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शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

मेरे अपने कौन ?

मेरे अपने
कौन ?


पति 
बेटा 
या बेटियाँ 
कौन हैं 
मेरे अपने ?


ता-उम्र 
हर रिश्ते में
अपना 
अस्तित्व 
बाँटती रही 
ज़िन्दगी भर
छली जाती रही 
मगर उसमे ही
अपना सुख 
मानती रही 


पत्नी का फ़र्ज़ 
निभाती रही
मगर कभी
पति की
प्रिया ना 
बन सकी 
मगर उसके
जाने के बाद 
भी कभी
होंसला ना 
हारती रही


माँ के फ़र्ज़
से कभी 
मूँह ना मोड़ा
रात -दिन 
एक किया
जिस बेटे 

के लिए 
ज़माने से 
लड़ गयी 
वो भी 
एक दिन 
ठुकरा गया
उस पर 
सठियाने का 
इल्ज़ाम 
लगा गया 
उसकी 
गृहस्थी की
बाधक बनी 
तो भरे जहाँ में
अकेला छोड़ 
दूर चला गया 

पति ना रहे 
बेटा ना रहे
तो कम से कम
एक माँ का 
आखिरी सहारा 
उसकी बेटियां
तो हैं 
इसी आस में
जीने लगती है
ज़हर के घूँट 
पीने लगती है


मगर एक दिन 
बेटियाँ भी
दुत्कारने 
लगती हैं
ज़मीन- जायदाद 
के लालच में 
माँ को ही 
कांटा समझने
लगती हैं

रिश्तों की 
सींवन 
उधड़ने लगी
आत्म सम्मान 
की बलि
चढ़ने लगी
अपमान के 
घूँट पीने लगी
जिन्हें अपना 
समझती थी
वो ही गैर
लगने लगी
जिनके लिए
ज़िन्दगी लुटा दी
आज उन्ही को 
बोझ लगने लगी
उसकी मौत की 
दुआएँ होने लगी 
और वो इक पल में
हजारों मौत 
मरने लगी 


कलेजा फट 
ना गया होगा 
उसका जिसे
भरे बाज़ार 
लूटा हो 
अपना कहलाने 
वाले रिश्तों ने


वक्त और किस्मत 
की मारी 
अब कहाँ जाये
वो बूढी 
दुखियारी 
लाचार 
बेबस माँ
जिसका 
कलेजा बींधा 
गया हो 
दो मीठे 
बोलों को 
जो तरस 
गयी हो
व्यंग्य बाणों 
से छलनी 
की गयी हो 


हर सहारा 
जिसका 
जब टूट जाये
दर -दर की 
भिखारिन 
वो बन जाए
फिर
कहाँ और 
कैसे 
किसमे 
किसी 
अपने को 
ढूंढें ?

बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

"वर्जित फल"

नज़रों का स्पर्श भी
ना गंवारा हो जिसे
छूने या देखने 
की कोशिश
तो दूर की  बात है
हवा के स्पर्श की भी
जिसे चाहत ना हो
रौशनी का स्पर्श भी

जलाता  हो जिसे
रूह के मिलन को भी
जो अगले जन्म का मोहताज़ बना दे
इस जन्म की हर रस्म निभा दे
मगर अपने साये को भी जो
किसी साए का स्पर्श होने ना दे
एक अपना अलग
मुकाम जो बना ले
चाहने वालों को
मिलकर भी ना मिले
हर चाहत पर जो पहरे बिठा दे
किसी ने कहा है
मुझे
तुम ऐसा
"वर्जित फल" हो

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

माना..................

माना चाहत की डोर
बाँधी है तूने मुझसे 
मगर मैंने नहीं
माना तेरी चाहत
पूजती है मुझे
माना मेरे जिक्र से 
बढ़ जाती हैं धडकनें 
माना पवित्र है 
तेरी चाहत 
माना नहीं है वासना
का लेश इसमें 
माना मेरे ख्याल ही
तेरी धरोहर हैं
माना मेरे लिए ही
तू जिंदा है 
माना मैं ही 
तेरी ज़िन्दगी हूँ
माना तेरी हर साँस
मेरे नाम से चलती है
मगर फिर भी 
नहीं लगता अच्छा 
कोई मेरे वजूद को
अपने अहसासों 
में भी छुए
 

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

रूठ गया प्यार मेरा ..........

रूठ गया
प्यार मेरा 
उसे अपना
कहने का 

गुनाह जो 
कर बैठा 

अब कैसे 
मनाऊँ 
कौन सा 
दीप जलाऊँ 
कैसे उसे
समझाऊँ

सितारों कोई तो 
राह दिखलाओ
तुमने तो कितने
चाहने वालों को
मनाते देखा होगा

मैं तो आसमाँ से
तारे तोड़कर
ला नहीं सकता
दूध की नदियाँ
बहा नहीं सकता
याद में उसकी
ताजमहल 
बनवा नहीं सकता
फिर कैसे 
मनाऊँ
कौन सा 
दीप जलाऊँ

माना तुम 
मेरी नहीं हो
मगर प्यार पर
बस भी तो 
नहीं मेरा
ये इस 
दिल को
कैसे समझाऊँ

अब अपने रूठे
प्यार को 
कैसे मनाऊँ
कौन सा सुमन
भेंट करूँ जो
उसके ह्रदय की 
थाह मैं पाऊँ
कौन सी ऋतु 
का आह्वान करूँ 
कौन सा मैं
राग सुनाऊँ

सितारों तुम ही
कोई राह
रोशन कर दो
उसके ह्रदय की
आकाशगंगा में 
मेरे प्यार का
सितारा बुलंद 
कर दो
उसे अपना चाहे
कह ना सकूँ 
मगर मैं उसका
बन जाऊँ
आज कोई ऐसा
जतन कर दो

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

दो रोटियों के बीच

आज रोटी बनाते -बनाते
तुम्हारे  ख्याल ने
आकर पुकारा
और हाथ बेलन
पर ही रुक गया
और ख्याल मुझसे
आकर उलझ गया
मुझे अपने साथ
उडा ले चला
जहाँ तुम्हारा साथ था
हाथ में हाथ था
सपनो का महल था
बगीचे में झूला पड़ा था
मैं झूल रही थी
तुम झुला रहे थे
हवा के संग
मीठी - मीठी
सरगोशियाँ किये
जा रहे थे
आँखें मेरी बंद थी
और दिल में एक
उमंग थी
प्रेम का चटक रंग
होशो- हवास भुला
रहा था
कहीं कोई भंवरा
किसी कली पर
मंडरा रहा था
जिसे देख दिल
धड़क - धड़क
जा रहा था
ये कैसा
मदहोश करता
पल था
प्रेम के आँगन में
मन मयूर
नृत्य किये

जा रहा था
और तेरी
रूह के आगोश में
सिमटे जा रहा था
तभी ना जाने
कैसे एक झोंका
हवा का आया
और तवे पर जलती
रोटी ने हकीकत का
आभास कराया
अब कभी चकले पर
अधबिली रोटी को
देख रही थी मैं
तो कभी
तवे पर जली रोटी
मुझे देख
हँस रही थी
"पागलों की सरदार" की
उपाधि दे रही थी
हाय ! दो रोटियों के बीच
आये उस ख्वाब को
अब मैं कोस रही थी
और हालत पर अपनी
मैं खीज रही थी

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

आज नहीं बनाये जाते मोहब्बत के मकबरे.............

इश्क हुआ होगा कभी 
राँझा को हीर से 
मजनू को लैला से
फरहाद को शीरीं से 
जिन्होंने इश्क को 
इबादत बनाया 
खुदा से भी पहले 
जुबान पर
महबूब का नाम आया
खुदा और इश्क में जहाँ
ना फर्क नज़र आया 
क्या कर सकेगा इबादत
तू भी महबूब की
बना सकेगा खुदा
अपनी मोहब्बत का
हो सकेगा कुर्बान
मोहब्बत की खातिर
दे सकेगा मोहब्बत के 
खुदाई जुनून का इम्तिहान
रे पगले ! ये किस्से 
कहानियों की बात और है
इश्क के इम्तिहान की
बात और है
आज नहीं बनाये जाते 
मोहब्बत के मकबरे.............

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

कुछ तो निशाँ पड़े होंगे .......................

तुम्हारे घर की 
चौखट पर 
आस का दीप 
जलाये पड़ा 
मेरा मन
और रसोई में 
खनकती 
चूड़ियों की खनक 
घर के आँगन में
छम- छम करती 
पायल की छनक
और बैठक में
गूंजती खिलखिलाहट 
कभी चीखती
चिल्लाती , हँसती 
मुस्कुराती
कभी ख़ामोशी 
की आवाज़
और बिस्तर के
एक छोर पर
प्यार , मनुहार
और दूसरे छोर पर
सिसकते , तड़पते 
पलों का हिसाब
ये तो कण -कण में
बिखरे अहसास 
और इन सबसे अलग
तुम्हारे तसव्वुर में
तुम्हारे ख्यालों में
तुम्हारे मन में 
बसी वो 
जीती -जागती 
प्रतिमा
जिसकी रौशनी 
से रोशन
तुम्हारे दिल का
हर कोना
कैसे इतने सारे
भीगे  मौसमों 
में से अपना
मौसम ढूँढ 
पाओगे
कैसे समेटोगे
उन यादों को
जो तुम्हारे
वजूद का 
जीता -जागता 
हिस्सा  हैं 
कैसे मेरी 
यादों के 
बिखरे सामान
को समेट 
पाओगे
देखो तुम्हारा 
घर मैंने कैसे
अपनी यादों से 
भर दिया है 
हर कोने में
मेरा ही अक्स
चस्पां है
तन के बँधन
भले ही टूट जायें
मन के बन्धनों 
से कैसे खुद को
आज़ाद कर पाओगे
आखिर इक 
उम्र गुजारी है
हमने साथ साथ
कुछ तो निशाँ पड़े होंगे .......................

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

"शब्द " और " काव्य "

काव्य शब्द है 
या शब्द काव्य
या फिर भावों का
समन्वय 

शब्द को 
सौंदर्य प्रदान 
कर काव्य 
बनता है
या फिर 
काव्य शब्द में 
सिमटा एक 
निर्विकार 
निर्लेप
अनंत 
आकाश है
जहाँ 
शब्द ही शब्द है
निराकार में 
आकार है
या फिर
आकारबद्ध हो 
शब्द 
काव्य सौष्ठव 
बन अपने अनेक 
अर्थ प्रस्तुत 
करता है

एक में छिपे अनेक
भावों का समन्वय है
शब्द
या काव्य की उच्च
अवस्था को 
प्राप्त करता 
गरिमाबोध 
करता है शब्द
या शब्द सिर्फ 
सामाजिक सरोकारों 
का प्रतीक है
या नितांत 
व्यक्तिगत
अभिव्यक्ति का
माध्यम 
या शब्द काव्य की
गुणवत्ता का 
श्रेष्ठ परिचायक है

काव्य को 
खुद में समेटता
शब्द 
भावो के 
प्रस्तुतीकरण का
माध्यम मात्र है
या फिर 
प्रणव - सा 
निनाद करता
दिशाओं को
गुंजार करता 
शब्द 
स्वयं में 
समाहित करता
काव्यात्मकता का
लयबद्ध संगीत है 



शनिवार, 25 सितंबर 2010

तुम मुझे जानते हो ?

मुझे पढने के
बाद भी
मैं समझ 
आने वाली नही 
इसलिए कभी
मत सोचना
कि तुम मुझे जानते हो ?

कुछ दायरे 
सोच से भी 
उपर होते हैं
बहुत दूर हूँ 
तुम्हारी सोच से
तुम्हारी सोच 
सिर्फ मेरे 
अस्तित्व तक ही 
पहुंचेगी 
मगर मेरी
सोच तक नहीं
मेरे ख्यालों तक नहीं
मेरे सीने में उठते 
ज्वार भाटों तक नहीं
उन कसमसाते 
सवालों तक नहीं
उन ख्वाब में बुनी
चादरों तक नहीं
उन दिल  के खामोश
सूने तहखानो तक 
कभी नहीं पहुँच पायेगी 
तुम्हारी सोच
फिर कैसे कह सकते हो 
तुम मुझे जानते हो ?

कुछ शख्सियत
कुछ किताबें
उसके कुछ अक्षर
गूढार्थ समेटे होते हैं
कहीं गूढार्थ
तो कहीं भावार्थ
हर अहसास
हर भाव
हर ख्वाब
का  अर्थ 
ना ढूँढ पाओगे
बाज़ार में
भावों की 
कोई डिक्शनरी
नही मिलती 
फिर कैसे कह सकते हो
तुम मुझे जानते हो ?

हर अनकहे 
शब्द का अर्थ
हर जज़्बात का
भीगा  टुकड़ा
हर याद की 
अनकही चाहत
हर मौसम की
सर्द हवाओं और 
लू के गर्म 
थपेड़ों में 
चकनाचूर हुए कुछ
बोझिल ख्यालात
कैसे इन सबसे 
पार पाओगे
कहाँ तक इनके
अर्थ ढूँढ पाओगे
शायद सागर से तो
मोती ढूँढ भी लाओ
मगर मुझमे छुपी "मैं"
कहाँ ढूँढ पाओगे
कुछ ना जान पाओगे
सिर्फ उपरी आडम्बर है
यहाँ कोई किसी को
पहचान नहीं पाता
एक ज़िन्दगी साथ 
गुजारने के बाद भी
फिर जानना तो 
मुमकिन ही नहीं
इसलिए 
अब फिर कभी ना कहना
तुम मुझे जानते हो ?

बुधवार, 22 सितंबर 2010

कोपभाजन से कोखभाजन तक .................

तुम्हारे 
कोपभाजन से कोखभाजन तक 
सिसकती मर्यादाआहत हो जाती है 
जब बर्बरता की चरम सीमा को लाँघ जाते हैं
अपने ही लहू के दुश्मन
अपना ही लहू बहाते  हैं 
फिर भी मुख पर न मलाल लाते हैं 
तब सड़ांध भरे घुटते कमरों में
सिसकती ममता आहत हो जाती है 

मुखौटे पर लगे मुखौटे 
भयावहता का दर्शन करा जाते हैं 
वो मर्यादा की हर सीमा को लाँघ कर भी इंसान कहाते हैं

शनिवार, 18 सितंबर 2010

पुरुष तुम अब भी कहाँ बदले हो?

पुरुष
तुम अब भी
कहाँ बदले हो?
अपने व्यंग्य बाणों
से कलेजा
बींध देते हो
उम्र के किसी 
भी दौर में
तुम में ना 
परिवर्तन आया 
तुम्हारी कुंठित सोच
अवचेतन में बैठे
पौरुष के दंभ से
कभी ना बाहर 
आ पायी  है 
हर बार ज़हर 
बुझे नश्तर ही
चुभाते आये हो
अपने प्रगति पथ पर
नारी के त्याग ,
समर्पण ,सहयोग 
को हमेशा
नकारते आये हो 
उसके वजूद को
खिलौना समझ
खेलना ही तुमको
आता है
कहाँ नारी ह्रदय को
जीतना तुमको आता है
कल भी नारी को
दुत्कारा था
उसे त्याग, तपस्या 
की मूरत बना
बलि वेदी पर
चढ़ाया था
आज भी नारी को 
शोषित करते हो
कभी उसका 
सौंदर्य भुनाते हो
कभी मानसिक
शोषण करते हो
प्रगति के नाम पर
हर बार 
भावनाओं का 
बलात्कार करते हो
कल भी तुम 
नहीं बदलोगे
अपनी कुंठित 
सोच से ना 
उबरोगे
चाहे अन्तरिक्ष
भ्रमण कर आओ
चाहे प्रगति के
कितने सोपान 
तुम चढ़ जाओ
पर अपनी पुरुषवादी
प्रवृत्ति से ना
मुक्त हो पाओगे
जब तक 
अपने अंतस में
बैठे झूठे दंभ से
बाहर ना आओगे

बुधवार, 15 सितंबर 2010

दुनिया की अदालत में खड़े भगवान ?

कल कन्हैया 
सपने में आया 
उदास , हताश
बड़ा व्यथित था 
दुनिया के
आरोपों से
प्रश्न उठाया 
क्यूँ दुनिया 
जीने नहीं देती है 
किसी भी युग में 
हर युग में 
आरोप लगाया 
और जनता की 
अदालत में 
मुझे ही दोषी 
ठहराया

जब राम 
बनकर आया 
मर्यादा में रहा 
मगर वो भी ना
किसी को भाया 
नारी का 
सम्मान किया 
उसे यथोचित 
स्थान दिया 
एक पत्नी व्रत लिया
ता- उम्र उस 
व्रत को निभाया
मगर फिर भी
खुद को ही
कटघरे में 
खड़ा पाया
क्यूँ सीता को
बनवास दिया?
क्यूँ उस पर 
अविश्वास किया?
क्यूँ उसकी 
अग्निपरीक्षा ली?
ताने मारा 
करती है 
दुनिया
मगर इतना ना 
समझ पाती है
मर्यादा में रहकर
राजा का कर्त्तव्य 
भी निभाना था
प्रीत को एक बार
फिर सूली पर 
चढ़ाना था 
मेरा तो विशवास
अटल था
मगर दुनिया के
आरोपों से 
सीता को मुक्त 
करना था
और दुनिया में 
रहकर 
दुनिया का धर्म 
भी निभाना था
इसीलिए 
उस दर्द  से
मुझे भी तो 
गुजरना था 
वो बनवास 
महलों में रहकर
मुझे भी तो
भोगना था 


जब कृष्ण बन 
कर आया
तब भी 
खुद को
दुनिया की 
अदालत
में दोषी ही पाया
क्यूँ राधा के प्रेम
को ना स्वीकारा ?
उसे पत्नी का दर्जा
क्यूँ ना दिया?
क्यूँ उससे 
विश्वासघात किया?
क्यूँ उसके प्रेम 
को ना स्वीकार किया?
मगर मेरा दर्द
ना किसी ने जाना
संसार का दिया
वाक्य मुझे भी
निभाना था 
"कर्त्तव्य हर 
भावना से 
बड़ा होता है "
इसी को ज़िन्दगी 
भर निभाता रहा
प्रीत का दीया 
अश्रुओं से 
जलाता रहा
मगर कभी भी 
कोई भी भाव 
ना मुख पर 
लाता रहा 
निर्मोही, निर्लिप्त 
भाव से हर 
कार्य निभाता रहा
गर राधा को 
पत्नी बना
लिया होता तो
ये ज़माना उसे भी
धरती में समा 
जाने को विवश 
कर देता 
या फिर कोई 
एक नया 
इलज़ाम उस पर
भी लगा देता
और फिर एक बार
दो प्रेमी
विरह अगन में
जल रहे होते
मिल कर भी
ना मिले होते


तब भी तो दुनिया 
ने ही विवश किया था
वो निर्णय लेने के लिए
एक आदर्श राजा के 
फ़र्ज़ की खातिर
पति हार गया था
और ये दुनिया 
जीत गयी थी
इसीलिए प्रण 
किया था मैंने
अगले जन्म 
अपने प्रेम को 
दुनिया के हाथ 
की कठपुतली 
ना बनने दूँगा
वचन लिया था
सीता ने मुझसे   
ना यूँ अगले जन्म
रुसवा करना
चाहे पत्नी का
दर्जा ना देना
मगर हमारे 
प्रेम को
अमर कर देना
जो इस जन्म
अधूरा छूट गया
उसे अगले जन्म
पूरा कर देना
नहीं चाहिए 
संग ऐसा जो
दुनिया दीवार बने
वो ही वादा 
मैंने निभाया
मगर वो भी 
दुनिया को 
ना रास आया
ना पत्नी को 
किसी ने जाना
ना ही प्रेम को
पहचाना


राधा संग 
अपने प्रेम को
दिव्यता की
ऊँचाइयों तक
पहुँचाया 
खुद से पहले
राधा को पुजवाया 
संसार को 
प्रेम करना सिखाया
मैंने और राधा ने
तो प्रेम की पूर्णता
पा ली थी
दूर होकर भी
कभी दूर ना हुए थे
ह्रदय तो हमारे
इक दूजे में ही
समाये थे
दिखने में ही
दो स्वरुप थे
असल में तो
एकत्त्व में 
विलीन थे 


फिर कहो कैसे
राधा को 
धोखा दिया मैंने
उसी को दिया
वचन अगले 
जन्म में 
निभाया मैंने
मगर तब भी
दुनिया की कसौटी 
पर खरा ना 
उतर पाया मैं
अब बताओ
कैसे खुद को
निर्दोष साबित करूँ
अपनी ही बनाई
दुनिया के 
इल्जामों से
कहो कैसे
खुद को 
मुक्त करूँ 
दुनिया ना 
खुद जीती है
चैन से  
ना मुझे
जीने देती है
आखिर क्या 
चाहती है 
दुनिया मुझसे ?




राधा अष्टमी पर राधा जी को समर्पित श्रद्धा सुमन .



सोमवार, 13 सितंबर 2010

पीड़ा का मर्म

कभी
मर्यादा का हनन 
किया होता
दोस्त बन कर 
दिल का दर्द 
पी लिया होता
तो कुछ लम्हों
के लिए ही सही 
मुझे मुझसे
छीन लिया होता
रूह पर गिरते 
अश्कों पर 
लब अपने 
रख दिए होते
अश्को का
ज़हर सारा 
पी लिया होता
तो मेरी रूह को
कुछ देर ही सही
तू जी लिया होता
रूह में जलते
सुर्ख अंगारों की 
तपिश पर 
हाथ रखा होता
दिल के हर 
अंगार पर अपना
नाम लिखा होता
कुछ अश्रु बूँद
टपकायीं होती
तो दिल जलने 
की आवाज़ 
तुझ तक भी
आई होती
मेरे दर्द की
कोई सीमा नहीं
अंतहीन दर्द के 
सफ़र में 
हमसफ़र 
बना होता
इस सीमा का
अतिक्रमण
किया होता
इस रेखा को लाँघ
अन्दर आया होता
तो मेरी पीड़ा का
मर्म जान पाया होता


शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

"सूरज है वो "

सूरज है वो 
सबसे ज्यादा 
चमकना चाहा
सबके जीवन 
प्राण बनना चाहा
सबसे ऊपर 
उठना चाहा
जो चाहा 
सब मिला
दूसरों  को 
ज़िन्दगी देना
आसान कब होता है 
किसी को 
जीवन देने के लिए 
खुद की आहुति
दी जाती है
हर अभिलाषा को
होम किया जाता है
ताउम्र इक आग में
जलना होता है
तब किसी जीवन में
रौशनी की जाती है
शायद नहीं 
जानता था
इसीलिए
जीवन भर 
जलते रहने का
अभिशाप लिया 
सोचा तो 
इसे वरदान था
मगर बन 
अभिशाप  गया
शायद अब 
जाना होगा
सूरज 
होने का अर्थ 
किसने जहाँ में 
तपन को 
अपनाया है
कौन किसी की 
तपिश में
कब साथ दे पाया है
ये सफ़र तो 
स्वयं के साथ 
ही तय हो पाया है
कोई साथी 
नहीं बनता 
जलने वालों का
जीवन भर
तनहा सफ़र 
तय करते रहना
और जलते रहना
जलने की पीड़ा को
स्वयं में ही
समाहित करना
और फिर भी
 उफ़ ना करना 
अपनी चिता 
स्वयं जलाकर
सबकी ज़िन्दगी 
रोशन करना
शायद इसीलिए
"सूरज है वो "

बुधवार, 8 सितंबर 2010

प्राची के पार.......................

मोहब्बत की थी 
हम दोनों ने
इश्क की सीढियां
चढ़ी थीं 
हम दोनों ने
ज़माने से लड़ा था
दोनों के लिए 


याद है तुम्हें 
प्राची के पार 
मिलने का 
वादा किया था
डूबता सूरज
गवाह बना था
तेरी ज़ुल्फ़ से
अठखेलियाँ करती 
पवन अपने 
पंखों पर 
हमारे प्रेम का
संदेस ले उड़
चली थी
सारा चमन
महका रही थी
और हम दोनों
मिलेंगे कभी 
इसी चाह में
इसी विश्वास पर
इसी आस पर
जिए जा रहे थे 
मोहब्बत के 
ख्वाब बुने 
जा रहे थे 



ना जाने कहाँ से
वो बवंडर आया 
ख्वाब के महल 
को ढहा गया 
ज़माने को ना
इश्क रास आया
तुम्हें मजबूर
किया गया
रिश्तों की 
बेड़ियों में
जकड़ा गया
इज्ज़त के नाम 
पर ठगा गया
लड़की होने की
मजबूरी  पर
कुर्बान किया गया


और फिर उस दिन
जब तुम दुल्हन 
बनीं किसी और की
मुझसे मेरी खुशबू ,
मेरी सांसें ,
मेरी जिंदा
रहने की
हर वजह छीन 
ली गयी
जब तुम्हें देखा
आखिरी बार
दुल्हन के 
लिबास में
विदाई के वक़्त
अंग सब 
शिथिल हो गए
आँसू आँख में
जज़्ब हो गए 
धडकनों ने जैसे
धडकना छोड़ 
दिया था
दिमाग 
चेतनाशून्य
हो गया था
दिल तो तेरे
हवन कुंद की
आग में पहले ही
भस्म हो गया था
और रूह 
तेरे क़दमों तले
कुचली गयी थी
जिस पर
पाँव रख 
तू डोली  में
चढ़ी थी
हर अंग 
स्पन्दनहीन था
बस रूह का 
ज़िंदा पिंजर
खड़ा था
तेरे एक 
वादे की
सलीब पर
टंगा मेरा
वादा खड़ा था
कि
प्राची के पार
मिलन होगा 
हमारा
मगर तूने
बता दिया
प्राची के पार
जहाँ और भी है
जहाँ और भी है.................

सोमवार, 6 सितंबर 2010

चाहे हस्ती ही मेरी मिट जाये

कोई ऐसी शय खोजो यारों
दिल को मेरे सुकूँ आ जाये


धडकनों को गज़ल बनाओ यारों
शायद गुलाब कोई खिल जाये


उनके  चौबारे को ऐसे सजा दो यारों
शायद्  फिर कोई शहीद हो जाये


उसके लबों पर मुस्कुराहट सजा दो यारों

चाहे लहू मेरा बह जाये

दर्द के बिस्तर पर सुला दो मुझको
बस एक बार वो हँस जाये


कोई अहले -करम फ़रमाओ यारों
वो जी जाये और मैं  मर जाऊँ


कुछ उसके भरम तोड दो यारों
चाहे मै शहर--ए-बदर हो जाऊँ


कुछ तो उसको सुकून मिलेगा यारों
चाहे हस्ती ही मेरी  मिट जाये

 

रविवार, 5 सितंबर 2010

शिक्षा का स्तर ---------कल और आज ?

आज के वक्त में शिक्षा ने अपना एक अलग मुकाम बना लिया है .अब हर बच्चे के लिए शिक्षा का क्या महत्त्व है ये ज्यादातर सभी को  पता है मगर कभी वो भी वक्त था कि सिर्फ लड़कों को ही शिक्षा के योग्य समझा जाता था और लड़कियों की दुनिया सिर्फ घर में काम काज तक सीमित थी .मगर जैसे- जैसे शिक्षा का प्रसार होता गया शिक्षा का महत्त्व समझ आता गया और लड़कियों को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जाने लगा .


    आज लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों के कंधे से कन्धा मिलाकर चलती हैं और घर के कामकाज भी उतनी ही चुस्ती से करती हैं .शिक्षा ने देश और समाज को एक नयी दिशा दी है मगर फिर भी कल और आज के शिक्षा के स्तर में काफी फर्क आ चुका है.


कल शिक्षा बेशक सबके लिए अनिवार्य  नहीं थी मगर तब भी जो लगन होती थी वो अद्भुत होती थी . देश के लिए, समाज के लिए और घर परिवार के लिए कुछ करने का जज्बा होता था मगर आज शिक्षा सिर्फ पैसे कमाने का साधन बन कर  रह गयीं है .शिक्षा का स्तर दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा है. कोई मूल्य , कोई सिद्धांत नहीं रहे ...........बस पैसे के आगे कोई रिश्ता -नाता नहीं , सब छोटे हो गए हैं, बेमानी हो गए हैं ........................ये आज की शिक्षा की देन है .बेशक बड़ी बड़ी डिग्रियां मिल जाती हैं खूब नाम ,दौलत और शोहरत मिल जाती है मगर संस्कार नाम की दौलत से वंचित  रह जाता है आज का समाज. छात्र जव तक हाई स्कूल में होता है! माता पिता का आज्ञाकारी होता है . इंटर  में आने पर माता पिता की अवहेलना करता है! ग्रेज्यूएशन कर लेने के बाद स्वच्छंद हो जाता है और उसके बाद माता पिता को दुत्कारता और गालियां  देता है!
यही तो आजकल की शिक्षा का असर है.
बेशक आज अन्तरिक्ष ज्ञान प्राप्त कर लिया है मगर फिर भी कल की तुलना में कहीं ना कहीं कमजोर ही है आज का शिक्षा का स्तर.

क्या कहें अब ...............कल ज्यादा बढ़िया था कि आज ..............सबका अपना -अपना दृष्टिकोण होता है मगर अगर देखा जाए तो कल शिक्षा सिर्फ कमाई का साधन नहीं थी व्यावहारिक ज्ञान के साथ व्याकरणीय  ज्ञान भी उत्तम था मगर आज ना तो व्यावहारिक ज्ञान है और ना ही व्याकरणीय ज्ञान...............ऐसे में आज की पीढ़ी से क्या उम्मीद की जा सकती है ............सिर्फ कुछ शब्द अंग्रेजी के बोल लेने से कोई शिक्षा का स्तर उच्च नहीं हो जाता ............आज किसी साक्षात्कार में जाने से पहले हर बच्चे को व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा लेने के लिए कोचिंग   में जाना पड़ता है जबकि पहले ये सब शिक्षा के साथ - साथ व्यवहार में भी शामिल था..........बेशक आज भी व्यावहारिक ज्ञान जरूरी है मगर उसकी उपयोगिता सिर्फ साक्षात्कार तक ही सीमित हो कर रह गयीं है ..........एक बार जॉब मिल जाये उसके बाद सब भुला दिया जाता है या कहो रद्दी की टोकरी में डाल दिया जाता है.

आज सिर्फ एक ही ज्ञान दिया जाता है कि पैसे कमाकर , दूसरे की टांग खींचकर कैसे आगे बढ़ा जा सकता है जबकि कल नम्रता , सहनशीलता और संतोष का ज्ञान भी बांटा जाता था .

आज शिक्षा अपना  मूल स्वरुप खो चुकी है सिर्फ कमाई का साधन बन चुकी है .ऐसे में जो पौध निकलेगी वो भी तो वैसी ही निकलेगी जैसा बीज रोपित किया गया होगा.

कल की तुलना कभी भी आज से नहीं की जा सकती............कल हमारी धरोहर है मगर आज भविष्य ...............और आज यही भविष्य अंधकार की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है.हमें आज को सुरक्षित करना होगा तभी भविष्य की इमारत सुदृढ़ बन सकेगी और इसके लिए पहल हमारे शिक्षकों को ही करनी पड़ेगी क्योंकि नींव तो वो ही रखते हैं .नींव पक्की होगी तो इमारत आने आप सुदृढ़ और खूबसूरत बनेगी.

बुधवार, 1 सितंबर 2010

प्रेम का अंजन

प्रेम का अंजन
लगाओ 
सखी री 
मेरी आँखों में 
प्रेम का अंजन
लगाओ सखी री 
मुझे उनकी 
पुजारिन 
बनाओ सखी री
ये प्रेम की 
तिरछी डगर 
है सखी री
इस पर 
चलना सिखाओ 
सखी री
कभी तो 
मोहन को
बुलाओ सखी री
उनकी चाहत की 
पैंजनिया 
पहनाओ सखी री
विरह  में उनके 
नचाओ सखी री
श्याम को कहीं 
से ढूँढ लाओ
सखी री
मुरलिया की 
धुन सुनवाओ 
सखी री
मुझे श्याम की
मुरली बनाओ
सखी री
उनके अधरों
से मुझको 
लगाओ सखी री
कैसे भी अब तो
मुझे श्याम की
प्रिया बनाओ
सखी री
मोहे 
प्रेम का अंजन
लगाओ सखी री ............
 

शनिवार, 28 अगस्त 2010

हम तो डूबे हुए अशआर हैं

हम तो डूबे हुए अशआर हैं 
दर्द बिन ग़ज़ल बन नहीं सकते 

बहर मात्राओं की जुगलबंदी बिन
मुकम्मल शेर बन नहीं सकते

अब कौन पड़े जुल्फों के पेंचोखम में सनम
गिर- गिर के दरिया में अब संभल नहीं सकते

उजालों का सदा ही तलबगार रहा ज़माना
हम तो अंधेरों के सायों से भी अब लड़ नहीं सकते

ये मय्यतों पर झूठे आँसू बहाने वाले
कभी ज़िन्दगी  के तलबगार बन नही सकते

दुआ दें या बददुआ उसके दरबार के कानून
किसी के लिए कभी बदल नहीं सकते

मुमकिन है बदल जाए ईमान शैतान का
इंसान में छुपे शैतान को कभी बदल नहीं सकते

शनिवार, 21 अगस्त 2010

एक सफ़र ऐसा भी………………………

भार्या से 
प्रेयसी बनने की 
संपूर्ण चेष्टाओं
को धूल- धूसरित 
करती तुम्हारी
हर चेष्टा जैसे
आंदोलित कर देती
मन को और 
फिर एक बार 
नए जोश से 
मन फिर ढूँढता
नए -नए आयाम
प्रेयसी के भेदों
को टटोलता
खोजता
हर बार 
एक नाकाम -सी
कोशिश करता
और फिर धूमिल 
पड़ जाती आशाओं 
में , अपने नेह 
का सावन भरता
मगर कभी 
ना समझ पाता
एक छोटा सा सच
प्रेयसी को भार्या
बनाया जा सकता है
मगर
भार्या कभी प्रेयसी
नहीं बनाई जाती
उस पर तो
अधिकारों का बोझ
लादा जाता है
मनुहारों से नहीं
उपजाई जाती
इक अपनी 
जायदाद सम
प्रयोग में 
लाया जाता है
माणिकों सी 
सहेजी नहीं जाती
हकीकत के धरातल
पर बैठाई जताई है
ख्वाबों में नहीं
सजाई  जाती
 संस्कारों की वेणी
गुँथवाई जाती है
उसकी वेणी में पुष्प
नहीं सजाये जाते
अरमानो की तपती 
आग मे झुलसायी
जाती है
सपनो के हार नहीं
पहनाये जाते
शब्दों के व्यंग्य 
बाणों से बींधी जाती है
ग़ज़लों की चाशनी में
नहीं डुबाई जाती 
आस्था की बलि वेदी पर
मिटाई जाती है
मगर प्रेम की मूरत बना
पूजी नहीं जाती
बस इतना सा फर्क 
ना समझ पाता है
ये मन
क्यूँ भाग- भाग
जाता है
और इतना ना
समझ पाता है
प्रेयसी बनने की आग में
जलती भार्या का सफ़र
सिर्फ भार्या पर ही सिमट 
जाता है 
सिर्फ भार्या पर ही.................

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

ब्लॉग गुरु की पाठशाला ...............

आइये साथियों ब्लॉग गुरु की पाठशाला में और हर समस्या का समाधान पाइए ................हा हा हा 
ब्लॉगिंग गुरु ने स्कूल खोला
विज्ञापन लगाया ---------
ब्लॉगिंग के गुर सीखिए ------
फायदा ना होने पर 
बेनामी के रूप में 
सबको धमका दीजिये 

विज्ञापन देख दुनिया का मारा
एक चँगुल में फँस गया
और गुरु के दरबार में 
पहुँच गया
बोला -----गुरु जी 
मेरी कोई सुनता नहीं 
घर में पत्नी और बच्चो 
की ही राजनीति गरमाई है 
वहाँ मेरी अक्ल  चकराई है
ऑफिस में बॉस की फटकार 
खाई है पर बात की 
वहाँ भी नहीं सुनवाई है 
यार दोस्त अपनी- अपनी सुनाते  हैं
और मेरी बारी आते ही 
अपने घर चले जाते हैं 
कोई ऐसा चमत्कार कीजिये 
मेरा भी उद्धार हो जाये 
और जो अन्दर ही अन्दर 
उबल रहा है उसके बाहर 
आने का उपाय कीजिये 

गुरु बोले ------बेटा 
क्यूँ घबराता है
बिलकुल सही जगह तू आया है
आजकल जिसकी कोई नहीं सुनता
उसके लिए ही ये मंच बनाया है
हम तुझे ब्लॉगिंग के 
ऐसे -ऐसे गुर सिखायेंगे
कि बड़े- बड़े सूरमा 
मैदान छोड़कर भाग जायेंगे 
सबसे पहले तू 
किसी नामी- गिरामी संगठन का
सदस्य बन जाना 
और फिर बिना बात किसी 
से भी भिड जाना
आपत्तिजनक टिप्पणियां करना
बस फिर देखना 
पूरा संगठन तेरे समर्थन में
उतर आएगा और ब्लॉगजगत में
तुझे ख्याति दिला जायेगा 
बस पहली बाधा पार की जिसने
वो तो सिकंदर बन ही जाता है
फिर तू जो भी कहना चाहे
कह देना , अपनी हर भड़ास
निकाल लेना 
कोई न तुझसे पंगा लेगा
और ब्लॉगजगत में 
नाम तेरा रोशन होगा
महशूर होने का सबसे 
सुगम तरीका है 

अब बस इतना काम 
और कर लेना 
ब्लॉगजगत के अपने 
संगठन के हर सदस्य के
ब्लॉग पर उनकी पोस्ट के
कसीदे पढ़ देना 
चाहे लिखा उसमें 
कुछ भी काम का ना हो
मगर टिपण्णी ऐसी कर देना
जैसे उसकी भाषा को 
समझने का हुनर
सिर्फ खुदा ने तुम्हें 
ही बख्शा है 
फिर देखना कैसे 
ब्लॉगजगत तुम्हें 
आँखों पर बिठाता है
और अच्छी -अच्छी पोस्टों के
कैसे तोते उडाता है
और तुम्हारी पोस्ट को 
कैसे सबसे ऊपर पहुँचाता है
अगर फिर भी किसी कारणवश
कभी टिप्पणियां कम आने लगें
कोई और धुरंधर
अपना सिक्का ज़माने लगे
बस तू इतना कर देना
ब्लॉगजगत को छोड़ने की
धमकी दे देना 
फिर देखना सारा 
ब्लॉगजगत तुझे 
मनाने आ जायेगा 
और एक बार फिर 
तेरा सिक्का जम जायेगा

अब अच्छी पोस्टों का 
दीवाला निकालने का गुर 
सिखलाता हूँ
चाहे तुझे लिखना भी आता हो
कविता के भाव भी जानता हो
लेख की भाषा का भी ज्ञान हो
मगर तब भी इतना करते रहना
सिर्फ अपने संगठन के 
सदस्यों को छोड़कर
बाकी ब्लोगरों की पोस्टों पर
सिर्फ "अच्छी है" , "उम्दा भाव हैं " 
"गहरी बात कही" , "सुन्दर लेखन"
ऐसी छोटी -छोटी टिप्पणियाँ 
ही करना ताकी 
लिखने वाला भी समझ जाये
उसका होंसला भी 
पस्त हो जाये
और वो घबराकर
मैदान छोड़कर भाग जाये
बस इतना सब तू करते रहना
तब देखना एक दिन
ब्लॉगिंग में नाम तेरा भी
चमक जायेगा और 
अख़बारों के पन्नों पर
"बिग बी "की तरह 
तू भी छा जायेगा

बेटा आज के लिए 
बस इतना काफी है
तब तक तुम इसका अभ्यास करना

वरना पढने वालों के तोते उड़ जायेंगे
ज्यादा बड़े पाठ से घबराएंगे
इनको और पोस्टों पर भी जाना है
इतना ध्यान भी रखना होगा
फिर भी  कोई समस्या आये 
तो ब्लोगगुरु के पास आ जाना
                                   हर समाधान पा और जाना

सोमवार, 16 अगस्त 2010

बस इतना वादा करती जाओ................

हर जन्म
जब भी मिलीं 
मेरी ना हुयीं
हर बार
मिलकर भी 
ना मिलीं
अब एक वादा
करती जाओ
अगले जन्म
की आस को
कुछ तो
संबल 
देती जाओ 
मेरी 
चिर प्रतीक्षित 
प्यास को
अपने वादे के 
अमृत से 
सींचती जाओ
इस बुझते 
दिए की
टिमटिमाती 
लौ को
अपनी स्वीकृति
की छाप से 
भिगोती जाओ
अगले किसी जन्म
जब भी मिलोगी
सिर्फ मेरी 
बनकर मिलोगी
बस इतना 
वादा करती जाओ ............

बुधवार, 11 अगस्त 2010

इक बार दफ़न हुई चाहतें............

जब चाहतें थीं तो
हर हसरतें फ़ना हो गयी 
अब चाहतें नहीं तो
हर हसरत जवाँ हो गयी
कल जब बुलाते थे तो
दूर छिटक जाते थे
आज बिन बुलाये 
चले आते हैं 
ये कैसे हसरतों के साये हैं 
बंद किवड़िया खडकाए हैं
खुशियों के दरवाजे
जब बंद कर दिए हमने 
तो देहरी पर 
दस्तक दिए जाते हैं
अब शाख से टूटे पत्ते को
दोबारा कैसे जोडूँ
मुरझाये फूल को
कैसे खिला  दूँ
कौन सा वो सावन लाऊँ
जो गुलशन हरा हो जाये
अरमानो की कब्र पर
कौन सा दीया जलाऊँ
जो हर अरमान एक बार
फिर जी जाए
इक बार दफ़न हुई
अरमानों की दुनिया
फिर आबाद नहीं होती
किसी भी आरजू
किसी भी हसरत की
तलबगार नहीं होती
मुर्दे कब जिंदा हुए हैं
भुने हुए बीजों से
अंकुर नहीं उगते
इसीलिए शायद
इक बार दफ़न 
हुई चाहतें
दोबारा  कफ़न 
नहीं ओढती

शनिवार, 7 अगस्त 2010

और हँसी मेरी लौटा जायें ....................

चलो अच्छा हुआ
हँसा दिया 
आज सुबह से
हँसी ही नहीं 
ना जाने कहाँ 
काफूर हो गयी थी  
किस कोने में 
दुबकी पड़ी थी
क्या करूँ 
हँसी आती ही नहीं
दिल के गहरे 
सन्नाटों में 
खो जाती 
पता नहीं कौन से
सन्नाटे हैं 
जो हँसी को बाहर 
आने ही नहीं देते
सन्नाटों का कारण 
क्या है, पता ही नहीं
बहुत ढूँढा ,मिला ही नहीं
तुम्हें मिले तो 
बता जाना 
ना मिले तब भी
कोशिश करना 
शायद कभी 
किसी चौराहे पर 
भीड़ के बीच
मिल जायें 
और हँसी मेरी
लौटा जायें...............

सोमवार, 2 अगस्त 2010

हाय !ये मैंने क्या किया?

इक सौंदर्य का
बीज रोपा 
धरती के सीने में
जग नियंता ने 
और सौंदर्य 
की महकती फसल 
लहलहा उठी
फिर उसने 
मानव नाम का
प्राणी धरती
पर उतारा
और चाहा ये 
उसकी फुलवारी को
और निखारे 
उसकी बगिया के
हर फूल को
गुलज़ार करे
मगर मानव के
स्वार्थ ने
बनाने वाले को
दगा दे दिया
उसकी कृति का
दुरूपयोग  किया
सौंदर्य  को 
कुरूपता में 
बदल दिया
अब पछता रहा था
जगनियंता 
पालनहारा
जगसृष्टा
हाय !ये मैंने क्या किया?
ये मैंने क्या किया………
क्यूँ मानव का अविष्कार किया ?