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शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

आज राधा बनी है श्याम






आज राधा बनी है श्याम 
 नाचें कैसे नन्दकुमार

पैरों मे पहने कैसे पायलिया
छम छम नाचें देखो कैसे सांवरिया
मुरली पे छेडी कैसी तान 
 नाचें कैसे नन्दकुमार
आज राधा ...................

लहंगा चोली कैसे पहने सुकुमार
लाला से बने लली कैसे नन्दलाल
सिर पर ओढ़ी है चूनर लाल
 नाचें कैसे नंदकुमार
आज राधा.................


मोहिनी मूरत रही कैसे लुभाय
मधुर चितवन ने दियो होश गंवाय
माथे पर बिंदी ने कियो है कमाल
 नाचें कैसे नंदकुमार
आज राधा बनी है श्याम 
 नाचें कैसे नन्दकुमार

मेरो तन मन लियो है वार
नाचें कैसे नंदकुमार
मेरो जियो लियो है चुराय
नाचें कैसे नंदकुमार
जिसकी ठोढ़ी पे चमके हीरा लाल 
नाचें कैसे नंदकुमार 
आज वृषभान लली बनी श्याम
नाचें कैसे नंदकुमार 


आज राधा बनी है श्याम 
 नाचें कैसे नन्दकुमार








अब चाहें तो इस लिंक पर सुन भी लीजिये 
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सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

एक खोज , एक चाहत और एक सच्……………उफ़ !









एक खोज , एक चाहत और एक सच्……………उफ़ ! 
बुद्धत्व में पूर्णत्व को खोजता एक सच
पर उस चाहत का क्या करूँ 
जो बुद्धत्व भी तुम में ही पाना चाहती है
हाँ ...........तुम नहीं होकर भी यहीं कहीं हो
हाँ ...........मेरे अहसासों में
मेरे ख्यालों में
मेरे गीतों में
मेरी धड़कन में
फिर भी कहीं नहीं हो
वर्षों गुजर गए
तुम्हारा स्पंदन मुझ तक आते
मेरी धमनियों में बहते
मधुर झंकार करते
मगर फिर भी कहीं कुछ अधूरा था
कुछ छुटा हुआ 
कहीं कुछ ठहरा हुआ
एक अनाम सा नाम
एक मीठी सी  टीस
एक महकती सी  खुशबू
तुम्हारे होने की .........या ना होने की
मगर था और है सब आस पास ही
फिर भी एक दूरी
एक अनजानापन.......जिसे जानता हूँ मैं
एक उद्घोष मन्त्रों का
एक उद्घोष तुम्हारी अनसुनी आवाज़ का
कभी फर्क ही नहीं दिखा दोनों में
यूँ लगा जैसे तुम मुझे 
गुनगुना रही हो 
तुमसे कभी अन्जान रहा ही नहीं
तुम्हें जानता हूँ ........ये भी कैसे कहूं
जब तक कि मेरी चाहत को पंख ना मिलें
हाँ .........वो ही .........जब तुम हो
और बुद्धत्व तुम में ही समा जाये
या कहो मुझे बुद्ध तुम में ही मिल जाये
और जीवन संपूर्ण हो जाए
कहो आओगी ना
क़यामत के दिन मुझे पूर्ण करने 
बुद्धत्व स्थापित करने
मेरी अनदेखी कल्पना .........मेरी ऋतुपर्णा!


दोस्तों 
आज की इस रचना के जन्म का श्रेय श्री समीर लाल जी की पोस्ट को जाता है . जैसे ही उनकी पोस्ट पढ़ी तो ये कुछ ख्याल वहां उतर आये और उनकी आज्ञा से ही उनके दिए नाम का प्रयोग किया है क्यूंकि उनकी भी यही हार्दिक इच्छा थी कि वो ही नाम प्रयोग किया जाये वर्ना मैंने नाम बदल दिया था इसके लिए मैं समीर जी की हार्दिक आभारी हूँ.


शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

और हमारी मोहब्बत का सुहाग अमर हो जाये ............

सात जन्मों तक के लिए
तुम्हारा साथ मांगने वाली मैं
तुम्हारे लिए करवा चौथ का 
व्रत रखने वाली मैं
तुम्हारे नाम का सिन्दूर मांग में
सजाने वाली मैं
तुम्हारी चाहत की मेहंदी
हाथों में लगाने वाली मैं
तुम्हारे नाम का मंगलसूत्र
गले में पहनने वाली मैं
तुम्हारी लम्बी उम्र की कामना
करने वाली मैं
तुम्हारे प्रेम की बिंदिया 
माथे पर सजाने वाली मैं
आज नहीं चाहती 
सात जन्मों तक का साथ
नहीं करना चाहती ऐसा श्रृंगार
जिसमे सिर्फ दिखावे की बू आती हो
नहीं हो जिसमे ह्रदयों का मिलन
आडम्बर के आवरण में 
नहीं छिपाना चाहती 
रिश्ते की गरिमा को
नहीं चाहती मैं भी 
भीड़ में शामिल हो जाऊँ
और रिश्ते को सिर्फ
आडम्बर की भेंट चढ़ा
दिखावटी दुनिया के दिखावटी 
साजो सामान का 
वो हिस्सा बन जाऊँ
जिसमे रिश्ते की ऊष्मा
रिश्ते की गरिमा 
सिर्फ एक ढकोसला भर 
बन कर रह जाये
आज बाजारवाद ने 
रिश्ते को भी तो बाजारू 
सा नहीं बना दिया
सिर्फ एक दूसरे से सुन्दर
दिखने की होड़
एक दूसरे से ज्यादा समर्पित
और चाहने वाले पति 
का विज्ञापन सा नहीं लगता
नहीं करना चाहती
कोई होड़ किसी से
नहीं करना चाहती 
वो सब जो सब करते हैं
जानते हो मैं क्या चाहती हूँ
सिर्फ इतना 
इस करवा चौथ
सिर्फ इसी जन्म के लिए
पहनूं तो सिर्फ तुम्हारी चाहत का मंगलसूत्र
मांग सजाऊं तो सिर्फ तुम्हारी मोहब्बत के  
उन छोटे छोटे मोतियों से 
जिसमे तुम मन से शामिल हो 
दिखावटी साजो- समान बनकर नहीं
हाथ पर मेहंदी की जगह
मेरे दिल पर छाप हो तुम्हारे प्रेम की
कभी ना मिटने वाली 
ऐसा रंग चढ़े जो  कभी
फीका ही ना पड़े
और देखना चाहती हूँ 
उस चाँद को
जो तुम्हारी आँखों में हो
जो तुम्हारी आँखों से 
मेरे अंतस तक उतरे
और तब मैं अपना व्रत पूर्ण करूँ
उस चाँद में अपना प्रतिबिम्ब देखते हुए
जहाँ चाहत किसी लिबास में ढकी ना हो
जहाँ मोहब्बत को किसी जन्म की आस ना हो
जहाँ प्रेम शो केस में लगा पीस बनकर ना रह जाये
ये तुम्हारा और मेरा 
नितांत निजी क्षण 
सिर्फ और सिर्फ
हम दोनों के मध्य 
शरद के चाँद सा अपनी
सोलह कलाओं के साथ
उम्र भर दमकता रहे 
और सात जन्मों की कामना
एक जन्म में ही पूर्ण हो जाए
सात जन्म एक जन्म में ही जी जाएँ
और हमारी मोहब्बत का सुहाग अमर हो जाये .............

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

तोड़ दी हैं आज मैंने तेरी यादों की चूड़ियाँ

तोड़ दी हैं आज मैंने
तेरी यादों की चूड़ियाँ
जिसमे तुमने अपने 
प्रेम की लाख भरी थी 
सुनहरे वादों के रंगों से
जिनमे रंग भरा था 
ये कहकर 
देखो इनमे मेरा 
दिल धडकता है
सहेज कर रखना
ये सुनहरी रंग 
तुम्हारे हाथों  पर
खूब फबता है
देखो कभी 
फीका ना पड़े
और मैंने वो 
सुनहरी रंग आज तक
सहेजा हुआ है
अपनी याद का बिछावन बनाकर
और याद है
तुमने कहा था
ये लाल रंग 
तुम्हारी धडकनों  का है
जिसमे मेरा वजूद सांस लेता है
देखो उससे  मैंने आज तक
अपनी यादों की माँग सजा रखी है
ताकि तुम्हारी चाहत दीर्घायु रहे
और वो हरा रंग
तुम्हारी हरी भरी मोहब्बत का प्रतीक
कहा था ना तुमने
मोहब्बत हरी भरी ही अच्छी लगती है
देखो तो 
आज तक मैंने
मोहब्बत की जमीन पर 
यादों की मखमली  घास उगा रखी है 
ताकि जब भी तुम आओ 
तो नर्म नाजुक रेशमी अहसास
ही तुम्हारा स्वागत करें
मगर तुमने तो जैसे
यादों से भी किनारा कर लिया है
तभी तो तुम ना खुद आये 
ना यादों को आने दिया
और मैं यादों की संदूकची में 
तुम्हारे प्रेम की चूड़ियाँ सजाये
इंतज़ार का घूंघट ओढ़े 
चौखट पर खडी मूरत बन गयी
मैंने तो सिर्फ कांच की चूड़ियाँ 
ही संजोयी थीं
खनक के लिए
क्या पता था 
तुमने कभी कोई दस्तक सुनी ही नहीं
या सुननी ही नहीं चाही
आखिर कब तक सहेजती
रंग फीके पड़ जाते 
उससे पहले 
तोड़ दीं मैंने खुद ही आज
तुम्हारी यादों की चूड़ियाँ
और हो गयी आज़ाद
कब सबका सौभाग्य अखंड रहता है 
आखिर टूटना तो चूड़ियों की नियति होती है ना .............



गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

मोहब्बत जडाऊ नहीं होती

चाहती थी प्रीत बंजारन
के पांव में बिछुए पहनाना 
मोहब्बत के नगों से जड़कर
बनाना चाहती थी
एक नयी इबारत
एक नयी उम्मीद
एक नया अहसास
मोहब्बत के लिबास का
पर मोहब्बत ने कब
लिबास पहना है
कब  नग बन
किसी अहसास में उतरी है
मोहब्बत न तो कभी
बेपर्दा हुयी है
और न ही कभी
लिबास में ढकी है
मोहब्बत ने तो 
हर युग में
हर काल में
एक नयी इबारत गढ़ी है 
और हर रूह को छूती
हवा सी बही है
और बंजारे कब कहीं 
ठहरे हैं
फिर प्रीत बंजारन को
कैसे कोई छाँव मिलती
जो किसी नगीने सी 
किसी जेवर में जड़ी जाती 
शायद तभी
मोहब्बत जडाऊ नहीं होती .........

शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

आपके सहयोग की जरूरत है




दोस्तों 



आपको सिर्फ इतना करना है कि कृपया इन दोनों लिंक्स को  पसन्द 



करके मेरा हौसला बढायें और प्रतियोगिता मे स्थान दिलायेँ और अपने 


जानकारों तक ये लिंक पहुँचा कर लाइक करवाए तो बहुत सहयोग 


मिलेगा इन्हें खोलियेगा और like  के बटन  पर क्लिक करियेगा तथा 


अपने जानकारों से कहकर पसंद करवाइए .आप सब दोस्तों की हार्दिक 


आभारी रहूंगी .







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बुधवार, 28 सितंबर 2011

कुछ तो था उसमे

कुछ तो था उसमे
शायद उसकी आदत
बच्चियों सी जिद पकड़ने की
और फिर खिलौना देख
बच्चे जैसे खुश होने की
या शायद उसकी बातें
जिसमे मैं तो कहीं नहीं होता था
मगर सारा ज़माना अपने संग लिए घूमती थी
हर बात पर खिलखिलाना
हर बात की खाल खींच लाना
हर बात पर एक जुमला कस देना
या शायद उसकी वो दिलकश मुस्कान
जिसमे बच्चों की मासूमियत छुपी थी
जैसे किसी फूल पर शबनम रुकी हो
और इंतज़ार में हो कब हवा का झोंका आये
उसके वजूद को हिलाए
और वो नीचे टपक जाए
ना जाने क्या था उसमे
मगर कुछ तो था
शायद ख्वाब को पकड़ने की उसकी आदत
वो मेरी आँखों में चाँद देखने की उसकी जिद
और फिर उस चाँद को
किताब में सहेजने का उसका जूनून
या शायद एक चंचल हवा का
रुके हुए पानी में 

हलचल पैदा कर जाने जैसा 
उसका वजूद
कभी लगती

किसी मदमस्त इठलाती 
पवन की मीठी बयार सी
तो कभी लगती जैसे
जेठ की तपिश में जलती रूह पर
किसी ने बर्फ का फाया रखा हो
या शायद सागर में तैरती वो कश्ती
जिसमे मुसाफिर को मंजिल की चाह ना हो
बस सफ़र चलता रहे यूँ ही
अनवरत ............अनंत की तरफ
बस उसका साथ हो
कुछ तो था उसमे
तभी आज तक
उसकी सरगोशियाँ हवाओं में सरसरा रही हैं
कानों में गुनगुना रही हैं
रूह पर थाप दे रही हैं
एक संगीत जैसे कोई बज रहा हो
और वो कोई गीत गुनगुना रही हो

तभी उसमे कुछ होता है
जिसे भूल पाना नामुमकिन होता है 

कुछ आहटें बिन बुलाये भी दस्तक देती हैं ..............

तेरे बिना जिया लागे ना


सुनो 
देखो ना
इक युग बीता
मगर देखो तो
मेरी आस का टोकरा
कभी रीता ही नही
सबने मुझे बावरी बना दिया
तेरे विरह में ये नाम दे दिया
मगर तुम बिन मेरा ना
कोई पल रहा अछूता
फिर भला कैसे कहूं 
तेरे बिना जिया लागे ना
तुम तो सदा
मेरी आँख की ओट में

करवट लेते रहे
कभी नींद में तो कभी ख्वाब में
मिलते जुलते रहे
सुना है
दुनिया कहती है
तुम यहाँ कहीं नहीं हो अब
अब नहीं आओगे वापस
जाने वाले फिर नहीं आते
मगर ये तो बताओ
तुम गए कहाँ से हो
क्या मेरी यादों से
क्या मेरे नयनों से
क्या मेरे दिल से
हर पल तो तुम्हें
निहारा करती हूँ
हर पल तुम्हारा वजूद
मेरे ख्वाबों से
अठखेलियाँ करता है
कभी रूठा करते हो
कभी मनाया करते हो
कभी मेरी माँग
अपनी प्रीत से सजाया करते हो
कभी चाँदनी रात में
मेरी वेणी में फूल लगाया करते हो
कभी किसी झील के किनारे
ठहरे हुए पानी में
चाँद की सैर पर ले जाया करते हो
कभी तारावली के फूलों से
धरती सजाया करते हो
और मुझे वहाँ किसी
ख्वाब सा सजाया करते हो
तो बताओ ना
कौन है दीवाना
ये दुनिया या मैं
बताओ तो
जब हर पल
हर सांस में
हर धड़कन में
मेरी रूह में
तुम ही तुम समाये हो
फिर कैसे कह दूं
तेरे बिना जिया लागे ना

शनिवार, 24 सितंबर 2011

आ मेरी चाँदनी








आ मेरी चाँदनी 

तुझे कौन से 

दामन मे सहेजूँ

कैसे तेरी राहो को
रौशन करूँ
कौन से नव 
पल्लव खिलाऊँ
जो तू मुस्काये तो
मै मुस्काऊँ
ये जग मुस्काये
हर कली खिल जाये
चाँद की चाँदनी भी
तुझसे रश्क खाये

 आ मेरी चांदनी 
तुझे ऐसे संवारूं
जो तू चले तो 
हवाये चले
जो तू रुके तो
वक्त थम जाये
तेरी इक जुम्बिश पर
ये जहाँ हिल जाये
आ मेरी चाँदनी
तुझे सीने मे बसा लूँ
और एक नया जहाँ बसा लूँ
जिसमे तू ऐसे सिमट जाये
कि हर आंगन महक जाये







आ मेरी चाँदनी 

इक दीप जलाऊँ

जिसकी रौशनी में

हर आँगन महक जाये
घर घर गूंजे किलकारी
खिले हर बगिया न्यारी
तू हर घर में महक जाये
तेरी खुशबू यूँ बिखर जाये
हर आँगन में तुझसी 
इक कली खिल जाये 

आ मेरी चाँदनी 
तुझे पलकों में सजाऊँ
तुझे तेरा हक़ दिलाऊँ
और इस जहाँ को 
इक आईना दिखाऊँ
तुझे ऐसे बुलंद करूँ
कि आसमाँ भी छोटा पड़ जाये
और तेरा सितारा 
जहाँ में रोशन हो जाये
आ मेरी चाँदनी
तुझ पर हर ख़ुशी मैं लुटाऊँ 
और तेरी बुलंदियों को 
आसमाँ पे सजाऊँ

बुधवार, 21 सितंबर 2011

कहीं ये मन की मौत का कोई संकेत तो नहीं ?

कहीं कोई हलचल नहीं
नीरव निस्तब्ध अंतर्मन
निर्जन वन सा मन आँगन
कोई शब्द संचयन नहीं
कोई नव सृजन नहीं
सब ओर सिर्फ एक 
मरघट की ख़ामोशी
कहीं कोई दूर 
सियार भी नहीं बोल रहा
जो वातावरण का 
सन्नाटा कुछ तो घटे 
कब्रिस्तान की ख़ामोशी 
चिताओं की जलन
और दूर दूर तक फैला 
भयावह घटाटोप अँधेरा
कोई आकृति नहीं
कोई आकार नहीं
सिर्फ एक उमस
जिसमे घिरा अंतर्मन
कहीं ये मन की मौत का कोई संकेत तो नहीं ?

शनिवार, 17 सितंबर 2011

बताओ तो अब सुलगने को क्या बचा ?

एक हसरत के पाँव में
जैसे किसी ने आरजुओं के
घुंघरुओं को बांधा हो
उम्र के लिहाज को
जैसे किसी ने
उच्छंखरल नदी में डाला हो
रिश्ते की करवट ने
जैसे चाँद दिन में निकाला हो
मोहब्बत के चेनाब में
जैसे पक्का घड़ा उतारा हो
कुछ ऐसे मोहब्बत का धुआँ
मेरी रूह में पैबस्त हो गया है


बताओ तो अब सुलगने को क्या बचा ?

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

आखिर कोई तो हो कारण

सुनो
आजकल मन तुम तक नहीं पहुँचता
पता नहीं किन जंगलों में भटकता है
पता नहीं किस कांटे में उलझा है
जो अब फूलों की डगर नहीं देखता
कहीं दिखे तुम्हें किसी
अन्जान शहर में
अन्जान डगर पर
अन्जान महफ़िल में
किसी कांटे से उलझा
तो उसे याद कराना
हर बीता लम्हा
जो तुम्हारे साथ गुजरा था
शायद दिल की जमीन नम हो जाए
और फिर भी ना माने तो
एक बार उसे वापसी की राह दिखाना
जहाँ ये ठूंठ उसके इंतज़ार में सूखा पड़ा है
अब इसमें हलचल नहीं होती
आखिर कोई तो हो कारण
चाँदनी को जमीं तक पहुँचने के लिए

बुधवार, 7 सितंबर 2011

युगों की प्यास को अभिशप्त होने से पहले

सुनो
कहो
..............
अरे कहो ना
अब खामोश क्यूँ हो?


जानते हो
कब से
शायद अनंत जन्म से
हम प्रतीक्षारत थे
और हर क्षण
एक दूजे की चाह
एक दूजे का साथ
एक दूजे में समाहित
हमारे वजूद थे
वजूद जानते हो ना कौन से?


हाँ जानता हूँ...........
रूहानी वजूद
जो मिटकर भी नहीं मिटते
जो दूर होकर भी
पास होते हैं
एक दूजे के साथ होते हैं

देखो ना
कहीं आज अमावस तो नहीं
पूनम तो कभी
हमारी ज़िन्दगी में आयी ही नहीं
कभी चाँदनी में
रूह मुस्कायी ही नहीं
कोई कली किसी गुलशन में
खिलखिलाई ही नहीं


हाँ सही कहते हो
शायद आज
चाँद भी शर्मिंदा है
दो चाहने वालों के प्रेम का
साक्षी जो ना बन पाया
शायद मालूम हो गया है उसे
अब चाँदनी की हसरत
रूहों पर नहीं उतरती
किसी सूईं  में पिरो कर
कोई नहीं लगाता टांका
चाँदनी के तागों  का
महबूबा के केशों  में
देखो ना .............
शायद आज कोई
गवाह बनना नहीं चाहता
हमारे मिलन का
देखो तो .............
तभी सबने मुँह छुपाया है
जैसे प्रलय का कोई
चिन्ह नज़र आया है
जैसे सिर्फ एक
कँवल ही मुस्काया है
जिस पर हमारी प्रीत
का कोई मोती उभर आया है
अकेला बह रहा है
इस अथाह सागर में
आज शरीर होते
तो क्या हम होते?
नहीं ना...............
बस ये प्रेम ही है
जिसने प्रवाहमान बनाया है
शायद खुदाई नूर का
कोई करिश्मा नज़र आया है
तभी कहीं कोई विनाश का
चिन्ह ना नजर आया है
सिर्फ और सिर्फ
वो बहता हुआ
शांत सौम्य स्थिर अटल
एक ध्रुव तारा ही नज़र आया है
आओ चलें
आज प्रेम को
पूर्णविराम दे दें
युगों की प्यास को अभिशप्त होने से पहले

शनिवार, 3 सितंबर 2011

हिंदी की सच्ची तस्वीर








दोस्तों
मेरा ये आलेख इस माह के गर्भनाल के अंक मे छपा है जिसे आप फ़ोटो पर क्लिक करके बडा  करके पढ सकते हैं।


बुधवार, 31 अगस्त 2011

बताओ कौन से सितारे में लपेटूँ बिखरे अस्तित्व को ?

यूँ तो रोज किसी ना किसी को
बिखरते देखा है मैंने
मगर कभी देखा है
खुद को बिखरते
टूटते किसी ने ?
आजकल रोज का नियम है
खुद को बिखरते देखना
देखना अभी कितनी जगह
और बाकी है
हवाओं के लिए
किन किन दरारों से
रिसने की बू आती है
इबादत की जगह बदल दी है मैंने
शायद तभी देवता भी
मंदिर में नहीं रहते
सबको एक ही काम सौंपा है
 खुदा ने शायद
हर मुमकिन कोशिश करना
कोई ना कोर कसर रखना
बहुत बुलंदियों को छू चुकी है ईमारत
अब इसे ढहना होगा
मिटटी में मिलना होगा
बिखराव भी तो एक प्रक्रिया है
निरंतर बहती प्रक्रिया
प्रकृति का एक अटल हिस्सा
फिर उससे मैं कैसे अछूती रहती
सृष्टि के नियम का
कैसे ना पालन करती
मगर पल पल बिखरना
और फिर जुड़ना और फिर बिखरना
इतना आसान होता है क्या
एक बार मिटना आसान होता है
मगर पल पल का बिखराव
दिमागी संतुलन खो देता है
अब कोई कैसे और कब तक
खुद को संभाले
दिल के टूटने को तो
जज़्ब कर भी ले कोई
मगर जब वार दिमाग पर होने लगे
अस्तित्व की सिलाइयां उधड़ने लगें
और डूबने को कोई सागर भी ना मिले
बताओ कौन से सितारे में लपेटूँ बिखरे अस्तित्व को ?



रविवार, 28 अगस्त 2011

कालजयी नही बन सकती.............

वो कहते हैं मुझसे
कालजयी बन जाओ

भाषा शैली को दुरुस्त करो
मगर कैसे कालजयी बन जाऊँ

कैसे भावों से खिलवाड़ करूँ
अपने सुख के लिए लिखती हूँ
भावों में ही तो बस जीती हूँ
कैसे उनका भी व्यापार करूँ
वक्त की कसौटी पर खरा उतरने के लिए
कैसे खुद पर अत्याचार करूं
अब कसौटियो पर नही जी सकती
सबके लिये नही बदल सकती


भाव ही मेरी पूंजी हैं
भाव ही मेरा जीवन हैं
भाव बिना शून्य हूं
भावों को ही जीती हूँ
भावों को ही पीती हूँ
भाव ही मेरी थाती हैं
कैसे उनसे समझौता करूँ
कैसे भावों का त्याग करूँ
खुद से विश्वासघात करूँ
और रूह को लहूलुहान करूँ
फिर कहो कैसे शैली को बदलूं मै
कैसे भावों को कुचलूं मै
फिर मै ना मै रह पाऊंगी
अपने ही हाथों ठगी जाऊँगी
मुझे मुझसे जुदा मत करना
जैसी हूं बस वैसा अपना लेना
अब कालजयी नही बन सकती
कालजयी नही बन सकती............


शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

उडान तो आसमां की तरफ़ ही होती है ना……………

अजनबी मोड
अजनबी मुलाकात
जानकर भी अन्जान
पता नही वजूद जुदा हुये थे
या …………
नहीं , आत्मायें कभी जुदा नही होतीं
वज़ूद तो किराये का मकान है
और तुम और मै बताओ ना
वजूद कब रहे
हमेशा ही आत्माओ से बंधे रहे
अब चाहे कितनी ही
बारिशें आयें
कितने ही मोड अजनबी बनें
कितनी ही ख्वाहिशें दम निकालें
और चाहे चाय के कप दो हों
और उनमे चाहे कितना ही
पानी भर जाये
देखना प्यार हमेशा छलकता है
वो कब किसी कप मे
किसी बारिश की बूंद मे
या किसी फ़ूल मे समाया है
वो तो वजूद से इतर
दिलो का सरमाया है
फिर कैसे सोचा तुमने
हम जुदा हुये
हम तो हमेशा
अलग होते हुये भी एक रहे
एक आसमां की तरह
एक पंछी की तरह
कहीं भी रहे
उडान तो आसमां की तरफ़ ही होती है ना……………

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

झूठे मक्कारों के देश मे गांधी ने क्यों जनम लिया

किससे करें शिकायत
किससे करें गिला
झूठे मक्कारों के देश मे
गांधी ने क्यों जनम लिया
ये गांधीवादी बनते हैं
जनता पर अत्याचार करते हैं
सिर्फ़ बातों मे ही सब्ज़बाग दिखाते हैं
मगर आचरण मे ना
गांधी के उपदेश लाते हैं
गांधी की तस्वीर के नीचे ही
सच को कदमों तले कुचलते हैं
कदम कदम पर धोखा देते हैं
अपनी बातों से ही मुकरते हैं
गांधी गर होते ज़िन्दा
अपने देश का हाल देख
खुदकुशी वो भी कर लेते
अपने नारों का
अपनी बातों का
अपनी मर्यादाओ का
यूँ तिरस्कार ना देख पाते
जो राह दिखाई थी
उस पर चलने वालों को
तिल तिल कर ना मरते देखा जाता
आतंकवादियों , भ्रष्टाचारियों की खातिर मे
देश के कर्णधारों को
यूँ दण्डवत करते देखते
तो सच मे गांधी आज
लोकतंत्र की परिभाषा पर
खुद ही शर्मिंदा होते
किसकी खातिर संघर्ष किया
किसकी खातिर अनशन किये
किसकी खातिर जाँ कुर्बान की
गर पता होता तो आज
गांधी भी ज़िन्दा होते
और देश पर विदेशियो का
राज होता तो क्या गलत होता
कल भी विदेशी राज करते थे
आज भी विदेशी राज करती है
देश की जनता तो बस
भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर चढती है
गर गांधी ने ये सब देखा होता
तो सिर शर्म से झुक गया होता
अन्तस मे पीडा उपजी होती
गर कुर्सी के लालची नेताओं की
ये ऐसी मिलीभगत देखी होती
जहाँ कुर्सी की खातिर
जनता से विश्वासघात होता है
वहाँ संविधान भी आज
अपनी किस्मत पर रोता है
कैसे करे इस बात को साबित
जनता को ,जनता के लिये, जनता के द्वारा
ये तो सिर्फ़ एक किताबी तहरीर
बनी है मगर इसमे ना कोई
जनता की भागीदारी है
जनता तो सिर्फ़ प्रयोगों
तक सीमित होती है
गर देखा होता आज देश का ये हाल
गांधी ने भी अफ़सोस किया होता
क्यूँ मैने झूठे मक्कारों धोखेबाजों के
देश मे जनम लिया……………

रविवार, 21 अगस्त 2011

प्रेम दीवानी

सांवरे की प्रीत संग मैने 
बांध ली है डोरी
अब मर्ज़ी तुम्हारी
नैया मेरी पार लगाओ 
या मझधार मे डुबा दो मोरी
प्रीत की रीत मै नही जानूँ
पूजा पाठ की विधि ना जानूँ
और कोई राह ना जानूँ
सांवरे इक तेरे नाम के सिवा
और ना कोई नाम ना जानूँ
अब मर्ज़ी तुम्हारी
हाथ पकडो या छोड दो मुरारी
मै तो जोगन बनी तिहारी
मुझे ना भाये दुनिया सारी




तुम बिन  ठौर ना पाये दीवानी
भई बावरी प्रीत बेचारी
दर दर भटके मीरा बेचारी
कहीं ना मिलते कृष्ण मुरारी
कैसे आये चैन जिया मे
श्याम बिन अंखियाँ बरस रही हैं
श्याम दरस को तरस रही हैं
श्याम रंग मे डूब गयी हैं
श्याम ही श्याम हो गयी हैं
 
और कोई रंग नही है
और कोई ढंग नही है
जीवन तुम बिन व्यर्थ गया है
जीने का ना कोई अर्थ रहा है
श्याम सुधि ना बिसरायो
इक बार दरस दिखा जाओ
ह्रदयकमल मे आ जाओ



मोहिनी रूप दिखा जाओ
मुझे अपनी दासी बना जाओ
श्याम प्रीत की रीत दिखा जाओ
मुझे अपनी दुल्हन बना जाओ
श्याम मिलन को आ जाओ
कांकर पाथर बना जाओ
चरण स्पर्श करा जाओ
मुझ अहिल्या को भी तार जाओ
श्याम दिव्य जोत जगा जाओ
इक बार विरहिनी के ताप को मिटा जाओ
श्याम इक बार तो आ जाओ
प्यारे इक बार दरस दिखा जाओ


गुरुवार, 18 अगस्त 2011

आज तुम फिर धडकी हो

आज तुम फिर धडकी हो
क्या हुआ है जो आज
धडकनों  ने फिर करवट ली है
क्या फिर से कोई सरगोशी हुई है
किसी याद ने फिर आँगन
बुहारा है
ये तो  बियाबान जंगल में
एक उजाड़ मंदिर है
जहाँ अब कोई घंटा नहीं बजता
फिर कैसे आज टंकार हुई है
यहाँ तो देवी की मूरत भी
खंडित हो चुकी है
सिर्फ अवशेष ही बिखरे पड़े हैं
फिर कैसे यहाँ आज आहट हुई है
मैंने तो सुना है उजड़े दयारों में
चराग रौशन नहीं होते
फिर कैसे आज लौ टिमटिमा रही है
वैसे भी सब सावन हरे नहीं होते
फिर कैसे यहाँ कोंपल फूट रही है
क्या वक्त तुम्हारे आँगन में हवा दे रहा है
या कोई उड़ता तिनका मेरी आस का
आज तुम्हें भी चुभा है
जो तुमने मुझे इस कदर याद किया है
कि मेरी धडकनों ने फिर से जीना सीख लिया है
या फिर कोई बादल आज तुम्हारे
पाँव को फिर से छू गया है
और तुम्हें वो गुजरा लम्हा
याद आ गया है
जिसमे बरसात भी सूख गयी थी
और मोहब्बत भीग रही थी
कोई तो कारण है
यूँ ही तुम आज फिर से मुझमे नहीं धडकी हो

रविवार, 14 अगस्त 2011

जब तुम्हारा नया जन्म होगा……एक अपील देश की जनता के नाम





स्वतंत्रता दिवस है या महज औपचारिकता?
क्या वास्तव मे स्वतंत्रता दिवस है?
क्या वास्तव मे हम स्वतंत्र हैं?
कौन से भ्रम मे जी रहे हैं हम? किसे धोखा दे रहे हैं? शायद खुद को धोखा देने की आदत पड गयी है ।
जिस देश मे बोलने की आज़ादी पर प्रतिबंध लगने लगे, अपने अधिकारों के इस्तेमाल पर अंकुश कसने लगे, तानाशाही का बोलबाला होने लगे, आम जनता की आवाज़ को दबाने की कोशिश की जाने लगे,जनता के मौलिक अधिकारों का हनन होने लगे…………तो कहाँ से वो देश लोकतांत्रिक देश गिना जायेगा…………क्या हम तानाशाही की तरफ़ नही बढ रहे…………क्या फ़र्क रह गया तानाशाही मुल्कों मे और हमारे देश मे जहाँ भ्रष्टतम अधिकारी डंके की चोट पर सीना तान कर आम जनता की आवाज़ को दबाने मे जुटे हों और देश की सरकार भी उसमे शामिल हो …………किस आधार पर कहते हैं कि ये देश लोकतंत्र मे विश्वास रखता है कहाँ है लोकतंत्र जब आम जनता को उसके बोलने या विरोध प्रदर्शन की भी इजाज़त ना दी जाये?
सिर्फ़ लोकतंत्र शब्द याद किया है मगर उसके असली अर्थ को तो नेस्तनाबूद कर दिया है । कैसा शासन है ? फिर कैसी स्वतंत्रता का ढोल पीट रहे हैं हम? क्या यही स्वतंत्रता है और इसी का जश्न हमने मनाना है तो मेरी अपील है इस देश के नागरिकों से कि मत भ्रम मे रहें और कल स्वतंत्रता दिवस पर कोई भी जनता लालकिले पर ना पहुँचे और इस तरह अपना विरोध प्रदर्शन करे………ताकि देश के कर्णधारो को पता चल जाये कि तानाशाही हर युग मे चकनाचूर हुई है………और जनता की एकता और अखंडता का सबूत सरकार को मिल जाये अन्यथा उम्रभर गुलामी की जंजीरो मे जकडे रहेंगे और फिर ये मौका दोबारा कभी मिलेगा भी या नही , नही मालूम।
तो क्यों ना आज हम सब मिलकर अपना विरोध प्रदर्शन इस तरह करें कि सरकार और उनके नुमाइंदों को जनता के तेवर समझ आ जायें और इसका सबसे बेहतर अब एक  आखिरी उपाय यही बचा है कि हम सब कल स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले ना जाकर और ना ही किसी समारोह मे शिरकत करके अपना विरोध दर्ज करायें और देश के सच्चे नागरिक होने का फ़र्ज़ निभायें ताकि आने वाला कल हम पर शर्मिंदा ना हो।





सभ्यता संस्कार और संस्कृति का मानी
तीन रंगो मे समाया देश है मेरा
अब इसके रक्षक बन जाओ
मत फिर से तुम भरमाओ
एकजुट फिर हो जाओ
बलिदान को तैयार हो जाओ
आज देश की पुकार यही है
एक बार फिर से दोहराओ
तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आज़ादी दूँगा
और एकता का परचम लहराओ
खुद मे भगतसिंह , सुखदेव , राजगुरु
को एक बार फिर जिला देना
वतन का कुछ कर्ज़ चुका लेना
गांधी का मान रख लेना
अपनी शक्ति का परिचय देना
कल गुलाम थे गैरो के
इस बार अपनो की जंजीरें तोड देना
भारत को एक बार फिर
आज़ाद कर देना
ये आज़ादी का संकल्प लेना
तब स्वतंत्रता दिवस सफ़ल होगा
जब तुम्हारा नया जन्म होगा
जब तुम्हारा नया जन्म होगा……………

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

आहत मन

आओ लहू का बीज बोयें
लहू का खाद पानी दें
और लहू की ही खेती करें
अब रगो मे लहू का उफ़ान कहाँ
वो जमीन आसमान कहाँ
बन्जर मरुस्थलो मे 
अब खिलते कँवल कहाँ 
चलो यारो थोडा तेरा 
थोडा मेरा 
कुछ लहू बहाया जाये
एक लहू का दरिया बनाया जाए

सीनो मे अब दिल कहाँ 
जज़्बातो मे वो सिहरन कहाँ
अहसासो मे वो अपनापन कहाँ
चलो यारो ज़िन्दा लाशो को
फिर से दफ़नाया जाये
कुछ तेरा और कुछ मेरा
थोडा लहू बहाया जाए

सरहदो मे अब फ़ासले कहाँ
आने जाने मे अब रुकावटें कहाँ
हर तरफ़ दहशतगर्दी का आलम
चलो फिर से इस बेजान शहर को
कब्रिस्तान बनाया जाए
यहाँ ज़िन्दा रूहो को दफ़नाया जाए
कुछ तेरी कुछ मेरी
लहू की भूख मिटायी जाए
ऐसे इक दूजे को काटा जाए
फिर ना कोई प्यास रहे
फिर ना कोई आस रहे
कहीं ना कोई विश्वास रहे
चलो यारो आओ इस देश को अपने
लहू का समन्दर बनाया जाए

जब ज़िन्दा ही चिताये जलती हैं
इंसान हर पल मरता हो
आतंक , भ्रष्टाचार का बोलबाला हो
आम आदमी के नसीब मे तो
सिर्फ़ भुखमरी का पाला हो
पैसे से जहाँ सबकी भूख मिटती हो
गद्दारो से धरती पटी पडी हो
जहाँ लाशें भी बिकती हों
और इंसानियत पर 
बेईमानी , गद्दारी की
दीवारें चिनती हों
जहाँ मौत ज़िन्दगी से सस्ती हो
आदमी आदमी का दुश्मन हो
फिर क्यो न ऐसे देश मे यारो
अपनो का लहू बहाया जाए
खुद को स्वंय मिटाया जाए

जब मौत हर पासे ताण्डव करती हो
तो क्यों ना उसे गले लगाया जाए
इस बेबस लाचार कमजोर सभ्यता 
को मिटाया जाए
प्रलय का दीदार कराया जाए
कुछ इस तरह यारों 
आखिरी कर्ज़ चुकाया जाए
एक नये जहान, 
एक नयी सभ्यता 
एक नयी जमीन 
और इंसानियत की खातिर
 वर्तमान को ज़मींदोज़ किया जाये
भविष्य को नया सूरज दिया जाए






































































बुधवार, 10 अगस्त 2011

उधर तो चीन की दीवार खिंची है

ये मोहब्बत की
शिकस्त नही तो क्या है
तुम्हारी परछाइयाँ भी
साथ छोड रही हैं
और नगर मे
कोलाहल मचा है
कुछ सुनाई नही देता
क्या तुम तक
मेरी आवाज़ पहुंचती है
क्या तुम अब भी
मोहब्बत की राख मे
भीगते हो
अगर हाँ ……।
तो बताओ छूकर मुझे
क्या मेरा स्पर्श
महसूस कर रहे हो
और जो राख बची है मुझमे
क्या मिली उसमे कोई चिंगारी
नही बता सकते ……जानती हूँ
मोहब्बत कब स्पर्श की मोहताज़ रही है
शायद तभी बर्तन खडक रहे हैं
और शोर मच रहा है
मगर इकतरफ़ा…………
उधर तो चीन की दीवार खिंची है
अब दीवारों मे कान नही होते………।


रविवार, 7 अगस्त 2011

कुछ कश्तियाँ अकेले बहने को मजबूर होती हैं

जाने कैसे पहुँच गयी
महासागर मे बहते बहते
लहरों के तांडव पर
अपने वजूद को संभालने
की कशमकश में

वो कहते हैं
तुम दूर हो गयी हो
इंसानी वजूद से

तुम्हारे चारो तरफ़
फ़ैला सागर
तुम्हे समेट रहा है
अपने आगोश मे



और तुम अकेले
किनारे पर खडे
मुझे  और मेरी
ज़िन्दगी की हलचलों
को इस किनारे से उस किनारे तक
देख रहे हो
मगर क्या तुम्हे
मै वहाँ मिली?
दिखा मेरा वजूद
जो ना जाने कब का
सागर के अंतस्थल मे
विलीन हो गया है


तुम होकर भी नही हो
और मै ………
देखो ना मै बची ही नही
तुम्हारे बिना………
इस बहते सागर के
उठते ज्वार भाटों मे
कश्तियाँ डूब जाया करती हैं
अपना वजूद खो देती हैं
मगर कुछ कश्तियाँ
अकेले बहने को मजबूर होती हैं

कहीं देखा है तुमने

शापित कश्तियों का अकेलापन

बुधवार, 3 अगस्त 2011

कभी देखा है चिता को चीत्कार करते हुये?

ये कानखजूरों से रेंगते
सवालो के पत्थर
ये बेतरतीब से बिखरे
अशरारों के मंज़र
हादसों के गवाह
कब होते हैं
ये तो खुद हादसों की
वकालत करते हैं
सीने पर बिच्छू से
डंक मारते अलाव
उम्र भर जलने को
मजबूर होते हैं
चिता का धुआं
सुलगती आग को
हवा देता है
और हर ख्यालाती
मंज़र को होम
कर देता है
कभी देखा है
चिता को चीत्कार
करते हुये?