अनुमति जरूरी है

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

बुधवार, 21 सितंबर 2011

कहीं ये मन की मौत का कोई संकेत तो नहीं ?

कहीं कोई हलचल नहीं
नीरव निस्तब्ध अंतर्मन
निर्जन वन सा मन आँगन
कोई शब्द संचयन नहीं
कोई नव सृजन नहीं
सब ओर सिर्फ एक 
मरघट की ख़ामोशी
कहीं कोई दूर 
सियार भी नहीं बोल रहा
जो वातावरण का 
सन्नाटा कुछ तो घटे 
कब्रिस्तान की ख़ामोशी 
चिताओं की जलन
और दूर दूर तक फैला 
भयावह घटाटोप अँधेरा
कोई आकृति नहीं
कोई आकार नहीं
सिर्फ एक उमस
जिसमे घिरा अंतर्मन
कहीं ये मन की मौत का कोई संकेत तो नहीं ?

38 टिप्‍पणियां:

arvind ने कहा…

gahare dird kaa isharaa deti kavita....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

जीवन एक मुसाफिरखाना
मौत नहीं मन की होती है।
मन है एक अनन्त मुसाफिर,
मौत मगर तन की होती है।

शारदा अरोरा ने कहा…

नहीं वंदना जी , मन इतनी आसानी से नहीं मरता , ये तो एक डिटैचमेंट होता है बाहरी जगत से अंतर्मन का ...कभी कभी इसी हालत में सब कुछ बड़ा साफ़ साफ़ पढ़ पाते हैं ..

सदा ने कहा…

गहन भावों का समावेश ...बेहतरीन ।

वर्ज्य नारी स्वर ने कहा…

वंदना जी... नि:शब्द कर दिया

संध्या शर्मा ने कहा…

बहुत दर्द है इन पंक्तियों में... लेकिन मन को मजबूत रखना भी जरुरी है इंसान के लिए कहते हैं न मन के हारे हार है मन के जीते जीत...

Suman Sinha ने कहा…

जब मैं फुर्सत में होता हूँ , पढ़ता हूँ और तहेदिल से इन भावनाओं का शुक्रगुज़ार होता हूँ ....

shikha varshney ने कहा…

हे...ये क्या हो गया है आपको...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

गहरी रात के बाद ही दिन का उजाला आता है।

Pallavi ने कहा…

शारदा जी की बात से सहमत हूँ, वंदना जी मन इतनी अससनी से नहीं मारता हाँ मगर कभी यह सन्नाटा ज़रूर महसूस हुआ करता है, जीवन में जैसे सब रुक सा गया हो...

Patali-The-Village ने कहा…

गहन भावों का समावेश| धन्यवाद|

NISHA MAHARANA ने कहा…

मन जब खुद से नाराज होता है
तभी निःशब्द परवाज होता है
ये उसकी मौत नही होती
गहरे अर्थ को समेटती रचना।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

अत्यंत गहन और नायाब रचना.

रामराम.

Maheshwari kaneri ने कहा…

गहन भावों का समावेश..मार्मिक..

Kailash C Sharma ने कहा…

रचना का सन्नाटा अंतस का मौन बन जाता है..निशब्द

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 22 -09 - 2011 को यहाँ भी है

...नयी पुरानी हलचल में ...हर किसी के लिए ही दुआ मैं करूँ

एस.एम.मासूम ने कहा…

बहुत ही गहरी बात कही है.

Rakesh Kumar ने कहा…

प्रवीण जी की यह बात अच्छी लगी.

गहरी रात के बाद ही दिन का उजाला आता है।


कृष्ण लीला के अनुपम भक्ति रस से
ऐसा अवसादपूर्ण वीभत्स रस ?

वंदना जी,आप मुझे भक्ति रस में सराबोर ही
बहुत अच्छी लगती हैं.

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

ji nahi ye man ki maut ka sanket bilkul nahi hai....ye to toofan aane se pahle ki shanti hai. bas intzar hai tufani dhardar shamsheer jaisi lekhni ke shabd pravaah ka.

rachana yadav ने कहा…

ek ghan udasi h...

rachana yadav ने कहा…

ek ghan udasi h...

rachana yadav ने कहा…

ek ghan udasi h...

रचना दीक्षित ने कहा…

जीवन में उजाला और अँधियारा तो आते जाते रहते है. इसी तरह मन पर नियंत्रण भी आवश्यक है. सुंदर भावप्रधान रचना के लिये बधाई.

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत ही निराशावादी होती जा रही हैं आप।
मन में शक्ति और संकल्प का संचयन कीजिए। कहीं पढ़ा था, आज कल आप आध्यात्मिक पोस्ट लिख रही हैं। फिर ये विकार क्यों?

परमजीत सिँह बाली ने कहा…

baDhiyaa!!

रंजना ने कहा…

दृश्य नयनाभिराम हो मन को बोझिल कर गए...

कुश्वंश ने कहा…

गहन भावों का समावेश ...बेहतरीन

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

बहुत सुन्दर हृदयस्पर्शी भावाभिव्यक्ति....

इमरान अंसारी ने कहा…

सुन्दर.........मन की मौत के बात ही आत्मा का जन्म होता है ...........बहुत ही सुन्दर..........वंदना जी आजकल कुछ नाराज़गी है क्या हमसे हमारे ब्लॉग पर भी आना नहीं होता?

रेखा ने कहा…

बहुत गहरी अभिव्यक्ति ..

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

सन्नाटे और खामोशी के मंजर खिंच गये.यही शब्दों का जादू है.

वृजेश सिंह ने कहा…

यह मन की मौत का संकेत तो नहीं

बस मन के थक जाने का संकेत है

मन को इन्तजार है कुछ ऐसे लम्हों का

जो उसकी जिन्दगी वापस कर दें....

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

गहन भाव....सुंदर रचना

वीरेन्द्र जैन ने कहा…

marmik rachna......

अरूण साथी ने कहा…

साधु-साधु

कुमार राधारमण ने कहा…

इस कविता में विरोधाभास है। अंतर्मन जब नीरव और शब्द-संचयन से मुक्त हो,तभी वह घटता है जिसके बारे में कबीर कहते हैं
"बिन बाजा झनकार करै कोई,समुझि पड़ै जब ध्यान धरै...रस गगन गुफा में अजर झरै"

यह तो अमरता की ओर प्रस्थान की स्थिति है। मौत कैसी?

mridula pradhan ने कहा…

bahut achcha likhi hain.......

निवेदिता ने कहा…

गहरे अर्थ को समेटती रचना .......