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शनिवार, 5 नवंबर 2011

दोस्ती , प्रेम और सैक्स

दोस्ती अलग है 
प्रेम अलग है
सेक्स अलग है
किसी ने कहा मुझे
क्या कर सकती हो व्याख्या ?
बता सकती हो
क्या हैं इनके अस्तित्व?
क्या ये हैं समाये इक दूजे में
या हैं इनके भिन्न अस्तित्व?


दो विपरीत लिंगी 
दोस्ती हो या प्रेम 
हमेशा कसौटी पर ही 
खड़ा पाया जाता है
क्यूँ समझ नहीं आ पाता है
दोस्ती का जज्बा 
नेमत खुदा की
जिसको नवाज़ा है 
होगा कोई बाशिंदा 
जहान से अलग
खुदा के नज़दीक
यूँ ही तो नहीं खुदा को
उस पर प्यार आया है
मगर विपरीत लिंगी दोस्ती 
पर ही क्यूँ आक्षेप लगाया है
क्यूँ नहीं किसी को समझ आया है
हर दोस्ती की बुनियाद 
सैक्स नहीं होती
इमारत इतनी कमजोर नहीं होती
महज़ शारीरिक आकर्षण 
और स्त्री पुरुष का संग ही 
क्यूँ ये दर्शाता है 
यहाँ तो सिर्फ इनका
शारीरिक नाता है
देह से इतर भी 
सम्बन्ध होते हैं
जो प्रेम से भी गहरे होते हैं
फिर चाहे हो कृष्ण
सखी तो एक ही बन पाई थी
पांचाली ने भी  तो 
दोस्ती कृष्ण संग निभाई थी
पर वहाँ प्रेम दिव्यता पा गया था
दोस्ती की रस्में निभा गया था

प्रेम की डोर 
बड़ी कच्ची होती है
इसमें ना कोई कड़ी होती है
अदृश्य तरंगों पर 
ह्रदय तरंगित होते हैं
बिन देखे , बिन मिले
बिन जाने भी 
भाव स्खलित होते हैं
प्रेम में स्त्री पुरुष 
कब चिन्हित होते हैं
वहाँ तो आत्माओं 
के ही मिलन होते हैं
फिर कैसे भेद करूँ 
स्त्री पुरुष को अलग करूँ
फिर चाहे गोपी भाव 
में समाहित हो
जहाँ कृष्ण गोपी बन जाता हो
या गोपी कृष्ण बन जाती हो
पर प्रेम की थाह न कोई पाता है
प्रेम तो ह्रदय की वीथियों 
पर लिखा अनवरत नाता है
जिसकी गहराइयों में 
जिस्म से परे सिर्फ 
आत्मिक मिलन ही हो पाता है 
जो हर किसी को ना आता है
और वो प्रेम को भी
शरीरों के मिलन से ही
तोल पाता है 
मगर अपनी जड़ सोच से
ना मुक्त हो पाता है
सिर्फ स्त्री पुरुष रूप में ही
परिभाषित किया जाता है
मगर कभी उसकी दिव्यता को 
ना जान जाता है
तभी प्रेम कभी भी 
अपना मुकाम ना पा पाता है
इक बार स्त्री पुरुष भेद से बाहर आओ
खुद को प्रेम के सागर में डुबा जाओ
तो शायद तुम भी प्रेमग्रंथ लिख जाओ



दो विपरीत लिंगी मिलन
महज सम्भोग को ही
दर्शाता है
सिर्फ देह से शुरू होकर
देह तक ही सिमट जाता है
कभी देह से इतर 
ना इक दूजे को  जान पाता है
और बीच राह में ही 
बँधन चटकता जाता है
जब तक ना आपसी
सौहार्द हो 
तब तक कैसे ढाई अक्षर 
का आधार हो
सम्भोग का कैसे श्रृंगार हो
जब तक ना मित्रमय 
वातावरण का विचार हो
जब तक ना प्रेम के बीज का रोपण हो
कैसे कहो तो सम्भोग हो
सम्भोग मात्र क्रिया नहीं
जीवन दर्शन समाया है
सम्भोग से भी अध्यात्म तक
मार्ग बताया है
पर वहाँ देह से इतर ही
सम्बन्ध बन पाया है
सिर्फ कुछ पलों का सामीप्य ही 
ना दीवार बने 
मानस के मन का मजबूत आधार बने
जहाँ एक दूजे में ही 
प्रेमी, सखा ,आत्मीय,
ईश्वरीयतत्व 
सबका दर्शन हो जाए 
तन से परे मन का मिलन हो जाये
तो सम्भोग पूर्णता पा जाये
तभी शायद विपरीत लिंगी होना
सिर्फ एक रूप रह जायेगा
सम्भोग में भी दोस्ती और प्रेम का 
आधार नज़र आएगा
और संपूर्ण दिव्यता को मानव पा जायेगा

यूँ तो दोस्ती , प्रेम और सैक्स
तीनो अपने मानदंडों पर खरे उतरते हैं
पर इनके अस्तित्व भी
इक दूजे में ही समाहित होते हैं
जहाँ बिना दोस्ती के 
प्रेम ना जगह पाता है
और बिना प्रेम और दोस्ती के
सम्भोग का कारण ना
उचित नज़र आता है
फिर कैसे इन्हें अलग करूँ
अलग होते हुए भी
इनके अस्तित्व इक दूजे बिन
ना पूर्णता पाते हैं 
हाँ ...अलग अस्तित्व
तभी सम्पूर्णता पाते हैं
जब इक दूजे में सिमट जाते हैं
मगर वहाँ  वासनात्मक 
राग ना बहता है
सिर्फ अनुराग ही अनुराग होता है
सर्वस्व  समर्पण जहाँ होता है
वो ही प्रेम हो या दोस्ती या सैक्स
सभी का आधार होता है
शायद वहीँ दिव्यता का भान होता है 



दोस्तों ये फ़ोटो गुंजन जी के ब्लोग से ली है जो इस रचना पर खरी उतर रही है आभारी हूँ गुंजन जी की।

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

क्या जरूरी है हर बार त्याग राम ही करे............300

सर्वस्व समर्पण किया था तुम्हें
सात फेरों के सात वचनों के साथ
सात जन्म के लिए 
बांध ली थी तुम संग जीवन डोर
उम्र की सीढियां चढ़ती रही
रोज एक नयी आग सुलगती रही
अपना प्रेम अपना विश्वास अपना वजूद
सब तुम पर ही लाकर ठहरा दिया था
और तुम्हारे लिए
मेरा वजूद क्या था
या क्या है
बस यही ना जान पाई
सिर्फ तन का ही संगम हुआ
जीवन भागीरथी में
कभी मतभेद बढे 
तो कभी चाहतें परवान चढ़ीं
कभी तुम्हारे फरेब ने 
आत्मा को कचोट दिया
कभी तुम्हारे झूठ ने 
मुझे छलनी किया
फिर भी सात जन्मों के बँधन 
की हर रस्म निभाती रही
कभी मन से तो कभी तन से
और था भी क्या मेरे पास
सिवाय मन और तन के
मगर तुम्हारे अहम् ने
हर जगह मुझे प्रताड़ित किया
फिर भी ना उफ़ किया
लेकिन नहीं पता था 
तुम अपने अहम् को 
पोषित करने के लिए
हर सीमारेखा लाँघ जाओगे
जिसमे मेरे वजूद को भी
ढहा जाओगे 
मेरे स्वाभिमान की लाश पर
अपने नपुंसक अहम् की 
दीवार खडी कर जाओगे
एक सीमा होती है ना
सागर की भी 
उसमे भी सुनामियां आती हैं 
जब समवायी हद से बाहर हो जाये
और लगता है शायद
अब वो वक्त आ गया है
आखिर कब तक  तुम्हारे 
तुच्छ अहम् की खातिर 
खुद की आहुति देती
एक ही चीज  तो मेरी अपनी थी
मेरा स्वाभिमान..................
और तुमने उसे भी रौंद  दिया
सिर्फ गैरों की खातिर
और अपने अहम् के पोषण के लिए
असत्य संभाषण का सहारा लिया
कहो कब तक और क्यों 
तुम्हारी ही खातिर जीती रहूँ
और बेइज्जती के कडवे घूँट पीती रहूँ
इसलिए आज एक निर्णय ले ही लिया
वरना शायद खुद की नज़रों में गिरकर
जीना आसान नहीं होता
मैंने तुम्हें रस्मो रिवास के 
हर बँधन से मुक्त किया
अब ना तुम से
तन का रिश्ता रहा ना मन का
लो मैंने पानी पर दीवार बना दी है
इस पार मेरा जहान
उस पार तुम्हारा
एक छत के नीचे रहते हुए भी
जो दिखाई नहीं देतीं
वो अदृश्य दीवारें बहुत मजबूत होती हैं
हाँ मैंने आज तुम्हें तन और मन से त्याग दिया है
क्या जरूरी है हर बार त्याग राम ही करे
लो आज सीता ने तुम्हारा त्याग किया ................

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

आखिर रुखसती के भी अपने रिवाज़ होते हैं……

आज एक धडकन तुम्हारे नाम गिरवीं रख रही हूँ
देखो ज़रा संभाल कर रखना अमानत मेरी
बस उस दिन लौटा देना जब रुखसत होउँ जहाँ से
मेरी चिता पर आखिरी आहुति दे देना
बस उस धडकन पर अपना नाम लिखकर
कोई ज्यादा कीमत तो नही मांगी ना ………
आखिर रुखसती के भी अपने रिवाज़ होते हैं……

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

तुम होते तो………

तुम होते.....तो जरुर दीपावली होती....
नहीं हो ..... दिवाली फिर भी है
ना तेरे रहने से ना तेरे जाने से

दिवाली पर कोई फर्क पड़ा 

तुम होते ........तो जरूर दीप जलते
नहीं हो ...........फिर भी दीप तो जले हैं 
मगर अश्रु घृत में इंतजार की बाती को
आहों की अग्नि से प्रज्वलित किया है 

तुम होते .........तो जरूर पूजन होता
नहीं हो ..........पूजन तो हुआ है
मगर तुम्हारी यादों को ह्रदय की तश्तरी में 
सजाकर कसक के अक्षत कुमकुम से नवाज़ा है 

तुम होते .........तो जरूर अमावस भी रौशन होती 
नहीं हो ............तब भी रौशन तो हुई है 
मगर तेरी मोहब्बत के निशानों ने 
हृदयतम पर छाये घनेरे अँधेरे पर 
याद का दिया जलाया है 

तुम नहीं हो ........फिर भी दिवाली तो है ना
क्या हुआ ........जो गुलाब खिल ना सके 
क्या हुआ .........जो मोहब्बत के दीप जल ना सके
दिवाली के लिए कब वजूदों की जरूरत हुई है 
तेरे होने के अहसास ने ही मेरी अमावस रौशन कर दी है ............




दोस्तों पहली लाइन ( तुम होते तो.......जरूर दिवाली होती ) 


मायामृगजी की फेसबुक पर पढ़ी तो इस रचना का जन्म हो गया. 

शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

आज राधा बनी है श्याम






आज राधा बनी है श्याम 
 नाचें कैसे नन्दकुमार

पैरों मे पहने कैसे पायलिया
छम छम नाचें देखो कैसे सांवरिया
मुरली पे छेडी कैसी तान 
 नाचें कैसे नन्दकुमार
आज राधा ...................

लहंगा चोली कैसे पहने सुकुमार
लाला से बने लली कैसे नन्दलाल
सिर पर ओढ़ी है चूनर लाल
 नाचें कैसे नंदकुमार
आज राधा.................


मोहिनी मूरत रही कैसे लुभाय
मधुर चितवन ने दियो होश गंवाय
माथे पर बिंदी ने कियो है कमाल
 नाचें कैसे नंदकुमार
आज राधा बनी है श्याम 
 नाचें कैसे नन्दकुमार

मेरो तन मन लियो है वार
नाचें कैसे नंदकुमार
मेरो जियो लियो है चुराय
नाचें कैसे नंदकुमार
जिसकी ठोढ़ी पे चमके हीरा लाल 
नाचें कैसे नंदकुमार 
आज वृषभान लली बनी श्याम
नाचें कैसे नंदकुमार 


आज राधा बनी है श्याम 
 नाचें कैसे नन्दकुमार








अब चाहें तो इस लिंक पर सुन भी लीजिये 
http://www.facebook.com/photo.php?v=२६६००९८६०१०९८८१



सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

एक खोज , एक चाहत और एक सच्……………उफ़ !









एक खोज , एक चाहत और एक सच्……………उफ़ ! 
बुद्धत्व में पूर्णत्व को खोजता एक सच
पर उस चाहत का क्या करूँ 
जो बुद्धत्व भी तुम में ही पाना चाहती है
हाँ ...........तुम नहीं होकर भी यहीं कहीं हो
हाँ ...........मेरे अहसासों में
मेरे ख्यालों में
मेरे गीतों में
मेरी धड़कन में
फिर भी कहीं नहीं हो
वर्षों गुजर गए
तुम्हारा स्पंदन मुझ तक आते
मेरी धमनियों में बहते
मधुर झंकार करते
मगर फिर भी कहीं कुछ अधूरा था
कुछ छुटा हुआ 
कहीं कुछ ठहरा हुआ
एक अनाम सा नाम
एक मीठी सी  टीस
एक महकती सी  खुशबू
तुम्हारे होने की .........या ना होने की
मगर था और है सब आस पास ही
फिर भी एक दूरी
एक अनजानापन.......जिसे जानता हूँ मैं
एक उद्घोष मन्त्रों का
एक उद्घोष तुम्हारी अनसुनी आवाज़ का
कभी फर्क ही नहीं दिखा दोनों में
यूँ लगा जैसे तुम मुझे 
गुनगुना रही हो 
तुमसे कभी अन्जान रहा ही नहीं
तुम्हें जानता हूँ ........ये भी कैसे कहूं
जब तक कि मेरी चाहत को पंख ना मिलें
हाँ .........वो ही .........जब तुम हो
और बुद्धत्व तुम में ही समा जाये
या कहो मुझे बुद्ध तुम में ही मिल जाये
और जीवन संपूर्ण हो जाए
कहो आओगी ना
क़यामत के दिन मुझे पूर्ण करने 
बुद्धत्व स्थापित करने
मेरी अनदेखी कल्पना .........मेरी ऋतुपर्णा!


दोस्तों 
आज की इस रचना के जन्म का श्रेय श्री समीर लाल जी की पोस्ट को जाता है . जैसे ही उनकी पोस्ट पढ़ी तो ये कुछ ख्याल वहां उतर आये और उनकी आज्ञा से ही उनके दिए नाम का प्रयोग किया है क्यूंकि उनकी भी यही हार्दिक इच्छा थी कि वो ही नाम प्रयोग किया जाये वर्ना मैंने नाम बदल दिया था इसके लिए मैं समीर जी की हार्दिक आभारी हूँ.


शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

और हमारी मोहब्बत का सुहाग अमर हो जाये ............

सात जन्मों तक के लिए
तुम्हारा साथ मांगने वाली मैं
तुम्हारे लिए करवा चौथ का 
व्रत रखने वाली मैं
तुम्हारे नाम का सिन्दूर मांग में
सजाने वाली मैं
तुम्हारी चाहत की मेहंदी
हाथों में लगाने वाली मैं
तुम्हारे नाम का मंगलसूत्र
गले में पहनने वाली मैं
तुम्हारी लम्बी उम्र की कामना
करने वाली मैं
तुम्हारे प्रेम की बिंदिया 
माथे पर सजाने वाली मैं
आज नहीं चाहती 
सात जन्मों तक का साथ
नहीं करना चाहती ऐसा श्रृंगार
जिसमे सिर्फ दिखावे की बू आती हो
नहीं हो जिसमे ह्रदयों का मिलन
आडम्बर के आवरण में 
नहीं छिपाना चाहती 
रिश्ते की गरिमा को
नहीं चाहती मैं भी 
भीड़ में शामिल हो जाऊँ
और रिश्ते को सिर्फ
आडम्बर की भेंट चढ़ा
दिखावटी दुनिया के दिखावटी 
साजो सामान का 
वो हिस्सा बन जाऊँ
जिसमे रिश्ते की ऊष्मा
रिश्ते की गरिमा 
सिर्फ एक ढकोसला भर 
बन कर रह जाये
आज बाजारवाद ने 
रिश्ते को भी तो बाजारू 
सा नहीं बना दिया
सिर्फ एक दूसरे से सुन्दर
दिखने की होड़
एक दूसरे से ज्यादा समर्पित
और चाहने वाले पति 
का विज्ञापन सा नहीं लगता
नहीं करना चाहती
कोई होड़ किसी से
नहीं करना चाहती 
वो सब जो सब करते हैं
जानते हो मैं क्या चाहती हूँ
सिर्फ इतना 
इस करवा चौथ
सिर्फ इसी जन्म के लिए
पहनूं तो सिर्फ तुम्हारी चाहत का मंगलसूत्र
मांग सजाऊं तो सिर्फ तुम्हारी मोहब्बत के  
उन छोटे छोटे मोतियों से 
जिसमे तुम मन से शामिल हो 
दिखावटी साजो- समान बनकर नहीं
हाथ पर मेहंदी की जगह
मेरे दिल पर छाप हो तुम्हारे प्रेम की
कभी ना मिटने वाली 
ऐसा रंग चढ़े जो  कभी
फीका ही ना पड़े
और देखना चाहती हूँ 
उस चाँद को
जो तुम्हारी आँखों में हो
जो तुम्हारी आँखों से 
मेरे अंतस तक उतरे
और तब मैं अपना व्रत पूर्ण करूँ
उस चाँद में अपना प्रतिबिम्ब देखते हुए
जहाँ चाहत किसी लिबास में ढकी ना हो
जहाँ मोहब्बत को किसी जन्म की आस ना हो
जहाँ प्रेम शो केस में लगा पीस बनकर ना रह जाये
ये तुम्हारा और मेरा 
नितांत निजी क्षण 
सिर्फ और सिर्फ
हम दोनों के मध्य 
शरद के चाँद सा अपनी
सोलह कलाओं के साथ
उम्र भर दमकता रहे 
और सात जन्मों की कामना
एक जन्म में ही पूर्ण हो जाए
सात जन्म एक जन्म में ही जी जाएँ
और हमारी मोहब्बत का सुहाग अमर हो जाये .............

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

तोड़ दी हैं आज मैंने तेरी यादों की चूड़ियाँ

तोड़ दी हैं आज मैंने
तेरी यादों की चूड़ियाँ
जिसमे तुमने अपने 
प्रेम की लाख भरी थी 
सुनहरे वादों के रंगों से
जिनमे रंग भरा था 
ये कहकर 
देखो इनमे मेरा 
दिल धडकता है
सहेज कर रखना
ये सुनहरी रंग 
तुम्हारे हाथों  पर
खूब फबता है
देखो कभी 
फीका ना पड़े
और मैंने वो 
सुनहरी रंग आज तक
सहेजा हुआ है
अपनी याद का बिछावन बनाकर
और याद है
तुमने कहा था
ये लाल रंग 
तुम्हारी धडकनों  का है
जिसमे मेरा वजूद सांस लेता है
देखो उससे  मैंने आज तक
अपनी यादों की माँग सजा रखी है
ताकि तुम्हारी चाहत दीर्घायु रहे
और वो हरा रंग
तुम्हारी हरी भरी मोहब्बत का प्रतीक
कहा था ना तुमने
मोहब्बत हरी भरी ही अच्छी लगती है
देखो तो 
आज तक मैंने
मोहब्बत की जमीन पर 
यादों की मखमली  घास उगा रखी है 
ताकि जब भी तुम आओ 
तो नर्म नाजुक रेशमी अहसास
ही तुम्हारा स्वागत करें
मगर तुमने तो जैसे
यादों से भी किनारा कर लिया है
तभी तो तुम ना खुद आये 
ना यादों को आने दिया
और मैं यादों की संदूकची में 
तुम्हारे प्रेम की चूड़ियाँ सजाये
इंतज़ार का घूंघट ओढ़े 
चौखट पर खडी मूरत बन गयी
मैंने तो सिर्फ कांच की चूड़ियाँ 
ही संजोयी थीं
खनक के लिए
क्या पता था 
तुमने कभी कोई दस्तक सुनी ही नहीं
या सुननी ही नहीं चाही
आखिर कब तक सहेजती
रंग फीके पड़ जाते 
उससे पहले 
तोड़ दीं मैंने खुद ही आज
तुम्हारी यादों की चूड़ियाँ
और हो गयी आज़ाद
कब सबका सौभाग्य अखंड रहता है 
आखिर टूटना तो चूड़ियों की नियति होती है ना .............



गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

मोहब्बत जडाऊ नहीं होती

चाहती थी प्रीत बंजारन
के पांव में बिछुए पहनाना 
मोहब्बत के नगों से जड़कर
बनाना चाहती थी
एक नयी इबारत
एक नयी उम्मीद
एक नया अहसास
मोहब्बत के लिबास का
पर मोहब्बत ने कब
लिबास पहना है
कब  नग बन
किसी अहसास में उतरी है
मोहब्बत न तो कभी
बेपर्दा हुयी है
और न ही कभी
लिबास में ढकी है
मोहब्बत ने तो 
हर युग में
हर काल में
एक नयी इबारत गढ़ी है 
और हर रूह को छूती
हवा सी बही है
और बंजारे कब कहीं 
ठहरे हैं
फिर प्रीत बंजारन को
कैसे कोई छाँव मिलती
जो किसी नगीने सी 
किसी जेवर में जड़ी जाती 
शायद तभी
मोहब्बत जडाऊ नहीं होती .........

शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

आपके सहयोग की जरूरत है




दोस्तों 



आपको सिर्फ इतना करना है कि कृपया इन दोनों लिंक्स को  पसन्द 



करके मेरा हौसला बढायें और प्रतियोगिता मे स्थान दिलायेँ और अपने 


जानकारों तक ये लिंक पहुँचा कर लाइक करवाए तो बहुत सहयोग 


मिलेगा इन्हें खोलियेगा और like  के बटन  पर क्लिक करियेगा तथा 


अपने जानकारों से कहकर पसंद करवाइए .आप सब दोस्तों की हार्दिक 


आभारी रहूंगी .







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बुधवार, 28 सितंबर 2011

कुछ तो था उसमे

कुछ तो था उसमे
शायद उसकी आदत
बच्चियों सी जिद पकड़ने की
और फिर खिलौना देख
बच्चे जैसे खुश होने की
या शायद उसकी बातें
जिसमे मैं तो कहीं नहीं होता था
मगर सारा ज़माना अपने संग लिए घूमती थी
हर बात पर खिलखिलाना
हर बात की खाल खींच लाना
हर बात पर एक जुमला कस देना
या शायद उसकी वो दिलकश मुस्कान
जिसमे बच्चों की मासूमियत छुपी थी
जैसे किसी फूल पर शबनम रुकी हो
और इंतज़ार में हो कब हवा का झोंका आये
उसके वजूद को हिलाए
और वो नीचे टपक जाए
ना जाने क्या था उसमे
मगर कुछ तो था
शायद ख्वाब को पकड़ने की उसकी आदत
वो मेरी आँखों में चाँद देखने की उसकी जिद
और फिर उस चाँद को
किताब में सहेजने का उसका जूनून
या शायद एक चंचल हवा का
रुके हुए पानी में 

हलचल पैदा कर जाने जैसा 
उसका वजूद
कभी लगती

किसी मदमस्त इठलाती 
पवन की मीठी बयार सी
तो कभी लगती जैसे
जेठ की तपिश में जलती रूह पर
किसी ने बर्फ का फाया रखा हो
या शायद सागर में तैरती वो कश्ती
जिसमे मुसाफिर को मंजिल की चाह ना हो
बस सफ़र चलता रहे यूँ ही
अनवरत ............अनंत की तरफ
बस उसका साथ हो
कुछ तो था उसमे
तभी आज तक
उसकी सरगोशियाँ हवाओं में सरसरा रही हैं
कानों में गुनगुना रही हैं
रूह पर थाप दे रही हैं
एक संगीत जैसे कोई बज रहा हो
और वो कोई गीत गुनगुना रही हो

तभी उसमे कुछ होता है
जिसे भूल पाना नामुमकिन होता है 

कुछ आहटें बिन बुलाये भी दस्तक देती हैं ..............

तेरे बिना जिया लागे ना


सुनो 
देखो ना
इक युग बीता
मगर देखो तो
मेरी आस का टोकरा
कभी रीता ही नही
सबने मुझे बावरी बना दिया
तेरे विरह में ये नाम दे दिया
मगर तुम बिन मेरा ना
कोई पल रहा अछूता
फिर भला कैसे कहूं 
तेरे बिना जिया लागे ना
तुम तो सदा
मेरी आँख की ओट में

करवट लेते रहे
कभी नींद में तो कभी ख्वाब में
मिलते जुलते रहे
सुना है
दुनिया कहती है
तुम यहाँ कहीं नहीं हो अब
अब नहीं आओगे वापस
जाने वाले फिर नहीं आते
मगर ये तो बताओ
तुम गए कहाँ से हो
क्या मेरी यादों से
क्या मेरे नयनों से
क्या मेरे दिल से
हर पल तो तुम्हें
निहारा करती हूँ
हर पल तुम्हारा वजूद
मेरे ख्वाबों से
अठखेलियाँ करता है
कभी रूठा करते हो
कभी मनाया करते हो
कभी मेरी माँग
अपनी प्रीत से सजाया करते हो
कभी चाँदनी रात में
मेरी वेणी में फूल लगाया करते हो
कभी किसी झील के किनारे
ठहरे हुए पानी में
चाँद की सैर पर ले जाया करते हो
कभी तारावली के फूलों से
धरती सजाया करते हो
और मुझे वहाँ किसी
ख्वाब सा सजाया करते हो
तो बताओ ना
कौन है दीवाना
ये दुनिया या मैं
बताओ तो
जब हर पल
हर सांस में
हर धड़कन में
मेरी रूह में
तुम ही तुम समाये हो
फिर कैसे कह दूं
तेरे बिना जिया लागे ना

शनिवार, 24 सितंबर 2011

आ मेरी चाँदनी








आ मेरी चाँदनी 

तुझे कौन से 

दामन मे सहेजूँ

कैसे तेरी राहो को
रौशन करूँ
कौन से नव 
पल्लव खिलाऊँ
जो तू मुस्काये तो
मै मुस्काऊँ
ये जग मुस्काये
हर कली खिल जाये
चाँद की चाँदनी भी
तुझसे रश्क खाये

 आ मेरी चांदनी 
तुझे ऐसे संवारूं
जो तू चले तो 
हवाये चले
जो तू रुके तो
वक्त थम जाये
तेरी इक जुम्बिश पर
ये जहाँ हिल जाये
आ मेरी चाँदनी
तुझे सीने मे बसा लूँ
और एक नया जहाँ बसा लूँ
जिसमे तू ऐसे सिमट जाये
कि हर आंगन महक जाये







आ मेरी चाँदनी 

इक दीप जलाऊँ

जिसकी रौशनी में

हर आँगन महक जाये
घर घर गूंजे किलकारी
खिले हर बगिया न्यारी
तू हर घर में महक जाये
तेरी खुशबू यूँ बिखर जाये
हर आँगन में तुझसी 
इक कली खिल जाये 

आ मेरी चाँदनी 
तुझे पलकों में सजाऊँ
तुझे तेरा हक़ दिलाऊँ
और इस जहाँ को 
इक आईना दिखाऊँ
तुझे ऐसे बुलंद करूँ
कि आसमाँ भी छोटा पड़ जाये
और तेरा सितारा 
जहाँ में रोशन हो जाये
आ मेरी चाँदनी
तुझ पर हर ख़ुशी मैं लुटाऊँ 
और तेरी बुलंदियों को 
आसमाँ पे सजाऊँ

बुधवार, 21 सितंबर 2011

कहीं ये मन की मौत का कोई संकेत तो नहीं ?

कहीं कोई हलचल नहीं
नीरव निस्तब्ध अंतर्मन
निर्जन वन सा मन आँगन
कोई शब्द संचयन नहीं
कोई नव सृजन नहीं
सब ओर सिर्फ एक 
मरघट की ख़ामोशी
कहीं कोई दूर 
सियार भी नहीं बोल रहा
जो वातावरण का 
सन्नाटा कुछ तो घटे 
कब्रिस्तान की ख़ामोशी 
चिताओं की जलन
और दूर दूर तक फैला 
भयावह घटाटोप अँधेरा
कोई आकृति नहीं
कोई आकार नहीं
सिर्फ एक उमस
जिसमे घिरा अंतर्मन
कहीं ये मन की मौत का कोई संकेत तो नहीं ?

शनिवार, 17 सितंबर 2011

बताओ तो अब सुलगने को क्या बचा ?

एक हसरत के पाँव में
जैसे किसी ने आरजुओं के
घुंघरुओं को बांधा हो
उम्र के लिहाज को
जैसे किसी ने
उच्छंखरल नदी में डाला हो
रिश्ते की करवट ने
जैसे चाँद दिन में निकाला हो
मोहब्बत के चेनाब में
जैसे पक्का घड़ा उतारा हो
कुछ ऐसे मोहब्बत का धुआँ
मेरी रूह में पैबस्त हो गया है


बताओ तो अब सुलगने को क्या बचा ?

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

आखिर कोई तो हो कारण

सुनो
आजकल मन तुम तक नहीं पहुँचता
पता नहीं किन जंगलों में भटकता है
पता नहीं किस कांटे में उलझा है
जो अब फूलों की डगर नहीं देखता
कहीं दिखे तुम्हें किसी
अन्जान शहर में
अन्जान डगर पर
अन्जान महफ़िल में
किसी कांटे से उलझा
तो उसे याद कराना
हर बीता लम्हा
जो तुम्हारे साथ गुजरा था
शायद दिल की जमीन नम हो जाए
और फिर भी ना माने तो
एक बार उसे वापसी की राह दिखाना
जहाँ ये ठूंठ उसके इंतज़ार में सूखा पड़ा है
अब इसमें हलचल नहीं होती
आखिर कोई तो हो कारण
चाँदनी को जमीं तक पहुँचने के लिए

बुधवार, 7 सितंबर 2011

युगों की प्यास को अभिशप्त होने से पहले

सुनो
कहो
..............
अरे कहो ना
अब खामोश क्यूँ हो?


जानते हो
कब से
शायद अनंत जन्म से
हम प्रतीक्षारत थे
और हर क्षण
एक दूजे की चाह
एक दूजे का साथ
एक दूजे में समाहित
हमारे वजूद थे
वजूद जानते हो ना कौन से?


हाँ जानता हूँ...........
रूहानी वजूद
जो मिटकर भी नहीं मिटते
जो दूर होकर भी
पास होते हैं
एक दूजे के साथ होते हैं

देखो ना
कहीं आज अमावस तो नहीं
पूनम तो कभी
हमारी ज़िन्दगी में आयी ही नहीं
कभी चाँदनी में
रूह मुस्कायी ही नहीं
कोई कली किसी गुलशन में
खिलखिलाई ही नहीं


हाँ सही कहते हो
शायद आज
चाँद भी शर्मिंदा है
दो चाहने वालों के प्रेम का
साक्षी जो ना बन पाया
शायद मालूम हो गया है उसे
अब चाँदनी की हसरत
रूहों पर नहीं उतरती
किसी सूईं  में पिरो कर
कोई नहीं लगाता टांका
चाँदनी के तागों  का
महबूबा के केशों  में
देखो ना .............
शायद आज कोई
गवाह बनना नहीं चाहता
हमारे मिलन का
देखो तो .............
तभी सबने मुँह छुपाया है
जैसे प्रलय का कोई
चिन्ह नज़र आया है
जैसे सिर्फ एक
कँवल ही मुस्काया है
जिस पर हमारी प्रीत
का कोई मोती उभर आया है
अकेला बह रहा है
इस अथाह सागर में
आज शरीर होते
तो क्या हम होते?
नहीं ना...............
बस ये प्रेम ही है
जिसने प्रवाहमान बनाया है
शायद खुदाई नूर का
कोई करिश्मा नज़र आया है
तभी कहीं कोई विनाश का
चिन्ह ना नजर आया है
सिर्फ और सिर्फ
वो बहता हुआ
शांत सौम्य स्थिर अटल
एक ध्रुव तारा ही नज़र आया है
आओ चलें
आज प्रेम को
पूर्णविराम दे दें
युगों की प्यास को अभिशप्त होने से पहले

शनिवार, 3 सितंबर 2011

हिंदी की सच्ची तस्वीर








दोस्तों
मेरा ये आलेख इस माह के गर्भनाल के अंक मे छपा है जिसे आप फ़ोटो पर क्लिक करके बडा  करके पढ सकते हैं।