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सोमवार, 13 सितंबर 2010

पीड़ा का मर्म

कभी
मर्यादा का हनन 
किया होता
दोस्त बन कर 
दिल का दर्द 
पी लिया होता
तो कुछ लम्हों
के लिए ही सही 
मुझे मुझसे
छीन लिया होता
रूह पर गिरते 
अश्कों पर 
लब अपने 
रख दिए होते
अश्को का
ज़हर सारा 
पी लिया होता
तो मेरी रूह को
कुछ देर ही सही
तू जी लिया होता
रूह में जलते
सुर्ख अंगारों की 
तपिश पर 
हाथ रखा होता
दिल के हर 
अंगार पर अपना
नाम लिखा होता
कुछ अश्रु बूँद
टपकायीं होती
तो दिल जलने 
की आवाज़ 
तुझ तक भी
आई होती
मेरे दर्द की
कोई सीमा नहीं
अंतहीन दर्द के 
सफ़र में 
हमसफ़र 
बना होता
इस सीमा का
अतिक्रमण
किया होता
इस रेखा को लाँघ
अन्दर आया होता
तो मेरी पीड़ा का
मर्म जान पाया होता


33 टिप्‍पणियां:

समयचक्र ने कहा…

इस सीमा का
अतिक्रमण
किया होता
इस रेखा को लाँघ
अन्दर आया होता
तो मेरी पीड़ा का
मर्म जान पाया होता

भावपूर्ण रचना .... आभार

रश्मि प्रभा... ने कहा…

kareeb jo aaya hota to mujhko jaan paata....

kshama ने कहा…

Kin,kin panktiyon ko dohraun? Kin lafzon me taareef karun?Behad alahida aur khoobsoorat rachana!

कडुवासच ने कहा…

... bahut khoob !!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

रूह में जलते
सुर्ख अंगारों की
तपिश पर
हाथ रखा होता
दिल के हर
अंगार पर अपना
नाम लिखा होता

बहुत भाव पूर्ण रचना ....काश करीब से जाना होता ..

shikha varshney ने कहा…

काश...मन के उदगार बयान करती कविता बहुत सुन्दर.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत खूब ... सच कहा है ... पर दूसरों की पीड़ा समझने वाले आज बहुत मुश्किल से मिलते हैं ...

Akanksha Yadav ने कहा…

दिल को छूती है आपकी यह मार्मिक कविता...सुन्दर भाव..बधाई.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 14 - 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

http://charchamanch.blogspot.com/

Shabad shabad ने कहा…

बहुत ही भावुक कविता....पढ़कर मैं तो बस डूबती ही चली गई.....
दोस्त बन कर
दिल का दर्द
पी लिया होता
तो कुछ लम्हों
के लिए ही सही
मुझे मुझसे
छीन लिया होता.....
जब कोई ...आपको आप से छीनने वाला मिल जाए तो समझो आप ने सब कुछ पा लिया।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

रचना में दर्द निखर कर सामने आया है । अपने बहुत खूबसूरती से उजागर किया है । अति सुन्दर ।

Aruna Kapoor ने कहा…

दर्दे दिल की आवाज....सुन्दर भावोक्ति!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

जीवन के उन मृदु भावों से सुसज्जित जो किसी के अंतस में स्थित एकांतवास का सुख अनुभव करने से वंचित रहकर प्रवंचना का जीवन बिताने को गहन अंधकर की कंदरा में तिरोहित कर दिए जाते हैं, ऐसे अश्रु कणों को जो गरिमा आपने प्रदान की है, वह सर्वथा अतुलनीय है!! साधुवाद!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

इस रेखा को लाँघ
अन्दर आया होता
तो मेरी पीड़ा का
मर्म जान पाया होता
--
पीड़ा को इंगित कर
जीवन का पूरा फलसफा ही
समा दिया आपने तो
इस रचना में!

Kailash Sharma ने कहा…

कुछ अश्रु बूँद
टपकायीं होती
तो दिल जलने
की आवाज़
तुझ तक भी
आई होती
....Bahut sundar....bahut hi emotional aur dil ko chhunewali
abhivyakti...dil ka dard bahut hi khubsurati se vyakt kiya hai...
http://www.sharmakailashc.blogspot.com/

निर्मला कपिला ने कहा…

कुछ लम्हों के लिये
ही मुझ को मुझ से
छीन लिया होता। बहुत खूब। शुभकामनायें

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

कोई सीमा नहीं
अंतहीन दर्द के
सफ़र में
हमसफ़र
बना होता
इस सीमा का
अतिक्रमण
किया होता
इस रेखा को लाँघ
अन्दर आया होता
तो मेरी पीड़ा का
मर्म जान पाया होता....
वंदना जी प्रेम को नया आयाम दे रही हैं आप.. दर्द को आत्मा से परिचय करवा रही हैं.. ए़क कसक पैदा हो जाती है आपकी कविता को पढने के बाद और मन देर तक उद्वेलित रहता है... सुंदर कविता..

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

दर्द तो अन्दर जाकर ही पता चलेगा।

रचना दीक्षित ने कहा…

तो मेरी पीड़ा का
मर्म जान पाया होता
यही तो सबसे मुश्किल काम है

ashokbajajcg.com ने कहा…

मानव की अंतहीन पीड़ा की सुंदर अभिव्यक्ति .

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा है..वो मर्म नहीं जाना कोई जो रेखा से बाहर ही रहा ! अब वाह भी कैसे बोलू ये तो दर्द की बात है.. :))

रंजना ने कहा…

वाह...
बहुत ही सुन्दर भावाभिव्यक्ति..

पीड़ा को सार्थक अभिव्यक्ति दी है आपने...

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

मेरे दर्द की
कोई सीमा नहीं
अंतहीन दर्द के
सफ़र में
हमसफ़र
बना होता
इस सीमा का
अतिक्रमण
किया होता
*
- बहुत सुन्दर !

Madhu chaurasia, journalist ने कहा…

अच्छी रचना...मैडम

राजभाषा हिंदी ने कहा…

राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज़्ज़त करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिन्दी की इज़्ज़त न हो, यह मैं नहीं सह सकता। - विनोबा भावे

भारतेंदु और द्विवेदी ने हिन्दी की जड़ें पताल तक पहुँचा दी हैं। उन्हें उखाड़ने का दुस्साहस निश्‍चय ही भूकंप समान होगा। - शिवपूजन सहाय

हिंदी और अर्थव्यवस्था-2, राजभाषा हिन्दी पर अरुण राय की प्रस्तुति, पधारें

Akshitaa (Pakhi) ने कहा…

कित्ती भावपूर्ण रचना ...बधाई.

_____________
'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है...

Akshitaa (Pakhi) ने कहा…

कित्ती भावपूर्ण रचना ...बधाई.
_____________
'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है...

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

कुछ अश्रु बूँद
टपकायीं होती
तो दिल जलने
की आवाज़
तुझ तक भी
आई होती
Bahut sundar Vandna ji.

Renu Sharma ने कहा…

vandana ji
shandar likha hai
kya bataun , kuchh bol hi nahi pa rahi
bahut khoob likha hai.

Renu Sharma ने कहा…

vandana ji
shandar likha hai
kya bataun , kuchh bol hi nahi pa rahi
bahut khoob likha hai.

राजेश उत्‍साही ने कहा…

कोशिश जारी है।

Parul kanani ने कहा…

रूह में जलते
सुर्ख अंगारों की
तपिश पर
हाथ रखा होता
दिल के हर
अंगार पर अपना
नाम लिखा होता
beautiful!

बेनामी ने कहा…

वंदना जी,

इतने सच्चे भाव आप लती कहाँ से हैं.......मुझे ऐसा लगता है की ये आपकी अपनी व्यथा ..........माफ़ कीजियेगा मेरा मतलब आपकी निजी जिंदगी में झाँकने का नहीं है ....पर जो मुझे लगा वही मैंने कहा ................सुन्दर रचना.....इन्हें कहते हैं "जज़्बात"

कभी फुर्सत में हमारे ब्लॉग पर भी आयिए-
http://jazbaattheemotions.blogspot.com/
http://mirzagalibatribute.blogspot.com/
http://khaleelzibran.blogspot.com/
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एक गुज़ारिश है ...... अगर आपको कोई ब्लॉग पसंद आया हो तो कृपया उसे फॉलो करके उत्साह बढ़ाये|