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रविवार, 17 जनवरी 2010

ज़रा सोचिये ----------ऐसा आखिर कब तक ?

लो फिर
एक ख्वाहिश
का जनम हो गया
एक बच्चे के
जनम के साथ
फिर से उसे
अपनी जड़
सोच के साथ
दुलारा जायेगा
अपने अरमानो को
उसकी देह पर
संवारा जायेगा
इक मिटटी का
पुतला समझ
निखारा जायेगा
उसकी इच्छाओं का
गला घोंट
फिर से उसे
मारा जायेगा
अपने सपनो को
पाने की चाहत में
अपने स्वाभिमान
की खातिर
दोजख की आग में
खरा सोना
बनाने के लिए
तपाया जायेगा
उसकी भावनाओं को
अपने अहम् की
तुष्टि के लिए
कुचला जायेगा
सिर्फ अपनी
इक कुंठित कमजोरी
को छुपाने के लिए
और अपनी
महत्तवाकांक्षाओं को
पाने के लिए
एक बार फिर
अपने ही लहू से
हाथों को धोया जायेगा
ऐसा आखिर कब तक होगा?
युग सृष्टा हो , क्यूँ
युग मारक बनते जाते हो
अधखिले फूलों को क्यूँ
अपनी आकांक्षाओं की
बलि चढाते हो
जागो , जागो
मत अपने ही हाथो
भविष्य को
मटियामेट करो
दिल के टुकड़ों का
मत अपने ही हाथों
क़त्ल करो
जागो , मेरे प्यारो
अब तो जागो



ये रचना मैंने उन सब मासूमों को समर्पित की है जो अपने माता पिता की आकांक्षाओं की बलि चढ़ गए । वो भी जीना चाहते थे मगर अपने माँ बाप की इच्छा के आगे अपनी इच्छाओं की जिन्होंने बलि चढ़ा दी और जब उनकी इच्छाओं पर खरे नही उतर सके तो अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली ताकि उनके माता पिता को समाज के आगे शर्मिंदा ना होना पड़े ...........कई दिनों से ये समाचार मन को उद्वेलित किये हुए थे कि पढाई के बोझ के कारण बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं मगर नही बोझ पढाई का कहाँ है ? बोझ तो आज इंसान की महत्त्वाकांक्षाएं बन गयी हैं जिनकी खातिर हम अपने ही बच्चों को मौत के मुँह में झोंक रहे हैं। एक छोटा सा प्रयास है सोये हुओं को जगाने का ।

26 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

अधखिले फूलों को क्यूँ
अपनी आकांक्षाओं की
बलि चढाते हो
जागो , जागो
मत अपने ही हाथो
भविष्य को
मटियामेट करो
दिल के टुकड़ों का
मत अपने ही हाथों
क़त्ल करो
जागो , मेरे प्यारो

मासूमों को समर्पित आपकी रचना सार्थक होने के साथ-साथ बहुत ही मार्मिक है।
बधाई!

Dipak 'Mashal' ने कहा…

bahut sundar bhavna aur sandesh hai kavita ka... 3 idiots me bhi aisa hi kuchh hai.. jaroor dekhen.
Jai Hind...

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

agar kisi ki nazarein kholni ho to wo aapki yeh rachna padh le....

bahut he achhi rachna vandna ji...

kshama ने कहा…

Sach kaha..bade log apni mahatwkanksh
pooree karneke liye maasoomonka bali chadhate hain!

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

vandna ji bahut maarmik shabdo se rachna ko sajaya hai aur ek teekha prashn khada kiya hai jo har maa-baap ko sochne per majboor karta hai.

bahut acchhi rachna.badhayi.

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर .. रचना में वेदना भी है और सीख भी !!

योगेश स्वप्न ने कहा…

bahut khoob , samasya ko bahut sahi ubhaara hai, vishay shochniya hai,gambheer hai.

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

मत अपने ही हाथो
भविष्य को
मटियामेट करो
दिल के टुकड़ों का
मत अपने ही हाथों
क़त्ल करो !

सुन्दर भाव के साथ एक विचारणीय विषयवस्तु की
रचना !

sangeeta swarup ने कहा…

लो फिर
एक ख्वाहिश
का जनम हो गया
एक बच्चे के
जनम के साथ

बहुत बढ़िया शुरुआत की है रचना की .

उसकी भावनाओं को
अपने अहम् की
तुष्टि के लिए
कुचला जायेगा

सटीक ढंग से आपने समस्या को रखा है...अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए माता - पिता बच्चों पर बहुत दवाब डालते हैं जिसका नतीजा होता है बच्चे आत्महत्या तक कर लेते हैं....अहम् मुद्दा उठाया है इस रचना में

रश्मि प्रभा... ने कहा…

pata nahi kab tak.......bahut gahan arth liye bahut kuch kaha

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अधखिले फूलों को क्यूँ
अपनी आकांक्षाओं की
बलि चढाते हो

मन की वेदन को उतारा है अपने ...... आमिर ख़ान की नयी पिक्चर भी यही संदेश देती है ........

रचना दीक्षित ने कहा…

समाज को जागरूक करती एक मर्मस्पर्शी रचना

महफूज़ अली ने कहा…

मैं क्या कहूँ.... मैं भी इसी महत्वाकान्षाओं का शिकार हुआ हूँ.... यह रचना बहुत अपनी सी लगी..... बहुत सुंदर....

लखनऊ से बाहर था.... इसलिए नेट पर आना नहीं हो पाया....

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

...बेहद मार्मिक व प्रभावशाली रचना,बधाई !!!

देश अपरिमेय ने कहा…

कुछ दर्द बड़ों के भी हैं शाहब. कभी कभी वो बस इतना चाहते हैं कि उनका बच्चा खुस रहे................

निर्मला कपिला ने कहा…

अधखिले फूलों को क्यूँ
अपनी आकांक्षाओं की
बलि चढाते हो
जागो , जागो
मत अपने ही हाथो
भविष्य को
मटियामेट करो
सही बात है आज प्रतिस्पर्धा के युग मे बच्चे की सामर्थ्य देखे बिना उस पर दवाब बनाया जाता है । एक सार्थक प्रयास है आपका बधाई

Babli ने कहा…

आपको और आपके परिवार को वसंत पंचमी और सरस्वती पूजन की हार्दिक शुभकामनायें!
बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने!

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

जी आपकी कविता में के कठोर सत्य छुपा हुआ है... यही संदेश फ़िल्म थ्री ईडियटस में भी था..
कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में.. कभी घर में, कभी स्कूल कालेज में कभी समाज के किसी अन्य कोने में हम में से ही किसी से चूक हो जाती है और परिणाम ऐसा भय़ंकर जिसके बारे में सोच कर रोंगटे खडे हो जायें.

लिखते रहिये.

'अदा' ने कहा…

Vandana ji,
aapki kavita bahut hi saamyik aur jwalant samasya ki or ishaara kar rahi hai...
bahut pasand aayi..

श्यामल सुमन ने कहा…

बहुत सटीक रचना वन्दना जी। यही हो रहा है आजकल। जो बन्दूक बाप नहीं चला पाता अपने जीवन में, वही बन्दूक अपने बेटे के कंधे पर लादने की कोशिश रहती है। मेरा शहर जमशेदपुर तो आजकल सुर्खियों में है। आज जब यह पंक्ति लिख रहा हूँ - शहर मे छः आत्महत्यायें हुईं हैं जिसमें एक मेरे बगल के घर में ही मात्र सोलह उम्र। पता नहीं हम लोग अपने से अपनी दुनिया कबतक उजाड़ते रहेंगे?

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

नरेन्द्र व्यास ने कहा…

अधखिले फूलों को क्यूँ
अपनी आकांक्षाओं की
बलि चढाते हो
जागो , जागो.......बहुत ही मार्मिक, बहुत सुंदर ..बधाई!!

नरेन्द्र व्यास ने कहा…

बहुत ही मार्मिक....बहुत सुंदर ..बधाई!!!

नरेन्द्र व्यास ने कहा…

vandana ji aapji rachna me bahut vedna, sajeevta aur yatharth hai..
bahut badhai..

नरेन्द्र व्यास ने कहा…

बहुत सुन्दर .....

prerna argal ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
prerna argal ने कहा…

bahut sunder vichaar liye yathart ko baatati hui saaarthak rachanaa.badhaai aapko.
happy friendship day.
/ ब्लोगर्स मीट वीकली (३) में सभी ब्लोगर्स को एक ही मंच पर जोड़ने का प्रयास किया गया है / आप आइये और अपने विचारों से हमें अवगत कराइये/ हमारी कामना है कि आप हिंदी की सेवा यूं ही करते रहें। सोमवार ०८/०८/११ कोब्लॉगर्स मीट वीकली (3) Happy Friendship Day में आप आमंत्रित हैं /