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रविवार, 5 सितंबर 2010

शिक्षा का स्तर ---------कल और आज ?

आज के वक्त में शिक्षा ने अपना एक अलग मुकाम बना लिया है .अब हर बच्चे के लिए शिक्षा का क्या महत्त्व है ये ज्यादातर सभी को  पता है मगर कभी वो भी वक्त था कि सिर्फ लड़कों को ही शिक्षा के योग्य समझा जाता था और लड़कियों की दुनिया सिर्फ घर में काम काज तक सीमित थी .मगर जैसे- जैसे शिक्षा का प्रसार होता गया शिक्षा का महत्त्व समझ आता गया और लड़कियों को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जाने लगा .


    आज लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों के कंधे से कन्धा मिलाकर चलती हैं और घर के कामकाज भी उतनी ही चुस्ती से करती हैं .शिक्षा ने देश और समाज को एक नयी दिशा दी है मगर फिर भी कल और आज के शिक्षा के स्तर में काफी फर्क आ चुका है.


कल शिक्षा बेशक सबके लिए अनिवार्य  नहीं थी मगर तब भी जो लगन होती थी वो अद्भुत होती थी . देश के लिए, समाज के लिए और घर परिवार के लिए कुछ करने का जज्बा होता था मगर आज शिक्षा सिर्फ पैसे कमाने का साधन बन कर  रह गयीं है .शिक्षा का स्तर दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा है. कोई मूल्य , कोई सिद्धांत नहीं रहे ...........बस पैसे के आगे कोई रिश्ता -नाता नहीं , सब छोटे हो गए हैं, बेमानी हो गए हैं ........................ये आज की शिक्षा की देन है .बेशक बड़ी बड़ी डिग्रियां मिल जाती हैं खूब नाम ,दौलत और शोहरत मिल जाती है मगर संस्कार नाम की दौलत से वंचित  रह जाता है आज का समाज. छात्र जव तक हाई स्कूल में होता है! माता पिता का आज्ञाकारी होता है . इंटर  में आने पर माता पिता की अवहेलना करता है! ग्रेज्यूएशन कर लेने के बाद स्वच्छंद हो जाता है और उसके बाद माता पिता को दुत्कारता और गालियां  देता है!
यही तो आजकल की शिक्षा का असर है.
बेशक आज अन्तरिक्ष ज्ञान प्राप्त कर लिया है मगर फिर भी कल की तुलना में कहीं ना कहीं कमजोर ही है आज का शिक्षा का स्तर.

क्या कहें अब ...............कल ज्यादा बढ़िया था कि आज ..............सबका अपना -अपना दृष्टिकोण होता है मगर अगर देखा जाए तो कल शिक्षा सिर्फ कमाई का साधन नहीं थी व्यावहारिक ज्ञान के साथ व्याकरणीय  ज्ञान भी उत्तम था मगर आज ना तो व्यावहारिक ज्ञान है और ना ही व्याकरणीय ज्ञान...............ऐसे में आज की पीढ़ी से क्या उम्मीद की जा सकती है ............सिर्फ कुछ शब्द अंग्रेजी के बोल लेने से कोई शिक्षा का स्तर उच्च नहीं हो जाता ............आज किसी साक्षात्कार में जाने से पहले हर बच्चे को व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा लेने के लिए कोचिंग   में जाना पड़ता है जबकि पहले ये सब शिक्षा के साथ - साथ व्यवहार में भी शामिल था..........बेशक आज भी व्यावहारिक ज्ञान जरूरी है मगर उसकी उपयोगिता सिर्फ साक्षात्कार तक ही सीमित हो कर रह गयीं है ..........एक बार जॉब मिल जाये उसके बाद सब भुला दिया जाता है या कहो रद्दी की टोकरी में डाल दिया जाता है.

आज सिर्फ एक ही ज्ञान दिया जाता है कि पैसे कमाकर , दूसरे की टांग खींचकर कैसे आगे बढ़ा जा सकता है जबकि कल नम्रता , सहनशीलता और संतोष का ज्ञान भी बांटा जाता था .

आज शिक्षा अपना  मूल स्वरुप खो चुकी है सिर्फ कमाई का साधन बन चुकी है .ऐसे में जो पौध निकलेगी वो भी तो वैसी ही निकलेगी जैसा बीज रोपित किया गया होगा.

कल की तुलना कभी भी आज से नहीं की जा सकती............कल हमारी धरोहर है मगर आज भविष्य ...............और आज यही भविष्य अंधकार की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है.हमें आज को सुरक्षित करना होगा तभी भविष्य की इमारत सुदृढ़ बन सकेगी और इसके लिए पहल हमारे शिक्षकों को ही करनी पड़ेगी क्योंकि नींव तो वो ही रखते हैं .नींव पक्की होगी तो इमारत आने आप सुदृढ़ और खूबसूरत बनेगी.

20 टिप्‍पणियां:

राजेश उत्‍साही ने कहा…

आपने जिन विडम्‍बनाओं का जिक्र किया है उसके लिए हमारी शिक्षा नहीं हमारे जीवन मूल्‍य जिम्‍मेदार हैं। हमारे जीवन मूल्‍यों में गिरावट आई है। जीवन मूल्‍य की बाकी सब बातें तय करते हैं। हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था भी उन्‍हीं मूल्‍यों को बढ़ावा दे रही है जिनकी बाजार में मांग है। वास्‍तव में तो जीवन मूल्‍य गिरे ही नहीं हैं,बल्कि उनकी परिभाषाएं भी बदल गई हैं।उन पर विमर्श करने की जरूरत है।

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

अगर हमारी शिक्षा में कुछ कमीं है तो हमारा क़ानून और हमारे अभिभावक भी कुछ कम दोषी नहीं जो एक थप्पड़ मारने पर कानून का दरवाजा खटखटाते हैं और क़ानून भी उनको शय देता है...कुछ अपवाद अवश्य होते हैं...लेकिन ऐसे कानून लगाने से हम कैसे भविष्य का निर्माण कर रहे हैं ?

डा.राजेंद्र तेला "निरंतर" ने कहा…

आज शिक्षा का मतलब जीविको पार्जन के लिए ज्ञान है .संस्कारों से क्या मतलब .अब डिग्रियां हैं ज्ञान कहाँ है .शिक्षा देने वाले भी उसी प्रकार की शिक्षा दे रहे हैं .किसी प्रकार सिलेबस पूरा हो जाये तो समझ लो शिक्षा पूरी हुई .व्यक्ति के मूल्यों मैं हास सर्वत्र हुआ है ,किसी एक पर दोषारोपण करना उचित नहीं होगा .शिक्षक ,शिष्य और समाज के अन्य प्रबुद्ध लोग भी कमोबेश कम या ज्यादा जिम्मेदार हैं .ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं इनसे सहमत होना जरूरी नहीं है.

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.
शिक्षक दिवस पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

जैसी बाज़ार में मांग होती है पूर्ति भी वैसी ही होती है ..यही हाल शिक्षा का है ..संस्कारों का अवमूल्यन करने में हम स्वयं दोषी हैं ...हम खुद चाहते हैं कि हमारे बच्छे आज के दौर में हर क्षेत्र में सबसे आगे रहें ...और इस दौड में भूल जाते हैं कि हम क्या सिखा रहे हैं ..

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सबसे पहले तो हमें लार्ड मेकाले की शिक्षा पद्धति से मुक्ति पानी होगी .... फिर संस्कार देने की प्रक्रिया को शिक्षा के साथ अनिवार्य करना होगा ... तभी कुछ संभावनाएँ बनेंगी .....

डा. अरुणा कपूर. ने कहा…

सही कहा आपने...हालात ऐसे ही है...लेकिन हम आशा कर सकतें है कि इतिहास अपने आप को दोहराएगा और शिक्षा को उसका यथा सन्मान और गौरव फिर से वापस मिल जाएगा!....सार्थक लेख!

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत सही कहा आपने, परंतु इसके लिये हम भी कहीं ना कहीं जिम्मेदार तो हैं ही.

रामराम.

sumant ने कहा…

बहुत सुंदर रचना. मैंने अपने ब्लॉग संग्रह को एक नया नाम दिया है.
आपका पूर्ववत प्रेम अपेक्षित है .
www.the-royal-salute.blogspot.com

रचना दीक्षित ने कहा…

यहाँ केवल एक ही व्यक्ति दोषी नहीं है हर कोई कहीं न कहीं दोषी है

डॉ टी एस दराल ने कहा…

बेशक शिक्षा के क्षेत्र में बहुत बदलाव आया है । मूल्यों की गिरावट नज़र आ रही है । लेकिन बढती आबादी के साथ अभी भी अशिक्षित लोगों की कमी नहीं है । जो शिक्षित हैं , वे भी सही मायने में शिक्षित कहलाने के लायक नहीं हैं ।
कहीं न कहीं शिक्षा पर व्यवस्था का असर ही दिखाई देता है ।

shama ने कहा…

Vandana,bade manse aalekh kikha hai..afsos kee baat ye hai,ki,hamare pariwaron me sahi nagrikatv kee shiksha nahi dee jati.Yahi wajah hai ki widyarthi aur shikshak inka paraspar samanway nahi hota...apne yahan pariksharthi nirmaan hote hain.Shikshak paison se matlab rakhte hain,widyarthi maarks se...!Insaniyat kaa nata kiska kiske saath hota hai?

रश्मि प्रभा... ने कहा…

bahut hi spasht aalekh hai

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

व्यवस्था में कहीं मूलभूत दोष है। जो हम सोच रहे हैं, कर नहीं पा रहे हैं।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (ਦਰ. ਰੂਪ ਚੰਦ੍ਰ ਸ਼ਾਸਤਰੀ “ਮਯੰਕ”) ने कहा…

दुरंगी शिक्षा नीति का यही परिणाम होगा!
--
भारत के पूर्व राष्ट्रपति
डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म-दिन
शिक्षकदिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

विवेक सिंह ने कहा…

परिवर्तन तो हर व्यवस्था में होते रहे हैं और होते रहेंगे ।

Babli ने कहा…

बहत ख़ूबसूरत, शानदार और लाजवाब प्रस्तुती !
शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!

इमरान अंसारी ने कहा…

वंदना जी,

सबसे पहले तो ऐसे लेख के लिए धन्यवाद.......मैं आपसे काफी हद तक सहमत हूँ ...पर एक बात कहना चाहूँगा ....सारा दोष सिर्फ शिक्षा को ही नहीं दिया जा सकता......संस्कार .....एक बच्चे को सबसे पहले अपने घर से मिलते हैं ...उसके बाद दुनिया शुरू होती है ....मेरा मानना है की संस्कार कभी नहीं मिटते ......अगर किसी को अछे संस्कार मिले हैं , तो वह चाहे कितने ही बुरे माहोल में रह ले, वह बुरा नहीं हो सकता....और ठीक इसका उल्टा भी है |

अंग्रेजी में एक कहावत है जिसका अर्थ है
" कोई भी इंसान वही बनता है ...जो उसकी माँ उसे बनाती है "

माँ-बाप का एक बच्चे के जीवन पर सबसे ज्यादा असर होता है |

Kusum Thakur ने कहा…

"कल की तुलना कभी भी आज से नहीं की जा सकती......कल हमारी धरोहर है....मगर आज भविष्य "

बहुत सुन्दर और सार्थक आलेख !!

ali ने कहा…

चिंतनपरक आलेख !