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मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

पुकार

कान्हा तेरे दरस के दीवाने
नैन मेरे बरसे हर पल
कब दोगे दरस कन्हाई
अब तो हो गई जग में हंसाई
मैं तो हो गई तेरी दीवानी
दर दर भटकूँ मारी मारी
खोजत खोजत मैं तो हारी
अब तो दे दो दर्शन कन्हाई
जन्मों से मैं भटक रही हूँ
तेरे मिलन को तरस रही हूँ
जनम जनम की प्यासी हूँ
तेरे विरह में तड़प रही हूँ
अब तो दिखा दो झलक कन्हाई
वरना होगी जग में रुसवाई
सुनते हो तुम सबकी पुकार
मेरी बारी क्यूँ चुप्पी साधी
क्या मैं तेरे लायक नही हूँ
या मेरी पुकार में कमी है
एक बार बतला जा कान्हा
कैसे होगा मिलन हमारा

रविवार, 12 अप्रैल 2009

मत ढूंढो कविता इसमें

दिल से निकले उदगारों का नाम कविता है
मत बंधो इसे गद्य या पद्य में
मत ढूंढो इसमें छंदों को
जो भी दिल की हो आवाज़
उसी का नाम कविता है
क्यूँ ढूंढें हम छंदों को
जब छंद बसे हों दिल में
क्यूँ जाने हम गद्य को
जब हर लफ्ज़ में हों भाव भरे
मत रोको इन हवाओं को
जो किसी के मन में बह रही हैं
चाहे हों कविता रूपी
चाहे हों ग़ज़लों रूपी
या न भी हों मगर
साँस साँस की आवाज़ को
मत बांधो तुम पद्यों में
मत ढूंढो साहित्य इसमें
मत ढूंढो काव्य इसमें
ये तो दिलों की धड़कन हैं
जो भाव रूप में उभरी हैं
भावों में जीने वाले
क्या जाने काव्यात्मकता को
वो तो भावों को ही पीते हैं
और भावों में ही जीते हैं
बस भावाव्यक्ति के सहारे ही
दिल के दर्द को लिखते हैं
कभी पास जाओ उनके
तो जानोगे उनके दर्द को
कभी कुछ पल ठहरो
तो जानोगे उनकी गहराई को
वो तो इस महासमुद्र की
तलहटी में दबे वो रत्न हैं
जिन्हें न किसी ने देखा है
जिन्हें न किसी ने जाना है
अभी तुम क्या जानो
सागर की गहराई को
एक बार उतरो तो सही
फिर जानोगे इस आशनाई को
किसी के दिल के भावों को
मत तोड़ो व्यंग्य बाणों से
ये तो दिल की बातें हैं
दिलवाले ही समझते हैं
तुम मत ढूंढो कविता इसमें
तुम मत ढूंढो कविता इसमें............................

शनिवार, 11 अप्रैल 2009

अविरल प्रेम को जाना होता

तू कृष्ण बनकर जो आया होता
तो मुझमें ही राधा को पाया होता

कभी कृष्ण सी बंसी बजायी होती
तो मैं भी राधा सी दौडी आई होती

कभी कृष्ण सा प्रेमी बना होता
तो तुझमें ही राधा समायी होती

गर तूने कृष्ण को जाना होता
तो कब का राधा को पा लिया होता

इन अनन्य प्रेमियों की फेहरिस्त में
अपना नाम भी सजा लिया होता

अनन्य प्रेम में एक बार पगा होता
तो अविरल प्रेम को पा लिया होता

फिर वहां न मैं होती न तू होता
कृष्ण राधा सा स्वरुप पा लिया होता

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

उम्र के पड़ाव

उम्र के इक पड़ाव पर
सब कुछ अच्छा लगता है
साथी का हर अंदाज़
निराला लगता है
हर खामी भी
इक अदा सी लगती है

उम्र के अगले पड़ाव पर
सब कुछ बदलने लगता है
साथी का सादा वक्तव्य भी
शूल सा चुभने लगता है
शब्दों के रस की जगह
अब ज़हर सा घुलने लगता है

उम्र के आखिरी पड़ाव पर
कुछ भी न अच्छा लगता है
साथी की तो बात ही क्या
अपना साथ भी न अच्छा लगता है
कभी दिल बच्चा बनने लगता है
कभी उम्र का बोझ बढ़ने लगता है
उम्र के इस पड़ाव पर
कोई न चाहत होती है
सिर्फ़ खामोशी होती है
और इंतज़ार ..........................
एक खामोश पल का .........................

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

इक ताजमहल दिल का

मुझे ताजमहल अपना बनाया होता
फिर दर्द ज़िन्दगी में न आया होता

कभी मुझसे दिल लगाया होता
ज़ख्म खाकर यूँ न मुरझाया होता

कुछ पल खामोश गुजर गए होते
गर मुझको ज़िन्दगी में बुलाया होता

लबों पे ये खामोशी न होती
गर मुझे दिल में बसाया होता

दर-ओ-दीवार यूँ ना सूने होते
गर मेरी तस्वीर को लगाया होता

मुझे मुमताज अपनी बनाया होता
तो रूह को तेरी सुकून आया होता

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

ये कैसा इंतज़ार !

तुमने दर्द माँगा
मैं दे न सकी
तुमने दिल माँगा
मैं दे न सकी
तुमने आंसू मांगे
मैं दे न सकी
तुमने प्यार माँगा
मैं दे न सकी
तुमने मुझे चाहा
मैं तुम्हें चाह न सकी
दिल की बात कभी
होठों पर ला न सकी
न जाने किस मिटटी के बने हो तुम
जन्मों के इंतज़ार के लिए खड़े हो तुम
ये कैसी खामोशी है
ये कैसा नशा है
ये कैसा प्यार है
जिसे जन्मों का इंतज़ार है
क्यूँ ज़हर ये पी रहे हो
क्यूँ इश्क में मर रहे हो
मैं इक ख्वाब हूँ , हकीकत नही
किसी की प्रेयसी हूँ,तेरी नही
फिर क्यूँ इस पागलपन में
जी रहे हो
इतना दीवानावार प्यार कर रहे हो
अगले जनम मिलन की आस में
क्यूँ मेरा इंतज़ार कर रहे हो

रविवार, 29 मार्च 2009

टुकडियां

एक कल
कल आया था
एक कल
आज आया है
एक कल
कल आएगा
ये कल कल
में जीवन
यूँ ही गुजर जाएगा



इस बार
मौसम की तरह
मैं भी बदली
कभी कली सी खिली
कभी पतझड़ सी मुरझाई
कभी बदली सी बरसी
कभी कुहासे सी शरमाई


बिना कहे भी बात होती है
बिना मिले भी मुलाक़ात होती है
जब बंधे हो दिल के तार दिल से
तब बिन सावन भी बरसात होती है


दिल ने दिल से पूछा
दिल ने दिल से बात की
दिल ने दिल को आवाज़ दी
दिल से दिल की आवाज़ आई
दिल को न ढूंढ यारा
अब दिल दिल न रहा


अपनी बेबसी को बयां करती हो
ज़ख्म दिल के छुपा लेती हो
अंखियों तुम हो कमाल की
नज़रों में ठहरे मोतियों को भी
पलकों के कोरों में दबा लेती हो

शनिवार, 21 मार्च 2009

मंथन

मंथन किसी का भी करो
मगर पहले तो
विष ही निकलता है
शुद्धिकरण के बाद ही
अमृत बरसता है
सागर के मंथन पर भी
विष ही पहले
निकला था
विष के बाद ही
अमृत बरसा था
विष को पीने वाला
महादेव कहलाया
अमृत को पीने वालों ने भी
देवता का पद पाया
आत्म मंथन करके देखो
लोभ , मोह , राग ,द्वेष
इर्ष्या , अंहकार रुपी
विष ही पहले निकलेगा
इस विष को पीना
किसी को आता नही
इसीलिए कोई
महादेव कहलाता नही
आत्म मंथन के बाद ही
सुधा बरसता है
इस गरल के निकलते ही
जीवन बदलता है
पूर्ण शुद्धता पाओगे जब
तब अमृत्व स्वयं मिल जाएगा
उसे खोजने कहाँ जाओगे
अन्दर ही पा जाओगे
आत्म मंथन के बाद ही
स्वयं को पाओगे
मंथन किसी का भी करो
पहले विष तो फिर
अमृत को भी
पाना ही होगा
लेकिन मंथन तो करना ही होगा

मंगलवार, 17 मार्च 2009

क्या मैं इंसान हूँ ?

क्या मैं इंसान हूँ?
क्या मुझमें
संवेदनाएं हैं ?
जब किसी का दर्द
मुझे विचलित नही करता
किसी के दुःख से
मैं द्रवीभूत नही होता
किसी की खुशी से
मैं खुश नही होता
किसी के लिए भी
मेरे दिल में
अहसास नही होते
मैं अपनी ही धुन में
बेखबर ,
अपने सुख के लिए ही
जीना चाहता हूँ
क्या मैं इंसान हूँ?
ना अपना देखता हूँ
ना पराये को
जो हूँ बस मैं हूँ
मैं किसी भी
हादसे को देखकर भी
अनदेखा कर देता हूँ
मगर अपने साथ हुए
हर हादसे के प्रति
मैं दुखित हो जाता हूँ
कभी बोध नही कर पाता
दुख तो सबका बराबर है
क्या मैं इंसान हूँ?
एक धमाके से
घरों को बरबाद करता हूँ
घरों के सूने आँगन से
सिसकती आहों से
मुझे कोई सरोकार नही
बस मैं जो चाहता हूँ
वो पाना चाहता हूँ
फिर चाहे किसी का
आँगन सूना हो
या मांग सूनी हो
कोई अनाथ हो या
किसी के सर से ही
बाप का साया उठे
मुझे तो सिर्फ़ अपना
आँगन सजाना है
अपने दर्द से निजात पाना है
क्या मैं इंसान हूँ?
संवेदनहीन ,संवेदनाशून्य,
निर्मम ,निष्ठुर
क्या मैं इंसान हूँ ?

शुक्रवार, 13 मार्च 2009

टीस

खुशियाँ भी कभी
खुशी से न मिलीं
जब भी मिली
कोई खुशी
अपने साथ
लाखों ग़मों की
सौगात लेकर मिली
दामन था छोटा
किस किस को सँभालते
जो था ज्यादा
उससे ही दामन भर गया
और खुशी जा जाने
कब फिसल गई
हर खुशी ऐसे ही
फिसल जाती है
दामन में न समाती है
ये तो वो अमृत की बूँद है
जो ज़हर में पड़ जाती है
फिर भी असर न दिखाती है

बुधवार, 11 मार्च 2009

ये कैसी होली

कहीं तो रंग ,अबीर ,गुलाल उडाते
रंगों की बोछार उडाते
होली लोग मनाते
और
कहीं कोई जिंदगी को
जीने की जुगाड़ लगाता
होली के इस हुडदंग में
शाम की रोटी के जुगाड़ में
गुब्बारों की खाली
पन्नियाँ बटोरता जीवन
क्या उनमें उमंग नही
होली की वो तरंग नही
हाय ! यह कैसी होली है
यह कैसी होली है ?

रविवार, 8 मार्च 2009

श्यामा श्याम की होरी का रंग

श्याम रंग में रंग गई राधे
श्यामल श्यामल हो गई राधे
एक रंग हैं , एक रूप हैं
होरी का हर रंग खूब है
प्रीत के रंग में रंग गई राधे
श्यामल श्यामल हो गई राधे
श्याम प्रीत में सुध बुध भूली
प्रेम की तो खान है राधे
श्याम के रंग की दीवानी राधे
श्यामल श्यामल हो गई राधे
कौन श्याम है कौन है राधे
कैसे कोई पहचाने राधे
प्रेम के रंग में रंग गई राधे
श्यामल श्यामल हो गई राधे
श्याम रंग में रंग गई राधे.

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

गर किसी को मिले मेरा पता

गुरुवार, 5 मार्च 2009

zakhm: एक कतरा खुशी

Wednesday, August 6, 2008

virhan का दर्द

virhan का दर्द sawan क्या जाने
कैसे कटते हैं दिन और कैसे कटती हैं रातें
बदल तो आकर बरस गए
चहुँ ओर हरियाली कर गए
मगर virhan का सावन तो सुखा रह गया
पीया बीना अंखियों से सावन बरस गया
सावन तो मन को उदास कर गया
बीजली बन कर दिल पर गिर गया
कैसे सावन की फुहार दिल को जलाती है
इस दर्द को तो एक virhan ही जानती है

आत्मकथा-----------प्रेम की

मैं प्रेम हूँ,प्यार हूँ,इश्क हूँ,मोहब्बत हूँ,इक अहसास हूँ,खुदा हूँ और न जाने क्या क्या हूँ.हर किसी के लिए अलग.किसी के दिल का चैन हूँ तो किसी के दिल का दर्द,किसी के लिए ख्वाब हूँ तो किसी के लिए हकीकत,किसी का जीवन हूँ तो किसी के लिए मौत...........................सबके अहसास , सबके दायरे, सबकी सोच सब अलग मगर फिर भी एक अलग पहचान लिए मैं हर दिल में पलता हूँ किसी न किसी रूप में.कभी प्रेमी के प्रेम में तो कभी माँ के दुलार में,कभी पिता के अहसास में तो कभी बेटी के जज़्बात में,कभी बहन के रूप में तो कभी भाई के रूप में,कभी पत्नी के खवाबों में तो कभी पति के दिल में,न जाने कितने ही असंख्य रूपों में लोग मुझे जानते हैं और मेरे साथ जीते हैं अपने हर गम और खुशी के पलों को.किसी ने मुझे इंसान में देखा तो किसी ने भगवान में , मगर पूरा किसी ने न जाना। जब जाना नही तो पाना कैसा?
मेरा रूप-सौंदर्य शाश्वत है। मैं कभी नही मरता,हमेशा हर हाल में जीवित रहता हूँ.मैं गीतों में , रंगों में,रूपों में जो भी जैसा चाहे ,हर हाल में ढल जाता हूँ.जिस बंधन में भी कोई बांधना चाहे बंध जाता हूँ। मेरा मुझमें कुछ नही है,जो कुछ है वो सामने वाले के मन में ,उसके विचारों में , उसकी सोच में , उसकी आंखों में ,उसके दिल में है, जैसा भी चाहता है मुझे रूप दे लेता है।
मेरे आनंद में सराबोर हर प्राणी मुझमें ही खुदा ढूंढता है और सच मानो तो खुदा बसता भी तो प्रेम में ही है.प्रेम को जानना क्या इतना आसान है.प्रेम को तो सिर्फ़ कुछ लोगों ने जाना और जिन्होंने जाना उन्होंने ही पाया.प्रेम हो तो राधा सा,मीरा सा -------जहाँ शरीर तो थे ही नही। था तो सिर्फ़ ---------प्रेम.प्रेम के अलावा वहां कुछ न था। क्या रस था , क्या आनंद था। इसे कहते हैं ----------प्रेम।
शाश्वत सत्य ,चिरंतन,दिव्यता के पार। मुझे जानना और पाना हर किसी के बस की बात कहाँ!मैं तो रस का महासागर हूँ जहाँ प्रेमी डूबते ही हैं-------बहुत गहरे अनंत में.
बहुत से लोगों ने मेरे बारे में न जाने सदियों से कितना लिखा और आज भी लिख रहे हैं और आगे भी लिखते रहेंगे मगर फिर भी मैं किसी की भी कविता में ,किसी भी लेख में क़ैद न हो पाया क्यूंकि मैं अनंत हूँ मैं भी शायद अपने बारे में पूरा सच नही बता सकता क्यूंकि मैं क्या हूँ -------------ये तो सिर्फ़ मुझमें डूबने वाला ही बता सकता है । जिसने इस रस में डुबकी लगायी है वो ही जानता है कि -----------मैं प्रेम हूँ.

सोमवार, 2 मार्च 2009

तेरे आने से पहले
और
तेरे जाने के बाद
तेरे रोने से पहले
और
तेरे हंसने के बाद
तेरे ग़मों से पहले
और
तेरी खुशियों के बाद
तेरी यादें,तेरी खामोशी,
तेरे दर्द,तेरे आंसू
आकर हमें घेर लेते हैं
कभी तन्हाई का
अहसास ही नही होता.

शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

औरत का घर?

सदियों से औरत अपना घर ढूंढ रही है
उसे अपना घर मिलता ही नही
पिता के घर किसी की अमानत थी
उसके सर पर इक जिम्मेदारी थी
हर इच्छा को ये कह टाल दिया
अपने घर जाकर पूरी करना
पति के घर को अपनाया
उस घर को अपना समझ
प्यार और त्याग के बीजों को बोया
खून पसीने से उस बाग़ को सींचा
हर आह,हर दर्द को सहकर भी
कभी उफ़ न किया जिसने
उस पे ये इल्जाम मिला
ये घर तो तुम्हारा है ही नही
क्या पिता के घर पर देखा
वो सब जो यहाँ तुम्हें मिलता है
यहाँ हुक्म पति का ही चलेगा
इच्छा उसकी ही मानी जायेगी
पत्नी तो ऐसी वस्तु है
जो जरूरत पर काम आएगी
उसकी इच्छा उसकी भावना से
हमें क्या लेना देना है
वो तो इक कठपुतली है
डोर हिलाने पर ही चलना है
ऐसे में औरत क्या करे
कहाँ ढूंढें , कहाँ खोजे
अपने घर का पता पूछे
सारी उम्र अपनी हर
हर तमन्ना की
बलि देते देते भी
ख़ुद को स्वाहा करते करते भी
कभी न अपना घर बना सकी
सबको जिसने अपनाया
उसको न कोई अपना सका
आज भी औरत
अपना घर ढूंढ रही है
मगर शायद ......................
औरत का कोई घर होता ही नही
औरत का कोई घर होता ही नही

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

सिलवटें

बिस्तर की सिलवटें तो मिट जाती हैं
कोई तो बताये
दिल पर पड़ी सिलवटों को
कोई कैसे मिटाए
उम्र बीत गई
रोज सिलवटें मिटाती हूँ
मगर हर रोज
फिर कोई न कोई
दर्द करवट लेता है
फिर कोई ज़ख्म
हरा हो जाता है
और फिर एक नई
सिलवट पड़ जाती है
हर सिलवट के साथ
यादें गहरा जाती हैं
और हर याद के साथ
एक सिलवट पड़ जाती है
फिर दिल पर पड़ी सिलवट
कोई कैसे मिटाए

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

प्यार हो तो ऐसा

बर्फ की मानिन्द
सर्द हाथ को
जो छुआ उसने
कुछ कहने और सुनने
से पहले
वहीँ साँसे
थम गयीं
आँखें पथरा गयीं
और
रूह खामोश हो गई

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

दिमाग के कीडे

कहते हैं न की जब किसी चीज़ की धुन सवार हो जाए तो फिर उससे बचना मुश्किल है और उसे पाना इंसान की पहली जरूरत बन जाता है । शायद कुछ ऐसा ही हाल हमारा है जब तक कुछ न लिखो तब तक दिमाग में लिखने का कीडा कुलबुलाता रहता है । कितना ही समझा लो मगर सुनता कौन है । फिर चाहे उसका कोई सारगर्भित अर्थ हो या न हो मगर जनाब दिमाग को तो आराम करने की फुर्सत ही नही होती न । अगर न लिखें तो शायद फट ही जाएँ किसी न किसी पर । सच कुछ दिमाग ऐसे ही होते हैं । अब देखो हमारे दिमाग को ---------कुछ और न मिला तो यही लिखने बैठ गया । है न .........दिमाग का फितूर । अब इसे और क्या कहेंगे। सच ऐसे कीडे बहुत परेशां करते हैं कभी कभी ।
अब हम कहीं किसी जरूरी काम में बैठे हैं जहाँ बहुत ध्यान से कोई लिखा पढ़ी का काम करना हो तो जनाब वहां भी शुरू हो जाते हैं । अब पुचो इनसे की उस वक्त हम तुम्हें कैसे टाइम दें और जो तुम्हारे अन्दर कुलबुला रहा है उसे कैसे शब्दों में ढलकर पन्नों पर उतर दें। मगर नही जनाब........यह कहाँ मानने वाले हैं । यह वहां भी शुरू हो जाते हैं और जहाँ हिसाब लिखा जा रहा है उसी कागज़ के पीछे चालू हो जाते हैं ।
हद तो तब होती है जब हम उनके साथ होते हैं और ये जनाब अपने काम में लग जाते हैं । अब इनसे कोई पूछे उस वक्त हम इनके बारे में कैसे सोचें। जनाब कुछ वक्त तो आराम फरमा लिया करो ।
सच यह कीडा कुछ अजीबोगरीब होता है न वक्त देखता है और न जगह और शुरू हो जाता है .मुझे जैसे न जाने कितनो का जीना दुश्वार किए रखता है । लेकिन शायद इसके बिना हम जैसों की गति भी तो नही ।

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

प्रेम का अनोखा स्वरुप

प्रेम का जो स्वरुप आज मैंने देखा है उसे देखकर ह्रदय आंदोलित हो गया .अभी मैंने राज्नीश्क्झा जी का ब्लॉग अनकही खोला और वहां प्रेम का स्वरुप देखकर अहसास हुआ की प्रेम क्या होता है कोई उन लोगों से सीखे.सच प्रेम का सच्चा स्वरुप तो वो ही है.आज लोग प्रेम को एक दिन का खेल बनाकर खेलते हैं यह उन लोगो के लिए एक सबक है । प्रेम एक ऐसी अनुभूति है जहाँ कोई प्रतिकार नही, कोई अपेक्षा नही सिर्फ़ त्याग , समर्पण , विश्वास और निस्वार्थ प्रेम।

प्रेम करना भी एक कला है । यह होता है अलोकिक प्रेम ---------जहाँ सिर्फ़ समर्पण है । हर अपेक्षा से परे । सिर्फ़ भावनाओं से लबरेज़ । इसे कहते हैं रूह से रूह का असली मिलन जहाँ शारीरिक विकलांगता गौण हो गई है और उस विकलांगता का कोई निशान वहां नही है ,हर चेहरा खुशी से भरपूर जीवन जी रहा है ।

ज़िन्दगी जीना कोई उनसे सीखे और प्रेम करना भी ।
प्रेम की पराकाष्ठा है -----------सारी ज़िन्दगी ऐसे प्रेम की हसरत ही रहती है मगर ऐसा प्रेम हर किसी का नसीब नही होता ।
खुदा प्रेम दे तो ऐसा दे
जहाँ प्रेम के सिवा कुछ न हो
प्रेम ही खुशी हो
प्रेम ही बलिदान हो
प्रेम ही समर्पण हो
प्रेम ही संसार हो
प्रेम के महासागर में
प्रेमानंद में डूबे
प्रेमियों का वास हो
खुदा प्रेम दे तो ऐसा दे...........


मैं यहाँ रजनीश जी के ब्लॉग का पता दे रही हूँ पहले उसे देखियेगा और फिर यह पढियेगा ।

rajneeshkjha.ब्लागस्पाट.कॉम

इसमें अनकही खोलियेगा तब प्रेम का अनोखा स्वरुप देखने को मिलेगा।

www.ankahi.tk

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

चाहतें कब ख़त्म होती हैं
चाहत तो पत्थर भी रखता है
कि कोई उसे भी देवता बना दे

रविवार, 8 फ़रवरी 2009

मोहब्बत ऐसे भी होती है शायद

न तुमने मुझे देखा
न कभी हम मिले
फिर भी न जाने कैसे
दिल मिल गए
सिर्फ़ जज़्बात हमने
गढे थे पन्नो पर
और वो ही हमारी
दिल की आवाज़ बन गए
बिना देखे भी
बिना इज़हार किए भी
शायद प्यार होता है
प्यार का शायद
ये भी इक मुकाम होता है
मोहब्बत ऐसे भी की जाती है
या शायद ये ही
मोहब्बत होती है
कभी मीरा सी
कभी राधा सी
मोहब्बत हर
तरह से होती है