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बुधवार, 31 अगस्त 2011

बताओ कौन से सितारे में लपेटूँ बिखरे अस्तित्व को ?

यूँ तो रोज किसी ना किसी को
बिखरते देखा है मैंने
मगर कभी देखा है
खुद को बिखरते
टूटते किसी ने ?
आजकल रोज का नियम है
खुद को बिखरते देखना
देखना अभी कितनी जगह
और बाकी है
हवाओं के लिए
किन किन दरारों से
रिसने की बू आती है
इबादत की जगह बदल दी है मैंने
शायद तभी देवता भी
मंदिर में नहीं रहते
सबको एक ही काम सौंपा है
 खुदा ने शायद
हर मुमकिन कोशिश करना
कोई ना कोर कसर रखना
बहुत बुलंदियों को छू चुकी है ईमारत
अब इसे ढहना होगा
मिटटी में मिलना होगा
बिखराव भी तो एक प्रक्रिया है
निरंतर बहती प्रक्रिया
प्रकृति का एक अटल हिस्सा
फिर उससे मैं कैसे अछूती रहती
सृष्टि के नियम का
कैसे ना पालन करती
मगर पल पल बिखरना
और फिर जुड़ना और फिर बिखरना
इतना आसान होता है क्या
एक बार मिटना आसान होता है
मगर पल पल का बिखराव
दिमागी संतुलन खो देता है
अब कोई कैसे और कब तक
खुद को संभाले
दिल के टूटने को तो
जज़्ब कर भी ले कोई
मगर जब वार दिमाग पर होने लगे
अस्तित्व की सिलाइयां उधड़ने लगें
और डूबने को कोई सागर भी ना मिले
बताओ कौन से सितारे में लपेटूँ बिखरे अस्तित्व को ?



21 टिप्‍पणियां:

वर्ज्य नारी स्वर ने कहा…

बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने

पत्रकार-अख्तर खान "अकेला" ने कहा…

oh drdnaak khudaa kre kabhi kuchh na bikhre or jo bikhr gya hai simat kr aek khubsurat kamyaabi ke maala me bandh jaaye ....aamin .akhtar khan akela kota rajstan

कुश्वंश ने कहा…

एक चादर जिसमे अनुभूतियों के सितारे टंके हों खालिश खुशनुमा अनुभूतियों के वही समेत लीजिये सुकून मिलगे रूह को . भावपूर्ण काव्यांजलि बधाई

Dr Varsha Singh ने कहा…

यूँ तो रोज किसी ना किसी को
बिखरते देखा है मैंने
मगर कभी देखा है
खुद को बिखरते टूटते किसी ने ?

इस रचना का सूफ़ियाना रंग लाजवाब है। इस बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति के लिए बधाई।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

पर समेटना तो होगा ही।

smshindi By Sonu ने कहा…

उम्दा प्रस्तुती!

ईद मुबारक आप एवं आपके परिवार को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ.एक ब्लॉग सबका

ईद पर विशेष अनमोल वचन

Maheshwari kaneri ने कहा…

बहुत सुन्दर भाव पूर्ण अभिव्यक्ति...

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

खुद को बिकहरते टुटते देखने वाला तो कोई पहुंचा हुआ फ़कीर औलिया ही हो सकता है, बहुत गहन भाव.

रामराम.

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

ईद मुबारक आप एवं आपके परिवार को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ...सुन्दर भाव पूर्ण रचना ...

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

बहुत गहन अभिव्यक्ति...
सादर...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खुद के बिखराव को समेटने की कश्मकश दिख रही है इस रचना में ... गहन भाव लिए अच्छी रचना

Ankur jain ने कहा…

sunda rachna...

इमरान अंसारी ने कहा…

very nice.......keep it up.

Dr.Bhawna ने कहा…

Bahut khub !

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

गहन विचार .... बेहतरीन रचना ...

Mirchiya Manch ने कहा…

बहुत सुन्दर

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

bahut adbhut rachna. shubhkaamnaayen Vandana ji.

***Punam*** ने कहा…

एक बार मिटना आसान होता है
मगर पल पल का बिखराव
दिमागी संतुलन खो देता है...

और ऐसा ही असंतुलन
अपने इर्द-गिर्द भी देखा है मैंने..!
कभी किसी में !!

NISHA MAHARANA ने कहा…

बहुत अच्छी अभिव्यक्ति।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

टूटते हुवे सितारों में खुद का अस्तित्व समेटना मुश्किल होता है ... बिखर जाता है वो तारे के साथ ...

Suman Dubey ने कहा…

वन्दना जी नमस्कार सुन्दर भाव है विखराव की भी उत्तम व्याख्या।मेरे ब्लाग पर भी आपका स्वागत है।