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शनिवार, 25 सितंबर 2010

तुम मुझे जानते हो ?

मुझे पढने के
बाद भी
मैं समझ 
आने वाली नही 
इसलिए कभी
मत सोचना
कि तुम मुझे जानते हो ?

कुछ दायरे 
सोच से भी 
उपर होते हैं
बहुत दूर हूँ 
तुम्हारी सोच से
तुम्हारी सोच 
सिर्फ मेरे 
अस्तित्व तक ही 
पहुंचेगी 
मगर मेरी
सोच तक नहीं
मेरे ख्यालों तक नहीं
मेरे सीने में उठते 
ज्वार भाटों तक नहीं
उन कसमसाते 
सवालों तक नहीं
उन ख्वाब में बुनी
चादरों तक नहीं
उन दिल  के खामोश
सूने तहखानो तक 
कभी नहीं पहुँच पायेगी 
तुम्हारी सोच
फिर कैसे कह सकते हो 
तुम मुझे जानते हो ?

कुछ शख्सियत
कुछ किताबें
उसके कुछ अक्षर
गूढार्थ समेटे होते हैं
कहीं गूढार्थ
तो कहीं भावार्थ
हर अहसास
हर भाव
हर ख्वाब
का  अर्थ 
ना ढूँढ पाओगे
बाज़ार में
भावों की 
कोई डिक्शनरी
नही मिलती 
फिर कैसे कह सकते हो
तुम मुझे जानते हो ?

हर अनकहे 
शब्द का अर्थ
हर जज़्बात का
भीगा  टुकड़ा
हर याद की 
अनकही चाहत
हर मौसम की
सर्द हवाओं और 
लू के गर्म 
थपेड़ों में 
चकनाचूर हुए कुछ
बोझिल ख्यालात
कैसे इन सबसे 
पार पाओगे
कहाँ तक इनके
अर्थ ढूँढ पाओगे
शायद सागर से तो
मोती ढूँढ भी लाओ
मगर मुझमे छुपी "मैं"
कहाँ ढूँढ पाओगे
कुछ ना जान पाओगे
सिर्फ उपरी आडम्बर है
यहाँ कोई किसी को
पहचान नहीं पाता
एक ज़िन्दगी साथ 
गुजारने के बाद भी
फिर जानना तो 
मुमकिन ही नहीं
इसलिए 
अब फिर कभी ना कहना
तुम मुझे जानते हो ?

41 टिप्‍पणियां:

Akanksha~आकांक्षा ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता ..अभिव्यक्तियों का सटीक चित्रण.
______________
'शब्द-शिखर'- 21 वीं सदी की बेटी.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

soch ki hadon tak pahunchna aasaan nahi .... bahut badhiyaa

डॉ टी एस दराल ने कहा…

सिर्फ उपरी आडम्बर है
यहाँ कोई किसी को
पहचान नहीं पाता

बहुत सही कहा ।

`मैं' को पहचानना तो वैसे ही मुश्किल है ।
बढ़िया रचना ।

Anupriya ने कहा…

jee...nahi jaanti, par ab jaanna chahungi,kaun hai aap ?aapki likhi kawitayen gat do dino se padh rahi hu. jitna padha aapke baare me jaanne ki khwahish badhti gai.kya khub likhti hai aap.

रंजना ने कहा…

सही कहा.....
यह दावा कोई नहीं कर सकता कि वह दुसरे को जानता है..
कई बार तो व्यक्ति खुद को नहीं जान पहचान पाता,तो दुसरे के लिए क्या दंभ भरे...

बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण कविता रची है आपने...बहुत बहुत सुन्दर....

सलीम ख़ान ने कहा…

Yes! bahoor achchhi tarah se...!!

Umda Prastuti !!!

दीप्ति शर्मा ने कहा…

क्या बात है वंदना जी , "तुम मुझे नहीं जानते" बहुत ही उम्दा

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

यहाँ कोई किसी को
पहचान नहीं पाता
एक ज़िन्दगी साथ
गुजारने के बाद भी

बिलकुल सही कहा ..यह दावा करना कि हम किसी को जान पहचान गए हैं बेमानी है ...बहुत सशक्त रचना ..

मेरे भाव ने कहा…

शायद सागर से तो
मोती ढूँढ भी लाओ
मगर मुझमे छुपी "मैं"
कहाँ ढूँढ पाओगे
कुछ ना जान पाओगे
..nari ko to devta bhi nahin samajh paaye phir aadmi kya cheej hai.

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

ek shashakt kaviyatri ke kalam se niklli ek aur shandaar rachna......wow karne ko majboor kati hai.......:))

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

किसी को उतना ही जाना जा सकता है जितना वह व्यक्त हो। उससे परे तो समझने का दावा करना मूर्खता की श्रेणी में ही आयेगा।
बहुत सुन्दर रचना।

सुनीता शानू ने कहा…

सही कहा आपने हर आदमी के भीतर छिपा है एक और आदम। कहाँ जान पाते हैं हम किसी को भली-भाँती।

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

बहुत सुन्दर भावपूर्ण कविता वंदना जी खासकर कविता के दुसरे पैरे की सुरुँती कुछ पंक्तिया बहुत बेहतरीन है !

M VERMA ने कहा…

मगर मुझमे छुपी "मैं"
कहाँ ढूँढ पाओगे
और फिर जानने की भी तो एक हद होती जिससे परे कोई खुद को या किसी दूसरे को जान ही कहाँ पाता है.
अभिव्यक्ति .. भाव .. और एहसास के उतार-चढाव का सुन्दर चित्रण

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

प्याज के छिलके की तरह होता है इंसान का ब्यक्तित्व..एक परत के बाद दुसरा खुलता चला जाता है.. कोई नहीं कर सकता दावा किसी को जानने का. भावनओं का डिक्शनरी वाला बात अच्छा लगा. सुंदर रचना!!

राजेश उत्‍साही ने कहा…

कोशिश जारी है।

ktheLeo ने कहा…

वाह! सुन्दर अभिव्यक्ति!

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सही बात कही..किसी को जानने और पहचानने में अंतर है.

बढ़िया रचना.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

यहाँ कोई किसी को
पहचान नहीं पाता
एक ज़िन्दगी साथ
गुजारने के बाद भी
फिर जानना तो
मुमकिन ही नहीं
इसलिए
अब फिर कभी ना कहना
तुम मुझे जानते हो ?
--

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।
--
पुत्री-दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

Shekhar Suman ने कहा…

bahut hi khubsurat kavita..
aapki rachnayein padhkar dil ko jaise sukun sa milta hai...
मेरे ब्लॉग पर इस बार धर्मवीर भारती की एक रचना...
जरूर आएँ.....

ali ने कहा…

मेरा अस्तित्व मेरी सोच ,मेरे ख्याल ,सीने में उठते ज्वार भाटों वगैरह वगैरह से अलग है ?

Kailash C Sharma ने कहा…

बाज़ार में
भावों की
कोई डिक्शनरी
नही मिलती
फिर कैसे कह सकते हो
तुम मुझे जानते हो ?.....
बहुत ही सशक्त मनोविज्ञानिक चिंतन.......जब आदमी स्वयं को ही पूरी तरह नहीं जान पता तो वह दुसरे की सोच की गहराई तक कैसे जा पायेगा...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

arun c roy ने कहा…

"हर अनकहे
शब्द का अर्थ
हर जज़्बात का
भीगा टुकड़ा
हर याद की
अनकही चाहत
हर मौसम की
सर्द हवाओं और
लू के गर्म
थपेड़ों में
चकनाचूर हुए कुछ
बोझिल ख्यालात
कैसे इन सबसे
पार पाओगे
कहाँ तक इनके
अर्थ ढूँढ पाओगे "...
वंदना जी.. इस कविता में और कहस कर इन पंक्तियों में आपने स्त्री पुरुष सम्बन्ध.. नारी का समाज में स्थान.. उसकी अहमियत.. उसके प्रति हमारी सोच.. सब कुछ कह दिया है आपने इस कविता के माध्यम से .. मनोवैज्ञानिक स्तर पर चोट करती आपकी कविता ए़क सार्थक अभिव्यक्ति है...

सुमन'मीत' ने कहा…

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति...................

Akshita (Pakhi) ने कहा…

आपने तो बहुत अच्छी कविता लिखी...बधाई.


_________________________
'पाखी की दुनिया' में- डाटर्स- डे पर इक ड्राइंग !

अजय कुमार झा ने कहा…

बहुत खूब .....सुंदर रचना ...सरल शब्दों से आपने एक सुंदर संसार रच दिया ॥

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
कहानी ऐसे बनी– 5, छोड़ झार मुझे डूबन दे !, राजभाषा हिन्दी पर करण समस्तीपुरी की प्रस्तुति, पधारें

अजय कुमार ने कहा…

जी हां बहुत मुश्किल है जानना ।

रचना दीक्षित ने कहा…

सिर्फ उपरी आडम्बर है
यहाँ कोई किसी को
पहचान नहीं पाता
सरल शब्दों में सार्थक अभिव्यक्ति है. जानने और पहचानने में अंतर है. सशक्त रचना

Apanatva ने कहा…

bahut gahree baat .......
shaandaar rachana.......

Razi Shahab ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति। लेकिन थोडी बड़ी हो गई है...शायद

shikha varshney ने कहा…

बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति.

veerubhai ने कहा…

baazaar me bhaavon zazbaaton ki koi dikshnari nahin milti ,
yakeen maaniye, milti to main chhodtaa nahin .
sirf jgyaasu hi to hoon aur kuchh bhi to nahin .
veerubhai
behad ki sundar rachnaa hai aapki badhaai .

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

कई बार जिंदगी ऐसे मोडो पर ला खड़ा करती है की हम अपने बारे में भी ये निर्णय नहीं ले पाते की हम कैसे उस मोड से निकल पाएंगे...जब ऐसी अवस्था में हम खुद को ही नहीं समझ पाते तो दूसरा क्या समझेगा ??? वैसे भी नारी तो भगवान के लिए भी एक पहेली है. :):):)

खैर ये तो रही एक अलग बात...
आपने जो शब्द दिए अपने एहसास को सच कहा की हमारे साथ कोई एक क्या दो जिंदगियां भी बिता ले तो समझ नहीं सकता.

सुंदर अभिव्यक्ति.

इमरान अंसारी ने कहा…

वंदना जी,

इस रचना में आपने बहुत ऊंचाई छुई है ........जानना और पहचानना इन दोनों में ज़मीन और आसमान का अंतर है ....कोई दूसरा हमें क्या जानेगा.......सारी जिंदगी हम खुद को नहीं जान पाते....किसी दूसरे से आशा क्यूँ करें ......अगर हमने खुद को जान लिया फिर कुछ भी जानने को नहीं रह जाता| एक शेर अर्ज़ है .....
" मेरी खुदी में निहाँ है मेरे खुदा का वजूद,
खुदा को भूल गया जबसे खुद को समझा हूँ "

'उदय' ने कहा…

... bahut sundar !!!

शरद कोकास ने कहा…

जानना इतना आसान भी नहीं है ।

डॉ. हरदीप संधु ने कहा…

बाज़ार में
भावों की
कोई डिक्शनरी
नही मिलती .........
बहुत ही गहरी बात........
यह डिक्शनरी तो बस दिल में मिलती है !!!

ZEAL ने कहा…

Beautiful presentation !

sakhi with feelings ने कहा…

kisi ko koi itna asani se sampuran jaan le to baat hi kya ho??

par aisa hota nahi

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

hmmm. kah to aap sahi hi rahi ho vandana ji .. insaan ko samajhna mushkil hai aur upar se wo agar poet ho to aur bhi mushkil..

so well written..

badhayi