१) सुनो
कुछ ख्वाब बोये थे
तुम्हारे साथ जीने के
बंजर ज़मीन में
२) वेदनाओं के ताबूत में
आखिरी कील जो
लगायी तुमने
रूह को सुकून आ गया
३) तेरी चाहत की
बैसाखियों ने
अपाहिज बनाया मुझे
बस लाश बनना बाकी है
४) कैसे समेटेगा
इन बिखरे टुकड़ों को
जिन्हें कभी
तू ने ही ....................
५) बिन बादल बरसती हूँ
बिन आंसू के रोती हूँ
कहीं सैलाब में बह ना जाऊं
६) दस्तक कोई देता ही नही
आवाज़ कोई आती ही नही
शायद हवाओं का रुख बदल रहा है
पृष्ठ
रविवार, 7 मार्च 2010
गुरुवार, 4 मार्च 2010
तेरी ख़ामोशी
तेरी ख़ामोशी
जब बातें करती है
मुझसे
बस वहीं धडकनें
रूक जाती हैं
जो तुझसे
नहीं कह पातीं
वो अफसाने
मेरे कानो में
बयां कर जाती हैं
कभी तेरा
तितलियों सा
उड़ना
कभी तूफ़ान सा
मचलना
कभी खग सदृश
आकाश में उड़ना
कभी यादों के
कटहरे में
सजायाफ्ता
मुजरिम सा
खामोश ठहर जाना
कभी मेघों सा
गरजना
कभी वेणी में गुंथे
पुष्पों सा महकना
और फिर कभी- कभी
कांच की तरह टूटे
ख्वाबों सा तेरा टूटना
कभी किसी
रुके दरिया सा
ख़ामोशी का सन्नाटा
कभी आँख से गिरे
अश्क सा मिटटी
में मिल जाना
तेरे हर पल
हर लम्हे की
दास्ताँ सुना जाती हैं
तेरी ख़ामोशी मुझे
बता फिर कैसे
कोई जिंदा रहे
और धडकनों की
आवाज़ सुने
जब बातें करती है
मुझसे
बस वहीं धडकनें
रूक जाती हैं
जो तुझसे
नहीं कह पातीं
वो अफसाने
मेरे कानो में
बयां कर जाती हैं
कभी तेरा
तितलियों सा
उड़ना
कभी तूफ़ान सा
मचलना
कभी खग सदृश
आकाश में उड़ना
कभी यादों के
कटहरे में
सजायाफ्ता
मुजरिम सा
खामोश ठहर जाना
कभी मेघों सा
गरजना
कभी वेणी में गुंथे
पुष्पों सा महकना
और फिर कभी- कभी
कांच की तरह टूटे
ख्वाबों सा तेरा टूटना
कभी किसी
रुके दरिया सा
ख़ामोशी का सन्नाटा
कभी आँख से गिरे
अश्क सा मिटटी
में मिल जाना
तेरे हर पल
हर लम्हे की
दास्ताँ सुना जाती हैं
तेरी ख़ामोशी मुझे
बता फिर कैसे
कोई जिंदा रहे
और धडकनों की
आवाज़ सुने
रविवार, 28 फ़रवरी 2010
किससे करें बरजोरी........कैसे खेलें होली ?
होली होली
खेलें होली
रंगों की है
बरजोरी
चलो चलो
सब खेलें होली
आवाज़ ये
आ रही है
दिल को मेरे
दुखा रही है
कैसी होली
कौन सी होली
कौन से रंगों से
करें बरजोरी
कहीं है देखो
रिश्तों के
व्यापार की होली
कहीं है प्यार के
इम्तिहान की होली
कहीं पर देखो
जाति की होली
कहीं है भ्रष्टाचार
की होली
कोई तो फेंके
बमों के गुब्बारे
कहीं पर है
नक्सलिया टोली
लहू का पानी
डाल रहे हैं
नफरतों के
बाज़ार लगे हैं
सियासती चालों की
होली खेल रहे हैं
दाँव पेंच सब
चल रहे हैं
बन्दूक की
पिचकारी बना
निशाना दाग रहे हैं
देश को कैसे
बाँट रहे हैं
ये कैसी होली
खेल रहे हैं
लहू के रंग
बिखेर रहे हैं
केसरिया भी
सिसक रहा है
टेसू के फूलों से
भी जल रहा है
हरियाली भी
रो रही है
अपना दामन
भिगो रही है
अमन शान्ति का
हर रंग उड़ गया है
आसमान भी
बिखर गया है
माँ भी लाचार खडी है
अपनों के खून से
सनी पड़ी है
बेबस निगाहें
तरस रही हैं
जिसके बच्चे
मर रहे हों
आतंक की भेंट
चढ़ रहे हों
जो घात पर घात
सह रही हो
तड़प- तड़प कर
जी रही हो
जिस माँ को
अपने ही बच्चे
टुकड़ों में
बाँट रहे हों
वो माँ बताओ
कैसे खेले होली
जहाँ दिमागों पर
पाला पड़ गया हो
स्पंदन सारे
सूख गए हों
ह्रदयविहीन सब
हो गए हों
अपनों के लहू से
हाथ धो रहे हों
बताओ फिर
कैसे खेलें होली
किसकी होली
कैसी होली
किससे करें
बरजोरी
अब कैसे खेलें होली ?
खेलें होली
रंगों की है
बरजोरी
चलो चलो
सब खेलें होली
आवाज़ ये
आ रही है
दिल को मेरे
दुखा रही है
कैसी होली
कौन सी होली
कौन से रंगों से
करें बरजोरी
कहीं है देखो
रिश्तों के
व्यापार की होली
कहीं है प्यार के
इम्तिहान की होली
कहीं पर देखो
जाति की होली
कहीं है भ्रष्टाचार
की होली
कोई तो फेंके
बमों के गुब्बारे
कहीं पर है
नक्सलिया टोली
लहू का पानी
डाल रहे हैं
नफरतों के
बाज़ार लगे हैं
सियासती चालों की
होली खेल रहे हैं
दाँव पेंच सब
चल रहे हैं
बन्दूक की
पिचकारी बना
निशाना दाग रहे हैं
देश को कैसे
बाँट रहे हैं
ये कैसी होली
खेल रहे हैं
लहू के रंग
बिखेर रहे हैं
केसरिया भी
सिसक रहा है
टेसू के फूलों से
भी जल रहा है
हरियाली भी
रो रही है
अपना दामन
भिगो रही है
अमन शान्ति का
हर रंग उड़ गया है
आसमान भी
बिखर गया है
माँ भी लाचार खडी है
अपनों के खून से
सनी पड़ी है
बेबस निगाहें
तरस रही हैं
जिसके बच्चे
मर रहे हों
आतंक की भेंट
चढ़ रहे हों
जो घात पर घात
सह रही हो
तड़प- तड़प कर
जी रही हो
जिस माँ को
अपने ही बच्चे
टुकड़ों में
बाँट रहे हों
वो माँ बताओ
कैसे खेले होली
जहाँ दिमागों पर
पाला पड़ गया हो
स्पंदन सारे
सूख गए हों
ह्रदयविहीन सब
हो गए हों
अपनों के लहू से
हाथ धो रहे हों
बताओ फिर
कैसे खेलें होली
किसकी होली
कैसी होली
किससे करें
बरजोरी
अब कैसे खेलें होली ?
शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010
कैसे खेलें होरी
तिरछी चितवन
सुर्ख कपोल
भीगे अधर
प्रिये
कैसे प्रवेश करूँ
ह्रदय में
पहरे तुमने
बिठा रखे हैं
चितवन बांकी
बींध रही है
किस रंग से
तुम्हें सजाऊँ
कपोल सुर्ख
किये हुए हैं
कौन से नीर से
तुम्हें भिगाऊं
अधर अमृत का
पान किये हैं
प्रिये
कैसे खेलूँ होरी
तुझ संग कैसे
खेलूँ होरी
प्रिये
एक बार बस
आलिंगनबद्ध
हो जाओ
प्रेम रस में
तुम भीग जाओ
प्रीत मनुहार
के रंगों से
आओ सजनिया
अब खेलें होरी
सुर्ख कपोल
भीगे अधर
प्रिये
कैसे प्रवेश करूँ
ह्रदय में
पहरे तुमने
बिठा रखे हैं
चितवन बांकी
बींध रही है
किस रंग से
तुम्हें सजाऊँ
कपोल सुर्ख
किये हुए हैं
कौन से नीर से
तुम्हें भिगाऊं
अधर अमृत का
पान किये हैं
प्रिये
कैसे खेलूँ होरी
तुझ संग कैसे
खेलूँ होरी
प्रिये
एक बार बस
आलिंगनबद्ध
हो जाओ
प्रेम रस में
तुम भीग जाओ
प्रीत मनुहार
के रंगों से
आओ सजनिया
अब खेलें होरी
बुधवार, 24 फ़रवरी 2010
कमरों वाला मकान
इस मकान के
कमरों में
बिखरा अस्तित्व
घर नही कहूँगी
घर में कोई
अपना होता है
मगर मकान में
सिर्फ कमरे होते हैं
और उन कमरों में
खुद को
खोजता अस्तित्व
टूट -टूट कर
बिखरता वजूद
कभी किसी
कमरे की
शोभा बनती
दिखावटी मुस्कान
यूँ एक कमरा
जिंदा लाश का था
तो किसी कमरे में
बिस्तर बन जाती
और मन पर
पड़ी सिलवटें
गहरा जाती
यूँ एक कमरा
सिसकती सिलवटों का था
किसी कमरे में
ममता का
सागर लहराता
मगर दामन में
सिर्फ बिखराव आता
यूँ एक कमरा
आँचल में सिसकते
दूध का था
किसी कमरे में
आकांक्षाओं , उम्मीदों
आशाओं की
बलि चढ़ता वजूद
यूँ एक कमरा
फ़र्ज़ की कब्रगाह का था
कभी रोटियों में ढलता
कभी बर्तनों में मंजता
कभी कपड़ों में सिमटता
तो कभी झाड़ू में बिखरता
कभी नेह के दिखावटी
मेह में भीगता
कभी अपशब्दों की
मार सहता
हर तरफ
हर कोने में
टुकड़े - टुकड़े
बिखरे अस्तित्व
को घर कब
मिला करते हैं
ऐसे अस्तित्व तो सिर्फ कमरों में ही सिमटा करते हैं.
कमरों में
बिखरा अस्तित्व
घर नही कहूँगी
घर में कोई
अपना होता है
मगर मकान में
सिर्फ कमरे होते हैं
और उन कमरों में
खुद को
खोजता अस्तित्व
टूट -टूट कर
बिखरता वजूद
कभी किसी
कमरे की
शोभा बनती
दिखावटी मुस्कान
यूँ एक कमरा
जिंदा लाश का था
तो किसी कमरे में
बिस्तर बन जाती
और मन पर
पड़ी सिलवटें
गहरा जाती
यूँ एक कमरा
सिसकती सिलवटों का था
किसी कमरे में
ममता का
सागर लहराता
मगर दामन में
सिर्फ बिखराव आता
यूँ एक कमरा
आँचल में सिसकते
दूध का था
किसी कमरे में
आकांक्षाओं , उम्मीदों
आशाओं की
बलि चढ़ता वजूद
यूँ एक कमरा
फ़र्ज़ की कब्रगाह का था
कभी रोटियों में ढलता
कभी बर्तनों में मंजता
कभी कपड़ों में सिमटता
तो कभी झाड़ू में बिखरता
कभी नेह के दिखावटी
मेह में भीगता
कभी अपशब्दों की
मार सहता
हर तरफ
हर कोने में
टुकड़े - टुकड़े
बिखरे अस्तित्व
को घर कब
मिला करते हैं
ऐसे अस्तित्व तो सिर्फ कमरों में ही सिमटा करते हैं.
शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010
देशभक्ति का दानव
देशभक्ति का दानव मुझमें
जाने क्यूँ मचलता रहता है
इसका कोई मान नही
इसकी कोई पहचान नही
फिर भी अपना राग सुनाता रहता है
सिर्फ चुनावी बिगुल बजने
पर ही सबको याद ये आता है
वरना सियासतदारों को
फूटी आँख ना भाता है
आज के युग में
दानव ही ये कहलाता है
इसकी माला जपने वाला
यहाँ महादानव कहलाता है
हर नेता इससे बचकर
निकलना चाहता है
जब बजती देशभक्ति की घंटी
संसद में आँख मूँद सो जाता है
इसके भयंकर रूप से तो
हर नेता घबराता है
जान की कीमत पर अब
कौन शोहरत पाना चाहता है
अब तो हर इंसान बस
पैसे की तराजू में तुलना चाहता है
देशभक्ति के पल्लू से तो बस
हाथ पोछना चाहता है
फिर क्यूँ ना भ्रष्टाचार , आतंकवाद
स्वार्थपरता के यज्ञ में
इसकी आहुति दे दें हम
फिर क्यूँ ना ऐसे दानव से
अब मुक्ति पा लें हम
आओ देशभक्ति के दानव से
मुक्त होने का प्रण लें हम
आओ प्रण करें
देशभक्ति के दानव का
सर कुचलकर रहेंगे हम
स्वार्थपरता , भ्रष्टाचार और आतंक
का नारा बुलंद करेंगे हम
तभी (भार + त ) भार से अटे
भारत को
देशभक्ति के चुंगुल से
मुक्त कर पाएंगे हम
और सही मायनो में
आने वाली पीढ़ी को
सन्मार्ग(कुमार्ग) दिखा जायेंगे हम
जाने क्यूँ मचलता रहता है
इसका कोई मान नही
इसकी कोई पहचान नही
फिर भी अपना राग सुनाता रहता है
सिर्फ चुनावी बिगुल बजने
पर ही सबको याद ये आता है
वरना सियासतदारों को
फूटी आँख ना भाता है
आज के युग में
दानव ही ये कहलाता है
इसकी माला जपने वाला
यहाँ महादानव कहलाता है
हर नेता इससे बचकर
निकलना चाहता है
जब बजती देशभक्ति की घंटी
संसद में आँख मूँद सो जाता है
इसके भयंकर रूप से तो
हर नेता घबराता है
जान की कीमत पर अब
कौन शोहरत पाना चाहता है
अब तो हर इंसान बस
पैसे की तराजू में तुलना चाहता है
देशभक्ति के पल्लू से तो बस
हाथ पोछना चाहता है
फिर क्यूँ ना भ्रष्टाचार , आतंकवाद
स्वार्थपरता के यज्ञ में
इसकी आहुति दे दें हम
फिर क्यूँ ना ऐसे दानव से
अब मुक्ति पा लें हम
आओ देशभक्ति के दानव से
मुक्त होने का प्रण लें हम
आओ प्रण करें
देशभक्ति के दानव का
सर कुचलकर रहेंगे हम
स्वार्थपरता , भ्रष्टाचार और आतंक
का नारा बुलंद करेंगे हम
तभी (भार + त ) भार से अटे
भारत को
देशभक्ति के चुंगुल से
मुक्त कर पाएंगे हम
और सही मायनो में
आने वाली पीढ़ी को
सन्मार्ग(कुमार्ग) दिखा जायेंगे हम
रविवार, 14 फ़रवरी 2010
प्रेम की परिधि
मुझे
रेखांकित किया
जब तुमने
अपने प्रेम की
परिधि में
बाँधा जब तुमने
अपने मूक प्रेम
की डोर से तुमने
मेरे भटकते
अर्धव्यास को
स्वयं के व्यास से
जोड़कर संपूर्ण
घेरा बना लिया
जब तुमने
तब उसी परिधि में
अपनी धुरी पर
घूमते- घूमते
कब मैं
तेरा ही रूप हो गयी
पता ही ना चला
आओ अब इस
परिधि में
एक दूजे को
समा लें हम
अपने अस्तित्व की
पूर्णता से सजा लें हम
एक दूजे की
सम्पूर्णता में
खो जायें हम
जहाँ दो ना रहें
एक हो जायें हम
रेखांकित किया
जब तुमने
अपने प्रेम की
परिधि में
बाँधा जब तुमने
अपने मूक प्रेम
की डोर से तुमने
मेरे भटकते
अर्धव्यास को
स्वयं के व्यास से
जोड़कर संपूर्ण
घेरा बना लिया
जब तुमने
तब उसी परिधि में
अपनी धुरी पर
घूमते- घूमते
कब मैं
तेरा ही रूप हो गयी
पता ही ना चला
आओ अब इस
परिधि में
एक दूजे को
समा लें हम
अपने अस्तित्व की
पूर्णता से सजा लें हम
एक दूजे की
सम्पूर्णता में
खो जायें हम
जहाँ दो ना रहें
एक हो जायें हम
गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010
चक्रव्यूह
विरह दंश से
पीड़ित धड़कन
तेरे नाम से ही
धड़क जाती है
सोच ज़रा
क्या होगा
उस पल जब
युगों के चक्रव्यूह
में फँसी
जन्म -जन्मान्तरों
से भटकती रूहों
का मिलन होगा
और दीदार को
तरसते नैन
चार होंगे
जब प्रेम अपने
चरम पर होगा
उस चिर प्रतीक्षित
क्षणिक पल में
धड़कन रूक नही जाएगी
साँस थम नही जाएगी
और एक बार फिर
प्रेम , विरह और मिलन
के चक्रव्यूह में
अगले कई युगों तक
कई जन्मो के लिए
रूहें हमारी
फिर उसी दलदल में
फँस नही जाएँगी
पीड़ित धड़कन
तेरे नाम से ही
धड़क जाती है
सोच ज़रा
क्या होगा
उस पल जब
युगों के चक्रव्यूह
में फँसी
जन्म -जन्मान्तरों
से भटकती रूहों
का मिलन होगा
और दीदार को
तरसते नैन
चार होंगे
जब प्रेम अपने
चरम पर होगा
उस चिर प्रतीक्षित
क्षणिक पल में
धड़कन रूक नही जाएगी
साँस थम नही जाएगी
और एक बार फिर
प्रेम , विरह और मिलन
के चक्रव्यूह में
अगले कई युगों तक
कई जन्मो के लिए
रूहें हमारी
फिर उसी दलदल में
फँस नही जाएँगी
रविवार, 7 फ़रवरी 2010
क्या फिर ऋतुराज का आगमन हुआ है ?
सोमरस -सा
प्राणों को
सिंचित करता
तुम्हारा ये नेह
ज्यों प्रौढता की
दहलीज परवसंत का आगमन
नव कोंपल सी
खिलखिलाती
स्निग्ध मुस्कान
ज्यों वीणा के तार
झनझना गए हो
स्नेहसिक्त नयनो से
बहता प्रेम का सागर
ज्यों तूफ़ान कोई
दरिया में
सिमट आया हो
सांसों के तटबंधों
को तोड़ते ज्वार
ज्यों सैलाब किसी
आगोश में
बंध गया हो
प्रेमारस में
भीगे अधर
ज्यों मदिरा कोई
बिखर गयी हो
धडकनों की
ताल पर
थिरकता मन
ज्यों देवालय में
घंटियाँ बज रही हों
आह ! ये कैसा
अनुबंध है प्रेम का
क्या फिर
ऋतुराज का
आगमन हुआ है ?
प्राणों को
सिंचित करता
तुम्हारा ये नेह
ज्यों प्रौढता की
दहलीज परवसंत का आगमन
नव कोंपल सी
खिलखिलाती
स्निग्ध मुस्कान
ज्यों वीणा के तार
झनझना गए हो
स्नेहसिक्त नयनो से
बहता प्रेम का सागर
ज्यों तूफ़ान कोई
दरिया में
सिमट आया हो
सांसों के तटबंधों
को तोड़ते ज्वार
ज्यों सैलाब किसी
आगोश में
बंध गया हो
प्रेमारस में
भीगे अधर
ज्यों मदिरा कोई
बिखर गयी हो
धडकनों की
ताल पर
थिरकता मन
ज्यों देवालय में
घंटियाँ बज रही हों
आह ! ये कैसा
अनुबंध है प्रेम का
क्या फिर
ऋतुराज का
आगमन हुआ है ?
गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010
" कल "
कल
जब आई थी
मैं
क्यूँ नही बांधा
तुमने
प्रेमापाश में
क्यूँ नही
पकड़ा दामन
क्यूँ नही
डालीं पाँव में
जंजीरें
अपने इंतज़ार की
क्यूँ नही दी
दुहाई
अपने जज्बातों की
क्यूँ नही सुनाई
इक-इक पल में
सौ- सौ बार
मर- मर कर
जीने की दास्ताँ
अब कल
फिर आऊँगी
तब कह लेना
अनकही बातें
दिखा देना
अपनी धडकनों पर
लिखा मेरा नाम
हवाओं पर तैरता
मोहब्बत का पैगाम
सुना देना
सारे जहान को
अपने ख्वाबों की
दास्ताँ
मगर एक बात
याद रखना
कल आई थी
कल आऊँगी
पर ये भूल
ना जाना
कल कभी नही आता
कभी नही आता
जब आई थी
मैं
क्यूँ नही बांधा
तुमने
प्रेमापाश में
क्यूँ नही
पकड़ा दामन
क्यूँ नही
डालीं पाँव में
जंजीरें
अपने इंतज़ार की
क्यूँ नही दी
दुहाई
अपने जज्बातों की
क्यूँ नही सुनाई
इक-इक पल में
सौ- सौ बार
मर- मर कर
जीने की दास्ताँ
अब कल
फिर आऊँगी
तब कह लेना
अनकही बातें
दिखा देना
अपनी धडकनों पर
लिखा मेरा नाम
हवाओं पर तैरता
मोहब्बत का पैगाम
सुना देना
सारे जहान को
अपने ख्वाबों की
दास्ताँ
मगर एक बात
याद रखना
कल आई थी
कल आऊँगी
पर ये भूल
ना जाना
कल कभी नही आता
कभी नही आता
रविवार, 31 जनवरी 2010
बावरा मन
ये मन का उड़ता पंछी
आकाश को पाना चाहता है
जिस राह की कोई मंजिल नही
उस राह को तकना चाहता है
प्रणय बंधन में बँधे मनों को
प्रेम का नव अर्थ देना चाहता है
नामुमकिन सी तमन्ना को
आइना बनाना चाहता है
प्रणय बंधन में जकड़ी बेडी को
प्रेम की हथकड़ी लगाना चाहता है
तुमसे ही हर चाहत का अब
सिला पाना चाहता है
ह्रदय की कुँवारी इच्छाओं को
तुमसे ही मनवाना चाहता है
ह्रदय में उठते ज्वारों की
ख़ामोशी को सुनाना चाहता है
प्रेम के हर अधबुने फंदे को
तुमसे ही बुनवाना चाहता है
तन के रिश्ते से कुछ ऊपर उठकर
प्रेमी के भावों में भीगना चाहता है
तमन्नाओं की बढती अमरबेल तो देखो
साजन से तुमको प्रियतम बनाना चाहता है
अपनी नाकाम सी कोशिशों को
मोहब्बत का इक मुकाम देना चाहता है
साजन में छुपे प्रेमी की
परछाईं को पकड़ना चाहता है
तुम्हारी हर अदा में साजन
प्रेमी सा तसव्वुर चाहता है
ये प्रेम की अतल गहराइयों में डूबा मन
सूखे फूलों से खुशबू को पाना चाहता है
हाय ! ये प्रेम में बावरा मन
अनहोनी को होनी में बदलना चाहता है
आकाश को पाना चाहता है
जिस राह की कोई मंजिल नही
उस राह को तकना चाहता है
प्रणय बंधन में बँधे मनों को
प्रेम का नव अर्थ देना चाहता है
नामुमकिन सी तमन्ना को
आइना बनाना चाहता है
प्रणय बंधन में जकड़ी बेडी को
प्रेम की हथकड़ी लगाना चाहता है
तुमसे ही हर चाहत का अब
सिला पाना चाहता है
ह्रदय की कुँवारी इच्छाओं को
तुमसे ही मनवाना चाहता है
ह्रदय में उठते ज्वारों की
ख़ामोशी को सुनाना चाहता है
प्रेम के हर अधबुने फंदे को
तुमसे ही बुनवाना चाहता है
तन के रिश्ते से कुछ ऊपर उठकर
प्रेमी के भावों में भीगना चाहता है
तमन्नाओं की बढती अमरबेल तो देखो
साजन से तुमको प्रियतम बनाना चाहता है
अपनी नाकाम सी कोशिशों को
मोहब्बत का इक मुकाम देना चाहता है
साजन में छुपे प्रेमी की
परछाईं को पकड़ना चाहता है
तुम्हारी हर अदा में साजन
प्रेमी सा तसव्वुर चाहता है
ये प्रेम की अतल गहराइयों में डूबा मन
सूखे फूलों से खुशबू को पाना चाहता है
हाय ! ये प्रेम में बावरा मन
अनहोनी को होनी में बदलना चाहता है
गुरुवार, 28 जनवरी 2010
मेरे हिस्से का आसमान
शाम के
धुंधलके में
एक टुकड़ा
आसमान
मेरे आँगन
में उतरा
मुझे पुकारा
मेरे हिस्से के
चाँद की
संगमरमरी
दुधिया रौशनी से
मेरे आँगन को
जगमगाया
तारों की
टिमटिमाती
मखमली
चादर पर
सुलाया
और ले गया
स्वप्नों के
जहान में
जहाँ बादलों
का एक टुकड़ा
लहलहाता सा
आया और
मेरे वजूद पर
इन्द्रधनुषी
रंगों सा
छा गया
मेरे स्वप्न को
हकीकत का
ताज पहना गया
मुझे मेरे
वजूद को
सरगम सा
सहला गया
मेरे बिखरे हुए
अहसासों को
महका गया
कुछ इस तरह
टुकड़ों में
बंटे अस्तित्व
को संपूर्ण
बना गया
और फिर
मेरे हिस्से का
आसमान
मुझे मिल गया
धुंधलके में
एक टुकड़ा
आसमान
मेरे आँगन
में उतरा
मुझे पुकारा
मेरे हिस्से के
चाँद की
संगमरमरी
दुधिया रौशनी से
मेरे आँगन को
जगमगाया
तारों की
टिमटिमाती
मखमली
चादर पर
सुलाया
और ले गया
स्वप्नों के
जहान में
जहाँ बादलों
का एक टुकड़ा
लहलहाता सा
आया और
मेरे वजूद पर
इन्द्रधनुषी
रंगों सा
छा गया
मेरे स्वप्न को
हकीकत का
ताज पहना गया
मुझे मेरे
वजूद को
सरगम सा
सहला गया
मेरे बिखरे हुए
अहसासों को
महका गया
कुछ इस तरह
टुकड़ों में
बंटे अस्तित्व
को संपूर्ण
बना गया
और फिर
मेरे हिस्से का
आसमान
मुझे मिल गया
रविवार, 24 जनवरी 2010
प्यार , प्यार होता है -----------शरीरी नही होता
प्यार , प्यार होता है
शरीरी नही होता
क्यूँ प्यार का
एक ही अर्थ
लगाती है दुनिया
प्यार बहन से, माँ से,
पत्नी से , प्रेमिका से ,
बेटे से , बेटी से
भी होता है
मगर प्यार, प्यार होता है
शरीरी नही होता
प्यार में
रिश्ते के नाम की
पट्टी हो
ये जरूरी तो नही
उसका अर्थ तो
एक ही होता है
भावनाओं की दिशा
तो वो ही है
फिर प्यार शब्द से
क्यूँ डरती है दुनिया
क्यूँ तोहमतों के बाज़ार
लगा देती है दुनिया
प्यार तो प्यार होता है
शरीरी नही होता
क्यूँ वासना के तराजू में
तोलती है दुनिया
क्यूँ अश्लीलता के पैबंद
लगाती है दुनिया
प्यार तो प्यार होता है
शरीरी नही होता
प्यार तो इबादत होता है
क्यूँ व्यापार बना देती है दुनिया
क्यूँ प्यार शब्द के
उच्चारण से ही
बबाल मचा देती है दुनिया
प्यार तो प्यार होता है
शरीरी नही होता
प्यार मीरा सा भी होता है
प्यार राधा सा भी होता है
प्यार सुदामा सा भी होता है
प्यार उद्धव सा भी होता है
प्यार यशोदा सा भी होता है
प्यार शबरी सा भी होता है
फिर क्यूँ प्यार को
हवस की वेदी पर
चढ़ा देती है दुनिया
प्यार तो प्यार होता है
शरीरी नही होता
क्यूँ इतनी सी बात
ना समझ पाती है दुनिया
शरीरी नही होता
क्यूँ प्यार का
एक ही अर्थ
लगाती है दुनिया
प्यार बहन से, माँ से,
पत्नी से , प्रेमिका से ,
बेटे से , बेटी से
भी होता है
मगर प्यार, प्यार होता है
शरीरी नही होता
प्यार में
रिश्ते के नाम की
पट्टी हो
ये जरूरी तो नही
उसका अर्थ तो
एक ही होता है
भावनाओं की दिशा
तो वो ही है
फिर प्यार शब्द से
क्यूँ डरती है दुनिया
क्यूँ तोहमतों के बाज़ार
लगा देती है दुनिया
प्यार तो प्यार होता है
शरीरी नही होता
क्यूँ वासना के तराजू में
तोलती है दुनिया
क्यूँ अश्लीलता के पैबंद
लगाती है दुनिया
प्यार तो प्यार होता है
शरीरी नही होता
प्यार तो इबादत होता है
क्यूँ व्यापार बना देती है दुनिया
क्यूँ प्यार शब्द के
उच्चारण से ही
बबाल मचा देती है दुनिया
प्यार तो प्यार होता है
शरीरी नही होता
प्यार मीरा सा भी होता है
प्यार राधा सा भी होता है
प्यार सुदामा सा भी होता है
प्यार उद्धव सा भी होता है
प्यार यशोदा सा भी होता है
प्यार शबरी सा भी होता है
फिर क्यूँ प्यार को
हवस की वेदी पर
चढ़ा देती है दुनिया
प्यार तो प्यार होता है
शरीरी नही होता
क्यूँ इतनी सी बात
ना समझ पाती है दुनिया
रविवार, 17 जनवरी 2010
ज़रा सोचिये ----------ऐसा आखिर कब तक ?
लो फिर
एक ख्वाहिश
का जनम हो गया
एक बच्चे के
जनम के साथ
फिर से उसे
अपनी जड़
सोच के साथ
दुलारा जायेगा
अपने अरमानो को
उसकी देह पर
संवारा जायेगा
इक मिटटी का
पुतला समझ
निखारा जायेगा
उसकी इच्छाओं का
गला घोंट
फिर से उसे
मारा जायेगा
अपने सपनो को
पाने की चाहत में
अपने स्वाभिमान
की खातिर
दोजख की आग में
खरा सोना
बनाने के लिए
तपाया जायेगा
उसकी भावनाओं को
अपने अहम् की
तुष्टि के लिए
कुचला जायेगा
सिर्फ अपनी
इक कुंठित कमजोरी
को छुपाने के लिए
और अपनी
महत्तवाकांक्षाओं को
पाने के लिए
एक बार फिर
अपने ही लहू से
हाथों को धोया जायेगा
ऐसा आखिर कब तक होगा?
युग सृष्टा हो , क्यूँ
युग मारक बनते जाते हो
अधखिले फूलों को क्यूँ
अपनी आकांक्षाओं की
बलि चढाते हो
जागो , जागो
मत अपने ही हाथो
भविष्य को
मटियामेट करो
दिल के टुकड़ों का
मत अपने ही हाथों
क़त्ल करो
जागो , मेरे प्यारो
अब तो जागो
ये रचना मैंने उन सब मासूमों को समर्पित की है जो अपने माता पिता की आकांक्षाओं की बलि चढ़ गए । वो भी जीना चाहते थे मगर अपने माँ बाप की इच्छा के आगे अपनी इच्छाओं की जिन्होंने बलि चढ़ा दी और जब उनकी इच्छाओं पर खरे नही उतर सके तो अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली ताकि उनके माता पिता को समाज के आगे शर्मिंदा ना होना पड़े ...........कई दिनों से ये समाचार मन को उद्वेलित किये हुए थे कि पढाई के बोझ के कारण बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं मगर नही बोझ पढाई का कहाँ है ? बोझ तो आज इंसान की महत्त्वाकांक्षाएं बन गयी हैं जिनकी खातिर हम अपने ही बच्चों को मौत के मुँह में झोंक रहे हैं। एक छोटा सा प्रयास है सोये हुओं को जगाने का ।
एक ख्वाहिश
का जनम हो गया
एक बच्चे के
जनम के साथ
फिर से उसे
अपनी जड़
सोच के साथ
दुलारा जायेगा
अपने अरमानो को
उसकी देह पर
संवारा जायेगा
इक मिटटी का
पुतला समझ
निखारा जायेगा
उसकी इच्छाओं का
गला घोंट
फिर से उसे
मारा जायेगा
अपने सपनो को
पाने की चाहत में
अपने स्वाभिमान
की खातिर
दोजख की आग में
खरा सोना
बनाने के लिए
तपाया जायेगा
उसकी भावनाओं को
अपने अहम् की
तुष्टि के लिए
कुचला जायेगा
सिर्फ अपनी
इक कुंठित कमजोरी
को छुपाने के लिए
और अपनी
महत्तवाकांक्षाओं को
पाने के लिए
एक बार फिर
अपने ही लहू से
हाथों को धोया जायेगा
ऐसा आखिर कब तक होगा?
युग सृष्टा हो , क्यूँ
युग मारक बनते जाते हो
अधखिले फूलों को क्यूँ
अपनी आकांक्षाओं की
बलि चढाते हो
जागो , जागो
मत अपने ही हाथो
भविष्य को
मटियामेट करो
दिल के टुकड़ों का
मत अपने ही हाथों
क़त्ल करो
जागो , मेरे प्यारो
अब तो जागो
ये रचना मैंने उन सब मासूमों को समर्पित की है जो अपने माता पिता की आकांक्षाओं की बलि चढ़ गए । वो भी जीना चाहते थे मगर अपने माँ बाप की इच्छा के आगे अपनी इच्छाओं की जिन्होंने बलि चढ़ा दी और जब उनकी इच्छाओं पर खरे नही उतर सके तो अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली ताकि उनके माता पिता को समाज के आगे शर्मिंदा ना होना पड़े ...........कई दिनों से ये समाचार मन को उद्वेलित किये हुए थे कि पढाई के बोझ के कारण बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं मगर नही बोझ पढाई का कहाँ है ? बोझ तो आज इंसान की महत्त्वाकांक्षाएं बन गयी हैं जिनकी खातिर हम अपने ही बच्चों को मौत के मुँह में झोंक रहे हैं। एक छोटा सा प्रयास है सोये हुओं को जगाने का ।
बुधवार, 13 जनवरी 2010
मिलन को आतुर पंछी
आ
ख्यालों की गुफ्तगू
तुझे सुनाऊँ
एक वादे की
शाख पर ठहरी
मोहब्बत तुझे दिखाऊँ
हुस्न और इश्क की
बेपनाह मोहब्बत के
नगमे तुझे सुनाऊँ
हुस्न : इश्क , क्या तुमने कल चाँद देखा ?
मैंने उसमें तुम्हें देखा
इश्क : हाँ , कोशिश की
लेकिन मुझे सिर्फ तुम दिखीं
चाँद कहीं नही
हुस्न : आसमान पर लिखी तहरीर देखी
इश्क : नहीं , तेरी तस्वीर देखी
हुस्न : क्या मेरी आवाज़ तुम तक पहुँचती है ?
इश्क : मैं तो सिर्फ तुम्हें ही सुनता हूँ
क्या कोई और भी आवाज़ होती है ?
हुस्न : मिलन संभव नही
इश्क : जुदा कब थे
हुस्न : मैं अमानत किसी और की
तू ख्याल किसी और का
इश्क : या खुदा
तू मोहब्बत कराता क्यूँ है ?
मोहब्बत करा कर
हुस्न-ओ-इश्क को फिर
मिलवाता क्यूँ नही है ?
इश्क के बोलों ने
हुस्न को सिसका दिया
हिमाच्छादित दिल की
बर्फ को भी पिघला दिया
इश्क के बोलो के
दहकते अंगारों पर
तड़पते हुस्न का
जवाब आया
तेरी मेरी मोहब्बत का अंजाम
खुदा भी लिखना भूल गया
वक़्त की दीवार पर
तुझे इश्क और
मुझे हुस्न का
लबादा ओढा गया
हमें वक़्त की
जलती सलीब पर
लटका गया
और शायद इसीलिए
तुझे भी वक़्त की
सलाखों से बाँध दिया
मुझे भी किसी के
शीशमहल का
बुत बना दिया
तेरी मोहब्बत की तपिश
नैनो से मेरे बरसती है
तेरे करुण क्रंदन के
झंझावात में
मर्यादा मेरी तड़पती है
प्रेमसिन्धु की अलंकृत तरंगें
बिछोह की लहर में कसकती हैं
हिमशिखरों से टकराती
अंतर्मन की पीड़ा
प्रतिध्वनित हो जाती है
जब जब तेरे छालों से
लहू रिसता है
देह की खोल में लिपटी
रूहों के यज्ञ की पूर्णाहूति
कब खुदा ने की है ?
हुस्न की समिधा पर
इश्क के घृत की आहुति
कब पूर्णाहूति बन पाई है
फिर कहो, कब और कैसे
मिलन को परिणति
मिल पायेगी
हुस्न - ओ - इश्क
खुदाई फरमान
और बेबसी के
मकडजाल में जकड़े
रूह के फंद से
आज़ाद होने को
तड़फते हैं
इस जनम की
उधार को
अगले जनम में
चुकायेंगे
ऐसा वादा करते हैं
प्रेम के सोमरस को
अगले जनम की
थाती बना
हुस्न और इश्क ने
विदा ले ली
रूह के बंधनों से
आज़ाद हो
अगले जनम की प्रतीक्षा में
मिलन को आतुर पंछी
अनंत में विलीन हो गए
ख्यालों की गुफ्तगू
तुझे सुनाऊँ
एक वादे की
शाख पर ठहरी
मोहब्बत तुझे दिखाऊँ
हुस्न और इश्क की
बेपनाह मोहब्बत के
नगमे तुझे सुनाऊँ
हुस्न : इश्क , क्या तुमने कल चाँद देखा ?
मैंने उसमें तुम्हें देखा
इश्क : हाँ , कोशिश की
लेकिन मुझे सिर्फ तुम दिखीं
चाँद कहीं नही
हुस्न : आसमान पर लिखी तहरीर देखी
इश्क : नहीं , तेरी तस्वीर देखी
हुस्न : क्या मेरी आवाज़ तुम तक पहुँचती है ?
इश्क : मैं तो सिर्फ तुम्हें ही सुनता हूँ
क्या कोई और भी आवाज़ होती है ?
हुस्न : मिलन संभव नही
इश्क : जुदा कब थे
हुस्न : मैं अमानत किसी और की
तू ख्याल किसी और का
इश्क : या खुदा
तू मोहब्बत कराता क्यूँ है ?
मोहब्बत करा कर
हुस्न-ओ-इश्क को फिर
मिलवाता क्यूँ नही है ?
इश्क के बोलों ने
हुस्न को सिसका दिया
हिमाच्छादित दिल की
बर्फ को भी पिघला दिया
इश्क के बोलो के
दहकते अंगारों पर
तड़पते हुस्न का
जवाब आया
तेरी मेरी मोहब्बत का अंजाम
खुदा भी लिखना भूल गया
वक़्त की दीवार पर
तुझे इश्क और
मुझे हुस्न का
लबादा ओढा गया
हमें वक़्त की
जलती सलीब पर
लटका गया
और शायद इसीलिए
तुझे भी वक़्त की
सलाखों से बाँध दिया
मुझे भी किसी के
शीशमहल का
बुत बना दिया
तेरी मोहब्बत की तपिश
नैनो से मेरे बरसती है
तेरे करुण क्रंदन के
झंझावात में
मर्यादा मेरी तड़पती है
प्रेमसिन्धु की अलंकृत तरंगें
बिछोह की लहर में कसकती हैं
हिमशिखरों से टकराती
अंतर्मन की पीड़ा
प्रतिध्वनित हो जाती है
जब जब तेरे छालों से
लहू रिसता है
देह की खोल में लिपटी
रूहों के यज्ञ की पूर्णाहूति
कब खुदा ने की है ?
हुस्न की समिधा पर
इश्क के घृत की आहुति
कब पूर्णाहूति बन पाई है
फिर कहो, कब और कैसे
मिलन को परिणति
मिल पायेगी
हुस्न - ओ - इश्क
खुदाई फरमान
और बेबसी के
मकडजाल में जकड़े
रूह के फंद से
आज़ाद होने को
तड़फते हैं
इस जनम की
उधार को
अगले जनम में
चुकायेंगे
ऐसा वादा करते हैं
प्रेम के सोमरस को
अगले जनम की
थाती बना
हुस्न और इश्क ने
विदा ले ली
रूह के बंधनों से
आज़ाद हो
अगले जनम की प्रतीक्षा में
मिलन को आतुर पंछी
अनंत में विलीन हो गए
सोमवार, 11 जनवरी 2010
यादों के लांछन -----------किस- किस पर ?
याद करते हो तुम
अपने प्रेमी को
फिर क्यूँ लांछन
हम पर लगाते हो
हम बेजुबान
तुम्हारे लांछनों का
जवाब नही दे सकते
किसी की याद में
जी तुम जलाते हो
मगर दोष हमारा
इसमें क्या है
क्या हमने तुम्हें
ये दर्द दिया
क्या प्रेम का कभी
कोई उपदेश दिया
फिर भी बार- बार
शब्द यही दोहराते हो
ए चाँद ! तू तो
अपनी चाँदनी के साथ है
आ- आकर क्यूँ
जलाता है
अरे मैं तो खुद
अपनी चाँदनी को
ढूँढता हूँ
मैं क्या तुम्हें जलाऊंगा
मैं तो खुद घायल हूँ
कभी तुम हम पर
दाग लगाते हो
हम फूलों को भी
ना बख्श पाते हो
कभी हमें सहलाते हो
तो कभी
बेदर्दी से मसल देते हो
अब इसमें हमारा
गुनाह क्या है
प्रेम तुमने किया
दर्द तुमने लिया
और मसल हमें दिया
कभी हमारे अंतस में
झाँको तो सही
काँटों के बिस्तर पर
ज़िन्दगी गुजारने वाले
क्या किसी को
घाव दे पाएँगे?
मेरा तो कोई दोष नही
प्रेमियों के मिलन की
साक्षी बनाया जाता है
और कभी मुझे ही
दुत्कारा जाता है
यादों में तुम अपनी
कभी अपना वजूद
मुझमें छुपाना चाहते हो
और कभी
मेरे अंधियारे को ही
दाग बताते हो
हाँ , रात हूँ मैं
दर्द का लम्हा हो
या ख़ुशी का
मुझे तो सब
सहना होता है
फिर कैसे मैं
किसी की यादों में
काँटा बन सकती हूँ
यादों के लांछन लगाने वालों
यादों को याद ही रहने दो
तुम्हारी यादों के साक्षी हम
यादों को याद दिलाया करेंगे
जो समृति में कभी
भटक जाओगे तब
हम ही यादों को
यादों में सँवारा करेंगे
क्यूँ हम पर इलज़ाम लगाते हो
क्यूँ हम पर ...............
अपने प्रेमी को
फिर क्यूँ लांछन
हम पर लगाते हो
हम बेजुबान
तुम्हारे लांछनों का
जवाब नही दे सकते
किसी की याद में
जी तुम जलाते हो
मगर दोष हमारा
इसमें क्या है
क्या हमने तुम्हें
ये दर्द दिया
क्या प्रेम का कभी
कोई उपदेश दिया
फिर भी बार- बार
शब्द यही दोहराते हो
ए चाँद ! तू तो
अपनी चाँदनी के साथ है
आ- आकर क्यूँ
जलाता है
अरे मैं तो खुद
अपनी चाँदनी को
ढूँढता हूँ
मैं क्या तुम्हें जलाऊंगा
मैं तो खुद घायल हूँ
कभी तुम हम पर
दाग लगाते हो
हम फूलों को भी
ना बख्श पाते हो
कभी हमें सहलाते हो
तो कभी
बेदर्दी से मसल देते हो
अब इसमें हमारा
गुनाह क्या है
प्रेम तुमने किया
दर्द तुमने लिया
और मसल हमें दिया
कभी हमारे अंतस में
झाँको तो सही
काँटों के बिस्तर पर
ज़िन्दगी गुजारने वाले
क्या किसी को
घाव दे पाएँगे?
मेरा तो कोई दोष नही
प्रेमियों के मिलन की
साक्षी बनाया जाता है
और कभी मुझे ही
दुत्कारा जाता है
यादों में तुम अपनी
कभी अपना वजूद
मुझमें छुपाना चाहते हो
और कभी
मेरे अंधियारे को ही
दाग बताते हो
हाँ , रात हूँ मैं
दर्द का लम्हा हो
या ख़ुशी का
मुझे तो सब
सहना होता है
फिर कैसे मैं
किसी की यादों में
काँटा बन सकती हूँ
यादों के लांछन लगाने वालों
यादों को याद ही रहने दो
तुम्हारी यादों के साक्षी हम
यादों को याद दिलाया करेंगे
जो समृति में कभी
भटक जाओगे तब
हम ही यादों को
यादों में सँवारा करेंगे
क्यूँ हम पर इलज़ाम लगाते हो
क्यूँ हम पर ...............
शनिवार, 9 जनवरी 2010
दोबारा कैसे जियूँ
तारीख
कैसे याद रखूँ
हर तारीख
इक कहानी है
कभी गम है
कभी ख़ुशी है
तारीख की बेड़ियों से
यादों का अंकुर
जो फूटा
कभी तारीख में
कराहता इंतज़ार मिला
तो कभी इम्तिहान
कभी दर्द का
सैलाब मिला
तो कभी
भावनाओं का तूफ़ान
कहीं खुशियों की
सौगात मिली
तो कहीं जुगनू से
चमकते पलों का हिसाब
मगर फिर भी
तारीख कैसे याद रखूँ
हर लम्हे को
दोबारा कैसे जियूँ
कैसे याद रखूँ
हर तारीख
इक कहानी है
कभी गम है
कभी ख़ुशी है
तारीख की बेड़ियों से
यादों का अंकुर
जो फूटा
कभी तारीख में
कराहता इंतज़ार मिला
तो कभी इम्तिहान
कभी दर्द का
सैलाब मिला
तो कभी
भावनाओं का तूफ़ान
कहीं खुशियों की
सौगात मिली
तो कहीं जुगनू से
चमकते पलों का हिसाब
मगर फिर भी
तारीख कैसे याद रखूँ
हर लम्हे को
दोबारा कैसे जियूँ
रविवार, 3 जनवरी 2010
मैंने तो जीना कब का छोड़ दिया है
मैंने तो जीना कब का
छोड़ दिया है
एक निर्जीव , स्पन्दनहीन
जीवन जी रही थी
फिर तुम ठहरे हुए
पानी में क्यूँ
उम्मीदों के
कंकड़ फेंकते हो
क्यूँ अपेक्षाओं के
बीज बोते हो
संवेदनाओं के बेल -बूटे
सब सूख चुके हैं
जानते हो , मुझे पता है
तुम कभी
खरे नही उतर पाओगे
मेरे सपने ना कभी
समेट पाओगे
मेरे पंखों को उड़ान
ना दे पाओगे
मुझमें आशा का संचार
ना कभी कर पाओगे
मुझे मेरे तिमिर में
अकेला छोड़ दो
अब नही जीना
आशाओं का दामन थाम
मैं खुश हूँ
अपने आशाविहीन
जीवन के साथ
पथ आलोकित है मेरा
मेरे दृढ निश्चय के साथ
जाओ , तुम भी अपना
पथ आलोकित करना
मुझमें ना अपना
संसार ढूंढना
मैंने तो जीना
कब का छोड़ दिया है
छोड़ दिया है
एक निर्जीव , स्पन्दनहीन
जीवन जी रही थी
फिर तुम ठहरे हुए
पानी में क्यूँ
उम्मीदों के
कंकड़ फेंकते हो
क्यूँ अपेक्षाओं के
बीज बोते हो
संवेदनाओं के बेल -बूटे
सब सूख चुके हैं
जानते हो , मुझे पता है
तुम कभी
खरे नही उतर पाओगे
मेरे सपने ना कभी
समेट पाओगे
मेरे पंखों को उड़ान
ना दे पाओगे
मुझमें आशा का संचार
ना कभी कर पाओगे
मुझे मेरे तिमिर में
अकेला छोड़ दो
अब नही जीना
आशाओं का दामन थाम
मैं खुश हूँ
अपने आशाविहीन
जीवन के साथ
पथ आलोकित है मेरा
मेरे दृढ निश्चय के साथ
जाओ , तुम भी अपना
पथ आलोकित करना
मुझमें ना अपना
संसार ढूंढना
मैंने तो जीना
कब का छोड़ दिया है
मंगलवार, 29 दिसंबर 2009
कैसा होता है वो प्रेम ?
अभी कुछ दिन पहले अमृता और इमरोज जी के बारे में कुछ पढ़ा और वो दिल में उतर गया । तभी कुछ भाव उभरे जिन्हें शब्दों में बाँधने की कोशिश की है --------------
ना वादा किया
ना वादा लिया
मगर फिर भी
साथ चले
ना इंतज़ार किया
ना इंतज़ार लिया
मगर फिर भी
हमेशा साथ रहे
कभी अल्फाज़ की
जरूरत ना रही
दिल ने ही दिल से
मुलाक़ात की
भावों को पढने के लिए
नज़रों ने ही नज़रों से
बात की
जो तुम कह ना सकी
जो मैं कह ना सका
मगर रूह ने रूह से
फिर भी बात की
वादों पर गुजर करने वाले
प्रेमी नही होते
आँख में अश्क जो दे
वो साहिल नही होते
कुछ प्रेम देह के पिंजर से अलग
रूह के अवसान के लिए होते हैं
वादों की खोखली
चादर में लिपटे नही होते
इंतज़ार के पैबंद के
मोहताज़ नही होते
लफ़्ज़ों की बानगी की जहाँ
जरूरत नही होती
प्रेम अभिव्यक्ति का
मोहताज़ नही होता
सिर्फ रूह ही रूह की
सरताज होती है
रूह ही रूह की
माहताब होती है
कैसा होता है वो प्रेम
या
सिर्फ वो ही प्रेम होता है
ना वादा किया
ना वादा लिया
मगर फिर भी
साथ चले
ना इंतज़ार किया
ना इंतज़ार लिया
मगर फिर भी
हमेशा साथ रहे
कभी अल्फाज़ की
जरूरत ना रही
दिल ने ही दिल से
मुलाक़ात की
भावों को पढने के लिए
नज़रों ने ही नज़रों से
बात की
जो तुम कह ना सकी
जो मैं कह ना सका
मगर रूह ने रूह से
फिर भी बात की
वादों पर गुजर करने वाले
प्रेमी नही होते
आँख में अश्क जो दे
वो साहिल नही होते
कुछ प्रेम देह के पिंजर से अलग
रूह के अवसान के लिए होते हैं
वादों की खोखली
चादर में लिपटे नही होते
इंतज़ार के पैबंद के
मोहताज़ नही होते
लफ़्ज़ों की बानगी की जहाँ
जरूरत नही होती
प्रेम अभिव्यक्ति का
मोहताज़ नही होता
सिर्फ रूह ही रूह की
सरताज होती है
रूह ही रूह की
माहताब होती है
कैसा होता है वो प्रेम
या
सिर्फ वो ही प्रेम होता है
बुधवार, 23 दिसंबर 2009
उसने पुकारा मुझको
कल का दिन
मेरी ज़िन्दगी का
वो दिन था
जब मैं ज़िन्दगी के
करीब था
वो
जिससे मैंने मिलना चाहा
इक नज़र देखना चाहा
लाखों पैगाम भेजे
मिन्नतें की
सदके किये
मगर ये सोच
पत्थर भी कभी
पिघले हैं
खामोश हो जाता था
और अपनी
मोहब्बत से मजबूर हो
बार - बार
आवाज़ दिए जाता था
मगर उस दर पर
कभी मेरी
ना फरियाद कबूल हुई
ना ही कोई
जवाब आया
मगर ना जाने
ये मोहब्बत की
कशिश थी
या मेरी
दुआओं का असर
कल मेरी मोहब्बत ने
पुकारा मुझको
आवाज़ दी
हिमखंड शायद
पिघल रहा था
लम्हा वहीँ ठहर गया
शब्द वहीँ रुक गए
जुबान खामोश हो गयी
धडकनों की धड़कन भी
थम सी गयी
मेरे पंखों को
परवाज़ मिल गयी थी
मेरे गीतों को
आवाज़ मिल गयी थी
होशो- हवास ना जाने
किन फिजाओं में
तैर रहे थे
ख्वाबों को भी शायद
पंख मिल रहे थे
तन- मन झंकृत
हो रहा था
बिना साज के सुर
सज रहे थे
गीतों की बयार
बहने लगी थी
मैं कल्पनाओं के
आकाश में
विचर रहा था
तभी उसने फिर पुकारा
तब ख्यालों की
नींद से जागा
यथार्थ के धरातल
पर उतरा
यूँ लगा
किसी दर्द के गहरे
कुएं से आवाज़ आई हो
किस मजबूरी से मजबूर हो
उसने पुकारा मुझे
किस बेबसी से बेबस हो
आवाज़ दी होगी
इस ख्याल ने ही
रूह कंपा दी मेरी
वो जो मिलना तो दूर
बात भी ना करना चाहती हो
वो जो ख्यालों में भी
किसी को ना आने देती हो
वो जो हवाओं के
साये से भी
कतराती हो
वो जो चांदनी से भी
घबराती हो
वो जो गुलों के
खिलने से भी
शरमा जाती हो
ना जाने किस
भावना के वशीभूत हो
उसने पुकारा मुझे
उसके दर्द की
थाह कैसे पाउँगा
किन शब्दों का
मरहम लगाऊँगा
कैसे उसकी सर्द आवाज़ में
ठहरे दर्द के सागर को
लाँघ पाउँगा
कैसे उसे उसके दर्द से
जुदा कर पाउँगा
कैसे उसके जीवन के
गरल को सुधा सागर में
बदल पाउँगा
कहाँ से वो दामन लाऊँ
जहाँ मिलन की
ख़ुशी को सहेजूँ
या
उसके दर्द की
इम्तिहान देखूँ
किस दामन में
उसकी बेबसी के
दर्द की
मिटटी को समेटूँ
मेरी ज़िन्दगी का
वो दिन था
जब मैं ज़िन्दगी के
करीब था
वो
जिससे मैंने मिलना चाहा
इक नज़र देखना चाहा
लाखों पैगाम भेजे
मिन्नतें की
सदके किये
मगर ये सोच
पत्थर भी कभी
पिघले हैं
खामोश हो जाता था
और अपनी
मोहब्बत से मजबूर हो
बार - बार
आवाज़ दिए जाता था
मगर उस दर पर
कभी मेरी
ना फरियाद कबूल हुई
ना ही कोई
जवाब आया
मगर ना जाने
ये मोहब्बत की
कशिश थी
या मेरी
दुआओं का असर
कल मेरी मोहब्बत ने
पुकारा मुझको
आवाज़ दी
हिमखंड शायद
पिघल रहा था
लम्हा वहीँ ठहर गया
शब्द वहीँ रुक गए
जुबान खामोश हो गयी
धडकनों की धड़कन भी
थम सी गयी
मेरे पंखों को
परवाज़ मिल गयी थी
मेरे गीतों को
आवाज़ मिल गयी थी
होशो- हवास ना जाने
किन फिजाओं में
तैर रहे थे
ख्वाबों को भी शायद
पंख मिल रहे थे
तन- मन झंकृत
हो रहा था
बिना साज के सुर
सज रहे थे
गीतों की बयार
बहने लगी थी
मैं कल्पनाओं के
आकाश में
विचर रहा था
तभी उसने फिर पुकारा
तब ख्यालों की
नींद से जागा
यथार्थ के धरातल
पर उतरा
यूँ लगा
किसी दर्द के गहरे
कुएं से आवाज़ आई हो
किस मजबूरी से मजबूर हो
उसने पुकारा मुझे
किस बेबसी से बेबस हो
आवाज़ दी होगी
इस ख्याल ने ही
रूह कंपा दी मेरी
वो जो मिलना तो दूर
बात भी ना करना चाहती हो
वो जो ख्यालों में भी
किसी को ना आने देती हो
वो जो हवाओं के
साये से भी
कतराती हो
वो जो चांदनी से भी
घबराती हो
वो जो गुलों के
खिलने से भी
शरमा जाती हो
ना जाने किस
भावना के वशीभूत हो
उसने पुकारा मुझे
उसके दर्द की
थाह कैसे पाउँगा
किन शब्दों का
मरहम लगाऊँगा
कैसे उसकी सर्द आवाज़ में
ठहरे दर्द के सागर को
लाँघ पाउँगा
कैसे उसे उसके दर्द से
जुदा कर पाउँगा
कैसे उसके जीवन के
गरल को सुधा सागर में
बदल पाउँगा
कहाँ से वो दामन लाऊँ
जहाँ मिलन की
ख़ुशी को सहेजूँ
या
उसके दर्द की
इम्तिहान देखूँ
किस दामन में
उसकी बेबसी के
दर्द की
मिटटी को समेटूँ
सोमवार, 21 दिसंबर 2009
एक कोशिश
कुछ परवाजों को पंख नही मिला करते
कुछ दरख्तों पर फूल नही खिला करते
अब तो कलमों की स्याही भी सूख चुकी है
कोई मेरे आंसुओं को पिए ----तो क्यूँ?
कोई मेरे ज़ख्मों को सिंए ----तो क्यूँ ?
यादों का उधड़ना अभी बाकी है
लबों पर जो हमने, ख़ामोशी का कफ़न ओढ़ लिया
तो दर्द मेरा, क्यूँ तेरे चेहरे पर उतर आया है
क्या चाहत का कोई क़र्ज़ अब भी बाकी है
कुछ दरख्तों पर फूल नही खिला करते
अब तो कलमों की स्याही भी सूख चुकी है
कोई मेरे आंसुओं को पिए ----तो क्यूँ?
कोई मेरे ज़ख्मों को सिंए ----तो क्यूँ ?
यादों का उधड़ना अभी बाकी है
लबों पर जो हमने, ख़ामोशी का कफ़न ओढ़ लिया
तो दर्द मेरा, क्यूँ तेरे चेहरे पर उतर आया है
क्या चाहत का कोई क़र्ज़ अब भी बाकी है
शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009
कहाँ सजाऊँ इसे
तेरे रूप के सागर में
उछलती -मचलती
लहरों सी
चंचल चितवन
जब तिरछी होकर
नयन बाण चलाती है
ह्रदय बिंध- बिंध जाता है
धडकनें सुरों के सागर पर
प्रेम राग बरसाती हैं
केशों का बादल
जब लहराता है
सावन के कजरारे
मेघ छा जाते हैं
अधरों की अठखेलियाँ
कमल पर ठहरी ओस -सी
बहका- बहका जाती हैं
क़दमों की हरकत पर तो
मौसम भी थिरक जाते हैं
ऋतुओं के रंग भी
बदल- बदल जाते हैं
रूप- लावण्य की
अप्रतिम राशि पर तो
चांदनी भी शरमा जाती है
फिर कैसे धीरज
रख पाया होगा
तुझे रचकर विधाता
कुछ पल ठिठक गया होगा
और सोच रहा होगा
लय और ताल के बीच
किसके सुरों में सजाऊँ इसे
किस शिल्पकार की
कृति बनाऊँ इसे
किस अनूठे संसार में
बसाऊँ इसे
किसके ह्रदय आँगन में
सजाऊँ इसे
किस भोर की उजास
बनाऊँ इसे
किस श्याम की राधा
बनाऊँ इसे
उछलती -मचलती
लहरों सी
चंचल चितवन
जब तिरछी होकर
नयन बाण चलाती है
ह्रदय बिंध- बिंध जाता है
धडकनें सुरों के सागर पर
प्रेम राग बरसाती हैं
केशों का बादल
जब लहराता है
सावन के कजरारे
मेघ छा जाते हैं
अधरों की अठखेलियाँ
कमल पर ठहरी ओस -सी
बहका- बहका जाती हैं
क़दमों की हरकत पर तो
मौसम भी थिरक जाते हैं
ऋतुओं के रंग भी
बदल- बदल जाते हैं
रूप- लावण्य की
अप्रतिम राशि पर तो
चांदनी भी शरमा जाती है
फिर कैसे धीरज
रख पाया होगा
तुझे रचकर विधाता
कुछ पल ठिठक गया होगा
और सोच रहा होगा
लय और ताल के बीच
किसके सुरों में सजाऊँ इसे
किस शिल्पकार की
कृति बनाऊँ इसे
किस अनूठे संसार में
बसाऊँ इसे
किसके ह्रदय आँगन में
सजाऊँ इसे
किस भोर की उजास
बनाऊँ इसे
किस श्याम की राधा
बनाऊँ इसे
मंगलवार, 15 दिसंबर 2009
प्रेम को साकार बना दें ...........१०० वी पोस्ट
दोस्तों ,
आज ज़िन्दगी पर १०० वी पोस्ट डाल रही हूँ । उम्मीद करती हूँ हमेशा की तरह इसे भी आप सबका स्नेह प्राप्त होगा।
इक उम्र
इंतज़ार किया तेरा
तुम अपने जीवन की
हलचलों में गुम थे
मैं अपनी ज़िन्दगी की
खानाबदोशी में खुश थी
मगर फिर भी
इक प्यास थी
किसी की चाहत थी
एक आस थी
एक विश्वास था
कोई न कोई
तो होगा
जो मेरा होगा
या किसी की
रूह की तस्वीर
मैं होऊँगी
देह का जीवन तो
जी चुकी थी
रूह का जीवन
अभी सूना था
न जाने किस
इंतज़ार में.........
ज़िन्दगी यूँ ही
गुजरती रही
और उम्र यूँ ही
बढती रही
आज जब सोच
कुंद हो चुकी है
मानस क्षुब्ध
हो चुका है
चाहत सब
भस्म हो चुकी है
उम्र का आखिरी
पड़ाव आ चुका है
उस पड़ाव पर
तुम मिले हो मुझे
मेरा इंतज़ार करते हुए
जन्मों से खोज रहे थे
मिलन की बाट जोह रहे थे
विरह- व्यथा का दावानल
जो अंतस में जला था
आओ चिर- प्रतीक्षित
उर- ज्वाला को
भावों की चांदनी में
नहला दें
तुम्हारे चेहरे की लकीरों में
छुपे वियोग के दर्द को
कुछ चाहत का मरहम लगा दूँ
जन्मों से तेरी नज़रों में
ठहरे पतझड़ को
अपनी नज़रों के नेह से
वासंतिक बना दूँ
अधरों पर पसरे मौन को
शब्दों का जामा पहना दूँ
अब मत पढो
चेहरे को
तुम्हारा ही अक्स
नज़र आएगा
तुम और मैं
दो थे ही कब
वक्त का ही
तो परदा था
जो इंतज़ार का दर्द
तूने सहा
वो क्या मुझसे
जुदा था
आओ , आज मिलन
को साकार बना दें
जन्मों से बिछड़े
प्रेम को साकार बना दें
दोनों के अव्यक्त प्रेम को
प्रेम का प्रतिबिम्ब बना
चिरनिद्रा में सो जाएँ
रूह का रूह से
मिलन करा दें
आओ , प्रेम को
साकार बना दें
आज ज़िन्दगी पर १०० वी पोस्ट डाल रही हूँ । उम्मीद करती हूँ हमेशा की तरह इसे भी आप सबका स्नेह प्राप्त होगा।
इक उम्र
इंतज़ार किया तेरा
तुम अपने जीवन की
हलचलों में गुम थे
मैं अपनी ज़िन्दगी की
खानाबदोशी में खुश थी
मगर फिर भी
इक प्यास थी
किसी की चाहत थी
एक आस थी
एक विश्वास था
कोई न कोई
तो होगा
जो मेरा होगा
या किसी की
रूह की तस्वीर
मैं होऊँगी
देह का जीवन तो
जी चुकी थी
रूह का जीवन
अभी सूना था
न जाने किस
इंतज़ार में.........
ज़िन्दगी यूँ ही
गुजरती रही
और उम्र यूँ ही
बढती रही
आज जब सोच
कुंद हो चुकी है
मानस क्षुब्ध
हो चुका है
चाहत सब
भस्म हो चुकी है
उम्र का आखिरी
पड़ाव आ चुका है
उस पड़ाव पर
तुम मिले हो मुझे
मेरा इंतज़ार करते हुए
जन्मों से खोज रहे थे
मिलन की बाट जोह रहे थे
विरह- व्यथा का दावानल
जो अंतस में जला था
आओ चिर- प्रतीक्षित
उर- ज्वाला को
भावों की चांदनी में
नहला दें
तुम्हारे चेहरे की लकीरों में
छुपे वियोग के दर्द को
कुछ चाहत का मरहम लगा दूँ
जन्मों से तेरी नज़रों में
ठहरे पतझड़ को
अपनी नज़रों के नेह से
वासंतिक बना दूँ
अधरों पर पसरे मौन को
शब्दों का जामा पहना दूँ
अब मत पढो
चेहरे को
तुम्हारा ही अक्स
नज़र आएगा
तुम और मैं
दो थे ही कब
वक्त का ही
तो परदा था
जो इंतज़ार का दर्द
तूने सहा
वो क्या मुझसे
जुदा था
आओ , आज मिलन
को साकार बना दें
जन्मों से बिछड़े
प्रेम को साकार बना दें
दोनों के अव्यक्त प्रेम को
प्रेम का प्रतिबिम्ब बना
चिरनिद्रा में सो जाएँ
रूह का रूह से
मिलन करा दें
आओ , प्रेम को
साकार बना दें
शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009
मैं नहीं आने वाली
अब मुझे
मत पुकारना
ना देना आवाज़
मैं नही आने वाली
लम्हा - लम्हा
युग बना
तेरा इंतज़ार
करते- करते
और युग
बीतते- बीतते
जन्म बदल गए
जन्मों के बिछड़े हैं
जन्मों तक
बिछड़ते ही रहेंगे
अब तेरे प्रेम की
चाह में ना तडपेंगे
ना तुझे आवाज़ देंगे
ना तेरे दीदार को तरसेंगे
जन्मों की प्यास को
अब और बढ़ाना होगा
तुझे मुझसे
मिलने से पहले
ख़ुद को भी
इसी आग में
अब जलाना होगा
एक बार फिर
जन्मों के इंतज़ार को
अगले कुछ और
जन्मों तक
निभाना होगा
इंतज़ार के लम्हों को
तुझे भी तो जीना होगा
जन्मों की मौत को
तुझे भी तो सहना होगा
कुंदन बनने के लिए
तुझे भी तो तपना होगा
मेरे प्यार के काबिल बनने के लिए
इस आग को सहना होगा
फिर आवाज़ देना मुझे
जब आग का दरिया पार कर लो
फिर आवाज़ देना मुझे
जब ख़ुद को इतना तपा लो
फिर आवाज़ देना मुझे
अपने प्रेम का अहसास करवाना
गर तेरे प्रेम पर
यकीं आया मुझे
तो इक प्रेम परीक्षा देना
गर हो गए अनुत्तीर्ण
फिर ना आवाज़ देना मुझे
मैं नही आने वाली
मत पुकारना
ना देना आवाज़
मैं नही आने वाली
लम्हा - लम्हा
युग बना
तेरा इंतज़ार
करते- करते
और युग
बीतते- बीतते
जन्म बदल गए
जन्मों के बिछड़े हैं
जन्मों तक
बिछड़ते ही रहेंगे
अब तेरे प्रेम की
चाह में ना तडपेंगे
ना तुझे आवाज़ देंगे
ना तेरे दीदार को तरसेंगे
जन्मों की प्यास को
अब और बढ़ाना होगा
तुझे मुझसे
मिलने से पहले
ख़ुद को भी
इसी आग में
अब जलाना होगा
एक बार फिर
जन्मों के इंतज़ार को
अगले कुछ और
जन्मों तक
निभाना होगा
इंतज़ार के लम्हों को
तुझे भी तो जीना होगा
जन्मों की मौत को
तुझे भी तो सहना होगा
कुंदन बनने के लिए
तुझे भी तो तपना होगा
मेरे प्यार के काबिल बनने के लिए
इस आग को सहना होगा
फिर आवाज़ देना मुझे
जब आग का दरिया पार कर लो
फिर आवाज़ देना मुझे
जब ख़ुद को इतना तपा लो
फिर आवाज़ देना मुझे
अपने प्रेम का अहसास करवाना
गर तेरे प्रेम पर
यकीं आया मुझे
तो इक प्रेम परीक्षा देना
गर हो गए अनुत्तीर्ण
फिर ना आवाज़ देना मुझे
मैं नही आने वाली
बुधवार, 9 दिसंबर 2009
आखिरी ख़त
मेरा ये आखिरी ख़त
और ये अन्तिम शब्द
क्या तुम्हें
उद्वेलित कर पाएँगे?
मेरी ह्रदय व्यथा को
क्या ये बयां कर पाएँगे?
गर कर दिया बयाँ
तो क्या तुम
उसे समझ पाओगी?
गठबंधन में बँधे
जब हम तुम
वचन लिया था दोनों ने
इक दूजे को चाहेंगे
साथ न छोड़ेंगे इक पल
फिर कौन सी
मुझसे खता हुई
जिसकी ये सज़ा मिली
क्या प्रेम में मेरे
कोई खोट था
या कोशिशें मेरी
नाकाम रही
तुम्हारी इक -इक अदा पर तो
मेरे दिल-ओ-जान गए
तुम्हारी हर ख्वाहिश को
मैंने अपना बनाया
तेरे लबों के तबस्सुम पर तो
दिल मेरा मचलता था
कौन सी ख्वाहिश ऐसी
जो न पूरी कर पाया मैं
कौन सी ऐसी हसरत थी
जिसे समझ न पाया मैं
फिर भी किस खता की
सज़ा दे चली गई तुम
पल-पल युगों सा बीतता है
और पल -पल में
युगों सी मौत मरा मैं
बाबुल के अँगना जाकर
पिया का दामन भुला दिया
एक चाहने वाले को
खतावार बना दिया
मेरे हर प्रयास को
निराशा का जामा पहना दिया
हर दरवाज़ा तुमने बंद किया
हर आस को तुमने तोड़ दिया
घनघोर निराशा फैली है
अब जीवन बगिया मेरी सूनी है
किस आस के सहारे जियूँ में
किसको अपना कहूँ मैं
तुम बिन जग
सूना लगता है
जीना मौत से
बदतर लगता है
रोज काँटों की
सेज पर सोता हूँ
हर पल तुम्हारे
लिए ही रोता हूँ
अब न रहा वश ख़ुद पर
कोई राह न सूझती है
तुम बिन प्रिया
जीवन की डगर अधूरी है
कैसे अधूरा जियूँ मैं
ये ज़हर का घूँट
कैसे पियूँ मैं
अब न सहा जाता है
तुम बिन रहा न जाता है
दरो- दीवार में
तुम्हारा अक्स ही
नज़र आता है
इसलिए
विदा चाहता हूँ तुमसे
अन्तिम विदाई देना मुझे
कर सको तो इतना करना
अन्तिम यात्रा में आकर
दीदार अपना दिखा जाना
जो जीते जी न मिला
वो सुकून रूह को तो
दिला जाना
इस आखिरी ख़त को भी
चिता के साथ जला देना
जैसे मुझे भुला दिया
वैसे ही हर याद को वहीँ जला देना
अब आखिरी सलाम लो मेरा
लो अब ख़ुद को
ख़त्म मैं करता हूँ
और तुमसे
अन्तिम विदा मैं लेता हूँ
और ये अन्तिम शब्द
क्या तुम्हें
उद्वेलित कर पाएँगे?
मेरी ह्रदय व्यथा को
क्या ये बयां कर पाएँगे?
गर कर दिया बयाँ
तो क्या तुम
उसे समझ पाओगी?
गठबंधन में बँधे
जब हम तुम
वचन लिया था दोनों ने
इक दूजे को चाहेंगे
साथ न छोड़ेंगे इक पल
फिर कौन सी
मुझसे खता हुई
जिसकी ये सज़ा मिली
क्या प्रेम में मेरे
कोई खोट था
या कोशिशें मेरी
नाकाम रही
तुम्हारी इक -इक अदा पर तो
मेरे दिल-ओ-जान गए
तुम्हारी हर ख्वाहिश को
मैंने अपना बनाया
तेरे लबों के तबस्सुम पर तो
दिल मेरा मचलता था
कौन सी ख्वाहिश ऐसी
जो न पूरी कर पाया मैं
कौन सी ऐसी हसरत थी
जिसे समझ न पाया मैं
फिर भी किस खता की
सज़ा दे चली गई तुम
पल-पल युगों सा बीतता है
और पल -पल में
युगों सी मौत मरा मैं
बाबुल के अँगना जाकर
पिया का दामन भुला दिया
एक चाहने वाले को
खतावार बना दिया
मेरे हर प्रयास को
निराशा का जामा पहना दिया
हर दरवाज़ा तुमने बंद किया
हर आस को तुमने तोड़ दिया
घनघोर निराशा फैली है
अब जीवन बगिया मेरी सूनी है
किस आस के सहारे जियूँ में
किसको अपना कहूँ मैं
तुम बिन जग
सूना लगता है
जीना मौत से
बदतर लगता है
रोज काँटों की
सेज पर सोता हूँ
हर पल तुम्हारे
लिए ही रोता हूँ
अब न रहा वश ख़ुद पर
कोई राह न सूझती है
तुम बिन प्रिया
जीवन की डगर अधूरी है
कैसे अधूरा जियूँ मैं
ये ज़हर का घूँट
कैसे पियूँ मैं
अब न सहा जाता है
तुम बिन रहा न जाता है
दरो- दीवार में
तुम्हारा अक्स ही
नज़र आता है
इसलिए
विदा चाहता हूँ तुमसे
अन्तिम विदाई देना मुझे
कर सको तो इतना करना
अन्तिम यात्रा में आकर
दीदार अपना दिखा जाना
जो जीते जी न मिला
वो सुकून रूह को तो
दिला जाना
इस आखिरी ख़त को भी
चिता के साथ जला देना
जैसे मुझे भुला दिया
वैसे ही हर याद को वहीँ जला देना
अब आखिरी सलाम लो मेरा
लो अब ख़ुद को
ख़त्म मैं करता हूँ
और तुमसे
अन्तिम विदा मैं लेता हूँ
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