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बुधवार, 30 सितंबर 2009

आ मेरी चाहत .................


मेरी चाहत
तुझे दुल्हन बना दूँ
तुझे ख्वाबों के
सुनहले तारों से
सजा दूँ
तेरी मांग में
सुरमई शाम का
टीका लगा दूँ
तुझे दिल के
हसीन अरमानों की
चुनरी उढा दूँ
अंखियों में तेरी
ज़ज्बातों का
काजल लगा दूँ
माथे पर तेरे
दिल में मचलते लहू की
बिंदिया सजा दूँ
अधरों पर तेरे
भोर की लाली
लगा दूँ
सिर पर तेरे
प्रीत का
घूंघट उढा दूँ

मेरी चाहत
तुझे दुल्हन बना दूँ

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

मेरे संवेदनहीन पिया

मेरे संवेदनहीन पिया
दर्द के अहसास से विहीन पिया
दर्द की हर हद से गुजर गया कोईऔर तुम मुस्कुराकर निकल गए
कैसे घुट-घुटकर जीती हूँ मैं
ज़हर के घूँट पीती हूँ मैं
साथ होकर भी दूर हूँ मैं
ये कैसे बन गए ,जीवन पिया
मेरे संवेदनहीन पिया
जिस्मों की नजदीकियां
बनी तुम्हारी चाहत पिया
रूह की घुटती सांसों को
जिला न पाए कभी पिया
मेरे संवेदनहीन पिया
आंखों में ठहरी खामोशी को
कभी समझ न पाए पिया
लबों पर दफ़न लफ्जों को
कभी पढ़ न पाए पिया
ये कैसी निराली रीत है
ये कैसी अपनी प्रीत है
तुम न कभी जान पाए पिया
मैं सदियों से मिटती रहीबेनूर ज़िन्दगी जीती रही
बदरंग हो गए हर रंग पिया
मेरे संवेदनहीन पिया
आस का दीपक बुझा चुकी हूँ
अपने हाथों मिटा चुकी हूँ
अरमानों को कफ़न उढा चुकी हूँ
नूर की इक बूँद की चाहत में
ख़ुद को भी मिटा चुकी हूँ
फिर भी न आए तुम पिया
कुछ भी न भाए तुम्हें पिया
कैसे तुम्हें पाऊँ पिया
कैसे अपना बनाऊं पिया
कौन सी जोत जगाऊँ पिया
मेरे संवेदनहीन पिया

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

सात दिनों का मेला

ये दुनिया सात दिनों का मेला
आठवां दिन न आया कभी
ख्वाब बरसों के बुनता रहा
पल भी चैन न पाया कभी
क्षण क्षण जीता मरता रहा
पर ख़ुद को न जान पाया कभी
आठवें दिन की आस में
सात दिन भी न जी पाया कभी
प्राणी जीवन सात दिनों का मेला है
कुछ तो यत्न करना होगा
सात दिनों में मरने से पहले
भवसिंधु से भी तरना होगा
जो जीवन भर न कर पाया
वो यत्न अब करना होगा
जैसा उज्जवल भेजा उसने
वैसा उज्जवल बनना होगा
ये दुनिया सात दिनों का मेला
आठवां दिन न आया कभी



कृपया मेरा नया ब्लॉग भी पढ़ें .................
http://ekprayas-vandana.blogspot.com

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

मौत भी उसकी मौत पर रोया करे

एक मौत,मर कर मरे , तो क्या मरे
आदमी है वो,जो हर पल, मर-मरकर जिया करे
मौत भी हार जाती है उसके आगे
जो ज़िन्दगी से मौत की ज़ंग लड़ा करे
मौत क्या मारेगी उस जीवट को
जो मौत को सामने देख हंसा करे
हो ज़िन्दगी ऐसी आदमी की
कि मौत भी ,उसकी मौत पर , रोया करे

कृपया मेरा नया ब्लॉग पढ़ें :
http://ekprayas-vandana.blogspot.com

बुधवार, 9 सितंबर 2009

विदा करो मुझे

किस शून्य में
छिप गए हो
कहाँ कहाँ ढूंढूं
किस अंतस को चीरूँ
जब से गए हो मुहँ मोड़कर
प्रीत की हर रीत तोड़कर
किस पथ को निहारूं मैं
कैसे बाट जोहारूं मैं
तुम तो मुख मोड़ गए
मुझे अकेला छोड़ गए
अंखियन ने बहना छोड़ दिया है
ह्रदय का स्पंदन रुक गया है
तुम्हारे वियोग में प्रीतम
अंतस मेरा सूख चुका है
वो तेरा रूठ कर जाना
फिर बुलाने पर भी ना आना
जीवन को ग्रहण लगा गया है
कैसे भीगी सदायें भेजूं
किन हवाओं से पैगाम भेजूं
कैसे ख़त पर तेरा नाम लिखूं
लहू भी सूख चुका है अब तो
निष्क्रिय तन है अब तो
सिर्फ़ साँसों की डोर है बाकी
विदाई की अन्तिम बेला है
और आस की डोर कहीं बंधी है
तुम्हारे मिलन को तरस रही है
तेरे दीदार की खातिर
ज़िन्दगी मौत से लड़ रही है
हर आती जाती साँस के साथ
अधरों पर
तेरे नाम की माला जप रही है
निश्चेतन तन में कहीं
कोई चेतना बची नही है
इक श्वास ही कहीं
अटकी पड़ी है
तेरे विरह में कहीं
भटक रही है
अब तो आ जा
अब तो आ जा..........
मुझे एक बार फिर से
अपना बना जा
मेरी विदाई को
मेरा इंतज़ार न बना
शायद यही सज़ा है मेरी
आह ! नही आओगे
लो चलती हूँ अब
विदा करो मुझे
मेरे इंतज़ार के साथ
आस भी टूट गई
रूह भी पथरा गई
और साँस थम गई

सोमवार, 7 सितंबर 2009

तुम्हारी कैसे बनूँ मैं

सुनो
सब सुनती हूँ मैं
तुम्हारे हर जज़्बात को
समझती हूँ मैं
जो तुम कहते हो
जो नही कहते
वो भी पहचानती हूँ मैं
फिर भी नही चाहती
तेरा इज़हार -ऐ-मोहब्बत
कभी तो समझो
तुम भी मेरी व्यथा
आत्मा पर मोहब्बत शब्द
इक बदनुमा दाग सा लगता है
ह्रदय को बींध जाता है
वैसे ही छलनी हुए इस दिल में
तुम अपने प्रेम का
एक और छिद्र न अन्वेषित करो
अब इसमें कुछ ठहरता नही
फिर तुम्हारे प्रेम को
कहाँ संजोऊँ मैं
कैसे तुम्हारे प्रेम की
आरती उतारूँ मैं कैसे दिल का दिया जलाऊँ मैंसब छिद्रों से प्रवाहित हो जाता है
तेरे प्रेम का रस
अंतस में कुछ भी ठहरता ही नही
भावनाओं का कोई ज्वार
उठता ही नही
प्रेमरस के महासागर की
कोई लहर भिगोती ही नही
ह्रदय तरंगित होता ही नही
कैसे प्रेम का बीज, रोपित करुँ
कहीं कोई स्फुरण होता ही नही
कहीं कोई स्पंदन होता ही नही
फिर कहो कैसे
तुम्हारे प्रेम को
अपना नाम दूँ
कहीं कोई हिलोर
उठती ही नही
फिर कैसे
तेरे सवालों का जवाब दूँ मैं
कैसे तेरे सपनो को
अपनी अंखियों में पालूँ मैं
इस सूखे ह्रदय को
कहो कैसे
प्रेम रस की चाशनी मैं
डूबा डालूँ मैं
कौन सी धातु से
इन छिद्रों को भरूँ मैं
कैसे तेरे प्रेम का प्याला
पियूं मैं
कैसे तुझे अपना
बनाऊं मैं
बोलो, बोलो न
एक बार तो
जवाब दे जाओ
मेरे इस छलनी
ह्रदय के घाव
कैसे भरेंगे
इतना तो बता जाओ
कैसे तुम्हारी
जोगन बनूँ मैं
कैसे इस अंतस की
पीर सहूँ मैं
तुम्हारी कैसे बनूँ मैं ..............................

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

उर्मिला की विरह वेदना

१) प्रियतम हे प्रानप्यारे
विदाई की अन्तिम बेला में
दरस को नैना तरस रहे हैं
ज्यों चंदा को चकोर तरसे है
आरती का थाल सजा है
प्रेम का दीपक यूँ जला है
ज्यों दीपक राग गाया गया हो

२) पावस ऋतु भी छा गई है
मेघ मल्हार गा रहे हैं
प्रियतम तुमको बुला रहे हैं
ह्रदय की किवाडिया खडका रहे हैं
विरह अगन में दहका रहे हैं
करोड़ों सूर्यों की दाहकता
ह्रदय को धधका रही है
प्रेम अगन में झुलसा रही है
देवराज बरसाएं नीर कितना ही
फिर भी ना शीतलता आ रही है

३) हे प्राणाधार
शरद ऋतु भी आ गई है
शरतचंद्र की चंचल चन्द्रकिरण भी
प्रिय वियोग में धधकती
अन्तःपुर की ज्वाला को
न हुलसा पा रही है
ह्रदय में अगन लगा रही है

४) ऋतुराज की मादकता भी छा गई है
मंद मंद बयार भी बह रही है
समीर की मोहकता भी
ना देह को भा रही है
चंपा चमेली की महक भी
प्रिय बिछोह को न सहला पा रही है

५) मेरे जीवनाधार
पतझड़ ऐसे ठहर गया है
खेत को जैसे पाला पड़ा हो
झर झर अश्रु बरस रहे हैं
जैसे शाख से पत्ते झड़ रहे हैं
उपवन सारे सूख गए हैं
पिय वियोग में डूब गए हैं
मेरी वेदना को समझ गए हैं
साथ देने को मचल गए हैं
जीवन ठूंठ सा बन गया है
हर श्रृंगार जैसे रूठ गया है

६) इंतज़ार मेरा पथरा गया है
विरहाग्नि में देह भी न जले है
क्यूंकि आत्मा तो तुम संग चले है
बिन आत्मा की देह में
वेदना का संसार पले है

७) मेरे विरह तप से नरोत्तम
पथ आलोकित होगा तुम्हारा
पोरुष को संबल मिलेगा
भात्री - सेवा को समर्पित तुम
पथ बाधा न बन पाऊँगी
अर्धांगिनी हूँ तुम्हारी
अपना फ़र्ज़ निभाउँगी
मेरी ओर न निहारना कभी
ख्याल भी ह्रदय में न लाना कभी
इंतज़ार का दीपक हथेली पर लिए
देहरी पर बैठी मिलूंगी
प्रीत के दीपक को मैं
अश्रुओं का घृत दूंगी
दीपक मेरी आस का है ये
मेरे प्रेम और विश्वास का है ये
कभी न बुझने पायेगा
इक दिन तुमको लौटा लायेगा,लौटा लायेगा .........................

शनिवार, 22 अगस्त 2009

आरजू

चंचल चपल हे मृगनयनी
नयन बाण से बिद्ध ह्रदय लो
अधरामृत का लेप लगाकर
प्रेम को आधार बनाकर
होशो-हवास पर मोहिनी बरसाकर
मुझको अपना श्याम बना लो
महारास की शीतल बेला में
रूप-लावण्य का रंग बिखरे है
पायल की छम-छम छंकारों पर
प्रीत का बादल नृत्य किए है
दास को प्रेम सुधा का पान कराकर
जीवन का अलंकार बनाकर
अपने हृदयांगन का प्रहरी बना लो
चंचल चपल हे मृगनयनी
मुझको अपना दास बना लो

रविवार, 16 अगस्त 2009

अलविदा मत कहा करो

अलविदा मत कहा करो
किसी के दिल पर क्या गुजरी
ये तुम क्या जानो
तेरे जाने और आने के
बीच का वक्त
कैसे गुजरता है
ये तुम क्या जानो
रोज मिलने को दिल
कितना तड़पता है
ये तुम क्या जानो
बातों की महावर लगाने को
दिल कितना मचलता है
दीदार का काजल लगाने को
नज़रें कितना तरसती हैं
ये तुम क्या जानो
लबों पर अल्फाजों का
तबस्सुम खिलाने को
दिल कितना भटकता है
ये तुम क्या जानो
दिलो की ये दूरी मिटाने को
कुछ पल तेरा साथ पाने को
दिल कितना सुबकता है
ये तुम क्या जानो
तेरे गीतों में ढल जाने को
तेरी काव्य धारा बन जाने को
दिल कितना सिसकता है
ये तुम क्या जानो
इसलिए
कभी अलविदा मत कहा करो

बुधवार, 12 अगस्त 2009

एक भाई का दर्द

एक बेबस भाई की मजबूरी
कोई क्या जाने
बेतरतीब से बिखरे बाल ,
पपडाए होंठ, वीरान आँखें
मैली सारी में लिपटी
इक जिंदा लाश को जब देखा हो
बुखार से तपती देह में भी
उफ़ न कर पाए जो
मर - मर कर हर काम
करती जाए जो
और फिर भी न किसी से
शिकायत कर पाए जो
ऐसा हाल जिस भाई ने
देखा हो अपनी बहन का
कितनी मौत मरा होगा
और अपनी बेबसी से लड़ा होगा
खून तो उसका भी खौला होगा
बंद जुबान को खोलना चाहा होगा
इंसान की खाल में छुपे भेडियों से
बहन को बचाना चाहा होगा
उसकी पीड़ा से कितना तडपा होगा
मगर बहन की आंखों में छुपी वेदना ने
हर भेद खोल दिया होगा
चुप रहने को मजबूर कर दिया होगा
क्यूंकि ज़िन्दगी तो उसे
वहीँ गुजारनी होगी
इसलिए खामोशी का ही
ज़हर पिया होगा
और भाई चाहकर भी
कुछ न कर पाया होगा
नाज़ों - नखरों से पली बहन की
दुर्दशा पर खून के आंसू रोया होगा
बहन की कसम से बंधे रिश्ते को
घुट-घुटकर कैसे निभाया होगा
और उसका दर्द माँ बाप से भी
न कह पाया होगा
और राखी का वचन
इस तरह निभाया होगा
बहन की रक्षा के वचन ने
किस कदर रुलाया होगा
तिल-तिल कर बिलखती
बहन को देख
कैसे आक्रोश को
जज्ब कर पाया होगा
अपने भाई होने के फ़र्ज़ को
कैसे छुपाया होगा
और आंखों में समंदर लिए
चुपचाप उसकी दहलीज से
थके क़दमों से चला आया होगा

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

देखा है कभी

इस शहर के हर शख्स की
आँख में उबलता आक्रोश
देखा है कभी
अपने वजूद से लड़ते
आदमी का रूप
देखा है कभी
सीने में धधकता
ज्वालामुखी लिए हर शख्स
रोज कैसे मर-मरकर जीता है
देखा है कभी
कब , किस मोड़ पर ये
ज्वालामुखी फट जाए
और किसी नुक्कड़ पर
सीने की भड़ास ,अपनी बेबसी
उतारता आदमी
देखा है कभी
परेशानियों से जूझता
ज़िन्दगी से लड़ता आदमी
देखा है कभी
रोज नए ख्वाब बुनता
और फिर रोज
उन ख्वाबों के टूटने पर
टूटता - बिखरता आदमी
देखा है कभी
जीवन जीने की
जद्दोजहदसे परेशान
कभी हालत से लड़ता
तो कभी ख़ुद से लड़ता आदमी
देखा है कभी

रविवार, 2 अगस्त 2009

पुरानी यादें

आज कॉलेज के वक्त की एक पुरानी कॉपी के कुछ पन्ने पढने लगी तो सभी पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं । उन्ही में से कुछ यादें आज आप सबके साथ बाँट रही हूँ .ये सब मेरे लिखे हुए तो नही हैं मगर जिसने भी लिखे हैं बहुत ही खूब लिखे हैं .उस वक्त मैं अपने को वक्त दे पाती थी तो सब पढ़ पाती थी और जो पसंद आ जाता था उसे अपनी यादों में सजा लेती थी।


इश्क के मकबरे के गुम्बद की ऊंचाई बहुत ऊंची है
कब्र में फनाई के अफ़साने खुदे हैं जिसकी सच्चाई
सिर्फ़ वहीं सच्ची लगती है । जन्नत और दो़जख
के मोहरबंद लिफाफे खुदा ने ख़ुद तसदीक किए हैं ।
कब्र की पाक जाली में रेशमी इच्छा मैं भी बांधूंगी
और देखूंगी कि मेरे मोहरबंद लिफाफे की तहरीर
क्या होगी ।


अनुरोध

मेरे तन से नही , दोस्त
मेरे मन से प्यार करो
मेरी उपस्थिति को ,
मेरे सामीप्य को ही ,
फकत न चाहो ,
एक रस्म भर न निबाहो ,
प्यार की कोई हद नही होती
तुम यह प्रमाणित कर दिखलाओ
मेरे सपनो से प्यार करो ,
मेरे विचारों को सराहो
सही और इमानदार करो
मेरे ही पर्याय हो जाओ
अपना प्यार महान हो जाए
तुम तुम न रहो , "मैं " हो जाओ ।

बुधवार, 22 जुलाई 2009

ठहरा हुआ इंतज़ार ......................एक प्रेम कथा

कल की सी बात लगती है
याद है तुम्हें प्रिये
तेरा आना जीवन में मेरे
ज्यों बहारों ने डेरा डाला हुआ हो
छुप -छुपकर कनखियों से
खिड़की के झरोखों से वो तकना मुझे
चांदनी रात में घंटों इंतज़ार करना
सिर्फ़ एक बार देखने की चाहत में
वो पल पल का हिसाब रखना तेरा
यादों के तारों को झंझोड़ जाता है
कभी प्रेम का इजहार किया नही
फिर भी प्रेम के हर रंग को जिया
अंखियों के मौन निमंत्रण को
मौन में ही संजो लिया
तन की प्यास कभी जगी ही नही
मन के प्यासे प्रेमी हम
प्रेम - वंदन में पगे रहे
ख्वाबों की चादर बुनते रहे
प्यार के मोती टांकते रहे
मेरे जिस्म , मेरे अधरों ,
मेरे गेसुओं पर कोई
कविता कभी लिखी ही नही
मगर फिर भी बिना कहे
प्रेम के हर अहसास से गुजरते रहे
इन्द्रधनुषी रंगों से प्रेम रंग में रंगते रहे
कल की सी बात लगती है
याद है तुम्हें प्रिये
फिर एक दिन तुम
मेरे प्रणय - निवेदन को भुला
मातृभूमि की पुकार पर
अपने विजय-रथ पर सवार हो
अपने हर ख्वाब को ,उस पर टंगे मोतियों को
चांदनी रात की परछाइयों को
यादों के दामन में संजो कर
देशभक्ति का कफ़न उढाकर चले गए
और मैं ..............................
तेरे विरह की अग्नि में जलती रही
पर तेरे पथ की न शिला बनी
पल - पल युगों सा निष्ठुर बन गया
कभी चांदनी रात में
तारावली की अनन्य घाटी में
तेरे दीदार को तरसती रही
कभी पतझड़ सी मुरझाती रही
तेरे आने की आस में
दिल को मैं समझाती रही
और फिर एक दिन .............
वो मनहूस ख़बर आई
जीवन का हर रंग उडा ले गई
ये कैसे हो सकता है !
जब धड़कन चल रही हो
तो दिल कैसे रुक सकता है
जब साँस मेरी चल रही हो
तो मौसम कैसे बदल सकता है
मैं न समझ पाई कुछ
तेरे इंतज़ार में इक उम्र गुजार दी मैंने
ज़माने ने 'बावरी' नाम दे दिया
और मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया
अब दर-दर भटकती फिरती थी
सिर्फ़ तुझे खोजती फिरती थी
तेरे ही नाम की माला जपती थी
कभी तेरे ख्यालों से खेलती थी
कभी तेरी याद से उलझती थी
सीने के दर्द को मैं
ज़हर बनाकर पीती थी
मगर फिर भी
साँस गर मेरी चलती है तो
मौजूद है तू कहीं न कहीं
बस इसी आस में जीती थी
सदियाँ गुजर गयीं यूँ ही सूनी
कोई भी सावन मेरा
कभी न हरा हो पाया
और पतझड़ ने जीवन में
अपना डेरा लगा लिया
और उम्र के एक पड़ाव पर आकर
जब आंखों के सतरंगी सपने सारे
चूर - चूर हो चुके
आस का दामन भी जब
लहू सा रिसने लगा
तब एक दिन अच्चानक तुमने
मेरे जीवन में ठहरे हुए
अमावस को दूर करते हुए
अपनी मोहब्बत की चांदनी बिखेरते हुए
मेरे विश्वास को अटल करते हुए
बरसों की प्रीत को
अपने प्रेम की चादर उढाकर
मेरी बरसों से सूनी मांग में
अपने अनुपम प्रेम का सिन्दूर लगाकर
मुझे अपनी प्राणप्रिया बनाकर
हमारे चिर-प्रतीक्षित प्रेम को अमर कर दिया

सोमवार, 20 जुलाई 2009

मचलते अरमान

दोस्तों
जो लिखने जा रही हूँ उसके लिए मैं रूपचंद्र शास्त्री जी की शुक्रगुजार हूँ । मैं इस पोस्ट में १-२ जगह अटक गई थी तो उनकी सहायता से ये पोस्ट पूरी हो पाई। मैं शास्त्री जी की आभारी हूँ उन्होंने अपना कीमती समय दिया ।


नूतन नवल कुसुम खिले हैं
अमल धवल रंग में मिले हैं
सावन की रिमझिम फुहारों सा
मन मयूर भी नृत्य किए है
किसी के आने का पैगाम लिए हैं
जीवन को मदमस्त किए है
जागृत में भी स्वप्न दिखे है
मौसम भी अलमस्त किए है
बादल बिजुरिया चमक रहे हैं
अरमान दिलों में मचल रहे हैं
किसी के साथ को तरस रहे हैं
तन मन को भिगो रहे हैं
न जाने कैसे फंद पड़े हैं
उलझ उलझ का सुलझ रहे हैं
मन का मीत आज आ रहा है
इसीलिए हम संवर रहे हैं

मंगलवार, 14 जुलाई 2009

नदिया की रवानी अभी देखी कहाँ है

तूने नदिया की रवानी
अभी देखी कहाँ है
बहते पानी की मदमस्त जवानी
अभी देखी कहाँ है
बलखाती ,मदमाती , अल्हड नदिया की
लहरों से छेड़खानी
अभी देखी कहाँ है
लहरों के गीतों पर
उछलती नदिया की
अंगडाइयां अभी देखी कहाँ हैं
तूफानों के साये में
पलने वाली नदिया की
तूफानों को बहा ले जाने की अदा
अभी देखी कहाँ है
तूने नदिया की रवानी
अभी देखी कहाँ है

शुक्रवार, 10 जुलाई 2009

कुछ ख्याल

लाश का मेरी
जो चाहे करना यारों
मैं नही पूछने
आने वाला
जिंदा हूँ जब तलक
जी लेने दो
मैं नही यहाँ
अमर होने वाला




वो


एक वो थी
कौन ?
जिसे कभी देखा नही
फिर ?
फिर भी उसे चाहा
क्यूँ ?
पता नही
क्या था उसमें ?
मगर जो था
वो शायद या
सिर्फ़ मेरा था



जिसने चाहा ,शरीर को चाहा
मुझे तो किसी ने चाहा ही नही
जिसने पाया शरीर को पाया
मुझे तो किसी ने पाया ही नही
ये रूप के लोलुप भंवरों को
कभी प्रेम रंग भाया ही नही

रविवार, 21 जून 2009

धरती और आकाश का क्षितिज

धरती और आकाश का क्षितिज
दूर बहुत दूर ..........अनन्त में
कभी मिलकर भी
नही मिल पाते
धरती यूँ ही
आकाश की तरफ़
एकटक , टकटकी बांधे
ताकती रहती है
नेह को उसके
तरसती रहती है
और आकाश
जब मन चाहे तब
बरस जाता है
उसकी चुनरिया को
धानी कर जाता है
और धरती प्रेम के
अथाह सागर में
डूब जाती है
और कभी कभी
ऐसा भी होता है
धरती जो आकाश की ओर
निहारते - निहारते
अपने वजूद को भी
खोने लगती है
तब भी आकाश
अपने अहम् में चूर
धरती की प्रीत को
उसके स्नेह को
उसके धैर्य को
भुलाकर , उसे
वृक्ष के ठूंठ सा
बाँझ बना देता है
उसके रूप - सौष्ठव को
उसकी गरिमा को
उसके त्याग को
बंजर बना देता है
प्रेम के अंकुर को सुखा देता है
उसकी सहनशीलता को
तीक्ष्ण ताप से
कुम्हला देता है
इतनी उपेक्षित होकर भी
धरती आकाश से
मिलन की चाह में
अपने को मिटाती रहती है
एक क्षितिज की चाह में
ख़ुद को भुलाती रहती है
और क्षितिज कभी
नही मिलता उसे
कभी नही मिलता ..........

सोमवार, 8 जून 2009

सिर्फ़ एक दिन

अपनी ज़िन्दगी से
सिर्फ़ एक दिन
उधार दे दो मुझे
उस एक दिन में
उम्र गुजार लेने दो मुझे
एक -एक पल को
यादों में सजा लेने दो मुझे
मेरे संग ,
उम्र के हर बंधन को तोड़ते हुए
कुछ पलों के लिए
ज़िन्दगी को जी लेने दो मुझे
तुम मुझमें और मैं तुम में
ऐसे डूब जायें जहाँ
तुम आंखों से बोलो
और मैं उन अंखियों की
हर भाषा को
हर शब्द को
दिल में उतार लूँ
सिर्फ़ एक दिन तुम
मुझे अपना दे दो
और उस एक दिन में
मेरी उम्र बीत जाए
फिर आँख न खुले
फिर ये सपना न टूटे
बस
ज़िन्दगी की हर तमन्ना
पूरी हो जाए
तुम्हारा हाथ हो मेरे हाथ में
उस स्पर्श को
दिल के एक खास हिस्से में
सहेज लूँ
उस अहसास को कुछ पलों
में ही जी लूँ
सिर्फ़ एक दिन तुम
मुझे अपना दे दो
उस एक दिन में
मेरी ज़िन्दगी बसर हो जाए
तुम्हारे हाथों में
रजनीगंधा के फूल हों
मेरे दिल के हर कोने को
उसकी खुशबू से ऐसे महका दो
फिर कोई सुगंध न बसे मन में
तुम्हारी यादों की खुशबू में
तन मन रच बस जाए
बस एक दिन
तुम मुझे अपना उधार दे दो
मुझे मेरी ज़िन्दगी
जी लेने दो
सिर्फ़ एक दिन तुम
प्रेमी बन जाओ
मैं तुमसे रूठ जाऊँ
और तुम
मनुहार करके
मनाओ मुझे
एक दिन के लिए
प्रेमिका अपनी बनाओ मुझे
और उस एक दिन में
प्रेम के सारे रंग
दिखाओ मुझे
प्रेम रंग में ऐसे डूब जाऊँ
फिर न कोई रंग चढ़े
हर ख्वाहिश पूरी हो जाए
और फिर
उसी प्रेम रंग में
ज़िन्दगी तमाम हो जाए
फिर उस दिन की
कोई शाम न हो
कोई सुबह न हो
कोई कल न हो
कोई दिन न हो
कोई रात न हो
सिर्फ़ इसी एक दिन में
पूरी उम्र गुजर जाए

गुरुवार, 4 जून 2009

एक मुलाक़ात -----सायों की

एक अनजाने
अनदेखे
अजनबी से मोड़ पर
तेरा साया
मेरे साये से
टकरा गया
चारों आँखें
जब टकराई
तो देखा
मेरे साये ने
तेरे साये की
आंखों में
वहां शमशान की
वीरानी थी
सूखे हुए
अश्कों के निशान
तेरी कहानी
कह गए
एक वीराने की
खामोशी
एक अजनबियत
लिए तेरी आँखें
सब हाल बयां
कर गयीं
मेरे साये ने
तेरे साये की
आंखों में
मेरी तस्वीर
ढूंढनी चाही
राख के ढेर में
चाहत की
इक चिंगारी
ढूंढनी चाही
पर वहां तो
एक बेजुबान चीख
दबी दिखी
बिना किसी हलचल के
बिना किसी चाहत के
छुपी हुयी खामोशी देखी
तेरी चाहत की
इंतहा देखी
कोई उम्मीद
न बाकी देखी
पहचानना तो
दूर की बात थी
तेरे साये की
आंखों में
मेरे साये ने
लाश की सी
वीरानी दखी
और फिर
उस अजनबी मोड़ पर
बिना रुके
बिना मुडे
बिना देखे
बिना बात किए
तेरा साया
आगे बढ़ता गया
और मेरा साया
तेरे साये के
क़दमों के निशां तले
तेरे मेरे रिश्ते की
राख को
संजोता रहा

शुक्रवार, 29 मई 2009

बेदर्द मौसम

मौसम का क्या है
बदलता ही रहता है
और फिर लौट कर
भी आता रहता है
मगर कुछ मौसम
ऐसे भी होते हैं
एक बार जो चले जायें
फिर कभी लौट कर नही आते
फिर कितना भी पुकारो
कितने ही पैगाम भेजो
बंजर जमीन की तरह
फिर वहां कोई फूल नही खिलता
बड़े बेदर्द मौसम होते हैं कुछ
यादों में ही बरसते हैं
यादों में ही उलझते हैं
कभी सर्द रातों की तरह
तो कभी धूप की चादर की तरह
कभी मौसमी बरसात की तरह
तो कभी पतझड़ में ठूंठ हुए
पेड़ की तरह
ये बेदर्द मौसम
सिर्फ़ दर्द देकर चले जाते हैं
ऊम्र भर का
लौट कर फिर न आने के लिए।

मंगलवार, 26 मई 2009

एक दास्ताँ ये भी ..........भाग २

आज मौन को तोड़ती हूँ
और बताती हूँ तुम्हें
हम तो सिर्फ़ अहसास हैं
ख्यालों में आस पास हैं
रिश्ता नही कहूँगी इसे
वरना बंधन बन जाएगा
एक बेनामी सा अहसास है
तू कभी मेरा था ही नही
और न ही मैं कभी तेरी
फिर भी ख्यालों में अपने- अपने
हम दोनों पास-पास हैं
मैंने तो कोई वादा किया ही नही
कभी कोई कसम खायी ही नही
और तू जानता है ये
तुझे कभी चाहा भी नही
फिर भी एक अहसास है तू मेरा
जिसे खो भी नही सकती
और पा भी नही सकती
न तूने मुझे देखा
न मैंने तुझे देखा
ऐ मेरे बिन देखे अहसास
न भटक इस मृगतृष्णा में
तुझसे दूर होकर भी पास हूँ मैं
फिर भी न जाने क्यूँ
तुमने या कहो
तेरी चाहत ने खुदा बनाया मुझे
तेरे अनकहे जज़्बात
तेरी भटकती भावनाएं
तेरे खामोश अल्फाज़
तेरे दर्द की इम्तिहान कह जाते हैं
तेरी चाहत का इल्म करा जाते हैं
फिर क्यूँ तू उन्हें
शब्दों में ढालना चाहता है
शब्दों का जामा पहनाकर
इक नया रूप देना चाहता है
कुछ तार दिल से बंधे होते हैं
शब्द जहाँ गौन हो जाते हैं
बंधन दिल के होते हैं
शब्दों के नही
फिर क्यूँ तू मुझे अपनी
ख्याली चाहत में बांधना चाहता है
क्यूँ हर बात का इकरार चाहता है
कुछ बातें बिना किए भी होती हैं
कुछ चाहतें खामोश भी हुआ करती हैं
बिना किसी आडम्बर के
बिना किसी बंधन के
बिना किसी वादे के
और तुम हो कि
चाहत को बाँध रहे हो
शब्दों के तराजू में
तोल रहे हो
क्या हर बात का
इकरार जरूरी होता है
शब्दों में बांधने का
व्यापार जरूरी होता है
मेरे अनकहे जज्बातों को
तुझे समझना होगा
मुझे मुझसे छीनने का जूनून
तुझे छोड़ना होगा
अपने ख्यालों के बंधन में
न बांधना होगा
कुछ मेरे जज्बातों को भी
समझना होगा
चाहत के रंग को
बदलना होगा
मुझे खुदा बनाने वाले
अब तुझे ख़ुद बदलना होगा
क्या अपने खुदा की
एक बात नही मानोगे
सिर्फ़ अहसासों में
चाहत को समेटना होगा
दिल की बात को
जुबान पर न लाना होगा
खामोश रहकर चाहत को
निभाना होगा
तेरी चाहत न रुसवा कर दे मुझको
अब अपनी चाहत को
तुझे दफ़न करना होगा
अरमानों की कब्र सजानी होगी
क्या ये इम्तिहान दे पायेगा
इश्क के इम्तिहान दुनिया ने लिए
आज तेरा इम्तिहान है
तेरे इश्क का इम्तिहान है
जहाँ इश्क तुझसे
तेरी चाहत का
तेरे जूनून का
तेरे सब्र का
इम्तिहान लेगा
तेरी चाहत को
दोस्ती का कफ़न उढाकर
उसे एक नया रूप देगा
क्या इतना तू कर पायेगा
चाहत को दोस्ती में
बदल पायेगा
गर तू ऐसा कर पाया
तो तेरा नाम भी
इश्क की किताब में
अमर हो जाएगा

शनिवार, 23 मई 2009

एक दास्ताँ ये भी ..............भाग १

न जाने कैसे और कब
तुमने ज़िन्दगी में दस्तक दी
धीरे धीरे खामोशी से
अपने जज्बात बयां करते रहे
तुम कहते रहे और
मैं सुनती रही
बिना कुछ पूछे
बिना कुछ जाने
तुम्हारे साथ बहती रही
तुम्हारे दिल की हर बात को
तुम्हारे नगमों में
तो कभी
तुम्हारी ग़ज़लों में
बार बार पढ़ती रही
तुम्हें जानने का
तुम्हारे जज़्बात पहचानने का
दावा करती रही
तुम्हारे अंदाजे बयां पर
मिटती रही
मेरी खामोशी को
तुम इकरार समझ लोगे
मेरे मौन को मेरा
इकरार समझ लोगे
मौन की भी अपनी
भाषा होती है
कभी इकरार की
तो कभी इंकार की
जानती हूँ मैं
आज मौन को शायद
तोड़ना होगा
अपने मौन को
परिभाषित करना होगा
जानती हूँ तुम तन का नही
मन का रिश्ता चाहते हो
मुझे अपनी प्रेरणा
बनाना चाहते हो
अपनी छवि देखी है मैंने
तुम्हारे हर गीत में
उस गीत में छुपे
हर दर्द में
हर शब्द में
हर भाव में
देह से परे
भावों के रिश्ते
कुछ खास होते हैं
जिन्हें न कोई
समझ पाता है
इसलिए आज
मौन को तोड़ना होगा
तुझे ये समझना होगा
ये सिर्फ़ और सिर्फ़
तेरे जज़्बात हैं
मुझे अपनी चाहत न मान
अपने मचलते हुए अरमानों में
न भटकना होगा तुझे
मैं तो सिर्फ़ एक पड़ाव हूँ .....................

क्रमशः .................

शुक्रवार, 15 मई 2009

जिस्म के रिश्ते

प्यार यहाँ होता है कहाँ
सिर्फ़ शरीरों का व्या
पार  होता है यहाँ
रोटी , कपड़ा और मकान के बदले
सिर्फ़ शरीरों के सौदे होते हैं यहाँ
सौदों का बाज़ार सजा है
जिस्म जहाँ व्यापार बना है
जरूरत के बाज़ार में सिर्फ़
जरूरतों के सौदे होते हैं
कीमत चुकाकर शरीरों की
आत्मा को बेचा जाता है
प्यार की कीमत न जाने कोई
शरीरों को जाना जाता है
जिस्म की भूख से पीड़ित जो
वो रूह की भूख को क्या जाने
ये शरीर के भूखे भेडिये
दिलों की आवाज़ कब सुन पाते हैं
शरीरों को चाहने वाले कब
प्यार को पहचान पाते हैं
जिस्मों के बाज़ार में
प्यार का कोई मोल नही
ख़ुद को मिटा देती है जो
उसके अरमानों का कोई मोल नही
जिस्म खुदा बन जाए जहाँ
वहां जज्बातों का मोल कहाँ
ये जिस्मों से बंधे जिस्मों के रिश्ते
जिस्मों के बाज़ार में ख़रीदे बेचे जाते हैं
जिस्मफरोशी की रूह भी काँपे जहाँ
ये इतनी क़यामत ढाते हैं
ये जिस्मों के रिश्ते
जिस्मों पर ही सिमट जाते हैं 

आत्मा को ना छू पाते हैं 

बुधवार, 13 मई 2009

तेरा नाम

मुझे आइना दिखाने वाले
मुझे मुझसे मिलाने वाले
कल तक तुझे था इंतज़ार
आज तुम बन गए हो मेरा प्यार
मेरे इस जनम को सजाने वाले
कल तक थे तुम अजनबी
आज तुम बन गए हो हमराही
मेरी रूह की प्यास बुझाने वाले
मेरी जन्मों की थकन मिटाने वाले
मेरी खामोशी को जुबान देने वाले
मेरे दर्द को भी पी जाने वाले
कल तक तुझे था प्यार
आज मेरी जुबान पर है
बस तेरा नाम , तेरा नाम, तेरा नाम .......................

शनिवार, 2 मई 2009

ऐसा भी होता है

खुश्क आँखें भी रोया करती हैं
पत्थर भी सदाएं देते हैं
ठहरे हुए हर लम्हे की
खामोशी भी पुकारा करती है

खुशियाँ भी रोया करती हैं
गम भी हंसा करते हैं
चलती हुई ज़िन्दगी का
वक्त भी रुका करता है


रूहें भी रोया करती हैं
ज़ख्म भी हंसाया करते हैं
दफ़न होने के बाद भी ,रूहें
ज़िन्दगी को बुलाया करती हैं.