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रविवार, 27 जून 2010

मोहब्बत के पंख कतरे पड़े थे

मोहब्बत के पंख कतरे पड़े थे
हैवानियत के अब ये 
सिलसिले चले थे
आन के नाम पर 
मिटा दिया था गुलों को
ये किस मज़हब के 
बाशिंदे थे
अभी तो परवाज़ भी 
भरी ना थी परिंदों ने
 सैयाद ने जाल 
फैला दिया था
सिर्फ नाक बचाने 
की खातिर 
अपनों ने ही अपनों का
लहू बहा दिया था
ये २१ वी सदी में 
जीने वाले 
क्यूँ रूढ़ियों की 
बेड़ियों में 
जकड़े खड़े  थे
 खुदा ने तो 
ना फर्क किया 
लहू एक -सा 
अता फ़रमाया 
फिर क्यूँ इंसान
ने ही इन्सान को
इंसानियत का
दुश्मन  बनाया
कभी रिश्तों का
कभी मज़हब का
कभी जाति का
कभी खाप का
जामा पहनाया
और इज्जत की 
आड़ में
मौत का वीभत्स
तांडव कराया
ज़िन्दगी दे नहीं सकते
तो ज़िदगी लेने का
हक़ किसने दिलाया
ये इंसान की सोच को
किस श्राप ने 
अभिशप्त बनाया
किस श्राप ने.....................


दोस्तों,
मन बहुत व्यथित था रोज की इन घटनाओं से ..............जब भी पेपर उठाओ सिर्फ यही पढने को मिलता और दिल दुखने लगता ...........आज के युग में भी जब  ये हाल है तो कैसे हम कह सकते हैं कि देश तरक्की कर रहा है .........क्या इसी का नाम तरक्की है जहाँ अभी तक इंसानी सोच जड़ बनी हुई है ?

बुधवार, 23 जून 2010

आशिकों के बीच बहस- सी छेड़ जाते थे

वो रेशमी दुपट्टा तेरा जो लहराता था 
 एक तूफ़ान आकर गुजर जाता था 

जब हिरनी सी -कुलांचें भरती तू चलती थी 
कितने आवारा बदल टकरा जाते थे 

तेरी मदमाती खनखनाती सुरीली तान पर 
मंदिरों में घंटियाँ घनघना जाती थीं

जब कपोलों पर गिरी लट तू सुलझाती थी
एक मदहोशी- सी जहन पर छा जाती थी 

सुर्ख लबों को जब तू दाँत के नीचे दबाती थी 
कितने ही दिलों की धडकनें रुक जाती थीं

सुराहीदार ग्रीवा जब नजाकत से बल खाती थी
दिलों पर सैंकड़ों बिजलियाँ- सी गिर जाती थीं

जब मदभरे चंचल नयन लजाते थे 
आशिकों के बीच बहस- सी छेड़ जाते थे 

जब आफताब के साथ तेरा दीदार हुआ करता था
दिल में इन्द्रधनुषी -से रंग बिखर जाते थे

शनिवार, 19 जून 2010

पिता का योगदान

              एक बच्चे के व्यक्तित्व के सम्पूर्ण विकास में एक पिता का योगदान माँ से किसी भी तरह कम नहीं होता.माँ तो वात्सल्य की मूर्ति होती है जहाँ अपने बच्चे के लिए प्रेम ही प्रेम होता है  मगर पिता उसकी भूमिका यदि माँ से बढ़कर नहीं तो माँ से कम भी नहीं होती. ज़िन्दगी की कठिन से कठिन परिस्थिति में भी पिता अपना धैर्य नहीं खोता और उसकी यही शक्ति बच्चों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है. बच्चों के जीवन के छोटे -बड़े उतार -चढ़ावों में पिता चट्टान की तरह खड़ा हो जाता है और अपने बच्चों पर आँच भी नहीं आने देता. बेशक ऊपर से कितना भी कठोर क्यूँ ना दिखे पिता का व्यक्तित्व मगर ह्रदय में उसके जो प्यार होता है अपने बच्चों के लिए वो शायद दूसरा समझ ही नहीं सकता. बेशक ज्यादा लाड - प्यार ना जताए मगर वो भी अपने बच्चों की छोटी से छोटी ख़ुशी के लिए उसी प्रकार जी -जान लड़ा देता है जैसे माँ.बस वो अपने स्नेह का उस प्रकार प्रदर्शन नहीं कर पाता. समर्पण ,प्रेम और त्याग में पिता कहीं भी पीछे नहीं होता बस वो जता नहीं पता. माँ तो रो भी पड़ेगी मुश्किल हालात में मगर पिता वो हमेशा अन्दर ही अन्दर सिर्फ अपने आप से जूझता रहेगा मगर कहेगा नहीं वरना ममता और भावुकता में वो किसी से पीछे नहीं रहता.ना पिता में जज्बात कम होते हैं ना ही अहसास बस अपने प्यार को वो अपनी कमजोरी नहीं बनने देता और यही उसकी ताकत होती है ज़िन्दगी से लड़ने की और आगे बढ़ने की.
                 ज़िन्दगी का व्यावहारिक ज्ञान जिस प्रकार पिता बच्चों को दे सकता है शायद उतनी अच्छी तरह और कोई नहीं दे सकता . बच्चे के अन्दर से भय का दानव वो ही निकालता है . माँ तो फिर भी अपनी ममता के कारण बच्चे को कहीं अकेले जाने के लिए  मना भी कर दे मगर पिता वो बड़ी बेफिक्री से बच्चे को प्रोत्साहित करता है जिससे बच्चे में आत्मविश्वास बढ़ता है. एक पिता अपने बच्चों को सुरक्षा की भावना प्रदान करता है. जैसे यदि माँ होती तो चाहे बेटा हो या बेटी उन्हें कोई भी वाहन चलाने पर चिंतित हो जाएगी . हाय !मेरा बच्चा ठीक- ठाक घर आ जाये या उसे चलाने  से ही मना कर दे क्यूंकि हर माँ जीजाबाई जैसे ह्रदय की नहीं होती मगर माँ की जगह पिता इस कार्य को चुटकियों में और खेल -खेल में पूरा कर देता है और माँ भी उस वक्त बेकिफ्र हो जाती है जब बच्चा पिता के साये में ज़िन्दगी जीना सीख रहा होता है.
                जब बच्चा मुश्किल घडी में अपने पिता को धैर्य और आत्मविश्वास के साथ हालत का मुकाबला करते देखता है तो ये भावना भी उसके दिल में घर कर जाती है और बच्चा भी अपने पिता के पदचिन्हों पर चलने के लिए प्रेरित हो जाता है . किसी भी असफलता की घडी में उसे अपने पिता की सहनशक्ति ही आगे बढ़ने को प्रोत्साहित करती है और फिर बच्चा हर कठिन से कठिन परिस्थिति का हँसते -हँसते मुकाबला करने में सक्षम हो जाता है.
          एक बच्चे के समुचित विकास में लिए माँ के साए के साथ- साथ पिता का योगदान भी उतना ही आवश्यक है तभी बच्चे का सर्वांगीण  विकास संभव है.

बुधवार, 16 जून 2010

आखिरी वसीयत

तेरी गली के
कोने पर 
घर के सामने
खड़ा वो 
गुलमोहर का पेड़
आरामगाह 
है मेरी
बस आखिरी 
आरजू 
आखिरी वसीयत 
है मेरी
वहीँ बिस्तर
लगा देना मेरा
कब्रगाह बनवा 
देना मेरी
मुझे वहाँ 
सुला देना
और चेहरा मेरा
खुला रखना 
बाकी जिस्म 
सारा दबा देना
बस दीदार 
होता रहेगा तेरा
और रूह को
सुकून मिलता रहेगा 


शनिवार, 12 जून 2010

इसे क्या नाम दूं?

भोर की 
सुरमई 
लालिमा सी
मुस्काती 
थी वो
नभ में 
विचरण 
करते
उन्मुक्त 
खगों सी
खिलखिलाती 
थी वो
और सांझ के 
सिंदूरी रंग के
झुरमुट में
सो जाती 
थी वो
वो थी 
उसकी 
पावन 
निश्छल 
मधुर 
मनभावन 
मुस्कान 
हाँ --एक नवजात 
शिशु की
अबोध 
चित्ताकर्षक
पवित्र मुस्कान  

मंगलवार, 8 जून 2010

तुम्हें याद है वो..................

तुम्हें याद है वो
मौसम की पहली
बारिश में भीगना
और इतना भीगना
कि हाथ -पैर 
और होठों का 
नीला पड़ जाना
फिर ठण्ड से 
ठिठुरना और
ठिठुरते -ठिठुरते
तेरे आगोश में
सिमट जाना


तुम्हें याद है वो
जेठ की तपती  
धूप में 
छत पर नंगे
पाँव दौड़कर
आना मेरा 
आकाश से 
गिरते अंगारों 
की भी परवाह
ना करना
और तुझसे 
मिलने की 
बेचैनी में
पाँव में पड़ते
छालों का 
दर्द भी 
बिसरा देना


तुम्हें याद है वो
आसमान से गिरते
रूई के फाहों 
पर नंगे पाँव
चलना और
सर्द हवाओं से
ठिठुरते हुए
किटकिटाते 
दाँतों के साथ
आइसक्रीम 
खाना और
फिर कंपकंपाते 
हुए तेरी बाँहों 
के घेरे में
कैद हो जाना

क्या याद है 
तुम्हें वो सब मंज़र 
जहाँ शोखियों 
और प्यार का
खुमार था 
निगाहों में बस 
इंतज़ार ही 
इंतज़ार था
प्रेम के वो
शोख चंचल पल 
क्या अब भी
तुम्हारी यादों
में क़ैद हैं 
क्या वो स्मृतियाँ 
अब भी जीवंत हैं
या वक़्त की 
धूल पड़ गयी है ?

मैंने कतरनों को संभाला है 
देख इस आषाढ़ में 
कितने गरज गरज आमंत्रित कर रहे हैं बदरा 
आओ पुनः उन्हीं लम्हों को जीवंत कर लें 
पल जो अधूरे छुट गए थे 
फिर से जी लें 
अधूरी हसरतों को शायद मुकाम मिल जाए 
किसी और जन्म मिलन की हसरत को 
आ इसी जन्म पूरा कर लिया जाए 
कल हों न हों ......

शुक्रवार, 4 जून 2010

एक दिन में सिमटती यादें

कहते हैं यादों का कोई मौसम नहीं होता ....... यादों की फसल हर मौसम में लहलहाती रहती है मगर ऐसा होता कहाँ है ..............ज़िन्दगी इतनी फुरसत देती ही कब है जो यादों में जिया जाये ............ बड़ी मुश्किल से कुछ गिने -चुने दिनों में यादों को समेट देती है और यादों का हर मौसम उन्ही चुनिन्दा दिनों में लहलहा उठता है ...........अपने होने का अहसास करा जाता है .
सिर्फ एक दिन यादों का बवंडर आ जाना ........ सारी की सारी यादें सिर्फ एक दिन में सिमट जाना.............ना जाने क्या होता है उस एक दिन में. .........बाकी भी तो दिन होते हैं तब हमें कुछ भी याद नहीं आता ......अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी जीते चले जाते हैं......... सुबह से ही दिनचर्या शुरू हो जाती है और रात को बिस्तर पर ख़त्म ...........मगर उस सारे दिन एक बार भी यादें दरवाज़ा नहीं खट्खटातीं.........फुरसत ही नहीं मिलती कि किसी को याद किया जाए............इतना वक़्त कब देती है ज़िन्दगी..........मगर जब आपका जन्म दिन हो , वैवाहिक वर्षगाँठ हो ,कोई आपसे बिछड़ा हो या किसी खास का आपकी ज़िन्दगी में आगमन हुआ हो या कोई हादसा हुआ हो..........उस दिन यादों की लहरें बाँध तोड़कर सैलाब सी उमड़ पड़ती हैं और हर तटबंध को तोड़ देती हैं............स्मृति की हर कुण्डी खडखडा जाती हैं ............क्या हमारा नाता यादों से सिर्फ एक दिन का होता है या फिर हम उस एक दिन में ही अपनी पूरी ज़िन्दगी जी लेते हैं ..........दिल के हर कोने से खुरच- खुरच कर यादों को निकाल लाते हैं ........हर दबी -ढकी, धुंधली याद भी उस एक दिन को महका जाती है फिर चाहे वो याद कडवी हो या मीठी, तीखी हो या कसैली मगर यादें तो सिर्फ यादें होती हैं जो उस एक दिन की शोभा बन कर उस सारे दिन पर कब्ज़ा कर लेती हैं और हम उनके साथ- साथ बहते हुए यादों की संकरी पगडंडियों से गुजरते हुए उसके हर अहसास में डूबते -उतरते यादों की वादियों में खो जाते हैं ..........उस एक दिन में हम होते हैं और हमारी यादें..........यादों के बिस्तर पर हम यादों का ही सिरहाना लगाये यादों में खोये होते हैं  उनके अलावा उस दिन कुछ याद ही नहीं आता ..........ज़िन्दगी की हर चिंता उस एक दिन में ना जाने कहाँ काफूर हो जाती है ........उस एक दिन में एक ज़िन्दगी को जीना एक अलग ही अहसास होता है ............ज़िन्दगी को ज़िन्दगी से दूर अपने आगोश में समेट लेती हैं यादें और ज़िन्दगी के हर दुःख तकलीफ , हर गम ख़ुशी से दूर ले जाती हैं ..........मगर हमारी ज़िन्दगी का एक हिस्सा होती हैं  यादें शायद इसीलिए  यादें ही हैं जो हमें जीने की उर्जा देती हैं क्यूंकि उस एक दिन में हम ना जाने किन -किन पलों से रु-ब-रु होते हैं और अपने अन्दर एक नयी शक्ति का संचार पाते हैं क्यूंकि इन्ही यादों में हमारे जीवन की सफलता और असफलता का दर्शन होता है और फिर उन्ही से प्रेरित हो हम अगले दिन से एक नए जोश और उत्साह के साथ ज़िन्दगी की मंजिल की ओर बढ़ने लगते हैं ..........एक और यादों को मुकाम देने के लिए..............शायद इसीलिए  सिर्फ एक दिन में सिमट जाती हैं यादें .

सोमवार, 31 मई 2010

यूँ आवाज़ ना दिया करो

सुनो
यूँ आवाज़ ना दिया करो 
दिल की बढती धड़कन 
आँखों की शोखियाँ 
कपोलों पर उभरती 
हया की लाली
कंपकंपाते अधर 
तेरे प्यार की 
चुगली कर जाते हैं 
कभी ख्वाब तेरे
रातों में जगा जाते हैं
और चंदा की बेबसी से
सामना करा जाते हैं
तारे गिनते- गिनते 
कटती तनहा  रात 
भोर की लाली से
सहम- सहम जाती है 
मद्धम मद्धम बहती बयार
तेरी साँसों की 
सरगोशियाँ कर जाती है
तेरी इक आवाज़ पर
मोहब्बत का हर रंग
बसंत सा खिल जाता है 
बता अब कैसे 
मुट्ठी में क़ैद करूँ 
इस बिखरती खुशबू को 
बस तुम 
यूँ आवाज़ ना दिया करो 

रविवार, 23 मई 2010

तेरे मन का मंदिर

तेरे मन की 
खुली खिड़की 
में झाँकता 
अक्स मेरा 
तेरे मनोभावों 
की हर तह 
को खोलता
परत- दर- परत
तेरे अहसासों
को छूता 
ज्यों चाँदनी का
स्पर्श हो 
तेरे मन की 
हर तह में
प्रेम के अथाह
सागर की
अनगिनत
उछलती 
मचलती
टकराती 
और टूट कर
बिखरती 
लहरों का
खामोश 
रुदन
तेरे सूखे 
हुए आँसुओं
की कहानी 
सुनाता है
किसी परत में
दबे तेरे
असफल प्रेम 
की पुकार
का करुण 
क्रन्दन
तेरी आत्मा की
बेकली का
दीदार कराता है
और किसी 
परत में
तेरे दर्द की
पराकाष्ठा मिली 
जहाँ तूने
प्रेम की 
कब्रगाह में
वो बुत बनाया 
जिसकी खुशबू
के आगे 
पुष्प भी 
महकना छोड़ दे 
जिसकी 
शिल्पकारी में
शिल्पकार भी
मूर्ती गढ़ना 
छोड़ दे
बुतपरस्ती
का ऐसा 
मक़ाम बनाया
मुझे वहाँ 
खुदा ना मिला
बस तूने
मुझे ही 
खुदा बनाया
ये तेरे प्रेम
का नगर
तेरी मोहब्बत 
का मंदिर बना
जहाँ आकर
मेरा अक्स भी 
हार गया
और तेरे प्रेम के
बुत में समां गया

गुरुवार, 20 मई 2010

बिना बात के भी शिकायत होती है

बिना बात के भी शिकायत होती है
हुस्न वालों की भी अजीब फितरत होती है

कभी शिकवों की लम्बी फेहरिस्त होती है
कभी बिना फेहरिस्त के भी शिकायत होती है

हुस्न की ये अदा भी गज़ब होती है
जब शिकायत भी प्यार भरी होती है

तकरार में भी इकरार नज़र आता है
तब हुस्न  कुछ और निखर जाता है

शोख चंचल आँखों में खिले तबस्सुम 
हुस्न का हुस्न और खिला जाते हैं 

प्यार की तकरार की मिठास बढ़ा जाते हैं
रूठे हुस्न को मनाने की प्यास जगा जाते हैं

जब  इश्क क़दमों में झुका होता है
हुस्न का वो ही अंदाज़ तो कातिल होता है

रविवार, 16 मई 2010

ख्वाब को पकड़ना चाहता हूँ...........

तेरा मेरा यूँ मिलना
जैसे आकाश का 
धरती को तकना
पूजन , अर्चन,वंदन बन 
आई हो मेरे जीवन में
जब से दीदार किया तेरी
रिमझिम सी  इठलाती ,
मुस्काती चितवन का
 होशोहवास सब गुम हो गए
तुम्हारे ही ख्यालों में
ना जाने कहाँ खो  गए
ये कैसी मदहोशी छाई है 
तुम्हें पाने की चाह
दिल  में समायी है
जानता हूँ छू नहीं सकता
फिर भी आस की लौ 
जलाई है 
 ख्वाबों को तुम्हारे प्रेम की
पैरहन पहनाई है
तुम पैरों में महावर लगाये
आओगी इक दिन जीवन में 
इसी आस की रंगोली रोज
दिल की चौखट पर सजाता हूँ 
तुम्हारी चूड़ियों की खनक
जब  दरवाज़ा मेरा खड्काएगी 
तब कैसे दिल को सम्हालूँगा
ये सोच -सोच घबराता हूँ
जब भी तस्वीर निहारा करता हूँ
अधरामृत पान की
लालसा मुखर हो जाती है
जब सामने तुम्हारा वजूद होगा 
तब कैसे खुद को सम्हालूँगा
ये सोच -सोच शरमाता हूँ
मगर फिर भी प्रेम का
प्रतिकार तुम ही से चाहता हूँ
ख्वाब में ही सही मगर 
अपने इंतज़ार के मंदिर में
तुझे अपने ख्वाब की देवी बना 
तेरी वंदना कर
विजय रथ पर सवार हो
ख्वाब के प्रेम क्षितिज पर
मिलना चाहता हूँ
जानता हूँ तुम हकीकत नहीं
ख्वाब हो मेरा फिर भी
ख्वाब को पकड़ना चाहता हूँ...........

गुरुवार, 13 मई 2010

मैं भीग जाता हूँ

जब भी 
तेरे गेसुओं से 
टपकती बूँदें
गिरती हैं मेरे 
ह्रदय नभ पर
मैं भीग जाता हूँ 

जब भी तेरे अधरों पर
कुछ कहते -कहते
लफ्ज़ रुक जाते हैं
मैं भीग जाता हूँ

जब भी तेरी 
पेशानी पर
चुहचुहाती बूँदें
चाँदनी सी आभा
बिखेरती हैं
मैं भीग जाता हूँ

जब भी तेरे
दिल की धडकनें
मौसम - सी 
बदलती हैं
मैं भीग जाता हूँ

जब भी तेरा
मुखड़ा 
ओस की बूँद सा
सतरंगी आभा 
बिखेरता है
मैं भीग जाता हूँ

शनिवार, 8 मई 2010

हाँ , मैंने खुशबू को क़ैद कर लिया

हाँ , मैंने 
खुशबू को 
क़ैद कर लिया 
तेरी सोमरस 
छलकाती बातों को
मीठी -मीठी 
मुस्कानों को
हिरनी से चंचल
नैनों की चितवन को 
बिजली से मचलते 
पैरों की थिरकन को
तेरे मिश्री घुले 
मधुर अल्फाजों को 
मधुर- मधुर
गुंजार करते गीतों को
तेरे  कभी दौड़ते , 
भागते ,कभी हाँफते 
पलों को
हर पल
प्रफुल्लित 
उल्लसित
पुलकित 
जीवन को भरपूर
जीने की तमन्ना को
तेरे छोटे -छोटे
तारों में सिमटे 
रंगीन ख्वाबों को
मेरे दर्द में
तड़पकर
तेरी अंखियों में
उभरे मोतियों को 
तेरे भीने -भीने
अहसास की महक को
तेरा उछलकर 
बादलों को 
छूने  की चाह को
तेरा मचलकर 
मेरी गोद में
सिर रखकर
रूठने की अदा को
अपनी यादों में
समेट लिया
हाँ , लाडली
मेरे आँगन 
की गोरैया
मैंने खुशबू को
क़ैद कर लिया

मंगलवार, 4 मई 2010

बस एक बार आजा जानाँ..................

तेरी मेरी मोहब्बत
खाक हो जाती
गर तू वादा ना करती
इसी जन्म में मिलने का
एक अरसा हुआ
तेरे वादे पर ऐतबार
करते - करते
पल- छिन्न युगों से
लम्बे हो गए हैं
मगर तेरे वादे की
इन्तिहाँ ना हुई
आज जान जाने को है
आस की हर लौ
बुझने को है
तुझे पुकारता है प्यार मेरा
याद दिलाता है वादा तेरा
क्या भूल गयी हो जानाँ
मोहब्बत की तपिश से
वादे को जलाना
मेरी आवाज़ की
स्वर लहरी पर
हर रस्मो- रिवाज़ की
जंजीरों को तोड़कर
आने के वादे को
क्या भूल गयी हो
धड़कन के साथ
गुंजार होते मेरे नाम को
देख , मुझे तो
तेरी हर कसम
हर वादा
आज भी याद है
ज़िन्दगी की आखिरी
साँस तक सिर्फ
तुझे चाहने का
वादा किया था
और आज भी
उसे ही निभा रहा हूँ
इसी जन्म में
मिलन की बाट
जोह रहा हूँ
तेरे वादे की लाश
को ढोह रहा हूँ
अब तो आजा जानाँ
यारा
मुझे मेरे यार से
मिला जा जानाँ
मेरे प्यार को
मेरे इंतज़ार को
अमर बना जा जानाँ
बस एक बार
आजा जानाँ
बस एक बार…………

सोमवार, 3 मई 2010

मौन मुखर हो जाये

अश्कों का बहना
कोई बड़ी बात नहीं 
मज़ा तब है जब
अश्क बहें भी और
 नज़र भी ना आयें
और  जहाँ मौन भी
नज़रों में मुखर हो जाये 

शनिवार, 1 मई 2010

आज्ञाकारी पुत्र ?

पिता ने पुत्र 
को उपदेश दिया 
जीवन का
सन्देश दिया
बेटा, काम कुछ
ऐसा कर जाना 
दुनिया की यादों 
में बस जाना
पशुवत जीवन तो
सब जीते हैं 
ज़हर का घूँट 
तो सब पीते हैं
तुम राम -सा 
जीवन जी जाना
नाम अपना रौशन 
कर जाना
अब पुत्र ने
चिंतन- मनन किया 
राम के जीवन का
अवलोकन किया
इक गहन चिंता 
में डूब गया 
आज के युग में
कहाँ से लाउँगा 
भारत- सा
त्यागी भाई
लक्षमण -सा 
आज्ञाकारी भाई
सीता हर किसी को
मिला नहीं करती 
राम अगर बन जाऊँगा
केकैयी तो बहुत 
मिल जाएँगी पर 
कौशल्या- सी माँ
कहाँ से लाऊँगा 
जहाँ माँ ही 
स्वार्थ की खातिर 
बेटो की बलि 
चढ़ा  देती है 
पत्नी भी प्रेमी 
के साथ 
भाग जाती है
जन्म भर का बंधन 
इक पल में 
भुला देती है
भाई ही भाई का
गला उतार देते हैं
जहाँ पग -पग पर
मर्यादाएँ टूटा करती हैं
कैसे मर्यादा पुरुषोत्तम 
बन पाऊँगा 
कैसे राम- सा जीवन
जी पाऊँगा
बहुत चिंतन -मनन के बाद
पुत्र निष्कर्ष पर पंहुचा 
सिर्फ नाम ही तो करना है
लोगों के ज़ेहन में
अपनी छवि अंकित 
ही तो करनी है 
काम ही तो 
ऐसा करना है
जिससे नाम 
रौशन  हो जाये 
 राम बनना आसान 
नहीं इस युग में
इसलिए वो
"रावण"बन गया 

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

जब सवाल करने का हक हो ?

कोई चीत्कार 
सुनी नहीं 
मगर फिर भी
चीत्कार होती है 
जो बिना सुने 
भी सुनाई देती है
अंतर्मन को 
झकझोरती है
सागर के फेन 
सा जीवन 
उसमें भी
वक़्त के तरकश में 
दबी , ढकी , 
अंधकार में डूबी 
कुछ वीभत्स करती
आत्मा को 
झिंझोड़ती आवाजें
 बिना कहे भी
बहुत कुछ 
कह जाती हैं 
उस अंधकार की
कालकोठरी में
चीत्कारती हैं
मगर उन्हें 
वहीँ उन्ही 
तहखानो में 
दफ़न कर दिया 
जाता है
जवाब तो तब मिले
जब सवाल करने 
का हक हो  ?

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

पत्थर हूँ मैं

पत्थर हूँ ना 
खण्ड- खण्ड 
होना मंजूर
पर पिघलना 
मंजूर नहीं 

स्थिर , अटल 
रहना  मंजूर 
पर श्वास , गति 
लय मंजूर नहीं

पत्थर हूँ ना
पत्थर- सा 
ही रहूँगा 
अच्छा है 
पत्थर हूँ
कम से कम 
किसी दर्द 
आस , विश्वास
का अहसास 
तो नहीं
कहीं कोई 
जज़्बात तो नहीं
किसी गम में 
डूबा तो नहीं
किसी के लिए 
रोया तो नहीं
किसी को धोखा 
दिया तो नहीं
अच्छा है
पत्थर हूँ
वरना 
मानव 
बन गया होता
और स्पन्दनहीन बन
मानव का ही
रक्त चूस गया होता
अच्छा है
पत्थर हूँ
जब स्पन्दनहीन 
ही बनना है
संवेदनहीन 
ही रहना है
मानवीयता से
बचना है
अपनों पर ही
शब्दों के 
पत्थरों से 
वार करना है
मानव बनकर भी 
पत्थर ही 
बनना है
तो फिर 
अच्छा है
पत्थर हूँ मैं  

रविवार, 28 मार्च 2010

संजीवनी

हृदय तिमिर को  बींधती
तेरी रूह की 
सिसकती आवाज़
जब मेरे हृदय की
मरुभूमि से टकराती है
मुझे मेरे होने का 
अहसास करा जाती है
जब तेरे प्रेम की 
स्वरलहरियाँ हवा के
रथ पर सवार हो
मेरा नाम गुनगुना जाती हैं
मुझे जीने का सबब
सिखा जाती हैं
जब  दीवानगी की 
इम्तिहाँ पार कर 
तेरी चाहत मेरा
नाम पुकारा करती है
मेरी रूह देह की 
कब्र में फ़ड्फ़डाती है
और ना मिलने के 
अटल वादे की 
आहुतियाँ दिए जाती है
तेरे दर्द को भी जीती हूँ
अपने दर्द को भी पीती हूँ
प्रेम के इस मंथन में
हलाहल भी पीती हूँ
मगर फिर भी
तेरी इक पुकार की 
संजीवनी से जी उठती हूँ
मैं मर- मरकर भी 
मर नहीं पाती हूँ

रविवार, 21 मार्च 2010

गर प्यार से छू ले

आज भी 
सिहर जाए 
रोम रोम
गर तू
प्यार से 
छू ले मुझे
आज भी
डूब जाऊँ 
नैनों की 
मदिरा में
 गर तू
नज़र भर 
देख ले मुझे
आज भी 
बंध  जाऊँ
बाहुपाश में तेरे
 गर तू
स्नेहमय निमंत्रण दे 
उर स्पन्दनहीन
नहीं है
बस नेह जल के 
अभाव में
बंजर हो गया है

बुधवार, 17 मार्च 2010

तेरे पास

सुन 
तेरे चेहरे पर 
गुलाब सी खिली 
मधुर स्मित 
नज़र आती है मुझे
जब तू दूर -बहुत दूर
निंदिया के आगोश में
स्वप्नों के आरामगाह में
विचरण कर रहा होता है
तेरे सीने के मचलते ज्वार 
यहीं भिगो जाते हैं मुझे 
मेरे तड़पते जज्बातों को 
तेरी बेखुदी में
महकते ख्याल 
तेरे अहसासों की
 लोरियां सुना 
जाते हैं मुझे
तेरी धड़कन की 
हर आवाज़ सुना 
करती हूँ
तेरे हर पैगाम को
पढ़ा करती हूँ
और मैं यहीं 
तुझसे दूर होकर भी
तेरे पास होती हूँ

गुरुवार, 11 मार्च 2010

अब तो आ जा .......

आ जा
अब तो
एक बार
तड़प की
हर हद
पार हो चुकी है
बिन आंसू के
रोती हूँ
तुझ बिन
कैसे जीती हूँ
जानता है
तू भी
मगर फिर भी
मुझे तड़पाकर
कितना सुकून
तुझे मिलता होगा
ये पता है मुझे
अहसास सिर्फ
अहसास होते हैं
उनका नाम
नहीं होता ना
इसीलिए
तुझे अहसास
नाम दिया
और तूने
उसे सार्थक
कर दिया
अहसास बनकर
आया ज़िन्दगी में
अहसास सा
वजूद पर
छा गया
उस अहसास
की तड़प
तडपाती है
जो नही
कहना चाहती
वो भी
कह जाती है
अब तो आ जा
यार मेरे
अहसास का भी
अहसास अब तो
तड़पाता है
मत इम्तिहान ले
मेरे अहसास का
कहीं आज
धडकनें रुक
ना जायें
तेरे दीदार की
हसरत लिए
ना दफ़न
हो जायें
अब तो
आ जा
एक बार
बस एक बार.........

रविवार, 7 मार्च 2010

टूटे टुकड़े

१) सुनो
कुछ ख्वाब बोये थे
तुम्हारे साथ जीने के

बंजर ज़मीन में


२) वेदनाओं के ताबूत में
आखिरी कील जो
लगायी तुमने

रूह को सुकून आ गया


३) तेरी चाहत की
बैसाखियों ने
अपाहिज बनाया मुझे

बस लाश बनना बाकी है


४) कैसे समेटेगा
इन बिखरे टुकड़ों को
जिन्हें कभी
तू ने ही ....................


५) बिन बादल बरसती हूँ
बिन आंसू के रोती हूँ

कहीं सैलाब में बह ना जाऊं


६) दस्तक कोई देता ही नही
आवाज़ कोई आती ही नही

शायद हवाओं का रुख बदल रहा है

गुरुवार, 4 मार्च 2010

तेरी ख़ामोशी

तेरी ख़ामोशी
जब बातें करती है
मुझसे
बस वहीं धडकनें
रूक जाती हैं
जो तुझसे
नहीं कह पातीं
वो अफसाने
मेरे कानो में
बयां कर जाती हैं
कभी तेरा
तितलियों सा
उड़ना
कभी तूफ़ान सा
मचलना
कभी खग सदृश
आकाश में उड़ना
कभी यादों के
कटहरे में
सजायाफ्ता
मुजरिम सा
खामोश ठहर जाना
कभी मेघों सा
गरजना
कभी वेणी में गुंथे
पुष्पों सा महकना
और फिर कभी- कभी
कांच की तरह टूटे
ख्वाबों सा तेरा टूटना
कभी किसी
रुके दरिया सा
ख़ामोशी का सन्नाटा
कभी आँख से गिरे
अश्क सा मिटटी
में मिल जाना
तेरे हर पल
हर लम्हे की
दास्ताँ सुना जाती हैं
तेरी ख़ामोशी मुझे
बता फिर कैसे
कोई जिंदा रहे
और धडकनों की
आवाज़ सुने

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

किससे करें बरजोरी........कैसे खेलें होली ?

होली होली
खेलें होली
रंगों की है
बरजोरी
चलो चलो
सब खेलें होली
आवाज़ ये
आ रही है
दिल को मेरे
दुखा रही है
कैसी होली
कौन सी होली
कौन से रंगों से
करें बरजोरी
कहीं है देखो
रिश्तों के
व्यापार की होली
कहीं है प्यार के
इम्तिहान की होली
कहीं पर देखो
जाति की होली
कहीं है भ्रष्टाचार
की होली
कोई तो फेंके
बमों के गुब्बारे
कहीं पर है
नक्सलिया टोली
लहू का पानी
डाल रहे हैं
नफरतों के
बाज़ार लगे हैं
सियासती चालों की
होली खेल रहे हैं
दाँव पेंच सब
चल रहे हैं
बन्दूक की
पिचकारी बना
निशाना दाग रहे हैं
देश को कैसे
बाँट रहे हैं
ये कैसी होली
खेल रहे हैं
लहू के रंग
बिखेर रहे हैं
केसरिया भी
सिसक रहा है
टेसू के फूलों से
भी जल रहा है
हरियाली भी
रो रही है
अपना दामन
भिगो रही है
अमन शान्ति का
हर रंग उड़ गया है
आसमान भी
बिखर गया है
माँ भी लाचार खडी है
अपनों के खून से
सनी पड़ी है
बेबस निगाहें
तरस रही हैं
जिसके बच्चे
मर रहे हों
आतंक की भेंट
चढ़ रहे हों
जो घात पर घात
सह रही हो
तड़प- तड़प कर
जी रही हो
जिस माँ को
अपने ही बच्चे
टुकड़ों में
बाँट रहे हों
वो माँ बताओ
कैसे खेले होली
जहाँ दिमागों पर
पाला पड़ गया हो
स्पंदन सारे
सूख गए हों
ह्रदयविहीन सब
हो गए हों
अपनों के लहू से
हाथ धो रहे हों
बताओ फिर
कैसे खेलें होली
किसकी होली
कैसी होली
किससे करें
बरजोरी
अब कैसे खेलें होली ?