिखरी होती है

एक मनोवैज्ञानिक सत्य को उद्घाटित करती सुंदर रचना।

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

वंदना जी आपकी कविताएँ वाकई अंत में एक और नयी कविता के जन्म की सूचना दे जाती हैं|

परमजीत सिँह बाली ने कहा…

अंतर्मन के भावों को बखूबी उभारा है.
सुन्दर रचना

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

जहाँ की भाषा को
तुम शब्द देते हो
और मौन मुखर हो
जाता है और मैं
व्यक्त
बहुत सुन्दर ...स्वयं की अभिव्यति ...सुन्दर रचना

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

maun ki bhasha swayam mukhar ho rahi hai..
komal bhavon ki sundar rachna..

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

वंदना जी पिछले कुछ महीनो से मैं मैं आपको लगातार पढ़ रहा हूँ और देख रहा हूँ कि आपकी कविता का क्षितिज दिनों दिन व्यापक हो रहा है.. विम्ब संरचना में भी गहराई आयी है.. मौन को इतना मुखरित कर दिया है आपने इस कविता में कि मौन ने आकार ले लिया है.. उद्वेलित करती कविता..

mridula pradhan ने कहा…

bahot achchi lagi.

Akhtar Khan Akela ने कहा…

bhtrein rchnaa . akhtar khan akela kota rajsthan

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

आदरणीय वन्दनाजी
अति सुन्दर

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

मेरी पोस्ट "जानिए पासपोर्ट बनवाने के लिए हर जरूरी बात" देखियेगा और अपने अनुपम विचारों से हमारा मार्गदर्शन करें.

आप भी सादर आमंत्रित हैं,
http://sawaisinghrajprohit.blogspot.com पर आकर
हमारा हौसला बढाऐ और हमें भी धन्य करें .......आपका अपना सवाई

वीना ने कहा…

जहाँ की भाषा को
तुम शब्द देते हो
और मौन मुखर हो
जाता है और मैं
व्यक्त
बहुत सुंदर....

dev ने कहा…

वंदना.....लिख कर मिटाया मत करिए.....कागज़ से कुछ शब्द मिटा देने से......सीने मे दबे भाव नहीं मिटा करते, खून मे बहती हुई.....भावनाओं कि नदी नहीं मिटती.....मुझ को आप के शब्दों मे देखने का एक अवसर आप ने छीन लिया मुझसे.....बहने दीजिये......नदी पर बाँध ना बनाइये.

nilesh mathur ने कहा…

मौन मुखर हो
जाता है और मैं
व्यक्त!
वाह! क्या बात है, बहुत सुन्दर! बेहतरीन!

'साहिल' ने कहा…

सुन्दर रचना!

इमरान अंसारी ने कहा…

वंदना जी,

वाह....वाह....बहुत सुन्दर रचना|